PM Kisan Samman Nidhi Updates: 24वीं किस्त का इंतजार जल्द होगा खत्म, अगले महीने आएगा किसानों के खाते में पैसा

देश के करोड़ों किसानों को जल्द खुशखबरी मिल सकती है। पीएम किसान सम्मान योजना की 24वीं किस्त अगले महीने उनके बैंक अकाउंट में आ सकती है। इस योजना के दायरे में आने वाले किसानों को एक साल में कुल 6,000 रुपये मिलते हैं। यह पैसा सरकार की तरफ से किसानों के खातों में दो-दो हजार की तीन किस्तों में ट्रांसफर किया जाता है।

अगले महीने बड़े त्योहार

अगले महीने दशहरा है। उसके बाद नवंबर में दिवाली है। ऐसे में खाते में इस स्कीम का पैसा आने से किसानों को काफी राहत मिलगी। पिछले साल 19 नवंबर को सरकार की तरफ से इस स्कीम की दूसरी किस्त का पैसा किसानों के खातों में ट्रांसफर हुआ था। हालांकि, 2024 में 5 अक्तूबर को ही किसानों के खातों में स्कीम का पैसा आ गया था।

ई-केवायसी जरूरी है

यह ध्यान में रखना जरूरी है कि पीएम किसान योजना का फायदा उन किसानों को नहीं मिलेगा, जिन्होंने ई-केवायसी नहीं कराई है। इस योजना के दायरे में आने वाले किसानों को ई-केवायसी कराने पर ही पैसा खाते में आएगा। साथ ही उन्हें अपने बैंक अकाउंट को भी आधार से लिंक करना होगा। इसके बाद ही उनके खाते में योजना की 24वीं किस्त आएगी।

अगले महीने आ सकता है पैसा

इस स्कीम से जुड़ी खबरों पर नजर रखने वाले एक्सपर्ट्स का कहना है कि चूंकि अक्तूबर में दशहरा है। दूसरे हफ्ते नवरात्र शुरू हो जाएगा। इस वजह से 24वीं किस्त के अक्तूबर की शुरुआत या दूसरे हफ्ते तक आ जाने की उम्मीद है। योजना की 23 किस्त इस साल जून में किसानों के खाते में आई थी।

कुछ किसानों को 23वीं किस्त भी मिल सकता है

इस बार कुछ किसानों को 24वीं किस्त के साथ 23वीं किस्त का भी पैसा मिल सकता है। इसकी वजह यह है कि कई किसानों को ई-केवायसी और जमीन का सत्यापन नहीं होने से से 23वीं किस्त का पैसा नहीं मिला था। अब जिन किसानों ने अपना ई-केवायसी पूरा कर लिया है और जमीन का सत्यापन भी हो चुका है, उन्हें 24वीं किस्त के साथ 23वीं किस्त का पैसा भी मिल सकता है।

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2019 में शुरू हुई थी केंद्र सरकार की स्कीम

पीएम किसान सम्मान निधि केंद्र सरकार की स्कीम है। इस स्कीम के तहत किसानों को मिलने वाला पूरा पैसा केंद्र सरकार की तरफ से आता है। इस योजना का ऐलान केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने 2019 के अंतरिम बजट में किया था। इस स्कीम का मकसद देश के करोड़ों किसानों की इनकम को सपोर्ट देना है।

Bharat Taxi in UP: यूपी के सभी 75 जिलों में ‘भारत टैक्सी’ सुविधा शुरू! इसे चलाने वाले ड्राइवरों को 5 लाख रुपये तक का कवर, सारी डिटेल जानिए

Bharat Taxi in UP: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बुधवार (23 सितंबर) को यूपी में ‘भारत टैक्सी’ सेवा और ‘मुख्यमंत्री कृषक समृद्धि योजना’ का शुभारंभ कर दिया। एक तरफ ‘भारत टैक्सी’ के जरिए ड्राइवरों को कमीशन से राहत और सामाजिक सुरक्षा देने की बात कही गई है। वहीं, दूसरी तरफ छोटे और सीमांत किसानों के लिए दीर्घकालिक कर्ज की ब्याज दर घटाकर 6 प्रतिशत कर दी गई है। देश के पहले सहकारिता आधारित प्लेटफॉर्म ‘भारत टैक्सी; का परिचालन सहकार टैक्सी सहकारिता लिमिटेड द्वारा किया जाएगा। ‘Bharat Taxi’ पहले से ही लखनऊ, गोरखपुर, वाराणसी और प्रयागराज में चल रही है।

ड्राइवरों को नहीं देना होगा कमीशन

सीएम योगी ने अपने संबोधन में कहा, “‘भारत टैक्सी’ देश का पहला सहकारी मॉडल पर आधारित राइड-हेलिंग प्लेटफॉर्म है, जिसे सहकार टैक्सी कोऑपरेटिव लिमिटेड संचालित करता है।” CM ने बताया कि ‘भारत टैक्सी’ फिलहाल लखनऊ, गोरखपुर, वाराणसी और प्रयागराज में संचालित हो रही है। उन्होंने कहा कि इस सेवा से जुड़ने वाले ड्राइवरों से कमीशन नहीं लिया जाएगा। इसके साथ ही उन्हें ₹5 लाख तक की सामाजिक सुरक्षा कवरेज मिलेगी। सीएम योगी आदित्यनाथ ने यह भी कहा कि अब तक टैक्सी ड्राइवरों के लिए सामाजिक सुरक्षा की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी। उन्होंने कहा कि भारत टैक्सी के जरिए ड्राइवरों को सुरक्षा के साथ सम्मान और गरिमा देने का प्रयास किया जा रहा है।

‘ये पूरे भारत की टैक्सी है’

सीएम योगी ने कहा, “जब व्यक्ति अपनी गाड़ी पर भारत टैक्सी लिखाएगा और जो भी उस कार का चालक होगा, भारत टैक्सी के ब्रांड को संचालित करने का कार्य करेगा, तो उसको इस बात पर गौरव की अनुभूति होगी कि ये टैक्सी केवल एक यात्री को ढोने की नहीं, ये पूरे भारत की टैक्सी है। भारत को संचालित करने की भारत की गति को प्रगति में बदलने की टैक्सी है। उसके मन में इस बात की निश्चिंतता भी होगी कि मुझे यह सुविधा 5,00,000 रुपए की सामाजिक सुरक्षा की गारंटी भी दे रही है…जब किसी को सामाजिक सुरक्षा की गारंटी मिलती है तो उसमें एक निश्चिंतता होती है और फिर वह व्यक्ति पूरी तन्मयता के साथ, पूरी जिम्मेदारी के साथ अपने कार्य को कर पाता है…आज यह टैक्सी लखनऊ, गोरखपुर, वाराणसी, प्रयागराज में संचालित हो रही है।”

एयरपोर्ट, मेट्रो और पुलिस से भी समझौता

मुख्यमंत्री ने बताया कि भारत टैक्सी ने लखनऊ एयरपोर्ट, लखनऊ मेट्रो और लखनऊ पुलिस के साथ समझौता ज्ञापन (MoU) किए हैं। उन्होंने इस पहल के विस्तार पर जोर देते हुए कहा कि ‘भारत टैक्सी’ से आने वाले समय में लाखों युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा किए जा सकते हैं। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में प्रस्तावित बस सर्विस को भी इसी तरह के सहकारी मॉडल से विकसित करने की संभावना जताई।

किसानों के लिए 11% से घटकर 6% हुआ ब्याज

सीएम योगी ने ‘मुख्यमंत्री कृषक समृद्धि योजना’ की भी शुरुआत की। इसके तहत उत्तर प्रदेश सहकारी ग्राम्य विकास बैंक से मिलने वाले दीर्घकालिक ऋण पर ब्याज दर 11 प्रतिशत से घटाकर 6 प्रतिशत कर दी गई है। इस योजना का उद्देश्य आने वाले वर्षों में करीब 5 लाख छोटे और सीमांत किसानों को कर्ज की सुविधा उपलब्ध कराना है। आदित्यनाथ ने कहा कि सरकार ने किसानों के लिए ब्याज दर कम करने का फैसला किया और अब इसका परिणाम सामने है। उन्होंने कहा कि किसान समृद्ध होगा तो देश भी समृद्ध होगा।

पांच ड्राइवरों और पांच किसानों को मिला लाभ

कार्यक्रम के दौरान पांच भारत टैक्सी ड्राइवरों को शेयर सर्टिफिकेट दिए गए। वहीं, किसान योजना के पांच लाभार्थियों को लोन स्वीकृति पत्र सौंपे गए। मुख्यमंत्री ने सहकारिता विभाग का ‘उर्वरक सेतु’ मोबाइल ऐप और उत्तर प्रदेश सहकारी डेटाबेस सेंटर का मोबाइल ऐप भी लॉन्च किया।

