यूपी के गो संरक्षण में अब जेन जी की एंट्री, गांव-गांव तैयार होंगे 10 हजार ‘गो मित्र’

यूपी के गो संरक्षण में अब जेन जी की एंट्री, गांव-गांव तैयार होंगे 10 हजार 'गो मित्र'

Gen Z enters fray for cow conservation in UP

– यूपी में बच्चों के मन में गो माता के प्रति प्रेम बढ़ाने के लिए गांव गांव चलेगा अभियान

– योगी सरकार नई पीढ़ी को बनाएगी गो संरक्षण के प्रति सजग

– तैयार किए जाएंगे मास्टर ट्रेनर, देंगे अन्य ट्रेनर को प्रशिक्षण

– गो संरक्षण में रुचि रखने वालों को दी जाएगी वरीयता

Cow Protection Campaign : योगी सरकार की प्रदेश में गो संरक्षण अभियान से अब नई पीढ़ी, खासकर जेन जी को भी जोड़ने की तैयारी है। गांव-गांव अभियान चलाकर युवाओं को गोवंश के संरक्षण, गो सेवा और इसके सामाजिक-आर्थिक महत्व के प्रति जागरूक किया जाएगा। इसके लिए करीब 10 हजार ‘गो मित्र’ तैयार किए जाएंगे। पहले मास्टर ट्रेनर प्रशिक्षित होंगे और फिर उनके माध्यम से अन्य लोगों को प्रशिक्षण दिया जाएगा। गो संरक्षण और गो सेवा में पहले से रुचि रखने वाले लोगों को इसमें वरीयता दी जाएगी। इसके साथ ही योगी सरकार गो संरक्षण को ग्रामीण अर्थव्यवस्था, प्राकृतिक खेती, महिला सशक्तीकरण, हरित ऊर्जा और रोजगार से जोड़कर आत्मनिर्भरता का मॉडल विकसित करने पर काम कर रही है।

 

गो सेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता ने बताया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गो संरक्षण को सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल किया है। सरकार का प्रयास है कि गोवंश का संरक्षण केवल गो आश्रय स्थलों तक सीमित न रहे, बल्कि इससे रोजगार और ग्रामीण समृद्धि के नए अवसर भी पैदा हों। इसी सोच के तहत गोशालाओं को गोबर और गोमूत्र आधारित उत्पादों, प्राकृतिक खेती, बायोगैस और अन्य आर्थिक गतिविधियों से जोड़ा जा रहा है।

 

बच्चों और युवाओं तक पहुंचेगा गो संरक्षण का संदेश

गो सेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता ने बताया कि नई पहल में सबसे ज्यादा जोर बच्चों और युवाओं को गो संरक्षण से जोड़ने पर रहेगा। गांवों में अभियान चलाकर उन्हें देसी गोवंश, गो सेवा, प्राकृतिक खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में गाय के महत्व की जानकारी दी जाएगी। उद्देश्य यह है कि नई पीढ़ी गो संरक्षण के पर्यावरणीय और आर्थिक पहलुओं को भी समझे।

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अभियान को प्रभावी तरीके से आगे बढ़ाने के लिए मास्टर ट्रेनर तैयार किए जाएंगे। ये मास्टर ट्रेनर आगे अन्य लोगों को प्रशिक्षण देंगे। इस व्यवस्था के जरिए गांव-गांव प्रशिक्षित लोगों का नेटवर्क खड़ा करने की तैयारी है। गो संरक्षण में रुचि रखने वाले लोगों को प्राथमिकता दी जाएगी।

 

7,500 से अधिक गो आश्रय स्थलों में 12 लाख से ज्यादा गोवंश

उत्तर प्रदेश में निराश्रित गोवंश के संरक्षण और भरण-पोषण के लिए बड़े स्तर पर अभियान चलाया जा रहा है। प्रदेश में साढ़े सात हजार से अधिक गो आश्रय स्थल विकसित किए गए हैं, जिनमें 12 लाख से अधिक गोवंश संरक्षित हैं। किसानों की फसलों को निराश्रित पशुओं से होने वाले नुकसान को कम करने के साथ गोवंश को सुरक्षित आश्रय देना इस अभियान का प्रमुख उद्देश्य है।

योगी सरकार ने गोवंश के भरण-पोषण के लिए दी जाने वाली सहायता राशि में भी वृद्धि की है। प्रति गोवंश प्रतिदिन मिलने वाली राशि को 30 रुपये से बढ़ाकर 50 रुपये किया गया है। वहीं अधिकांश गो आश्रय स्थलों पर सीसीटीवी कैमरों के माध्यम से निगरानी की व्यवस्था भी की गई है।

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1.15 लाख पशुपालकों को सौंपे गए करीब 1.85 लाख गोवंश

गोवंश संरक्षण में आम लोगों की भागीदारी बढ़ाने के लिए मुख्यमंत्री सहभागिता योजना और पोषण मिशन को भी आगे बढ़ाया गया है। इसके तहत करीब 1.15 लाख पशुपालकों को लगभग 1.85 लाख गोवंश सुपुर्द किए गए हैं। इससे गोवंश को परिवार आधारित संरक्षण मिलने के साथ पशुपालकों को भी इससे जुड़ने का अवसर मिला है।

उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा पशुधन वाला राज्य है और दुग्ध उत्पादन में भी देश में पहले स्थान पर है। सरकार अब इस क्षमता को ग्रामीण आय और रोजगार बढ़ाने के बड़े माध्यम के रूप में विकसित करने पर जोर दे रही है।

 

गोशाला से गो आधारित उद्योग तक बढ़े कदम

सरकार की रणनीति गोशालाओं को धीरे-धीरे आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने की है। प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में गोबर से गो-काष्ठ, गो-पेंट, वर्मीकम्पोस्ट, धूपबत्ती, अगरबत्ती, गमले और दीपक जैसे उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। इसके साथ पंचगव्य, घनामृत और जीवामृत जैसे उत्पादों को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।

इन गतिविधियों में महिला स्वयं सहायता समूहों की भागीदारी बढ़ाई जा रही है। इससे महिलाओं के लिए गांव में ही स्वरोजगार के अवसर पैदा हो रहे हैं। जो गोबर पहले सामान्य अपशिष्ट के रूप में देखा जाता था, वही अब खाद, ऊर्जा और विभिन्न उत्पादों के जरिए आय का साधन बन रहा है।

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हर जिले की गोशालाओं का होगा मूल्यांकन

उत्तर प्रदेश गो सेवा आयोग ने प्रदेश की गोशालाओं की क्षमता का व्यापक मूल्यांकन करने की पहल की है। इसके पीछे उद्देश्य अलग-अलग जिलों की स्थानीय परिस्थितियों और उपलब्ध संसाधनों के अनुसार गो-आधारित आर्थिक गतिविधियां विकसित करना है।

 

योजना है कि किसी जिले में गोबर से बायोगैस की संभावना बेहतर है तो वहां उस पर जोर दिया जाए, जबकि दूसरे जिले में जैविक खाद, गो-काष्ठ या गोमूत्र आधारित उत्पादों की इकाइयां विकसित की जाएं। सरकार का लक्ष्य गो संरक्षण को स्थानीय रोजगार से जोड़ना और गांवों में आय के नए स्रोत तैयार करना है।

ब्रिटेन की हरी घास हुई पीली, 190 साल में सबसे सूखा जुलाई, जानें क्यों बदल गया पूरा नजारा

अपनी हरी-भरी घास और खूबसूरत पार्कों के लिए मशहूर ब्रिटेन का नजारा इस बार बदला हुआ है। ब्रिटेन में पड़ी भीषण गर्मी और सूखे ने इसकी मनमोहक हरियाली पर काफी असर डाला है और यहां की घास हरी से पीली, भूरी और सुनहरी रंग की दिखने लगी हैं। इंग्लैंड में इस बार 190 वर्षों में सबसे सूखा जुलाई देखने को मिला है जबकि वेल्स ने भी अपने इतिहास का सबसे सूखा जुलाई देखा। इस वजह से देश के लॉन, पार्क और खेत सूख रहे हैं।

यूके सरकार के मुताबिक महीनों तक बेहद कम बारिश और हाई टेंप्रेचर के बाद 10 अगस्त तक इंग्लैंड का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा आधिकारिक तौर पर सूखे की चपेट में आ चुका था। इस जल संकट ने नदियों, जलाशयों, कृषि योग्य भूमि और वन्यजीवों पर काफी असर डाला है।

क्यों पीली पड़ रही है हरी घास?

घास के रंग में आया यह बदलाव मुख्य रूप से पौधों का सर्वाइवल रिस्पॉन्स है। जब मिट्टी काफी सूख जाती है तो घास का बढ़ना रुक जाता है और वो डॉर्मेंट स्टेट में चली जाती है। जब घास पानी और एनर्जी बचाने की कोशिश करती है तो उसकी पत्तियां अपना स्वस्थ हरा रूप खो देती हैं और पीली, भूरी या पुआल के रंग की हो जाती हैं। रॉयल हॉर्टिकल्चरल सोसाइटी के मुताबिक स्थापित लॉन अक्सर सूखे के लंबे दौर में भी जीवित रह सकते हैं क्योंकि सतह के नीचे उनकी जड़ें जीवित रहती हैं। जैसे ही बारिश लौटती है, उनमें फिर से नई हरी पत्तियां निकल आती हैं। फिर भी मौजूदा स्थितिइतनी गंभीर है कि कुछ क्षेत्रों में स्थायी नुकसान हो सकता है। अगर सूखा जारी रहता है तो घास कमजोर हो सकती है और जड़ें खराब हो सकती हैं।

किसानों, जलाशयों और जल आपूर्ति पर पड़ा भारी असर

इस सूखे मौसम का सीधा असर ब्रिटेन के किसानों पर भी पड़ रहा है। इंग्लैंड की पर्यावरण एजेंसी ने रिपोर्ट दी है कि घास की पैदावार घटने के कारण पशुपालक किसानों को समय से पहले ही सर्दियों के लिए रखा गया चारा इस्तेमाल करने पर मजबूर होना पड़ रहा है। इसके अलावा किसानों को समय से पहले फसलों की कटाई करनी पड़ रही है, फसल की पैदावार कम हो रही है और खेतों में आग लगने का खतरा काफी बढ़ गया है।

