जब उम्मीद थक जाए, तब साहस काम आता है

जब उम्मीद थक जाए, तब साहस काम आता है

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जीवन का सबसे कठिन समय वह नहीं होता, जब हमारे सामने समस्याएँ खड़ी होती हैं। सबसे कठिन समय वह होता है, जब हर प्रयास के बाद भी मन धीरे-धीरे यह मानने लगे कि शायद अब कुछ नहीं बदलेगा। बाहर से सब कुछ सामान्य दिखाई देता है, लेकिन भीतर उम्मीद थकने लगती है। ऐसे क्षणों में इंसान दुनिया से नहीं, स्वयं से हारने लगता है।

 

यदि आपने भी कभी ऐसा समय देखा है, तो यह लेख आपके लिए है। क्योंकि जीवन में ऐसा दौर लगभग हर व्यक्ति के सामने आता है। फर्क केवल इतना होता है कि कोई उसे शब्दों में कह देता है और कोई चुपचाप अपने भीतर सहता रहता है। हम अक्सर सोचते हैं कि इंसान केवल उम्मीद के सहारे जीता है। लेकिन अनुभव ने मुझे एक अलग बात सिखाई है। उम्मीद और साहस एक ही चीज़ नहीं हैं। उम्मीद कहती है— 'शायद सब ठीक हो जाएगा।' साहस कहता है— 'जब तक सब ठीक नहीं होता, तब तक मैं रुकूँगा नहीं।'

 

यही कारण है कि जब उम्मीद थकने लगती है, तब साहस की असली परीक्षा शुरू होती है। कुछ वर्ष पहले मेरी मुलाकात एक छोटे दुकानदार से हुई। उनका चेहरा बुझा-बुझा था। बातचीत के दौरान उन्होंने कहा, 'अब हर सुबह दुकान खोलने का मन नहीं करता। महीनों से मेहनत कर रहा हूँ, लेकिन लगता है जैसे जीवन एक ही जगह ठहर गया है।' मैंने उनसे पूछा, 'फिर भी रोज़ दुकान क्यों खोलते हैं?'

 

उन्होंने कुछ क्षण मेरी ओर देखा और फिर मुस्कुराकर बोले, 'क्योंकि अगर आज शटर नहीं खोलूँगा, तो कल बदलने की संभावना भी अपने हाथों से बंद कर दूँगा। सच कहूँ, अब मैं उम्मीद के भरोसे नहीं, अपने कर्तव्य के भरोसे दुकान खोलता हूँ।' उनकी यह बात सुनकर मैं कुछ देर तक मौन रहा। उस दिन पहली बार महसूस हुआ कि साहस हमेशा ऊँची आवाज़ में नहीं बोलता। कई बार वह हमारे भीतर चुपचाप इतना भर कहता है—'रुकना मत… बस अगला सही कदम उठाते रहो।'

 

उस दिन मुझे एक और बात समझ में आई। जीवन आगे बढ़ाने के लिए हमेशा बड़ी उम्मीदों की ज़रूरत नहीं होती। कई बार एक छोटा-सा कारण ही काफी होता है—परिवार की जिम्मेदारी, किसी अपने की मुस्कान, अपने काम के प्रति ईमानदारी या स्वयं से किया हुआ एक वादा। शायद इसी कारण किसान हर वर्ष फिर से बीज बोता है। उसे मौसम की गारंटी नहीं होती, लेकिन कर्म पर उसका विश्वास बना रहता है। विद्यार्थी कई असफलताओं के बाद भी फिर से किताब खोलता है। उसे परिणाम दिखाई नहीं देता, फिर भी वह सीखना नहीं छोड़ता।

 

एक पिता अपनी चिंताओं को अपने चेहरे तक नहीं आने देता, क्योंकि वह जानता है कि उसके बच्चों का आत्मविश्वास उसके चेहरे से ही जन्म लेता है। एक माँ अपने मन की थकान और अपनी चिंताओं को भीतर ही समेटे रखती है, फिर भी पूरे परिवार को यह एहसास नहीं होने देती कि वह स्वयं कितने संघर्षों से गुजर रही है।

 

ये लोग असाधारण नहीं हैं। ये हमारे आसपास के साधारण लोग हैं। लेकिन इन्हीं साधारण लोगों के भीतर छिपा साहस जीवन को आगे बढ़ाता है। कठिन समय हमें तोड़ने नहीं आता। वह हमें यह दिखाने आता है कि हमारे भीतर कितना धैर्य, कितना विश्वास और कितनी शक्ति अभी भी बची हुई है। जब परिस्थितियाँ अनुकूल होती हैं, तब हर व्यक्ति मजबूत दिखाई देता है। असली पहचान तब होती है, जब सब कुछ विपरीत हो और फिर भी इंसान अपने मूल्यों को न छोड़े।

 

हमारी एक भूल हमें और अधिक कमजोर बना देती है। हम अपने संघर्ष की तुलना किसी और की सफलता से करने लगते हैं। लेकिन हर जीवन की कहानी अलग होती है। किसी की यात्रा तेज होती है, किसी की गहरी। इसलिए तुलना नहीं, निरंतरता महत्वपूर्ण है। जब जीवन कठिन लगे, तब पूरी जिंदगी का निर्णय मत कीजिए। केवल इतना तय कीजिए कि आज का सही कदम क्या है। जीवन हमेशा अगले दस वर्षों के निर्णय से नहीं बदलता। कई बार वह केवल आज लिए गए एक सही निर्णय से बदलना शुरू होता है।

 

यह भी सच है कि हर प्रयास का परिणाम तुरंत नहीं मिलता। कुछ बीज मिट्टी के भीतर लंबे समय तक दिखाई नहीं देते। इसका अर्थ यह नहीं कि उनमें जीवन नहीं है। वे अपनी जड़ें मजबूत कर रहे होते हैं। मनुष्य का जीवन भी कुछ ऐसा ही है। कई बार हमारी सबसे बड़ी तैयारी दुनिया की नज़रों से छिपी होती है। याद रखिए, सफलता केवल मंज़िल तक पहुँचने का नाम नहीं है। कई बार सफलता यह भी होती है कि कठिन समय के बावजूद हमने अपने भीतर की अच्छाई, अपने कर्तव्य और अपने विश्वास को जीवित रखा।

 

यदि आज आपकी उम्मीद थक गई है, तो उसे दोष मत दीजिए। उम्मीद भी मन की एक अवस्था है। उसे लौटने में थोड़ा समय लग सकता है। लेकिन अपने साहस को कभी मत छोड़िए। क्योंकि साहस ही वह शक्ति है, जो थके हुए मन को फिर से उठाती है, बिखरे हुए विश्वास को जोड़ती है और अंधेरे में भी अगला कदम उठाने का हौसला देती है। जीवन धीरे-धीरे उन्हीं लोगों के सामने अपने द्वार खोलता है, जो परिस्थितियों के सामने झुकने के बजाय अपने कर्तव्य पर टिके रहते हैं। इसलिए जब उम्मीद थक जाए, तब उसके लौटने की प्रतीक्षा मत कीजिए। अपने भीतर के साहस का हाथ थाम लीजिए। क्योंकि अंत में जीवन उन लोगों की कहानी लिखता है, जिन्होंने सबसे कठिन दिनों में भी चलना बंद नहीं किया।

 