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सरकार के सहकारी मॉडल पर जोर

मुख्यमंत्री ने कहा कि मजबूत सहकारी क्षेत्र देश की मजबूती से जुड़ा है। सरकार और केंद्र की ओर से सहकारी सेवाओं के विस्तार पर जोर दिया जा रहा है। सरकार के अनुसार, भारत टैक्सी का उद्देश्य किसी निजी ऐप आधारित टैक्सी एग्रीगेटर को खत्म करना नहीं, बल्कि ड्राइवर-केंद्रित और लोगों के लिए किफायती परिवहन का एक वैकल्पिक प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराना है। सहकारी मॉडल में ड्राइवर सदस्य और हितधारक के रूप में जुड़े होंगे, ताकि उनके आर्थिक और सामाजिक हितों को बढ़ावा दिया जा सके।

वेबदुनिया के 27 साल: इंटरनेट से AI तक भारतीय भाषाओं की नई उड़ान

वेबदुनिया के 27 साल: इंटरनेट से AI तक भारतीय भाषाओं की नई उड़ान

27 years of webdunia hindi

कुछ यात्राएँ केवल वर्षों में नहीं मापी जातीं। वे इस बात से पहचानी जाती हैं कि उन्होंने अपने समय में क्या बदला।

1999 में मध्य प्रदेश से शुरू हुई वेबदुनिया की यात्रा आज 27 वर्ष पूरी कर रही है। यह केवल एक डिजिटल पोर्टल की वर्षगांठ नहीं, बल्कि भारतीय भाषाओं की उस डिजिटल यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जो इंटरनेट के शुरुआती दौर में शुरू हुई थी।

 

उस समय इंटरनेट पर अंग्रेजी का दबदबा था। भारतीय भाषाओं के लिए डिजिटल दुनिया में जगह बनाना एक चुनौती थी। वेबदुनिया ने हिंदी को इंटरनेट पर एक स्वतंत्र पहचान देने का प्रयास किया और आगे चलकर हिंदी के साथ सात अन्य भारतीय भाषाओं में भी अपनी उपस्थिति बनाई।

 

आज करोड़ों पाठकों तक पहुँचना इस बात का प्रमाण है कि भारत की डिजिटल कहानी केवल अंग्रेजी में नहीं लिखी जा सकती। लेकिन अब कहानी का अगला अध्याय शुरू हो चुका है।

 

AI Revolution.

 

अब सवाल इंटरनेट का नहीं, AI का है

 

पहली डिजिटल क्रांति का बड़ा सवाल था—क्या भारतीय भाषाएँ इंटरनेट पर अपनी जगह बना पाएंगी? आज सवाल है—क्या भारतीय भाषाएँ AI की दुनिया को भी आकार देंगी?

AI जिस तेजी से हमारे सूचना प्राप्त करने, ज्ञान हासिल करने और संवाद करने के तरीके को बदल रहा है, उसमें भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती केवल तकनीक तक पहुँच नहीं है। चुनौती यह भी है कि AI भारत की भाषाओं, संस्कृति, संदर्भ और विविधता को कितनी गहराई से समझता है।

 

भारत में करोड़ों लोग अपनी मातृभाषा में सोचते और संवाद करते हैं। इसलिए भारत में AI की वास्तविक पहुँच तभी व्यापक होगी, जब वह केवल भारतीय भाषाओं को translate न करे, बल्कि उन्हें समझे। यहीं भारतीय भाषा मीडिया की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

 

Content से Context तक

 

पिछले 27 वर्षों में भारतीय भाषा मीडिया ने डिजिटल कंटेंट का एक विशाल संसार तैयार किया है—समाचार, विचार, संस्कृति, इतिहास, मनोरंजन, खेल और समाज से जुड़ी जानकारी। AI के युग में यही कंटेंट एक नई भूमिका निभा सकता है।

 

अब चुनौती केवल यह नहीं कि हम कितना कंटेंट बनाते हैं। चुनौती यह है कि वह विश्वसनीय, संदर्भपूर्ण, संरचित और AI-ready हो। क्योंकि आने वाला पाठक शायद हमेशा वेबसाइट पर जाकर जानकारी न खोजे। वह AI से पूछेगा—

 

“मुझे बताइए…”

 

और उस उत्तर की गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करेगी कि AI ने किस ज्ञान से सीखा है और उस ज्ञान का संदर्भ कितना विश्वसनीय है। इस बदलाव को समझना मीडिया के लिए आवश्यक है।

 

बदलाव शाश्वत है, मूल्य स्थायी

 

27 वर्षों में हमने इंटरनेट को बदलते देखा। वेबसाइट से मोबाइल, सोशल मीडिया से वीडियो और अब AI तक—तकनीक लगातार बदल रही है। आगे भी बदलाव रुकने वाला नहीं है। बदलाव शाश्वत है, लेकिन मूल्य स्थायी।

 

तकनीक बदल सकती है, प्लेटफॉर्म बदल सकते हैं, पाठक के व्यवहार बदल सकते हैं; लेकिन विश्वसनीयता, सत्यता, जिम्मेदारी और पाठक का विश्वास किसी भी दौर में मीडिया की बुनियाद बने रहेंगे।शायद यही किसी भी डिजिटल संस्था की सबसे बड़ी पूंजी है।

 

भारतीय भाषाओं का अगला अवसर

 

AI भारतीय भाषाओं के लिए एक बड़ी चुनौती है, लेकिन उससे भी बड़ा अवसर। एक किसान अपनी भाषा में AI से खेती के बारे में पूछ सके। एक विद्यार्थी अपनी मातृभाषा में जटिल विषय समझ सके। कोई नागरिक अपनी भाषा में सरकारी योजनाओं की जानकारी प्राप्त कर सके। कोई पाठक अपनी भाषा में इतिहास, विज्ञान या समसामयिक घटनाओं को समझ सके।

 

तब AI केवल तकनीक नहीं रहेगा।वह ज्ञान को लोकतांत्रिक बनाने का माध्यम बन जाएगा। लेकिन इसके लिए भारतीय भाषाओं में उच्च गुणवत्ता वाले डिजिटल ज्ञान की आवश्यकता होगी।

 

27 साल बाद फिर एक शुरुआत

 

वेबदुनिया की 27 वर्ष की यात्रा को पीछे मुड़कर देखने पर एक दिलचस्प समानता दिखाई देती है।

 

1999 में चुनौती थी—भारतीय भाषाओं को इंटरनेट तक पहुँचाना।

 

2026 में चुनौती है—भारतीय भाषाओं को AI के केंद्र तक पहुँचाना।

 

तकनीक बदल गई है। माध्यम बदल गया है। उपयोगकर्ता का व्यवहार बदल रहा है। लेकिन एक चीज नहीं बदली—अपनी भाषा में जानकारी पाने की आवश्यकता। इसलिए 27 वर्ष पूरे होना हमारे लिए केवल अतीत का उत्सव नहीं है। यह भविष्य के बारे में सोचने का अवसर है।

 

AI की दुनिया में भारत की सबसे बड़ी ताकत केवल उसकी तकनीकी प्रतिभा नहीं होगी। उसकी असली ताकत उसकी भाषाई और सांस्कृतिक विविधता भी होगी।

 

और शायद आने वाले वर्षों का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही होगा—

 

क्या हम ऐसा AI बना पाएँगे जो भारत की भाषाएँ सिर्फ बोलता नहीं, बल्कि भारत को समझता भी हो?