बारिश की कमी का आंकड़ा बेहद हैरान करने वाला है

जुलाई महीने में इंग्लैंड में केवल 6।5 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जो कि उसके दीर्घकालिक औसत का मात्र 10 प्रतिशत है। दक्षिणी इंग्लैंड के कुछ हिस्सों में पूरे महीने लगभग न के बराबर बारिश हुई। देश में जलाशयों का जलस्तर काफी गिर गया है, नदियों का प्रवाह असामान्य रूप से कम है और लाखों लोग पानी के उपयोग पर लगी पाबंदियों से मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। सूखे के हालातों को देखते हुए सरकार ने किसानों के लिए अतिरिक्त सहायता की घोषणा की है।

विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि लोग अपने घर के लॉन में हर कीमत पर घास को हरा रखने की जिद न करें। रॉयल हॉर्टिकल्चरल सोसाइटी का कहना है कि भूरी हुई घास बारिश लौटने पर प्राकृतिक रूप से ठीक हो सकती है जबकि सूखे के दौरान ज्यादा सिंचाई करने से सीमित जल आपूर्ति पर एक्स्ट्रा दबाव पड़ेगा।

Nag Panchami 2026: नाग पंचमी के त्योहार पर बन रहा ये खास संयोग, भूल कर भी न करें ये गलतियां

Nag Panchami 2026: हर साल की तरह इस बार भी नाग पंचमी सावन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को होगी। 17 अगस्त 2026 दिन सोमवार को नाग पंचमी मनाई जाएगी। यह और भी खास हो गई है, क्योंकि इसी दिन सावन का तीसरा सोमवार पड़ रहा है। ऐसे शुभ दिन पर नाग पंचमी और सावन सोमवार का यह संयोग पर्व के महत्व और ज्यादा बढ़ा देता है। माना जाता है कि इस विशेष संयोग में शुभ मुहूर्त पर नाग देवता की विधि-विधान से पूजा करने से भक्तों को 4 गुना ज्यादा फल मिलता है। पूजा मन लगाकर विधि विधान से करनी चाहिए।

पूजा विधि

इस साल नाग पंचमी 17 अगस्त को मनाई जाने वाली है। ज्योतिष के मुताबिक नाग पंचमी श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को होती है। इस दिन नाग देवताओं की पूजा होती है, जिससे सर्प दंश (काटने) का भय न हो, जीवन में सुख शांति समृद्धि बनी रहे, और प्रकृति तथा जीव-जंतुओं के प्रति सम्मान करने का भी ये एक जरिया है। इस दिन यदि आप सावन सोमवार का व्रत कर रहे हैं, तो आपको नागव्रत का संकल्प नहीं कर सकते हैं। एक बार में एक व्रत किया जा सकता है। इसके बाद शिव जी की विधि विधान से पूजा करनी चाहिए। फिर नाग देवता की पूजा करनी चाहिए। जल अर्पित कर तिलक, चावल, फूल, भोग चढ़ाएं। वस्त्र अर्पित करें। वहीं दूध और खीर चढ़ाना न भूलें।

ये काम करने से बचें

1-सांपों का बिल जमीन के अंदर होता है। इसलिए नाग पंचमी के दिन गलती से भी जमीन, खेत वगैरह की खुदाई न करें। ऐसा करने से सांपों को चोट पहुंच सकती है, जो अशुभ होगा।

2-नाग पंचमी वाले दिन लोहे के बर्तनों का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए।

3-इस दिन नुकीलीं चीजें जैसे चाकू, सुई आदि का यूज करने से बचें।

4-नाग पंचमी वाले दिन भूलकर भी किसी जीव जंतु खासकर सापों को नुकसान न पहुंचाए।

5-इस दिन मदिरा और तामसिक भोजन करने से भी बचना चाहिए।

कथा

सबसे फेमस कथा के मुताबिक एक खेत जोतता किसान था। हल चलाते समय गलती से उसने नागिन के बच्चों को मार दिया ता। दुखी और क्रोधित नागिन ने किसान के पूरे परिवार को डंस लिया था। बाद में किसान की बेटी ने श्रद्धा से नाग देवता की पूजा की और उनसे क्षमा याचना की थी।

उसकी भक्ति को देख नागिन ने प्रसन्न होकर पूरे परिवार को जीवनदान दे दिया था। तभी से नाग पंचमी पर नाग देवता की पूजा करने की परंपरा की शुरुआत हो गई। मान्यता है कि इस दिन नाग देवता की पूजा करने से परिवार सुरक्षित रहता है और जीवन में आने वाले संकट कटते हैं।

अंग्रेजों ने भारत से लूटे 200 ट्रिलियन डॉलर! कभी दुनिया की 27% GDP था भारत, जानिए यहां से कितना लेकर गए

भारत और 15 अगस्त को अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। देश को 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से आजादी मिली थी। लेकिन आजादी मिलने के बाद देश को कई समस्याओं का सामना करना पड़ा था। आजादी के बाद देश की अर्थव्यवस्था बेहद कमजोर स्थिति में थी। अंग्रेजों ने करीब 200 साल तक भारत के संसाधनों का भरपूर इस्तेमाल अपने लिए किया। वहीं करीब 200 साल के ब्रिटिश शासन के दौरान भारत के संसाधनों और संपदा का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल ब्रिटेन के हितों के लिए किया गया।

न्यूज 18 के मुताबिक, अर्थशास्त्रियों के पुराने आकलनों के मुताबिक, 1765 से 1938 के बीच ब्रिटिश क्राउन और ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत से करीब 45 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति बाहर ले गई। लंबे समय तक चले इस आर्थिक शोषण का असर भारत की आर्थिक स्थिति पर पड़ा और आजादी के समय देश को कई बड़ी आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

नेहरू के सामने बड़ी समस्या

1947 के बाद पीएम जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती कमजोर अर्थव्यवस्था को संभालना, उद्योगों को बढ़ावा देना और देश में बुनियादी ढांचे का विकास करना था। लगभग दो शताब्दियों के औपनिवेशिक शासन के बाद भारत को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए सरकार को लंबे समय तक बड़े स्तर पर काम करना पड़ा।

करीब 200 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति गई बाहर

पुराने अनुमानों को अगर आज की आर्थिक स्थिति के हिसाब से देखा जाए और उनमें महंगाई, निवेश पर मिलने वाले रिटर्न और मौजूदा बाजार मूल्य को शामिल किया जाए, तो भारत से बाहर गई संपत्ति की अनुमानित कीमत 2026 में करीब 200 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है। ये आंकड़ा बताते हैं कि ब्रिटिश शासन में भारत की संपदा बाहर जाती रही, जिससे आजादी के समय देश की अर्थव्यवस्था कमजोर हो गई।

‘काउंसिल बिल्स’ बड़ा तरीका

भारत से पैसा बाहर ले जाने का एक बड़ा तरीका ‘काउंसिल बिल्स’ व्यवस्था थी। 1765 से पहले ईस्ट इंडिया कंपनी भारत से कपड़ा, मसाले और शोरा खरीदने के लिए ब्रिटेन से लाया गया सोना-चांदी इस्तेमाल करती थी। लेकिन बंगाल में टैक्स वसूलने का अधिकार मिलने के बाद कंपनी ने तरीका बदल दिया। इसके बाद भारत से मिले टैक्स के पैसे से ही भारतीय सामान खरीदा जाने लगा और इस तरह भारत की कमाई का बड़ा हिस्सा ब्रिटेन पहुंचने लगा।

  1. टैक्स वसूली: भारतीय किसानों और व्यापारियों से सीधे टैक्स लिया जाता था।
  2. टैक्स से खरीदारी: ब्रिटिश सरकार टैक्स से जुटाए गए राजस्व का करीब एक-तिहाई हिस्सा भारतीय सामान खरीदने में इस्तेमाल करती थी, जिसे बाद में ब्रिटेन भेज दिया जाता था।
  3. बिना असली भुगतान: भारतीयों को उनके ही टैक्स के पैसे से भुगतान किया जाता था, जिससे ब्रिटेन को भारत का कीमती सामान लगभग मुफ्त में मिलता था।

GDP में आई गिरावट

ब्रिटिश शासन के दौरान भारत की आर्थिक स्थिति में बड़ा बदलाव आया। 1700 के आसपास भारत का वैश्विक GDP में हिस्सा करीब 27% बताया जाता है, लेकिन 1947 तक यह घटकर 3% से भी कम रह गया। ब्रिटिश नीतियों का असर भारत के कपड़ा उद्योग पर भी पड़ा। भारतीय कपड़ों पर ब्रिटेन में भारी टैक्स लगाया गया, जबकि ब्रिटिश सामान भारत में आसानी से बिकने लगा। इससे ढाका, मुर्शिदाबाद और सूरत जैसे पुराने औद्योगिक केंद्रों को बड़ा नुकसान हुआ। काम कम होने के बाद कई कारीगर और बुनकर खेती पर निर्भर हो गए और भारत धीरे-धीरे तैयार सामान के बजाय कपास, अफीम और नील जैसी कच्ची उपज के निर्यातक देश के रूप में बदल गया।

दूसरे विश्व युद्ध में हुआ नुकसान

1858 के बाद भी भारत की कमाई का बड़ा हिस्सा ब्रिटिश सरकार से जुड़े खर्चों पर ही लगाया जाता रहा। ‘होम चार्ज’ के तहत भारतीय करदाताओं के पैसों से ब्रिटिश अधिकारियों की पेंशन, रेलवे निवेश पर ब्याज और विदेशों में ब्रिटिश सेना के अभियानों का खर्च उठाया जाता था। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान यह आर्थिक दबाव और बढ़ गया। युद्ध के खर्च और कर्ज का असर भारत में महंगाई और खाद्य संकट के रूप में दिखाई दिया। लंबे समय तक चले इस आर्थिक बोझ के कारण 1947 में आजादी मिलने तक भारत की अर्थव्यवस्था बेहद कमजोर स्थिति में पहुंच चुकी थी।

