Justice Ujjal Bhuyan: ‘वोटिंग से वंचित करने वाली कोई भी प्रक्रिया मनमानी’; SIR विवाद पर बोले जस्टिस उज्ज्वल भुइयां

SIR Row: सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने रविवार (4 अक्टूबर) को कहा कि लाखों भारतीय नागरिकों को उनके मताधिकार से वंचित करने वाली कोई भी प्रक्रिया मूल रूप से मनमानी और संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि इस तरह की प्रक्रिया को किसी भी तरह की दलीलों के जरिये उचित नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने कहा कि ऐसी प्रक्रिया संवैधानिक व्यवस्था को नकारती है। जस्टिस भुइयां ने कहा कि चाहें अरबपति हो या रिक्शा चलाने वाला हो। दोनों के वोट की कीमत बराबर होती है।

जस्टिस भुइयां रविवार को हैदराबाद में NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के एक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। यह टिप्पणी भारतीय चुनाव आयोग (ECI) द्वारा वोटर लिस्ट के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविजन’ (SIR) को लेकर चल रहे विवाद के बीच आई है।

‘मताधिकार से वंचित करने वाली कोई भी प्रक्रिया भारतीय संविधान का सीधा उल्लंघन होगी’

जस्टिस भुइयां ने ‘नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ’ में आयोजित 19वीं जस्टिस बोध राज साहनी मेमोरियल मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन कार्यक्रम में कहा कि भारत का संविधान नागरिकों को दो वर्गों में नहीं बांटता, जिनमें से एक वर्ग मताधिकार प्राप्त हो और दूसरा मताधिकार से वंचित हो। उन्होंने कहा कि व्यापक पैमाने पर भारतीय नागरिकों को मताधिकार से वंचित करने वाली कोई भी प्रक्रिया भारतीय संविधान के आर्टिकल 326 और 14 का सीधा उल्लंघन होगी।

उन्होंने कहा, “यदि किसी प्रक्रिया के परिणामस्वरूप अनगिनत भारतीय नागरिक अपने ही देश में दोयम दर्जे के नागरिक बन जाएं और उनके पास मतदान का अधिकार न रहे, तो ऐसी प्रक्रिया पूरी तरह से मनमानी है। किसी भी तरह की दलीलों से इसे उचित नहीं ठहराया जा सकता।” उन्होंने कहा, “यह संविधान के मूल ढांचे पर हमला करती है और मैं तो यहां तक कहूंगा कि यह उस संवैधानिक व्यवस्था का उल्लंघन है, जिसे हमने भारत के संविधान के तहत अपनाया है।”

ब्रिटिश शासन का किया जिक्र

जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा कि भारतीय नागरिकों का मतदान का अधिकार देश में ब्रिटिश शासन के खिलाफ लंबे संघर्ष से गहराई से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि यह लंबे संघर्ष और बलिदान के बाद हासिल की गई स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति है और संविधान के आर्टिकल 326 के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ नहीं की जा सकती।

‘संविधान से ऊपर कोई नहीं’

जस्टिस भुइयां ने आगे कहा, “ऐसा करने का अधिकार किसी भी प्राधिकार को नहीं है। कोई भी अदालत इसे मंजूरी या मान्यता नहीं दे सकती। संविधान से ऊपर कोई नहीं है।” उन्होंने कहा कि मतदान का अधिकार या मतदाता होने का अधिकार महज एक वैधानिक अधिकार नहीं है, जो जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 जैसे संसदीय कानून से प्राप्त होता है। बल्कि यह एक संवैधानिक अधिकार है, जो स्वयं लोकतंत्र का एक विशिष्ट और अभिन्न हिस्सा है। उन्होंने कहा कि इस तरह, यह भारतीय संविधान के मूल ढांचे के दायरे में आता है।

सुप्रीम कोर्ट का दिया हवाला

पीटीआई के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी नागरिक के मतदान के अधिकार को संविधान के आर्टिकल 326 के प्रावधान से अलग नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि किसी नागरिक का मतदाता बनने और मतदान करने का अधिकार अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव की आधारशिला है।

‘वोटर लिस्ट में दर्ज किसी नाम को हटाने की अनुमति नहीं’

