टाटा संस की लिस्टिंग टालने के लिए टाटा ट्रस्ट का बड़ा कदम, दो कंपनियों के मर्जर का प्रस्ताव रखा

टाटा ट्रस्ट (Tata Trusts) ने टाटा संस की संभावित लिस्टिंग को टालने के लिए बड़ा प्रस्ताव रखा है। इसके तहत Tata Electronics Systems Solutions Private Limited (TESS) और Tata Consulting Engineers (TCE) का Tata Sons में मर्जर किया जाएगा।

इसका मकसद Tata Sons को NBFC और कोर इनवेस्टमेंट कंपनी यानी CIC की नियामकीय कैटेगरी से बाहर लाना है। प्रस्ताव को Tata Sons के बोर्ड और RBI की मंजूरी मिलना जरूरी है।

Tata Sons को क्या फायदा होगा?

Tata Trusts के पास Tata Sons की करीब 66% हिस्सेदारी है। ट्रस्ट ने कंपनी के बोर्ड से इस प्रस्ताव को मंजूरी देने और RBI से जरूरी NOC लेने के लिए आवेदन करने को कहा है।

अगर प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है तो Tata Sons अनलिस्टेड प्राइवेट कंपनी बनी रह सकेगी। यह इसलिए अहम है क्योंकि RBI ने इसी महीने Tata Sons की CIC के तौर पर रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने की अर्जी खारिज कर दी थी।

अपर लेयर NBFC के तौर पर Tata Sons पर कई अतिरिक्त नियम लागू होते हैं। इसमें कंपनी की शेयर मार्केट में अनिवार्य लिस्टिंग भी शामिल है।

दो कंपनियों के विलय से क्या बदलेगा?

यह Tata Sons का ब्रेकअप या डीमर्जर नहीं है। इसके उलट दो ऑपरेटिंग कंपनियों को Tata Sons में मिलाया जाएगा।

Tata Trusts के मुताबिक, 31 मार्च 2026 के आंकड़ों के आधार पर विलय के बाद Tata Sons की ऑपरेटिंग रेवेन्यू ₹1,05,043 करोड़ होता। वहीं, फाइनेंशियल एसेट्स से इनकम ₹40,072 करोड़ होती।

इस तरह कुल इनकम में ऑपरेटिंग रेवेन्यू की हिस्सेदारी 64.3% होती। Tata Trusts का कहना है कि इस स्थिति में टाटा संस RBI के प्रिंसिपल बिजनेस क्राइटेरिया के तहत NBFC नहीं होगी।

CIC की कैटेगरी से भी बाहर आएगी

इस प्रस्ताव का दूसरा मकसद Tata Sons को CIC की परिभाषा से बाहर लाना है। मर्जर के बाद कंपनी की कुल नेट एसेट्स ₹2,00,158 करोड़ होंगी। इसमें ₹1,77,120 करोड़ यानी करीब 88.5% हिस्सा ग्रुप कंपनियों में निवेश का होगा।

CIC के लिए 90% की सीमा लागू होती है। प्रस्तावित ढांचे में यह अनुपात 90% से नीचे रहेगा। इसलिए Tata Trusts के मुताबिक, Tata Sons CIC की कैटेगरी में नहीं आएगी।

Tata Sons फिर सीधे कारोबार करेगी

मर्जर के बाद Tata Sons सिर्फ होल्डिंग कंपनी नहीं रहेगी। वह सीधे कारोबार भी करेगी। Tata Trusts का कहना है कि इससे Tata Sons अपने पुराने मॉडल की तरफ लौटेगी। कंपनी के करीब 100 साल के इतिहास में लगभग 80 साल तक Tata Sons के पास अपने ऑपरेटिंग बिजनेस और रेवेन्यू थे।

इसी रेवेन्यू से ग्रुप के नए कारोबारों को आगे बढ़ाने में मदद मिलती थी। Tata Consultancy Services यानी TCS भी 2004 में अलग कंपनी बनने से पहले Tata Sons की ही एक डिविजन थी।

RBI की मंजूरी जरूरी

इस प्रस्ताव को लागू करना आसान नहीं होगा। इसके लिए RBI की मंजूरी जरूरी है। ऑपरेटिंग और नॉन-फाइनेंशियल कंपनियों का NBFC के साथ विलय होने की वजह से RBI के Non-Banking Financial Companies-Voluntary Amalgamation Directions, 2025 के नियम लागू होंगे।

Tata Sons को पहले RBI से NOC लेना होगा। मर्जर पूरा होने के बाद अगर कंपनी CIC की कैटेगरी में नहीं रहती है तो उसे अपना रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट सरेंडर करना होगा।

Tata Trusts ने क्या कहा?

Tata Trusts का कहना है कि यह रीस्ट्रक्चरिंग टाटा ग्रुप और उसके शेयरहोल्डर्स के हित में है। ट्रस्ट के मुताबिक, इससे Tata Sons को अनलिस्टेड प्राइवेट कंपनी के तौर पर बनाए रखने का रास्ता खुल सकता है।

ट्रस्ट ने जुलाई 2025 में Sir Dorabji Tata Trust और Sir Ratan Tata Trust के बोर्ड से पास हुए प्रस्तावों का भी जिक्र किया है। दोनों ट्रस्ट के बोर्ड ने Tata Sons का अनलिस्टेड प्राइवेट कंपनी का दर्जा बनाए रखने के लिए हर मुमकिन प्रयास करने की बात कही थी।

Tata Trusts के मुताबिक, इस बदलाव से टाटा ग्रुप की करीब 100 साल पुरानी संरचना बनी रहेगी। साथ ही, लंबे समय के निवेश, राष्ट्र निर्माण और परोपकारी कामों पर ग्रुप का फोकस भी जारी रहेगा।

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Sunday Bank Open: अगले संडे 27 सितंबर को खुले रहेंगे ये सारे बैंक, नेशनल से लेकर रीजनल के लिए RBI ने दिया ये अप्रूवल

Sunday Bank Open: बैंकों से जुड़ी बड़ी खबर आ रही है। अगले रविवार यानी 27 सितंबर को बैंकों की सभी शाखाएं खुली रहेंगी। आरबीआई ने सभी सरकारी बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (आरआरबी) को अपनी सभी शाखाएं संडे यानी 27 सितंबर को खुला रखने का निर्देश दिया है। यह ग्राहकों को बड़ी राहत देने वाली खबर है।

बैंकों में 28 सितंबर से 30 सितंबर तक हड़ताल

सरकारी बैंकों ने इस महीने 28 से लेकर 30 तारीख तक हड़ताल का ऐलान किया है। इसका मतलब है कि 28 सितंबर यानी सोमवार से लेकर 30 सितंबर बुधवार तक सरकारी बैंकों की सभी शाखाओं में कामकाज नहीं होगा। यह हड़ताल 3 दिन की है। इस वजह से बड़ी संख्या में लोगों को दिक्कत का सामना करना पड़ सकता है।

27 सितंबर यानी अगले रविवार को बैंकों में सामान्य कामकाज होगा

यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (UFBU) ने इस हड़ताल का ऐलान किया है। चूंकि, 26 सितंबर को शनिवार और 27 सितंबर को रविवार है, जिससे औपचारिक रूप से दोनों दिन बैंक बंद रहेंगे। इसकी वजह यह है कि हर महीने के चौथे शनिवार को बैंकों की सभी शाखाओं में अवकाश होता है। फिर हर रविवार को बैंक बंद रहते हैं। अगर हड़ताल के तीन दिन शामिल कर लिए जाए तो इसका मतलब है कि बैंक लगातार पांच दिन तक बंद रहते।

RBI ने सरकारी बैंकों और RRB को अगले संडे को ब्रांच खुला रखने की दी इजाजत

बैंकों के ग्राहकों को असुविधा से बचाने के लिए RBI ने सभी सरकारी बैंकों (PSU Banks) और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (RRB) को अपनी सभी शाखाएं रविवार को खुला रखने की इजाजत दी है। इसका मतलब है कि अगले रविवार यानी 27 सितंबर को सभी सरकारी और आरआरबी बैंकों की शाखाओं में सामान्य कामकाज होगा।

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सरकार ने बैंक यूनियंस से हड़ताल टालने की अपील की है

इस बीच, सरकार और बैंकों के मैनेजमेंट ने बैंक यूनियंस को इस प्रस्तावित हड़ताल को टालने की अपील की है। साथ ही तीन दिन की हड़ताल से बैंकों के ग्राहकों को होने वाली दिक्कत को कम करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। हड़ताल के दौरान भी बैंकों के एटीएम खुले रहेंगे। साथ ही सभी सरकारी बैंकों की नेट बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध रहेंगी। इसके बावजूद भी अगर किसी ग्राहक को बैंक की शाखा में जाकर कोई काम कराना है तो वह अगले संडे यानी 27 सितंबर को अपने बैंक जाकर अपना काम करा सकता है।

Bank FD Return Calcullator: इन बैंकों के FD में शानदार रिटर्न कमाने का मौका, जानिए 5 लाख के एफडी पर कितनी होगी कमाई

बैंकों के फिक्स्ड डिपॉजिट में निवेश काफी सुरक्षित माना जाता है। इसकी वजह यह है कि छोटे-बड़े सभी बैंकों को आरबीआई के नियमों का पालन करना पड़ता है। बैंक के एफडी जमा पैसे के रिटर्न पर शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव का असर नहीं पड़ता है। एफडी पर इंटरेस्ट रेट ऑफर करने में स्मॉल फाइनेंस बैंक सबसे आगे हैं।

सूर्योदय स्मॉल फाइनेंस बैंक का रिटर्न सबसे ज्यादा

बैंकों के एफडी स्कीम में ऑनलाइन भी निवेश किया जा सकता है। एफडी पर सबसे ज्यादा रिटर्न देने में सूर्योदय स्मॉल फाइनेंस बैंक सबसे ऊपर है। 5 साल के एफडी पर बैंक सालाना 8.25 फीसदी का इंटरेस्ट रेट ऑफर कर रहा है। इस बैंक में एक साल के एफडी पर इंटरेस्ट रेट सालाना 7.25 फीसदी है। जना स्माॉल फाइनेंस बैंक 3 साल के एफडी पर सबसे ज्यादा 8 फीसदी इंटरेस्ट रेट ऑफर कर रहा है।