आज दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल भारत

आजादी के समय भारत की नई सरकार के सामने पैसों और संसाधनों की बड़ी कमी थी। देश में गरीबी और खाद्य संकट गंभीर था, उद्योग कमजोर हो चुके थे और विभाजन के बाद बड़ी संख्या में आए शरणार्थियों के पुनर्वास की जिम्मेदारी भी सरकार पर थी। सीमित सरकारी खजाने के बावजूद सड़कों, बिजली, सिंचाई और दूसरी जरूरी सुविधाओं के विकास पर काम शुरू करना पड़ा। लेकिन, आजादी के बाद के दशकों में भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में लगातार प्रगति की और आज वह दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। देश अब लंबे समय के विकास लक्ष्यों पर ध्यान देते हुए अपनी आर्थिक ताकत को और बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

शासन प्रमुख के तौर पर लगातार तिरंगा फहराने का नया रिकॉर्ड बना गये मोदी!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से आज तेरहवीं बार झंडा फहराया। इसी के साथ मोदी ने शासन प्रमुख के तौर पर झंडा फहराने का एक नया कीर्तिमान भी स्थापित किया, लगातार 25 बार झंडोत्तोलन करने का। गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर मोदी पहले ही बारह बार राष्ट्र ध्वज राज्य स्तरीय स्वतंत्रता दिवस समारोह में फहरा चुके हैं और देश के प्रधानमंत्री के तौर पर आज तेरहवीं बार लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराकर वो सिल्वर जुबली का ऐसा रिकॉर्ड बना गये, जो जल्दी टूटने वाला नहीं है।

इससे पहले सबसे अधिक झंडोत्तोलन का रिकॉर्ड राज्य स्तर पर तीन मुख्यमंत्रियों के नाम था, ज्योति बसु, पवन कुमार चामलिंग और नवीन पटनायक ने लगातार चौबीस बार झंडोत्तोलन करने का रिकॉर्ड बनाया था। उन तीनों में सबसे पहले ये कीर्तिमान पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री के तौर पर ज्योति बसु ने जून 1977 से लेकर नवंबर 2000 के बीच बनाया था। आगे चलकर सिक्किम के मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग ने दिसंबर 1994 से मई 2019 के बीच और ओडीशा के मुख्यमंत्री के तौर पर के नवीन पटनायक ने मार्च 2000 से जून 2024 के बीच इसकी बराबरी की। मोदी इन तीनों से अब आगे निकल गये हैं। न सिर्फ सीएम से लेकर पीएम तक सबसे अधिक समय तक प्रशासनिक प्रमुख बने रहने का, बल्कि सबसे अधिक बार झंडा फहराने का, जो रिकॉर्ड उन्होंने देश के अस्सीवें स्वतंत्रता दिवस समारोह के मौके पर बनाया।

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राष्ट्र ध्वज फहराने के मामले में आज सिल्वर जुबली मनाने वाले मोदी अगले दो महीने के अंदर अपने प्रशासनिक कैरियर की भी सिल्वर जुबली मनाने जा रहे हैं। सात अक्टूबर के दिन उन्हें प्रशासन के शीर्ष पर रहते हुए 25 साल हो जाएंगे, सात अक्टूबर 2001 को पहली बार गुजरात का सीएम बनने वाले मोदी लगातार मिले जनसमर्थन के कारण सीएम से पीएम तक की अपनी प्रशासनिक यात्रा की निरंतरता को बनाए हुए हैं।

मोदी से पहले लगातार शासन के अगुआ बने रहने का रिकॉर्ड पवन कुमार चामलिंग के नाम था, जो सिक्किम के मुख्यमंत्री 24 साल 165 दिन लगातार रहे थे, 12 दिसंबर 1994 से लेकर 26 मई 2019 तक। मोदी चामलिंग का ये रिकॉर्ड पहले ही तोड़ चुके हैं, सिर्फ सीएम के तौर पर कौन कहे, सीएम- पीएम के तौर कुल मिलाकर सबसे लंबे समय तक प्रशासन के शीर्ष पर बने हुए हैं मोदी।

लेकिन अगर स्वतंत्रता दिवस समारोह की ही बात की जाए, तो मोदी ने इसे सरकारी कार्यक्रम से आगे बढ़कर जन उत्सव में बदल दिया है पिछले 25 वर्षों में। यही नहीं, इसे बड़े संकल्प लेने और अपना रिपोर्ट कार्ड पेश करने का भी अवसर बना दिया है मोदी ने। आखिर प्रजातंत्र में जन प्रतिनिधि को अपना हिसाब देने और शासन की दशा- दिशा और बड़े लक्ष्यों को तय करने का स्वतंत्रता दिवस समारोह से बड़ा अवसर क्या हो सकता है।

बहुत कम लोगों को ध्यान में होगा कि सात अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री की कमान संभालने वाले मोदी को पहली बार शासन प्रमुख के तौर पर झंडा फहराने का अवसर 15 अगस्त 2002 को मिला था। ये वो समय था, जब मोदी गंभीर चुनौतियों से गुजर रहे थे। 27 फरवरी 2002 को गोधरा कांड में 59 कारसेवकों को साजिशन जलाकर मार देने की घटना की वजह से गुजरात के कई हिस्सों में दंगे भड़क उठे थे और इसे लेकर मोदी पर विपक्ष हमलावर था।

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मोदी ने इसके सामने जनता की अदालत में जाने का फैसला किया था और 19 जुलाई 2002 को गुजरात विधानसभा को भंग करने की सिफारिश राज्यपाल से करते हुए जल्दी चुनाव कराने की मांग की थी। लेकिन तब के मुख्य चुनाव आयुक्त जेम्स माइकल लिंगदोह ने गुजरात में शीघ्र चुनाव कराने से मना कर दिया था।

ऐसे में राज्य के कार्यवाहक मुख्यमंत्री के तौर पर मोदी ने पहली बार अगस्त 2002 में झंडोत्तोलन किया था। राज्य स्तरीय मुख्य कार्यक्रम गुजरात की राजधानी गांधीनगर की जगह अहमदाबाद में हुआ था। दरअसल ये किसी नई परंपरा की शुरूआत नहीं थी, बल्कि गुजरात की स्थापना के बाद से ही ये हो रहा था।

एक मई 1960 को अलग राज्य के तौर पर अस्तित्व में आये गुजरात की पहली राजधानी होने का गौरव राज्य के सबसे बड़े शहर अहमदाबाद को ही हासिल हुआ था और इसलिए यहां के पुलिस स्टेडियम में स्वतंत्रता दिवस का मुख्य कार्यक्रम आयोजित होने लगा, जो 1961-62 के साल में बना था। बाद में गांधीनगर में राजधानी शिफ्ट हो जाने के बावजूद स्वतंत्रता दिवस का मुख्य समारोह अहमदाबाद में ही होता रहा, उसी पुलिस स्टेडियम में।

अहमदाबाद के पुलिस स्टेडियम में ही 15 अगस्त 2002 की सुबह जब मोदी ने सीएम के तौर पर पहली बार झंडोत्तोलन किया, तो इस अवसर को गुजरात को लेकर अपने बड़े सपने सामने रखने का अवसर बना दिया। गुरूवार की उस सुबह मोदी ने शिक्षा पर बल देते हुए ग्रामीण इलाकों में रहने वाले छात्रों के लिए इंटरनेट के जरिये आधुनिक शिक्षा मुहैया कराने की बात की। यही नहीं, अपनी नई शिक्षा नीति को सामने रखते हए मदरसों के आधुनिकीकरण के साथ ही सीमावर्ती इलाको के सैनिक स्कूलों को भी उन्नत करने की बात की।

मोदी ने तब राज्य में अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की संख्या भी बढ़ाने की बात की, ताकि गुजराती और हिंदी के साथ ही अंग्रेजी सिखकर भी राज्य के बच्चे राष्ट्रीय- अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ सकें, अपनी जगह बना सकें। जिस राज्य की स्थापना के साथ ही गुजराती भाषा के स्कूलों पर जोर था, वहां के लिए ये एक क्रांतिकारी, आधुनिक सोच थी, ‘त्रिभाषा फार्मूले’ को पूरी ईमानदारी के साथ लागू करने की शुरूआत थी।

मोदी ने 15 अगस्त 2002 की उस सुबह शिक्षा से आगे बढ़कर सुशासन पर भी जोर दिया। मोदी का कहना था कि गुजरात के दो प्रमुख सपूतों- गांधी और सरदार की अगुआई में आजादी हासिल करने वाले भारत में ‘सुराज’ के बाद ‘सुशासन’ भी उतना ही जरूरी है, और इस मामले में गुजरात को पहल लेनी होगी।

मोदी ने 15 अगस्त 2002 की उस सुबह जिस सुशासन का संकल्प लिया था, अगले एक दशक में गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर वही उनके शासन का मूल मंत्र रहा, जिसके आधार पर गुजरात मॉडल विकसित हुआ और पूरे देश में उनकी शोहरत हुई। इसी सुशासन के बल पर जनता के हृदय में अपनी जगह बनाकर मई 2014 में मोदी देश के प्रधानमंत्री बने।

लेकिन देश का प्रधानमंत्री बनने से पहले करीब पौने तेरह साल लंबे अपने सीएम कैरियर में मोदी ने जो दर्जन भर अवसरों पर गुजरात में राष्ट्र ध्वज फहराया, स्वतंत्रता दिवस के मौके पर, मोदी ने उन अवसरों को फटाफट जन उत्सव में बदल दिया।