याद रखिए— उम्मीद हमें भविष्य की झलक दिखाती है, लेकिन उस भविष्य तक पहुँचाने का काम साहस करता है। इसलिए जब उम्मीद थक जाए, तब अपने भीतर की उस शांत आवाज़ को सुनिए, जो आज भी कह रही है— 'एक कदम और… बस एक कदम और।' कई बार यही एक कदम पूरी जिंदगी बदल देता है। अंत में बस इतना ही कहना चाहूँगा— उम्मीद हमें आगे देखने की वजह देती है, लेकिन आगे बढ़ने की ताकत साहस देता है।

बांग्लादेश में 10-10 घंटे बिजली कट रही:सरकार ने रात 8 बजे बाजार बंद करने का आदेश दिया, भारत से डीजल सप्लाई बढ़ाने की मांग

बांग्लादेश में बिजली संकट लगातार गंभीर होता जा रहा है। देश के कई हिस्सों में रोज 8 से 10 घंटे तक बिजली कट रही है। इसका सबसे ज्यादा असर राजधानी ढाका के बाहर ग्रामीण इलाकों में देखने को मिल रहा है। तेज गर्मी और हीटवेव ने लोगों की परेशानी और बढ़ा दी है। बिजली की कमी से निपटने के लिए सरकार ने बुधवार से देशभर में शॉपिंग मॉल, बाजार और दुकानों को रात 8 बजे तक बंद करने का आदेश दिया है। बिजली संकट से निपटने के लिए बांग्लादेश ने अब भारत से अतिरिक्त डीजल देने की मांग की है। गैस की कमी से 1,500 मेगावाट बिजली कम बनी बांग्लादेश में बिजली संकट की सबसे बड़ी वजह ईंधन की कमी है। खासकर प्राकृतिक गैस की कमी ने बिजली उत्पादन को प्रभावित किया है। बांग्लादेश अपने इस्तेमाल का 90% से ज्यादा तेल और करीब 30% गैस दूसरे देशों से खरीदता है। मौजूदा संकट के पीछे दो बड़ी वजहें… पहली वजह- अमेरिकी कंपनी एक्सेलरेट एनर्जी के LNG टर्मिनल में 21 जुलाई को आग लग गई। इसके बाद टर्मिनल बंद हो गया था। इस हफ्ते की शुरुआत में यहां कुछ काम दोबारा शुरू हुआ, लेकिन तब तक LNG की सप्लाई आधी रह गई थी। दूसरी वजह- समुद्र में खराब मौसम की वजह से कम से कम दो LNG जहाज टर्मिनल तक नहीं पहुंच पाए और अपना माल नहीं उतार सके। दूसरे देशों से आने वाली बिजली की सप्लाई भी कम हुई है। इन वजहों से बांग्लादेश में बिजली उत्पादन करीब 1,500 मेगावाट घट गया है। ग्रामीण इलाकों में ज्यादा कटौती बांग्लादेश में बिजली की सप्लाई छह वितरण कंपनियां करती हैं। राजधानी ढाका को फिलहाल उसकी जरूरत के मुताबिक बिजली मिल रही है। लेकिन ढाका के बाहर ग्रामीण इलाकों में करीब 80 बिजली सहकारी समितियां सप्लाई करती हैं। मयमनसिंह, बरिशाल, रंगपुर, सिलहट, राजशाही और खुलना में बिजली संकट का ज्यादा असर है। ज्यादातर इलाकों में रोज 3 से 5 घंटे बिजली कट रही है। वहीं खुलना में लोगों ने 9 से 10 घंटे तक बिजली गुल रहने की शिकायत की है। नाराज लोगों ने बिजली घरों पर हमला किया लगातार बिजली कटने से लोगों में गुस्सा भी बढ़ रहा है। कुछ इलाकों में नाराज लोगों ने बिजली से जुड़ी फैसिलिटी पर हमला किया है। कई जगहों पर तोड़फोड़ और आगजनी की भी खबरें सामने आई हैं। इसके बाद बिजली विभाग ने सुरक्षा के लिए पुलिस से मदद मांगी है। बिजली कटौती का असर सिर्फ घरों तक सीमित नहीं है। खेती, रेस्टोरेंट और कारखानों का काम भी प्रभावित हो रहा है। किसानों को बिजली की जगह डीजल जनरेटर चलाने के लिए ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ रहा है। झींगा पालने वाले किसानों की परेशानी और ज्यादा है। बिजली जाने पर पानी में ऑक्सीजन पहुंचाने वाली मशीनें बंद हो जाती हैं। इससे पानी में ऑक्सीजन कम होने लगती है और झींगों के मरने का खतरा बढ़ जाता है। बांग्लादेश दुनिया में झींगा निर्यात करने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश है। देश के कपड़ा और गारमेंट उद्योग पर भी बिजली संकट का असर पड़ रहा है। यह सेक्टर बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम है। बिजली बचाने के लिए सरकार ने लगाई पाबंदियां सरकार को फिलहाल बिजली संकट से जल्द राहत मिलने की उम्मीद कम है। इसलिए बिजली की खपत घटाने के लिए कई पाबंदियां लगाई गई हैं। ऐसा कदम बांग्लादेश में पहले भी उठाया जा चुका है। कुछ महीने पहले अप्रैल में ऊर्जा संकट बढ़ने के दौरान सरकार ने दुकानों और शॉपिंग मॉल को शाम 6 बजे तक बंद करने का आदेश दिया था। भारत से और ज्यादा डीजल की मांग बांग्लादेश के ऊर्जा मंत्री इकबाल हसन महमूद ने पिछले हफ्ते भारतीय हाई कमिश्नर दिनेश त्रिवेदी से मुलाकात के दौरान यह मांग रखी थी। महमूद ने पत्रकारों से कहा कि भारत के साथ एक पाइपलाइन है, जिससे बांग्लादेश को डीजल मिलता है। उन्होंने भारत से इसकी सप्लाई बढ़ाने का अनुरोध किया है। भारत और बांग्लादेश के बीच इंडिया-बांग्लादेश फ्रेंडशिप पाइपलाइन 2017 में शुरू हुई थी। दोनों देशों के बीच 15 साल का समझौता है। इसके तहत भारत को हर साल बांग्लादेश को 1.80 लाख मीट्रिक टन डीजल देना है। पश्चिम एशिया में हालिया संकट के दौरान भारत मार्च और अप्रैल में बांग्लादेश को पहले ही 30 हजार टन से ज्यादा डीजल भेज चुका है। —————– यह खबर भी पढ़ें… शेख हसीना बोलीं- दिसंबर में बांग्लादेश लौटूंगी: 2 साल बाद वर्चुअल भाषण दिया, कैमरा ऑफ था; बांग्लादेश सरकार बोली- दिल्ली में बैठकर जहर उगला बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने दो साल बाद लोगों को वर्चुअली संबोधित किया। जब हसीना बोल रही थीं, उस दौरान उनका कैमरा बंद था। पूरी खबर पढ़ें…

गुजरात के अरवल्ली में सरकारी नौकरी का सुनहरा अवसर: वॉक-इन इंटरव्यू से होगा सीधा चयन

गुजरात के अरवल्ली में सरकारी नौकरी का सुनहरा अवसर: वॉक-इन इंटरव्यू से होगा सीधा चयन

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गुजरात के अरवल्ली जिले में आदर्श आवासीय विद्यालयों में अंग्रेजी, रसायन विज्ञान और गुजराती-सामाजिक विज्ञान शिक्षकों के 3 पदों पर भर्ती निकली है। योग्य B.Ed उम्मीदवार 14 अगस्त 2026 को वॉक-इन इंटरव्यू में शामिल हो सकते हैं। ALSO READ: कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले अहमदाबाद में बड़ा बदलाव, शहर से बाहर होंगे सभी उद्योग