उत्कर्ष स्मॉल फाइनेंस बैंक भी 7.5% इंटरेस्ट ऑफर कर रहा

ईसॉफ स्मॉल फाइनेंस बैंक 3 साल और 1 साल के एफडी पर 6 फीसदी इंटरेस्ट रेट ऑफर कर रहा है। उत्कर्ष स्मॉल फाइनेंस बैंक 3 साल के एफडी पर 7.5 फीसदी इंटरेस्ट रेट ऑफर कर रहा है। उज्जीवन स्मॉल फाइनेंस बैंक 1 साल और 3 साल के एफडी पर 7.25 फीसदी का इंटरेस्ट रेट ऑफर कर रहा है। शिवालिक स्मॉल फाइनेंस बैंक 3 साल के एफडी पर 7.5 फीसदी इंटरेस्ट रेट ऑफर कर रहा है। खास बात यह है कि ज्यादातर स्मॉल फाइनेंस बैंक सीनियर सिटीजंस को 0.50 फीसदी ज्यादा इंटरेस्ट रेट ऑफर करते हैं।

सूर्योदय स्मॉल फाइनेंस बैंक में 5 साल के एफडी पर इंटरेस्ट रेट 8.25 फीसदी

जना स्मॉल फाइनेंस बैंक में 3 साल के एफडी पर 8 फीसदी इंटरेस्ट रेट

ईसॉफ स्मॉल फाइनेंस बैंक में 3 साल और 1 साल के एफडी पर 6 फीसदी इंटरेस्ट

उज्जीवन स्मॉल फाइनेंस बैंक में 1 और 3 साल के एफडी पर 7.25 फीसदी इंटरेस्ट रेट

शिवालिक स्मॉल फाइनेंस बैंक में 3 साल के एफडी पर 7.5 फीसदी इंटरेस्ट रेट

बैंक ऑफ इंडिया की इस स्कीम में 6.85% इंटरेस्ट रेट

सरकारी बैंकों में सबसे ज्यादा 6.85 फीसदी इंटरेस्ट रेट बैंक ऑफ इंडिया ऑफर कर रहा है। बैंक यह इंटरेस्ट रेट अपनी ग्रीन डिपॉजिट स्कीम के तहत ऑफर कर रहा है। इस स्कीम में 999 दिन के एफडी पर सालाना 6.85 फीसदी इंटरेस्ट रेट कमाया जा सकता है। सीनियर सिटीजंस के लिए इस स्कीम में इंटरेस्ट रेट 7.35 फीसदी और सुपर सीनियर सिटीजंस के लिए 7.50 फीसदी है। 60 साल से ज्यादा उम्र के लोग सीनियर सिटीजंस के तहत आते हैं। 80 साल और इससे ज्यादा उम्र के लोग सुपर सीनियर सिटीजंस कैटेगरी में आते हैं।

5 लाख रुपये के निवेश पर इतना मिलेगा रिटर्न 

अगर आप लाख रुपये का निवेश सूर्योदय स्मॉल फाइनेंस बैंक के एफडी में करते हैं तो 8.25 फीसदी के इंटरेस्ट रेट से 5 साल में आपका पैसा बढ़कर 7,52,132 रुपये हो जाएगा। इसमें इंटरेस्ट का 2,52,132 रुपये शामिल है। इसी तरह अगर आप बैंक ऑफ इंडिया की ग्रीन डिपॉजिट स्कीम में 5 लाख रुपये का निवेश 999 दिन के लिए करते हैं तो 6.85 इंटरेस्ट रेट से आपका पैसा बढ़कर 7,02,193 रुपये हो जाएगा।

Banks vs NBFCs: 5 वजहों से बैंकिंग शेयरों की चमक फीकी, एनबीएफसी ने मारी बाजी

Banks vs NBFCs: लोन बुक में बढ़ोतरी, एसेट क्वालिटी की मजबूती बने रहने और बैड लोन के रिकॉर्ड निचले स्तर के आस-पास होने के बावजूद बड़े बैकों के शेयर निवेशकों को लुभा नहीं पा रहे। वहीं नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनीज (NBFC) को लेकर निवेशकों की काफी दिलचस्पी दिख रही है। सैमको सिक्योरिटीज के सीईओ और फाउंडर जिमीत मोदी का कहना है कि इसका मतलब यह नहीं है कि बैंकों का मैनेजमेंट खराब है बल्कि बैंकिंग सेक्टर के हालात बदल गए हैं। उन्होंने इसके पीछे की पांच अहम वजह बताई है, जिसके बारे में नीचे दिया जा रहा है।

घट रहे बैंकों के रिटर्न

बड़े प्राइवेट बैंकों के शेयरहोल्डर्स का रिटर्न अब कम हो रहा तो दिग्गज एनबीएफसी में RoE (रिटर्न ऑन इक्विटी) बढ़ रहा है। लंबे समय तक बैंकों का RoE मजबूत बना रहा क्योंकि उनके पसा बड़ा डिपॉजिट बेस था, जिसके दम पर वे शेयरहोल्डर्स के निवेश की तुलना में अधिक लोन बांट पाते थे तो दूसरी तरफ एनबीएफसी को यह सुविधा नहीं थी और उन्हें अपनी पूंजी पर निर्भर रहना पड़ता था। हालांकि अब लेंडिंग मार्जिन कम होने से अधिक लेवरेज का असर बैंकों के RoE पर निगेटिव दिखने लगा तो बेहतर मार्जिन और कम लेवरेज वाली NBFCs का रिटर्न बेहतर बना हुआ है।

रेपो-लिंक्ड लोन ने बढ़ाई बैंकों की दिक्कत

फरवरी 2025 से आरबीआई ने रेपो रेट में 125 बेसिस पॉइंट्स की कटौती की है। बैंकों के लगभग 60% लोन इसी रेट से जुड़े होते हैं तो रेपो रेट कम होने से इनकी ब्याज दर लगभग तुरंत कम हो गईं। वहीं डिपॉजिट के मामले में स्थिति थोड़ी अलग है क्योंकि इनकी दरें तभी बदलती हैं, जब वे मैच्योर होते हैं, जिसमें आमतौर पर छह से बारह महीने लगते हैं। ऐसे में बैंकों की इनकम पहले घटी, जबकि लागत बाद में कम हुई। वहीं नॉन-बैंक लेंडर्स यानी NBFCs के मामले में स्थिति बिल्कुल उल्टी रही। उनके अधिकतर लोन फिक्स्ड रेट वाले होते हैं, जैसे- ऑटो, गोल्ड और SME लोन। ऐसे में उनकी इनकम कम नहीं हुई और लोन के लिए फंड जुटाने की लागत कम हो गई। इस तरह रेपो रेट में कटौती का असर बिल्कुल अलग-अलग दिखा और इसने मार्जिन में फर्क डाल दिया।

कमजोर हो रही बैंकों की डिपॉजिट

दशकों तक बैंकों को कम लागत वाली सेविंग्स डिपॉजिट मिल जा रही थी लेकिन अब स्टॉक्स और म्यूचुअल फंड जैसे मार्केट से जुड़े प्रोडक्ट्स में पैसा जाने लगा तो बैंकों का डिपॉजिट्स बेस कमजोर पड़ा। इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 के मुताबिक परिवारों की बचत का बैंकों में जमा हिस्सा FY12 में 57.9% से घटकर FY25 में 35.2% रह गया। ऐसे में बैंकों के लिए बॉन्ड्स और CD (सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट) इत्यादि की जरूरत बढ़ने लगी जिनकी फंडिंग लागत मार्केट से जुड़ी है। एनबीएफसी भी इसी तरीके से पैसे जुटाते हैं।

कुछ एरिया में बैंकों से आगे NBFC

पिछले कुछ महीनों में बैंकों की लोन ग्रोथ एनबीएफसी की तुलना में अधिक रफ्तार से बढ़ी लेकिन इस ग्रोथ का एक बड़ा हिस्सा बड़े कॉरपोरेट से जुड़ा है, जहां मार्जिन कम है और कीमत बॉन्ड मार्केट से तय होती है। इसके अलावा एनबीएफसी को भी बैंकों का लोन तेजी से बढ़ रहा है। एनबीएफसी की बात करें तो गोल्ड लोन, पुरानी गाड़ियों से जुड़े लोन, अफोर्डेबल हाउसिंग से जुड़े लोन और छोटे बिजनेसेज के लोन के मामले में यह आगे है। इन सेगमेंट में सही फैसला लेने, स्थानीय जानकारी और लोन वसूली की क्षमता की जरूरत होती है, और NBFC ने इन मामलों में बढ़त हासिल कर ली है।

लीडरशिप में बदलाव

प्राइवेट बैंकों के चीफ एग्जीक्यूटिव का एक कार्यकाल तय होता है, जिस पर आरबीआई मंजूरी लेनी होती है। चूंकि कई लीडरशिप कार्यकाल एक ही समय के आसपास तय किए गए थे, इसलिए अब उनमें से कई लगभग एक साथ खत्म हो रहे हैं। इस वजह से 2026 में प्राइवेट और पब्लिक सेक्टर के बैंकों में बड़ी संख्या में लीडरशिप में बदलाव हो रहे हैं। लीडरशिप में बदलाव से बड़े फैसलों में देरी हो सकती है। नए सीईओ के पद संभालने तक बैंक कई अहम फैसलों को टाल सकते हैं तो नए सीईओ भी आते ही तुरंत आक्रामक तौर पर काम करने लगें, ऐसा जरूरी भी नहीं। बैंकिंग स्टेबिलिटी के लिए ये नियम जरूरी हैं, लेकिन लीडरशिप में बदलाव के समय बैंकों को लेकर निवेशक अधिक सतर्क होने लगते हैं।