 

वेबदुनिया की यात्रा इंटरनेट से शुरू हुई थी। अब अगला अध्याय AI के युग में भारतीय भाषाओं की नई कहानी लिखने का है। 27 वर्षों से साथ चल रहे करोड़ों पाठकों, पत्रकारों, रचनाकारों, सहयोगियों और शुभचिंतकों को हृदय से धन्यवाद।

न्यूजीलैंड की कीवी होगी सस्ती? FTA के बाद भारत में घटेगी कीमत, जानें कितना मिलेगा फायदा

न्यूजीलैंड से भारत आने वाला कीवीफ्रूट भारत-न्यूजीलैंड फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) के तहत सस्ता हो सकता है। हालांकि, शुरुआत में इसकी कीमत में ज्यादा कमी आने की संभावना नहीं है, क्योंकि कीवीफ्रूट का आयात एक तय कोटे और न्यूनतम आयात कीमत के नियम के तहत किया जाएगा।

बता दें कि भारत और न्यूजीलैंड ने अप्रैल 2026 में FTA पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते के तहत, भारत ने न्यूजीलैंड को कीवीफ्रूट, सेब और मानुका शहद जैसे चुनिंदा उत्पादों के लिए विशेष पहुंच दी है। इस व्यवस्था का मकसद आयात की बाधाओं को कम करना है, साथ ही कोटा, मौसमी नियंत्रण और न्यूनतम आयात मूल्य के जरिए भारतीय किसानों के हितों की रक्षा करना भी है।

वहीं, दोनों देशों की घरेलू प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद इस समझौते के लागू होने की उम्मीद है। न्यूजीलैंड की संसद ने सितंबर में इस समझौते को लागू करने के लिए जरूरी कानून को मंजूरी दे दी थी और उम्मीद है कि यह समझौता अक्टूबर के दूसरे हिस्से में लागू हो जाएगा।

न्यूजीलैंड की कीवी और कितनी सस्ती हो सकती हैं?

अभी भारत कीवी फल के इंपोर्ट पर 33% कस्टम ड्यूटी लगाता है। FTA के तहत, न्यूजीलैंड को पहले साल में 6,250 टन का ड्यूटी-फ्री कोटा मिलेगा। न्यूजीलैंड के समझौते के आधिकारिक विश्लेषण के अनुसार, यह कोटा धीरे-धीरे बढ़कर छठे साल तक 15,000 टन हो जाएगा।

इस कोटे के अंदर होने वाले इंपोर्ट पर कोई ड्यूटी नहीं लगेगी, बशर्ते इंपोर्ट की कीमत कम से कम 1.80 अमेरिकी डॉलर प्रति किलोग्राम हो। न्यूजीलैंड सरकार के दस्तावेज के अनुसार, कोटे से बाहर के शिपमेंट पर तुरंत 50% टैरिफ में कटौती होगी, जिससे प्रभावी ड्यूटी लगभग 33% से घटकर 16.5% हो जाएगी।

इसका सीधा फायदा यह होगा कि पात्र खेप के भारत पहुंचने की लागत में लगने वाली ड्यूटी काफी कम हो सकती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि बाजार में कीवी की कीमत भी उतने ही प्रतिशत कम हो जाएगी।

कीवी की अंतिम कीमत तय होने में कई दूसरे खर्च भी शामिल होते हैं। इनमें फ्रेट, इंश्योरेंस, पोर्ट हैंडलिंग, कोल्ड स्टोरेज, खराब होने से होने वाला नुकसान, रुपये और डॉलर की कीमत में बदलाव, इंपोर्टर का मार्जिन, थोक विक्रेताओं का कमीशन, रिटेलर का मार्जिन और घरेलू टैक्स शामिल हैं। इसलिए कस्टम ड्यूटी घटने के बावजूद ग्राहकों को मिलने वाली कीमत में कमी इससे कम हो सकती है।

कम से कम आयात कीमत यह भी तय करती है कि घोषित आयात मूल्य कितना कम हो सकता है। इसका मकसद बहुत कम कीमत वाले आयात को घरेलू उत्पादकों पर ज्यादा दबाव डालने से रोकना है।

शुरुआती कोटा, न्यूजीलैंड से भारत के हालिया आयात से ज्यादा है। ट्रिज (Tridge) के ट्रेड डेटा से पता चलता है कि भारत ने 2024 में न्यूजीलैंड से लगभग 5.84 मिलियन किलोग्राम कीवी फल का आयात किया, जिसकी कीमत लगभग 16.74 मिलियन अमेरिकी डॉलर थी।

न्यूजीलैंड के कीवी फल उद्योग ने इस समझौते का स्वागत किया है। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, न्यूजीलैंड सरकार का अनुमान है कि यह सेक्टर 5 वर्षों में टैरिफ के तौर पर लगभग 125 मिलियन न्यूजीलैंड डॉलर बचा सकता है।

भारत को कीवी कहां से मिलती है?

भारत का कीवी फल मार्केट काफी हद तक आयात पर निर्भर है। Tridge के ट्रेड डेटाबेस के अनुसार, 2024 में भारत ने लगभग 60.51 मिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य के करीब 49.14 मिलियन किलोग्राम ताजे कीवी फल का आयात किया।

प्रमुख सप्लायर ये थे:

देश2024 में आयात की मात्रा2024 में आयात की कीमत
चिली1.307 करोड़ किलोग्राम2.406 करोड़ अमेरिकी डॉलर
न्यूजीलैंड58.4 लाख किलोग्राम1.674 करोड़ अमेरिकी डॉलर
ईरान2.385 करोड़ किलोग्राम1.291 करोड़ अमेरिकी डॉलर
ग्रीस51 लाख किलोग्राम51.9 लाख अमेरिकी डॉलर
इटली11.3 लाख किलोग्राम14.7 लाख अमेरिकी डॉलर

आंकड़े बताते हैं कि ईरान ने सबसे ज्यादा मात्रा में सप्लाई की, जबकि प्रमुख सप्लायरों में न्यूजीलैंड ने प्रति किलोग्राम सबसे ज्यादा कीमत दर्ज की। भारतीय सुपरमार्केट और ऑनलाइन ग्रॉसरी मार्केट में प्रीमियम इम्पोर्टेड कीवीफ्रूट के लिए चिली और न्यूजीलैंड भी महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

भारत में इम्पोर्ट की मांग काफी बनी हुई है। ट्रिज (Tridge) के आंकड़ों के अनुसार, 2023 में लगभग 49.17 मिलियन किलोग्राम और 2022 में 45.94 मिलियन किलोग्राम का इम्पोर्ट हुआ।

क्या भारत में कीवी फल उगाया जाता है?

हां, भारत में कीवी फल की खेती होती है, हालांकि इसकी घरेलू पैदावार मांग के मुकाबले बहुत कम है।

नेशनल हॉर्टिकल्चर बोर्ड के अनुसार, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, सिक्किम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश और केरल के कुछ हिस्सों के पहाड़ी इलाकों में कीवी फल की खेती की जाती है।

अरुणाचल प्रदेश को भारत का सबसे बड़ा कीवी फल उत्पादक राज्य माना जाता है। ICAR की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस राज्य में लगभग 3,558 हेक्टेयर जमीन पर इसकी खेती होती है और सालाना पैदावार करीब 7,111 टन है। इस रिपोर्ट में मणिपुर, सिक्किम, नागालैंड, मिजोरम और हिमाचल प्रदेश को भी अन्य उत्पादक क्षेत्रों के तौर पर बताया गया है।

उत्तराखंड और हिमालय के अन्य इलाकों में भी कीवी फल की खेती बढ़ी है। इस फसल के लिए ठंडी जलवायु की जरूरत होती है, और इसका कमर्शियल उत्पादन देश के मैदानी इलाकों के बजाय पहाड़ी और पूर्वोत्तर क्षेत्रों में ज्यादा होता है।

हालांकि, घरेलू उत्पादन अभी भी जरूरत के हिसाब से कम है। हिमालयी बागवानी पर हुई एक रिसर्च में बताया गया है कि भारत अपनी ताजी कीवी की जरूरत का सिर्फ एक-चौथाई हिस्सा ही पैदा करता है, यानी लगभग 75% मांग आयात से पूरी करनी पड़ती है।

इसी अंतर की वजह से कम कीमत वाले आयात का शहरी बाजारों पर साफ असर दिख सकता है, साथ ही इससे घरेलू उत्पादकों में चिंता भी पैदा होती है। FTA इसी चिंता को दूर करने की कोशिश करता है। इसके लिए आयात की सुविधा को कृषि उत्पादकता कार्यक्रमों, तकनीकी सहयोग, बाग के प्रबंधन में मदद और फसल कटाई के बाद बेहतर तरीकों से जोड़ा गया है।

FTA का ग्राहकों पर क्या होगा असर?

