दिल्ली में 2 अक्टूबर को CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन होगा या नहीं? जानिए कल का क्या होने वाला है

2 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर अभी तस्वीर साफ नहीं है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ होने वाले इस प्रदर्शन के लिए दिल्ली पुलिस ने फिलहाल अनुमति नहीं दी है। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, आयोजकों की ओर से प्रदर्शन की तैयारी की जा रही है, लेकिन जंतर-मंतर पर सभा करने की मंजूरी अभी नहीं मिली है।

यह प्रदर्शन सामाजिक कार्यकर्ताओं और छात्र संगठनों की ओर से बुलाया गया है। प्रदर्शन में चुनाव आयोग के कामकाज और वोटर लिस्ट में होने वाले स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर सवाल उठाए जाएंगे।

पुलिस सूत्रों ने बताया कि जंतर-मंतर पर प्रस्तावित इस प्रदर्शन के लिए अभी तक अनुमति नहीं दी गई है।

बता दें कि यह प्रदर्शन गांधी जयंती यानी 2 अक्टूबर को आयोजित किया जाना है। इस दौरान प्रदर्शन के आयोजकों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

वहीं, प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन के मद्देनजर दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर इलाके की ओर जाने वाली सड़कों पर बैरिकेड्स भी लगा दिए हैं।

बता दें कि आम आदमी पार्टी (AAP) दिल्ली के अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने सोमवार को लोगों से जंतर-मंतर पर हो रहे विरोध प्रदर्शन में शामिल होने की सार्वजनिक अपील की थी। इसके अलावा, कुछ अन्य विपक्षी समूह भी इस प्रदर्शन में शामिल हो सकते हैं या अलग से प्रदर्शन कर सकते हैं।

इस बीच, ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) आंदोलन के संस्थापक अभिजीत दिपके ने 2 अक्टूबर को शाम 4 बजे मुंबई के शिवाजी पार्क में समानांतर “जेल भरो आंदोलन” की घोषणा की है।

दिपके ने पहले कहा था कि मुंबई पुलिस ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ CJP के 2 अक्टूबर को प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन की इजाजत देने से इनकार कर दिया है। इसके बाद, उन्होंने गांधी जयंती के दिन ‘जेल भरो आंदोलन’ शुरू करने का ऐलान किया।

शिवाजी पार्क में प्रदर्शन की इजाजत क्यों नहीं मिली?

हालांकि, मुंबई पुलिस ने साफ किया कि बॉम्बे हाई कोर्ट के 2013 के आदेश को देखते हुए, उन्हें शिवाजी पार्क में सभा के लिए “इजाजत देने का अधिकार नहीं है” और यह इलाका एक “साइलेंस जोन” है। पुलिस ने कहा कि आवेदन करने वाले अजिंक्य शिंदे को सलाह दी गई थी कि वे मुंबई में कोई दूसरी जगह देखें और इजाजत के लिए आवेदन करें, जिस पर उचित रूप से विचार किया जाएगा।

सूत्रों के अनुसार, CJP ने मूल रूप से योजना बनाई थी कि अगर ज्ञानेश कुमार CEC के पद से इस्तीफा नहीं देते हैं, तो 2 अक्टूबर को मुंबई से देशव्यापी विरोध प्रदर्शन शुरू किया जाएगा।

ANI के मुताबिक, 25 सितंबर को दिपके ने कहा था, “अगर ज्ञानेश कुमार कल तक इस्तीफा नहीं देते हैं, तो CJP 2 अक्टूबर को मुंबई से देशव्यापी विरोध प्रदर्शन शुरू करेगा और इसे भारत भर के शहरों तक ले जाएगा। आइए, इस गांधी जयंती पर लोकतंत्र को बचाने का संकल्प लें।”

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El Nino effect: अल नीनो बढ़ा सकता है भारत का फूड बिल! चावल, अरहर दाल और खाद्य तेलों ने दिए महंगाई के संकेत

El Nino effect: भारत में खाद्य कीमतों को लेकर आने वाले महीनों में दबाव बढ़ने की आशंका है। देश की रोजमर्रा की खपत वाली प्रमुख खाद्य वस्तुओं में चावल, अरहर दाल और खाद्य तेलों की कीमतों में अलग-अलग रफ्तार से बदलाव देखने को मिल रहा है। ऐसे समय में भारत El Nino की बढ़ती निगरानी के दौर में प्रवेश कर रहा है, जिससे अगर मौसम प्रतिकूल रहता है तो फसल उत्पादन और कमोडिटी सप्लाई पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, अभी ऐसा कोई सबूत नहीं है कि हाल में खाद्य कीमतों में आई तेजी सीधे El Nino की वजह से है। फिलहाल कीमतों की दिशा घरेलू उत्पादन, सरकारी नीतियों, भंडार और वैश्विक कमोडिटी बाजार जैसे कई कारकों पर निर्भर है।

सरकार ने El Nino को बताया जोखिम का कारण

केंद्र सरकार ने अपनी अगस्त 2026 की मासिक आर्थिक रिपोर्ट में El Nino को निगरानी योग्य कारक बताया था। रिपोर्ट में कहा गया था कि लंबे समय तक El Nino की स्थिति रहने पर मानसून कमजोर या असमान हो सकता है। इसका असर फसल उत्पादन और खाद्य कीमतों पर पड़ सकता है। हालांकि, वित्त मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि El Nino और कृषि उत्पादन के बीच सीधा और एक-से-एक संबंध नहीं माना जा सकता।

सिंचाई, सरकारी खरीद, खाद्यान्न भंडार और जरूरत पड़ने पर आयात जैसे उपाय मौसम के झटकों का असर कम कर सकते हैं। भारत में किसी मौसम संबंधी घटना का असर केवल बारिश पर निर्भर नहीं करता। फसल की स्थिति, जलाशयों में पानी, सरकारी स्टॉक, खरीद व्यवस्था और आयात की क्षमता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

चावल और दालों की कीमतों में भारी तेजी

सरकार के मूल्य निगरानी आंकड़ों के मुताबिक, चावल की कीमत पिछले साल की तुलना में बढ़ी है। 29 सितंबर को थोक चावल की कीमत करीब ₹4,185 प्रति क्विंटल थी, जो एक साल पहले के मुकाबले लगभग 8.5 फीसदी अधिक है। खुदरा बाजार में भी चावल की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। दालों में भी अलग-अलग किस्मों की कीमतों में अंतर देखने को मिल रहा है।

अरहर या तूर दाल सितंबर के अंत में ₹125 प्रति किलो से अधिक पर बिक रही थी। अब इसकी कीमत करीब 8 फीसदी सालाना बढ़ी थी। उड़द की कीमत भी ऊपर रही। जबकि मूंग, मसूर और चना में साल-दर-साल अपेक्षाकृत कम बढ़ोतरी दर्ज की गई। हालांकि, इन मौजूदा कीमतों को सीधे El Nino का असर मानना सही नहीं होगा। असली जोखिम आने वाले महीनों में सामने आ सकता है, खासकर अगर बारिश का पैटर्न या फसल उत्पादन प्रभावित होता है।

