बच्चों में कैंसर क्यों होता है? इन लक्षणों को भूलकर भी न करें नजरअंदाज, डॉक्टर से जानें पूरी जानकारी

बच्चे के बार-बार बीमार पड़ने पर ज्यादातर माता-पिता इसे मौसम बदलने, संक्रमण या सामान्य कमजोरी से जोड़कर देखते हैं। लेकिन अगर बुखार बार-बार लौट रहा हो, हड्डियों में लगातार दर्द हो, शरीर पर बिना चोट के नीले निशान पड़ रहे हों या कोई असामान्य गांठ दिखाई दे रही हो, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ये लक्षण कई सामान्य बीमारियों में भी हो सकते हैं, लेकिन कुछ मामलों में गंभीर बीमारी का संकेत भी हो सकते हैं।

हाल ही में द लैंसेट रीजनल हेल्थ–साउथईस्ट एशिया में प्रकाशित एक अध्ययन ने दक्षिण एशिया में बच्चों में होने वाले कैंसर के बोझ पर ध्यान खींचा है। अध्ययन के मुताबिक, सार्क देशों में बच्चों के कैंसर के करीब 69 प्रतिशत मामले भारत में सामने आते हैं। भारत की बड़ी आबादी और यहां जांच व उपचार की बेहतर उपलब्धता भी इस आंकड़े की एक वजह हो सकती है। वहीं, जागरूकता और समय पर जांच की कमी के कारण कुछ मामलों की पहचान देर से होने की आशंका भी रहती है।

क्या बदलती जीवनशैली और पर्यावरण जिम्मेदार हैं?

बदलता खानपान, प्रदूषण और रसायनों का बढ़ता संपर्क आज बच्चों की सेहत को लेकर कई सवाल खड़े करता है। हालांकि, विशेषज्ञ साफ तौर पर कहते हैं कि बच्चों में होने वाले कैंसर को केवल जीवनशैली की वजह से नहीं जोड़ा जा सकता। राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर के हेमेटोलॉजिस्ट और बोन मैरो ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ डॉ. नरेंद्र अग्रवाल, के अनुसार बच्चों में कैंसर के ज्यादा मामले सामने आने की एक वजह यह हो सकती है कि अब पहले के मुकाबले बीमारी की पहचान बेहतर हो रही है। ज्यादा बच्चे अस्पतालों और कैंसर उपचार केंद्रों तक पहुंच रहे हैं, इसलिए पहले से अधिक मामले सामने आ रहे हैं।

दूसरी ओर, कुछ क्षेत्रों में कैंसर के वास्तविक मामलों में बढ़ोतरी की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में उन इलाकों की हवा, पानी, मिट्टी और खानपान से जुड़े पर्यावरणीय कारणों का वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है। लेकिन किसी एक कारण को बच्चों में कैंसर की सीधी वजह मानना सही नहीं होगा।

बच्चों में ल्यूकीमिया सबसे आम क्यों?

बच्चों में होने वाले कैंसर में ल्यूकीमिया यानी रक्त कैंसर सबसे आम है। इसकी वजह समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि बचपन में शरीर तेजी से बढ़ता है और नई कोशिकाएं तेजी से बनती हैं। खून बनाने वाली जगह यानी अस्थि मज्जा भी इस दौरान काफी सक्रिय रहती है।

नई कोशिकाएं बनते समय कभी-कभी उनके आनुवंशिक पदार्थ में बदलाव हो सकते हैं। ज्यादातर बदलाव शरीर खुद संभाल लेता है, लेकिन कुछ बदलाव कोशिकाओं की सामान्य वृद्धि को प्रभावित कर सकते हैं और आगे चलकर ल्यूकीमिया जैसी बीमारी का कारण बन सकते हैं।

डॉ. अग्रवाल के मुताबिक, ज्यादातर बच्चों में ल्यूकीमिया का कोई एक निश्चित कारण नहीं मिलता। इसलिए बच्चे को कैंसर होने पर माता-पिता को खुद को दोषी नहीं मानना चाहिए।

इन लक्षणों को सामान्य समझकर न टालें

ल्यूकीमिया के शुरुआती लक्षण कई बार सामान्य संक्रमण जैसे लगते हैं। लंबे समय तक या बार-बार बुखार आना, बहुत ज्यादा कमजोरी, खून की कमी, बार-बार संक्रमण होना, बिना चोट के शरीर पर नीले निशान पड़ना, नाक या मसूड़ों से खून आना और हड्डियों या जोड़ों में लगातार दर्द इसके संभावित संकेत हो सकते हैं। इसके अलावा कुछ दूसरे बच्चों के कैंसर में भी विशेष संकेत दिखाई दे सकते हैं। पेट में बिना दर्द की गांठ किडनी से जुड़े कुछ कैंसर का संकेत हो सकती है। वहीं, आंख की पुतली में फोटो खींचने पर सफेद चमक दिखाई देना या अचानक भेंगापन आना आंख के कैंसर का संकेत हो सकता है।

हालांकि, इन लक्षणों का मतलब कैंसर होना नहीं है। कई सामान्य बीमारियों में भी ऐसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। लेकिन अगर लक्षण लंबे समय तक बने रहें, बार-बार लौटें या इलाज के बाद भी ठीक न हों, तो बाल रोग विशेषज्ञ से जांच कराना जरूरी है।

बच्चों में कैंसर को कैसे रोका जा सकता है?