अरवल्ली के भिलोड़ा और मेघरज स्थित आदर्श आवासीय विद्यालयों में अंशकालिक (घंटे के आधार पर) शिक्षकों की भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया गया है। जनजाति विकास विभाग, गांधीनगर के अधीन परियोजना प्रशासक कार्यालय द्वारा कुल 3 पदों पर उम्मीदवारों का चयन किया जाएगा। सरकारी क्षेत्र में शिक्षक के रूप में सेवा देने के इच्छुक और योग्य स्थानीय उम्मीदवारों के लिए यह एक बहुत ही बेहतरीन अवसर है।

 

रिक्त पद और शैक्षणिक योग्यता

इस भर्ती प्रक्रिया के तहत अंग्रेजी (1 पद), रसायन विज्ञान (1 पद) और गुजराती-सामाजिक विज्ञान (1 पद) के लिए उम्मीदवारों का चयन किया जाएगा। शैक्षणिक योग्यता के रूप में संबंधित विषय में स्नातक या स्नातकोत्तर (BA, MA, BSc, MSc) के साथ B.Ed. की डिग्री धारक उम्मीदवार आवेदन कर सकते हैं। उम्मीदवार को कंप्यूटर का बुनियादी ज्ञान होना आवश्यक है, जबकि राज्य परीक्षा बोर्ड द्वारा आयोजित TAT परीक्षा उत्तीर्ण और अनुभवी उम्मीदवारों को चयन में प्राथमिकता दी जाएगी। ALSO READ: किसानों के लिए खुशखबरी, गुजरात सरकार स्थापित करेगी प्राकृतिक खेती के 'मॉडल कैंपस', ट्रेनिंग के साथ बीज भी मिलेंगे

 

मानदेय और चयन प्रक्रिया

इस भर्ती के लिए उम्मीदवारों को किसी भी प्रकार का लिखित आवेदन नहीं करना होगा, बल्कि सीधा चयन वॉक-इन इंटरव्यू के आधार पर किया जाएगा। मानदेय की बात करें तो अंग्रेजी और गुजराती-सामाजिक विज्ञान विषय के शिक्षकों को 75 रुपए प्रति घंटा दिया जाएगा, जबकि रसायन विज्ञान विषय के शिक्षक को 90 रुपए प्रति घंटा का भुगतान किया जाएगा।

 

इंटरव्यू की तिथि, समय और महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश

इच्छुक और पात्र उम्मीदवारों के लिए वॉक-इन इंटरव्यू 14 अगस्त 2026 को दोपहर 12:00 बजे आदर्श आवासीय विद्यालय (कुमार), भिलोड़ा, जिला-अरवल्ली में आयोजित किया जाएगा। इंटरव्यू में भाग लेने के लिए उम्मीदवारों को अपने सभी मूल शैक्षणिक प्रमाण पत्रों और उनकी सत्यापित प्रतियों (अटेस्टेड कॉपी) के साथ निर्धारित समय पर उपस्थित होना होगा। उम्मीदवारों को सलाह दी जाती है कि इंटरव्यू में जाने से पहले भर्ती से संबंधित सभी जानकारियों की अच्छी तरह से जांच कर लें।

आलू किसानों के हितों के लिए प्रतिबद्ध है योगी सरकार

आलू किसानों के हितों के लिए प्रतिबद्ध है योगी सरकार

योगी सरकार ने किसानों को सम्मान और स्वाभिमान का आधार बताया है। उद्यान मंत्री दिनेश प्रताप सिंह ने कहा कि खेती-किसानी के मार्ग में आने वाली हर बाधा को दूर करना सरकार की प्राथमिकता है। विशेष रूप से आलू किसानों की उत्पादन, भंडारण और विपणन संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए योगी सरकार लगातार प्रभावी कदम उठा रही है।

 

श्री सिंह ने बताया कि सरकार ने आलू किसानों को राहत देने के लिए पिछले वर्षाकालीन सत्र में भंडारण शुल्क में ₹1 प्रति किलोग्राम की दर से छूट देने का निर्णय लिया है। यह राशि प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) के माध्यम से किसानों के बैंक खातों में पहुंचाई जाएगी। इसके लिए ₹1,000 करोड़ का बजट प्रावधान किया गया है।

 

इसी प्रकार किसानों को बाजार भाव में उतार-चढ़ाव से राहत देने के उद्देश्य से भामाशाह भाव स्थिरता कोष की स्थापना की गई है। इसके माध्यम से किसानों के हित में बाजार भाव को स्थिर रखने के लिए ₹1.50 प्रति किलोग्राम की दर से भावांतर भुगतान सीधे किसानों के बैंक खातों में किया जाएगा। इसके लिए ₹100 करोड़ का बजट प्राविधान किया गया है।

 

उन्होंने कहा कि नौ वर्ष में आलू किसानों के हित के लिए हरसंभव प्रयास किए गए हैं, ताकि उन्हें उत्पादन से लेकर विपणन तक किसी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े। चालू वर्ष में भी फसल खेत में रहते ही विभाग ने आलू के बेहतर विपणन की संभावनाओं पर काम शुरू कर दिया था।

 

इसी क्रम में 30 जनवरी 2026 को ओडिशा के भुवनेश्वर में क्रेता-विक्रेता सम्मेलन आयोजित किया गया। उद्यान मंत्री दिनेश प्रताप सिंह ने ओडिशा के उपमुख्यमंत्री, कृषि मंत्री, प्रगतिशील किसानों तथा प्रतिष्ठित व्यावसायियों के साथ संवाद कर उत्तर प्रदेश के आलू की ओडिशा में आपूर्ति बढ़ाने और किसानों को उचित मूल्य दिलाने की दिशा में प्रयास किया।

 

इसके अतिरिक्त अपर मुख्य सचिव व उद्यान निदेशक सहित विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने देश के विभिन्न राज्यों का दौरा कर उत्तर प्रदेश के आलू के विपणन की संभावनाओं को तलाशा। सरकार का कहना है कि ऐसे प्रयासों का उद्देश्य किसानों को व्यापक बाजार उपलब्ध कराना और उन्हें उनकी उपज का बेहतर मूल्य दिलाना है।

 

उद्यान मंत्री ने प्रदेश के आलू किसानों से अपील की है कि योगी सरकार उनके साथ हर सुख-दुख में खड़ी है। किसानों से अपील की गई कि राजनीतिक दलों द्वारा सरकार को बदनाम करने के उद्देश्य से किए जाने वाले दुष्प्रचार पर ध्यान न दें और सरकार की किसान हितैषी योजनाओं एवं निर्णयों की वास्तविकता को समझें।

 

सरकार ने सभी किसानों के हितैषी लोगों से भी रचनात्मक सुझाव आमंत्रित किए हैं। डबल इंजन की सरकार की प्राथमिकता में किसान हैं और किसानों की आय, उनकी उपज के उचित मूल्य तथा विपणन की व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए हरसंभव प्रयास जारी रहेंगे।

FSSAI bans plastic: पान मसाला और गुटखा छोटे प्लास्टिक पाउच में नहीं आएगा! नया नियम लागू होने पर जानें कैसे बिकेगा माल

FSSAI bans plastic: पान मसाला बनाने वाली कंपनियों के लिए पैकेजिंग को लेकर सरकार की तरफ से एक बड़ा बदलाव किया गया है। फूड सेफ्टी एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ इंडिया (FSSAI) ने पान मसाला की पैकेजिंग में प्लास्टिक, एल्युमिनियम फॉयल और मेटलाइज्ड लेयर्स के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। नए नियमों के बाद कंपनियों को अपनी पैकेजिंग व्यवस्था में बड़े बदलाव करने पड़ेगा। FSSAI ने ‘फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स (पैकेजिंग) अमेंडमेंट रेगुलेशंस, 2026’ का नोटिफिकेशन जारी कर दिया। इसी के साथ अब ये नियम लागू हो गए हैं।

नए नियमों के तहत पान मसाला को फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स (पैकेजिंग) रेगुलेशंस, 2018 की शेड्यूल 4 में शामिल किया गया है। यह शेड्यूल अलग-अलग खाद्य उत्पादों के लिए इस्तेमाल की जा सकने वाली अनुमत पैकेजिंग सामग्री तय करता है।

अब किन चीजों से पैक हो सकेगा पान मसाला?