क्या करना चाहिए निवेशकों को

निवेशकों की पसंद में बदलाव स्टॉक मार्केट में भी दिखने लगा है। एक साल में निफ्टी बैंक 3.51% मजबूत हुआ है लेकिन निफ्टी फाइनेंशिल सर्विसेज 2.5% कमजोर हुआ है। हालांकि अगर निफ्टी फाइनेंशियल सर्विसेज में से बैंकों को निकाल दें तो यह एक साल में 6.77% मजबूत हुआ। जिमीत मोदी के मुताबिक जहां बैंकों का क्रेडिट मॉडल काम नहीं कर पा रहा, वहां एनबीएफसी की मौजूदगी इसकी कमाई को सपोर्ट दे रही। हालांकि उनका यह भी मानना है कि इसमें अधिकतर फायदा साइक्लिकल है और इसमें बदलाव हो सकता है। बैंकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती स्ट्रक्चरल है। अब आम लोग अपनी बचत बैंकों की बजाय मार्केट-लिंक्ड प्रोडक्ट्स में डाल रहे हैं। जिमीत के मुताबिक ऐसे समय में निवेशकों को सिर्फ लोन ग्रोथ की बजाय बैंकों के लोन यील्ड और कम लागत वाले डिपॉजिट के हिस्से पर ध्यान देना चाहिए।

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SBI Loan Recovery: विधवा पत्नी की एफडी से बैंक ने गुपचुप की पति के लोन की वसूली, हाईकोर्ट ने सुनाया ब्याज सहित पैसा लौटाने का फैसला

SBI Loan Recovery: लखनऊ स्थित स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बैंक (SBI) से जुड़ा एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। यहां की एक एसबीआई ब्रांच ने पति की असमय मृत्यु के बाद पत्नी की निजी एफडी गुपचुप तरीके से तुड़वा कर लोन की बकाया रकम काट ली। इस मामले में इलाहाबाद हाईकोट की लखनऊ बेंच ने बैंक को कड़ी फटकार लगाई और महिला को ब्याज सिहत रकम लौटाने का आदेश दिया है। अपनी टिप्पणी में अदालत ने बैंक के इस रवैये को ‘बैंकिंग नीति का घृणित उल्लंघन’ भी बताया। इस मामले ने एक बार फिर बैंक पर ग्राहकों के अटूट भरोसे पर सवाल खड़े किए हैं।

बैंक ने सीज किया वेतन खाता

यह मामला लखनऊ के रिंग रोड स्थित मेडिसिन अस्पताल में सहायक प्रोफेसर की पत्नी नेहा मिश्रा से जुड़ा हुआ है। नेहा के पति ने नवंबर 2020 में एसबीआई से 15 लाख रुपए का पर्सनल लोन लिया था। दुर्भाग्यवश, कोविड संक्रमण के कारण मई 2021 में उनके पति का निधन हो गया। न्यूज 18 की खबर के अनुसार, बैंक ने सितंबर 2025 में एसबीआई ने नेहा मिश्रा को कानूनी नोटिस भेजा और 13.87 लाख रुपए के बकाया लोन का भुगतान करने की मांग की। हालांकि, आरबीआई लोकपाल के हस्तक्षेप के बाद यह रोक हटा दी गई। अभी बैंक और महिला के बीच बकाया लोन भुगतान पर बातचीत चल रही थी। लेकिन इसी बीच एसबीआई ने गुपचुप तरीके से महिला की फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) भुना ली और उसमें से 19.90 लाख रुपए कर्ज के नाम पर डेबिट कर लिए।

नेहा मिश्रा ने किया हाईकोर्ट का रुख

बैंक की इस हरकत का पता चलने के बाद पीड़िता नेहा मिश्रा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच का रुख किया। मिश्रा की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि मृत प्रोफेसर की पत्नी न तो इस लोन की सह-उधारकर्ता थीं और न ही गारंटर, जमानतदार, क्षतिपूर्तिकर्ता या नॉमिनी। कर्ज के इस लेनदेन में उन्होंने बैंक के साथ किसी भी तरह का करार नहीं किया था। इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी गौर किया कि कर्ज एक बीमा पॉलिसी से कवर था, जिसके लिए मृतक ने प्रीमियम का भुगतान किया था।

अदालत ने एसबीआई को लताड़ लगाते हुए कहा कि बैंक यह साबित करने में पूरी तरह असफल रहा कि किस कानूनी प्रावधान के तहत उसने पति के कर्ज की भरपाई के लिए पत्नी के निजी खाते से रकम काटी है। कोर्ट ने एसबीआई को महिला का पूरा पैसा एफडी के लागू ब्याज दर के साथ चार हफ्ते के भीतर वापस करने का आदेश दिया। साथ ही बैंक को 1 लाख रुपए का दंडात्मक मुआवजा देने का भी निर्देश दिया। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि बैंक अपने ग्राहकों के धन के संरक्षक होते हैं और जनता के पैसों को एक ट्रस्ट के रूप में रखते हैं।

बैंक का गुपचुप वसूली का तरीका ग्राहक अधिकारों का हनन

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में दो टूक कहा कि यदि बैंक कानूनन मृतक के कर्ज की वसूली उसकी पत्नी से कानूनी उत्तराधिकारी के रूप में करने का हकदार था, तब भी इसके लिए कानून सम्मत प्रक्रिया अपनानी जरूरी थी। इस तरह रातोंरात गुपचुप तरीके से और मनमाने ढंग से किसी के खाते से पैसे काट लेना पूरी तरह अवैध है।

Rupee vs Dollar: फेड के इंटरेस्ट रेट बढ़ाने से गिरा रुपया, जुलाई के बाद पहली बार 96 के लेवल के पार पहुंचा

Rupee vs Dollar: अमेरिका में इंटरेस्ट रेट बढ़ने का असर 17 सितंबर को रुपये पर दिखा। डॉलर के मुकाबले यह 96 के मनोवैज्ञानिक स्तर के पार हो गया। जुलाई के बाद पहली बार रुपया इस लेवल पर पहुंचा है। डॉलर के मुकाबले रुपया 96.03 के लेवल पर चल रहा था। 16 सितंबर को यह 95.95 के लेवल पर बंद हुआ था।

अमेरिकी केंद्रीय बैंक Federal Reserve ने 16 सितंबर को इंटरेस्ट रेट बढ़ाने का ऐलान किया। फेड ने करीब तीन साल बाद इंटरेस्ट रेट 0.4 फीसदी बढ़ाया है। इतना ही नहीं फेड ने आगे भी सख्त मॉनेटरी पॉलिसी का संकेत दिया है। 25 बेसिस प्लाइंट्स बढ़ने के बाद अमेरिका में अब इंटरेस्ट रेट 3.75-4 फीसदी हो गया है।

फेडरल रिजर्व की इंटरेस्ट रेट तय करने वाली कमेटी (FOMC) की बैठक 15 सितंबर को शुरू हुई थी। इसके नतीजे भारतीय समय के मुताबिक 16 सितंबर को रात करीब 12 बजे आए। एक्सपर्ट्स का कहना है कि फेड का फैसला अनुमान के मुताबिक रहा। पहले से यह माना जा रहा था कि 16 सितंबर को अमेरिकी केंद्रीय बैंक इंटरेस्ट रेट में 25 बेसिस प्वाइंट्स का इजाफा करेगा। फेड चेयरमैन केविन वॉर्श ने पहले कहा था कि फिलहाल उनका फोकस इनफ्लेशन को कंट्रोल करने पर रहेगा।

फेड इस साल इंटरेस्ट रेट में और एक बार इजाफा कर सकता है। दरअसल, क्रूड ऑयल की कीमतों में उछाल से दुनियाभर में महंगाई बढ़ी है। इनफ्लेशन को कंट्रोल में करने के लिए बैंक ऑफ जापान (BoJ) और यूरोपियन सेंट्रल बैंक (ECB) सहित कई देशों के केंद्रीय बैंक इंटरेस्ट रेट बढ़ाने को मजबूर हुए हैं। दुनियाभर के केंद्रीय बैंक महंगाई को बढ़ने से रोकने के लिए इंटरेस्ट रेट को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं।

फेडरल रिजर्व के रेट बढ़ा देने के बाद माना जा रहा है कि आरबीआई (RBI) भी अक्तूबर की अपनी मॉनेटरी पॉलिसी में इंटरेस्ट रेट बढ़ा सकता है। आरबीआई की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की बैठक 5 अक्तूबर को शुरू होगी। तीन दिन की बैठक के बाद इसके नतीजे 7 अक्तूबर को आएंगे।

भारत में भी रिटेल इनफ्लेशन लगातार बढ़ रहा है। अगस्त में रिटेल इनफ्लेशन 4.80 से ऊपर निकल गया। यह आरबीआई के 4 फीसदी के तय लेवल से काफी ऊपर निकल चुका है। फेड के इंटरेस्ट रेट बढ़ाने का असर रुपया सहित भारतीय शेयर बाजार पर पड़ता है।

Rate Hike: त्योहारी सीजन में RBI दे सकता है झटका! बढ़ जाएगी आपकी EMI, बैंक FD पर भी पड़ेगा बड़ा असर

RBI Repo Rate Hike Expectations: अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में 25 बेसिस प्वाइंट (0.25%) की बढ़ोतरी के बाद अब सभी की नजरें भारतीय रिजर्व बैंक पर टिक गई हैं। देश में बढ़ती रिटेल इंफ्लेशन और कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों के बीच अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि आरबीआई भी अक्टूबर 2026 की MPC समीक्षा बैठक में ब्याज दरें बढ़ा सकता है।

अगर दरों में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी होती है, तो रेपो रेट 5.50% से बढ़कर 5.75% हो सकता है। आइए आपको बताते हैं कि आरबीआई यह कदम क्यों उठा सकता है और इसका आपकी होम लोन ईएमआई और फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) की दरों पर क्या असर पड़ेगा।

आरबीआई क्यों बढ़ा सकता है रेपो रेट?

अमेरिकी फेड के फैसले के अलावा भारत के आंतरिक आर्थिक हालात भी आरबीआई को सख्त रुख अपनाने पर मजबूर कर रहे हैं। अगस्त में खुदरा महंगाई बढ़कर 4.82% पर पहुंच गई जो जुलाई में 4.45% थी। अल-नीनो के कारण कमजोर मानसून, खाद्य वस्तुओं के दाम और कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के करीब पहुंचने से महंगाई 6% के ऊपरी दायरे को पार कर सकती है। अगर डॉलर के मुकाबले रुपया और कमजोर होता है, तो भारत का क्रूड ऑयल इंपोर्ट का बिल काफी बढ़ जाएगा, जिससे देश में महंगाई और बढ़ेगी।

एसबीआई, एचएसबीसी, डॉयचे बैंक और आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के अर्थशास्त्रियों का मानना है कि आरबीआई अक्टूबर और दिसंबर की बैठकों में 25-25 बीपीएस की दो किश्तों में रेपो रेट बढ़ा सकता है।

होम लोन ग्राहकों पर क्या असर पड़ेगा?