जस्टिस भुइयां कहा कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 22 वोटर लिस्ट में दर्ज किसी नाम को हटाने की अनुमति देती है। लेकिन ऐसा तभी किया जा सकता है जब संबंधित मतदाता को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिया गया हो। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य फैसले का हवाला देते हुए कहा कि उच्चतम न्यायालय ने मतदाताओं के नाम हटाने के मामलों में अपनाए जाने वाले दिशानिर्देश निर्धारित किए हैं।

‘सबसे ऊंचा पद राष्ट्रपति का नहीं, बल्कि नागरिक का होता’

जस्टिस भुइयां कहा कि मृत व्यक्ति के मामले को छोड़कर, वोटर लिस्ट में दर्ज किसी वोटर का नाम बिना पूर्व सूचना दिए और उसका पक्ष सुने बिना हटाया नहीं जा सकता। उन्होंने कहा, “एक भारतीय नागरिक के रूप में उसकी पहचान से मतदान का अधिकार या मतदाता सूची में शामिल होने का अधिकार अलग नहीं किया जा सकता। ऐसा करना शरीर से आत्मा निकालने के समान होगा।”

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जस्टिस भुइयां ने कहा कि अमेरिकी जज जस्टिस फ्रैंकफर्टर ने यह विचार व्यक्त किया था कि लोकतंत्र में सबसे ऊंचा पद राष्ट्रपति का नहीं, बल्कि नागरिक का होता है। उन्होंने कहा, “मैं खुद से सवाल करता हूं कि अपने मतदान के अधिकार से वंचित नागरिक की आखिर क्या हैसियत रह जाती है?”

SIR प्रक्रिया में गड़बड़ियों पर ECI का जवाब! ‘असहमति सामान्य प्रक्रिया…’; 10 महीने के सवालों पर चुनाव आयोग ने क्या-क्या कहा?

ECI response SIR Row: चुनाव आयोग ने पिछले 10 महीनों के दौरान इलेक्शन क (ECI) के भीतर उठाई गई कथित आपत्तियों और अलग-अलग टिप्पणियों को लेकर बुधवार (23 सितंबर) को विस्तृत प्रेस नोट जारी कर विस्तृत जवाब दिया। चुनाव आयोग ने कहा कि लिखित नोट, टिप्पणियां, तकनीकी सुझाव और आंतरिक जांच-पड़ताल बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था की सामान्य कार्यप्रणाली का हिस्सा हैं। ECI ने कहा कि आयोग संविधान के आर्टिकल 324, वैधानिक नियमों और स्थापित संस्थागत परंपराओं के तहत काम करता है। उसके सभी कदम कानून और आयोग के निर्देशों के अनुरूप हैं। SIR प्रक्रिया में गड़बड़ियों पर 2 चुनाव आयुक्त की आपत्ति के बारे में ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग ने प्रेस नोट जारी किया है।

‘अलग-अलग राय विमर्श का सामान्य हिस्सा’

चुनाव आयोग ने कहा, “किसी भी संस्था में अंतिम फैसला लेने से पहले अलग-अलग विचार और टिप्पणियां सामने आना सामान्य प्रक्रिया है।” आयोग के मुताबिक, “सिर्फ तीनों चुनाव आयुक्त ही नहीं, बल्कि आयोग का हर अधिकारी चुनाव प्रक्रिया को बेहतर बनाने के लिए अपने सुझाव देने के लिए अधिकृत है।” ECI ने कहा कि सदस्यों की ओर से ड्राफ्ट स्तर पर उठाए गए ऑपरेशनल सवाल या सुझाव चुनाव प्रक्रिया और मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा के उद्देश्य से प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं।

‘हर अधिकारी अपने सुझाव देने के लिए पूरी तरह से अधिकृत है’

चुनाव आयोग ने बयान में कहा, “किसी भी संस्था में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय और टिप्पणियां होना सामान्य बात है। ये अंतिम फैसला लेने से पहले निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं। न केवल तीनों कमिश्नर, बल्कि आयोग का हर अधिकारी चुनावी व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए आयोग को अपने सुझाव देने के लिए पूरी तरह से अधिकृत है।”

10 महीनों के दौरान क्या-क्या हुआ?