नए नियमों के तहत पान मसाला की पैकेजिंग के लिए पेपर, पेपरबोर्ड, सेलुलोज और अन्य प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त सामग्री का इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि, एक महत्वपूर्ण शर्त रखी गई है। इन प्राकृतिक या कागज आधारित सामग्रियों में किसी भी तरह का प्लास्टिक मौजूद नहीं होना चाहिए। इसके अलावा पैकेजिंग में एल्युमिनियम फॉयल या किसी भी तरह की मेटलाइज्ड लेयर भी नहीं हो सकती। यानी केवल बाहर से कागज दिखाई देने वाली पैकेजिंग भी नियमों के दायरे से बाहर नहीं होगी। अगर उसके अंदर प्लास्टिक या धातु की छिपी हुई परत लगी है तो ऐसी पैकेजिंग की अनुमति नहीं होगी।

पॉलीथीन से लेकर PVC तक पर रोक

FSSAI ने प्रतिबंध को काफी व्यापक रखा है। पॉलीएथिलीन, पॉलीप्रोपाइलीन, पॉलिएस्टर, पॉलीविनाइल क्लोराइड (PVC) और अन्य सिंथेटिक पॉलिमर, कोपॉलिमर या लैमिनेट जैसी सामग्रियों के इस्तेमाल पर रोक लगाई गई है। इसका सीधा असर उन पैकेजिंग फॉर्मेट पर पड़ेगा जिनमें कई परतों वाली प्लास्टिक या मेटल-कोटेड सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है।

ऐसी पैकेजिंग का इस्तेमाल आम तौर पर उत्पाद को नमी से बचाने, उसकी खुशबू बनाए रखने और शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए किया जाता है। अब पान मसाला उद्योग को इन सुविधाओं के लिए प्लास्टिक आधारित पैकेजिंग के दूसरे विकल्प तलाशने होंगे।

टिन और कांच के डिब्बे बनेंगे विकल्प

FSSAI ने पान मसाला के लिए टिन और कांच के कंटेनर के इस्तेमाल की भी अनुमति दी है। इस बदलाव के बाद कंपनियों को अपनी पैकेजिंग तकनीक और डिजाइन पर दोबारा काम करना पड़ सकता है। इस तरह कंपनियों के सामने अब मुख्य रूप से दो तरह के विकल्प होंगे:-

  • पहला पूरी तरह प्लास्टिक-मुक्त प्राकृतिक सामग्री से बनी पैकेजिंग
  • जबकि दूसरा टिन या कांच के कठोर कंटेनर में हुई पैकेजिंग

कागज की पैकिंग में भी छिपा प्लास्टिक नहीं चलेगा

नए नियमों में पैकेजिंग के एक ऐसे तरीके को भी स्पष्ट किया गया है, जो लंबे समय से उद्योग में इस्तेमाल होता रहा है। कई उत्पादों की पैकिंग ऊपर से कागज जैसी दिखाई देती है, लेकिन उसके अंदर प्लास्टिक या एल्युमिनियम की परत लगी होती है। अब ऐसी कंपोजिट पैकेजिंग की अनुमति नहीं होगी, अगर उसमें प्रतिबंधित सामग्री मौजूद है। यानी केवल पैकेजिंग का बाहरी हिस्सा कागज का होना पर्याप्त नहीं होगा। पूरी पैकेजिंग को निर्धारित मानकों के अनुरूप होना पड़ेगा।

छोटे निर्माताओं के सामने बड़ी चुनौती

नए नियमों का सबसे बड़ा असर उन निर्माताओं पर पड़ सकता है जो लंबे समय से फ्लेक्सिबल और मल्टी-लेयर पैकेजिंग पर निर्भर हैं। कंपनियों को अब अपनी सप्लाई चेन, पैकेजिंग सामग्री की खरीद, डिजाइन और पैकेजिंग तकनीक की समीक्षा करनी होगी। विशेष रूप से छोटे निर्माताओं के लिए प्लास्टिक-मुक्त पैकेजिंग की ओर बदलाव करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है, क्योंकि उन्हें नई सामग्री और पैकेजिंग व्यवस्था विकसित करने की जरूरत पड़ेगी।

प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट नियम भी जोड़े गए

FSSAI के संशोधन में स्टिक वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2016 से जुड़े प्रावधानों को भी फूड पैकेजिंग व्यवस्था में शामिल किया गया है। इन प्रावधानों के तहत गुटखा, तंबाकू और पान मसाला को रखने, पैक करने या बेचने के लिए प्लास्टिक के सैशे के इस्तेमाल पर पहले से लागू प्रतिबंधों को मजबूत किया गया है। नियमों में इन उत्पादों के लिए किसी भी रूप में प्लास्टिक के इस्तेमाल पर रोक को भी दोहराया गया है। इस तरह, सरकार ने पान मसाला की पैकेजिंग से जुड़े पर्यावरण नियमों के साथ फ़ूड सेफ़्टी के नियमों को भी एक जैसा कर दिया है।

अप्रैल में शुरू हुई थी नियम बदलने की प्रक्रिया

इन बदलावों की प्रक्रिया इसी साल अप्रैल में शुरू हुई थी। 28 अप्रैल को FSSAI ने प्रस्तावित संशोधनों का ड्राफ्ट जारी किया था। इस ड्राफ्ट में पान मसाला को शेड्यूल 4 में शामिल करने का प्रस्ताव रखा गया था। इसमें पेपर, पेपरबोर्ड, सेलुलोज और अन्य प्राकृतिक सामग्री से पैकेजिंग की अनुमति देने की बात कही गई थी।

ये भी पढ़ें- Cow Urine: अब दूध के साथ गोमूत्र से भी बंपर कमाई करेंगे किसान! यूपी के इन जिलों में ₹10 प्रति लीटर खरीद शुरू

लेकिन शर्त थी कि इनमें प्लास्टिक, सिंथेटिक पॉलिमर या मेटल की परत नहीं होनी चाहिए। ड्राफ्ट में टिन और कांच को भी पैकेजिंग के विकल्प के रूप में प्रस्तावित किया गया था। इसके बाद संबंधित पक्षों और उद्योग से आपत्तियां और सुझाव मांगे गए। मिले सुझावों और प्रतिक्रियाओं की समीक्षा के बाद FSSAI ने 10 अगस्त को अंतिम संशोधन अधिसूचित कर दिए।

Cow Urine: अब दूध के साथ गोमूत्र से भी बंपर कमाई करेंगे किसान! यूपी के इन जिलों में ₹10 प्रति लीटर खरीद शुरू

Cow Urine Pilot Project: उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले गो-संरक्षण को ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ने की दिशा में एक नई पहल शुरू की गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विजन के तहत बुलंदशहर में गोमूत्र की खरीद का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया है। इसके तहत किसानों और पशुपालकों से 10 रुपये प्रति लीटर की दर से गोमूत्र खरीदा जा रहा है। योगी सरकार ने बुलंदशहर में किसानों से गाय का मूत्र इकट्ठा करने का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया है। उम्मीद है कि इससे किसानों की आमदनी बढ़ेगी। साथ ही महिलाओं को कमाई का एक अतिरिक्त जरिया मिलेगा। साथ ही उन गायों की देखभाल में मदद मिलेगी जो अब दूध नहीं देतीं।

इकट्ठा किए गए गाय के मूत्र का इस्तेमाल खेती-बाड़ी के कामों में कच्चे माल के तौर पर किए जाने की उम्मीद है। ऐसी आशा है कि यह केमिकल वाले उत्पादों की जगह ले सकता है। अगर यह पायलट प्रोजेक्ट सफल रहता है, तो एक औपचारिक नीति बनाई जाएगी। अधिकारियों ने बताया कि चुनाव से पहले इस प्रोजेक्ट को पूरे राज्य में लागू किया जाएगा।

क्या है मकसद?