न्यूजीलैंड से आने वाला कीवीफ्रूट रातोंरात बहुत सस्ता होने की उम्मीद नहीं है। इसकी बड़ी वजह यह है कि शुरुआत में सिर्फ 6,250 टन कीवीफ्रूट को ड्यूटी-फ्री कोटा मिलेगा। भारत के कुल सालाना आयात के मुकाबले यह मात्रा काफी कम है। 2024 में भारत ने करीब 49,000 टन कीवीफ्रूट आयात किया था।

फिर भी, इसका असर तीन तरह से महत्वपूर्ण हो सकता है:

हालांकि, इस FTA का असर तीन तरह से देखने को मिल सकता है।

पहला, कोटे के तहत बिना इंपोर्ट ड्यूटी के आने वाला न्यूजीलैंड का कीवीफ्रूट उन देशों से आने वाले फलों के मुकाबले ज्यादा प्रतिस्पर्धी हो सकता है, जिन्हें ऐसी टैरिफ छूट नहीं मिलती।

दूसरा, इंपोर्टर्स को ड्यूटी में होने वाली बचत का कुछ हिस्सा रिटेलर्स और ग्राहकों तक पहुंचाने का मौका मिलेगा। खासकर ऐसे समय में जब बाजार में कीवीफ्रूट की सप्लाई अच्छी होगी, तब ग्राहकों को इसका फायदा कीमतों में देखने को मिल सकता है।

छठे साल तक कोटा बढ़कर 15,000 टन हो जाएगा, जिससे जीरो-ड्यूटी पर आने वाले सामान की मात्रा बढ़ जाएगी।

रिटेल में असल कमी इस बात पर निर्भर करेगी कि टैरिफ से हुई बचत का कितना हिस्सा सप्लाई चेन में आगे बढ़ाया जाता है। जीरो कस्टम ड्यूटी का मतलब जीरो इंपोर्ट कॉस्ट नहीं है, और ट्रांसपोर्टेशन, रेफ्रिजरेशन और खराब होने से जुड़े खर्चों की वजह से छोटे शहरों में कीमतें ज्यादा बनी रह सकती हैं।

कीवी फल को सेहत के लिए अच्छा क्यों माना जाता है?

कीवी फल में खास तौर पर विटामिन C भरपूर मात्रा में होता है। हार्वर्ड हेल्थ के अनुसार, एक कीवी फल से किसी वयस्क की रोजाना की विटामिन C की जरूरत का लगभग 80% हिस्सा मिल जाता है। साथ ही, यह फाइबर, पोटैशियम और विटामिन K का भी अच्छा स्रोत है।

US नेशनल इंस्टिट्यूट्स ऑफ हेल्थ की एक साइंटिफिक समीक्षा में कीवी फल को पोषक तत्वों से भरपूर बताया गया है, जिसमें विटामिन C, डाइटरी फाइबर, पोटैशियम, विटामिन E और फोलेट होते हैं। इसमें नियमित रूप से कीवी खाने से पाचन, इम्यून सिस्टम और मेटाबॉलिक हेल्थ को संभावित फायदे होने की बात कही गई है, साथ ही यह भी कहा गया है कि इन फायदों को एक संतुलित आहार के हिस्से के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।

इस वजह से कीवी फल भारतीय ग्राहकों को न सिर्फ एक प्रीमियम इंपोर्टेड फल के तौर पर, बल्कि विटामिन C और फाइबर के आसान स्रोत के तौर पर भी पसंद आ सकता है। इसके हेल्थ बेनिफिट्स, सुपरमार्केट में बढ़ती उपलब्धता और शहरों में बढ़ती मांग ने कीवीफ्रूट को भारत में इंपोर्ट किए जाने वाले फलों में शामिल कर दिया है।

ग्राहकों के लिए FTA का सबसे बड़ा और तुरंत दिखने वाला फायदा यह नहीं है कि हर कीवी सस्ता हो जाएगा। असली फायदा यह हो सकता है कि न्यूजीलैंड से ज्यादा मात्रा में कीवीफ्रूट कम टैरिफ रेट पर भारत आ सके।

हालांकि, बाजार में इसकी कीमत वास्तव में कितनी कम होगी, यह कई चीजों पर निर्भर करेगा। इनमें ड्यूटी-फ्री कोटे का कितना इस्तेमाल होता है, बाजार में कीवीफ्रूट की सप्लाई कैसी रहती है और इंपोर्टर्स व रिटेलर्स ड्यूटी में हुई बचत का कितना हिस्सा अपने पास रखते हैं, ये सभी बातें शामिल हैं।

योगी सरकार का फैसला, फलावदा के जनता PG कॉलेज का बदला नाम, अब चौधरी चरण सिंह के नाम से जाना जाएगा

योगी सरकार का फैसला, फलावदा के जनता PG कॉलेज का बदला नाम, अब चौधरी चरण सिंह के नाम से जाना जाएगा

प्रदेश की योगी सरकार शिक्षा के विस्तार और गुणवत्ता सुधार के साथ-साथ महापुरुषों के गौरवशाली योगदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में भी निरंतर कार्य कर रही है। इसी क्रम में मेरठ के फलावदा स्थित जनता पीजी कॉलेज का नाम परिवर्तित कर चौधरी चरण सिंह पीजी कॉलेज, फलावदा, मवाना किए जाने की कार्रवाई की गई है।

 

प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में प्रदेश सरकार शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक, गुणवत्तापूर्ण और रोजगारपरक बनाने के साथ ही विद्यार्थियों को देश और समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले महापुरुषों के विचारों एवं जीवन मूल्यों से जोड़ने का कार्य कर रही है। शिक्षण संस्थानों का महापुरुषों के नाम से जुड़ाव विद्यार्थियों को उनके संघर्ष, विचार और योगदान से परिचित कराने का सशक्त माध्यम है।

 

उन्होंने बताया कि चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ द्वारा जनता पीजी कॉलेज, फलावदा के नाम परिवर्तन के संबंध में शासन को प्रस्ताव उपलब्ध कराया गया था। विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद द्वारा प्रस्ताव पर विचार करते हुए नाम परिवर्तन की संस्तुति की गई। इसी क्रम में शासन स्तर से नियमानुसार आवश्यक कार्रवाही करते हुए महाविद्यालय का नाम चौधरी चरण सिंह पीजी कॉलेज, फलावदा, मवाना किए जाने का निर्णय लिया गया है।

 

चौधरी चरण सिंह का देश और प्रदेश के सामाजिक, शैक्षिक एवं कृषि क्षेत्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। किसानों, ग्रामीण समाज और शिक्षा के प्रति उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं। ऐसे महापुरुषों के नाम से शिक्षण संस्थानों का जुड़ना विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा का माध्यम बनेगा और उन्हें राष्ट्र निर्माण के प्रति अपने दायित्वों को समझने में मदद करेगा।

 

उच्च शिक्षा मंत्री ने कहा कि योगी सरकार महापुरुषों के सम्मान को केवल स्मरण तक सीमित रखने के बजाय उनके विचारों और योगदान को युवा पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए संस्थागत प्रयास कर रही है। प्रदेश में शिक्षण संस्थानों की पहचान, गौरव और गुणवत्ता को मजबूत करने के साथ-साथ विद्यार्थियों को बेहतर शैक्षिक वातावरण उपलब्ध कराने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

 

प्रदेश के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में शैक्षिक गुणवत्ता, आधारभूत सुविधाओं, शोध, नवाचार और रोजगारपरक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए लगातार कदम उठाए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उच्च शिक्षा को नई दिशा देते हुए ऐसे वातावरण का निर्माण किया जा रहा है, जिसमें युवा ज्ञान, कौशल और संस्कारों के साथ आगे बढ़ सकें।

 

उन्होंने कहा कि चौधरी चरण सिंह पीजी कॉलेज, फलावदा का नया नाम विद्यार्थियों को चौधरी चरण सिंह के जीवन, विचारों और राष्ट्रहित में उनके योगदान से जोड़ने के साथ ही उन्हें समाज और देश के प्रति जिम्मेदार भूमिका निभाने की प्रेरणा देगा।

PM Kisan Yojana: क्या दिवाली से पहले किसानों के खाते में आएंगे ₹2000? जानिए 24वीं किस्त का अपडेट

PM Kisan Yojana 24th Installment: प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना की अगली यानी 24वीं किस्त का किसानों को इंतजार है। 23वीं किस्त 20 जून 2026 को जारी की गई थी। अब देश के करोड़ों किसान अगली किस्त का इंतजार कर रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स में अक्टूबर या दिवाली से पहले किस्त जारी होने की संभावना जताई जा रही है। कृषि विभाग के उप कृषि निदेशक नीलेश चौरसिया ने भी पिछले दिनों संकेत दिया था कि अगली किस्त अक्टूबर में आ सकती है। हालांकि, अभी सरकार की ओर से किसी पक्की तारीख का ऐलान नहीं हुआ।

पीएम किसान योजना की 24वीं किस्त का लाभ उठाने के लिए किसानों को अपनी पात्रता पर ध्यान देना चाहिए। कुछ जरूरी काम पूरे नहीं होने पर किस्त अटक सकती है।

e-KYC नहीं है तो अटक सकता है पैसा

PM-KISAN के तहत रजिस्टर्ड किसानों के लिए e-KYC जरूरी है। सरकार के आधिकारिक पोर्टल पर भी इसे अनिवार्य बताया गया है। इसलिए जिन किसानों की e-KYC पूरी नहीं है, उन्हें इसे जल्द पूरा कर लेना चाहिए।

इसके अलावा बैंक खाते की जानकारी और आधार से जुड़ी डिटेल भी सही होनी चाहिए। PM-KISAN की रकम DBT के जरिए किसानों के बैंक खाते में भेजी जाती है।

नए किसानों के लिए Farmer ID जरूरी

अगर आपने हाल में PM-KISAN के लिए रजिस्ट्रेशन कराया है, तो Farmer ID भी अहम है। सरकार ने नए किसानों के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया में Farmer ID को जरूरी किया है।

इस डिजिटल ID में किसान की पहचान और जमीन से जुड़ी जानकारी दर्ज होती है। Farmer ID बनवाने के लिए किसान CSC सेंटर या संबंधित राज्य के कृषि पोर्टल की मदद ले सकते हैं।

जमीन आपके नाम नहीं है तो क्या होगा?