खाद्य तेलों की कीमतें बनीं चुनौती

खाद्य तेल भारत के लिए अलग तरह की चुनौती हैं, क्योंकि देश कच्चे पाम, सोयाबीन और सूरजमुखी तेल के आयात पर काफी निर्भर है। वैश्विक कीमतों के असर को कम करने के लिए सरकार ने हाल में आयात शुल्क में कटौती की है। 24 सितंबर से कच्चे सोयाबीन और कच्चे पाम ऑयल पर बेसिक कस्टम ड्यूटी 10% से घटाकर 5% की गई।

  • कच्चे सूरजमुखी तेल पर ड्यूटी शून्य कर दी गई।
  • रिफाइंड सोयाबीन और पाम ऑयल पर ड्यूटी 32.5% से घटाकर 27.5% की गई।
  • रिफाइंड सूरजमुखी तेल पर ड्यूटी 22.5% कर दी गई।
  • सरकार के मुताबिक, कम आयात शुल्क से खाद्य तेलों की लैंडेड कॉस्ट घट सकती है, जिससे खुदरा कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। साथ ही घरेलू रिफाइनिंग को भी समर्थन मिल सकता है।
  • वित्त मंत्रालय की अगस्त रिपोर्ट में वैश्विक वेजिटेबल ऑयल कीमतों को महंगाई के संभावित जोखिमों में शामिल किया गया था। इसका एक कारण यह भी है कि पाम, सोयाबीन और रेपसीड जैसे तेलों का इस्तेमाल तेजी से बायोफ्यूल उत्पादन में हो रहा है।

El Nino से क्या बदलेगा?

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 के अंत तक El Nino के बहुत मजबूत स्थिति में पहुंचने का अनुमान जताया गया है। El Nino प्रशांत क्षेत्र से काफी दूर तक बारिश और तापमान के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है। हालांकि इसका असर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग होता है।

भारत के लिए सबसे अहम सवाल यह नहीं है कि El Nino कितना मजबूत होगा। बल्कि यह है कि यह भारतीय मानसून, फसल चक्र और मौजूदा खाद्य-सप्लाई व्यवस्था के साथ किस तरह इंटरेक्ट करता है। WMO ने जलवायु जोखिमों से निपटने के लिए पहले से मिलने वाले मौसम पूर्वानुमानों के महत्व पर भी जोर दिया है। संगठन की ताजा चेतावनी में गर्मी, बाढ़ और सूखे के साथ खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले व्यापक असर का उल्लेख किया गया है।

सरकार के पास कई विकल्प मौजूद

भारत के पास खाद्य आपूर्ति को संभालने के लिए कई नीतिगत विकल्प मौजूद हैं। सरकारी खरीद और खाद्यान्न भंडार प्रमुख वस्तुओं की कमी के दौरान कीमतों को कंट्रोल करने में मदद कर सकते हैं। जरूरत पड़ने पर आयात के जरिए घरेलू बाजार में सप्लाई बढ़ाई जा सकती है। खाद्य तेलों पर हालिया आयात शुल्क कटौती इसका एक उदाहरण है कि सरकार व्यापार नीति के जरिए घरेलू कीमतों को प्रभावित कर सकती है।

RBI की भी रहेगी नजर

खाद्य कीमतों का असर देश की व्यापक महंगाई पर भी पड़ सकता है। Reuters की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत की खपत वाली वस्तुओं की टोकरी में महंगाई का दबाव व्यापक हुआ है और करीब आधी वस्तुओं की कीमतें सालाना आधार पर 4% या उससे अधिक बढ़ रही हैं, जबकि मार्च में यह हिस्सा करीब एक-तिहाई था। इसी अवधि में अप्रैल-जून तिमाही में भारत की अर्थव्यवस्था में करीब 8% की वृद्धि दर्ज की गई। ऐसे में RBI के लिए अहम सवाल यह होगा कि क्या मौसम से जुड़े बदलाव केवल कुछ खाद्य वस्तुओं तक सीमित रहते हैं या वे लगातार खाद्य महंगाई में बदलकर व्यापक कीमतों तक पहुंचते हैं।

अभी की तस्वीर क्या है?

फिलहाल भारत में खाद्य कीमतों की तस्वीर एकसमान तेजी वाली नहीं है। चावल और कुछ दालों की कीमतें पिछले साल की तुलना में ज्यादा हैं। जबकि खाद्य तेल वैश्विक सप्लाई और कीमतों से प्रभावित हो सकते हैं। दूसरी ओर, सरकार ने खाद्य तेलों के आयात शुल्क में कटौती जैसे कदम उठाए हैं। अब आने वाले कुछ महीने यह तय करने में अहम होंगे कि El Nino सिर्फ मौसम से जुड़ा जोखिम बना रहता है या भारत के खाद्य बिल और महंगाई पर इसका स्पष्ट असर दिखाई देने लगता है।

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अब माता-पिता या दादा-दादी की जानकारी नहीं होगी जरूरी, EC ने 20 राज्यों में नए वोटर्स के लिए Form 6 का नियम बदला

अगर आप पहली बार वोटर लिस्ट में अपना नाम जुड़वाने जा रहे हैं, तो आपके लिए एक जरूरी अपडेट है। दरअसल, जिन 20 राज्यों में ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविजन’ (SIR) का काम पूरा हो चुका है, वहां नए वोटरों को अब वोटर लिस्ट में अपने माता-पिता के नाम या जानकारी देने की जरूरत नहीं होगी। ऐसा इसलिए क्योंकि चुनाव आयोग ने ‘Form 6’ में बदलाव किया है, ताकि इन राज्यों में आवेदन करने वाले लोग माता-पिता और दादा-दादी की जानकारी मांगने वाले SIR से जुड़े अतिरिक्त घोषणा-पत्र (डिक्लेरेशन) के बिना ही फॉर्म जमा कर सकें। हालांकि, जिन राज्यों में SIR का काम अभी भी चल रहा है, वहां नए वोटरों को यह घोषणा-पत्र जमा करना जारी रखना होगा।

Form 6 में बदलाव का यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब कुछ दिन पहले चुनाव आयोग के तीन सदस्यों वाले पैनल के अंदर ही इस बदलाव को लेकर अंदरूनी विरोध की खबर सामने आई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने इस घोषणा को जोड़ने पर आपत्ति जताई थी। वहीं, ‘The Indian Express’ के पास मौजूद अंदरूनी रिकॉर्ड से पता चलता है कि उन्होंने ‘रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960’ में संशोधन किए बिना इसे जोड़ने की कानूनी वैधता पर सवाल उठाए थे।

हालांकि, चुनाव आयोग का कहना है कि SIR और Form 6 पर उसके फैसलों को तीनों कमिश्नरों ने सर्वसम्मति से मंजूरी दी थी। 26 सितंबर को जारी एक स्पष्टीकरण में, चुनाव आयोग ने कहा कि Form 6 के साथ लगे SIR डिक्लेरेशन को सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया था और 1960 के नियमों के तहत तय फॉर्म का इस्तेमाल उन समयों में किया जाएगा जब SIR की प्रक्रिया नहीं चल रही होगी।

क्या बदला है?