इस पहल का उद्देश्य गोमूत्र से कृषि उपयोगी उत्पाद तैयार करना, पशुपालकों की अतिरिक्त आमदनी बढ़ाना, महिलाओं को गांव में ही रोजगार उपलब्ध कराना और प्राकृतिक एवं जैविक खेती को बढ़ावा देना है। पायलट प्रोजेक्ट सफल रहने पर इसे प्रदेश के दूसरे हिस्सों में भी लागू करने की तैयारी है।

बुलंदशहर के 15 गांवों में शुरू हुआ मॉडल

यह पहल बुलंदशहर की स्याना तहसील के नरसेना गांव में डॉ. प्रवीण के नेतृत्व में एक किसान उत्पादक संगठन (FPO) के माध्यम से शुरू की गई है। फिलहाल आसपास के 15 गांवों को इस परियोजना से जोड़ा गया है। इन गांवों में गोमूत्र जमा करने के लिए स्थानीय कलेक्शन सेंटर बनाए गए हैं। इन केंद्रों के जरिए वर्तमान में करीब 500 लीटर गोमूत्र प्रतिदिन एकत्र किया जा रहा है। भविष्य में गोमूत्र की खरीद कीमत को बढ़ाकर 20 रुपये प्रति लीटर करने की भी योजना बताई गई है।

पशुपालकों को नहीं जाना पड़ेगा दूर

गोमूत्र संग्रह के लिए गांवों में 200 लीटर क्षमता वाले टैंक लगाए गए हैं। इससे पशुपालकों को गोमूत्र बेचने के लिए दूर स्थित किसी केंद्र तक जाने की जरूरत नहीं पड़ती। गांव में ही कलेक्शन और खरीद की व्यवस्था होने से इस योजना में अधिक से अधिक पशुपालकों को जोड़ने में मदद मिल रही है। खासकर ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।

महिलाओं को हर लीटर पर 2 रुपये कमीशन

इस मॉडल की एक खास बात महिलाओं की आर्थिक भागीदारी है। गांवों में गोमूत्र संग्रह में मदद करने वाली महिलाओं को हर लीटर पर 2 रुपये कमीशन दिया जा रहा है। इससे महिलाओं के लिए गांव में रहते हुए अतिरिक्त आमदनी का एक नया जरिया तैयार हुआ है। इस पहल से करीब 300 महिलाओं को शुरुआत में जोड़ा गया है। उन्हें इस मॉडल में शेयरधारक भी बनाया गया है।

यानी महिलाएं सिर्फ गोमूत्र संग्रह करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उन्हें पूरे आर्थिक मॉडल से सीधे जोड़ा गया है। डॉ. प्रवीण ने न्यूज एजेंसी यूएनआई को बताया कि इस पहल का उद्देश्य केवल गोमूत्र की खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं है। बल्कि इसे महिला सशक्तीकरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से भी जोड़ना है।

गोमूत्र से बनाए जाएंगे खेती में काम आने वाले उत्पाद

संग्रह किए गए गोमूत्र का इस्तेमाल कृषि उपयोगी उत्पाद तैयार करने में किया जा रहा है। इसके लिए गोमूत्र में विभिन्न जड़ी-बूटियों को मिलाकर कृषि में इस्तेमाल होने वाले मिश्रण और उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। इन उत्पादों को स्थानीय समितियों और सहकारी संस्थाओं के माध्यम से किसानों तक पहुंचाने की व्यवस्था की जा रही है। इस मॉडल का उद्देश्य खेती में इस्तेमाल होने वाले कुछ रासायनिक उत्पादों के विकल्प के रूप में गोमूत्र आधारित प्राकृतिक उत्पादों को बढ़ावा देना भी है।

दूध के साथ गोमूत्र से भी आमदनी

ग्रामीण इलाकों में पशुपालन से होने वाली आमदनी मुख्य रूप से दूध और डेयरी उत्पादों पर निर्भर रहती है। इस पहल के जरिए पशुपालकों की आय में गोमूत्र को भी एक अतिरिक्त आर्थिक संसाधन के रूप में जोड़ने की कोशिश की जा रही है। यानी पशुपालक परिवारों के लिए एक ही पशु से दूध के अलावा गोमूत्र के जरिए भी अतिरिक्त आय का रास्ता बनाया जा रहा है। विशेष रूप से पशुपालन से जुड़े परिवारों की महिलाओं के लिए यह पहल घर और गांव के आसपास रहते हुए अतिरिक्त कमाई का जरिया बन सकती है।

सहकारी समितियों के जरिए बाजार तक पहुंचेंगे उत्पाद

गोमूत्र से तैयार कृषि उत्पादों को केवल किसानों तक पहुंचाने पर ही जोर नहीं है, बल्कि इनके लिए स्थानीय बाजार तंत्र भी विकसित किया जा रहा है। तैयार उत्पादों को सहकारी समितियों और स्थानीय समितियों के जरिए किसानों और बाजार तक पहुंचाने की व्यवस्था की जा रही है। इससे गांव में संग्रह से लेकर उत्पाद तैयार करने और फिर उसकी बिक्री तक एक स्थानीय आर्थिक चक्र विकसित करने की कोशिश है।

गो-संरक्षण, रोजगार और प्राकृतिक खेती को जोड़ने की कोशिश

गो सेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता के अनुसार, बुलंदशहर में शुरू किया गया मॉडल गो-संरक्षण, ग्रामीण रोजगार, महिला सशक्तीकरण और प्राकृतिक/जैविक खेती को एक साथ जोड़ने वाली पहल के तौर पर देखा जा रहा है। इस मॉडल में गांवों से गोमूत्र इकट्ठा किया जाता है। फिर महिलाएं कलेक्शन प्रक्रिया से आमदनी हासिल करती हैं।

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इसके बाद गोमूत्र से कृषि उपयोगी उत्पाद तैयार कर उन्हें सहकारी समितियों और स्थानीय समितियों के माध्यम से बाजार तक पहुंचाया जाता है। फिलहाल, यह योजना पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर बुलंदशहर में चलाई जा रही है। इसके अनुभव और परिणामों के आधार पर इसे उत्तर प्रदेश के दूसरे हिस्सों में भी विस्तार देने की तैयारी है।

PM Awas Yojana 2026: लखनऊ में 2640 सस्ते फ्लैट का रास्ता साफ, दो बड़ी आवासीय योजनाओं में जल्द शुरू होगी लैंड पूलिंग