दिसंबर 2002 में राज्य विधानसभा का चुनाव अपनी अगुआई में जीताने के बाद स्वतंत्रता दिवस समारोह का जो पहला मौका मोदी को मिला, उन्होंने उस मौके को राज्य की जनता के लिए अनूठा बना दिया। गुजरात की स्थापना के बाद पहली बार हुआ, जब स्वतंत्रता दिवस का मुख्य समारोह अहमदाबाद की जगह पाटण में मना, जिस पाटण को गुजरात की प्राचीन राजधानी रहने का गौरव भी हासिल रहा है।

पाटण में तब पूरे शहर को सजाया- संवारा गया, भांति- भांति के कार्यक्रम किये गये।

पूरे शहर में लाइटिंग ऐसी, मानो पूरा पाटण दीपावली मना रहा हो। सांस्कृतिक कार्यक्रमों की भी धूम रही। न सिर्फ पाटण शहर के लोग, बल्कि राज्य के कई हिस्सो से यहां लोग पहुंचे। सबके लिए ये सुखद आश्चर्य था, किसी ने कल्पना नहीं की थी कि जिले स्तर पर कभी राज्य स्तरीय स्वतंत्रता दिवस समारोह होगा, अमूमन होता तो ये था कि ऐसे कार्यक्रम या तो राज्य की राजधानी में होते थे या फिर सबसे बड़े शहर में। लेकिन मोदी तो लीक से हटकर चलने के आदी रहे हैं, उन्हें कहां रूटीन चीजों में भरोसा।

15 अगस्त 2003 से पाटण में जो सिलसिला शुरु हुआ, वो मोदी के कार्यकाल के दौरान तो रहा ही, उनके राज्य छोड़ने के बाद भी कोविड की महामारी से आए व्यवधान को छोड़ दें, तो ये सिलसिला अब भी जारी है। मोदी जब आज लाल किले से झंडा फहरा रहे थे, उनके गृह राज्य गुजरात में उनकी शुरू की गई परंपरा के तहत ही राज्य स्तरीय 80वां स्वतंत्रता दिवस समारोह अहमदाबाद या गांधीनगर की जगह अमरेली में मनाया जा रहा था।

खुद मोदी ने गुजरात में राज्य सरकार के मुखिया के तौर पर जो आखिरी झंडोत्तोलन किया था, वो कच्छ जिले के मुख्यालय भुज में। भुज के लालन कॉलेज से ही 15 अगस्त 2013 के दिन मोदी ने लाल किले की तरफ बढ़ने की हुंकार भरी थी। यहां तक कि कार्यक्रम स्थल के चारों तरफ भी लालन कॉलेज से लाल किले की तरफ बढ़ते मोदी के ढेरों पोस्टर- बैनर और होर्डिंग्स लगे थे।

हुआ भी वही, अगले साल मोदी लालन कॉलेज की जगह लाल किले से झंडोत्तोलन करते नजर आए। 15 अगस्त 2014 की सुबह जब देश के प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी ने पहली बार तिरंगा फहराया, लगे हाथों अपनी प्राथमिकताओं का जिक्र किया, जिसमें स्वच्छ भारत अभियान की बात की थी, सबके लिए शौचालय की बात थी। तब ज्यादातर लोगों को आश्चर्य हुआ था, एक तो लाल किले से कभी किसी प्रधानमंत्री ने इस तरह की बात नहीं की थी, विपक्ष ने माखौल भी उड़ाया था। लेकिन ये मोदी की प्राथमिकताओं का संकेत था, जिसके केंद्र में देश का आम आदमी रहा है।

वहां से मोदी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा है, हर बार लाल किले की प्राचीर से बड़े लक्ष्य का ऐलान करते हुए और उसे पाने की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ने की योजना और उसका रोड मैप रखते आए हैं वो। बतौर पीएम तेरहवीं बार भी लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हुए मोदी आज ऐसा ही करते नजर आए। वर्ष 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करने के लिए शक्ति की सप्तधारा बहाने की बात की, एक सौ चालीस करोड़ देशवासियों की सामूहिक ताकत के साथ इस सपने को हकीकत में बदलने की बात की।

मोदी खुली आंखों से सपने देखते हैं, ऐसा वो खुद बार- बार कहते हैं, गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब भी ये बात कहते थे, 2014 से देश के प्रधानमंत्री हैं, तब भी ये बात करते हैं। मोदी का मानना है कि खुली आंखों से देखे हुए सपने पूरे होते हैं, जरूरत होती है इसके लिए तनतोड़ मेहनत की और अहर्निश प्रयासों की। मोदी को इन दोनों चीजों से कभी परहेज नहीं रहा है, तभी बिना रूके, बिना थके, पचीस वर्षों की प्रशासनिक यात्रा को जल्दी ही पूरा करने जा रहे हैं, विकसित भारत की दिशा में मजबूती से कदम बढ़ा रहे हैं, Gen-Z से लेकर नौजवानों, किसानों और महिलाओं को भी इस लक्ष्य को पाने में योगदान देने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

Saptadhara Explained: ‘सप्तधारा’ क्या है? PM मोदी ने बताया विकसित भारत का 7-सूत्रीय रोडमैप

Saptadhara Explained: सात धाराओं के पवित्र हिंदू विचार से लेकर विकसित भारत के लिए सात-सूत्रीय रोडमैप तक: ‘सप्तधारा’ का क्या अर्थ है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस 2026 पर इसका जिक्र क्यों किया? दरअसल, ‘सप्तधारा’ शब्द असल में ‘सप्त’ (यानी सात) और ‘धारा’ (यानी बहाव या प्रवाह) से मिलकर बना है। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के स्वतंत्रता दिवस भाषण में इसे विकास के एक फ्रेमवर्क के तौर पर इस्तेमाल किए जाने से बहुत पहले से ही, सात पवित्र धाराओं का यह विचार हिंदू धार्मिक परंपराओं में मौजूद था।

बता दें कि 15 अगस्त को प्रधानमंत्री मोदी ने जो घोषणा की, उसका आधार यही सांस्कृतिक और सभ्यतागत सोच थी। उन्होंने एक नई “सप्तधारा” — यानी ताकत की सात धाराएं — की बात की, जो 2047 तक ‘विकसित भारत’ की ओर भारत के सफर को आगे बढ़ाएंगी।

प्रधानमंत्री ने सबसे पहले ‘सप्त सिंधु’ यानी सात नदियों की पुरानी अवधारणा का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि कभी भारत अपनी ताकत के लिए सप्त सिंधु के कारण जाना जाता था और तर्क दिया कि अब एक विकसित भारत को ताकत की नई धाराओं की जरूरत है।

तो, सप्तधारा का हिंदू मूल क्या है, और इस शब्द को नीति के संदर्भ में नया अर्थ कैसे मिला है?

हिंदू परंपरा में ‘सप्तधारा’ का क्या अर्थ है?

सबसे बुनियादी स्तर पर, सप्तधारा का अर्थ है ‘सात धाराएं’। हिंदू धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में सात की संख्या का विशेष महत्व है—चाहे वह सात ऋषि (सप्तर्षि) हों, सात पवित्र नदियां हों या हिंदू ब्रह्मांड विज्ञान में वर्णित सात लोक हों।

पद्म पुराण में एक विशिष्ट ‘सप्तधारा-तीर्थ’ का भी वर्णन मिलता है।

संबंधित अध्याय के अनुवाद के अनुसार, सप्तधारा को एक महत्वपूर्ण पवित्र स्थान माना जाता था और यह ऋषियों से जुड़ा हुआ था। इस ग्रंथ में पवित्र जल की सात धाराओं का जिक्र मिलता है, जिन्हें गंगा के सात शुभ रूपों से जोड़ा गया है। इस स्थान का संबंध पांडवों से भी बताया गया है।

पद्म पुराण में सप्तधारा का उल्लेख खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें सात धाराओं में बहने वाले पवित्र जल को गंगा की पवित्रता, तीर्थ यात्रा और पूर्वजों से जुड़े धार्मिक कर्मकांडों से जोड़ा गया है।

सप्तधारा या सप्तसरोवर नामक स्थानों से जुड़ी अन्य हिंदू परंपराएं भी हैं। उदाहरण के लिए, हरिद्वार में एक स्थानीय मान्यता है कि गंगा सात धाराओं में विभाजित हो गई थी ताकि सप्तऋषि (सात प्राचीन ऋषि) बिना किसी व्यवधान के अपनी तपस्या कर सकें।

दूसरे शब्दों में, “सात धाराएं” कोई नई गढ़ी गई उपमा नहीं है। लंबे समय से यह पवित्र प्रवाह, समृद्धि, निरंतरता और किसी शक्तिशाली चीज के विभिन्न दिशाओं में फैलने का प्रतीक रही है।

सप्तधारा और सप्त सिंधु: क्या है इनका संबंध?

पीएम मोदी के भाषण को समझने के लिए यह कड़ी ज्यादा महत्वपूर्ण है।

‘सप्त सिंधु’ का शाब्दिक अर्थ है “सात नदियां” और यह शुरुआती वैदिक काल से जुड़ा एक प्राचीन भौगोलिक और सांस्कृतिक शब्द है।

पीएम मोदी ने अपनी ‘सप्तधारा’ को पौराणिक ‘सप्तधारा-तीर्थ’ की हूबहू नकल के तौर पर पेश नहीं किया। इसके बजाय, उन्होंने अपने आज के विचार को समझाने के लिए पुरानी ‘सप्त सिंधु’ की अवधारणा का इस्तेमाल एक पुल की तरह किया।

सात ही क्यों?

भारतीय परंपराओं में ‘सात’ का बहुत गहरा महत्व है। सप्तऋषि (सात ऋषि) और सप्तसिंधु (सात नदियां) जैसी अवधारणाएं हैं। साथ ही हिंदू ब्रह्मांड विज्ञान, रीति-रिवाजों और साहित्य में भी सात के समूहों का कई बार जिक्र मिलता है।

इसलिए, यह संख्या पूर्णता और विविधता को दिखाने के लिए एक बेहतरीन प्रतीक है: अलग-अलग धाराएं मिलकर एक बड़ा प्रवाह बनाती हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर इसी तरह इस विचार का इस्तेमाल किया। उनकी ‘सप्तधारा’ कोई एक योजना या नया मंत्रालय नहीं है। बल्कि, यह सात हिस्सों वाला एक रणनीतिक ढांचा है। इसमें वे क्षेत्र शामिल हैं जो भारत को 2047 तक विकसित देश बनाने के लिए जरूरी आर्थिक, तकनीकी, बुनियादी ढांचे से जुड़ी, सैन्य, पर्यावरणीय और सांस्कृतिक मजबूती दे सकते हैं।

PM मोदी की सात ‘सप्तधाराएं’ क्या हैं?

