Stocks to Watch: 21 अक्टूबर को Bajaj Finance, Hindustan Zinc, L&T Tech, PC Jeweller समेत इन शेयरों पर रहेगा फोकस

बुधवार, 21 अक्टूबर को कई शेयर फोकस में रहने वाले हैं। वजह हैं- तिमाही नतीजे, कारोबार से जुड़े डेवलपमेंट्स, नई डील या कॉन्ट्रैक्ट, आदि। लिस्ट में पीसी ज्वेलर, अदाणी ग्रीन एनर्जी, बजाज फाइनेंस, L&T टेक्नोलॉजी सर्विसेज, वारी रिन्यूएबल टेक्नोलॉजीस, हिंदुस्तान जिंक, SML महिंद्रा, IREDA जैसे कई नाम शामिल हैं। इन शेयरों में तेज हलचल देखने को मिल सकती है। इसके अलावा बुधवार को मेनबोर्ड और SME दोनों सेगमेंट में 1-1 लिस्टिंग है। वहीं 3 शेयर एक्स-डिविडेंड ट्रेड करने वाले हैं। आइए डिटेल में जानते हैं किन प्रमुख शेयरों पर रहेगी नजर…

आज इन कंपनियों के तिमाही नतीजे

इटर्नल, आदित्य बिड़ला सन लाइफ AMC, विशाल मेगा मार्ट, अदाणी ग्रीन एनर्जी, इंडियन होटल्स कंपनी, केईआई इंडस्ट्रीज, महिंद्रा एंड महिंद्रा फाइनेंशियल सर्विसेज, इंटरनेशनल जेमोलॉजिकल इंस्टीट्यूट, पीसी ज्वेलर, SRF, इंडोसोलर, वेल्सपन स्पेशिएलिटी सॉल्यूशंस

इन शेयरों पर रहेगी नजर

बजाज फाइनेंस: Q2 (जुलाई-सितंबर 2026 ​तिमाही) में सालाना आधार पर कंसोलिडेटेड मुनाफा 29% बढ़कर 6,367 करोड़ रुपये हो गया। नेट इंटरेस्ट इनकम 24% बढ़कर 13,335 करोड़ रुपये हो गई। ग्रॉस NPA घटकर 1.06% रह गया। नेट NPA घटकर 0.42% रह गया।

L&T टेक्नोलॉजी सर्विसेज: Q2 में सालाना आधार पर कंसोलिडेटेड मुनाफा 66.8% बढ़कर 548.2 करोड़ रुपये हो गया। रेवेन्यू 12.1% बढ़कर 3,040.4 करोड़ रुपये हो गया। EBIT 29.8% बढ़कर 496.6 करोड़ रुपये हो गया। EBIT मार्जिन 220 bps बढ़कर 16.3% हो गया। कंपनी ने प्रति शेयर 20 रुपये का अंतरिम डिविडेंड घोषित किया है।

वारी रिन्यूएबल टेक्नोलॉजीस: Q2 में सालाना आधार पर कंसोलिडेटेड मुनाफा 30% घटकर 81.5 करोड़ रुपये रह गया। रेवेन्यू 36.5% बढ़कर 1,057.8 करोड़ रुपये हो गया।

शोभा: Q2 में सालाना आधार पर कंसोलिडेटेड मुनाफा 54.6% गिरकर 33 करोड़ रुपये रहा। रेवेन्यू 31.3% घटकर 967.1 करोड़ रुपये पर आ गया।

डेल्टा कॉर्प: Q2 में सालाना आधार पर कंसोलिडेटेड बेसिस पर कंपनी ने 106.4 करोड़ रुपये का घाटा देखा। पिछले साल यह 25.1 करोड़ रुपये के मुनाफे में थी। रेवेन्यू 12.85% घटकर 159.5 करोड़ रुपये रह गया।

हिंदुस्तान जिंक: Q2 में सालाना आधार पर कंसोलिडेटेड मुनाफा 142.1% बढ़कर 6,412 करोड़ रुपये हो गया। रेवेन्यू 76.5% बढ़कर 15,093 करोड़ रुपये हो गया।

जस्ट डायल: Q2 में सालाना आधार पर मुनाफा 9.7% गिरकर 107.8 करोड़ रुपये हो गया। रेवेन्यू 13.1% बढ़कर 342.8 करोड़ रुपये हो गया।

गैलेंट इस्पात: Q2 में सालाना आधार पर कंसोलिडेटेड मुनाफा 32% घटकर 60.5 करोड़ रुपये और रेवेन्यू 13.1% बढ़कर 1,145.9 करोड़ रुपये हो गया।

पिरामल फाइनेंस: Q2 में सालाना आधार पर कंसोलिडेटेड मुनाफा 67% उछलकर 545 करोड़ रुपये हो गया। नेट इंटरेस्ट इनकम 35% बढ़कर 1,530 करोड़ रुपये रही।

इंडियन रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपमेंट एजेंसी: Q2 में सालाना आधार पर स्टैंडअलोन मुनाफा 0.91% बढ़कर 554 करोड़ रुपये हो गया। रेवेन्यू 14% बढ़कर 2,344 करोड़ रुपये रहा। ऑपरेटिंग प्रॉफिट 16.5% बढ़कर 904 करोड़ रुपये हो गया। ग्रॉस NPA घटकर 3.57% हो गया। नेट NPA घटकर 1.08% हो गया।

SML महिंद्रा: Q2 में सालाना आधार पर मुनाफा 44.4% गिरकर 11.7 करोड़ रुपये रह गया। रेवेन्यू 20.7% बढ़कर 669.8 करोड़ रुपये हो गया।

धामपुर बायो ऑर्गेनिक्स: कंपनी ने भारत में माइकोप्रोटीन के एक्सक्लूसिव उत्पादन के लिए स्विट्जरलैंड की कंपनी ‘प्लैनेटरी SA’ के साथ एक टेक्नोलॉजी लाइसेंसिंग समझौता किया है।

सीगल इंडिया: कंपनी की सब्सिडियरी, ‘जाम खंभालिया जामनगर पावर ट्रांसमिशन लिमिटेड’ ने ‘सेंट्रल ट्रांसमिशन यूटिलिटी ऑफ इंडिया’ के साथ एक ट्रांसमिशन सर्विस एग्रीमेंट किया है। यह समझौता एक इंटरस्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम के विकास और संचालन के लिए है।

Market cues : बाजार के दायरे में ट्रेड करने की उम्मीद, मुनाफे के सौदे पकड़ने के लिए इन अहम स्तरों पर रहे नजर

ट्रांसरेल लाइटिंग: कंपनी के बोर्ड ने ‘NOPL पेस ग्रीन एनर्जी’ में 49% इक्विटी हिस्सेदारी को 20 करोड़ रुपये में खरीदने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। NOPL, भारत सरकार की ‘PM-कुसुम’ योजना के कंपोनेंट C के तहत महाराष्ट्र में लगभग 990 MW (AC) कुल क्षमता वाला सोलर पावर पोर्टफोलियो विकसित कर रही है। इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य कृषि फीडरों के सोलराइजेशन (सौर ऊर्जा से जोड़ने) में मदद करना और सिंचाई के लिए दिन के समय बिजली की उपलब्धता में सुधार करना है।

JSW ड्यूलक्स: कर्नाटक GST विभाग ने अप्रैल 2020 से मार्च 2021 की अवधि के लिए टैक्स डिमांड को संशोधित करते हुए 42.04 करोड़ रुपये का आदेश जारी किया है। इस संशोधित डिमांड में 14.07 करोड़ रुपये का टैक्स, 13.9 करोड़ रुपये का ब्याज और 14.07 करोड़ रुपये का जुर्माना शामिल है। कंपनी को 5 अगस्त को कर्नाटक GST विभाग से एक कारण बताओ नोटिस मिला था, जिसमें इनपुट टैक्स क्रेडिट को अमान्य ठहराते हुए 118.33 करोड़ रुपये की टैक्स डिमांड की गई थी। इस डिमांड में 40.09 करोड़ रुपये का टैक्स, 38.17 करोड़ रुपये का ब्याज और 40.07 करोड़ रुपये का जुर्माना शामिल था।

बल्क डील्स

एक्सप्रो इंडिया: आशीष कचोलिया ने कंपनी में 2.22 लाख इक्विटी शेयर 21.53 करोड़ रुपये में बेचे हैं। शेयरों की यह संख्या कंपनी की पेड-अप इक्विटी कैपिटल के 0.94% के बराबर है।

मेनबोर्ड लिस्टिंग

HD फायर प्रोटेक्ट

SME लिस्टिंग

वैभव व्यापार

ये स्टॉक करेंगे एक्स-डिविडेंड ट्रेड

ICICI प्रूडेंशियल एसेट मैनेजमेंट कंपनी

मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स

एलेकॉन इंजीनियरिंग कंपनी

Stock Split: एक साल में 190% और 5 साल में 1000% चढ़ी कीमत, अब 10 टुकड़ों में टूटेगा शेयर

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

रिलायंस के पास रिफाइनिंग की असाधारण क्षमता! जामनगर दौरे से पहले अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का बड़ा बयान