अगर आरबीआई अक्टूबर में रेपो रेट में 25 बीपीएस की बढ़ोतरी करता है, तो इसका सीधा असर आपके रिटेल लोन पर पड़ेगा। ज्यादातर होम लोन एक्सटर्नल बेंचमार्क (EBLR) से जुड़े होते हैं। रेपो रेट बढ़ते ही बैंक आपके लोन की ब्याज दरें बढ़ा देंगे।इससे अगली रीसेट डेट पर या तो आपकी मासिक EMI बढ़ जाएगी या फिर आपकी लोन चुकाने की कुल अवधि लंबी हो जाएगी।

इसे उदाहरण से समझे तो अगर आपने ₹30 लाख का होम लोन 20 साल के लिए लिया है, तो 0.25% ब्याज दर बढ़ने से आपकी ईएमआई में हर महीने ₹400 से ₹500 तक का एक्स्ट्रा इजाफा हो सकता है।

फिक्स्ड डिपॉजिट पर क्या होगा असर?

रेपो रेट बढ़ने पर अमूमन बैंक जमा दरों में भी बढ़ोतरी करते हैं, लेकिन लोन की तरह यह तुरंत लागू नहीं होता। बैंक बाजार में लिक्विडिटी, अपने एसेट-लायबिलिटी मैनेजमेंट (ALM) और फंड की जरूरतों के आधार पर ही एफडी दरों में रिवीजन करेंगे। ब्याज दरें बढ़ने पर बैंक विशेष मैच्योरिटी वाली एफडी पर ब्याज बढ़ा सकते हैं, जिससे नए एफडी निवेशकों और वरिष्ठ नागरिकों को बेहतर रिटर्न मिलने की संभावना बनेगी।

8th Pay Commission: फिटमेंट फैक्टर और पेंशन हाइक पर चंडीगढ़ में 3 दिनों का महामंथन जारी, जानिए बैठक के अपडेट्स

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Bank Holiday: कल गुरुवार को बंद रहेंगे बैंक! जानिए RBI ने क्यों दी है छुट्टी

Bank Holiday on Vishwakarma Puja: 17 सितंबर को देशभर में धूमधाम से विश्वकर्मा पूजा बनाया जाएगा। ऐसे में अगर आप भी गुरुवार को बैंक से जुड़ा कोई जरूरी काम निपटाने या शाखा जाने की योजना बना रहे हैं, तो यह खबर आपके लिए जरूरी है।

भारतीय रिजर्व बैंक की आधिकारिक बैंक हॉलिडे लिस्ट के अनुसार, 17 सितंबर को देश के सभी राज्यों में बैंक बंद नहीं रहेंगे। आरबीआई ने कुछ विशिष्ट राज्यों और सर्किलों में ही विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर बैंकों में छुट्टी घोषित की है, जबकि बाकी देश में कामकाज सामान्य दिनों की तरह जारी रहेगा। जानिए आपके शहर या राज्य में कल बैंक खुलेंगे या बंद रहेंगे।

किन राज्यों में बंद रहेंगे बैंक?

आरबीआई के छुट्टियों के कैलेंडर के मुताबिक, 17 सितंबर (गुरुवार) को मुख्य रूप से पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत के चुनिंदा राज्यों में बैंक अवकाश रहेगा:

  • झारखंड
  • पश्चिम बंगाल
  • बिहार (कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में स्थानिक छुट्टियों के अनुसार)
  • ओडिशा
  • असम और त्रिपुरा

इन राज्यों में विश्वकर्मा पूजा को बड़े पैमाने पर मनाया जाता है, इसलिए यहां सरकारी, निजी और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की शाखाएं बंद रहेंगी।

दिल्ली-यूपी समेत किन राज्यों में खुले रहेंगे बैंक?

इन राज्यों के अलावा देश के अन्य सभी हिस्सों में बैंक पूरी तरह खुले रहेंगे और सामान्य कामकाज होगा:

  • उत्तर प्रदेश, दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा और पंजाब
  • राजस्थान, मध्य प्रदेश और बिहार के प्रमुख शहरी क्षेत्र
  • महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के सभी राज्य

अगर आप इन राज्यों में रहते हैं, तो आप अपनी निकटतम बैंक शाखा में जाकर काउंटर सर्विसेज का लाभ उठा सकते हैं।

बैंक बंद रहने पर भी चालू रहेंगी ये डिजिटल सुविधाएं

जिन राज्यों में 17 सितंबर को बैंकों की छुट्टी है, वहां भी ग्राहकों को घबराने की जरूरत नहीं है। डिजिटल और ऑनलाइन सेवाएं 24×7 बिना किसी रुकावट के काम करती रहेंगी:

ऑनलाइन/नेट बैंकिंग: किसी भी समय फंड ट्रांसफर कर सकते हैं।

UPI सर्विसेज: गूगलपे, फोनपे, पेटीएम आदि के जरिए लेनदेन सामान्य रहेगा।

ATM सेवाएं: कैश निकालने और जमा करने के लिए एटीएम खुले रहेंगे।

मोबाइल बैंकिंग ऐप: बिल भुगतान और खाते का बैलेंस चेक करना जारी रहेगा।

अगर आपको चेक क्लीयरेंस, ड्राफ्ट बनवाने या भारी नकदी से जुड़ा कोई काम निपटाना है और आप झारखंड, बंगाल या ओडिशा जैसे राज्यों से हैं, तो बैंक शाखा जाने के बजाय नेट बैंकिंग का इस्तेमाल करें या अगले वर्किंग डे की प्लानिंग करें।

UPI MDR Charge: क्या आप एमडीआर चार्ज को लेकर चिंतित हैं? 42 FAQ से समझें कि क्यों चिंता करने की जरूरत नहीं है

UPI MDR Charge: यूपीआई पेमेंट पर एमडीआर चार्ज के ऐलान के बाद कई लोग चिंतित हैं। उन्हें लग रहा है कि अब यूपीआई से पेमेंट करने पर उन्हें फीस चुकानी होगी। यूपीआई पर एमडीआर चार्ज 15 अक्टूबर से लागू होगा। सच यह है कि इसके लागू होने के बाद भी यूजर्स को यूपीआई से पेमेंट पर कोई फीस नहीं चुकानी होगी। एमडीआर चार्ज मर्चेंट यानी दुकानदार को देना होगा। इस पूरे मामले को समझने के लिए मनीकंट्रोल ने 42 FAQ तैयार किए हैं। इसकी मदद से आपकी पूरी उलझन दूर हो जाएगी।

 मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) अभी क्यों लागू किया जा रहा है?

यूपीआई के जरिए हर महीने अरबों रुपये के ट्रांजेक्शन होते हैं। एमडीआर चार्ज से वसूला गया पैसा सिर्फ यूपीआई इकोसिस्टम में डिस्ट्रिब्यूट होता है। इससे इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत बनाने, इनोवेशन, साइबर सुरक्षा (बैंकों और नॉन-बैंकों के साथ यूपीआई इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा) और सर्विस बेहतर बनाने में मदद मिलती है। यूपीआई का शुल्क (एमडीआर) क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड, वॉलेट आदि जैसे अन्य भुगतान साधनों के मुकाबले काफी कम हैं। शुल्क बहुत ही उचित रखे गए हैं और केवल ₹2,000 से अधिक के लेन-देन पर ही लागू होंगे, जिससे यूपीआई भुगतान स्वीकार करने हेतु सबसे किफायती जरिया बना रहे।

क्या कम राशि वाले यूपीआई लेनदेन प्रभावित होंगे?

₹2,000 तक की राशि वाले यूपीआई लेनदेन पर MDR का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, जो कुल यूपीआई (पी2एम) लेनदेन के 95% से अधिक हैं। उचित एमडीआर लगाने का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यूपीआई रोजमर्रा के लेनदेन के लिए सुलभ और सुविधाजनक बना रहे, साथ ही दीर्घकालिक इकोसिस्टम की स्थिरता को भी मजबूती मिले।

यूपीआई लेनदेन पर व्यापारियों के लिए कितना एमडीआर लागू किया जा रहा है?

₹2,000/- से अधिक के पर्सन-टू-मर्चेंट (पी2एम) यूपीआई लेनदेन पर एमडीआर 0.4% लागू होगा। ₹75,000/- और उससे अधिक के लेनदेन के लिए, एमडीआर प्रति लेन-देन ₹300 तक सीमित होगा।

यूपीआई एमडीआर की तुलना पारंपरिक डेबिट और क्रेडिट कार्ड एमडीआर से कैसे की जा सकती है?

यूपीआई एमडीआर सभी पारंपरिक कार्ड-आधारित लेनदेन शुल्कों की तुलना में काफी कम है। सामान्य क्रेडिट कार्ड एमडीआर आमतौर पर प्रति लेनदेन 1.5% से 2.5% तक होता है, जबकि डेबिट कार्ड एमडीआर 0.90% तक सीमित होता है। ₹2,000 से अधिक के लेनदेन पर यूपीआई एमडीआर को 0.4% और उच्च राशि की खरीदारी पर इसे ₹300 तक सीमित किया गया है।

अपडेटेड एमडीआर संबंधी प्रावधान कब से प्रभावी होंगे?

अपडेटेड एमडीआर 15 अक्टूबर 2026 से लागू होगा। यह समयसीमा अधिग्रहण करने वाले बैंकों, भुगतान एग्रीगेटरों, फिनटेक अनुप्रयोगों और कॉरपोरेट लेखा प्लेटफॉर्मों को अपने सॉफ्टवेयर इंजन और बिलिंग सिस्टम को अपडेट करने के लिए पर्याप्त समय प्रदान करती है।

इसकी तुलना अंतरराष्ट्रीय भुगतान प्रणालियों से किस प्रकार की जा सकती है?