  1. मैन्युफैक्चरिंग पावर: पहली धारा मैन्युफैक्चरिंग है। पीएम मोदी ने कहा कि भारत को मैन्युफैक्चरिंग की पूरी वैल्यू चेन में अपनी ताकत बढ़ानी होगी। इसमें पार्ट्स और कंपोनेंट्स बनाने से लेकर डिजाइन और तैयार उत्पादों तक हर स्तर शामिल है। साथ ही भारत को ग्लोबल सप्लाई चेन का एक भरोसेमंद हिस्सा बनना होगा। उन्होंने तीन जरूरतों पर ज़ोर दिया: लागत, क्वालिटी और स्केल।

उन्होंने कहा, “मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में काम कर रहे मेरे भाइयों और बहनों के लिए, यह एक बड़ मौका है। इस मौके को हाथ से न जाने दें। और इसके लिए, हमें लागत, क्वालिटी और स्केल के मामले में ग्लोबल स्टैंडर्ड्स को पूरा करना होगा। हमारी फैक्ट्रियां कॉम्पिटिटिव होनी चाहिए। हमारे प्रोडक्ट यूजर-फ्रेंडली होने चाहिए।”

इसका बड़ा लक्ष्य यह है कि भारत सिर्फ दुनिया की बड़ी कंपनियों के लिए एक बड़ा बाजार न रहे, बल्कि दुनिया के लिए एक प्रमुख मैन्युफैक्चरिंग हब बने।

  1. खेती और फ़ूड प्रोसेसिंग: दूसरा क्षेत्र खेती और फूड प्रोसेसिंग का है। यहां जोर सिर्फ खेती से होने वाले उत्पादन को बढ़ाने पर नहीं, बल्कि खेत से ग्लोबल मार्केट तक पहुंचने पर है। पीएम मोदी ने मोटे अनाज (मिलेट्स), मसालों, फलों और सब्जियों जैसे उत्पादों का जिक्र किया और कहा कि भारत के पारंपरिक खाद्य उत्पाद ग्लोबल ब्रांड बनने चाहिए।

प्रधानमंत्री ने कहा, “हमारे किसान केमिकल-मुक्त खेती को बढ़ावा देंगे। दुनिया में इन उत्पादों की मांग बढ़ रही है। और अगर हमारे कृषि उत्पाद हर तरह से ग्लोबल मानकों पर खरे उतरते हैं, तो हम आसानी से दुनिया भर के बाजारों तक पहुंच पाएंगे।”

इसका मकसद खेती से होने वाले उत्पादन में प्रोसेसिंग और एक्सपोर्ट के जरिए वैल्यू जोड़ना है, न कि किसानों को मुख्य रूप से कच्चे माल (रॉ-कमोडिटी) के स्तर पर ही छोड़ देना।

  1. टेक्नोलॉजी और इनोवेशन: तीसरी धारा टेक्नोलॉजी और इनोवेशन की है। पीएम मोदी ने UPI और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ भारत के अनुभव का जिक्र किया और कहा कि देश को अब टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में अगली बड़ी छलांग लगानी चाहिए।

उन्होंने खास तौर पर डेटा सेंटर, रोबोटिक्स, उभरती हुई टेक्नोलॉजी और अगली पीढ़ी के कम्युनिकेशन (जिसमें ‘मेड-इन-इंडिया 6G’ भी शामिल है) जैसे क्षेत्रों का जिक्र किया। इसका मुख्य संदेश यह है कि भारत उभरती हुई टेक्नोलॉजी का सिर्फ एक बड़ा उपभोक्ता बनकर नहीं रह सकता। बल्कि उसे इनका डेवलपर और निर्यातक भी बनना होगा।

उन्होंने कहा, “मेड-इन-इंडिया दुनिया के हर कोने तक पहुंचना चाहिए। यही हमारा लक्ष्य होना चाहिए और हमें इस दिशा में अपनी कोशिशें तेज करनी चाहिए। इस दिशा में हमारे प्रयास कम नहीं होने चाहिए।”

  1. गति शक्ति: चौथी धारा है ‘गति शक्ति’ – यानी रफ्तार और कनेक्टिविटी की ताकत। इसमें हाई-स्पीड रेल, हाईवे, अंदरूनी जलमार्ग, एयरपोर्ट, बंदरगाह और मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स शामिल हैं।

इसका मकसद पूरे भारत में लोगों और सामान को लाने-ले जाने में लगने वाले समय और खर्च को कम करना है। मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट पर आधारित अर्थव्यवस्था के लिए, इंफ्रास्ट्रक्चर सिर्फ निर्माण का काम नहीं है। यह भारत की कॉम्पिटिटिवनेस (प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता) का हिस्सा बन जाता है।

प्रधानमंत्री ने कहा, “हमें एयरपोर्ट्स की जरूरत है। हमें मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स सिस्टम की जरूरत है। हमें अपने बंदरगाहों को सिर्फ सामान चढ़ाने और उतारने की जगह के तौर पर नहीं देखना चाहिए। दुनिया भर से जहाजों का वहां आकर रुकना ही काफी नहीं है। हमें अपने बंदरगाहों को ‘पोर्ट-लेड डेवलपमेंट’ (बंदरगाह-आधारित विकास) और ग्रोथ की दिशा में आगे ले जाना होगा।”

इसलिए, पीएम मोदी ने बिना रुकावट वाली कनेक्टिविटी को देश के बड़े आर्थिक लक्ष्यों से जोड़ा।

  1. रक्षा शक्ति और आत्मनिर्भर रक्षा: पांचवां क्षेत्र डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग और आत्मनिर्भरता है। पीएम मोदी ने कहा कि आज की अनिश्चित दुनिया में रणनीतिक आत्मनिर्भरता और भी जरूरी हो गई है।

उन्होंने उस जोखिम का जिक्र किया जो तब पैदा होती है जब जरूरी चीजों – जैसे एनर्जी, फर्टिलाइजर, दवाइयां और टेक्नोलॉजी – की सप्लाई पर जियोपॉलिटिकल तनाव का असर पड़ सकता है। वहीं, इसका समाधान है घरेलू डिफेंस प्रोडक्शन को मजबूत करना और ड्रोन व काउंटर-ड्रोन सिस्टम जैसी टेक्नोलॉजी विकसित करना, ताकि भारत को एक ग्लोबल डिफेंस सप्लायर बनाया जा सके।

उन्होंने कहा, “हमें डिफेंस सेक्टर में आत्मनिर्भर बनना होगा। अगली जनरेशन की डिफेंस टेक्नोलॉजी विकसित करके, हमें ग्लोबल सप्लायर बनने के लक्ष्य के साथ आगे बढ़ना होगा।”

  1. ग्रीन इकोनॉमी और ब्लू इकोनॉमी:

छठी धारा दो क्षेत्रों को मिलाती है: ग्रीन इकोनॉमी और ब्लू इकोनॉमी

ग्रीन हिस्से में रिन्यूएबल एनर्जी, ग्रीन हाइड्रोजन और एनर्जी स्टोरेज शामिल हैं। ब्लू हिस्सा भारत की तटरेखा, महासागरों, मछली पालन, समुद्री गतिविधियों और तटीय पर्यटन पर केंद्रित है। इसका बड़ा मकसद आर्थिक विकास को एनर्जी ट्रांजिशन के साथ जोड़ना और साथ ही भारत की समुद्री क्षमता का इस्तेमाल करना है।

  1. भारत की सॉफ्ट पावर: सातवीं और आखिरी धारा ‘सॉफ्ट पावर’ है।

यहीं पर मोदी की ‘सप्तधारा’ पारंपरिक आर्थिक पैमानों से आगे निकल जाती है। उन्होंने योग, हस्तशिल्प, डिजिटल कंटेंट और पर्यटन जैसे क्षेत्रों का जिक्र करते हुए कहा कि भारत का सांस्कृतिक प्रभाव खुद एक आर्थिक और भू-राजनीतिक संपत्ति बन सकता है।

इसका मकसद भारत के उत्पादों, संस्कृति, क्रिएटिव इंडस्ट्रीज़ और विचारों को दुनिया भर के लोगों तक पहुंचाना है।

पीएम मोदी ने कहा, “हम अपनी क्षमताओं को दुनिया तक ले जा सकते हैं। चाहे वह हस्तशिल्प हो, संस्कृति हो, हमारी फिल्में हों, हमारी क्रिएटिव दुनिया हो, VFX, एनिमेशन, गेमिंग या डिजिटल कंटेंट हो – भारत क्रिएटिव दुनिया में अपनी ताकत दिखा सकता है। हमें इसे एक ग्लोबल क्षमता के तौर पर विकसित करना होगा।”

उन्होंने आगे कहा: “भारत के पास वन संपदा का विशाल भंडार है। हमारे यहां 100 से ज्यादा नेशनल पार्क हैं। इसमें बहुत संभावनाएं हैं, लेकिन हम विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने में पीछे रहे हैं। हमारे पास अपनी सॉफ्ट पावर के जरिए दुनिया भर के पर्यटकों को भारत की ओर आकर्षित करने का मौका है। हमें दुनिया के सामने अपनी क्षमताओं को दिखाना होगा।”

सप्तधारा के पीछे की सोच क्या है?