बच्चों में होने वाले ज्यादातर कैंसर को आज की स्थिति में पूरी तरह रोक पाना संभव नहीं है, क्योंकि इनके पीछे अक्सर कोशिकाओं में होने वाले आनुवंशिक बदलाव होते हैं। इसका मतलब यह भी है कि बच्चे के कैंसर के लिए माता-पिता की सामान्य जीवनशैली या किसी एक गलती को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है। फिर भी बच्चे को संतुलित आहार देना, साफ वातावरण उपलब्ध कराना, जरूरी टीके लगवाना और सामान्य स्वास्थ्य का ध्यान रखना महत्वपूर्ण है। इससे बच्चे का समग्र स्वास्थ्य बेहतर रहता है।

सबसे बड़ा बचाव समय पर पहचान है। अगर बच्चे में बार-बार बुखार, लगातार दर्द, असामान्य खून आना, बिना वजह नीले निशान, असामान्य गांठ या आंख में सफेद चमक जैसे संकेत दिखाई दें, तो जांच में देरी नहीं करनी चाहिए।

डॉ. अग्रवाल के मुताबिक, ल्यूकीमिया समेत बच्चों में होने वाले कई कैंसर का इलाज संभव है और कई मामलों में बच्चे पूरी तरह स्वस्थ भी हो सकते हैं। इसलिए डरने के बजाय सही समय पर डॉक्टर से सलाह लेना और जरूरत पड़ने पर जांच करवाना सबसे जरूरी कदम है।

डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी सामान्य स्वास्थ्य सुझावों पर आधारित है। इसे किसी योग्य चिकित्सा राय का विकल्प न मानें। किसी भी नए व्यायाम को शुरू करने से पहले विशेषज्ञ या डॉक्टर से सलाह जरूर लें।

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Market Next Week: भारत से अमेरिका तक आ रहे ये आंकड़े, अगले हफ्ते तय करेंगे मार्केट की चाल

Market next week: 31 अगस्त से शुरू हो रहे अगले कारोबारी हफ्ते मार्केट की चाल मुख्य तौर पर जीडीपी के घरेलू आंकड़ों, कच्चे तेल के भाव और अमेरिका में गैर-कृषि पेरोल रिपोर्ट पर निर्भर करेगा। इसके अलावा एनालिस्ट्स के मुताबिक मैक्रोइकनॉमिक रिलीज, ऑटो सेल्स के आंकड़े और विदेशी निवेशकों की ट्रेडिंग एक्टिविटी भी आने वाले दिनों में बाजार की दिशा तय करेंगे। पिछले कारोबारी हफ्ते यानी 17-21 अगस्त के दौरान घरेलू इक्विटी बेंचमार्क इंडेक्सेज सेंसेक्स (Sensex) 276.32 प्वाइंट्स यानी 0.35% गिरा, तो निफ्टी (Nifty) 76.35 प्वाइंट्स यानी 0.31% नीचे आया। लगातार तीसरे हफ्ते ये लाल हुए।

Market next week: क्या कहना है एक्सपर्ट्स का?

रेलिगेयर ब्रोकिंग के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट (रिसर्च) अजीत मिश्र का कहना है कि आने वाला कारोबारी हफ्ता काफी अहम रहने वाला है। जीडीपी के घरेलू आंकड़े और वैश्विक आर्थिक आंकड़े मार्केट की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। भारतीय अर्थव्यस्था में बात करें तो जून 2026 तिमाही के आंकड़े 31 अगस्त को जारी होंगे। अजीत के मुताबिक निवेशकों की नजर अगस्त महीने के मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज पीएमआई के आंकड़ों, जीएसटी कलेक्शंस, फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व और रुपये की चाल पर भी रहेगी।

अजीत के मुताबिक सबसे बड़ा ट्रिगर तो अमेरिकी रोजगार का आंकड़ा रहेगा। 4 अगस्त को अगस्त के नॉन-फार्म पेरोल्स का आंकड़ा आएगा। अजीत का मानना है कि यग फेडरल रिजर्व के सितंबर महीने की मौद्रिक नीति, अमेरिकी डॉलर, ट्रेजरी यील्ड्स और एमर्जिंग मार्केट्स में फंड्स फ्लो से जुड़ी उम्मीदों पर असर डाल सकता है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने अगस्त में भारतीय इक्विटीज में अब तक ₹30,919 करोड़ का नेट निवेश किया है और लगातार दूसरे महीने उनकी नेट खरीदारी जारी रही।

ऑनलाइन ट्रेडिंग और वेल्थ-टेक फर्म एनरिच मनी के सीईओ पोनमुडी आर का कहना है कि घरेलू स्तर पर जून तिमाही के जीडीपी आंकड़े ब्रोडर रिस्क सेंटिमेंट के लिए अहम होंगे। इससे यह पता चलेगा कि घरेलू अर्थव्यवस्था किस चाल से बढ़ रही है, खासतौर से ऐसे समय में जब एनर्जी प्राइसेज रॉकेट बने हुए हैं और पश्चिमी एशिया में तनाव अभी भी बना हुआ है।

पोनमुडी का कहना है कि जैक्सन होल में फेड चेयर कैविन वार्श के हॉकिश कमेंट के बाद अब अमेरिकी मौद्रिक नीति वैश्विक बाजारों के लिए सबसे बड़ा कैटेलिस्ट बन गई है। पोनमुडी का कहना है कि मार्केट की नजर अब 4 सितंबर को आने वाले अगस्त की जॉब्स रिपोर्ट के साथ-साथ अगली इनफ्लेशन रीडिंग पर भी नजर रहेगी। इन आंकड़ो से यह तय होगा कि सितंबर में रेट हाइक की हाल में बढ़ी उम्मीदें बनी रहती हैं या कम होती हैं।

रिसर्च एनालिस्ट फर्म एचएसटी वेल्थ के फाउंडर और सीईओ हरिसेल्वन राधाकृष्णन का कहना है कि सोमवार को भारतीय इकॉनमी के लिए जून तिमाही के जीडीपी के आंकड़े के आंकड़े आएंगे, जिससे घरेलू आर्थिक विकास की दिशा पता चलेगी। वहीं शुक्रवार को आने वाला अमेरिकी रोजगार का आंकड़ा वैश्विक बाजारों के सेंटिमेंट पर असर डाल सकता है। उनका कहना है कि इसके बाद निवेशक फिर से फेडरल रिजर्व की सितंबर की मौद्रिक नीतियों को लेकर अपनी उम्मीदों को रिव्यू करेंगे।

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PPF Investment: क्या आप भी PPF में डालते हैं पैसा और लमसम या मंथली में है कंफ्यूज? जान लें 5 तारीख वाला ये ‘गोल्डन रूल’

PPF Investment Timing: अगर आप हर साल पब्लिक प्रोविडेंट फंड (PPF) में अधिकतम ₹1.5 लाख का निवेश करते हैं, तो क्या आपने कभी सोचा है कि पैसा साल की शुरुआत यानी अप्रैल में एक साथ जमा करना सही है या हर महीने किश्तों में?