पहले जब कोई व्यक्ति पहली बार वोटर लिस्ट में अपना नाम जुड़वाने के लिए आवेदन करता था, तो उसे अपने माता-पिता या दादा-दादी का पिछली SIR वाली वोटर लिस्ट में दर्ज विवरण देने की जरूरत नहीं थी।

लेकिन SIR की प्रक्रिया के दौरान Form 6 में एक अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई थी। इसके तहत नए आवेदकों से पुरानी वोटर लिस्ट से अपना संबंध साबित करने के लिए कुछ जानकारी मांगी जाती थी। इसमें माता-पिता या दादा-दादी से जुड़ी जानकारी भी शामिल थी।

अब जिन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, वहां नए वोटरों को Form 6 भरते समय यह अतिरिक्त घोषणा देने की जरूरत नहीं होगी।

चुनाव आयोग ने कहा है कि बिहार और पश्चिम बंगाल समेत 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR का काम पूरा हो चुका है। युवा और पहली बार वोट देने वाले लोग, साथ ही वे लोग जिनके नाम SIR के दौरान या उसके बाद छूट गए थे, वे लगातार अपडेट होने वाली प्रक्रिया के जरिए नाम जुड़वाने के लिए अप्लाई कर सकते हैं।

जिन राज्यों में SIR चल रहा है, वहां क्या होगा?

जिन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR की प्रक्रिया अभी भी चल रही है, वहां यह जरूरत बनी रहेगी।

इन इलाकों में नाम जुड़वाने के लिए आवेदन करने वाले नए वोटरों को SIR से जुड़ा डिक्लेरेशन (घोषणा-पत्र) और Form 6 जमा करना होगा। इसमें पिछली वोटर लिस्ट से अपना संबंध साबित करने के लिए जरूरी जानकारी भी देनी होगी।

इससे SIR प्रक्रिया के दौरान वोटर का नाम जुड़वाने और SIR पूरा होने के बाद लगातार अपडेट होने की अवधि के दौरान नाम जुड़वाने के बीच अंतर हो जाता है।

चुनाव आयोग का स्पष्टीकरण

चुनाव आयोग का कहना है कि SIR के दौरान या SIR के बाद के समय में, Form 6 में कोई बदलाव नहीं किया गया है। आयोग ने कहा, “Declaration Form एक अतिरिक्त दस्तावेज था जिसे उन राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में मांगा गया था जहां 24 जून, 2025 के SIR आदेश के अनुसार SIR किया गया था। यह उस समय आयोग के सर्वसम्मत फैसले के अनुसार था। वहीं, 26 सितंबर, 2026 को जारी आयोग के प्रेस नोट के अनुसार, उन सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के लिए जहां SIR पूरा हो चुका है और जहां यह अभी शुरू होना है, Declaration Form की कोई जरूरत नहीं होगी।”

इससे SIR प्रक्रिया के दौरान वोटर एनरोलमेंट और SIR पूरा होने के बाद लगातार अपडेट होने की अवधि के दौरान एनरोलमेंट के बीच अंतर पैदा होता है।

EC में मतभेद की वजह बना ‘Form 6’

CEC और दो चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेदों की खबरों में ‘Form 6’ से जुड़ा विवाद भी एक अहम मुद्दा था।

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के मुताबिक, संधू और जोशी की आपत्तियों के बावजूद ECINET पोर्टल पर अतिरिक्त घोषणा (डिक्लेरेशन) को शामिल किया गया था। दोनों आयुक्तों का तर्क था कि ‘रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960’ में संशोधन किए बिना, प्रशासनिक या सॉफ्टवेयर बदलाव के जरिए कानूनी रूप से अनिवार्य ‘Form 6’ में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता।

बता दें कि यह विवाद सिर्फ ‘Form 6’ तक ही सीमित नहीं था। खबरों के अनुसार, दोनों आयुक्तों ने SIR प्रक्रिया से जुड़े कई मुद्दों पर आपत्तियां जताई थीं, जिनमें मतदाताओं के नाम जोड़ने और हटाने, ECINET सिस्टम के कामकाज और वोटर लिस्ट के डेटा तक पहुंच जैसे मामले शामिल थे।

इसके बाद EC ने पॉलिसी-लेवल पर बंटवारे के सुझाव को खारिज कर दिया। EC का कहना था कि कई सदस्यों वाली संवैधानिक संस्था के कामकाज में आपसी जांच-पड़ताल और अलग-अलग राय होना सामान्य बात है और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे।

जानकारी के लिए बता दें कि Form 6 वह कानूनी आवेदन है जिसका इस्तेमाल योग्य नागरिक वोटर लिस्ट में अपना नाम शामिल करवाने के लिए करते हैं। SIR के दौरान इसमें जोड़ी गई अतिरिक्त घोषणा को लेकर इसलिए विवाद हुआ, क्योंकि पहली बार वोटर बनने वाले लोगों से पुरानी वोटर लिस्ट से जुड़े परिवार के सदस्यों की जानकारी मांगी जा रही थी।

वहीं, इस फैसले को वापस लेने का मतलब है कि किसी राज्य में SIR प्रक्रिया पूरी होने के बाद, आवेदकों को SIR से जुड़ी परिवार की अतिरिक्त जानकारी देने के बजाय सामान्य Form 6 प्रक्रिया का पालन करना होगा।

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टाटा संस की लिस्टिंग टालने के लिए टाटा ट्रस्ट का बड़ा कदम, दो कंपनियों के मर्जर का प्रस्ताव रखा

टाटा ट्रस्ट (Tata Trusts) ने टाटा संस की संभावित लिस्टिंग को टालने के लिए बड़ा प्रस्ताव रखा है। इसके तहत Tata Electronics Systems Solutions Private Limited (TESS) और Tata Consulting Engineers (TCE) का Tata Sons में मर्जर किया जाएगा।

इसका मकसद Tata Sons को NBFC और कोर इनवेस्टमेंट कंपनी यानी CIC की नियामकीय कैटेगरी से बाहर लाना है। प्रस्ताव को Tata Sons के बोर्ड और RBI की मंजूरी मिलना जरूरी है।

Tata Sons को क्या फायदा होगा?