प्रधानमंत्री मोदी ने ‘सप्तधारा’ की घोषणा को ‘विकसित भारत 2047’ के बड़े लक्ष्य से जोड़ा है। उन्होंने कहा कि आने वाले 5 से 7 साल बेहद महत्वपूर्ण होने वाले हैं।

उन्होंने कहा कि जो काम पिछले पांच से सात दशकों में नहीं हो पाए, उन्हें अब आने वाले पांच से सात सालों में पूरा करना होगा। उन्होंने इस पहल को “रिफॉर्म एक्सप्रेस” (सुधार की गति बढ़ाने वाला कदम) भी कहा और सिस्टम, सोच और काम करने की रफ्तार में बदलाव की जरूरत पर जोर दिया।

इस वजह से ‘सप्तधारा’ सिर्फ सरकार की एक अलग योजना नहीं रह जाती, बल्कि सरकार के विकास के एजेंडे के अगले चरण के लिए एक रणनीतिक रूपरेखा बन जाती है।

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80th Independence Day: कॉम्पिटीटिव एग्जाम्स की तैयारी करने वाले छात्रों को मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग, PM मोदी ने किया ऐलान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को घोषणा की कि कॉम्पिटीटिव एग्जाम्स (प्रतियोगी परीक्षा) की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग की व्यवस्था की जाएगी। ऐसा छात्रों के परिवारों पर आर्थिक बोझ कम करने के लिए किया जा रहा है। 15 अगस्त 2026 को देश अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। इस मौके पर दिल्ली में ऐतिहासिक लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा, “कोचिंग क्लास से गरीब और मध्यम वर्ग पर बोझ पड़ता है। हम अलग-अलग परीक्षाओं के लिए मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग उपलब्ध कराएंगे।”

पीएम ने कहा कि हर माता-पिता को लगता है कि अगर वे अपने बच्चे को कोचिंग क्लास नहीं भेजेंगे तो वे प्रतिष्ठित परिवार नहीं कहलाएंगे। प्रधानमंत्री ने इन परिवारों को भरोसा दिलाया कि वे कोचिंग पर खर्च होने वाले हजारों करोड़ रुपये बचा सकते हैं, अपने बच्चों के करीब रह सकते हैं और उनकी देखभाल कर सकते हैं।

पीएम मोदी ने कहा, “इसलिए, हमने युवाओं के लिए अलग-अलग परीक्षाओं की मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग उपलब्ध कराने का फैसला किया है। हमारे पास डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर है, हमारे पास बेहतरीन टैलेंट और शिक्षक हैं। इन संसाधनों को एक साथ लाकर, हम देश के युवाओं को मुफ्त कोचिंग देने के लिए एक पूरा नेटवर्क बनाने जा रहे हैं।”

एक साल में 1 करोड़ युवाओं को AI की ट्रेनिंग

अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा कि हमने तय किया है कि अगले एक वर्ष में एक करोड़ युवाओं को आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस (AI) कौशल की ट्रेनिंग दी जाएगी। यह भी कहा कि युवाओं की क्षमताओं का इस्तेमाल राष्ट्र निर्माण में किया जाएगा। इसके साथ ही पीएम मोदी ने युवाओं से अपील की कि वे देश में जारी जनगणना प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लें। साथ ही जनगणना को त्रुटिरहित (जिसमें कोई गलती न हो) बनाने के लिए अपने परिवार की सही डिजिटल जानकारी उपलब्ध कराने में सहयोग करें।

इस वर्ष का समारोह ‘वंदे मातरम्’ के 150 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में राष्ट्रीय गीत को विशेष रूप से समर्पित है। लाल किले के स्वतंत्रता दिवस समारोह में आज, शनिवार को पहली बार ‘वंदे मातरम्’ गाया गया।

80th Independence Day: देश में 3 सेमीकंडक्टर प्लांट्स में उत्पादन शुरू, अगले 7-8 वर्षों में 5 से 8 और प्लांट शुरू होने की उम्मीद- PM मोदी

5,000 विशेष अतिथियों ने लिया हिस्सा

लाल किले पर शनिवार को आयोजित 80वें स्वतंत्रता दिवस समारोह में लगभग 5,000 विशेष अतिथियों ने हिस्सा लिया। इनमें महिला उद्यमी, युवा इनोवेटर्स, किसान और विभिन्न सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों सहित समाज के कई क्षेत्रों से जुड़े लोग शामिल रहे। समारोह में सांस्कृतिक रंग भरने के लिए विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से पारंपरिक वेशभूषा में सजे 1,500 से अधिक लोग भी उपस्थित रहे।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्र के नाम संबोधन, पेपर लीक पर लगेगी लगाम, परीक्षा व्यवस्था होगी पारदर्शी और भरोसेमंद

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्र के नाम संबोधन,  पेपर लीक पर लगेगी लगाम, परीक्षा व्यवस्था होगी पारदर्शी और भरोसेमंद

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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में शिक्षा, युवा, महिला सशक्तीकरण, राष्ट्रीय सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और विकसित भारत के लक्ष्य समेत कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर देश को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि सरकार सार्वजनिक परीक्षाओं में पेपर लीक और अनुचित साधनों के इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगाने के लिए व्यापक सुधार कर रही है।

 

राष्ट्रपति ने कहा कि सार्वजनिक परीक्षाएं विद्यार्थियों के लिए अवसरों के द्वार खोलती हैं। ऐसे में परीक्षा प्रणाली को ज्यादा पारदर्शी, सुरक्षित और भरोसेमंद बनाना सरकार की प्राथमिकता है।

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पेपर लीक रोकने के लिए परीक्षा व्यवस्था में होंगे व्यापक सुधार

 

राष्ट्रपति मुर्मू ने कहा कि सरकार सार्वजनिक परीक्षाओं में होने वाली अनियमितताओं को रोकने के लिए व्यापक कदम उठा रही है। इन सुधारों का उद्देश्य नकल और अनुचित साधनों के इस्तेमाल को पूरी तरह खत्म करना है।उन्होंने कहा कि परीक्षा व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिस पर देश के युवाओं को पूरा भरोसा हो। राष्ट्रपति की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक और अनियमितताओं को लेकर देशभर में छात्र आंदोलनों और व्यवस्था में बदलाव की मांग उठती रही है।

 

युवा नौकरी मांगने वाले नहीं, नौकरी देने वाले बन रहे

 

राष्ट्रपति ने देश के युवाओं की उद्यमिता की भावना की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में युवा अब नौकरी तलाशने के बजाय रोजगार पैदा करने की संस्कृति अपना रहे हैं। उन्होंने कहा कि स्वरोजगार और युवा उद्यमियों की बढ़ती भागीदारी से देश में मजबूत स्टार्टअप इकोसिस्टम तैयार हुआ है। दुनिया की बड़ी कंपनियां भारतीय युवाओं की प्रतिभा और समर्पण से प्रभावित हैं और उन्हें नेतृत्व की जिम्मेदारियां सौंप रही हैं।

 

‘खेलो इंडिया’ से तैयार हो रहा देशव्यापी स्पोर्ट्स इकोसिस्टम

 

राष्ट्रपति ने युवाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को देश के भविष्य की आधारशिला बताया। उन्होंने कहा कि युवाओं के समग्र विकास में परिवार और समाज की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने ‘खेलो इंडिया’ कार्यक्रम का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में जमीनी स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक खेलों का मजबूत इकोसिस्टम तैयार किया जा रहा है। खेलों को बढ़ावा देने के लिए सरकार अभूतपूर्व निवेश कर रही है, जिसका असर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारतीय खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर भी दिखाई दे रहा है।

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ऑपरेशन सिंदूर ने दिखाई भारतीय सेना की ताकत

 

राष्ट्रपति मुर्मू ने भारतीय सशस्त्र बलों के अद्वितीय साहस की सराहना करते हुए ऑपरेशन सिंदूर का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस अभियान ने आतंकवाद के खिलाफ सटीक कार्रवाई करने की भारत की क्षमता को प्रदर्शित किया। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने आतंकियों और उनके समर्थकों को स्पष्ट संदेश दिया कि वे चाहे कहीं भी छिपें, उन्हें अपने कृत्यों का परिणाम भुगतना होगा। राष्ट्रपति ने कारगिल विजय दिवस और ऑपरेशन सिंदूर की वर्षगांठ का भी उल्लेख किया और भारतीय सशस्त्र बलों के अदम्य साहस को याद किया।

 

सिंधु जल संधि निलंबन को बताया निर्णायक कदम

 

राष्ट्रपति ने आतंकवाद के खिलाफ भारत की रणनीति के तहत सिंधु जल संधि को निलंबित करने के फैसले का भी जिक्र किया। उन्होंने इसे राष्ट्रीय हित, विशेष रूप से किसानों के हित में उठाया गया निर्णायक कदम बताया।

 

नक्सलवाद का खात्मा बड़ी उपलब्धि

 

आंतरिक सुरक्षा पर राष्ट्रपति ने कहा कि दशकों तक नक्सलवाद देश के सामने गंभीर चुनौती रहा। उन्होंने भारत को नक्सलवाद मुक्त बनाने को बड़ी उपलब्धि बताया।

 

उन्होंने कहा कि जिन इलाकों में कभी नक्सलवाद का प्रभाव था, वहां अब विकास और उत्साह का माहौल है। बस्तर ओलंपिक और बस्तर पंडुम जैसे आयोजनों में स्थानीय लोगों की भागीदारी का भी उन्होंने उल्लेख किया।

 

सारनाथ को UNESCO विश्व धरोहर सूची में शामिल किए जाने का जिक्र

 

राष्ट्रपति ने भारत की सभ्यतागत विरासत का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान बुद्ध के प्रथम उपदेश स्थल सारनाथ को इस वर्ष UNESCO की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है।

 

उन्होंने पिछले वर्ष सूची में शामिल किए गए 12 मराठा सैन्य किलों का भी जिक्र किया। राष्ट्रपति ने कहा कि भारत आध्यात्मिक विरासत और सैन्य शक्ति व दृढ़ता के ऐतिहासिक प्रतीकों को समान गर्व के साथ संजोता है।

 

विदेश नीति में शांति और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ पर जोर