PM-KISAN का लाभ जमीन रखने वाले पात्र किसान परिवारों को मिलता है। यानी केवल खेती करने से योजना का लाभ मिलना जरूरी नहीं है। जमीन के मालिकाना हक और योजना की दूसरी पात्रता शर्तें भी देखी जाती हैं।

PM-KISAN के आधिकारिक पोर्टल के मुताबिक, जमीन का मालिकाना हक 1 फरवरी 2019 के बाद हासिल करने वाले कुछ मामलों और एक ही परिवार के एक से ज्यादा सदस्यों के लाभ लेने जैसे मामलों की जांच की जा सकती है। ऐसे मामलों में जांच पूरी होने तक भुगतान रोका जा सकता है।

हर साल मिलते हैं ₹6,000

PM-KISAN के तहत पात्र किसान परिवारों को साल में कुल ₹6,000 मिलते हैं। यह रकम तीन बराबर किस्तों में दी जाती है। यानी हर किस्त में ₹2,000 सीधे बैंक खाते में ट्रांसफर किए जाते हैं।

फिलहाल 24वीं किस्त की आधिकारिक तारीख का इंतजार है। ऐसे में किसानों को अपना e-KYC, बैंक और आधार से जुड़ी जानकारी और लाभार्थी स्टेटस पहले ही चेक कर लेना चाहिए।

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व्यवस्था को चुभने वाले अधिकारी

मुंढे मई 2026 में एफडीए आयुक्त बने। कुछ ही महीनों में विभाग ने हजारों निरीक्षण किए, सैकड़ों लाइसेंस निलंबित किए, करोड़ों रुपये का मिलावटी या असुरक्षित माल जब्त किया और गुटखा-पान मसाला के अवैध कारोबार पर कठोर कार्रवाई की। बड़े ब्रांड, पुराने होटल, क्विक-कॉमर्स गोदाम, यहाँ तक कि मुंबई हाईकोर्ट की कैंटीन भी इस दायरे से बाहर नहीं रहे। संदेश साफ था, नियम छोटे-बड़े के भेद से नहीं चलेंगे। अब वही सख्ती निजी अस्पतालों के उपभोग्य सामान पर दिख रही है।

महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषध प्रशासन के आयुक्त तुकाराम मुंढे इन दिनों एक बार फिर उन अधिकारियों की पंक्ति में खड़े दिखते हैं, जिनकी उपस्थिति व्यवस्था को असहज कर देती है। होटल-रेस्तरां की रसोइयों से शुरू हुआ उनका अभियान अब अस्पतालों के बिलों तक पहुँच गया है। सवाल केवल एक अधिकारी के तेवर का नहीं है। सवाल यह है कि जनता के स्वास्थ्य और जेब के बीच खड़ी लूट को रोकने वाले अधिकारी भारत में इतने दुर्लभ क्यों हैं? और जब वे दिखते हैं तो उनकी पदावधि इतनी छोटी क्यों रह जाती है?

मुंढे मई 2026 में एफडीए आयुक्त बने। कुछ ही महीनों में विभाग ने हजारों निरीक्षण किए, सैकड़ों लाइसेंस निलंबित किए, करोड़ों रुपये का मिलावटी या असुरक्षित माल जब्त किया और गुटखा-पान मसाला के अवैध कारोबार पर कठोर कार्रवाई की। बड़े ब्रांड, पुराने होटल, क्विक-कॉमर्स गोदाम, यहाँ तक कि मुंबई हाईकोर्ट की कैंटीन भी इस दायरे से बाहर नहीं रहे। संदेश साफ था, नियम छोटे-बड़े के भेद से नहीं चलेंगे। अब वही सख्ती निजी अस्पतालों के उपभोग्य सामान पर दिख रही है।

एक सर्वे में सामने आया कि अस्पताल ने आईवी इन्फ्यूजन सेट 11.05 रुपये में खरीदा, पर मरीज के बिल में उसकी कीमत 325 रुपये लिखी गई। यह करीब 2,841 प्रतिशत का अंतर है। सिरिंज 6.75 रुपये में खरीदी गई, बिल में 57.20 रुपये। कैथेटर 29.41 रुपये में लिया गया, मरीज से 310 रुपये वसूले गए। मुंढे ने राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण और केंद्रीय औषध विभाग को पत्र लिखकर ट्रेड मार्जिन पर लगाम लगाने की माँग की है।

यह महज मूल्य का खेल नहीं है। अस्पताल के बिल का सबसे मोटा हिस्सा अक्सर वह होता है जिसका उपचार से सीधा संबंध कम और खरीद-बिक्री की श्रृंखला से ज्यादा होता है। उल्लेखनीय है कि जब मरीज सरकारी योजना या निजी बीमा के दायरे में होता है, तो यह लूट और निर्लज्ज हो जाती है। मरीज सोचता है कि खर्च कंपनी या सरकार उठाएगी। अस्पताल जानता है कि क्लेम पास होने की प्रक्रिया जटिल है, मरीज कमजोर है और पूछताछ कम होती है। नतीजा यह कि खपत की वस्तुएँ मनमाने मार्जिन पर चढ़ जाती हैं, कमरे-जांच-उपकरण के पैकेज फुला दिए जाते हैं और बीमा का पैसा अंततः समाज के उसी वर्ग से वसूला जाता है जो प्रीमियम चुकाता है। सरकारी योजनाओं में भी यही तर्क काम करता है और सार्वजनिक धन निजी लाभ में बदल जाता है।

भारत को तुकाराम जैसे अधिकारियों की जरूरत है क्योंकि हमारे नियामक ढांचे में कानून पर्याप्त हैं, पर प्रवर्तन चयनात्मक है। खाद्य सुरक्षा, औषधि नियंत्रण और अस्पताल शुल्क, तीनों क्षेत्र उन जगहों पर हैं जहाँ आम आदमी सबसे असहाय होता है। वह मेनू नहीं पढ़ सकता कि पनीर असली है या नहीं; वह बिल नहीं काट सकता कि सेट ग्यारह का है या तीन सौ पच्चीस का; वह बीमा कंपनी से नहीं लड़ सकता जब अस्पताल कहता है कि पैकेज में सब शामिल है।

ऐसे में यदि कोई अधिकारी बिना चेतावनी निरीक्षण करता है, लाइसेंस निलंबित करता है और आंकड़े सार्वजनिक करता है, तो वह केवल विभाग नहीं चला रहा होता, वह बाजार की नैतिक सीमा खींच रहा होता है। गौरतलब है कि तुकाराम मुंढे प्रभाव तेज़ी से फैल रहा है। रसोई साफ होने लगीं, मेनू पर एनालॉग पनीर लिखा जाने लगा और अस्पताल अब कम से कम कीमतों की चर्चा से बच नहीं सकते। यह डर सुधार का पहला कदम है। स्थायी सुधार तभी आएगा जब एक व्यक्ति का अभियान संस्था की आदत बनेगी।