Tata Trusts के पास Tata Sons की करीब 66% हिस्सेदारी है। ट्रस्ट ने कंपनी के बोर्ड से इस प्रस्ताव को मंजूरी देने और RBI से जरूरी NOC लेने के लिए आवेदन करने को कहा है।

अगर प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है तो Tata Sons अनलिस्टेड प्राइवेट कंपनी बनी रह सकेगी। यह इसलिए अहम है क्योंकि RBI ने इसी महीने Tata Sons की CIC के तौर पर रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने की अर्जी खारिज कर दी थी।

अपर लेयर NBFC के तौर पर Tata Sons पर कई अतिरिक्त नियम लागू होते हैं। इसमें कंपनी की शेयर मार्केट में अनिवार्य लिस्टिंग भी शामिल है।

दो कंपनियों के विलय से क्या बदलेगा?

यह Tata Sons का ब्रेकअप या डीमर्जर नहीं है। इसके उलट दो ऑपरेटिंग कंपनियों को Tata Sons में मिलाया जाएगा।

Tata Trusts के मुताबिक, 31 मार्च 2026 के आंकड़ों के आधार पर विलय के बाद Tata Sons की ऑपरेटिंग रेवेन्यू ₹1,05,043 करोड़ होता। वहीं, फाइनेंशियल एसेट्स से इनकम ₹40,072 करोड़ होती।

इस तरह कुल इनकम में ऑपरेटिंग रेवेन्यू की हिस्सेदारी 64.3% होती। Tata Trusts का कहना है कि इस स्थिति में टाटा संस RBI के प्रिंसिपल बिजनेस क्राइटेरिया के तहत NBFC नहीं होगी।

CIC की कैटेगरी से भी बाहर आएगी

इस प्रस्ताव का दूसरा मकसद Tata Sons को CIC की परिभाषा से बाहर लाना है। मर्जर के बाद कंपनी की कुल नेट एसेट्स ₹2,00,158 करोड़ होंगी। इसमें ₹1,77,120 करोड़ यानी करीब 88.5% हिस्सा ग्रुप कंपनियों में निवेश का होगा।

CIC के लिए 90% की सीमा लागू होती है। प्रस्तावित ढांचे में यह अनुपात 90% से नीचे रहेगा। इसलिए Tata Trusts के मुताबिक, Tata Sons CIC की कैटेगरी में नहीं आएगी।

Tata Sons फिर सीधे कारोबार करेगी

मर्जर के बाद Tata Sons सिर्फ होल्डिंग कंपनी नहीं रहेगी। वह सीधे कारोबार भी करेगी। Tata Trusts का कहना है कि इससे Tata Sons अपने पुराने मॉडल की तरफ लौटेगी। कंपनी के करीब 100 साल के इतिहास में लगभग 80 साल तक Tata Sons के पास अपने ऑपरेटिंग बिजनेस और रेवेन्यू थे।

इसी रेवेन्यू से ग्रुप के नए कारोबारों को आगे बढ़ाने में मदद मिलती थी। Tata Consultancy Services यानी TCS भी 2004 में अलग कंपनी बनने से पहले Tata Sons की ही एक डिविजन थी।

RBI की मंजूरी जरूरी

इस प्रस्ताव को लागू करना आसान नहीं होगा। इसके लिए RBI की मंजूरी जरूरी है। ऑपरेटिंग और नॉन-फाइनेंशियल कंपनियों का NBFC के साथ विलय होने की वजह से RBI के Non-Banking Financial Companies-Voluntary Amalgamation Directions, 2025 के नियम लागू होंगे।

Tata Sons को पहले RBI से NOC लेना होगा। मर्जर पूरा होने के बाद अगर कंपनी CIC की कैटेगरी में नहीं रहती है तो उसे अपना रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट सरेंडर करना होगा।

Tata Trusts ने क्या कहा?

Tata Trusts का कहना है कि यह रीस्ट्रक्चरिंग टाटा ग्रुप और उसके शेयरहोल्डर्स के हित में है। ट्रस्ट के मुताबिक, इससे Tata Sons को अनलिस्टेड प्राइवेट कंपनी के तौर पर बनाए रखने का रास्ता खुल सकता है।

ट्रस्ट ने जुलाई 2025 में Sir Dorabji Tata Trust और Sir Ratan Tata Trust के बोर्ड से पास हुए प्रस्तावों का भी जिक्र किया है। दोनों ट्रस्ट के बोर्ड ने Tata Sons का अनलिस्टेड प्राइवेट कंपनी का दर्जा बनाए रखने के लिए हर मुमकिन प्रयास करने की बात कही थी।

Tata Trusts के मुताबिक, इस बदलाव से टाटा ग्रुप की करीब 100 साल पुरानी संरचना बनी रहेगी। साथ ही, लंबे समय के निवेश, राष्ट्र निर्माण और परोपकारी कामों पर ग्रुप का फोकस भी जारी रहेगा।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

कल का मौसम 27 सितंबर: उत्तराखंड, दिल्ली-NCR, यूपी संग इन राज्यों में आंधी के साथ मूसलाधार बारिश की चेतावनी

IMD Weather Update: सितंबर के आखिरी हफ्ते में देश के कई हिस्सों में मौसम का मिजाज बिगड़ सकता है। मौसम विभाग ने 27 सितंबर को उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भारी बारिश का अलर्ट जारी किया है। वहीं कई राज्यों में गरज-चमक के साथ तेज हवाएं चलने और बिजली गिरने की भी आशंका जताई गई है। इस दौरान 30 से 40 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चल सकती है। आईएमडी ने बारिश के दौरान लोगों को सावधानी बरतने की अपील की है। अचानक हो रही बारिश से लोगों को उमस भरी गर्मा से राहत मिली है।

कैसा होगा मौसम

मौसम विभाग के अनुसार, 27 सितंबर को हिमाचल प्रदेश और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी कई जगहों पर भारी से बहुत भारी बारिश का अनुमान है। वहीं पूर्वी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, चंडीगढ़, दिल्ली और मध्य प्रदेश में कुछ स्थानों पर भारी बारिश हो सकती है। वहीं उत्तराखंड में कुछ स्थानों पर भारी से बहुत भारी बारिश हो सकती है, जबकि कुछ इलाकों में अत्यधिक भारी बारिश की भी आशंका है। वहीं उत्तराखंड में भारी बारिश की वजह से चार धाम यात्रा दो दिनों के लिए रोक दी गई है।

दिल्ली में कैसा होगा मौसम

27 सितंबर को हरियाणा, चंडीगढ़, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, मध्य प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गरज-चमक के साथ भारी बारिश हो सकती है। वहीं इस दौरान 40 से 50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चलने की संभावना है। इसके अलावा अंडमान-निकोबार, आंध्र प्रदेश, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड, राजस्थान और तेलंगाना में 30 से 40 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवाओं के साथ बारिश और बिजली गिरने की आशंका है।

असम-मेघालय और पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में भी गरज-चमक के साथ बारिश हो सकती है। आंध्र प्रदेश में तेज हवाएं चलने का अनुमान है। वहीं दक्षिण-पश्चिम अरब सागर से लगे सोमालिया तट के पास हवाओं की रफ्तार 45 से 55 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंच सकती है, जो बढ़कर 65 किलोमीटर प्रति घंटे तक हो सकती है।