दुनिया के दूसरे देशों में भी ऐसे आर्थिक मॉडल हैं जो इंफ्रास्ट्रक्चर और नवाचार को सहयोग करते हैं। भारत का दृष्टिकोण सुगमता, विस्तार और समावेशन को प्राथमिकता देता है।

एमडीआर की लिमिट के अंतिम कार्यान्वयन और प्रवर्तन का निर्णय कौन करता है?

परिचालन संबंधी मापदंड, शुल्क वितरण मॉडल और श्रेणी सीमाएं भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) की अध्यक्षता वाली यूपीआई और सेवा संचालन समिति की ओर से तय किए जाते हैं।

एमडीआर के अंतर्गत प्रस्तावित छोटे व्यापारियों के लिए समर्पित निधि क्या है?

टियर-3 में पूर्वोत्तर राज्यों, जम्मू एवं कश्मीर तथा लद्दाख को मिलाकर कुल 6 केंद्रों और टियर-1 व 2 केंद्रों, जिनमें केंद्र सरकार की ओर से किसी अधिसूचित योजना (जैसे कि पीएम स्वनिधि, पीएम विश्वकर्मा इत्यादि) भी शामिल हैं, में डिजिटल भुगतान इंफ्रास्ट्रक्चर में तेजी बनाए रखने और सब्सिडी दिए जाने हेतु एक समर्पित कोष का निर्माण किया जाएगा। इस कोष का इस्तेमाल व्यापारियों को जोड़ने के लिए इकोसिस्टम के सदस्यों को वित्तीय मदद प्रदान करने और मौजूदा छोटे व्यापारियों के बीच यूपीआई लेन-देन को प्रोत्साहन देने के लिए भी किया जाएगा।

प्रस्तावित समर्पित कोष से छोटे व्यापारियों को किस प्रकार मदद मिलेगी?

प्रस्तावित किया गया समर्पित कोष से छोटे व्यापारियों के बीच यूपीआई की स्वीकार्यता बढ़ाने में सहायता मिलेगी। इसके लिए अधिग्रहण बैंकों/ भुगतान एग्रीगेटरों को व्यापारी जुड़ाव पहलों के लिए वित्तीय मदद प्रदान की जाएगी और छोटे व्यापारियों की ओर से, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों, टियर-III केंद्रों और उससे आगे के क्षेत्रों में, किए गए यूपीआई लेन-देन हेतु प्रोत्साहन दिया जाएगा। इससे निरंतर इस्तेमाल को प्रोत्साहन मिलेगा, डिजिटल भुगतान की पहुंच बढ़ेगी और छोटे व्यवसायों को डिजिटल भुगतान प्रणाली में शामिल करने की प्रक्रिया में तेजी आएगी। विस्तृत रूपरेखा को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की सलाह से अगले तीन महीनों के भीतर अंतिम रूप दिया जाएगा।

यूपीआई के लिए केवल सरकारी सब्सिडी पर निर्भर रहना पर्याप्त क्यों नहीं है?

वार्षिक सरकारी प्रोत्साहन/ सब्सिडी, हालांकि शुरुआती समय में डिजिटल को अपनाने में तेजी लाने में मददगार है, लेकिन इसे भुगतान इंडस्ट्री की ओर से किए गए खर्चों की भरपाई के लिए स्थायी उपाय के बजाय अल्पकालिक मदद के तौर पर तैयार किया गया था। इंडस्ट्री के अनुमानों के आधार पर, यूपीआई भुगतान के संचालन, सर्वर बैंडविथ, धोखाधड़ी रोकथाम प्रणालियों और बैंक तकनीकी सहायता को बनाए रखने में सालाना लगभग ₹20,000 करोड़ का खर्च आता है। केवल राजकोषीय बजट आवंटन पर निर्भर रहने से वित्तपोषण में अनिश्चितता पैदा होती है और बैंकों और फिनटेक कंपनियों की ओर से दीर्घकालिक प्रौद्योगिकी निवेश सीमित हो जाते हैं। एक वाणिज्यिक, सीमा-आधारित मॉडल में बदलाव निरंतर तकनीकी नवाचार के लिए विश्वसनीय पूंजी प्रदान करता है।

यह कदम पेमेंट ऐप ऑपरेटरों के बीच बाजार प्रतिस्पर्धा को कैसे प्रोत्साहन देगा?

एक संपोषित व्यावसायिक फ्रेमवर्क स्थापित करने से नए फिनटेक स्टार्टअप और प्रौद्योगिकी कंपनियों को डिजिटल भुगतान क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए प्रोत्साहन मिलता है। जब भुगतान प्रोसेसिंग शून्य-एमडीआर (डिजिटल डिलीवरी रेट) शर्तों के अंतर्गत संचालित होती है, तो केवल उच्च पूंजी वाली तकनीकी कंपनियां ही दीर्घकालिक परिचालन घाटे को वहन कर सकती हैं। एक पूर्वानुमानित व्यावसायिक राजस्व मॉडल सभी के लिए समान अवसर प्रदान करता है, जिससे छोटे, नवोन्मेषी स्टार्टअप प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं, विशेषीकृत भुगतान सॉफ्टवेयर तैयार कर सकते हैं और वित्तीय पहुंच का विस्तार कर सकते हैं। बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा आखिरकार बेहतर सेवाओं, ऐप की बेहतर विश्वसनीयता और उपभोक्ताओं के लिए अधिक विकल्पों की ओर ले जाती है।

यह नीति उभरते खतरों के खिलाफ साइबर सुरक्षा लचीलापन कैसे सुनिश्चित करती है?

एमडीआर के माध्यम से प्राप्त राजस्व का इस्तेमाल साइबर सुरक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर, एआई-आधारित धोखाधड़ी का पता लगाने, एन्क्रिप्शन अपग्रेड आदि में निवेश हेतु किया जा सकता है।

2026 तक यूपीआई का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कितना विस्तार हो चुका है?

2026 तक, यूपीआई का वैश्विक विस्तार काफी बढ़ चुका है और दुनिया के 11 देशों में इसकी भुगतान सेवाएं सक्रिय हैं। एक सुरक्षित और आत्मनिर्भर घरेलू आधार का निर्माण भारत को डिजिटल वित्तीय इंफ्रास्ट्रक्चर में वैश्विक नेतृत्व के तौर पर अपनी भूमिका को मजबूत करने में मददगार होगा।

वर्तमान में यूपीआई का लेन-देन की मात्रा और मूल्य का स्तर क्या है और इसे आत्मनिर्भर होने की आवश्यकता क्यों है?

अभूतपूर्व जन स्वीकृति का प्रदर्शन करते हुए, यूपीआई ने अकेले अगस्त 2026 में कुल ₹29.9 लाख करोड़ राशि के 2,451 करोड़ लेन-देन संसाधित किए। यह भारी मात्रा भारतीय अर्थव्यवस्था के प्राथमिक वित्तीय इंजन के रूप में यूपीआई की भूमिका को उजागर करती है, जो प्रतिदिन करोड़ों भुगतानों का प्रबंधन करता है। इस पैमाने को संभालने के लिए भारी संख्या में सर्वर इंफ्रास्ट्रक्चर, तेज गति वाली दूरसंचार लाइनें, बहुस्तरीय साइबर सुरक्षा निगरानी और विशेष बैंकिंग सॉफ्टवेयर की जरूरत होती है। लेन-देन के ये आंकड़े इस बात को पुष्ट करते हैं कि प्रणाली की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए एक आत्मनिर्भर वित्तपोषण फ्रेमवर्क स्थापित करना क्यों जरूरी था।

क्या यूपीआई के माध्यम से भुगतान करने पर सामान्य उपभोक्ताओं से शुल्क लिया जाएगा?

नहीं, यूपीआई सेवाएं उपभोक्ताओं के लिए निःशुल्क जारी रहेंगी। उपभोक्ता अब तक की तरह ही यूपीआई का इस्तेमाल करके निःशुल्क लेन-देन कर सकते हैं। यूपीआई के माध्यम से भुगतान करने वाले उपभोक्ताओं को कोई शुल्क नहीं देना होगा। व्यक्तिगत खाताधारक बिना किसी शुल्क की चिंता किए अपने सभी नियमित दैनिक खर्चों के लिए यूपीआई एप्लिकेशन का इस्तेमाल जारी रख सकते हैं। एमडीआर नीति यह सुनिश्चित करती है कि यूपीआई पूरे भारत में सभी नागरिकों के लिए निःशुल्क और सुलभ बनी रहे।

क्या यूपीआई के पर्सन-टू-पर्सन (पी2पी) लेन-देन जैसे दोस्तों, परिवार या व्यक्तिगत संपर्कों को पैसे भेजने पर कोई शुल्क लगता है?

नहीं, पी2पी लेन-देन भुगतानकर्ता और प्राप्तकर्ता दोनों के लिए निःशुल्क रहेंगे। यूपीआई का इस्तेमाल कर किसी भी व्यक्ति की ओर से किसी अन्य व्यक्ति को कोई भी राशि हस्तांतरित करने या प्राप्त करने (या स्वयं को हस्तांतरित करने) पर कोई शुल्क नहीं लगेगा। फिर चाहे आप परिवार के किसी सदस्य को पैसे भेज रहे हों, दोस्तों के साथ बिल बांट रहे हों, या अपने लिंक किए गए बैंक खातों में स्वयं को हस्तांतरित कर रहे हों, इन पर कोई शुल्क लागू नहीं होगा। नागरिक बिना किसी लेन-देन शुल्क के यूपीआई पर किसी भी स्वीकृत राशि का हस्तांतरण कर सकते हैं।

क्या यूपीआई ऐप यूपीआई भुगतान पर प्लेटफॉर्म शुल्क लेना शुरू कर देंगे?

नहीं, यूपीआई ऐप प्रदाता यूपीआई के माध्यम से किए गए किसी भी भुगतान पर प्लेटफॉर्म शुल्क या कोई अन्य शुल्क नहीं लेंगे। यूपीआई एप्लिकेशन को यूपीआई लेन-देन पर प्लेटफॉर्म शुल्क लगाने से स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित किया गया है।

क्या व्यापारियों की ओर से नाममात्र शुल्क का भुगतान शुरू करने पर दुकानों में उपभोक्ता कीमतों में बढ़ोतरी होगी?