सवाल उठता है कि ऐसे अधिकारी बार-बार तबादले का शिकार क्यों होते हैं? मुंढे 2005 बैच के महाराष्ट्र काडर के आईएएस हैं। करीब इक्कीस वर्ष की सेवा में उनके पच्चीस के आसपास तबादले हुए हैं। सोलापुर में रेत माफिया, नवी मुंबई में अनावश्यक परियोजनाओं का विरोध, पुणे परिवहन में अनुपस्थित ड्राइवरों की छँटनी, स्वास्थ्य आयुक्त रहते सरकारी डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस पर रोक, हर जगह उन्होंने स्वार्थी हितों से टकराव चुना। तबादला सजा नहीं कहा जाता, पर व्यवहार में वह सजा ही है। ईमानदार अधिकारी को बार-बार हटाकर व्यवस्था यह संकेत देती है कि स्थिरता सुविधा के पक्ष में है, असुविधा के नहीं। राजनेता, स्थानीय व्यापारिक लॉबी, कभी विभाग के भीतर के कर्मचारी, सभी को एक ही शिकायत होती है: काम का दबाव, अचानक छापे, छवि खराब होना। जनसमर्थन सोशल मीडिया पर दिखता है, पर फाइलें सचिवालय में चलती हैं। जब तक तबादले की शक्ति बिना पारदर्शी कारण के बनी रहेगी, मुंढे जैसे अधिकारी अपवाद रहेंगे, आदर्श नहीं।

ऐसे में आलोचना भी जरूरी है। व्यवसाय जगत कहता है कि बिना सुधार का समय दिए लाइसेंस काटना अति है। अदालत ने कभी कहा कि मच्छर मारने के लिए तलवार न चलाई जाए। विभाग के कुछ कर्मचारियों ने कार्यभार की शिकायत की। ये बातें अनसुनी नहीं की जानी चाहिए। प्रवर्तन कठोर हो, पर पूर्वानुमान योग्य और समान भी हो। छोटे ढाबे और बड़े अस्पताल दोनों पर एक ही पैमाना लगे। मूल्य नियंत्रण ऐसा हो कि गुणवत्ता न गिरे और इनोवेटर का मार्जिन भी पूरी तरह न मिटे। बीमा कंपनियों और सरकारी योजनाओं को अस्पताल के खरीद मूल्य से बिल का मिलान अनिवार्य बनाना चाहिए। मरीज को बाहरी फार्मेसी से दवा लेने की स्वतंत्रता कागज पर नहीं, व्यवहार में मिलनी चाहिए।

आखिरकार प्रश्न व्यक्ति का नहीं, संस्कृति का है। भारत में सेवा भाव वाले अधिकारी भी पैदा होते हैं, गाँव के किसान परिवार से आईएएस बनने वाले मुंढे इसका जीवंत उदाहरण हैं। कमी यह है कि व्यवस्था उन्हें टिकाए नहीं रखती। जब तक ईमानदारी को करियर का जोखिम माना जाएगा, रसोई में कीड़े और बिल में दो हजार प्रतिशत मुनाफा सामान्य बने रहेंगे। देश को मुंढे जैसे और अधिकारियों की जरूरत है। उससे भी ज्यादा जरूरत है ऐसी प्रशासनिक सुरक्षा की, जिसमें वे एक पद पर पूरा कार्यकाल काट सकें, आंकड़े सुधार सकें और लॉबी के दबाव में विस्थापित न हों। स्वास्थ्य और भोजन मौलिक जरूरतें हैं। इन पर लूट को सहना शासन की विफलता है। एक अधिकारी का अभियान चेतावनी है। चेतावनी को नीति बनाना अब बाकी है।

20 लाख खर्च कर MBA ग्रेजुएट ने शुरू की शिमला मिर्च की खेती, सालाना 2.25 करोड़ का कमा रही मुनाफा

MBA ग्रेजुएट प्रणिता वामन ने कोरोना काल में 20 लाख का एक समझदारीभरा निवेश किया था, जिसके बाद से आज वह करोड़ों का प्रोफिट कमा रही हैं। उन्होंने COVID-19 लॉकडाउन के दौरान शिमला मिर्च की खेती करनी शुरू की थी। एक एकड़ से शुरू हुआ काम आज 25 एकड़ के फार्म तक पहुंच चुका है। उनका टर्नओवर 4 करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है।

30Stades की रिपोर्ट के मुताबिक उनकी ये जर्नी फूड प्रोसेसिंग सेक्टर में इंटर्नशिप के साथ शुरू हुई थी, जहां उन्होंने मॉर्डन एग्रीकल्चर (आधुनिक खेती) में संभावनाओं को खोजा । 2020 में एक एकड़ पॉलीहाउस खेती से शुरू हुआ यह काम अब 25 एकड़ के खेती के कारोबार में तक पहुंच गया है, जिससे प्रणिता वामन का सालाना ₹4 करोड़ का टर्नओवर होता है।

MBA से खेती तक का सफर

प्रणिता वामन महाराष्ट्र के पुणे जिले के जुन्नार तालुका के कलवाड़ी गांव से ताल्लुक रखती हैं। वह एक किसान परिवार में पली-बढ़ी हैं। उनके पिता टीचर थे, लेकिन वॉलंटरी रिटायरमेंट लेने के बाद भी वे फलों और सब्जियों की खेती से जुड़े रहे। उन्होंने 2019 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज पुणे से एग्री बिजनेस मैनेजमेंट में MBA किया है। अपनी डिग्री करने के बाद उन्होंने एक फूड प्रोसेसिंग कंपनी में इंटर्नशिप करनी शुरू किया था।

इंटरर्नशिप से मिले एक्सपीरिएंस ने वामन को हाई-टेक खेती, खासकर पॉलीहाउस खेती के बारे में जानने के लिए काफी मोटीवेट किया। कम संसाधन में किसान फसल उगाने की स्थितियों को कैसे मैनेज कर सकते हैं, फसल की पैदावार और क्वालिटी बेहतर कैसे बना सकते हैं और पौधों को खराब मौसम से कैसे बचा सकते हैं? यह सब उन्होंने सीखा। बदलते मौसम के पैटर्न को देखते हुए कंट्रोल किए गए माहौल में सही तरीके से खेती आसानी से की जा सकती है।

वामन ने बताया कि हम तेजी से बदलते मौसम का सामना करते रहते हैं। आज लगातार अच्छी कमाई करने का एकमात्र तरीका हाई-टेक खेती है। यह बेहद फायदेमंद भी है।

प्रणिता ने शिमला मिर्च की खेती को ही क्यों चुना?

MBA ग्रेजुएट ने कहा खेती करने की प्लानिंग तो करली गई, लेकिन फिर हमारे सामने अगला सवाल यह था कि क्या उगाया जाए? वामन ने शिमला मिर्च (कैप्सिकम) को चुनने से पहले लेट्यूस और ब्रोकली जैसी कई सब्जियों को उगाने के बारे में भी विचार किया था। आखिरकार फिर उन्होंने शिमला मिर्च की फसल को चुना क्योंकि इसकी मांग हर मौसम में बनी रहती है।

वामन ने कहा कि “मैंने लेट्यूस, ब्रोकली और दूसरी विदेशी सब्जियों की खेती करने के बारे में विचार किया था। लेकिन शिमला मिर्च की मांग की डिमांड को देखते हुए हमने इसे फाइनल किया। शिमला मिर्च सालभर डिमांड में रहती है। इसका कोई खास सीजन नहीं होता है।

सालभर बाजार में रहती है डिमांड

ये शहरों के बाजारों में सालभर बिकती है। शिमला का यूज होटल, रेस्टोरेंट और फूड बिजनेस में बड़े पैमाने पर किया जाता है। खासकर लाल और पीली शिमला मिर्च अक्सर हरी शिमला मिर्च के मुकाबले ज्यादा महंगी बिकती हैं। इस फसल का एक बड़ा इंटरनेशनल मार्केट भी है।

वामन के मुताबिक उन्होंने मार्च 2020 में वामन ने 50% सरकारी सब्सिडी के साथ 20 लाख रुपये का निवेश करके एक पॉलीहाउस में एक एकड़ ज़मीन पर शिमला मिर्च की खेती शुरू की थी। उन्होंने KVK बारामती से लाए गए 12,000 पौधे लगाए थे। फसल जून-जुलाई में पूरी तरह से तैयार हो गई थी। लेकिन उनकी पहली फसल कटने का समय कोविड-19 लॉकडाउन लग गया था, जिससे बाजार बुरी तरह से प्रभावित हुए थे।