 

विदेश नीति पर राष्ट्रपति ने कहा कि शांति, संवाद, सहयोग और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ भारत के अंतरराष्ट्रीय संबंधों की आधारशिला हैं।

 

उन्होंने कहा कि भारत नियम आधारित वैश्विक व्यवस्था में विश्वास करता है और संयुक्त राष्ट्र समेत बहुपक्षीय संस्थाओं में वैश्विक समुदाय को उचित प्रतिनिधित्व दिलाने का प्रयास जारी रखेगा।

 

70 साल से अधिक उम्र के वरिष्ठ नागरिकों के लिए स्वास्थ्य सुविधा

 

राष्ट्रपति ने वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत में दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी के साथ वरिष्ठ नागरिकों की संख्या भी बढ़ रही है।

 

उन्होंने बताया कि करीब 6 करोड़ 70 वर्ष और उससे अधिक उम्र के वरिष्ठ नागरिक सरकारी योजनाओं के तहत सालाना 5 लाख रुपये तक की मुफ्त स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठा सकते हैं। उन्होंने समाज से बुजुर्गों के प्रति संवेदनशील रहने और उनकी गरिमा बनाए रखने की अपील की।

 

2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य

 

राष्ट्रपति ने कहा कि भारत 2047 तक विकसित भारत के निर्माण की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। आर्थिक मजबूती, विशाल डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और सशक्त युवा एवं महिलाएं इस यात्रा के प्रमुख आधार हैं।

 

उन्होंने कहा कि वैश्विक युद्ध और अस्थिरता से आर्थिक चुनौतियां बढ़ने के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बनी हुई है। उन्होंने ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ को आर्थिक प्रगति और राष्ट्रीय सुरक्षा की नींव मजबूत करने वाला कदम बताया।

 

25 करोड़ से ज्यादा लोग गरीबी से बाहर आए

 

राष्ट्रपति ने पिछले एक दशक की कल्याणकारी उपलब्धियों का जिक्र करते हुए कहा कि 25 करोड़ से अधिक लोग गरीबी से बाहर आए हैं।

 

उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत करीब 59 करोड़ खाताधारक बैंकिंग व्यवस्था से जुड़े हैं, जिनमें 32 करोड़ से अधिक महिलाएं हैं। वहीं 80 करोड़ से अधिक लोगों के लिए मुफ्त राशन के माध्यम से खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की गई है।

 

डिजिटल इंडिया की ताकत का भी किया उल्लेख

 

राष्ट्रपति ने भारत के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की उपलब्धि पर कहा कि देश ने दुनिया का सबसे बड़ा और बेहतर डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित किया है। भारत की हिस्सेदारी वैश्विक रियल-टाइम डिजिटल लेनदेन में 50 प्रतिशत से अधिक है। उन्होंने कहा कि देश की 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है और युवा भारत की सबसे मूल्यवान संपत्ति हैं।

 

महिला सशक्तीकरण पर विशेष जोर

 

राष्ट्रपति के संबोधन में महिला सशक्तीकरण भी प्रमुख विषय रहा। उन्होंने कहा कि 3 करोड़ ‘लखपति दीदी’ बनाने का शुरुआती लक्ष्य हासिल कर लिया गया है और अब सरकार तीन करोड़ और लखपति दीदी बनाने की दिशा में काम कर रही है।

 

उन्होंने शिक्षा और विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की उपलब्धियों की सराहना की। ड्रोन दीदी से लेकर वायुसेना की फाइटर कॉम्बैट लीडर तक महिलाओं की भूमिका का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय महिलाएं लगातार नए क्षेत्रों में अपनी क्षमता साबित कर रही हैं। उन्होंने ग्लासगो में हाल में संपन्न कॉमनवेल्थ गेम्स का जिक्र करते हुए कहा कि भारत के कुल 13 स्वर्ण पदकों में से 8 स्वर्ण पदक महिलाओं ने जीते।

 

लोकसभा और विधानसभाओं में 33% महिला आरक्षण का जिक्र

 

राष्ट्रपति ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 को भी महत्वपूर्ण कदम बताया। इस कानून के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रावधान है। उन्होंने कहा कि इससे भारतीय लोकतंत्र और ज्यादा समावेशी बनेगा।

 

पर्यावरण संरक्षण में भारत की भूमिका

 

सतत विकास पर राष्ट्रपति ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भारत वैश्विक स्तर पर नेतृत्व कर रहा है। उन्होंने बताया कि भारत ने 2030 के लिए निर्धारित कई सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को तय समय से पहले हासिल किया है। उन्होंने नागरिकों से प्रकृति और मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध रहने की अपील की और ‘एक पेड़ मां के नाम’ तथा LiFE (Lifestyle for Environment) जैसे अभियानों का उल्लेख किया।

 

स्वतंत्रता सेनानियों और विभाजन पीड़ितों को श्रद्धांजलि

 

राष्ट्रपति ने स्वतंत्रता सेनानियों, महात्मा गांधी, डॉ. बीआर आंबेडकर और सरदार वल्लभभाई पटेल को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने 550 से अधिक रियासतों के एकीकरण में सरदार पटेल की भूमिका को याद किया। उन्होंने विभाजन के दौरान जान गंवाने और विस्थापन झेलने वाले लोगों को भी श्रद्धांजलि दी। 14 अगस्त को मनाए जाने वाले विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस का भी उन्होंने उल्लेख किया।

 

राष्ट्रपति ने तेलुगु लेखक गुरजाडा अप्पाराव की पंक्ति का उल्लेख करते हुए कहा कि राष्ट्र केवल उसकी भूमि नहीं, बल्कि उसके सभी लोग हैं। उन्होंने देशवासियों से 2047 तक स्वतंत्र भारत को पूर्ण विकसित राष्ट्र बनाने में पूरी निष्ठा से योगदान देने का आह्वान किया।

15 अगस्त विशेष: शहीदों के सपनों का भारत नारों से नहीं, हमारे चरित्र और कर्म से बनेगा

15 अगस्त विशेष: शहीदों के सपनों का भारत नारों से नहीं, हमारे चरित्र और कर्म से बनेगा

15 अगस्त केवल एक तिथि नहीं, बल्कि देश के गौरवशाली इतिहास, अमर बलिदानों और राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रतीक है। हर साल जब लाल किले की प्राचीर पर तिरंगा लहराता है, तो वह केवल स्वतंत्रता का उत्सव मनाने का क्षण नहीं होता, बल्कि एक राष्ट्र के रूप में आत्ममंथन करने का अवसर भी होता है। अमर शहीदों के सपनों का भारत केवल नारों से नहीं, बल्कि नागरिकों के चरित्र, कर्तव्यनिष्ठा और आचरण से निर्मित होता है। आइए जानते हैं कि इस स्वतंत्रता दिवस पर हमें अधिकार मांगने के साथ-साथ किन नागरिक कर्तव्यों का संकल्प लेने की आवश्यकता है।

 

1. आत्ममंथन और अतीत का स्मरण:

15 अगस्त केवल तिरंगा फहराने, राष्ट्रगान गाने और देशभक्ति के नारों का दिन नहीं है। यह वह अवसर है जब राष्ट्र को अपने अतीत के बलिदानों को स्मरण करते हुए वर्तमान का आत्ममंथन और भविष्य का संकल्प करना चाहिए। स्वतंत्रता हमें संघर्ष, त्याग और असंख्य बलिदानों के बाद मिली है। इसलिए यह सवाल आज भी प्रासंगिक है कि जिस भारत का सपना हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने देखा था, क्या हम उसके निर्माण की दिशा में उतनी ही ईमानदारी से आगे बढ़ रहे हैं?

 

2. अमर सेनानियों का आदर्श और राष्ट्रीय चरित्र

भगत सिंह का साहस, चंद्रशेखर आजाद का आत्मविश्वास, नेताजी सुभाष चंद्र बोस का राष्ट्र-समर्पण, महात्मा गांधी का सत्य-अहिंसा का मार्ग और सरदार पटेल की राष्ट्रीय एकता के प्रति प्रतिबद्धता- केवल इतिहास के अध्याय नहीं हैं। वे स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय चरित्र की आधारशिलाएँ हैं। उनका सपना एक ऐसा भारत था जो:- 

  • राजनीतिक रूप से स्वतंत्र हो।
  • सामाजिक रूप से न्यायपूर्ण हो।
  • आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो।
  • नैतिक रूप से मजबूत और नागरिक चेतना से संपन्न हो।

 

3. अधिकार, कर्तव्य और नागरिक आचरण

आजादी का अर्थ केवल अधिकार प्राप्त करना नहीं है; लोकतंत्र अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों की भी मांग करता है।

सरकारें नीतियाँ बना सकती हैं, योजनाएँ लागू कर सकती हैं और संस्थाएँ खड़ी कर सकती हैं, लेकिन राष्ट्र का वास्तविक चरित्र उसके नागरिकों के आचरण से तय होता है।

  • कानून का सम्मान
  • सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा
  • करों का ईमानदार भुगतान
  • स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक सद्भाव
  • ये केवल मामूली बातें नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण की बुनियादी शर्तें हैं।

 

4. युवा शक्ति और आधुनिक चुनौतियाँ

आज भारत परिवर्तन के एक महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है। ऐसे समय में देश की युवा शक्ति निर्णायक भूमिका

A young person saluting the Indian flag in the picture.