Marco Rubio Jamnagar Refinery: गुजरात के जामनगर स्थित रिलायंस इंडस्ट्रीज की दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनरी के दौरे से ठीक पहले अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो (Marco Rubio) ने कंपनी की रिफाइनिंग क्षमताओं की जमकर तारीफ की है। नेटवर्क18 के एडिटर-इन-चीफ राहुल जोशी को दिए एक विशेष इंटरव्यू में रुबियो ने कहा कि रिलायंस ग्लोबल एनर्जी सेक्टर में एक बेहद महत्वपूर्ण प्लेयर है और उनका दौरा वेनेजुएला तथा पश्चिमी गोलार्ध से कच्चे तेल के आयात और प्रसंस्करण को बढ़ाने पर केंद्रित होगा।

‘रिलायंस के पास रिफाइनिंग की असाधारण क्षमता’

बुधवार को जामनगर स्थित रिलायंस रिफाइनरी का दौरा करने जा रहे अमेरिकी विदेश मंत्री ने कहा, ‘रिलायंस एक बेहद महत्वपूर्ण कंपनी है। उसके पास कच्चे तेल को रिफाइन करने की असाधारण क्षमता है।’ रुबियो ने ये भी कहा कि रिलायंस की रिफाइनिंग क्षमताएं भारत को अपनी ऊर्जा आपूर्ति को विविध बनाने में बड़ी मदद कर सकती हैं।

वेनेजुएला के कच्चे तेल पर रिलायंस के साथ सहयोग का बड़ा प्लान

रुबियो ने कहा कि वेनेजुएला में कच्चे तेल का उत्पादन बढ़ रहा है और भारत का इतिहास रहा है कि वह वेनेजुएला के भारी और उच्च-सल्फर तेल को आसानी से रिफाइन कर लेता है।

उन्होंने स्पष्ट किया, ‘पश्चिमी गोलार्ध से आने वाले तेल को जब भारत में रिफाइन किया जाता है, तो यह भारत के लिए भी फायदेमंद है और हमारे लिए भी।’ अमेरिकी विदेश मंत्री ने अमेरिकी ऊर्जा क्षेत्र में रिलायंस के मौजूदा निवेश और रिफाइनिंग क्षमताओं की भी सराहना की।

जामनगर में है दुनिया का सबसे बड़ा रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स

रिलायंस इंडस्ट्रीज जामनगर में दुनिया का सबसे बड़ा सिंगल-साइट रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स चलाती है, जिसकी कच्चा तेल प्रसंस्करण क्षमता लगभग 14 लाख बैरल प्रति दिन है।

इस कॉम्प्लेक्स में दो बड़ी रिफाइनरी शामिल हैं, जो वेनेजुएला द्वारा उत्पादित भारी और उच्च-सल्फर ग्रेड जैसे जटिल कच्चे तेल को भी आसानी से प्रोसेस करने में सक्षम हैं।

‘बस कुछ हफ्तों की बात…’, भारत से ट्रेड डील पर US विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने दे दिया बहुत बड़ा संकेत

Disclaimer: मनीकंट्रोल नेटवर्क18 ग्रुप का हिस्सा है। नेटवर्क18 का नियंत्रण इंडिपेंडेंट मीडिया ट्रस्ट के पास है, जिसकी एकमात्र लाभार्थी रिलायंस इंडस्ट्रीज है।

Marco Rubio Interview: ‘भारत-अमेरिका ट्रेड डील जल्द’, जानिए ईरान युद्ध, आतंकवाद से लेकर रूसी तेल की खरीद पर क्या बोले मार्को रुबियो

Marco Rubio Interview: अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भारत के साथ ट्रेड डील, रूस से तेल खरीदने, पाकिस्तान, ईरान और क्वाड जैसे अहम मुद्दों पर बात की। नेटवर्क18 के ग्रुप एडिटर-इन-चीफ राहुल जोशी को दिए एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि भारत-अमेरिका ट्रेड डील लगभग तैयार है। इसे पूरा होने में महीनों नहीं, बल्कि कुछ हफ्ते लगने की उम्मीद है।

रुबियो ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ अपने रिश्तों की भी तारीफ की। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के पास आपसी संबंध मजबूत करने के असाधारण अवसर हैं। रुबियो ने रूस से तेल खरीद, पाकिस्तान में आतंकवाद और ईरान युद्ध के बारे में भी बात की।

भारत-अमेरिका ट्रेड डील

रुबियो ने कहा कि ट्रेड डील अब अंतिम चरण में है। कुछ तकनीकी मुद्दों को सुलझाना और समझौते की भाषा को अंतिम रूप देना बाकी है। उनके मुताबिक, घोषणा से पहले जरूरी है कि दोनों देश हर शर्त पर सहमत हों। उन्हें उम्मीद है कि डील कुछ हफ्तों में पूरी हो जाएगी।

भारत को दूसरे देशों के मुकाबले बेहतर टैरिफ मिलने के सवाल पर रुबियो ने कहा कि किसी भी ट्रेड डील का मकसद मौजूदा स्थिति से बेहतर शर्तें हासिल करना होता है। लेकिन इससे भी जरूरी है कि दोनों देशों के व्यापारिक रिश्ते लंबे समय तक टिकाऊ रहें।

उन्होंने कहा कि हर देश के अपने राष्ट्रीय हित होते हैं। भारत अपने हितों की रक्षा करेगा और अमेरिका भी ऐसा ही करेगा। लेकिन दोस्ती और सहयोग की वजह से दोनों देश मतभेदों को सुलझा सकते हैं। रुबियो के मुताबिक, समझौता ऐसा होना चाहिए, जो कुल मिलाकर दोनों देशों के लिए फायदेमंद हो।

रूस से तेल खरीदने पर भारत की स्थिति समझते हैं रुबियो

अमेरिका रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर टैरिफ और प्रतिबंध लगाने की बात करता है, जबकि खुद भी रूस से डीजल खरीद रहा है। इस सवाल पर रुबियो ने कहा कि यूक्रेन युद्ध पांचवें साल में पहुंच चुका है और इसे खत्म करना जरूरी है। लेकिन रूस पर प्रतिबंधों का असर सिर्फ उसी देश पर नहीं पड़ता। रूस के साथ कारोबार करने वाले दूसरे देशों को भी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

उन्होंने कहा कि अमेरिका के सामने दो चुनौतियां हैं। पहली, रूस पर दबाव बनाना, ताकि वह युद्ध खत्म करने के लिए समझौते पर आए। दूसरी, यह देखना कि इस दबाव का असर दूसरे देशों की अर्थव्यवस्था पर कितना पड़ रहा है।

रुबियो के मुताबिक, यूक्रेन युद्ध को लेकर अमेरिका के हितों के साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले असर को भी देखना जरूरी है। उन्होंने माना कि रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर भारत और अमेरिका के बीच तनाव है। उम्मीद जताई कि ट्रेड डील और बातचीत से मतभेद कम हो सकते हैं।

अमेरिका में भारतीयों के खिलाफ नफरत

अमेरिका के इलिनॉय स्टेट में एक हिंदू मंदिर पर हमले की कथित साजिश और भारतीयों के खिलाफ नफरत के सवाल पर रुबियो ने कहा कि कोई भी देश ऐसी घटनाओं से पूरी तरह अछूता नहीं है। हर समाज में कुछ लोग अज्ञानता और नफरत के कारण गलत काम करते हैं।

हालांकि, उन्होंने इस बात से इनकार किया कि अमेरिका में भारतीयों के खिलाफ नफरत व्यापक स्तर पर फैली हुई है। उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाओं के बाद भारतीय-अमेरिकी समुदाय के साथ आसपास के लोग भी पीड़ितों के समर्थन में खड़े होते हैं।

रुबियो ने विस्कॉन्सिन में सिख समुदाय के साथ हुई एक भयावह घटना का भी जिक्र किया। उन्होंने अमेरिका में यहूदी विरोधी घटनाओं में बढ़ोतरी पर चिंता जताई। उनके मुताबिक, नेताओं को ऐसी नफरत को बढ़ावा नहीं देना चाहिए, न ही उसका बचाव करना चाहिए या उसे नजरअंदाज करना चाहिए।

पाकिस्तान पर अमेरिकी नीति

पाकिस्तान को लेकर अमेरिकी नीति पर रुबियो ने कहा कि अमेरिका दुनिया में कहीं भी आतंकवाद और उसे समर्थन देने वालों के खिलाफ है। हालांकि, विदेश मंत्री के तौर पर उन्हें उन देशों के साथ भी संबंध बनाए रखने पड़ते हैं, जिनसे कुछ मुद्दों पर मतभेद हैं।

राहुल जोशी ने उन्हें याद दिलाया कि 2025 में अमेरिकी सीनेटर रहते हुए रुबियो ने पाकिस्तान को अमेरिकी सुरक्षा सहायता रोकने से जुड़ा विधेयक लाने की बात कही थी, अगर वह भारत के खिलाफ आतंकवाद को समर्थन देता है। उनसे पूछा गया कि क्या अब उनकी नीति बदल गई है।