अब SIR के लिए नहीं लगाने होंगे ऑफिस के चक्कर! चुनाव आयोग का बड़ा फैसला

अब SIR के लिए नहीं लगाने होंगे ऑफिस के चक्कर! चुनाव आयोग का बड़ा फैसला

वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर चुनाव आयोग ने शनिवार को वेरिफिकेशन प्रक्रिया में कुछ बदलावों का ऐलान किया। आयोग ने कहा कि इन कदमों का मकसद वोटरों के लिए जांच और जरूरी दस्तावेज जमा करने की प्रक्रिया को आसान बनाना है। ये फैसला मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू व विवेक जोशी की बैठक में लिया गया। आयोग के मुताबिक, इन बदलावों का मकसद मतदाताओं को अपने रिकॉर्ड की जांच और जरूरी प्रक्रिया पूरी करने में ज्यादा सुविधा देना है।

नहीं लगाना होगा BLO के चक्कर

आयोग ने कहा कि जिन वोटरों का रिकॉर्ड पुराने डेटा से मैच नहीं हो रहा है या जानकारी में कोई गलती है, उन्हें वेरिफिकेशन के लिए ऑफिस जाने की जरूरत नहीं होगी। ऐसे लोगों के घर बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) जाएंगे, जरूरी दस्तावेज लेंगे और उन्हें ECINet पर अपलोड करेंगे। इससे वोटरों के लिए पूरी प्रक्रिया आसान हो जाएगी। चुनाव आयोग के नए नियमों के तहत सुनवाई की जरूरत केवल जरूरी मामलों में ही होगी और कोशिश रहेगी कि इसे ऑनलाइन पूरा किया जाए। अगर वोटर खुद मौजूद नहीं हो सकता, तो उसकी ओर से परिवार का कोई अधिकृत सदस्य भी सुनवाई में शामिल हो सकेगा।

SIR के लिए हेल्प डेस्क बनाने को कहा

चुनाव आयोग ने ऐसे मतदाताओं की मदद के लिए खास इंतजाम करने के निर्देश दिए हैं, जिन्हें SIR की प्रक्रिया में परेशानी हो सकती है। इसके तहत जिला निर्वाचन अधिकारियों को विशेष कैंप और हेल्प डेस्क लगाने को कहा गया है। इन केंद्रों पर नाइट शेल्टर में रहने वाले लोगों, मजदूरों, गरीब और बेघर मतदाताओं को जरूरी जानकारी और सहायता दी जाएगी, ताकि वे आसानी से वेरिफिकेशन प्रक्रिया पूरी कर सकें।

बढ़ाई गई नोटिस की समयसीमा

चुनाव आयोग ने दिल्ली और महाराष्ट्र में SIR से जुड़े दावे और आपत्तियां दर्ज करने के लिए समय बढ़ा दिया है। दिल्ली में अब 30 अक्टूबर 2026 तक क्लेम और ऑब्जेक्शन किए जा सकेंगे, वहीं उनका निपटारा 30 नवंबर तक होगा। महाराष्ट्र में लोग 12 अक्टूबर तक दावे और आपत्तियां दे सकेंगे और इनके निपटारे की आखिरी तारीख 10 नवंबर 2026 है। दोनों राज्यों को चुनाव आयोग ने SIR के एक ही चरण में शामिल किया है।

इन जगहों पर पूरा हुआ SIR

चुनाव आयोग के अनुसार, 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में वोटर लिस्ट का स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन पूरा हो चुका है। अगर किसी व्यक्ति का नाम सूची में नहीं है, तो वह लगातार अपडेट की प्रक्रिया के जरिए अपना नाम जुड़वा सकता है। इसमें युवा और पहली बार मतदान करने वाले लोग भी शामिल हैं। आयोग के वोटर पोर्टल पर पुराने वोटर रिकॉर्ड में नाम देखने और SIR से जुड़े नोटिस के जवाब में जरूरी दस्तावेज जमा करने की सुविधा भी उपलब्ध है। SIR को लेकर सवालों के बीच चुनाव आयोग ने कहा कि इस प्रक्रिया से जुड़े फैसलों को सभी सदस्यों की मंजूरी मिली थी।

आयोग के मुताबिक, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में SIR कराने का आदेश 24 जून 2025 को जारी किया गया था। इसकी शुरुआत बिहार से हुई और बाद में प्रक्रिया को पश्चिम बंगाल समेत अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भी लागू किया गया।

ECINet सिस्टम की होगी समीक्षा

चुनाव आयोग ने ECINet सिस्टम की समीक्षा करने का फैसला लिया है, जिससे ये पता लगाया जा सके कि यह चुनावी नियमों के अनुसार सही तरीके से काम कर रहा है या नहीं। इसके लिए वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई जाएगी, जिसमें IIT या IIIT का एक स्वतंत्र विशेषज्ञ भी शामिल होगा। ECINet के जरिए फिलहाल पुराने वोटर रिकॉर्ड देखने और SIR से जुड़े नोटिस का जवाब देने जैसे कई काम किए जा रहे हैं।

चुनाव आयोग ने SIR प्रक्रिया और फॉर्म 6 से जुड़े नियमों पर अपना पक्ष स्पष्ट किया है। आयोग के मुताबिक, SIR के दौरान फॉर्म 6 के साथ लगाए जाने वाले घोषणा पत्र को सुप्रीम कोर्ट ने मान्य माना है। वहीं SIR के अलावा सामान्य अवधि में मतदाता पंजीकरण के लिए 1960 के नियमों के तहत तय फॉर्म का इस्तेमाल किया जाएगा।

CEC ज्ञानेश कुमार पर आर-पार के मूड में विपक्ष! 30 सितंबर को दिल्ली में INDIA ब्लॉक की बड़ी बैठक

INDIA Bloc Meeting: देश में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और मतदाता सूचियों के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) प्रक्रिया को लेकर जारी घमासान के बीच विपक्षी खेमे से बड़ी खबर सामने आई है। समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और आंतरिक मतभेदों को लेकर रणनीति तैयार करने के लिए 30 सितंबर को नई दिल्ली में INDIA गठबंधन के घटक दलों की एक अहम बैठक बुलाई गई है।

इस बैठक का मुख्य एजेंडा चुनाव आयोग पर एक संयुक्त रुख अपनाना, चुनाव आयुक्तों के बीच सामने आए मतभेदों पर आयोग को घेरना और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ संसद में नया महाभियोग यानी हटाने का प्रस्ताव लाने पर सर्वसम्मति बनाना है।

बंगाल के कट्टर विरोधी TMC और CPI(M) आए एक मंच पर

SIR और चुनाव आयोग के रुख ने पश्चिम बंगाल में एक-दूसरे की धुर विरोधी पार्टियों तृणमूल कांग्रेस (TMC) और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPI-M) को भी इस मुद्दे पर एक साथ ला खड़ा किया है।