नहीं, बाजार की गतिशीलता और ऐतिहासिक भुगतान रुझान दर्शाते हैं कि व्यापारी अधिक कारोबार बढ़ाने के लिए डिजिटल प्रोसेसिंग की मामूली लागत वहन करते हैं। भुगतान स्वीकार करने की लागत को मानक परिचालन खर्च माना जाता है, जिसकी भरपाई ग्राहकों की बढ़ती संख्या, उच्च औसत टिकट मूल्य और नकदी प्रबंधन के कम जोखिम से हो जाती है। चूंकि प्रस्तावित यूपीआई एमडीआर क्रेडिट कार्ड शुल्क से काफी कम है और केवल विशिष्ट लेन-देन सीमा से ऊपर ही लागू होता है, इसलिए दुकानदारों के पास खुदरा कीमतों को बढ़ाने का कोई आर्थिक प्रोत्साहन नहीं है। उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं के लिए निश्चित मूल्य का ही भुगतान करते रहेंगे।

क्या मुझे स्थानीय विक्रेता पर क्यूआर कोड स्कैन करते समय शुल्क देना होगा?

नहीं, स्थानीय बाजारों, स्ट्रीट वेंडरों या छोटी खुदरा दुकानों पर क्यूआर कोड स्कैन करना उपभोक्ताओं के लिए पूरी तरह से निःशुल्क रहेगा। क्यूआर लेन-देन के ग्राहक के सामने वाले हिस्से में कोई शुल्क नहीं लगेगा, चाहे खरीदारी की राशि कितनी भी हो। यह नीति चाय की दुकानों और स्थानीय परिवहन जैसी दैनिक छोटी-मोटी खरीदारी को किसी भी प्रकार के अतिरिक्त शुल्क से बचाने के लिए बनाई गई है। उपभोक्ता पूरी तरह से आश्वस्त होकर क्यूआर कोड स्कैन करना जारी रख सकते हैं कि उनसे कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लिया जाएगा।

क्या उपभोक्ताओं के लिए मुफ्त यूपीआई लेन-देन के लिए कोई मासिक सीमा है?

नहीं, व्यक्तिगत उपभोक्ताओं के लिए मुफ्त यूपीआई लेन-देन पर कोई मासिक कोटा, मात्रा सीमा या स्तरित सीमा नहीं है। यूजर्स पूरे महीने में बिना किसी शुल्क सीमा तक पहुंचे, जितने चाहें उतने वैध पर्सन-टू-पर्सन (पी2पी) या पर्सन-टू-मर्चेंट (पी2एम) लेन-देन कर सकते हैं। हालांकि निजी बैंक और एनपीसीआई कुल लेन-देन राशि पर मानक दैनिक सुरक्षा सीमाएं लागू करते हैं (आमतौर पर लेनदेन श्रेणी के आधार पर ₹1 लाख से ₹5 लाख तक), ये जोखिम प्रबंधन मापदंड हैं, न कि व्यावसायिक शुल्क स्तर पर। किसी भी स्थिति में, उपभोक्ता यूपीआई का कितनी भी बार इस्तेमाल करें, उन्हें कोई लेन-देन शुल्क नहीं देना पड़ेगा।

सामान्य यूजर्स यूपीआई शुल्क के संबंध में आधिकारिक अपडेट कहां से सत्यापित कर सकते हैं?

नागरिकों को वित्त मंत्रालय, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) या भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) की ओर से सीधे प्रकाशित आधिकारिक सूचनाओं को देखने की सलाह दी जाती है। भुगतान शुल्कों के संबंध में सोशल मीडिया पर फैली अफवाहों और भ्रामक रिपोर्टों के कारण, सरकार ने जनता से असत्यापित संदेशों को आगे न भेजने का आग्रह किया है। पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी), आरबीआई या एनपीसीआई की ओर से जारी आधिकारिक प्रेस विज्ञप्तियां प्रामाणिक नियामक नीति का प्राथमिक स्रोत हैं। यूजर्स अपने प्राथमिक बैंकिंग एप्लिकेशन में भी सत्यापित सूचनाओं की जांच कर सकते हैं।

क्या एमडीआर की शुरुआत से ऑटो-डेबिट रिकरिंग पेमेंट जैसे यूटिलिटी बिल या ओटीटी/ म्यूचुअल फंड सब्सक्रिप्शन पर असर पड़ता है?

नहीं, स्वचालित रिकरिंग स्थायी निर्देश, जिन्हें यूपीआई मैंडेट या ऑटोपे के नाम से जाना जाता है, पर निर्धारित एमडीआर लेन-देन शुल्क नहीं लगता है। मासिक उपयोगिता बिल, ओटीटी स्ट्रीमिंग सब्सक्रिप्शन, सभी रिकरिंग निवेश आदि के लिए स्वचालित रिकरिंग हस्तांतरण का इस्तेमाल किए गए भुगतानों पर कोई निर्धारित एमडीआर शुल्क नहीं लगेगा।

क्या छोटे स्थानीय विक्रेताओं (पी2पीएम) से यूपीआई भुगतान पर एमडीआर शुल्क लिया जाएगा?

नहीं। पी2पीएम फ्रेमवर्क के अंतर्गत काम करने वाले छोटे व्यापारियों के लिए शून्य एमडीआर (एमडीआर) लागू रहेगा। ये वे छोटे विक्रेता हैं जिन्हें यूपीआई क्यूआर के माध्यम से सीधे उनके खातों में प्रति माह 1 लाख रुपये तक की राशि प्राप्त होती है। पी2पीएम श्रेणी असंगठित खुदरा क्षेत्र में छोटे व्यापारियों के बीच डिजिटल भुगतान की स्वीकार्यता को प्रोत्साहन देती है। इसके साथ ही, छोटे विक्रेता विशेष सूक्ष्म व्यापारी खाता वर्गीकरण (पी2पीएम) के अंतर्गत काम करते हैं, जो उन्हें वाणिज्यिक शुल्कों से सुरक्षा प्रदान करता है। एमडीआर फ्रेमवर्क विशेष रूप से इस तरह से तैयार किया गया है कि असंगठित खुदरा क्षेत्र के छोटे व्यवसाय बिना किसी मार्जिन कटौती के डिजिटल भुगतान स्वीकार कर सकें।

पी2पीएम फ्रेमवर्क क्या है और यह छोटे व्यापारियों की सुरक्षा कैसे करता है?

पर्सन-टू-पर्सन-मर्चेंट (पी2पीएम) फ्रेमवर्क एनपीसीआई की ओर से तैयार की गई एक विशेष खाता श्रेणी है, जिसका उद्देश्य छोटे विक्रेताओं को सीधे उनके निजी बैंक खातों में भुगतान प्राप्त करने में मदद करना है। पी2पीएम दिशानिर्देशों के अंतर्गत, यूपीआई क्यूआर कोड के माध्यम से प्रति माह ₹1 लाख तक का भुगतान प्राप्त करने वाले छोटे व्यापारियों को अनिवार्य रूप से शून्य एमडीआर का लाभ मिलता है। यह वर्गीकरण अनौपचारिक स्ट्रीट वेंडर सेटअप और औपचारिक वाणिज्यिक मर्चेंट एक्वायरिंग खातों के बीच एक सेतु का काम करता है, जिससे सूक्ष्म व्यवसायों के लिए कोई लागत नहीं आती है। यह असंगठित क्षेत्र में डिजिटल भुगतान को प्रोत्साहन देता है।

क्या छोटे व्यापारियों को अपने मौजूदा क्यूआर कोड को अपग्रेड करने या बदलने की जरूरत है?

नहीं। मौजूदा क्यूआर इंफ्रास्ट्रक्चर सामान्य तरीके से काम करता रहेगा। व्यापारियों को अपने मौजूदा क्यूआर स्टैंड या साउंडबॉक्स को बदलने, पुनः पंजीकृत करने या उनमें कोई बदलाव करने की जरूरत नहीं है। दुकानों में लगे हुए सभी यूपीआई क्यूआर कोड बिना किसी रुकावट के भुगतान प्रक्रिया जारी रखेंगे। व्यापारी बैंक शाखा में जाए बिना या सॉफ्टवेयर अपडेट किए बिना अपने मौजूदा सेटअप के माध्यम से ग्राहकों से भुगतान प्राप्त कर सकते हैं।

यदि किसी छोटे व्यापारी को ₹2,000 से अधिक का भुगतान प्राप्त होता है तो क्या होता है?

एमडीआर की प्रयोज्यता समग्र व्यापारी खाता वर्गीकरण के माध्यम से निर्धारित की जाती है। ₹2,000 से अधिक का भुगतान प्राप्त करने पर पी2पीएम जैसे छूट प्राप्त श्रेणियों के अंतर्गत काम करने वाले छोटे व्यापारियों पर कोई शुल्क नहीं लगता है। ₹2,000 से अधिक के पर्सन-टू-मर्चेंट (पी2एम) यूपीआई लेन-देन पर 0.4% का एमडीआर लागू होगा। ₹75,000 और उससे अधिक के लेन-देन के लिए, एमडीआर प्रति लेन-देन ₹300 तक सीमित रहेगा।

समर्पित लघु व्यापारी कोष के लिए विस्तृत रूपरेखा को कब अंतिम रूप दिया जाएगा?

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के साथ सलाह मशविरा करके लघु व्यापारी निधि के लिए विस्तृत परिचालन फ्रेमवर्क को अगले तीन महीने के भीतर अंतिम रूप दिया जाएगा। इस सहयोगात्मक प्रक्रिया के माध्यम से पूंजी आवंटन के सटीक मानदंड, क्षेत्रीय प्राथमिकताएं और व्यापारी प्रोत्साहन संरचनाएं निर्धारित की जाएंगी। हितधारकों के साथ परामर्श से यह सुनिश्चित होगा कि योजना जमीनी स्तर पर वितरण संबंधी चुनौतियों का प्रभावी ढंग से समाधान करे।

क्या शून्य एमडीआर का लाभ उठाने के लिए छोटे व्यापारी को जीएसटी के लिए पंजीकरण कराना जरूरी है?