PM Awas Yojana 2026: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में लोगों को किफायती दरों पर घर उपलब्ध कराने की दिशा में बड़ी पहल होने जा रही है। लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) अनंत नगर और शारदा नगर विस्तार योजना में कुल 2,640 सस्ते फ्लैट विकसित करेगा। इन फ्लैटों का निर्माण प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के तहत किया जाएगा। इसके साथ ही दोनों आवासीय योजनाओं के लिए जल्द ही लैंड पूलिंग की प्रक्रिया भी शुरू होगी।

सोमवार को मुख्य सचिव की अध्यक्षता में हुई बैठक में इन दोनों योजनाओं को मंजूरी मिलने के बाद परियोजना को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया है। योजना के तहत मध्यम आय वर्ग के लोगों के लिए भी दो बेडरूम वाले फ्लैट बनाए जाएंगे।

8.99 लाख रुपये में मिल सकता है वन BHK फ्लैट

LDA की दोनों योजनाओं में ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ के तहत बनने वाले वन बीएचके फ्लैट की कीमत करीब 8.99 लाख रुपये रखी गई है। इनके निर्माण के लिए केंद्र सरकार की ओर से ढाई लाख रुपये तक की सब्सिडी दिए जाने का प्रावधान है। योजना में मध्यम आय वर्ग के लोगों के लिए भी दो बेडरूम वाले फ्लैट बनाए जाएंगे। यानी अलग-अलग आय वर्ग के लोगों को ध्यान में रखते हुए यहां किफायती आवास विकसित किए जाएंगे।

अनंत नगर में बनेगा 14 मंजिला आदित्य अपार्टमेंट

अनंत नगर आवासीय योजना में आदित्य अपार्टमेंट विकसित किया जाएगा। यह इमारत 14 मंजिला होगी। योजना में पीएम आवास योजना के तहत सभी जरूरी नई सुविधाएं उपलब्ध कराने की बात कही गई है। इन सुविधाओं में स्वास्थ्य केंद्र, आंगनबाड़ी केंद्र, सामुदायिक केंद्र, किराना स्टोर, मेडिकल शॉप, मिल्क बूथ, एटीएम और अन्य आवश्यक सुविधाएं शामिल होंगी। इसका उद्देश्य यह है कि यहां रहने वाले लोगों को रोजमर्रा की जरूरतों के लिए योजना से बाहर न जाना पड़े।

शारदा नगर विस्तार में बनेगा बागेश्वरी अपार्टमेंट

शारदा नगर विस्तार योजना में बागेश्वरी अपार्टमेंट बनाया जाएगा। यह परियोजना PGI के पास और शारदा नगर विस्तार योजना के तहत प्रस्तावित है। यहां बनने वाला बागेश्वरी अपार्टमेंट 12 मंजिला होगा।इस परियोजना में कुल 1248 फ्लैट बनाए जाने की योजना है। इनमें 312 फ्लैट प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत होंगे। जबकि 936 फ्लैट दो बेडरूम कैटेगरी के बनाए जाएंगे। पीएम आवास योजना के फ्लैटों की कीमत करीब 8.99 लाख रुपये होगी। जबकि दो बेडरूम वाले फ्लैट की कीमत करीब 34.82 लाख रुपये तय की गई है।

अनंत नगर में कितने फ्लैट बनेंगे?

अनंत नगर आवासीय योजना में बनने वाले आदित्य अपार्टमेंट में कुल 1392 फ्लैट बनाए जाने की योजना है। यह भी 14 मंजिला भवन होगा। इस तरह अनंत नगर और शारदा नगर विस्तार की दोनों योजनाओं को मिलाकर कुल 2640 फ्लैट विकसित किए जाएंगे। इन परियोजनाओं में पीएम आवास योजना के लाभार्थियों के साथ-साथ मध्यम आय वर्ग के लोगों को भी ध्यान में रखा गया है।

4500 एकड़ जमीन जुटाने की तैयारी

लखनऊ में इन दो बड़ी आवासीय योजनाओं को जमीन पर उतारने के लिए लैंड पूलिंग की प्रक्रिया भी शुरू होने जा रही है। इसके तहत करीब 4500 एकड़ जमीन जुटाई जाएगी। मोहनलालगंज क्षेत्र में 9 अगस्त तक किसानों के साथ बातचीत की गई है। जमीन की कीमत तय करने को लेकर सहमति बनाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। अब समिति की बैठक हो चुकी है। अब लैंड पूलिंग के नियमों के तहत दोनों योजनाओं के लिए जमीन जुटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।

किसानों की सहमति से होगी जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया

लखनऊ विकास प्राधिकरण की दोनों आवासीय योजनाओं के लिए किसानों की सहमति से जमीन लेने की योजना है। इसके लिए पहले किसानों से बातचीत और जमीन के मूल्य निर्धारण की प्रक्रिया पूरी की जा रही है। आवास विकास परिषद के लखनऊ जोन के उप आवास आयुक्त चंदन पटेल ने बताया कि किसानों की सहमति के आधार पर जमीन लेने से पहले नियोजन समिति की बैठक की जा चुकी है। इस प्रक्रिया के बाद लैंड पूलिंग के नियमों के तहत जमीन जुटाने का काम आगे बढ़ेगा।

करीब दो लाख लोगों को मिलेगा आशियाना

इन दोनों योजनाओं के लिए करीब 4,500 एकड़ जमीन जुटाई जानी है। प्रस्तावित विकास से करीब दो लाख से अधिक लोगों को आशियाना मिलने की उम्मीद है। योजनाओं में सड़क और अन्य बुनियादी सुविधाओं के साथ आधुनिक शहरी ढांचे को विकसित करने की योजना है। दोनों परियोजनाओं में सड़कों को फोर लेन बनाया जाएगा। वहीं, मुख्य मार्गों पर ट्रैफिक को सुचारु रखने के लिए सिक्स लेन की व्यवस्था की जाएगी। जरूरत के हिसाब से फ्लाईओवर और अंडरपास भी बनाए जाने की योजना है। ड़ा, बेली, शिथौलीकला, शिवलर और हबुआपुर की जमीन प्रस्तावित की गई है।

आधुनिक सुविधाओं से लैस होंगी नई कॉलोनियां

इन आवासीय योजनाओं में सिर्फ फ्लैट बनाने पर ही जोर नहीं है, बल्कि पूरी तरह विकसित आवासीय क्षेत्र तैयार करने की योजना है। यहां स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़ी सुविधाओं के साथ बाजार और रोजमर्रा की जरूरतों की दुकानें भी विकसित की जाएंगी। सड़कों, फ्लाईओवर और अंडरपास जैसी बुनियादी सुविधाओं के साथ इन क्षेत्रों को बेहतर कनेक्टिविटी देने की तैयारी है।

कुल मिलाकर क्या बदलेगा?