सीपीआई(एम) के महासचिव एम. ए. बेबी ने इंडिया ब्लॉक और अन्य विपक्षी नेताओं को पत्र लिखकर तुरंत बैठक बुलाने का अनुरोध किया था। उन्होंने टीएमसी प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से फोन पर बातचीत की। ममता बनर्जी ने इस बात पर सहमति जताई कि चुनाव आयोग के मौजूदा हालात को देखते हुए सभी विपक्षी दलों को एकजुट होकर कार्रवाई करने की सख्त जरूरत है।

चुनाव आयोग में आतंरिक कलह की खबरों ने बढ़ाई सियासी गर्मी

विपक्ष की इस नई लामबंदी के पीछे ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की वह मीडिया रिपोर्ट मानी जा रही है, जिसमें यह दावा किया गया था कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से जुड़े कई फैसलों और आदेशों पर चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मुख्य चुनाव आयुक्त के समक्ष बार-बार आपत्तियां दर्ज कराई थीं।

राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर CEC ज्ञानेश कुमार पर तीखा हमला बोला है। विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने और SIR प्रक्रिया को तुरंत रोकने की मांग की है।

चुनाव आयोग की सफाई

उठते विवादों के बीच चुनाव आयोग ने बयान जारी कर स्पष्ट किया कि संस्थागत विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय और आपत्तियां आना एक सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग के सभी आदेशों को पूर्ण कानूनी मंजूरी प्राप्त है और वैधानिक प्रक्रियाओं का पूरी तरह पालन किया जा रहा है।

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ संसद में ‘तीसरा’ रिमूवल नोटिस लाने की तैयारी

विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कानूनी विशेषज्ञों की राय के बाद संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में एक नया हटाने का नोटिस पेश करने की दिशा में काम कर रहे हैं।

अगर विपक्षी दल यह नोटिस पेश करते हैं, तो मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विपक्ष की तरफ से किया जाने वाला यह तीसरा प्रयास होगा। इससे पहले भी 23 राजनीतिक दलों और एक निर्दलीय सांसद ने SIR प्रक्रिया और चुनाव संबंधी चिंताओं को लेकर सीधे देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) का रुख किया था।

29 सितंबर को कांग्रेस कार्य समिति की अहम बैठक

INDIA गठबंधन की 30 सितंबर की बैठक से ठीक एक दिन पहले, 29 सितंबर 2026 को कांग्रेस कार्य समिति (CWC) की उच्चस्तरीय बैठक होने जा रही है। इस बैठक में कांग्रेस पार्टी चुनाव आयोग और एसआईआर के विवाद पर अपनी रणनीति तय करेगी, जिसे अगले दिन इंडिया ब्लॉक की संयुक्त बैठक में अन्य घटक दलों के सामने रखा जाएगा।

UP-EDGE Project: योगी सरकार का पूर्वांचल पर मेगा प्लान! 28 जिलों की बदलने वाली है किस्मत, ₹2,500 करोड़ से होगा ये बदलाव

UP-EDGE Project: उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में आर्थिक गतिविधियों को रफ्तार देने के लिए राज्य सरकार ने बड़ा प्लान तैयार किया है। विश्व बैंक (World Bank) के सहयोग से ₹2,500 करोड़ की UP-EDGE प्रोजेक्ट प्रस्तावित की गई है। पांच साल तक चलने वाली इस परियोजना का मकसद पूर्वांचल के जिलों में स्थानीय क्षमता के आधार पर रोजगार, आय और निवेश के नए अवसर तैयार करना है। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने मंगलवार (22 सितंबर) को कहा कि वह पूर्वांचल क्षेत्र के 28 जिलों को समर्पित एक परियोजना शुरू करेगी।

इसका उद्देश्य स्थानीय संसाधनों को निवेश, रोजगार, उद्यमिता और निर्यात के अवसरों में बदलना है। विश्व बैंक के सहयोग से शुरू की जाने वाली उत्तर प्रदेश सक्षम जिला-आधारित आर्थिक विकास (UP-EDGE) परियोजना पूर्वांचल क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों को गति देने के साथ-साथ स्थानीय प्रशासन को भी मजबूत करेगी।

28 जिलों को मिलेगा फायदा

UP-EDGE यानी UP Enabling District-Led Economic Growth Project के तहत फिलहाल पूर्वांचल के 28 जिलों को शामिल करने का प्रस्ताव है। इसके अलावा बुंदेलखंड के सात जिलों को भी परियोजना में शामिल किए जाने की संभावना है। इस प्रोजेक्ट को विश्व बैंक के सहयोग से लागू किया जाना प्रस्तावित है।

बैठक में परियोजना की प्रारंभिक रिपोर्ट यानी PPR को भारत सरकार को भेजने समेत कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। राज्य सरकार की ओर से जारी एक बयान के अनुसार, मंगलवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और विश्व बैंक के अधिकारियों के बीच हुई बैठक में परियोजना के विभिन्न प्रस्तावित घटकों पर चर्चा की गई। इनमें प्रारंभिक परियोजना रिपोर्ट (PPR) को भारत सरकार को भेजना भी शामिल है।

बुंदेलखंड के सात जिले शामिल

विश्व बैंक के प्रैक्टिस मैनेजर हून सोह, लीड इकोनॉमिस्ट ऑरेलियन क्रॉस, सीनियर इकोनॉमिस्ट विंसेंट बेलिंगा और सीनियर स्पेशलिस्ट नेहा गुप्ता के साथ हुई बैठक में बताया गया कि यूपी-एज प्रोजेक्ट पूर्वांचल के 28 जिलों के लिए तैयार की गई है। बयान के मुताबिक, बुंदेलखंड के सात जिलों को भी इस परियोजना में शामिल किए जाने का प्रस्ताव है। करीब 2,500 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली इस परियोजना की अवधि पांच साल होगी।

पूर्वांचल में उत्तर प्रदेश की करीब 40% आबादी

बैठक में बताया गया कि पूर्वांचल में यूपी की करीब 40 प्रतिशत आबादी रहती है। लेकिन उत्तर प्रदेश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में इस क्षेत्र का योगदान लगभग 27.6 प्रतिशत है। क्षेत्र की प्रति व्यक्ति आय राज्य के औसत से करीब 45 फीसदी कम है। लगभग 80 प्रतिशत कार्यबल कृषि क्षेत्र से जुड़ा है। ऐसे में यह परियोजना जिलों की जरूरतों और स्थानीय संभावनाओं के आधार पर आर्थिक गतिविधियों का विस्तार करेगी।