नहीं, यूपीआई लेन-देन पर शून्य एमडीआर सुरक्षा का लाभ उठाने के लिए छोटे व्यापारियों को जीएसटी पंजीकरण की आवश्यकता नहीं है। पी2पीएम श्रेणी के अंतर्गत शून्य-रेटेड प्रोसेसिंग की पात्रता मासिक संग्रहण सीमा (प्रति माह ₹1 लाख तक) और बैंक खाता वर्गीकरण की ओर से निर्धारित की जाती है, चाहे कर पंजीकरण की स्थिति कुछ भी हो। अनिवार्य वैधानिक कर सीमा से नीचे काम करने वाले सूक्ष्म उद्यम जीएसटी दस्तावेज प्रदान किए बिना डिजिटल भुगतान संसाधित कर सकते हैं। इससे अनौपचारिक सूक्ष्म व्यवसायों को डिजिटल भुगतान की ओर बढ़ने में आने वाली नियामक अनुपालन संबंधी बाधाओं से छूट मिलती है।

अधिग्रहण करने वाले बैंक शून्य एमडीआर के लिए पात्र छोटे व्यापारियों (पी2पीएम) की पहचान कैसे करेंगे?

अधिग्रहण करने वाले बैंक और भुगतान सेवा प्रदाता, पी2पीएम श्रेणी के अंतर्गत आने वाले व्यापारियों के लिए प्रति माह ₹1 लाख की आने वाले लेन-देन सीमा की निगरानी के लिए लेन-देन गति जांच का इस्तेमाल करते हैं। लगातार 3 महीने तक प्रति माह ₹1 लाख से अधिक यूपीआई भुगतान का आने वाला क्रेडिट प्राप्त करने वाले व्यापारियों को औपचारिक रूप से पी2एम श्रेणी में स्थानांतरित कर दिया जाता है।

क्या ग्रामीण क्षेत्रों में स्वीकार किए जाने वाले क्यूआर कोड भुगतानों पर शून्य एमडीआर लागू होता है?

हां, ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में पी2पीएम व्यापारियों की ओर से स्वीकार किए जाने वाले क्यूआर कोड भुगतानों पर शून्य एमडीआर लागू होता है। ग्रामीण भारत में डिजिटल तकनीक को प्रोत्साहन देना एक प्रमुख नीतिगत उद्देश्य बना हुआ है। सभी ग्रामीण दुकानदारों को सीमा छूट (₹2,000 से कम के भुगतान पर शून्य एमडीआर) का लाभ मिलेगा और प्रस्तावित समर्पित भुगतान प्रोत्साहन कोष के माध्यम से उन्हें अतिरिक्त मदद भी मिलेगी। इसके साथ ही, अधिग्रहण करने वाले बैंकों को ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी सेवाएं बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा, जिससे क्षेत्रीय दुकानदारों पर लागत का बोझ काफी कम हो जाएगा।

बड़े वाणिज्यिक लेन-देन के लिए कौन सा एमडीआर लागू होता है?

₹2,000/- से अधिक के पर्सन-टू-मर्चेंट (पी2एम) यूपीआई लेन-देन पर 0.4% का मामूली एमडीआर लागू किया जाएगा। ₹75,000/- और उससे अधिक के लेन-देन पर एमडीआर प्रति लेन-देन ₹300 तक सीमित रहेगा। यह 0.4% की दर क्रेडिट कार्ड या पेमेंट गेटवे जैसे वैकल्पिक भुगतान माध्यमों की तुलना में काफी कम है। इसके साथ ही, ₹2,000 की सीमा से कम के लेन-देन स्थापित व्यावसायिक संस्थाओं के लिए भी निःशुल्क रहेंगे। यह संतुलित दृष्टिकोण यह सुनिश्चित करता है कि उद्यम व्यापारी सिस्टम के रखरखाव में उचित योगदान दें, साथ ही दैनिक लेन-देन लागत को भी बेहद कम रखें।

क्या बहुत अधिक राशि वाले यूपीआई भुगतान पर अधिकतम शुल्क की कोई सीमा है?

हां, बड़े लेन-देन करने वाले उद्यमों की सुरक्षा के लिए, ₹75,000 और उससे अधिक के भुगतानों पर प्रति लेन-देन पर ₹300 की अधिकतम शुल्क सीमा निर्धारित की गई है। उदाहरण के लिए, ₹1,00,000 के लेन-देन पर ₹400 का प्रतिशत-आधारित शुल्क नहीं लगेगा; बल्कि, शुल्क ₹300 की निर्धारित सीमा पर ही समाप्त हो जाएगा। इससे यह सुनिश्चित होता है कि उच्च मूल्य के लेन-देन की लागत पूर्वानुमानित और प्रतिस्पर्धी बनी रहे।

प्रतिशत दर के बजाय निश्चित एमडीआर के लिए कौन सी विशिष्ट श्रेणियां पात्र हैं?

रेलवे, दूरसंचार सेवाएं, बीमा और ईंधन जैसी विशिष्ट व्यापारी श्रेणियों के लिए, 2,000 रुपये से अधिक के लेन-देन पर प्रति लेन-देन 5 रुपये का एक समान मासिक दर (एमडीआर) लागू होगा। 0.4% की परिवर्तनीय दर लागू करने के बजाय, ये विशिष्ट क्षेत्र लेन-देन राशि की परवाह किए बिना 5 रुपये का निश्चित शुल्क अदा करेंगे। यह एक समान दर मॉडल महत्वपूर्ण सार्वजनिक सेवाओं, उपयोगिता बिल संग्रह और ईंधन खुदरा जैसे कम लाभ वाले क्षेत्रों में लागत बढ़ोतरी को रोकता है। यह सुनिश्चित करता है कि आवश्यक उपभोक्ता सेवाएं कम लागत वाली और डिजिटल रूप से कुशल बनी रहें।

क्या एंटरप्राइज मर्चेंट एमडीआर का बोझ खरीददार पर डाल सकते हैं?

नहीं, यूपीआई के माध्यम से भुगतान स्वीकार करते समय पंजीकृत व्यापारी एमडीआर शुल्क ग्राहकों पर नहीं डाल सकते। यह व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि उपभोक्ता केवल निर्धारित मूल्य का ही भुगतान करें।

सटीक लेन-देन (जैसे, ₹5,000 बनाम ₹1,00,000) पर एमडीआर की गणना कैसे की जाती है?

एमडीआर की गणना लेन-देन मूल्य सीमा के आधार पर एक स्पष्ट और अनुमानित सूत्र का पालन करती है। ₹3,000 की खरीदारी पर, 0.4% की दर लागू करने पर व्यापारी की ओर से अपने अधिग्रहण बैंक को ₹12 का एमडीआर शुल्क देना होता है। ₹50,000 की खरीदारी पर, 0.4% शुल्क ₹200 के बराबर होता है। हालांकि, ₹1,00,000 की उच्च-मूल्य वाली खरीदारी के लिए, 0.4% की गणना (जो ₹400 के बराबर है) ₹300 की निश्चित अधिकतम सीमा से अधिक हो जाती है (₹75,000 और उससे अधिक के भुगतान के लिए प्रति लेन-देन ₹300 की निश्चित अधिकतम सीमा है। ₹2,000 से कम के किसी भी लेन-देन पर कोई एमडीआर नहीं लगता है)।

मर्चेंट को भुगतान की गई राशिलागू एमडीआरमर्चेंट की ओर से भुगतान किया गया एमडीआर
₹ 2,000₹ 0
₹ 3,0000.40% ₹ 12
₹ 50,000 0.40% ₹ 200
₹ 75,000 और उससे अधिकनिश्चित ₹ 300 ₹ 300

क्या एमडीआर यूपीआई या क्रेडिट लाइन से जुड़े क्रेडिट कार्ड के माध्यम से किए गए लेन-देन पर लागू होता है?

क्रेडिट-लिंक्ड यूपीआई भुगतान, जैसे कि यूपीआई से जुड़े रुपे क्रेडिट कार्ड या पूर्व-स्वीकृत बैंक क्रेडिट लाइनें, अलग क्रेडिट उत्पाद नियमों के अंतर्गत संचालित होते हैं। चूंकि क्रेडिट-लिंक्ड लेन-देन में जारीकर्ता बैंकों की ओर से वित्तपोषित अल्पकालिक लोन शामिल होते हैं, इसलिए वे मानक क्रेडिट कार्ड दिशानिर्देशों का पालन करते हैं। इस संशोधन में चर्चा की गई एमडीआर विशेष रूप से यूजर्स खाते से व्यापारी खाते में सीधे किए जाने वाले यूपीआई लेन-देन पर लागू होती है।

यूपीआई के माध्यम से पूंजी बाजार लेन-देन पर कौन सी विशिष्ट एमडीआर दरें और सीमाएं लागू होती हैं?

म्यूचुअल फंड, प्रतिभूतियों, स्टॉकब्रोकरों और डीलरों को किए जाने वाले भुगतानों सहित पूंजी बाजार लेन-देन के लिए मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लेन-देन मूल्य का नाममात्र 0.02% निर्धारित किया गया है, जिसकी अधिकतम सीमा ₹300 है। औपचारिक वित्तीय बाजारों में खुदरा भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए यह शुल्क मानक वाणिज्यिक लेन-देन दरों से कम है।

इस पूंजी बाजार एमडीआर फ्रेमवर्क के अंतर्गत कौन सी संस्थाएं और लेन-देन के प्रकार शामिल हैं?

यह विशिष्ट एमडीआर श्रेणी पूंजी बाजारों में कार्यरत सभी विनियमित संस्थाओं को स्पष्ट रूप से कवर करती है, जिनमें एसेट मैनेजमेंट कंपनियां (म्यूचुअल फंड), एसईबीआई-पंजीकृत स्टॉकब्रोकर, सिक्योरिटीज डीलर और निवेश प्लेटफॉर्म शामिल हैं। यह इक्विटी खरीद, डेट बाजार निवेश, म्यूचुअल फंड खरीद और ब्रोकर वॉलेट टॉप-अप के लिए यूपीआई के माध्यम से किए गए फंड ट्रांसफर पर लागू होता है। इस श्रेणी को अलग से परिभाषित करके, यह सुनिश्चित किया जाता है कि पूंजी बाजार ट्रांसफर नियमित खुदरा खरीदारी या सामान्य सेवा भुगतानों से अलग हों।

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क्या बीमा प्रीमियम भुगतान विशेष एमडीआर रियायतों के लिए पात्र हैं?