रुबियो ने कहा कि पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार हैं और भौगोलिक स्थिति के लिहाज से भी अमेरिका के लिए उससे बातचीत करना जरूरी है। उन्होंने इसकी तुलना भारत के ईरान के साथ संबंधों से की। उनके मुताबिक, भारत को भी ईरान के नेताओं से बातचीत करनी पड़ती है, भले ही कुछ मुद्दों पर मतभेद हों।

रुबियो ने कहा कि पाकिस्तान के साथ संबंध बनाए रखने से अमेरिका को उन मुद्दों पर बातचीत करने का मौका मिल सकता है, जिनसे भारत को चिंता है। इससे आतंकवाद को समर्थन देने वाली गतिविधियों को रोकने में मदद मिलने की उम्मीद भी की जा सकती है।

ईरान और होर्मुज स्ट्रेट पर तनाव

ईरान के साथ संघर्ष और होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों पर हमलों को लेकर रुबियो ने कहा कि ईरान की सरकार के साथ समझौता करना मुश्किल है। उन्होंने ईरान की तुलना नाजी जर्मनी से की और आरोप लगाया कि ईरान व्यावसायिक जहाजों को निशाना बना रहा है। और ऐसे नाविकों की जान खतरे में डाल रहा है, जिनका युद्ध से कोई लेना-देना नहीं है।

रुबियो ने कहा कि अमेरिका हर रात समुद्री जहाजों की सुरक्षा के लिए काम कर रहा है। उनके मुताबिक, ईरान की ओर से दागे जाने वाले ज्यादातर ड्रोन और मिसाइलों को नष्ट कर दिया जाता है। हालांकि, कुछ हमले जहाजों तक पहुंच जाते हैं। इससे जहाजों को नुकसान होता है और लोगों की जान भी जाती है।

उन्होंने खास तौर पर भारतीय नाविकों की मौत का जिक्र किया। रुबियो ने कहा कि समुद्र में बड़ी संख्या में भारतीय नाविक काम करते हैं। इसी वजह से इन हमलों में कई भारतीयों की भी जान गई है। उन्होंने ईरान से ऐसे हमले रोकने की अपील की।

क्वाड की बैठक साल के अंत से पहले

रुबियो ने उम्मीद जताई कि क्वाड देशों के नेताओं की बैठक इस साल के अंत से पहले होगी। उन्होंने बताया कि बैठक फिलीपींस की राजधानी मनीला में आसियान सम्मेलन के दौरान आयोजित करने पर सहमति बनी है। हालांकि, तारीख अभी तय नहीं हुई है।

क्वाड में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। रुबियो ने बताया कि विदेश मंत्री बनने के बाद उनकी पहली बैठक क्वाड से जुड़ी थी, जिसमें जयशंकर भी शामिल थे। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच सात या आठ बार बातचीत हो चुकी है। उन्होंने अटलांटा में G20 के दौरान एक और बैठक होने की जानकारी भी दी।

रुबियो के मुताबिक, क्वाड अब सिर्फ बैठकों और समझौतों तक सीमित नहीं है। इसके तहत ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि अगली शिखर बैठक में भी ऐसे फैसलों और उनके नतीजों की घोषणा होनी चाहिए, जिनका वास्तविक असर दिखाई दे।

जयशंकर के साथ रिश्तों की तारीफ

रुबियो ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ अपने रिश्तों को शानदार बताया। उन्होंने कहा कि विदेश मंत्री बनने के बाद उनकी पहली बैठक में जयशंकर शामिल थे। इसके बाद दोनों कम से कम 12 बार मिल चुके हैं। जयशंकर चार बार अमेरिका भी गए हैं। दोनों की मुलाकातें अंतरराष्ट्रीय बैठकों और सम्मेलनों में भी हुई हैं।

रुबियो ने कहा कि जब भी दोनों किसी बैठक या कार्यक्रम के लिए एक ही शहर में होते हैं, तो मिलने का समय जरूर निकालते हैं। उनके मुताबिक, पिछले डेढ़ साल में दोनों के बीच मजबूत कामकाजी रिश्ता बना है। इससे कई संवेदनशील और मुश्किल मुद्दों को संभालने में मदद मिली है।

जामनगर में रिलायंस से मुलाकात क्यों?

रुबियो ने अपनी जामनगर यात्रा को रिलायंस की रिफाइनिंग क्षमता और ऊर्जा सहयोग से जोड़ा। उन्होंने कहा कि रिलायंस के पास कच्चे तेल को उपयोगी उत्पादों में बदलने की असाधारण क्षमता है। उन्होंने इसे भारत की ऊर्जा जरूरतों के लिए अहम बताया।

रुबियो के मुताबिक, रिलायंस भारत को ऊर्जा आपूर्ति के अलग-अलग स्रोतों से जोड़ने में मदद कर सकती है। उन्होंने वेनेजुएला के तेल का उदाहरण दिया। उनके मुताबिक, वेनेजुएला अपना तेल उत्पादन बढ़ा रहा है और भारत लंबे समय से इस तरह के कच्चे तेल को रिफाइन करने में सक्षम रहा है।

उन्होंने यह भी बताया कि रिलायंस ने अमेरिका में रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाने के लिए निवेश किया है। रुबियो ने कहा कि जामनगर में कंपनी के कामकाज को देखने और उसके अधिकारियों से बातचीत करने का मकसद ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की संभावनाएं तलाशना है।

उन्होंने कहा कि खास तौर पर पश्चिमी गोलार्ध से आने वाले कच्चे तेल को रिफाइन करने में सहयोग दोनों देशों के लिए फायदेमंद हो सकता है। इससे भारत को ऊर्जा आपूर्ति के नए विकल्प मिलेंगे और अमेरिका को भी लाभ होगा।

‘बस कुछ हफ्तों की बात…’, भारत से ट्रेड डील पर US विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने दे दिया बहुत बड़ा संकेत

अमेरिका ने भारत को रिफाइनिंग सुपरपावर बताया:विदेश मंत्री बोले- यहां वेनेजुएला का कच्चा तेल साफ होगा; दुनिया की तेल आपूर्ति बढ़ाने में मदद मिलेगी