अक्सर लोग अपनी सुविधा के हिसाब से निवेश करते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि सिर्फ निवेश के सही समय का चुनाव करने से आपके फाइनल मैच्योरिटी फंड में ₹1.1 लाख से ₹1.2 लाख तक का अंतर आ सकता है? आइए समझते हैं PPF में ब्याज की गणना कैसे होती है और 15 साल बाद दोनों तरीकों में से कौन सा विकल्प ज्यादा रिटर्न देगा।

PPF में ब्याज की गणना का नियम

PPF में ज्यादा से ज्यादा रिटर्न पाने के लिए इसके ब्याज की गणना का गणित समझना बेहद जरूरी है। वर्तमान में सरकार PPF पर 7.1% सालाना ब्याज दे रही है, जो हर साल कंपाउंड होता है। PPF नियम के अनुसार, ब्याज की गणना हर महीने की 5 तारीख से लेकर महीने के आखिरी दिन के बीच मौजूद सबसे न्यूनतम बैलेंस पर की जाती है।

अगर आप 5 अप्रैल से पहले पूरा ₹1.5 लाख जमा कर देते हैं, तो आपको पूरे 12 महीनों के लिए उस ₹1.5 लाख पर ब्याज मिलता है। इसके विपरीत, हर महीने ₹12,500 जमा करने पर ब्याज केवल उसी हिस्से पर मिलेगा जो महीने-दर-महीने खाते में जुड़ता जाएगा।

5 अप्रैल से पहले लमसम vs हर महीने ₹12,500

अगर आप PPF खाते में हर साल अधिकतम ₹1.5 लाख का निवेश करते हैं, तो 15 साल की मैच्योरिटी अवधि (7.1% सालाना चक्रवृद्धि ब्याज पर) में कुल ₹22.5 लाख जमा करने के बाद, साल की शुरुआत में यानी 5 अप्रैल से पहले एकमुश्त पैसा जमा करने पर आपको ₹40,68,209 का कुल फंड मिलता है। जबकि हर महीने ₹12,500 की किश्त में निवेश करने पर यही फंड घट कर ₹39,47,848 रह जाता है।

पैसे कम बढ़ने के पीछे की वजह है PPF का 5 तारीख का ब्याज वाला नियम है, जिसके तहत 5 अप्रैल से पहले एक साथ पैसा जमा करने पर आपकी पूरी रकम पर पूरे 12 महीनों तक लगातार चक्रवृद्धि ब्याज बनता है, जिससे बिना कोई अतिरिक्त पैसा लगाए आपको ₹1,20,361 (लगभग ₹1.2 लाख) का ज्यादा ब्याज प्राप्त होता है।

किस निवेशक के लिए कौन सा विकल्प सही है?

लमसम (5 अप्रैल से पहले): ये उन लोगों के सही है जिन लोगों के पास साल की शुरुआत में बोनस, मैच्योरिटी फंड या पर्याप्त सरप्लस पैसा उपलब्ध है। इससे आपके पैसे को 12 महीनों तक लगातार ब्याज और कंपाउंडिंग की ताकत मिलती है।

मंथली SIP (हर महीने की 5 तारीख से पहले): नौकरीपेशा और वे लोग जो अपनी मासिक सैलरी से बजट बनाकर थोड़ा-थोड़ा निवेश करते हैं। एकमुश्त बड़ी रकम का वित्तीय दबाव नहीं पड़ता और बचत का अनुशासन बना रहता है। इस बात का ध्यान दें कि अगर आप हर महीने निवेश कर रहे हैं, तो हमेशा महीने की 5 तारीख से पहले पैसा ट्रांसफर करें ताकि उस महीने का ब्याज न छूटे।

अगर आपके पास पैसा पहले से मौजूद है, तो उसे बैंक खाते में रखकर साल भर में थोड़ा-थोड़ा निवेश करने का कोई फायदा नहीं है। 5 अप्रैल से पहले एकमुश्त ₹1.5 लाख जमा करना ही सबसे समझदारी भरा कदम है। समय की ताकत और चक्रवृद्धि ब्याज का सही इस्तेमाल करके आप आसानी से ₹1.2 लाख की एक्स्ट्रा कमाई कर सकते हैं।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

‘नो बॉल के फाइन से सभी खिलाड़ी डिनर करें…’ टेस्ट में नो बॉल डालने वाले गेंदबाज को लेकर गावस्कर ने दिया अनोखा उपाय

 IND vs SL: भारत-श्रीलंका के बीच हुए टेस्ट सीरीज में गेंदबाजों के बार-बार नो-बॉल करने का मुद्दा चर्चा में रहा है। मैच के दौरान भारत की ओर से कुल 13 नो-बॉल डाली। पूर्व भारतीय क्रिकेटर सुनील गावस्कर ने रेड-बॉल क्रिकेट में नो-बॉल को लेकर अपनी राय रखी है। पूर्व क्रिकेटर ने गेंदबाजों को नो-बॉल डालने से रोकने के लिए अनोखा फॉर्मूला दिया है। उन्होंने कहा कि रेड-बॉल क्रिकेट में नो-बॉल करने वाले गेंदबाजों पर आर्थिक जुर्माना लगाया जाना चाहिए। इसी के साथ अगली गलती पर इसे दोगुना कर और गेंदबाजी कोच को भी आधा जुर्माना देने का सुझाव दिया।

श्रीलंका के खिलाफ दूसरे टेस्ट में भारतीय गेंदबाजों की नो-बॉल चर्चा का विषय बन गई। मैच में भारत ने कुल 13 नो-बॉल फेंकीं। इनमें स्पिनर सारांश जैन और रवींद्र जडेजा की गेंदों पर कई बार पैर क्रीज से आगे निकल गया। जडेजा पहले भी नो-बॉल कर चुके हैं। गॉल में खेले गए पहले टेस्ट में उन्होंने चार नो-बॉल फेंकी थीं।