हां, यूपीआई के माध्यम से स्वीकार किए गए बीमा प्रीमियम भुगतान विशेष निश्चित-दर की छूट के पात्र हैं। ₹2,000 से अधिक के बीमा प्रीमियम भुगतान पर, प्रतिशत-आधारित शुल्क के बजाय प्रति लेन-देन ₹5 का निश्चित एमडीआर लागू होता है। यह रियायती मॉडल सुनिश्चित करता है कि उच्च मूल्य के वार्षिक या अर्ध-वार्षिक बीमा भुगतान करने वाले पॉलिसीधारकों को भारी बैकएंड शुल्क का सामना न करना पड़े। बीमा कंपनियों को कम लागत वाले डिजिटल संग्रह से लाभ होता है, जिससे पूरे भारत में बीमा कवरेज का विस्तार करने में मदद मिलती है।

यूपीआई के माध्यम से पेट्रोल पंपों पर ईंधन की खरीद के लिए एमडीआर कैसे काम करता है?

यूपीआई के माध्यम से पेट्रोल पंपों पर की गई ईंधन खरीद पर ₹2,000 से अधिक के भुगतान पर ₹5 की एक समान रियायती दर लागू होती है। यह ₹5 की एक समान फीस पेट्रोल पंप संचालकों को टैंक रिफिल पर लगने वाले उच्च प्रोसेसिंग शुल्क से बचाती है। ₹2,000 से कम के सभी ईंधन भुगतानों पर एमडीआर 0% रहता है, जिससे रोजमर्रा के यात्रियों के लिए ईंधन भरना पूरी तरह से शुल्क-मुक्त हो जाता है, जबकि ईंधन स्टेशन संचालकों को ऐसे लेन-देन पर कोई एमडीआर नहीं देना पड़ता है।

क्या सरकारी उपयोगिता बिल संग्रह (बिजली, पानी) पर प्रतिशत एमडीआर लागू होगा?

बिजली वितरण, नगरपालिका जल शुल्क और पाइपलाइन की ओर से आपूर्ति की जाने वाली प्राकृतिक गैस जैसे सार्वजनिक उपयोगिता भुगतान निर्दिष्ट उद्योग कार्यक्रम श्रेणी के अंतर्गत आते हैं। ₹2,000 से अधिक के उपयोगिता बिल भुगतानों पर 0.4% बदलाव दर के बजाय ₹5 का एक समान रियायती मासिक दर एमडीआर लागू होता है। ₹2,000 से कम के उपयोगिता लेन-देन पर कोई एमडीआर लागू नहीं होता है। यह फ्रेमवर्क सुनिश्चित करता है कि राज्य उपयोगिता बोर्ड और नगर निगम उच्च प्रसंस्करण शुल्क लगाए बिना बिल संग्रह को डिजिटल बना सकें, जिससे सार्वजनिक उपयोगिता सेवाएं सस्ती बनी रहें।

क्या शैक्षणिक संस्थान मानक एमडीआर प्रतिशत शुल्क से मुक्त हैं?

स्कूल ट्यूशन, विश्वविद्यालय सत्र शुल्क और संस्थागत प्रवेश परीक्षाओं सहित शैक्षणिक शुल्क संग्रह, निर्दिष्ट उद्योग कार्यक्रम श्रेणी के अंतर्गत आते हैं। ₹2,000 से अधिक के लेन-देन पर निश्चित-फीस संरचना या सीमित प्रोसेसिंग दरें लागू होती हैं, जिससे बड़ी राशि पर लगने वाले उच्च प्रतिशत-आधारित शुल्कों से बचा जा सकता है। ₹2,000 तक के शैक्षणिक लेन-देन पूरी तरह से एमडीआर से मुक्त हैं। यह उपाय सुनिश्चित करता है कि स्कूल, कॉलेज और छात्र भारी प्रशासनिक शुल्कों के बिना डिजिटल रूप से ट्यूशन फीस का भुगतान कर सकें।

UPI पर ट्रांजेक्शन चार्ज को लेकर दुविधा में हैं? तो यहां जानें अपने हर सवाल का पूरा जवाब

यूपीआई से पेमेंट करने वाले लोगों के लिए बड़ी खबर है। आगे यूपीआई से पेमेंट फ्री नहीं रहेगा। हालांकि, 2000 रुपये तक के पेमेंट को फीस से राहत दी गई है। इससे ज्यादा अमाउंट के पेमेंट पर एमडीआर लागू होगा। हालांकि, यह 15 अक्तूबर से लागू होगा। सवाल है कि 2000 रुपये से ज्यादा के पेमेंट पर एमडीआर कितना होगा?

सबसे पहले यह जान लेना जरूरी है कि एमडीआर यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट क्या है। MDR वह कमीशन है, जिसका पेमेंट मर्चेंट बैंक को करते हैं। यह पेमेंट बैंक को डिजिटल पेमेंट को प्रोसेस करने के एवज में किया जाता है। काफी समय से यूपीआई पर फीस लगाने की चर्चा चल रही थी। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने पहले कहा था कि यूपीआई हमेशा के लिए फ्री नहीं रह सकता है। उन्होंने कहा था कि इस पर कॉस्ट आती है और किसी न किसी को यह कॉस्ट उठाना पड़ता है।

यूपीआई पर एमडीआर चार्ज को लेकर लोगों के मन में कई तरह के सवाल चल रहे हैं। इसकी वजह यह है कि आज हर आदमी 1 रुपये से लेकर हजारों रुपये तक के पेमेंट के लिए रोजाना यूपीआई का इस्तेमाल करता है। आम लोग सब्जी, फल, ग्रॉसरी जैसी रोजमर्रा की चीजों का पेमेंट भी यूपीआई से करते हैं। आइए कुछ जरूरी सवालों का जवाब जानने की कोशिश करते हैं।

क्या आम आदमी को UPI से पेमेंट के लिए कोई चार्ज देना होगा?

इस सवाल का जवाब है ना। यूपीआई की सर्विस कंज्यूमर्स के लिए फ्री बनी रहेगी। कंज्यूमर्स पहले की तरह से बगैर किसी चार्ज यूपीआआई के जरिए पेमेंट करते रहेंगे। आम आदमी को यूपीआई से पेमेंट के लिए फीस की चिंता करने की जरूरत नहीं है। एमडीआर पॉलिसी में यह कहा गया है कि यूपीआई सभी लोगों के लिए फ्री बना रहेगा।

क्या एक व्यक्ति अगर किसी दोस्त या रिश्तेदार को यूपीआई से पैसे ट्रांसफर करना चाहता है तो उसे चार्ज देना होगा?

इस सवाल का जवाब भी ना है। एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को होने वाले ट्रांजेक्शन को P2P कहते हैं। पी2पी ट्रांजेक्शन आगे भी पूरी तरह से फ्री बना रहेगा। आपको परिवार के किसी सदस्य, रिश्तेदार या दोस्त को यूपीआई के जरिए पैसे ट्रांसफर करने के लिए किसी तरह की फीस नहीं चुकानी होगी। आप किसी भी अमाउंट को बैगर किसी फीस दूसरे व्यक्ति को ट्रांसफर कर सकेंगे।

क्या UPI ऐप अपने प्लेटफॉर्म के जरिए होने वाले पेमेंट के लिए फीस लेंगे?

इस सवाल का जवाब भी नहीं है। यूपीआई ऐप यूपीआई के जरिए होने वाले पेमेंट के लिए प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल सहित किसी तरह की फीस कंज्यूमर्स से नहीं वसूलेंगे। यूपीआई ऐप को यूपीआई ट्रांजेक्शन पर किसी तरह की फीस वसूलने की इजाजत नहीं दी गई है।

चूंकि मर्चेंट्स को 2000 रुपये से ज्यादा के ट्रांजेक्शन पर एमडीआर चार्ज चुकाना होगा तो वे क्या वे चीजों के ज्यादा दाम वसूलेंगे?

इसका जवाब भी नहीं है। दरअसल, बाजार के समीकरण और अब तक का ट्रेंड यह बताता है कि मर्चेंट्स अपना बिजनेस बढ़ाने के लिए नॉमिनल डिजिटल प्रोसेसिंग कॉस्ट का बोझ खुद उठाते हैं। चूंकि, यूपीआई पर लगने वाला एमडीआर चार्ज क्रेडिट कार्ड फीस से काफी कम है, जिससे मर्चेंट्स के इस चार्ज को ग्राहकों से वसूलने की उम्मीद नहीं है। ऐसा करने पर उनकी सेल्स पर असर पड़ेगा। इसका मतलब है कि आम लोगों को पहले की तरह यूपीआई से सिर्फ उतना है पैसा चुकाना होगा, जितनी उस चीज की कीमत होगी।

मर्चेंट को कितना एमडीआर चुकाना होगा?

NPCI यानी नेशनल पेमेंट कॉर्पोरेशन के मुताबिक, 2000 रुपये से ज्यादा के ट्रांजेक्शन पर मर्चेंट्स को 0.4 फीसदी एमडीआर चुकाना होगा। हालांकि, 75,000 रुपये या इससे ज्यादा के पेमेंट पर फीस यानी एमडीआर की 300 रुपये की सीमा लागू होगी।

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उदाहरण से ऐसे समझें कितना होगा एमडीआर

मान लीजिए आपने किसी दुकान पर ₹3,000 का UPI पेमेंट किया। इस रकम पर 0.40% MDR लगेगा। ₹3,000 का 0.40% ₹12 होता है। यानी मर्चेंट को इस ट्रांजैक्शन पर ₹12 MDR देना होगा। अब ₹50,000 का पेमेंट लेते हैं। इसका 0.40% ₹200 होता है। यानी ₹50,000 के UPI पेमेंट पर मर्चेंट को MDR ₹200 चुकाना होगा।