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भारत को ‘रिफाइनिंग सुपरपावर’ बताया। उन्होंने कहा कि भारत के पास भारी कच्चे तेल को रिफाइन करके पेट्रोल, डीजल और दूसरे ईंधन बनाने की क्षमता है। न्यूज एजेंसी ANI से बात करते हुए मार्को रुबियो ने कहा, मेरा मानना है कि जैसे-जैसे वेनेजुएला का ज्यादा तेल बाजार में आएगा, भारत उसे रिफाइन कर सकता है। इससे दुनिया में तेल आपूर्ति बढ़ाने में मदद मिलेगी। भारतीय कंपनियां वेनेजुएला में भी बढ़ा सकती हैं तेल उत्पादन रुबियो ने वेनेजुएला में भारतीय कंपनियों की मौजूदा तेल परियोजनाओं का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि भारतीय कंपनियां वहां पहले से मौजूद तेल संपत्तियों से उत्पादन बढ़ा सकती हैं। रुबियो के मुताबिक, इस मुद्दे पर भारत के साथ पहले भी बातचीत हो चुकी है। उन्होंने कहा कि भारत इस दिशा में काम करने के लिए तैयार और इच्छुक नजर आ रहा है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस योजना को आगे बढ़ाने में अमेरिकी प्रतिबंधों और अन्य पाबंदियों से जुड़े मुद्दे सामने आ सकते हैं। इन पर अमेरिका और भारत को मिलकर काम करना होगा। रुबियो बोले- दोनों देश 21वीं सदी की दिशा तय कर सकते हैं मुंबई में ‘फ्रीडम 250’ कार्यक्रम में अमेरिकी विदेश मंत्री ने भारत और अमेरिका के बीच उन अहम मुद्दों पर असाधारण तालमेल है, जो दोनों देशों के राष्ट्रीय हितों को तय करते हैं। उन्होंने कहा कि दुनिया की दो बड़ी शक्तियां मिलकर 21वीं सदी की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। रुबियो ने कहा, दुनिया के कोई भी दो देश हर मुद्दे पर पूरी तरह सहमत नहीं हो सकते। कुछ मामलों में मतभेद होंगे। लेकिन उन अहम मुद्दों पर, जो भारत और अमेरिका के राष्ट्रीय हितों को तय करते हैं, दोनों देशों के बीच असाधारण तालमेल है। जयशंकर बोले- भारत-अमेरिका के रिश्ते लगातार मजबूत हुए विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि भारत और अमेरिका के संबंध पिछले कई दशकों में काफी आगे बढ़े हैं। दोनों देशों के बीच सहयोग अब बुनियादी ढांचे, शिक्षा, खाद्य और कृषि, तकनीक, ऊर्जा, रक्षा और नागरिक उड्डयन जैसे कई क्षेत्रों तक फैल चुका है। जयशंकर ने कहा, हमारे संबंधों ने वास्तव में लंबा सफर तय किया है। इतिहास में दर्ज है कि कई अमेरिकी भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के समर्थक थे। आजादी के बाद भी हमारी साझेदारी ने भारत के विकास में वास्तविक योगदान दिया है। जयशंकर ने अमेरिकी तकनीकी क्षेत्र में भारतीय प्रतिभाओं के योगदान को भी अहम बताया। उन्होंने माना कि वैश्विक चुनौतियों से निपटने के तरीकों को लेकर दोनों देशों के बीच अलग-अलग राय रही है। इसके बावजूद पिछले कुछ दशकों में साझेदारी लगातार बढ़ी है और इसमें सहयोग के नए क्षेत्र जुड़ते गए हैं। मार्को रुबियो और मुकेश अंबानी की कल मुलाकात अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो बुधवार को जामनगर में दुनिया के सबसे बड़े रिफाइनरी कॉम्प्लेक्स का दौरा करेंगे। इस दौरान वे रिलायंस के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर मुकेश अंबानी से भी मिलेंगे। रूबियो रिलायंस के साथ वेनेजुएला का कच्चा तेल रिफाइन करने पर बातचीत करेंगे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक रिलायंस इंडस्ट्रीज अमेरिका के टेक्सास में एक ऑइल रिफाइनरी में बड़ा निवेश करने की तैयारी में है, जो 50 साल में अमेरिका में बनने वाली पहली रिफाइनरी होगी।इसी वजह से यह मुलाकात काफी अहम मानी जा रही है। रूबियो का जामनगर दौरा 3 वजहों से अहम… 1. अमेरिका में डीजल 155 रुपए के पार अमेरिका में डीजल की कीमतें 6 डॉलर प्रति गैलन के पार हैं, यानी करीब 155 रुपए प्रति लीटर। इसके चलते ट्रक ड्राइवर, किसान और माल ढुलाई कारोबारी परेशान हैं। ट्रम्प सरकार चाहती है कि 3 नवंबर को होने वाले मिड टर्म इलेक्शन से पहले अमेरिका में पर्याप्त डीजल सप्लाई हो सके। इसलिए अमेरिका रूस से डीजल खरीद रहा है। रिलायंस भी सस्ती कीमतों में कच्चा तेल रिफाइन करके अमेरिका को पेट्रोल-डीजल बेच सकता है, जिससे अमेरिका फ्यूल क्राइसिस से बच सके। 2. वेनेजुएला से और तेल खरीदे रिलायंस जनवरी में वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार करने के बाद से अमेरिकी सरकार ही विदेशों में वेनेजुएला का तेल बेच रही है। रिलायंस वेनेजुएला के सबसे बड़े तेल खरीदारों में से एक है। ग्लोबल ट्रेड इंटेलिजेंस फर्म Kpler के मुताबिक, सितंबर में भारत ने वेनेजुएला से रोजाना 2.57 लाख बैरल तेल मंगाया। इसका 76% हिस्सा रिलायंस ने खरीदा। अमेरिका चाहता है कि रिलायंस वेनेजुएला से और ज्यादा तेल खरीदे। क्योंकि अमेरिका कई बार कह चुका है कि भारत वेनेजुएला से तेल खरीदे। हालांकि सरकारी तेल कंपनियों ने ऐसा नहीं किया। 3. अमेरिका में रिलायंस का 300 अरब डॉलर का निवेश रिलायंस अमेरिका के टेक्सास राज्य में एक नई रिफाइनरी खोल रही है, जो 50 साल में अमेरिका में बनने वाली पहली रिफाइनरी होगी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने मार्च 2026 में इसे 300 अरब डॉलर का सौदा बताया था। अमेरिका चाहता है कि ये निवेश जल्द से जल्द हो। दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनरी है जामनगर रिलायंस के मुताबिक, जामनगर रिफाइनरी एक ही जगह पर बनी दुनिया की सबसे बड़ी और आधुनिक रिफाइनरी है। यहां हर दिन 14 लाख बैरल कच्चे तेल को प्रोसेस करने की क्षमता है।

भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर जल्द लगेगी मुहर? मार्को रुबियो ने दिए बड़े संकेत

अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो मंगलवार को तीन दिवसीय भारत दौरे पर मुंबई पहुंचे हैं। इस दौरे के दौरान भारत और अमेरिका के बीच व्यापार और रणनीतिक संबंधों को मजबूत करने पर चर्चा होने की उम्मीद है। अमेरिका के विदेश मंत्री रुबियो ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ होने वाली बैठक से पहले दोनों देशों के बीच सहयोग और आगे की योजनाओं को लेकर अपनी बात रखी। उनके इस दौरे को भारत-अमेरिका संबंधों के लिहाज से अहम माना जा रहा है। मुंबई में पत्रकारों से बातचीत के दौरान मार्को रुबियो ने कई अहम अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी बात रखी।

उन्होंने यूक्रेन युद्ध, अमेरिका के हथियार नियंत्रण से जुड़े मामलों और रूस से तेल खरीदने को लेकर जारी चर्चाओं जैसे विषयों पर चर्चा की। इन मुद्दों को लेकर भारत और अमेरिका के बीच होने वाली बातचीत पर भी सबकी नजरें टिकी हुई हैं।

पॉजिटिव नतीजे देखने को मिलेगा

लंबे समय से चर्चा में चल रहे भारत-अमेरिका द्विपक्षीय समझौते की स्थिति पर बात करते हुए मार्को रुबियो ने साफ किया कि अमेरिकी विदेश विभाग सीधे तौर पर व्यापार समझौते पर बातचीत नहीं करता है। उन्होंने कहा, “​​ट्रेड एग्रीमेंट पर बातचीत की जिम्मेदारी विदेश विभाग की नहीं है, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में हमारी अहम भूमिका है। मैं और मेरे काउंटरपार्ट, नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर इस समझौते को लेकर काफी गंभीर हैं। हम इसे पूरा करने के बेहद करीब हैं। मेरा मानना है कि समझौते को अंतिम रूप देने के लिए अब केवल कुछ मुद्दों पर काम करना बाकी है, इसलिए इसके जल्द पूरा होने की उम्मीद है।”

उन्होंने आगे कहा कि, “हम चाहते हैं कि जल्द ही इस बारे में अच्छी खबर सामने आए और इसके बाद समझौते पर हस्ताक्षर किए जाएं। हमें पूरा भरोसा है कि आने वाले समय में इस दिशा में पॉजिटिव नतीजे देखने को मिलेंगे।”

रिलायंस के साथ होगी बैठक

इसके अलावा, उन्होंने बताया कि अमेरिकी डेलीगेशन वेनेजुएला में तेल उत्पादन को लेकर रिलायंस के साथ बैठक करेगा। उन्होंने कहा कि भारत ने अपनी पेट्रोलियम खरीद के स्रोतों में विविधता लाने की दिशा में काफी प्रगति की है, जिसे उन्होंने एक समझदारी भरा कदम बताया।

ग्लोबल एनर्जी जरूरतों को पूरा करने में भारत की भूमिका पर बात करते हुए मार्को रुबियो ने कहा कि, “भारत तेल रिफाइनिंग के मामले में काफी मजबूत है। उन्होंने बताया कि भारत के पास भारी कच्चे तेल को साफ करने और उससे उपयोगी ईंधन बनाने की क्षमता है और वह पहले भी ऐसा कर चुका है।” रुबियो के मुताबिक, “वेनेजुएला से तेल की आपूर्ति बढ़ने पर भारत इसका इस्तेमाल कर सकता है। उन्होंने ये भी कहा कि भारत के पास वेनेजुएला में पहले से ही तेल उत्पादन से जुड़े अधिकार हैं, जिनकी मदद से वह वहां अपना तेल उत्पादन बढ़ा सकता है।”

मार्को रुबियो ने तेल को लेकर क्या कहा

उन्होंने आगे कहा, “ये सभी सकारात्मक बातें हैं। मैं यह नहीं कह रहा कि दुनिया भर में चल रही घटनाओं के कारण तेल की आपूर्ति में जो कमी आ सकती है, उसे केवल वेनेजुएला ही पूरा कर सकता है। लेकिन मेरा मानना है कि लंबे समय में वेनेजुएला इसमें अहम योगदान दे सकता है और कम समय में भी कुछ राहत पहुंचा सकता है। यह उन मुद्दों में से एक है, जिन पर हम चर्चा करेंगे। भारत के साथ इस विषय पर पहले भी बातचीत हो चुकी है और वह इसके लिए तैयार नजर आ रहा है। भारत इस दिशा में आगे बढ़ने को इच्छुक है, हालांकि पाबंदियों से जुड़ी कुछ बाधाएं सामने आ सकती हैं, जिनका हमें समाधान निकालना होगा।”