गेंदबाजों पर लगे जुर्माना

दूसरे टेस्ट में बार-बार नो बॉल की समस्या सामने आने के बाद साईराज बहुतुले ने सुझाव दिया कि रेड-बॉल क्रिकेट में नो-बॉल पर बल्लेबाज को फ्री हिट मिलनी चाहिए। गावस्कर ने ‘मिड-डे’ के लिए लिखे अपने कॉलम में कहा कि भारतीय टीम के स्पिन गेंदबाजी कोच ने मजाक में सुझाव दिया था कि नो-बॉल के बाद फ्री हिट देने से गेंदबाजों की इस गलती को कम किया जा सकता है। गावस्कर ने आगे कहा कि, “एक ओवर में दो बाउंसर की सीमा और बाउंड्री के कारण बल्लेबाजों के लिए रन बनाना पहले ही थोड़ा आसान हो गया है। ऐसे में नो-बॉल पर फ्री हिट देने के बजाय गलती करने वाले गेंदबाज पर दोगुना जुर्माना लगाया जा सकता है। साथ ही, जुर्माने की आधी रकम गेंदबाजी कोच से भी ली जा सकती है।”

गेंदबाजी पर रख सकते हैं नियंत्रण

पूर्व भारतीय क्रिकेटर सुनील गावस्कर का कहा कि, “आज के समय में गेंदबाजों के लिए नो-बॉल जैसी गलती करना सही नहीं माना जा सकता। अब खिलाड़ियों के पास बेहतर तकनीक और आधुनिक उपकरण मौजूद हैं, जिससे गेंदबाज अपनी गेंदबाजी पर ज्यादा नियंत्रण रख सकते हैं। वहीं, व्हाइट-बॉल क्रिकेट में नो-बॉल करने पर गेंदबाजों को पहले से ही अतिरिक्त सजा मिलती है और अगली गेंद बल्लेबाज को फ्री हिट के रूप में मिलती है।”

इन चीजों पर भी लगे जुर्माना

गावस्कर ने सुझाव दिया कि, ‘फाइन के पैसों का इस्तेमाल खिलाड़ियों के अलग होने से पहले होने वाले टीम डिनर में किया जा सकता है।’ उन्होंने कहा कि, ‘नो-बॉल के अलावा भी खिलाड़ियों पर जुर्माना लगाया जा सकता है, जैसे थ्रो के समय पीछे न हटना या मैदान पर कोई और गलती करना। इन मामलों में पूरी टीम मिलकर तय कर सकती है कि खिलाड़ी पर फाइन लगाया जाए या नहीं।’ गावस्कर ने आगे कहा कि इस मुद्दे पर जल्द ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि इससे क्रिकेट के खेल पर असर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि क्रिकेट में कुछ ही चीजें ऐसी हैं, जो पूरी तरह खिलाड़ियों के नियंत्रण में होती हैं। इनमें बल्लेबाज का अपना गार्ड लेना और गेंदबाज का नो-बॉल न करना शामिल है।

Stocks to Buy: ये 5 स्टॉक्स 55% तक रिटर्न दे सकते हैं, एक्सपर्ट्स ने खरीदने की सलाह दी

Stocks to Buy: शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच ब्रोकरेज फर्मों ने 5 कंपनियों पर खरीदारी की सलाह दी है। इनमें पावर, इंफ्रास्ट्रक्चर, डेटा सेंटर, रिटेल और क्विक कॉमर्स जैसे तेजी से बढ़ते सेक्टर शामिल हैं। ब्रोकरेज के हिसाब से इन शेयरों में 55% तक रिटर्न मिल सकता है। आइए जानते हैं इन 5 स्टॉक्स में ब्रोकरेज को क्या संभावनाएं दिख रही हैं।

  1. Cummins India

ब्रोकरेज फर्म Macquarie ने Cummins India पर ‘आउटपरफॉर्म’ रेटिंग बरकरार रखी है। ब्रोकरेज ने ₹6,150 का टारगेट प्राइस दिया है। मौजूदा स्तर से इसमें करीब 18.43% का रिटर्न मिल सकता है।

पावर जनरेशन कंपनी के लिए बड़ा बिजनेस बना हुआ है। डेटा सेंटर की बढ़ती मांग भी कंपनी की ग्रोथ में अहम भूमिका निभा रही है। साथ ही CPCB IV+ इंजन वारंटी अवधि से बाहर आने पर आफ्टरमार्केट बिजनेस से अतिरिक्त अवसर मिलने की उम्मीद है।

2. Adani Enterprises

मोतीलाल ओसवाल ने अदाणी ग्रुप की फ्लैगशिप कंपनी Adani Enterprises पर ‘Buy’ रेटिंग के साथ ₹3,880 का टारगेट प्राइस दिया है। ब्रोकरेज के मुताबिक, इसमें करीब 25% तक का उछाल देखने को मिल सकता है।

कंपनी एयरपोर्ट, सड़क, रिन्यूएबल एनर्जी, डेटा सेंटर, कॉपर और स्ट्रैटेजिक मैन्युफैक्चरिंग जैसे कारोबार में मौजूद है। ब्रोकरेज को इन लॉन्ग टर्म बिजनेस से ग्रोथ की उम्मीद है।

3. NTPC

Bernstein ने सरकारी पावर कंपनी NTPC पर ‘Buy’ रेटिंग के साथ ₹450 का टारगेट प्राइस दिया है। ब्रोकरेज के मुताबिक शेयर में करीब 32% तक बढ़ोतरी की गुंजाइश है।

ब्रोकरेज के मुताबिक, भारत में बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम की भूमिका उम्मीद से बड़ी हो सकती है। रिन्यूएबल एनर्जी के साथ स्टोरेज बिजनेस NTPC के लिए बड़ा अवसर बन सकता है।

4. Avenue Supermarts

CLSA ने Avenue Supermarts पर ‘हाई-कन्विक्शन आउटपरफॉर्म’ रेटिंग दी है। ब्रोकरेज ने ₹5,723 का टारगेट प्राइस रखा है। इससे शेयर में करीब 49% का रिटर्न मिलने की संभावना है।