निभा सकती है। तकनीक, शिक्षा, कौशल, विज्ञान, अनुसंधान, उद्यमिता और नवाचार के क्षेत्र में युवाओं के लिए अभूतपूर्व अवसर हैं। हालाँकि, डिजिटल दुनिया के साथ कुछ चुनौतियाँ भी बढ़ी हैं:-

  • भ्रामक सूचनाएँ (Misinformation)
  • नशा और निराशा
  • सामाजिक विभाजन
  • इसलिए युवा ऊर्जा को केवल रोजगार की तलाश तक सीमित रखने के बजाय, उसे राष्ट्र-निर्माण की सकारात्मक शक्ति बनाना होगा।

5. स्वच्छता, आत्मनिर्भरता और विविधता में एकता

स्वच्छता और आत्मनिर्भरता को केवल सरकारी अभियानों के रूप में देखना उचित नहीं है। सड़क पर कचरा न डालना, जल-स्रोतों को प्रदूषण से बचाना, स्थानीय उत्पादों एवं उद्यमियों को प्रोत्साहित करना तथा संसाधनों के प्रति जिम्मेदार व्यवहार अपनाना प्रत्येक नागरिक की भूमिका है। आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से अलग होना नहीं, बल्कि अपनी प्रतिभा, श्रम और क्षमता पर विश्वास करना है।

 

भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता और एकता है। भाषा, धर्म, जाति और क्षेत्र की भिन्नताओं के बावजूद एक राष्ट्र के रूप में साथ खड़े रहना हमारी असाधारण उपलब्धि है। मतभेद लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा हैं, लेकिन वैमनस्य लोकतंत्र को कमजोर करता है। इसलिए संवाद, सहिष्णुता और परस्पर सम्मान को राष्ट्रीय जीवन का आधार बनाना होगा।

 

6. हर नागरिक की देशभक्ति

सीमा पर सैनिक देश की रक्षा करता है, लेकिन राष्ट्र-निर्माण की जिम्मेदारी सीमा के भीतर रहने वाले हर नागरिक की है। किसान, शिक्षक, वैज्ञानिक, श्रमिक, उद्यमी और कर्मचारी- हर व्यक्ति अपने कर्म से देश को मजबूत करता है। देशभक्ति केवल सीमा पर दिखाई देने वाली वीरता नहीं है, बल्कि अपने दायित्वों को ईमानदारी से निभाना भी देशभक्ति ही है।

 

7. निष्कर्ष और नागरिक संकल्प

इस स्वतंत्रता दिवस पर हमें यह पूछने की जरूरत है कि “देश ने हमें क्या दिया?” से अधिक महत्वपूर्ण यह प्रश्न है कि “हमने देश को क्या दिया?”

स्वतंत्रता की सबसे बड़ी सार्थकता यही है कि हम अपने अधिकारों का उपयोग जिम्मेदारी के साथ करें। शहीदों के बलिदान का सच्चा सम्मान केवल स्मारकों पर पुष्प अर्पित करने से आगे बढ़कर उनके आदर्शों को जीवन में उतारने में है।

 

आइए, इस 15 अगस्त को केवल उत्सव न मनाएँ, बल्कि एक नागरिक संकल्प लें:

  • ईमानदार बनें और जिम्मेदार बनें।
  • स्वच्छ और संवेदनशील समाज बनाएँ।
  • भारत की एकता और गरिमा को सर्वोपरि रखें।

 

क्योंकि शहीदों के सपनों का भारत नारों से नहीं, हमारे चरित्र, परिश्रम और कर्तव्यनिष्ठा से बनेगा। यही स्वतंत्रता का सम्मान है, यही सच्ची देशभक्ति है और यही नए भारत की ओर हमारा वास्तविक कदम है।

जय हिंद!

योगी सरकार की निर्यात नीति से किसानों को सीधा लाभ, निवेश की नई लहर

योगी सरकार की निर्यात नीति से किसानों को सीधा लाभ, निवेश की नई लहर

 

 

 

 

 

 


मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश ने निर्यात क्षेत्र में एक नई मिसाल कायम करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। प्रदेश देश का पहला राज्य बना है, जिसने निर्यात के लिए समर्पित त्रिवर्षीय आबकारी निर्यात नीति (2026-29) लागू की है। एक अप्रैल 2026 से प्रभावी इस नीति के शुरुआती दो माह में ही इसके सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। अप्रैल-मई 2026 में प्रदेश से निर्यात 84.5 प्रतिशत बढ़ा, जबकि देश का समग्र निर्यात 6.3 प्रतिशत बढ़ा। राष्ट्रीय निर्यात में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 8.1 प्रतिशत से बढ़कर 14 प्रतिशत हो गई और प्रदेश पांचवें स्थान से तीसरे स्थान पर पहुंच गया।
 

 

यूपी ने 39.4 लाख डॉलर की वृद्धि अर्जित की

 

अप्रैल-मई 2026 में देश से कुल 6.15 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निर्यात हुआ, जिसमें उत्तर प्रदेश का योगदान 86 लाख डॉलर रहा। पिछले वर्ष इसी अवधि में देश का निर्यात 5.78 करोड़ डॉलर और प्रदेश का योगदान 46.6 लाख डॉलर था। इस दौरान देश के निर्यात में 36.5 लाख डॉलर की वृद्धि हुई, जबकि उत्तर प्रदेश ने अकेले 39.4 लाख डॉलर की वृद्धि अर्जित की। बस्ती से 25,000 कुंतल शीरे का निर्यात भी हुआ, जिससे 5,00,000 अमेरिकी डॉलर की विदेशी मुद्रा मिली। शीरा भिन्न शुल्क वर्गीकरण में आता है, अतः यह अर्जन उपरोक्त आंकड़ों में सम्मिलित नहीं है और उनसे अतिरिक्त है। महत्वपूर्ण यह है कि राज्य ने इसके लिए कोई आर्थिक सहायता या अनुदान नहीं दिया, बल्कि नियामक शुल्कों को तर्कसंगत बनाया है। प्रत्येक निर्यात बोतल पर ट्रैक एंड ट्रेस व्यवस्था लागू है। एपीडा ने इस क्षेत्र के लिए करीब एक अरब अमेरिकी डॉलर का राष्ट्रीय निर्यात लक्ष्य रखा है और उत्तर प्रदेश लगातार अपना योगदान बढ़ा रहा है।

 

निवेश और रोजगार के नए अवसर

 

नीति की 3 वर्ष की स्थिरता से उद्योग जगत का भरोसा बढ़ा है। यूनाइटेड ब्रुअरीज उन्नाव और माउंट एवरेस्ट ब्रुअरीज हरदोई में नई इकाई स्थापित कर रही हैं। वुडपेकर ग्रीनएग्री न्यूट्रिएंट्स ने फर्रुखाबाद में इकाई स्थापित की है। एलाइड ब्लेंडर्स एण्ड डिस्टिलर्स ने मुरादाबाद की बंद इकाई को पुनर्जीवित किया है। गोरखपुर में लगभग एक वर्ष पहले एथेनॉल उत्पादन के लिए स्थापित कियान डिस्टिलरी ने पेय आसवनी और ब्रुअरी, दोनों की स्थापना के लिए आवेदन किया है। विभागीय आंकड़ों के अनुसार रैडिको खेतान अन्य राज्यों से अपने सीतापुर और रामपुर संयंत्रों में निर्यात उत्पादन स्थानांतरित कर रहा है। एक अन्य अंतरराष्ट्रीय कंपनी का स्थल चयन अंतिम चरण में है, जबकि कई मौजूदा आसवनियां क्षमता विस्तार कर रही हैं।

 

किसानों को बढ़ी मांग का सीधा फायदा

 

आबकारी एवं मद्य निषेध राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) नितिन अग्रवाल ने बताया कि इस नीति का महत्वपूर्ण लाभ प्रदेश के किसानों को मिल रहा है। ईएनए उत्पादन बढ़ने से चीनी मिलों के शीरे की मांग बढ़ी है, जिससे गन्ना किसानों को अप्रत्यक्ष लाभ मिल रहा है। वहीं ग्रेन आधारित आसवनियों में उत्पादन बढ़ने से अनाज की खरीद भी बढ़ी है। यानी निर्यात बढ़ने के साथ प्रदेश की औद्योगिक इकाइयों में उत्पादन, किसानों से खरीद और युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं। नीति में किसान हित को लेकर सख्त प्रावधान भी किए गए हैं। जिस आसवनी अथवा उसके स्वामी की किसी अन्य इकाई या चीनी मिल पर गन्ना मूल्य भुगतान अथवा आबकारी देयों की वसूली प्रमाण-पत्र प्रभावी है, उसे नीति की कोई छूट नहीं मिलेगी। इससे निर्यात प्रोत्साहन को सीधे किसानों के भुगतान से जोड़ा गया है।

 

कांच से लेकर परिवहन तक बढ़ा कारोबार

 

आबकारी आयुक्त डॉ. आदर्श सिंह ने बताया कि इस क्षेत्र की पश्च संबद्धता गन्ना, शीरा और अनाज जैसी कृषि उपज से जुड़ी है, जबकि अग्र संबद्धता में कांच, पैकेजिंग, ढक्कन, लेबलिंग, भंडारण और परिवहन जैसे उद्योग आते हैं। अप्रैल से जुलाई 2026 के बीच प्रदेश की इकाइयों ने अन्य राज्यों को 1.64 करोड़ अधिक बोतलें भेजीं, जो पिछले वर्ष की समान अवधि से 45.7 प्रतिशत अधिक हैं। यह वृद्धि घरेलू आपूर्ति घटाकर नहीं, बल्कि कुल उत्पादन बढ़ने से हुई है।

 

देश के लिए मॉडल बनी योगी सरकार की नीति

 

केंद्र सरकार के खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय की ओर से गठित टास्क फोर्स सभी राज्यों के लिए आदर्श निर्यात नीति तैयार कर रही है। इसमें एपीडा और विभिन्न राज्यों के आबकारी विभाग शामिल हैं। टास्क फोर्स की बैठक में उत्तर प्रदेश की नीति की सराहना करते हुए इसे अन्य राज्यों के लिए उपयोगी ढांचा बताया गया और राष्ट्रीय आदर्श नीति में प्रदेश के अनुभवों को शामिल करने के निर्देश दिए गए। इस तरह योगी सरकार की नीति ने किसान हित, निवेश, रोजगार और विदेशी मुद्रा अर्जन को एक साथ जोड़ते हुए उत्तर प्रदेश को निर्यात के क्षेत्र में नई पहचान दिलाने की दिशा में मजबूत आधार तैयार किया है।