दोनों देशों के संबंधों को और मजबूत बनाना

अपने भारत दौरे के महत्व पर बात करते हुए मार्को रुबियो ने कहा कि, “भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर इस साल चार बार अमेरिका का दौरा कर चुके हैं।” उन्होंने भारत को दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश और सबसे बड़ा लोकतंत्र बताते हुए कहा कि, अमेरिका के लिए भारत एक अहम व्यापारिक और कारोबारी साझेदार है। रुबियो ने दोनों देशों के बीच रक्षा क्षेत्र में सहयोग और क्वाड में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका का भी जिक्र किया। उन्होंने भारत को अमेरिका का मजबूत रणनीतिक साझेदार बताया और कहा कि दोनों देशों के बीच संबंधों को और मजबूत बनाने के लिए अमेरिकी अधिकारियों को भारत के अधिक दौरे करने चाहिए।

यूक्रेन को लेकर क्या कहा

इसके अलावा, मार्को रुबियो ने यूक्रेन युद्ध और अमेरिका के हथियार नियंत्रण से जुड़े अहम अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी अपनी बात रखी। उन खबरों पर प्रतिक्रिया देते हुए, जिनमें कहा गया था कि डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी रक्षा प्रणाली इस्तेमाल करने वाले सहयोगी देशों को यूक्रेन के लिए पैट्रियट मिसाइलें भेजने की मंजूरी रोक दी थी, रुबियो ने कहा कि यूक्रेन को जानबूझकर किसी भी तरह की मदद से वंचित नहीं किया जा रहा था। उन्होंने यह भी बताया कि ट्रंप उन आरोपों से नाराज थे, जिनमें कहा जा रहा था कि उनके फैसलों से यूक्रेन की स्थिति कमजोर हो रही है।

इसके अलावा, मार्को रुबियो ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि अगर चीन, रूस और अमेरिका के बीच हथियारों पर नियंत्रण को लेकर सहमति बनती है, तो यह पूरी दुनिया के लिए एक सकारात्मक कदम होगा। उन्होंने संकेत दिया कि इन तीनों देशों के बीच इस मुद्दे पर बातचीत आगे बढ़ने से वैश्विक सुरक्षा को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।

Neogen Chemicals Share Price: एनालिस्ट की पसंद बना ये केमिकल स्टॉक, दे सकता है 24% का रिटर्न

Neogen Chemicals Share Price: पिछले 6 महीनों में अच्छे रिटर्न के बाद घरेलू ब्रोकरेज फर्म ‘एंटीक स्टॉक ब्रोकिंग’ ने Neogen Chemicals पर कवरेज शुरू किया है। उन्होंने इसे ‘Buy’ की रेटिंग दी है और ₹3,050 का टारगेट प्राइस तय किया है। इसका मतलब है कि ₹2,482 के मौजूदा मार्केट प्राइस से इसमें लगभग 23% की तेजी आ सकती है।

ब्रोकरेज का मानना ​​है कि स्पेशलिटी केमिकल्स बनाने वाली यह कंपनी अब कमाई में तेज बढ़ोतरी के दौर में प्रवेश करने वाली है। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि कंपनी का बैटरी केमिकल्स का कारोबार बढ़ रहा है, जिसे घरेलू बैटरी मैन्युफैक्चरिंग, ग्राहकों की मंजूरी और चीन के बाहर की सप्लाई चेन में मिल रहे मौकों का समर्थन मिल रहा है।

एंटीक स्टॉक ब्रोकिंग ने कहा Neogen Chemicals के पास एक मजबूत स्पेशलिटी केमिकल्स कारोबार है और साथ ही बैटरी के क्षेत्र में भी बड़े मौके हैं। चूंकि प्लांट काफी हद तक तैयार हो चुके हैं और ग्राहकों द्वारा मंजूरी की प्रक्रिया चल रही है, इसलिए मुख्य रुकावटें अब पीछे छूट गई हैं। अब कमाई में तेजी आना बाकी है, जो विकास और री-रेटिंग का एक बेहतरीन मौका बनाता है।”

ब्रोकरेज को उम्मीद है कि FY26 से FY30 के बीच Neogen का रेवेन्यू, EBITDA और टैक्स के बाद का एडजस्टेड प्रॉफिट (PAT) क्रमशः 45%, 49% और 87% की कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) से बढ़ेगा। हालांकि, इस निवेश की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि नई सुविधाएं समय पर शुरू होती हैं या नहीं, ग्राहक कितना माल खरीदते हैं, और कंपनी अपने बढ़े हुए कर्ज को कैसे संभालती है।

ब्रोकरेज स्टॉक पर बुलिश क्यों

आने वाले वर्षों में बैटरी केमिकल्स, नियोजेन के विकास का सबसे बड़ा जरिया बनने की उम्मीद है। इसकी सब्सिडियरी कंपनी, ‘नियोजेन आयोनिक्स’, बैटरी इलेक्ट्रोलाइट और लिथियम हेक्साफ्लोरोफॉस्फेट (LiPF6) बनाती है। LiPF6 एक महत्वपूर्ण सॉल्ट है जिसका इस्तेमाल लिथियम-आयन बैटरी में किया जाता है। कंपनी इसके लिए ‘MU आयोनिक सॉल्यूशंस’ की जापानी मैन्युफैक्चरिंग तकनीक का इस्तेमाल करती है और जापान की ‘मोरिता’ के साथ एक जॉइंट वेंचर के जरिए अपना सॉल्ट कारोबार चलाती है।

एंटीक का अनुमान है कि नियोजेन के कुल रेवेन्यू में बैटरी केमिकल्स का हिस्सा FY26 के 4% से बढ़कर FY30 तक 62% हो जाएगा। FY26 तक यह सेगमेंट घाटे में था, क्योंकि उस दौरान इलेक्ट्रोलाइट और सॉल्ट बनाने की सुविधाएं तैयार हो रही थीं और ग्राहकों से मंजूरी लेने की प्रक्रिया चल रही थी। ब्रोकरेज को उम्मीद है कि FY27 तक यह कारोबार EBITDA के स्तर पर ‘ब्रेक-ईवन’ (यानी बिना नुकसान या मुनाफे की स्थिति) तक पहुंच जाएगा। एंटीक स्टॉक ब्रोकिंग का कहना है कि, “कमीशनिंग में देरी के कारण काम की गति (रैंप-अप) कुछ आगे खिसक गई है, लेकिन इससे मध्यम अवधि की कमाई के अनुमानों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि FY30E (वित्त वर्ष 2030) के हमारे अनुमान जिन क्षमताओं और ग्राहकों की मंजूरी पर आधारित हैं, वे पहले से ही मौजूद हैं।”

ब्रोकरेज का मानना ​​है कि ग्राहकों द्वारा दी जाने वाली योग्यता(क्वालिफिकेशन) कंपनी को एक प्रतिस्पर्धी बढ़त दिला सकती है। इस तरह की मंजूरी मिलने में 12-24 महीने लग सकते हैं, और एक बार किसी उत्पाद को मंजूरी मिल जाने के बाद, बैटरी निर्माता आमतौर पर अपने सप्लायर को बदलना नहीं चाहते। नियोजेन ने अमेरिका के तीन इलेक्ट्रोलाइट निर्माताओं के साथ अपने प्लांट का अंतिम ऑडिट पूरा कर लिया है। इससे कंपनी उन अमेरिकी टैक्स-क्रेडिट नियमों से जुड़ी मांग को पूरा करने की स्थिति में आ गई है, जो 2027 से कुछ चीनी सप्लायरों से सामान लेने पर रोक लगाते हैं।

भारत में बैटरी निर्माण क्षमता बढ़ने के साथ, घरेलू स्तर पर भी अवसर बढ़ सकते हैं। नियोजेन की दहेज और पाखाजन इकाइयां स्थानीय सेल निर्माताओं को सेवा देने के लिए तैयार हैं, जबकि इसकी लिथियम सॉल्ट क्षमता निर्यात के अतिरिक्त अवसर प्रदान करती है। बैटरी रसायनों के अलावा, कंपनी का स्पेशलिटी केमिकल्स का स्थापित कारोबार कमाई का एक स्थिर आधार देता है। इसे कॉन्ट्रैक्ट सिंथेसिस एंड मैन्युफैक्चरिंग (CSM), एडवांस्ड इंटरमीडिएट्स और दहेज प्लांट में आग लगने की घटना के बाद उत्पादन में हुए सुधार से भी मजबूती मिलती है।

स्टॉक का परफॉर्मेंस

इस केमिकल स्टॉक में पिछले 3 महीनों में 14%, 6 महीनों में 64% और पिछले 1 साल में 70% की तेजी आई है। हालांकि, हाल के समय में इसमें 1 हफ्ते में 2% और पिछले 1 महीने में 0.3% की गिरावट देखी गई है। अक्टूबर 2026 में यह स्टॉक अपने 52-हफ्तों के उच्चतम स्तर ₹2785 पर पहुंच गया था, जबकि दिसंबर 2025 में यह अपने 52-हफ्तों के निचले स्तर ₹978 पर था।

 

(डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सार्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

Daily Voice : अमेरिकी मध्यावधि चुनाव बाजार के लिए कर सकते हैं ट्रिगर का काम, चुनिंदा आईटी शेयरों पर रहे नजर