खरीदार ढूंढना था चुनौती

कमर्शियल खेती में नए होने की वजह से खरीदार ढूंढना उनके लिए एक बड़ी चुनौती बन गई थी। वामन ने माना “फील्ड में नई होने के नाते मुझे ये पता नहीं था कि अपनी फसल को कहां बेचना है। इसके बाद उन्होंने ऑनलाइन थोक सब्जी खरीदारों को ढूंढना शुरू किया। अपनी फसल बेचने के लिए उन्होंने नासिक से लेकर मुंबई तक के व्यापारियों से संपर्क किया। वामन ने बताया कि काफी मशक्कत के बाद मुझे शिमला मिर्च खरीदने के लिए एक व्यापारी मिला था। लॉकडाउन के दौरान कई किसानों ने इसकी खेती बंद कर दी थी।”

उनकी पहली फसल में 40 टन लाल, पीली और हरी शिमला मिर्च हुई, जो 80 रुपये प्रति किलो के भाव से बिकी थी। इससे उन्होंने 32 लाख रुपये कमाए थे। अपना 20 लाख रुपये का इंवेस्टमेंट निकालने के बाद वामन ने 2021 तक खेती का दायरा बढ़ाकर 1 से 25 एकड़ कर लिया था। इसमें छह एकड़ में पॉलीहाउस और 19 एकड़ में शेड नेट का इस्तेमाल किया, जिनसे अलग-अलग पैदावार और कीमतें मिलीं।

जानकारी के लिए बता दें कि पॉलीहाउस खेती से सालाना प्रति एकड़ लगभग 30-32 टन पैदावार मिलती है, जबकि शेड नेट के तहत यह 22-24 टन होती है। वामन ने बताया कि पॉलीहाउस से उन्हें प्रति एकड़ 30 लाख रुपये का टर्नओवर होता है, जिसमें 8-10 लाख रुपये का खर्च आता है। 25 एकड़ में वह सालाना 4 करोड़ रुपये का टर्नओवर और लगभग 2.25 करोड़ रुपये का मुनाफा आराम से कमा लेती हैं।

आरक्षण की चोरी करने वाले ज्ञान दे रहे, अंबेडकर को अपमानित करने वाले सम्मान की बात करते हैं: अनिल राजभर

आरक्षण की चोरी करने वाले ज्ञान दे रहे, अंबेडकर को अपमानित करने वाले सम्मान की बात करते हैं: अनिल राजभर

Uttar Pradesh Cabinet Minister Anil Rajbhar targeted Akhilesh Yadav

– ‘सपा मुखिया राजधानी में बैठकर जनता को गुमराह कर रहे, चार सरकारों में पिछड़ों-दलितों का आरक्षण चुराया, एक जाति विशेष को मलाई दी’

– 2012-17 में बाबा साहेब की मूर्तियां खंडित करने का आरोप, जांच होगी, आजम खान ने अंबेडकर को सबसे बड़ा भूमाफिया बताया था

– उनके पास जनता के बीच जाने का समय नहीं है, जनता के बीच जाएंगे भी नहीं

Cabinet Minister Anil Rajbhar : समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव की प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरक्षण, दलित समाज और बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर को लेकर भाजपा सरकार पर लगे आरोपों का उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री अनिल राजभर ने तीखा जवाब दिया है। एएनआई से बातचीत में राजभर ने कहा कि सपा के मुखिया प्रदेश की राजधानी में बैठकर प्रतिदिन प्रदेश और सम्मानित जनता को गुमराह करने की कोशिश करते हैं। उनके पास जनता के बीच जाने का समय नहीं है, जनता के बीच जाएंगे भी नहीं।

 

राजभर ने कहा कि आज सपा आरक्षण की बात कर रही है, जबकि उनकी चार सरकारों में पिछड़ों और दलितों के आरक्षण की जितनी डकैती हुई, उतनी शायद ही कभी हुई हो। उन्होंने आरोप लगाया कि आरक्षण की चोरी करने वाले आज आरक्षण पर ज्ञान दे रहे हैं। सपा ने सारे पिछड़ों और अति पिछड़ों का आरक्षण चुराया। जब-जब समाजवादी पार्टी की सरकार बनी, तब-तब आरक्षण की मलाई एक जाति विशेष के लोगों को दी गई। पूरी मलाई खाकर आज ये आरक्षण और बाबा साहब की बात कर रहे हैं।

 

आजम खान पर अनिल राजभर का हमला 

उन्होंने कहा कि 2012 से 2017 का दौर याद करना चाहिए। यह साजिश है। समाजवादी पार्टी गुंडों को आगे करके समाज में वैमनस्यता पैदा करने की कोशिश कर रही है। राजभर ने कहा कि अब इसकी भी जांच होगी कि समाजवादी पार्टी के किस गुंडे ने कहां मूर्ति खंडित की। उन्होंने सपा से अपने गिरेबान में झांकने को कहा और आरोप लगाया कि 2012 से 2017 के बीच सपा के संरक्षण में बाबा साहब की मूर्तियों को खंडित करने का काम हुआ।

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दोहरे चरित्र के लोग हैं सपाई

मंत्री ने सवाल किया कि बाबा साहब को भूमाफिया किसने बताया? उन्होंने कहा कि सपा के तत्कालीन मंत्री आजम खान ने बाबा साहब को प्रदेश का सबसे बड़ा भूमाफिया बताया था। जहां बाबा साहब की मूर्तियां लगी हैं और उनके नाम के पार्क बने हैं, वहां यह कहा गया मानो दलित समाज ने उन पर कब्जा कर लिया हो और बाबा साहब सबसे बड़े भूमाफिया हों।

राजभर ने कहा कि आज इन्हीं लोगों को बाबा साहब और दलित समाज याद आ रहे हैं। ये दोहरे चरित्र के लोग हैं। आरक्षण की चोरी करने वाले आज आरक्षण पर ज्ञान दे रहे हैं और बाबा साहब को अपमानित करने वाले आज उनके सम्मान की बात कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सपा और उसके नेता जनता को कितना नासमझ समझते हैं, यह उनके बयानों और प्रेस कॉन्फ्रेंस से निकलकर आता है।

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प्रतिदिन बदल रहे पीडीए का परिभाषा

राजभर ने कहा कि चिंता न करें, समाज गुमराह होने वाला नहीं है। प्रदेश उनके असली चेहरे को अच्छी तरह जानता है। पीडीए में दलित का ‘डी’ है, कल क्या कहेंगे पता नहीं। अखिलेश पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा कि इतना कन्फ्यूज नेता तो हम लोगों ने देखा ही नहीं। प्रतिदिन पीडीए की परिभाषा बदल रहे हैं। जनता सब कुछ देख और समझ रही है। समाजवादी पार्टी की दाल नहीं गलने वाली, निश्चिंत रहें।

झूठ की गूंज में कांग्रेस के युवराज का आचरण नारी शक्ति का अपमान : योगी आदित्यनाथ

झूठ की गूंज में कांग्रेस के युवराज का आचरण नारी शक्ति का अपमान : योगी आदित्यनाथ

Chief Minister Yogi Adityanath targeted Rahul Gandhi in Greater Noida

– ग्रेटर नोएडा में दो दिवसीय ‘प्रेरणा विमर्श-2026’ के समापन समारोह को मुख्यमंत्री योगी ने किया संबोधित

– मुख्यमंत्री योगी ने राहुल गांधी पर साधा निशाना, बोले- देश को उनसे उम्मीद करना छोड़ देना चाहिए, ये पथभ्रष्ट और मार्ग से भटके हुए लोग

– मुख्यमंत्री योगी ने कहा- समाज में भ्रम पैदा कर अव्यवस्था और अराजकता फैलाना इनका एकमात्र लक्ष्य

– मुख्यमंत्री योगी ने हामिद अंसारी पर भी साधा निशाना, बोले- भारत की समदृष्टि समझते तो हिंदू दृष्टि को नहीं कोसते

– मुख्यमंत्री योगी बोले- बीमारू राज्य से रेवेन्यू सरप्लस स्टेट बना यूपी, अर्थव्यवस्था, प्रति व्यक्ति आय और बजट हुआ तीन गुना

– मुख्यमंत्री योगी ने कहा- 9.5 लाख युवाओं को सरकारी नौकरी, 96 लाख एमएसएमई इकाइयों में सवा तीन करोड़ को काम

– मुख्यमंत्री योगी बोले- यूपी में 24 हजार से अधिक स्टार्टअप, इनमें आधे महिलाओं के हाथ, महिला वर्कफोर्स 12 से बढ़कर 36-37 फीसदी

– मुख्यमंत्री योगी ने कहा- अगले तीन-चार महीने में यूपी पुलिस में 50 हजार से अधिक होगी महिलाओं की संख्या