लखनऊ की इन दोनों बड़ी योजनाओं के पूरा होने के बाद राजधानी में 2640 नए किफायती और मध्यम आय वर्ग के फ्लैट उपलब्ध होंगे। पीएम आवास योजना के तहत करीब 8.99 लाख रुपये में फ्लैट मिलने से कम आय वर्ग के लोगों के लिए घर खरीदना आसान हो सकता है, वहीं, मध्यम आय वर्ग के लिए करीब 34.82 लाख रुपये की लागत वाले दो बेडरूम फ्लैट विकसित किए जाएंगे। लैंड पूलिंग के जरिए बड़े क्षेत्र में सुनियोजित विकास होने से मोहनलालगंज और आसपास के इलाकों में आने वाले वर्षों में आवासीय और बुनियादी ढांचे का तेजी से विस्तार होने की उम्मीद है।

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Noida Plot Scheme: नोएडा एयरपोर्ट के पास घर बनाने का सुनहरा मौका! YEIDA ला रहा 2 नई रेजिडेंशियल प्लॉट स्कीम, जानिए सबकुछ

YEIDA Residential Plot Schemes: उत्तर प्रदेश के जेवर में स्थित नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के शुरू होने के बाद यमुना एक्सप्रेसवे क्षेत्र में रेजिडेंशियल प्लॉट की मांग तेजी से बढ़ी है। इसी बढ़ती मांग को देखते हुए यमुना एक्सप्रेसवे इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी (YEIDA) नवरात्रि के दौरान दो नई रिहायशी प्लॉट योजनाएं लॉन्च करने की तैयारी कर रहा है। नई योजनाओं में पहली स्कीम कम आय वर्ग के लोगों को ध्यान में रखकर तैयार की जा रही है। इन दोनों योजनाओं की घोषणा अक्टूबर में होने की संभावना है।

आपके बता दें कि नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर 15 जून को फ्लाइट ऑपरेशन शुरू हुए थे। इसके दो दिन बाद कार्गो टर्मिनल भी खुल गया था। YEIDA के एडिशनल CEO शैलेंद्र भाटिया ने कहा कि अथॉरिटी अभी स्कीम की बारीकियों पर काम कर रही है। जल्द ही प्लॉट की सही संख्या और अन्य जानकारी की घोषणा की जाएगी।

40 वर्गमीटर के प्लॉट वाली होगी LIG स्कीम

हाल ही में YEIDA ने अक्टूबर में नवरात्रि के दौरान दो नई रेजिडेंशियल प्लॉट स्कीम लॉन्च करने की घोषणा की है। टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) के मुताबिक, इनमें से एक स्कीम कम आय वाले ग्रुप के लिए होगी। इसमें 40 वर्ग मीटर के प्लॉट मिलेंगे। दूसरी स्कीम आम जनता के लिए होगी। इसमें प्लॉट का साइज़ 162 से 300 वर्ग मीटर के बीच होगा।

दोनों स्कीम नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट (NIA) के पास सेक्टर 5-A में शुरू की जाएंगी। यानी अलग-अलग जरूरत और बजट वाले लोग अपनी पसंद के आकार का प्लॉट हासिल करने के लिए आवेदन कर सकेंगे। इससे सीमित बजट वाले लोगों को एयरपोर्ट के आसपास अपना घर बनाने का मौका मिल सकेगा।

पहले प्लॉट मिल चुका है तो नहीं कर पाएंगे अप्लाई

YEIDA ने योजनाओं में पारदर्शिता और ज्यादा से ज्यादा नए लोगों को मौका देने के लिए एक अहम शर्त रखी है। जिन लोगों को पहले नोएडा अथॉरिटी, ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी या YEIDA की किसी पिछली रेजिडेंशियल प्लॉट स्कीम में प्लॉट मिल चुका है, वे इन नई स्कीम के लिए अप्लाई नहीं कर सकेंगे। इसका उद्देश्य उन लोगों को दोबारा लाभ लेने से रोकना है, जिन्हें पहले ही किसी प्राधिकरण की योजना के तहत रिहायशी प्लॉट आवंटित किया जा चुका है।

प्लॉट की कीमत समेत अन्य जानकारी

फिलहाल, यमुना प्राधिकरण के मुताबिक इस एरिया में रेजिडेंशियल प्लॉट का आवंटन रेट 36,260 रुपये प्रति वर्गमीटर है। हालांकि, नई योजनाओं में प्लॉट की अंतिम कीमत और अन्य शुल्क से जुड़ी जानकारी प्राधिकरण की आधिकारिक घोषणा के बाद ही स्पष्ट होगी। यह कदम यमुना अथॉरिटी द्वारा जून में एयरपोर्ट के पास ही लकी ड्रॉ के जरिए भारी संख्या में रेजिडेंशियल प्लॉट अलॉट करने के ठीक बाद उठाया गया है। अप्रैल में घोषित उस स्कीम को बहुत अच्छा रिस्पॉन्स मिला था।

जून में 973 प्लॉट के लिए आए थे 1.1 लाख आवेदन

नई योजनाओं की घोषणा ऐसे समय में हो रही है जब YEIDA की पिछली रिहायशी प्लॉट योजना को जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली थी। इतने ही प्लॉट के लिए 1.1 लाख से ज़्यादा वैलिड एप्लीकेशन आए थे। बेहतर एयर कनेक्टिविटी, शानदार लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर और इलाके में बड़े पैमाने पर इंडस्ट्रियल और कमर्शियल ग्रोथ की संभावनाओं ने इस क्षेत्र को घर खरीदारों के लिए एक आकर्षक जगह बना दिया है। यह स्कीम अप्रैल में घोषित की गई थी। इसमें 973 प्लॉट के लिए 1.1 लाख से ज्यादा आवेदन प्राप्त हुए थे। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि नोएडा एयरपोर्ट के आसपास रिहायशी जमीन को लेकर लोगों में कितनी मजबूत दिलचस्पी है।

नोएडा एयरपोर्ट के कारण बढ़ी इलाके की डिमांड

नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के आसपास के क्षेत्र में पिछले कुछ समय से तेजी से विकास हो रहा है। एयरपोर्ट के शुरू होने के बाद इस इलाके में कनेक्टिविटी एवं निवेश की संभावनाएं और मजबूत हुई हैं। बेहतर हवाई संपर्क के साथ-साथ लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास और बड़े पैमाने पर औद्योगिक एवं व्यावसायिक गतिविधियों की उम्मीद ने यमुना एक्सप्रेसवे क्षेत्र को घर खरीदारों और निवेशकों के लिए आकर्षक बना दिया है। यही वजह है कि एयरपोर्ट के आसपास रिहायशी प्लॉट की योजनाओं में बड़ी संख्या में लोग अप्लाई कर रहे हैं। अब नवरात्रि के दौरान प्रस्तावित इन दो नई स्कीमों पर भी हजारों-लाखों लोगों की नजर रहने की उम्मीद है।

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Kalanamak Rice: अपनी खास सुगंध और गुणों के लिए फेमस कालानमक चावल की खेती और इसकी बिक्री ने उत्तर प्रदेश के किसानों की किस्मत बदल दी है। हाल के वर्षों में कालानमक चावल के खेती के क्षेत्रफल और प्रोडक्शन दोनों में जबरदस्त इजाफा हुआ है। इससे किसानों की इनकम भी बढ़ी है। साल 2018 में जहां कालानमक चावल का बिक्री मूल्य ₹40 प्रति किलोग्राम था। वहीं, साल 2026 में यह बढ़कर ₹150 प्रति किलोग्राम तक पहुंच गया है। इसी का असर है कि सामान्य चावल की तुलना में इसकी खेती करने वाले किसानों के लाभ में तीन गुना से अधिक की वृद्धि हुई है।

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी ने लोकसभा में एक लिखित उत्तर के दौरान काला नमक चावल को लेकर अहम जानकारियां शेयर की हैं। उन्होंने बताया कि कीमतों में आए इस भारी उछाल और बेहतर वित्तीय लाभ की वजह से इस धान को उगाने वाले किसानों की संख्या में भी रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है। सिद्धार्थनगर जिले में साल 2018 में जहां सिर्फ 2915 किसान कालानमक धान की खेती करते थे। वहीं, 2024 तक यह संख्या बढ़कर 23000 पहुंच गई है। इसके साथ ही सिद्धार्थनगर में 2018 से 2025 के दौरान इसका उत्पादन 5 गुना से अधिक बढ़ा है।