ब्रोकरेज का कहना है कि कंपनी का कम ऑपरेटिंग कॉस्ट मॉडल और कम कीमत पर सामान बेचने की रणनीति इसकी बड़ी ताकत है। प्राइवेट लेबल कारोबार और नए स्टोर्स का विस्तार भी ग्रोथ को सहारा दे सकता है।

5. Eternal 327

CLSA ने जोमैटो और ब्लिंकिट की पैरेंट कंपनी Eternal को खरीदने की सलाह के साथ ₹506 का टारगेट प्राइस दिया है। ब्रोकरेज के मुताबिक इसमें करीब 55% तक की तेजी देखने को मिल सकती है।

Blinkit का विस्तार इस निवेश की बड़ी वजहों में शामिल है। कंपनी नए शहरों में पहुंच बढ़ा रही है और डार्क स्टोर्स की संख्या भी बढ़ा रही है। Zomato Gold के जरिए ऑर्डर की बढ़ती संख्या और फूड डिलीवरी बिजनेस में सुधार से भी ग्रोथ की उम्मीद है।

Stocks to Watch: 31 अगस्त को ये 14 स्टॉक्स फोकस में रहेंगे, मिल सकता है तगड़ी कमाई का मौका

Disclaimer: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए सलाह या विचार एक्सपर्ट/ब्रोकरेज फर्म के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदायी नहीं है। यूजर्स को मनीकंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले हमेशा सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

Tukaram Mundhe: “क्या आपको लगता है कि आप भगवान हैं?” बॉम्बे हाई कोर्ट ने IAS तुकाराम मुंढे के FDI को क्यों लगाई फटकार?

Tukaram Mundhe: बॉम्बे हाई कोर्ट ने चर्चित IAS अधिकारी तुकाराम मुंढे की अगुवाई वाली महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) को दो अलग-अलग मामलों में सुनवाई के दौरान जमकर फटकार लगाई। इसके बाद रेगुलेटर को पुणे में सिप्ला (Cipla) की एक फैसिलिटी और मुंबई में मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन (MCA) परिसर में चल रहे पांच रेस्टोरेंट के खिलाफ जारी आदेश वापस लेने पड़े। कोर्ट ने FDA की आलोचना करते हुए कहा कि उसने बिना सोचे-समझे जल्दबाजी में काम किया।

अदालत ने कहा कि कानून का ठीक से विश्लेषण नहीं किया गया। कोर्ट के मुताबिक एक मामले में तो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन किया गया। MCA मामले में बेंच ने रेगुलेटर पर व्यावहारिक नजरिया अपनाने के बजाय किताबी या लकीर का फकीर वाला नजरिया अपनाने का आरोप भी लगाया।

‘क्या आपको लगता है कि आप भगवान हैं?’

बॉम्बे हाई कोर्ट ने सबसे तीखी टिप्पणी बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स में MCA परिसर के पांच रेस्टोरेंट से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की। एक्टिंग चीफ जस्टिस रवींद्र घुगे और जस्टिस गौतम अंखाड की बेंच ने FDA के रवैये पर सवाल उठाए। इस दौरान यह बात सामने आई कि एक नए जांच में पाया गया कि ये रेस्टोरेंट फूड सेफ्टी नियमों का 88% पालन कर रहे थे। कोर्ट ने FDA से पूछा, “क्या आपको लगता है कि आप भगवान हैं। आप कुछ भी कर सकते हैं?” साथ ही यह भी पूछा कि विभाग बार-बार बिना सोचे-समझे जल्दबाजी में क्यों काम करता है।

‘न्यूज 18’ के मुताबिक हाई कोर्ट ने कहा कि उसने पहले भी FDA से मामले पर सोच-समझकर और व्यावहारिक नजरिया अपनाने को कहा था। लेकिन आरोप लगाया कि विभाग ने इसके बजाय किताबी या लकीर का फकीर वाला रवैया अपनाया। अदालत ने कहा, “हम हर समय विभाग और अधिकारियों को फटकार लगाकर थक चुके हैं। अब कड़े आदेश जारी करने का समय आ गया है। हम संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अवमानना ​​की कार्रवाई करेंगे। वे हमें समझाएं या जेल जाएं।”

कामकाज रोकने का आदेश वापस

इसके बाद FDA ने हाई कोर्ट को बताया कि वह पांच रेस्टोरेंट का कामकाज रोकने का अपना आदेश वापस ले लेगा। साथ ही MCA को नया नोटिस जारी करेगा, ताकि उसे M/s शिर्के इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ अपने कॉन्ट्रैक्ट के बारे में जवाब देने का मौका मिल सके। कोर्ट ने इस कदम को मंजूरी देते हुए कहा कि चूंकि रेस्टोरेंट अब फूड सेफ्टी नियमों का पालन कर रहे हैं, इसलिए कामकाज रोकने का आदेश रद्द माना जाएगा। अदालत ने कहा कि अब रेस्टोरेंट फिर से खुल सकते हैं।

‘मच्छर मारने के लिए तलवार का इस्तेमाल न करें’

यह विवाद इसलिए हुआ क्योंकि फूड लाइसेंस MCA के नाम पर जारी किए गए थे। जबकि रेस्टोरेंट M/s शिर्के इंफ्रास्ट्रक्चर चला रही थी। कोर्ट ने कहा कि कानून में ऐसी व्यवस्था को रोकने वाला कोई प्रावधान नहीं है। FDA के फैसला लेने के तरीके पर सवाल उठाए। पीठ ने कहा, “हमें कितनी बार समझाने और संतुलन बनाने की कोशिश करनी चाहिए ताकि विभाग का हौसला न टूटे? हम क्यों कहते हैं, ‘मच्छर मारने के लिए तलवार का इस्तेमाल न करें’?” कोर्ट ने यह भी सवाल किया कि FDA लागू कानून का ठीक से विश्लेषण किए बिना आदेश क्यों जारी कर रहा था?