Daily Voice : IT शेयरों में हालिया तेजी भले ही अभी किसी टिकाऊ रिकवरी का संकेत न हो,लेकिन हर उछाल पर आईटी शेयरों में बिकवाली की एकतरफा रणनीति अपनाना भी जल्दबाजी हो सकती है। अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के नतीजे बाजारों के लिए एक ट्रिगर का काम कर सकते हैं,लेकिन इस बात की संभावना कम है कि केवल इसी वजह से बाजार में कोई बड़ी तेजी या कच्चे तेल में भारी गिरावट आएगी। ये बातें अल्फएक्यूरेट एडवाइजर्स के प्रबंध निदेशक और संस्थापक राजेश कोठारी ने मनीकंट्रोल से हुई एक बातचीत में कही हैं।

उन्होंने आगे कहा कि आईटी शेयरों में आई हालिया तेजी पॉजिटिव संकेत है लेकिन निवेशकों को अभी यह नहीं मान लेना चाहिए कि इस सेक्टर में टिकाऊ तेजी की शुरुआत हो गई है। पोर्टफोलियो में कोई बदलाव करने से पहले तेल सप्लाई की स्थिति,डॉलर,बॉन्ड यील्ड और कॉर्पोरेट अर्निंग पर नजर रखने की जरूरत है।

आईटी में तीन बातों पर नजर रखने की जरूरत

राजेश कोठारी के मुताबिक IT शेयरों में हालिया तेजी उत्साहजनक है,लेकिन इसे एक टिकाऊ तेजी मान लेने में सावधानी बरतने की जरूरत है। बड़ा सवाल यह है कि क्या यह तेजी इंडस्ट्री की अर्निंग आउटलुक से मेल खाती है या यह सिर्फ ‘ओवरसोल्ड’लेवल्स से आई खरीदारी है? हमें आईटी में तीन बातों पर नजर रखने की जरूरत है:

मांग की स्थिति: विशेष रूप से अमेरिका और यूरोप में टाले जा सकने वाला टेक्नोलॉजी खर्च (discretionary technology spending)अहम बना हुआ है। बेहतर सौदे हासिल करने का नतीजा रेवेन्यू ग्रोथ के रूप में दिखना चाहिए।

AI से बदलाव और अवसर: AI कमाई के नए स्रोत पैदा कर सकता है, लेकिन यह पारंपरिक बिलिंग मॉडल को भी बदल सकता है और कीमतों पर दबाव डाल सकता है।

वैल्यूएशन और अर्निंग आउटलुक: भारी तेजी के बाद, जिन शेयरों की कीमत उनकी कमाई की संभावनाओं से आगे निकल गई है, उनमें मुनाफावसूली (प्रॉफिट-टेकिंग) देखने को मिल सकती है।

राजेश कोठारी का मानना ​​है कि आईटी सेक्टर में तेजी आने पर हर शेयर बेच देने की रणनीति जल्दबाजी हो सकती है, लेकिन इस तेजी के पीछे भागना भी कोई समझदारी नहीं है। आईटी में उन कंपनियों को ही प्राथमिकता देनी चाहिए जिनकी ग्रोथ की संभावनाएं बेहतर हो रही हैं, जिनके ग्राहकों के साथ मजबूत संबंध हैं और जिनके पास AI से कमाई करने के ठोस मौके हैं। ऐसी कंपनियों से दूर रहने की जरूरत है जो अभी भी कमजोर मांग से जूझ रही हैं।

क्या आप कंजम्पशन सेक्टर को लेकर सतर्क हैं? कंजम्पशन डिमांड और इससे जुड़े शेयरों पर आपकी क्या राय है?

राजेश कोठारी ने कहा कि कंजम्पशन सेक्टर को लेकर पूरी तरह सतर्क रहने के बजाय,चुनिंदा रुख अपनाना पसंद करेंगे। जरूरी चीजों पर होने वाले खर्च और गैर-जरूरी (वैकल्पिक) चीजों पर होने वाले खर्च के बीच का अंतर समझना जरूरी है। कई ‘फास्ट फ्रीक्वेंसी’ डेटा इंडिकेटर कंजम्पशन ट्रेंड में सुधार दिखा रहे हैं (जैसे रिटेल क्रेडिट ग्रोथ, टू-व्हीलर की बिक्री में बढ़ोतरी, आदि)।

इस सेक्टर में ऐसी कंपनियों पर नजर रखनी चाहिए जिनके पास मजबूत ब्रांड, अच्छा डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क, कीमतों को तय करने की ताकत, अच्छी बैलेंस शीट और सही वैल्यूएशन हों। वैकल्पिक उपभोग (discretionary consumption) के सेक्टर में केवल कीमतों में बढ़ोतरी पर निर्भर रहने के बजाय, बिक्री की मात्रा (volume) में बढ़त के संकेतों पर भी नजर रखने की जरूरत है।

क्या आप आने वाले समय में ‘अल नीनो’ (El Niño) को बड़ा जोखिम मानते हैं? इसका महंगाई, ग्रामीण मांग और भारत के विकास पर क्या असर पड़ सकता है?

इसके जवाब उन्होंने कहा कि ‘अल नीनो’ एक जोखिम तो है,लेकिन इसे देखकर यह मान लेना सही नहीं होगा कि भारत के विकास का पूरा आउटलुक ही खराब हो जाएगा। कोई निष्कर्ष निकालने से पहले फसल उत्पादन, जलाशयों के जल-स्तर, खाने-पीने की चीजों की कीमतों के रुझान और ग्रामीण मांग के इंडीकेटरों पर नजर रखने की जरूरत है।

Q2FY27 में बैंकों के नतीजे कैसे रह सकते है? क्या इनके मौजूदा वैल्यूएशन अच्छे लग रहे है या इन स्तरों से आगे बढ़ने की गुंजाइश सीमित है?

इसके जवाब में राजेश कोठारी ने कहा कि बैंक शेयरों का प्रदर्शन उत्साहजनक है। ज़्यादातर बैंकों ने लोन वितरण (डिस्बर्समेंट) में अच्छी बढ़ोतरी और मज़बूत एसेट क्वालिटी की जानकारी दी है। अच्छे बैंकों में मध्यम अवधि के नजरिए निवेश के अच्छे मौके दिख रहे हैं लेकिन वैल्यूएशन के नजरिए से चुनिंदा शेयरों पर ही दांव लगाने की सलाह होगी।

ऐसे बैंकों पर फोकस करने की सलाह होगी जिनकी अर्निंग ग्रोथ को टिकाऊ कोर इनकम,अच्छी एसेट क्वालिटी और मजबूत फंडिंग फ्रेंचाइजी का सपोर्ट हासिल हो। अगले दो से तीन तिमाहियों में मार्जिन में सुधार की स्थिति कैसी रहती है, इस पर भी नजर रहनी चाहिए।

 

दिग्गज निवेशक आशीष कचोलिया ने एक्सप्रो इंडिया में लगभग 1% हिस्सेदारी बेची, ऋषि कजारिया ने स्वराज सूटिंग में बढ़ाई हिस्सेदार

डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

ड्रैगन फ्रूट की खेती से छप्परफाड़ कमाई! महाराष्ट्र के किसान ने अपनाया ऐसा तरीका, आज सालाना ₹2 करोड़ का कारोबार!

किसान अगर कुछ नया करने की ठान ले, तो खेती से भी करोड़ों रुपये कमाए जा सकते हैं। महाराष्ट्र के सोलापुर के रहने वाले महेश असाबे ने इसे सच कर दिखाया है। उनके परिवार ने कुछ साल पहले सिर्फ 3 एकड़ जमीन पर ड्रैगन फ्रूट उगाना शुरू किया था। आज उनका फार्म 60 एकड़ तक फैल चुका है और सालाना कारोबार करीब 2 करोड़ रुपये पहुंच गया है। खास बात यह है कि महेश ने खेती को बेहतर बनाने के लिए नई तकनीक अपनाई और दूसरे देशों से भी सीख ली। उनकी यह कहानी उन किसानों के लिए खास है, जो खेती से अपनी आमदनी बढ़ाना चाहते हैं।

पिता ने शुरू की थी खेती

महेश असाबे महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के अकोला गांव के रहने वाले हैं। उनका परिवार पहले मक्का जैसी पारंपरिक फसलों की खेती करता था। महेश ने एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग में बीटेक किया और इसके बाद एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग एंड फूड प्रोसेसिंग में एमटेक की पढ़ाई पूरी की।

साल 2013-14 में उनके पिता ने ड्रैगन फ्रूट की खेती करने का फैसला लिया। उन्होंने इस फल के बारे में पढ़ा था और जाना था कि इसकी खेती में अपेक्षाकृत कम पानी की जरूरत होती है। सूखे इलाकों में भी इसकी खेती की जा सकती है। यही बात उन्हें इस फसल की ओर खींच लाई।

बांग्लादेश से मंगाए 9,000 पौधे

ड्रैगन फ्रूट की खेती शुरू करना परिवार के लिए एक नया प्रयोग था। इसके लिए उन्होंने बांग्लादेश से करीब 9,000 पौधे मंगवाए। Startup Pedia के मुताबिक, पौधों पर शुरुआती निवेश करीब ₹9.9 लाख था। परिवार ने तीन एकड़ जमीन पर खेती शुरू की। साल 2015-16 में पहली फसल तैयार हुई और प्रति एकड़ करीब पांच टन उत्पादन मिला। उपज बेचकर परिवार को लगभग ₹5 लाख की कमाई हुई।