केंद्र और राज्य सरकार की ओर से मिलने वाली मदद के बारे में जानिए

कालानमक चावल की खेती करने वाले किसानों को आगे बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकार दोनों की ओर से वित्तीय, तकनीकी और मार्केटिंग से जुड़ी मदद दी जा रही है। पीएम सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना (PMFME) और राज्य सरकार की एक जिला एक उत्पाद (ODOP) मार्जिन मनी योजना के तहत व्यक्तिगत सूक्ष्म इकाइयों और किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) को कालानमक प्रसंस्करण और मिलिंग यूनिट्स बनाने पर 35 फीसदी (अधिकतम ₹10 लाख) तक क्रेडिट-लिंक्ड कैपिटल सब्सिडी दी जाती है।

इसके अलावा सरकार कालानमक महोत्सव का आयोजन कर इस चावल के ब्रांड का प्रचार-प्रसार कर रही है। स्थानीय किसानों को आधुनिक प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और निर्यात सहायता सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से सिद्धार्थनगर में ओडीओपी योजना के तहत एक सामान्य सुविधा केंद्र की स्थापना की गई है। उत्तर प्रदेश सरकार ने कालानमक चावल के प्रचार, उत्पादन और प्रसंस्करण के लिए विशेष प्रोजेक्ट फंडिंग भी निर्धारित की है।

6 नई उन्नत किस्में विकसित, उत्पादकता हुई लगभग दोगुनी

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के तत्वावधान में राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणाली कालानमक चावल की नई किस्मों के विकास और पारंपरिक किस्मों के संरक्षण में लगी हुई है। पारंपरिक किस्मों के अलावा कालानमक की छह नई और उन्नत किस्में जारी और अधिसूचित की गई हैं। इनमें कालानमक KN3, बौना कालानमक 101, बौना कालानमक 102, कालानमक किरण, पूसा नरेंद्र कालानमक 1 और पूसा सीआरडी कालानमक 2 शामिल हैं।

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नई बौनी और अधिक उपज देने वाली ये किस्में बेहद असरदार साबित हो रही हैं। जहां पारंपरिक किस्मों की औसत उपज 2.5 टन प्रति हेक्टेयर होती है, वहीं इन नई किस्मों की औसत उपज 4.5 टन प्रति हेक्टेयर तक मिलती है। बीज कार्यक्रम के तहत पिछले 5 वर्षों (2021-22 से 2025-26) के दौरान कुल 389.6 क्विंटल गुणवत्तापूर्ण कालानमक बीज का उत्पादन कर किसानों को बांटे गए हैं। हर साल 15-20 क्विंटल ब्रीडर बीज का उत्पादन भी किया जा रहा है।

‘बुद्ध राइस’ के नाम से वैश्विक पहचान, सिंगापुर से नेपाल तक निर्यात

सरकार कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) के माध्यम से कालानमक चावल के निर्यात को लगातार बढ़ावा दे रही है। APEDA क्षेत्रीय किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) को सीधे अंतरराष्ट्रीय खरीदारों से जोड़कर सिंगापुर और नेपाल जैसे देशों में निर्यात शिपमेंट की सुविधा प्रदान कर रहा है। जापान, थाईलैंड, वियतनाम, सिंगापुर और म्यांमार जैसे बौद्ध बहुल देशों के हाई प्राइज मार्केट को टारगेट करने के लिए कालानमक चावल को बुद्ध राइस (Buddha Rice) के रूप में ब्रांडेड किया जा रहा है।

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Monsoon & El Nino update: भारत की अर्थव्यवस्था और कृषि क्षेत्र के लिए एक चिंताजनक खबर सामने आई है। मौसम विभाग (IMD) के दो वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, मजबूत हो रहे अल नीनो (El Nino) के असर की वजह से अगले दो हफ्तों के दौरान देश के पश्चिमी, मध्य और दक्षिणी क्षेत्रों में औसतन से कम बारिश होने की संभावना है। ‘रॉयटर्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक मानसून में आने वाली इस सुस्ती और शुष्क मौसम के लंबे खिंचने से हाल ही में बोई गई कपास, सोयाबीन, मक्का और दालों (दलहन) की फसलों पर गंभीर खतरा मंडराने लगा है।

मानसून में कमी से सिंचाई और कृषि आजीविका पर बड़ा असर

भारत में वार्षिक वर्षा का करीब 70 फीसदी हिस्सा मानसूनी बारिश से ही आता है। ये देश के महत्वपूर्ण जल स्रोतों को रीचार्ज करने के लिए बेहद जरूरी है। भारत में कृषि भूमि का लगभग आधा हिस्सा आज भी सिंचाई सुविधाओं से वंचित है और देश की करीब आधी आबादी अपनी आजीविका के लिए सीधे तौर पर कृषि पर निर्भर है।

न्यूज एजेंसी ‘रॉयटर्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक, IMD के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि अगले दो हफ्तों के दौरान देश के कुछ पूर्वी और उत्तरी राज्यों को छोड़कर अधिकांश हिस्सों में बारिश की गतिविधियों में कमी आएगी। अधिकारी ने स्पष्ट किया कि इसदौरान देश के पश्चिमी और दक्षिणी राज्यों में बारिश की कमी काफी महत्वपूर्ण या गंभीर हो सकती है।

1 जून से अब तक 12 प्रतिशत कम हुई बारिश और बढ़ा तापमान का खतरा

चालू मानसून सीजन में 1 जून से लेकर अब तक भारत में औसत से 12 फीसदी कम बारिश हुई है। देश के कुछ राज्यों में स्थिति और भी चिंताजनक है। उदाहरण के लिए दक्षिणी राज्य आंध्र प्रदेश में बारिश की कमी का आंकड़ा 34 फीसदी तक पहुंच गया है।

मौसम विभाग के एक दूसरे अधिकारी ने बताया कि मजबूत होते अल नीनो की वजह से आने वाले हफ्तों में बारिश और कम होगी। इससे महीने के अंत तक बारिश की कमी का यह अंतर और अधिक बढ़ सकता है। इसके साथ ही आने वाले सप्ताहों में न्यूनतम और अधिकतम तापमान में बढ़ोतरी होने और इसके सामान्य से ऊपर बने रहने की संभावना जताई गई है।

नई बोई गई सोयाबीन, कपास और मक्का की फसलों पर मंडराया जोखिम

जुलाई महीने में हुई सामान्य के करीब बारिश की वजह से मिट्टी में नमी बढ़ गई थी। इसके बाद किसानों ने सोयाबीन, कपास, मक्का, दालें और धान जैसी खरीफ की फसलों की बुवाई में तेजी दिखाई थी। मुंबई बेस्ड एक ग्लोबल ट्रेड हाउस के डीलर के मुताबिक नई बोई गई इन फसलों की जड़ें अभी तक मिट्टी में गहराई तक नहीं पहुंची हैं। ऐसी स्थिति में, बारिश के बिना लंबा शुष्क दौर चलने से ये फसलें बेहद संवेदनशील हो जाती हैं और इन्हें भारी नुकसान पहुंचने का जोखिम बढ़ जाता है।

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कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 7 अगस्त तक किसानों ने 96.8 मिलियन (9.68 करोड़) हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ फसलों की बुवाई कर ली थी। ये एक साल पहले की इसी अवधि की तुलना में करीब 2 प्रतिशत कम है। अब अल नीनो के मजबूत होने और मानसून के कमजोर पड़ने से इन फसलों के उत्पादन को लेकर जोखिम काफी बढ़ गया है।