सिपला का लाइसेंस रद्द करने का फैसला वापस

दूसरे मामले में हाई कोर्ट ने FDA को पुणे के वाडकी में सिपला फार्मा एंड लाइफ साइंसेज लिमिटेड की कैरिंग एंड फॉरवर्डिंग सुविधा के दवा बिक्री लाइसेंस रद्द करने का आदेश वापस लेने के लिए मजबूर किया। ‘रिएक्टिन प्लस’ टैबलेट की पैकेजिंग और उन्हें वापस मंगाने (रिकॉल) की फॉलो-अप जांच के दौरान कथित उल्लंघन पाए जाने के बाद 27 अगस्त से लाइसेंस रद्द कर दिए गए थे।

कोर्ट ने FDA द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया पर सवाल उठाए, जिसमें राज्य सरकार द्वारा घोषित सार्वजनिक छुट्टी के दिन सुनवाई के लिए कंपनी के प्रतिनिधि को बुलाने वाला ईमेल भी शामिल था। अदालत ने FDA से कहा, “आप सराहनीय काम कर रहे हैं। लेकिन अब आप हद से आगे बढ़ रहे हैं। ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। आपने गलत किया है, और अब आपको इस मामले को सुलझाना होगा।”

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मुंढे पिछले कुछ दिनों से एफडीए द्वारा मुंबई में खाने-पीने की जगहों और रेस्तरां (जिनमें कुछ बड़े नाम भी शामिल हैं) के खिलाफ की गई सख्त कार्रवाई के कारण चर्चा में बने हुए हैं। कुछ मामलों में तो इस वजह से कानूनी जांच-पड़ताल भी हुई। ऐसे में, एफडीए कमिश्नर ने कहा कि खाने-पीने के प्रतिष्ठानों पर कार्रवाई तथ्यों और नियमों के पालन की जरूरतों के आधार पर की गई थी।

न नौकरी छोड़ने की जरूरत, न ऑफिस का झंझट! इस साइड बिजनेस से 5 लाख महीने कमाने का दावा

आज के दौर में नौकरी के साथ एक्सट्रा कमाई का रास्ता तलाशने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। कोई ऑनलाइन काम शुरू करता है तो कोई कंटेंट क्रिएशन या छोटे कारोबार में हाथ आजमाता है। इसी बीच एक्स पर एक यूजर की पोस्ट ने लोगों का ध्यान खींचा है, जिसमें एक ऐसे साइड बिजनेस का जिक्र किया गया है, जिसे शुरू करने के लिए बड़े निवेश की जरूरत नहीं बताई गई है। पोस्ट के मुताबिक, कुछ लोग इसी काम को पार्ट-टाइम करते हुए हर महीने करीब 5 लाख रुपये तक कमा रहे हैं।

खास बात यह है कि इसके लिए न अपना ऑफिस खोलने की जरूरत बताई गई है और न ही कर्मचारियों या सामान के स्टॉक का झंझट है। यही वजह है कि सोशल मीडिया पर इस कमाई के मॉडल को लेकर दिलचस्पी बढ़ गई है। हालांकि, असल कमाई कितनी होगी, यह कई बातों पर निर्भर कर सकता है।

न दुकान, न स्टाफ… फिर कमाई कैसे?

एक्स यूजर अंकित पांडे ने बताया कि उनके कुछ दोस्त रियल एस्टेट में फ्रीलांसिंग के जरिए अच्छी कमाई कर रहे हैं। उन्होंने इसे ‘रियल एस्टेट फ्रीलांसिंग’ नाम दिया और दावा किया कि इसे बेहद कम शुरुआती खर्च के साथ शुरू किया जा सकता है।

उनके मुताबिक, सबसे पहले अपने शहर के कई बिल्डरों से संपर्क करना होगा और उनके चैनल पार्टनर प्रोग्राम से जुड़ना होगा। इसके बाद उनके प्रोजेक्ट, कीमत, भुगतान योजना और कब्जे की तारीख जैसी जानकारी समझनी होगी।

असली काम है खरीदार ढूंढना

बिल्डरों से जुड़ने के बाद अगला कदम संभावित ग्राहकों तक पहुंचना है। पांडे के अनुसार, खरीदार सोशल मीडिया, दोस्तों, रिश्तेदारों, सहकर्मियों और अपने निजी नेटवर्क के जरिए खोजे जा सकते हैं। यानी इस काम में दुकान खोलने या कोई सामान खरीदकर रखने की जरूरत नहीं है। मुख्य भूमिका खरीदार और बिल्डर के बीच संपर्क बनाने, भरोसा कायम करने और सौदा पूरा कराने की होती है।

50 लाख के फ्लैट पर कितना बन सकता है कमीशन?

पांडे ने अपनी पोस्ट में एक उदाहरण के जरिए कमाई का गणित समझाया। उनके मुताबिक, अगर 50 लाख रुपये के फ्लैट पर 3 प्रतिशत कमीशन मिले, तो एक सौदे से 1.5 लाख रुपये बन सकते हैं। इसी हिसाब से तीन फ्लैट बिकने पर करीब 4.5 लाख रुपये और चार सौदों पर 6 लाख रुपये तक कमीशन बन सकता है। हालांकि, रियल एस्टेट में कमीशन की दर हर जगह एक जैसी नहीं होती। यह बिल्डर, प्रोजेक्ट और समझौते के आधार पर अलग-अलग हो सकती है।

सुनने में आसान, लेकिन सौदा पक्का करना मुश्किल

सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने इस मॉडल को आकर्षक जरूर माना, लेकिन कई यूजर्स ने इसकी असली चुनौती भी बताई। उनका कहना था कि खरीदार ढूंढना और आखिर में डील बंद करना उतना आसान नहीं है, जितना पोस्ट में दिखाई देता है।

एक यूजर ने कहा कि इस काम में ग्राहकों की तलाश के साथ जोखिम भी जुड़ा होता है। वहीं, दूसरे ने बताया कि कमीशन आकर्षक लग सकता है, लेकिन ग्राहक को मनाकर सौदा पूरा करना काफी मुश्किल होता है।

30 साल से यही काम कर रहे अंकल

एक यूजर ने अपने परिवार का अनुभव साझा करते हुए बताया कि उसके अंकल करीब तीन दशक से रियल एस्टेट का काम कर रहे हैं। कभी उनके महीने में 5-7 घर तक बिक जाते हैं, तो कभी लगातार 4-6 महीने तक एक भी सौदा नहीं होता। उन्होंने यह भी कहा कि उनके परिवार की आर्थिक स्थिति इसलिए संभल जाती है क्योंकि उनकी पत्नी सरकारी नौकरी में हैं। उनके मुताबिक, रियल एस्टेट का यह काम ऐसे व्यक्ति के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है जो अपने परिवार का अकेला कमाने वाला सदस्य हो।

‘साइड इनकम’ का मौका या पूरी तरह बिक्री पर निर्भर काम?