Chief Minister Yogi Adityanath : मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रविवार को कांग्रेस नेता राहुल गांधी और पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी पर निशाना साधा। राहुल गांधी का नाम लिए बिना उन्हें ‘कांग्रेस का युवराज’ बताते हुए कहा कि अपने झूठ की गूंज में उन्होंने जिस प्रकार का आचरण किया, वह पूरी नारी शक्ति का अपमान है। मुख्यमंत्री ने कहा कि देश को ऐसे लोगों से उम्मीद करना छोड़ देना चाहिए। ये पथभ्रष्ट और मार्ग से भटके हुए लोग हैं, जिनका लक्ष्य समाज में भ्रम पैदा कर अव्यवस्था और अराजकता फैलाना है।

 

ग्रेटर नोएडा में दो दिवसीय ‘प्रेरणा विमर्श-2026’ के समापन समारोह में मुख्यमंत्री योगी ने पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के वक्तव्य को दुर्भाग्यपूर्ण और डरावना बताया। उन्होंने कहा कि महत्वपूर्ण संवैधानिक पद पर रहे व्यक्ति से पद की गरिमा के अनुरूप आचरण की अपेक्षा होती है। काश वह भारत की समदृष्टि को समझ पाते तो भारत, भारतीयता और हिंदू दृष्टि को नहीं कोसते। मुख्यमंत्री ने महिला सशक्तीकरण, युवाओं को रोजगार, स्टार्टअप और प्रदेश की अर्थव्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि बीमारू कहा जाने वाला उत्तर प्रदेश अब रेवेन्यू सरप्लस स्टेट और देश का ग्रोथ इंजन बन चुका है।

 

नारी सशक्तीकरण भाषण से नहीं, काम से होगा

मुख्यमंत्री ने कहा कि नारी गरिमा की रक्षा और महिला सशक्तीकरण केवल भाषणों से नहीं होगा। सरकार ने योजनाओं में महिलाओं को प्राथमिकता दी है। देश में तीन करोड़ परिवारों को घरौनी के माध्यम से मकान का मालिकाना अधिकार दिया गया, जिसमें पहला अधिकार महिलाओं का है। 12 करोड़ परिवारों को एलपीजी कनेक्शन और 12 करोड़ घरों में शौचालय की सुविधा दी गई। यूपी में 54 हजार बैंकिंग कॉरेस्पोंडेंट सखी गांवों में बैंकिंग सेवाएं दे रही हैं।

 

उन्होंने झांसी के बलिनी मिल्क प्रोड्यूसर का उदाहरण देते हुए कहा कि 2019 में पांच महिलाओं से शुरू समूह से आज 62 हजार महिलाएं जुड़ी हैं। इसका टर्नओवर 115 करोड़ रुपए है और प्रत्येक महिला आठ से 10 हजार रुपए महीने कमा रही है। आगरा, काशी, गोरखपुर और लखनऊ में भी मिल्क प्रोड्यूसर काम कर रहे हैं। इनसे करीब चार लाख महिलाएं जुड़ी हैं।

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महिला पुलिस 10 हजार से बढ़कर 44 हजार

मुख्यमंत्री ने कहा कि 2017 में यूपी पुलिस में केवल 10 हजार महिलाएं थीं, जिनकी संख्या अब 44 हजार हो गई है। अगले तीन-चार महीने में यह आंकड़ा 50 हजार के पार होगा। प्रदेश में महिला वर्कफोर्स की भागीदारी भी 12 प्रतिशत से बढ़कर 36-37 प्रतिशत हो गई है। डिजिटल एंटरप्रेन्योरशिप की नई योजना के तहत आठ हजार न्याय पंचायतों में से चार हजार में महिला उद्यमियों को जोड़कर प्रशिक्षण दिया जाएगा।

 

9.5 लाख सरकारी नौकरियां, सवा तीन करोड़ को एमएसएमई में काम

मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत में सबसे बड़ी युवा शक्ति उत्तर प्रदेश के पास है और प्रदेश में 56 प्रतिशत युवा हैं। पिछले साढ़े नौ वर्ष में 9.5 लाख युवाओं को सरकारी नौकरी दी गई। 96 लाख एमएसएमई इकाइयों में सवा तीन करोड़ युवा काम कर रहे हैं। बेहतर सुरक्षा व्यवस्था के कारण प्रदेश को 50 लाख करोड़ रुपए के निवेश प्रस्ताव मिले। इनमें 15 लाख करोड़ रुपए से अधिक का निवेश धरातल पर उतरा और इससे 65 लाख से अधिक युवाओं को नौकरी मिली।

 

अब यूपी को कोई बीमारू राज्य नहीं कहता

मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था, प्रति व्यक्ति आय और बजट तीन गुना हुआ है। नौ-दस वर्ष पहले बीमारू कहा जाने वाला उत्तर प्रदेश आज रेवेन्यू सरप्लस स्टेट और भारत का ग्रोथ इंजन है। अब प्रदेश के सामने पहचान का संकट नहीं है। यह बदलाव विरासत के सम्मान और अपराध व भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति से आया है।

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विपक्ष पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि जो लोग पहले यूपी के सामने पहचान का संकट खड़ा करते थे, वे फिर दंगा, कर्फ्यू, समाज को बांटने, भेदभाव, अव्यवस्था और अराजकता का दौर लाना चाहते हैं।

 

120 से कम थे स्टार्टअप, अब 24 हजार से अधिक

मुख्यमंत्री ने कहा कि 2017 से पहले यूपी में 120 से भी कम स्टार्टअप थे, जबकि आज इनकी संख्या 24 हजार से अधिक है। इनमें करीब आधे महिलाओं द्वारा संचालित हैं। उन्होंने पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह, चंद्रशेखर आजाद, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और वीर सावरकर का उल्लेख करते हुए युवाओं से राष्ट्रीय नायकों से प्रेरणा लेने का आह्वान किया।

 

मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए राष्ट्र प्रथम है। देश सुरक्षित है तो धर्म, उपासना पद्धति, जाति, परिवार और व्यक्ति भी सुरक्षित हैं। नारी और युवा शक्ति का स्वावलंबन ही उत्तर प्रदेश और भारत के स्वावलंबन का आधार बनेगा।

 

भूतकाल जानेंगे तभी भविष्य के सपने गढ़ेंगे

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख स्वांत रंजन ने महर्षि अरविंद का उल्लेख करते हुए कहा कि जो समाज अपने भूतकाल के गौरव, वर्तमान की पीड़ा और भविष्य के सपनों को समझता है, वही उन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ता है। आचार्य धर्मपाल की पुस्तक ‘द ब्यूटीफुल ट्री’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि युवाओं को अपने देश, संस्कृति और उपलब्धियों को जानकर भविष्य के सपने गढ़ने चाहिए।

 

2020 में शुरू हुई प्रेरणा विमर्श की यात्रा

संसद टीवी के संपादक श्याम किशोर ने कहा कि कृपा शंकर के मार्गदर्शन में 2020 में प्रेरणा विमर्श की यात्रा शुरू हुई। इसके तहत स्मारिका, पुस्तकें और ‘केशव संवाद’ प्रकाशित होते हैं। विषय आधारित प्रदर्शनी भी इसका प्रमुख हिस्सा है। समाज और राष्ट्रहित में सकारात्मक पत्रकारिता करने वाली एक महिला को हर वर्ष सम्मानित किया जाता है। उन्होंने बताया कि प्रेरणा विमर्श-2026 का विषय ‘उत्कर्ष नारी सम्मान, युवा स्वाभिमान’ है।

 

दीप प्रज्ज्वलन से हुआ समापन समारोह का शुभारंभ

मुख्यमंत्री योगी ने दीप प्रज्ज्वलित कर समारोह का शुभारंभ किया। कार्यक्रम में ‘केशव संवाद’ और ‘प्रेरणा विचार’ की वैचारिक यात्रा पर वीडियो दिखाया गया और मुख्यमंत्री को दोनों पत्रिकाओं की प्रतियां सौंपी गईं। एक अन्य वीडियो में प्रदेश की नारी और युवा शक्ति की बदलती तस्वीर प्रस्तुत की गई।

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कार्यक्रम में ये रहे मौजूद

समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख स्वांत रंजन, गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राणा प्रताप सिंह, प्रेरणा विमर्श के कार्यकारी अध्यक्ष वीके गुप्ता, अध्यक्ष अनिल त्यागी, डॉ. मनमोहन सिंह सिसोदिया, प्रेरणा शोध संस्थान की अध्यक्ष प्रीति दादू, सचिव मोनिका चौहान, गौतम बुद्ध नगर के जनप्रतिनिधि और स्वयंसेवक मौजूद रहे।