धीरे-धीरे ड्रैगन फ्रूट की मांग और कीमत बढ़ने लगी। साल 2017 तक परिवार इसे ₹150 से ₹250 प्रति किलो के भाव पर बेचने लगा। इससे खेती को बड़े स्तर पर ले जाने का हौसला मिला।

इजरायल और वियतनाम से सीखी खेती की नई तकनीक

महेश ने खेती को सिर्फ पारंपरिक तरीके तक सीमित नहीं रखा। पढ़ाई के दौरान वह 45 दिनों के प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए इजरायल गए। वहां उन्होंने पानी का बेहतर इस्तेमाल, आधुनिक कृषि तकनीक और उत्पादन बढ़ाने के तरीके सीखे। साल 2018 में उन्होंने वियतनाम का दौरा भी किया, जहां ड्रैगन फ्रूट की खेती के तरीकों को समझा। लौटकर उन्होंने अपने खेत में एक-एक एकड़ के अलग-अलग प्रदर्शन प्लॉट तैयार किए, ताकि खेती की विभिन्न तकनीकों को आजमाया जा सके।

3 एकड़ से 60 एकड़ तक पहुंचा फार्म

आज महेश असाबे Rukmini Farms and Nursery का संचालन करते हैं। उनके फार्म में ड्रैगन फ्रूट के अलावा अनार, सीताफल और अमरूद भी उगाए जाते हैं।

खेती में पानी बचाने के लिए ड्रिप इरिगेशन और तालाब जैसी सुविधाएं विकसित की गईं। निराई जैसे नियमित कामों में मशीनों का इस्तेमाल भी शुरू किया गया, जिससे खेती को संभालना आसान हुआ।

ड्रैगन फ्रूट से ₹1.25 करोड़ की सालाना कमाई

Startup Pedia के मुताबिक, महेश ड्रैगन फ्रूट की खेती से हर साल करीब ₹1.25 करोड़ कमाते हैं। उनके फार्म में सालाना लगभग 200 टन ड्रैगन फ्रूट का उत्पादन होता है। दूसरे फलों से होने वाली कमाई को जोड़ दें, तो उनके कारोबार का सालाना टर्नओवर करीब ₹2 करोड़ पहुंच जाता है।

महेश की कहानी बताती है कि खेती में नई तकनीक अपनाना, बाजार की मांग समझना और लगातार सीखते रहना कितना महत्वपूर्ण है। तीन एकड़ से शुरू हुआ उनका सफर आज दूसरे किसानों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है।

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गले मिलने का दिखावा और जबकि असल ताकत?

trump and musk

भारत जैसी विश्व व्यवस्था चाहता है, वैसी खुद क्यों नहीं बनाता?…. किसी बड़े नेता तक पहुँच होने से यह पता नहीं चलता कि मुलाकात के बाद कौन-सी शर्तें कायम रहीं। असली परीक्षा तब होती है जब दोनों देशों के हित टकराते हैं। व्यक्तिगत कूटनीति तभी सार्थक होती है जब संस्थाएँ उस पहुँच को स्थायी राष्ट्रीय लाभ में बदल सकें। ऐसा नहीं होने पर गले मिलने की तस्वीर एक ऐसा विज्ञापन बन जाती है जिसके दावों को वास्तविक बातचीत और समझौतों ने अभी साबित नहीं किया है।

पश्चिमी देशों के बुद्धिजीवियों और रणनीतिक विशेषज्ञों की बैठकों में भारत की वैश्विक हैसियत पर अक्सर ऐसे चर्चा होती है, मानो दुनिया की सबसे बड़ी मेज पर उसके लिए कुर्सी रखी जानी बाकी हो। पश्चिम को भारत का महत्व स्वीकार करना चाहिए। उसकी रणनीतिक स्वायत्तता का सम्मान करना चाहिए। ऐसी शर्तें नहीं थोपनी चाहिए जिनसे एक अनिवार्य साझेदार नाराज हो जाए। मान लिया गया है कि दुनिया की बड़ी शक्तियों में भारत का शामिल होना तय है। बस यह फैसला होना बाकी है कि उसे कहाँ बैठाया जाएगा।

इस सोच में दम है। भारत का विशाल बाजार, उसकी भौगोलिक स्थिति, तकनीकी प्रतिभा और सैन्य शक्ति उसे अंतरराष्ट्रीय सौदेबाजी में पर्याप्त ताकत देते हैं। क्वाड के जरिए सहयोग, सेमीकंडक्टर क्षेत्र में निवेश और रक्षा उत्पादन में साझेदारी ऐसे साझा हित हैं जिन्हें कोई गंभीर सरकार नजरअंदाज नहीं कर सकती। पश्चिम के दोहरे मानदंडों पर भारत की आपत्तियाँ भी बेबुनियाद नहीं हैं। जो देश अपनी सुविधा के अनुसार कभी संप्रभुता का सम्मान करते हैं और कभी उसकी अनदेखी, उन्हें दूसरों को सिद्धांतों पर कायम रहने का उपदेश देने का कितना अधिकार है?

लेकिन किसी देश का अनिवार्य होना उसे दबाव से सुरक्षित नहीं बना देता। उसकी उपयोगिता सौदेबाजी में ताकत जरूर देती है, मगर यह गारंटी नहीं कि उस पर दबाव नहीं डाला जाएगा। कोई देश आपकी जरूरतों के कारण आपको गले भी लगा सकता है और आपकी कमजोरियों का फायदा उठाकर दबाव भी बना सकता है। निमंत्रण और शिकंजा, दोनों साथ आ सकते हैं।

यहीं भारत के बढ़ते वैश्विक महत्व की चमकदार कहानी भ्रामक हो जाती है। किसी ताकतवर देश के लिए उपयोगी होना और उस उपयोगिता की शर्तें स्वयं तय करने की ताकत रखना, दो अलग बातें हैं।

इस फर्क को समझने के लिए भारतीय रणनीतिकारों को विदेशों की ओर देखने की जरूरत नहीं है। अपने ही देश की कॉरपोरेट अर्थव्यवस्था में इसका उदाहरण मौजूद है।

मुंबई हवाई अड्डे का नियंत्रण जीवीके समूह से अदाणी समूह के हाथों में जाने की घटना को देखें। जीवीके के पास एक महत्वपूर्ण रणनीतिक संपत्ति थी। हवाई अड्डे के संचालन का अनुभव था। बड़े निवेशकों से संबंध थे। इसके बावजूद कर्ज, वित्तीय कठिनाइयों और जाँच एजेंसियों की कार्रवाइयों का सिलसिला उसके हवाई अड्डा कारोबार के आसपास बना। अंततः अदाणी समूह ने उसका नियंत्रण हासिल कर लिया।

बाद में जीवीके के उपाध्यक्ष ने इस बात से इनकार किया कि किसी दबाव के कारण हवाई अड्डा बेचना पड़ा। उनका यह खंडन भी घटनाक्रम का हिस्सा है। लेकिन उन परिस्थितियों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता जिनके कारण यह सौदा राजनीतिक विवाद का विषय बना। यहाँ मुद्दा सौदे को लेकर किसी एक विवादित दावे को सही या गलत ठहराना नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि किसी संपत्ति का मालिक होना कितना मायने रखता है, यदि उसे बनाए रखने के लिए जरूरी पूँजी, पहुँच या अनुमति किसी दूसरे के नियंत्रण में हो?

कंपनी की बैलेंस शीट पर अरबों की संपत्ति दिखाई दे सकती है, जबकि उसके पीछे छिपी निर्भरता नजर नहीं आती। कोई स्थापित कारोबारी तब तक सुरक्षित दिखाई देता है जब तक उसकी सुरक्षा की शर्तें नहीं बदलतीं।

संप्रभु देशों के सामने भी यही समस्या होती है। फर्क इतना है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इसके परिणाम कहीं अधिक खतरनाक हो सकते हैं। अमेरिका अपने बाजार, तकनीक, वित्तीय व्यवस्था और सुरक्षा संबंधों तक पहुँच के जरिए दूसरे देशों पर दबाव बना सकता है। जरूरी नहीं कि उसका नियंत्रण हर क्षेत्र में हो। दबाव प्रभावी बनाने के लिए इतना पर्याप्त है कि वह ऐसी किसी चीज तक पहुँच रोक सके जिसका विकल्प सामने वाला देश आसानी से नहीं खोज सकता।

भारत के पास भी सौदेबाजी के लिए पर्याप्त संसाधन हैं। मगर असली सवाल यह है कि भारत अपनी किसी महत्वपूर्ण जरूरत की आपूर्ति रुकने पर कितने समय तक टिक सकता है? और दूसरी तरफ, अमेरिका या कोई दूसरा साझेदार भारत से मिलने वाले लाभ के बिना कितने समय तक रह सकता है?