ECI ने कहा, “10 महीनों के दौरान की कुछ खास आंतरिक टिप्पणियों/अवलोकनों को उजागर करना, जबकि बड़ी संख्या में मंजूरियों, फैसलों, निर्देशों और पहलों को नजरअंदाज करना, तस्वीर का केवल एक हिस्सा ही दिखाता है। हाल के महीनों में आयोग ने कई फैसले लिए हैं, निर्देश जारी किए हैं, लगभग 40 नई पहलें शुरू की हैं और देश भर में मतदाता सूची संशोधन (SIR सहित) के संचालन सहित कई चुनावी सुधार किए हैं। ये सभी फैसले पिछले एक साल में पूरे आयोग के सर्वसम्मत फैसलों का परिणाम हैं।”

‘सिर्फ कुछ आंतरिक नोट्स से पूरी तस्वीर नहीं बनती’

आयोग ने कहा कि 10 महीने की अवधि में सामने आए कुछ खास आंतरिक नोट्स और टिप्पणियों को अलग से देखने से पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। ECI के मुताबिक, हाल के महीनों में आयोग ने कई फैसले लिए, निर्देश जारी किए और करीब 40 नई पहल शुरू कीं। इनमें देशभर में मतदाता सूची पुनरीक्षण, जिसमें SIR भी शामिल है, जैसे चुनावी सुधार और प्रक्रियाएं शामिल हैं। आयोग ने दावा किया कि पिछले एक साल में लिए गए ये सभी फैसले पूर्ण आयोग के सर्वसम्मत निर्णयों का परिणाम हैं।

कई राज्यों में चुनाव कराने का भी जिक्र

प्रेस नोट में चुनाव आयोग ने हाल में बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी, असम और पश्चिम बंगाल में कराए गए प्रमुख चुनावों का भी उल्लेख किया। आयोग ने कहा कि इन चुनावों के संचालन में बड़े पैमाने पर प्रशासनिक और ऑपरेशनल मशीनरी लगी और इस दौरान आयोग की ओर से कई मंजूरियां और निर्देश जारी किए गए।

ECINet और डेटा सुरक्षा पर भी सफाई

डिजिटल प्लेटफॉर्म ECINet को लेकर भी आयोग ने अपना पक्ष रखा। ECI ने कहा कि उसके डिजिटल प्लेटफॉर्म सख्त डेटा सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत काम करते हैं, जिनका उद्देश्य अनधिकृत छेड़छाड़ और डेटा में हेरफेर को रोकना है। आयोग ने कहा कि IT सुरक्षा जांच और ऑडिट नियंत्रण राष्ट्रीय स्तर के डेटाबेस में अपनाए जाने वाले सामान्य साइबर सुरक्षा उपाय हैं।

‘संवैधानिक जिम्मेदारियों के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध’

प्रेस नोट के अंत में चुनाव आयोग ने कहा कि वह अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों को पूरी ईमानदारी के साथ निभाने के लिए प्रतिबद्ध है और लोकतंत्र को मजबूत करने में अपनी भूमिका को महत्वपूर्ण मानता है। यह प्रेस नोट चुनाव आयोग के डिप्टी डायरेक्टर पी. पवन की ओर से जारी किया गया है।

अखबार की रिपोर्ट में क्या है?

‘इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि वोटर लिस्ट के SIR के दौरान 10 महीने में 14 बार दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के कदमों पर आपत्ति जताई थी। इसके बाद अधिकारियों का यह बयान आया है। अखबार ने खबर दी है कि तीन सदस्यीय निर्वाचन आयोग (ECI) के भीतर ही मतदाता सूचियों के स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (SIR)र से जुड़े मुद्दों पर बार-बार सवाल उठाए गए। खबर के अनुसार, तीन में से दो निर्वाचन आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कई बार इन मुद्दों को उठाया।

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अंग्रेजी दैनिक की खबर में कहा गया कि एसआईआर के देशव्यापी क्रियान्वयन की निगरानी तीनों निर्वाचन आयुक्तों की देखरेख में हो रही है। हालांकि, संधू और जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आधिकारिक रिकॉर्ड पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि ये आपत्तियां उन फैसलों और आदेशों को लेकर थीं, जिन्हें उनकी जानकारी के बिना लिया गया या जारी किया गया था। इनमें से चार आपत्तियां एक ही दिन दर्ज की गईं। विपक्षी दलों ने एसआईआर को लेकर निर्वाचन आयोग की आलोचना की है। उनका दावा है कि इसका उद्देश्य उन मतदाताओं को निशाना बनाना था, जो BJP और उसके सहयोगी दलों के साथ नहीं हैं।