कृषि के साथ मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर पर जोर

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि पूर्वांचल में विकास की काफी संभावनाएं हैं। उन्होंने जिलेवार बड़े निवेश प्रोजेक्ट के लिए स्थानीय जरूरतों और उपलब्ध संसाधनों के आधार पर योजनाएं तैयार करने पर जोर दिया। सरकार के मुताबिक, इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय के नए अवसर पैदा हो सकते हैं। इससे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को नई गति मिल सकती है। सीएम योगी ने कृषि के साथ-साथ मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर की भूमिका बढ़ाने की जरूरत बताई। उन्होंने स्थानीय उत्पादों को बेहतर डिजाइन, पैकेजिंग और वैश्विक बाजारों से जोड़ने पर भी जोर दिया।

इस प्रोजेक्ट के तहत करीब एक लाख नए उद्यम विकसित करने और महिला उद्यमियों की भागीदारी बढ़ाने का भी प्रस्ताव है। पर्यटन, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, ई-कॉमर्स, डेटा सेंटर और डिजिटल जिलों जैसे क्षेत्रों में भी नए अवसर विकसित किए जाएंगे। वाराणसी, गोरखपुर और प्रयागराज जैसे प्रमुख शैक्षणिक केंद्रों में कौशल विकास और ट्रेनिंग को बढ़ावा देने के साथ स्वास्थ्य क्षेत्र में मेडिसिटी और स्वास्थ्य पर्यटन की संभावनाओं पर भी काम किया जाएगा।

ODOP को ग्लोबल मार्केट से जोड़ने की तैयारी

मुख्यमंत्री ने ‘एक जिला, एक उत्पाद (ODOP)’ समेत अन्य स्थानीय उत्पादों को नए बाजारों से जोड़ने पर विशेष ध्यान देने की बात कही। बेहतर बाजार व्यवस्था और वैश्विक पहुंच के जरिए इन उत्पादों के निर्यात की संभावनाएं बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। UP-EDGE प्रोजेक्ट के जरिए सरकार का फोकस सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर तक सीमित रखने के बजाय जिले की स्थानीय आर्थिक क्षमता के हिसाब से विकास मॉडल तैयार करने पर है। प्रोजेक्ट के अगले चरण में प्रस्तावित PPR को केंद्र सरकार के समक्ष भेजने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।

सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा, “पूर्वांचल में विकास की अपार संभावनाएं हैं। स्थानीय जरूरतों, उपलब्ध संसाधनों और आर्थिक अवसरों को ध्यान में रखते हुए जिलेवार बड़े निवेश परियोजनाओं की कार्ययोजना तैयार की जानी चाहिए। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय के नए अवसर पैदा होंगे तथा क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को नई गति मिलेगी।”

ये भी पढ़ें- SIR प्रक्रिया में गड़बड़ियों पर ECI का जवाब! ‘असहमति सामान्य प्रक्रिया…’; 10 महीने के सवालों पर चुनाव आयोग ने क्या-क्या कहा?

उन्होंने कहा कि पूर्वांचल के विकास में कृषि के साथ-साथ मैन्युफैक्चरिंग और सेवा क्षेत्र की भूमिका भी बढ़ानी होगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि स्थानीय उत्पादों को बेहतर डिजाइन, पैकेजिंग और वैश्विक बाजारों से जोड़कर निर्यात के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं। आदित्यनाथ ने एक जिला एक उत्पाद (ODOP) और अन्य स्थानीय उत्पादों को नए बाजार तंत्र से जोड़ने पर विशेष ध्यान देने को कहा।

SIR प्रक्रिया में गड़बड़ियों पर ECI का जवाब! ‘असहमति सामान्य प्रक्रिया…’; 10 महीने के सवालों पर चुनाव आयोग ने क्या-क्या कहा?

ECI response SIR Row: चुनाव आयोग ने पिछले 10 महीनों के दौरान इलेक्शन क (ECI) के भीतर उठाई गई कथित आपत्तियों और अलग-अलग टिप्पणियों को लेकर बुधवार (23 सितंबर) को विस्तृत प्रेस नोट जारी कर विस्तृत जवाब दिया। चुनाव आयोग ने कहा कि लिखित नोट, टिप्पणियां, तकनीकी सुझाव और आंतरिक जांच-पड़ताल बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था की सामान्य कार्यप्रणाली का हिस्सा हैं। ECI ने कहा कि आयोग संविधान के आर्टिकल 324, वैधानिक नियमों और स्थापित संस्थागत परंपराओं के तहत काम करता है। उसके सभी कदम कानून और आयोग के निर्देशों के अनुरूप हैं। SIR प्रक्रिया में गड़बड़ियों पर 2 चुनाव आयुक्त की आपत्ति के बारे में ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग ने प्रेस नोट जारी किया है।

‘अलग-अलग राय विमर्श का सामान्य हिस्सा’

चुनाव आयोग ने कहा, “किसी भी संस्था में अंतिम फैसला लेने से पहले अलग-अलग विचार और टिप्पणियां सामने आना सामान्य प्रक्रिया है।” आयोग के मुताबिक, “सिर्फ तीनों चुनाव आयुक्त ही नहीं, बल्कि आयोग का हर अधिकारी चुनाव प्रक्रिया को बेहतर बनाने के लिए अपने सुझाव देने के लिए अधिकृत है।” ECI ने कहा कि सदस्यों की ओर से ड्राफ्ट स्तर पर उठाए गए ऑपरेशनल सवाल या सुझाव चुनाव प्रक्रिया और मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा के उद्देश्य से प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं।

‘हर अधिकारी अपने सुझाव देने के लिए पूरी तरह से अधिकृत है’

चुनाव आयोग ने बयान में कहा, “किसी भी संस्था में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय और टिप्पणियां होना सामान्य बात है। ये अंतिम फैसला लेने से पहले निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं। न केवल तीनों कमिश्नर, बल्कि आयोग का हर अधिकारी चुनावी व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए आयोग को अपने सुझाव देने के लिए पूरी तरह से अधिकृत है।”

10 महीनों के दौरान क्या-क्या हुआ?

ECI ने कहा, “10 महीनों के दौरान की कुछ खास आंतरिक टिप्पणियों/अवलोकनों को उजागर करना, जबकि बड़ी संख्या में मंजूरियों, फैसलों, निर्देशों और पहलों को नजरअंदाज करना, तस्वीर का केवल एक हिस्सा ही दिखाता है। हाल के महीनों में आयोग ने कई फैसले लिए हैं, निर्देश जारी किए हैं, लगभग 40 नई पहलें शुरू की हैं और देश भर में मतदाता सूची संशोधन (SIR सहित) के संचालन सहित कई चुनावी सुधार किए हैं। ये सभी फैसले पिछले एक साल में पूरे आयोग के सर्वसम्मत फैसलों का परिणाम हैं।”

‘सिर्फ कुछ आंतरिक नोट्स से पूरी तस्वीर नहीं बनती’