रणनीतिक स्वायत्तता की असली परीक्षा इसी असमान सहनशक्ति में होती है।

इसका अर्थ यह नहीं कि अंतरराष्ट्रीय संबंध किसी गणितीय समीकरण के अनुसार चलते हैं। सरकारें गलत आकलन करती हैं। गठबंधन बदलते हैं। घरेलू विरोध के कारण नेताओं की समझौता करने की क्षमता सीमित होती है। आर्थिक और सैन्य शक्ति के साथ विश्वसनीयता, जनमत और संस्थाओं के प्रति भरोसा भी परिणामों को प्रभावित करते हैं।

बड़ी शक्तियाँ अक्सर दूसरों से सहयोग के बदले उनके व्यवहार में बदलाव की माँग करती हैं। शर्तें लगाती हैं, जबकि अपने ऊपर वैसी ही निगरानी या जवाबदेही स्वीकार नहीं करतीं। उनका पाखंड उन शर्तों को समाप्त नहीं करता। उलटे, निर्भर देश के लिए उनकी कीमत और बढ़ा देता है। इसलिए भारत के सामने दो परस्पर जुड़े काम हैं। पहला, ऐसी क्षमता विकसित करना जिससे वह बाहरी दबाव का सामना कर सके। दूसरा, ऐसी विश्वसनीयता अर्जित करना जिससे दूसरे देश भी उसके साथ खड़े होने को तैयार हों।

इन दोनों का सीधा संबंध भारत की घरेलू शासन व्यवस्था से है। स्वतंत्र नियामक संस्थाएँ हों तो निवेश के लिए राजनीतिक पहुँच पर निर्भरता कम होती है। विश्वसनीय न्यायपालिका हो तो सत्ता के कृपापात्र समूहों से बाहर रहकर कारोबार खड़ा करने का जोखिम घटता है। खुली प्रतिस्पर्धा हो तो देश की उत्पादन क्षमता का आधार व्यापक बनता है। विश्वविद्यालयों में असहमति और स्वतंत्र विचार की गुंजाइश हो तो वह बौद्धिक स्वतंत्रता विकसित होती है जिसके बिना तकनीकी आत्मनिर्भरता संभव नहीं।

यही संस्थाएँ किसी शक्तिशाली साझेदार के शर्तें लगाने पर देश को अधिक विकल्प देती हैं। इनके कमजोर होने पर राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा कुछ कंपनियों, कुछ फैसलों और कुछ व्यक्तियों पर निर्भर होती चली जाती है। मगर नई दिल्ली में भारत की ताकत का सार्वजनिक प्रदर्शन अक्सर व्यक्तिगत कूटनीति के इर्दगिर्द घूमता दिखाई देता है।

प्रधानमंत्री का विदेशी नेताओं से गले मिलना इसकी सबसे पहचानी जाने वाली तस्वीर है। सामने खड़े नेता से आत्मीयता दिखाई जाती है और उस दृश्य को भारत की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा के प्रमाण के रूप में प्रसारित किया जाता है। गले मिलना आत्मीयता का संकेत हो सकता है। लेकिन उससे वह सब साबित नहीं होता जो तस्वीर देखकर नागरिकों को समझाया जाता है।

किसी बड़े नेता तक पहुँच होने से यह पता नहीं चलता कि मुलाकात के बाद कौन-सी शर्तें कायम रहीं। असली परीक्षा तब होती है जब दोनों देशों के हित टकराते हैं। भारत किस बात से इनकार कर सकता है? क्या हासिल कर सकता है? और मतभेद होने पर संबंध कितना दबाव सह सकता है?

व्यक्तिगत कूटनीति तभी सार्थक होती है जब संस्थाएँ उस पहुँच को स्थायी राष्ट्रीय लाभ में बदल सकें। ऐसा नहीं होने पर गले मिलने की तस्वीर एक ऐसा विज्ञापन बन जाती है जिसके दावों को वास्तविक बातचीत और समझौतों ने अभी साबित नहीं किया है।

भारत की विदेश नीति के प्रचार और वास्तविक आचरण के बीच यह अंतर केवल व्यक्तिगत कूटनीति तक सीमित नहीं है। एक अधिक न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था की भारत की माँग में भी यही सवाल उठता है।

नई दिल्ली का विरोध सही है जब शक्तिशाली देश नियमों को अपनी सुविधा के अनुसार मोड़ते हैं, असहमति जताने वालों को दंडित करते हैं या विशेषाधिकार अपने लिए सुरक्षित रखते हैं। लेकिन जब ऐसे ही सवाल भारत के भीतर उठते हैं तो उसकी दलील का नैतिक वजन कम होने लगता है। मतदाता सूचियों को लेकर विवाद, विपक्षी नेताओं के विरुद्ध जाँच एजेंसियों के चुनिंदा इस्तेमाल के आरोप, निवारक हिरासत और विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिबंध जैसे सवाल लोकतांत्रिक विश्वसनीयता से जुड़े हैं। इंटरनेट बंद करने की कार्रवाइयों का लोगों की आजीविका और आवश्यक सेवाओं तक पहुँच पर पड़ने वाला नुकसान भी दस्तावेजों में दर्ज है।

इन सवालों का उत्तर संप्रभुता का हवाला देकर नहीं दिया जा सकता। संप्रभुता तो यह तय करती है कि इनके जवाब देने की जिम्मेदारी किसकी है। ऐसा नहीं कि दूसरे देशों की आलोचना करने से पहले भारत को हर मामले में आदर्श बनना होगा। भारतीय नागरिकों के अधिकारों की परीक्षा लेने का अधिकार वाशिंगटन को नहीं है। लेकिन जो सरकार दुनिया से कहती है कि साझा शक्ति और न्यायपूर्ण व्यवस्था के उसके दृष्टिकोण पर भरोसा किया जाए, उसे यह भी स्वीकार करना होगा कि अपने देश में उसे सौंपी गई सत्ता का इस्तेमाल कैसे होता है, इसकी पड़ताल होगी।

यही कसौटी व्यापार नीति पर भी लागू होती है।

भारत के पास कमजोर आजीविकाओं की रक्षा करने और अपनी औद्योगिक क्षमता विकसित करने के उचित कारण हैं। इन उद्देश्यों के पक्ष में ठोस तर्क दिए जा सकते हैं। लेकिन इनके नाम पर हर व्यापारिक बाधा को जायज नहीं ठहराया जा सकता, जबकि दूसरे देशों की ऐसी ही पाबंदियों को मुक्त और निष्पक्ष व्यापार के विरुद्ध बताया जाए।

एक न्यायसंगत व्यापार नीति को स्पष्ट करना चाहिए कि संरक्षण किसे दिया जा रहा है, उससे कौन-सी नई क्षमता विकसित होगी और कब संरक्षण पाने वाले उद्योगों को खुली प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। वरना रणनीतिक स्वायत्तता एक भव्य नाम बनकर रह जाएगी, जिसके पीछे राजनीतिक पहुँच रखने वाले कारोबारियों को प्रतिस्पर्धा से बचाने की व्यवस्था चलती रहेगी।

दुनिया में प्रभावशाली भूमिका निभाने का भारत का दावा मजबूत है। लेकिन उसकी वास्तविक उपलब्धि इस पर निर्भर करेगी कि देश की विशाल आबादी और संस्थाएँ मिलकर कितनी व्यापक उत्पादन क्षमता, प्रतिभा और स्वतंत्र शक्ति विकसित करती हैं।

जिस देश में कारोबारी स्थापित कंपनियों को चुनौती दे सकते हों, नागरिक अधिकारियों से सवाल कर सकते हों और संस्थाएँ सत्ता की नाराजगी सह सकती हों, उसके पास कहीं अधिक ताकत होती है। उसकी तुलना में वह देश कमजोर स्थिति में होगा जहाँ अवसर और सफलता का रास्ता सत्ता तक विशेष पहुँच से होकर गुजरता हो।

ऐसी घरेलू शक्ति विकसित हो जाने से अमेरिका का दबाव, चीन की चुनौती या पश्चिम के दोहरे मानदंड समाप्त नहीं हो जाएँगे। लेकिन भारत के पास उनका सामना करने के अधिक विकल्प होंगे। साथ ही एक अलग विश्व व्यवस्था की उसकी माँग उन देशों को भी अधिक विश्वसनीय लगेगी जो स्वयं अपनी स्वतंत्रता और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ाना चाहते हैं।

भारत यह तय नहीं कर सकता कि उससे अधिक शक्तिशाली देश उसकी निर्भरताओं की परीक्षा लेंगे या नहीं। लेकिन वह यह जरूर तय कर सकता है कि उसकी अपनी घरेलू व्यवस्था उन निर्भरताओं को बढ़ाएगी या कम करेगी।

कैमरे हटते ही गले मिलना समाप्त हो जाता है। उसके बाद जो बचता है, वही असली ताकत है। भारत अपने बूते क्या बना सकता है, कितना दबाव सह सकता है और जिन नियमों पर दुनिया को चलने की सलाह देता है, उन पर स्वयं कितना भरोसा पैदा कर सकता है।