इस पूरी चर्चा ने रियल एस्टेट फ्रीलांसिंग की एक दिलचस्प तस्वीर सामने रखी है। इसमें शुरुआती निवेश कम हो सकता है, लेकिन कमाई पूरी तरह ग्राहकों, बिक्री और सौदे पूरे होने पर निर्भर करती है। यानी कागज पर यह मॉडल जितना आसान दिखता है, असल जिंदगी में उतना ही नेटवर्क, भरोसे और बिक्री की क्षमता का खेल है। सोशल मीडिया पर 5 लाख रुपये महीने की कमाई का दावा भले आकर्षक हो, लेकिन हर व्यक्ति के लिए इतनी आय की गारंटी नहीं मानी जा सकती।

डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर यूज़र द्वारा शेयर किए गए कंटेंट पर आधारित है। मनीकंट्रोल इन दावों की न तो स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है और न ही इनका समर्थन करता है।

VIDEO: पति को अचानक शुरू हुई उल्टियां, रात में दवा लेने निकली डॉक्टर… फिर बताई भारत की वो सुविधा जो विदेश में आसानी से नहीं मिलती

NSE IPO Update: NSE के आईपीओ से पहले SBI का बड़ा ऐलान! ₹30000 करोड़ के मेगा इश्यू में बेचेगा अपनी हिस्सेदारी

SBI to Dilute Stake in NSE IPO: देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) और उसकी सब्सिडियरी एसबीआई कैपिटल मार्केट्स मिलकर नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के प्रस्तावित ₹30,000 करोड़ के आईपीओ में अपनी 1% तक हिस्सेदारी बेचने जा रहे हैं।

इस बात की पुष्टि खुद एसबीआई के चेयरमैन सी एस शेट्टी ने की है। इसके साथ ही उन्होंने बैंक के होम लोन पोर्टफोलियो और हालिया एसबीआई म्यूचुअल फंड आईपीओ को लेकर भी कई अहम जानकारियां साझा की हैं।

NSE IPO में SBI ग्रुप कितना बेचेगा हिस्सा?

एसबीआई चेयरमैन सी एस शेट्टी ने एक इंटरव्यू में बताया कि बैंक और उसकी सहयोगी कंपनी मिलकर एनएसई के आईपीओ (OFS के जरिए) में हिस्सा बेचेंगे। एसबीआई मुख्य रूप से एनएसई में अपनी 0.65% हिस्सेदारी बेचेगा। एसबीआई कैपिटल मार्केट्स अपनी 0.35% हिस्सेदारी बेचेगा। इस तरह एसबीआई ग्रुप मिलकर कुल 1% हिस्सेदारी कैश करेगा। अन्य शेयरधारकों के शामिल होने के आधार पर यह आंकड़ा थोड़ा कम भी हो सकता है।

वर्तमान में कितनी है हिस्सेदारी?

मौजूदा समय में एनएसई में SBI की 3.23% और एसबीआई कैपिटल मार्केट्स की 4.33% हिस्सेदारी है। चेयरमैन ने साफ किया कि फिलहाल बैंक की किसी अन्य सब्सिडियरी कंपनी के मोनेटाइजेशन या आईपीओ की तत्काल कोई योजना नहीं है।

सुपरहिट रहा था SBI Mutual Fund का IPO

हाल ही में एसबीआई ने अपने विदेशी पार्टनर ‘अमुंडी’ के साथ मिलकर एसबीआई म्यूचुअल फंड में लगभग 10% हिस्सेदारी बेची थी। ₹9,800 करोड़ का यह पब्लिक ऑफर निवेशकों के बीच बेहद सुपरहिट रहा और इसे 42 गुना सब्सक्रिप्शन मिला था।लिस्टिंग के बाद एसबीआई की हिस्सेदारी 61.76% से घटकर 55.46% रह गई, जबकि अमुंडी की हिस्सेदारी 3.7% घटकर 32.56% पर आ गई।

होम लोन पोर्टफोलियो ₹10 लाख करोड़ पार करने की तैयारी में

हाउसिंग फाइनेंस सेगमेंट में एसबीआई की बादशाहत कायम है। बैंक जल्द ही एक बड़ा नया रिकॉर्ड बनाने जा रहा है। चालू तिमाही में एसबीआई का होम लोन पोर्टफोलियो ₹10 लाख करोड़ के ऐतिहासिक आंकड़े को पार कर जाएगा। बीते वित्त वर्ष में बैंक ने ₹9 लाख करोड़ का आंकड़ा पार किया था। होम लोन सेगमेंट में एसबीआई की बाजार हिस्सेदारी लगभग 28% है। देशभर में बैंक के 460 से ज्यादा होम लोन प्रोसेसिंग सेंटर्स काम कर रहे हैं, जो ग्राहकों के लिए प्रक्रिया को आसान बनाते हैं।

देश की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम है होम लोन: CS Setty

सी एस शेट्टी ने कहा कि ग्राहक कागजी कार्रवाई की पारदर्शिता, बिल्डर्स की ड्यू-डिलिजेंस और बैंक के भरोसे के कारण एसबीआई से होम लोन लेना पसंद करते हैं।उन्होंने जोर देकर कहा कि होम लोन को केवल एक बैंकिंग प्रोडक्ट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। 200 से अधिक उद्योग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रियल एस्टेट सेक्टर पर निर्भर हैं, इसलिए होम लोन भारत की आर्थिक वृद्धि का एक अभिन्न और महत्वपूर्ण हिस्सा है।