आयोग ने कहा कि 10 महीने की अवधि में सामने आए कुछ खास आंतरिक नोट्स और टिप्पणियों को अलग से देखने से पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। ECI के मुताबिक, हाल के महीनों में आयोग ने कई फैसले लिए, निर्देश जारी किए और करीब 40 नई पहल शुरू कीं। इनमें देशभर में मतदाता सूची पुनरीक्षण, जिसमें SIR भी शामिल है, जैसे चुनावी सुधार और प्रक्रियाएं शामिल हैं। आयोग ने दावा किया कि पिछले एक साल में लिए गए ये सभी फैसले पूर्ण आयोग के सर्वसम्मत निर्णयों का परिणाम हैं।

कई राज्यों में चुनाव कराने का भी जिक्र

प्रेस नोट में चुनाव आयोग ने हाल में बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी, असम और पश्चिम बंगाल में कराए गए प्रमुख चुनावों का भी उल्लेख किया। आयोग ने कहा कि इन चुनावों के संचालन में बड़े पैमाने पर प्रशासनिक और ऑपरेशनल मशीनरी लगी और इस दौरान आयोग की ओर से कई मंजूरियां और निर्देश जारी किए गए।

ECINet और डेटा सुरक्षा पर भी सफाई

डिजिटल प्लेटफॉर्म ECINet को लेकर भी आयोग ने अपना पक्ष रखा। ECI ने कहा कि उसके डिजिटल प्लेटफॉर्म सख्त डेटा सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत काम करते हैं, जिनका उद्देश्य अनधिकृत छेड़छाड़ और डेटा में हेरफेर को रोकना है। आयोग ने कहा कि IT सुरक्षा जांच और ऑडिट नियंत्रण राष्ट्रीय स्तर के डेटाबेस में अपनाए जाने वाले सामान्य साइबर सुरक्षा उपाय हैं।

‘संवैधानिक जिम्मेदारियों के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध’

प्रेस नोट के अंत में चुनाव आयोग ने कहा कि वह अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों को पूरी ईमानदारी के साथ निभाने के लिए प्रतिबद्ध है और लोकतंत्र को मजबूत करने में अपनी भूमिका को महत्वपूर्ण मानता है। यह प्रेस नोट चुनाव आयोग के डिप्टी डायरेक्टर पी. पवन की ओर से जारी किया गया है।

अखबार की रिपोर्ट में क्या है?

‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि वोटर लिस्ट के SIR के दौरान 10 महीने में 14 बार दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के कदमों पर आपत्ति जताई थी। इसके बाद अधिकारियों का यह बयान आया है। अखबार ने खबर दी है कि तीन सदस्यीय निर्वाचन आयोग (ECI) के भीतर ही मतदाता सूचियों के स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (SIR)र से जुड़े मुद्दों पर बार-बार सवाल उठाए गए। खबर के अनुसार, तीन में से दो निर्वाचन आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कई बार इन मुद्दों को उठाया।

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अंग्रेजी दैनिक की खबर में कहा गया कि एसआईआर के देशव्यापी क्रियान्वयन की निगरानी तीनों निर्वाचन आयुक्तों की देखरेख में हो रही है। हालांकि, संधू और जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आधिकारिक रिकॉर्ड पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि ये आपत्तियां उन फैसलों और आदेशों को लेकर थीं, जिन्हें उनकी जानकारी के बिना लिया गया या जारी किया गया था। इनमें से चार आपत्तियां एक ही दिन दर्ज की गईं। विपक्षी दलों ने एसआईआर को लेकर निर्वाचन आयोग की आलोचना की है। उनका दावा है कि इसका उद्देश्य उन मतदाताओं को निशाना बनाना था, जो BJP और उसके सहयोगी दलों के साथ नहीं हैं।

वैष्णो देवी में 550 करोड़ के ‘नकली चांदी’ चढ़ावे की जांच जारी, 10 अक्टूबर को अगली सुनवाई

वैष्णो देवी में 550 करोड़ के ‘नकली चांदी’ चढ़ावे की जांच जारी, 10 अक्टूबर को अगली सुनवाई

Vaishno Devi Temple fake silver Scam

माता वैष्णो देवी मंदिर में श्रद्धालुओं के चढ़ावे में कथित ‘नकली चांदी’ के आरोप ने अब 550 करोड़ रुपये के चढ़ावे की पारदर्शिता और उसके रखरखाव की पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। करीब 20 टन चांदी बताए जा रहे इस चढ़ावे की जांच में पुलिस को 116 पन्नों के सरकारी रिकॉर्ड और सीसीटीवी फुटेज मिले हैं, लेकिन मामले की तस्वीर अभी साफ नहीं हुई है। ALSO READ: भारत के दुश्मन हैं CEC ज्ञानेश कुमार, SIR पर CJP नेता अभिजीत दीपके ने भी खोला मोर्चा

श्राइन बोर्ड के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के बयान अब भी दर्ज होना बाकी हैं। अदालत ने जांच पूरी करने के लिए पुलिस को और समय देते हुए अगली सुनवाई 10 अक्टूबर तय की है।

 

मामले की ताजा स्थिति यह है कि पुलिस ने अदालत को बताया है कि उसे चढ़ावे के संग्रह, छंटाई, भंडारण, परिवहन और प्रसंस्करण से जुड़े 116 पन्नों के सरकारी रिकॉर्ड, पर्याप्त सीसीटीवी फुटेज और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य मिल चुके हैं। इनकी जांच और आपसी मिलान किया जा रहा है। हालांकि, श्राइन बोर्ड के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के बयान अभी दर्ज नहीं किए गए हैं, जिन्हें पुलिस ने व्यापक जांच के लिए जरूरी बताया है।

 

पुलिस के अनुसार श्राइन के पुजारियों, बोर्ड अधिकारियों, भवन में तैनात सीआरपीएफ कर्मियों, जम्मू कश्मीर पुलिस और सुरक्षा कर्मियों के बयान दर्ज किए जा चुके हैं। वहीं वरिष्ठ अधिकारियों से जुड़े बयान और कुछ अहम रिकॉर्ड अभी जांच के दायरे में हैं। गौरतलब है कि शिकायत को चार महीने से अधिक समय हो चुका है, लेकिन अब तक एफआईआर दर्ज किए जाने की पुष्टि अदालत में दाखिल स्थिति रिपोर्ट में नहीं है। ALSO READ: आजमगढ़ में महामृत्युंजय जाप के दौरान पत्नी-बेटे और 2 पंडितों को गोलियों से भूना, एनकाउंटर में ढेर

 

विवाद के केंद्र में करीब 20 टन ‘सफेद धातु’ है, जिसे चांदी का चढ़ावा बताया गया। हालांकि, चांदी की वास्तविक शुद्धता और कथित वित्तीय नुकसान से जुड़े दावों को अभी जांच का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। अदालत ने दस्तावेजों, सीसीटीवी और अन्य साक्ष्यों की विस्तृत पड़ताल पूरी करने के लिए पुलिस को समय दिया है। अब 10 अक्टूबर की सुनवाई में जांच की प्रगति पर नजर रहेगी।