VIDEO: पति को अचानक शुरू हुई उल्टियां, रात में दवा लेने निकली डॉक्टर… फिर बताई भारत की वो सुविधा जो विदेश में आसानी से नहीं मिलती

सोशल मीडिया पर इन दिनों एक डॉक्टर का वीडियो काफी वायरल हो रहा है। वीडियो में उन्होंने बताया कि भारत में रात के समय अचानक तबीयत खराब होने पर दवाएं आसानी से मिल जाती है। वहीं UK और दूसरे पश्चिमी देशों में रात के समय काफी मुश्किल से मिलती है। एक डॉक्टर को कुछ देर के लिए रुकना पड़ा। इस दौरान उन्हें महसूस हुआ कि भारत में स्वास्थ्य से जुड़ी कुछ ऐसी सुविधाएं हैं, जिन पर हम अक्सर ध्यान नहीं देते। उन्होंने भारत और पश्चिमी देशों की हेल्थकेयर व्यवस्था की तुलना करते हुए कहा कि विदेशों में भी कई ऐसी चुनौतियां हैं, जिनका सामना लोगों को करना पड़ता है। भारत में देर रात तक मेडिकल स्टोर खुले रहना और जरूरत के समय आसानी से दवाइयां मिल जाना इनमें शामिल है। इस अनुभव से उन्हें समझ आया कि ये छोटी लगने वाली सुविधाएं असल में कितनी जरूरी हैं।

रात 10 बजे तबीयत हुई थी

डॉ. दीपांजलि शर्मा ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो के जरिए अपना एक्सपीरिएंस शेयर किया। उन्होंने बताया कि, एक शाम उनके डॉक्टर पति की अचानक तबीयत बिगड़ गई। शुरुआत में उन्हें सिरदर्द की शिकायत हुई, लेकिन कुछ देर बाद उल्टी भी होने लगी। उनकी हालत को देखते हुए रात करीब 10 बजे दीपांजलि को जरूरी दवाइयों का इंतजाम करने के लिए घर से बाहर जाना पड़ा। उन्होंने कहा, “मैं उनके लिए कुछ दवाइयां और IV इंजेक्शन लेने जा रही हूं। ऐसे समय में मुझे एहसास होता है कि भारत में रहना कितनी बड़ी सुविधा है।”

तुंरत नहीं मिलती जरूरी दवाएं

शर्मा ने बताया कि, इस घटना ने उन्हें UK और दूसरे पश्चिमी देशों में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने कहा कि डॉक्टर होने के बावजूद विदेशों में तुरंत मेडिकल मदद या जरूरी दवाइयां मिलना आसान नहीं होता, खासकर रात या सामान्य समय के बाद। उन्होंने कहा, “अगर मैं इस समय UK या किसी दूसरे पश्चिमी देश में होती, तो शायद मुझे पहले लाइन में इंतजार करना पड़ता। संभव है कि बहुत ज्यादा भीड़ वाले इमरजेंसी डिपार्टमेंट में मेरे पति को तुरंत इलाज न मिल पाता।” उन्होंने यह भी बताया कि वहां जरूरी दवाइयां इतनी आसानी से उपलब्ध नहीं होतीं कि उन्हें तुरंत जाकर खरीदा और इस्तेमाल किया जा सके।

 

हर देश बेहतर नहीं होता

शर्मा ने बताया कि, भारत में उन्हें रात के समय भी जरूरी दवाइयां और मेडिकल सामान आसानी से मिल गया। वह बाहर जाकर सामान लाई और फिर अपने पति की देखभाल कर सकीं। इसके साथ उन्होंने यह भी कहा कि भारत की हेल्थकेयर व्यवस्था पूरी तरह बेहतर नहीं है और इसमें कई कमियां हैं। उनका कहना था कि हर देश की स्वास्थ्य व्यवस्था में कुछ न कुछ परेशानियां होती हैं, लेकिन जरूरत के समय दवाइयां आसानी से मिल जाना भारत की एक बड़ी सुविधा है। उन्होंने लिखा, “हमारे देश में कई चीजों में सुधार की जरूरत है, लेकिन हमें यह भी याद रखना चाहिए कि दुनिया का कोई भी देश हमें हर मामले में 100/100 वाला सबसे बेहतर अनुभव नहीं देता।”

विदेशों में भी होती है दिक्कतें

उन्होंने माना कि उन्हें भारत में जो सुविधाएं मिलीं, उनमें उनकी व्यक्तिगत स्थिति का भी असर था और देश में हर व्यक्ति को आसानी से स्वास्थ्य सेवाएं मिलना अभी भी आसान नहीं है। उनका कहना था कि जो लोग विदेश जाने को हर मामले में बेहतर मानते हैं, उन्हें वहां की चुनौतियों को भी समझना चाहिए। विदेशों में भी कई ऐसी परेशानियां हैं, जहां कुछ सुविधाएं भारत की तुलना में आसानी से नहीं मिलतीं। उनके मुताबिक, विदेश में रहने के फायदे हैं, लेकिन वहां भी लोगों को कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

लोगों ने किया कमेंट

शर्मा के वीडियो पर लोगों की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कई लोगों ने कहा कि भारत में देर रात तक दवाइयों की दुकानें खुली रहना, डॉक्टर से जल्दी संपर्क हो जाना और जरूरत की दवाइयां आसानी से मिल जाना बड़ी सुविधाएं हैं। वहीं कुछ यूजर्स ने भारत और विदेशों की स्वास्थ्य व्यवस्था की तुलना करते हुए नियमों और डॉक्टर की पर्ची वाली दवाइयों की उपलब्धता जैसे मुद्दों पर भी चर्चा की। कई लोगों ने यह बात भी मानी कि दुनिया में कोई भी जगह पूरी तरह बेहतर या परफेक्ट नहीं है और हर देश में लोगों को कुछ सुविधाओं के साथ कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ता है।