हर 5 में से 1 फल में होता है Pesticide Residues | Dr Asmita Prabhune ने खोजा समाधान | Sophab

हर 5 में से 1 फल में होता है Pesticide Residues | Dr Asmita Prabhune ने खोजा समाधान | Sophab

क्या आपको लगता है कि आपके फल और सब्ज़ियां पूरी तरह साफ हैं? FSSAI के एक सर्वे में भारतभर में जांचे गए करीब हर 5 में से 1 प्रोड्यूस सैंपल में कीटनाशकों के अवशेष पाए गए।
इसी समस्या को देखते हुए पुणे की वैज्ञानिक डॉ. अस्मिता प्रभुने ने कई सालों की मेहनत के बाद Green Pyramid Biotech के साथ मिलकर Sophab तैयार किया – एक Concentrated Organic Produce Wash
कई Experiments और Testing के बाद, Sophab को 99% तक कीटनाशक, Pathogens और Chemical Residues हटाने के लिए तैयार किया गया है। क्या ये रोज़ाना फल-सब्ज़ियां साफ करने का तरीका आसान बना सकता है?

हर 5 में से 1 फल में होता है Pesticide Residues | Dr Asmita Prabhune ने खोजा समाधान | Sophab

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US नागरिकों को निशाना बनाने वाले फर्जी कॉल सेंटर का ED ने किया भंडाफोड़, पटियाला-पुणे में रात तक चल रहा था पूरा नेटवर्क

(रिपोर्ट- शंकर आनंद) 

केंद्रीय जांच एजेंसी ED यानी प्रवर्तन निदेशालय के हैदराबाद जोनल ऑफिस ने मनी लॉन्ड्रिंग जांच के तहत पटियाला, चंडीगढ़ और पुणे में तलाशी अभियान चलाया। जांच के दौरान US नागरिकों को निशाना बनाकर ठगी और जबरन वसूली करने वाले संगठित फर्जी कॉल सेंटर नेटवर्क का खुलासा हुआ है। इस मामले में ईडी की तफ्तीश में सामने आया है कि ये कॉल सेंटर कॉरपोरेट कंपनियों की तरह संचालित किए जा रहे थे। इनमें बाकायदा कंप्यूटर, हेडसेट, डायलर और VoIP सिस्टम का इस्तेमाल किया जा रहा था। आरोप है कि नेटवर्क के मास्टरमाइंड गुजरात के अहमदाबाद से इन कॉल सेंटरों को रिमोट तरीके से नियंत्रित कर रहे थे।

पटियाला के दो कॉल सेंटरों में 194 कर्मचारी

ED के मुताबिक, पटियाला के अर्बन एस्टेट फेज-II में DM Web Solutions के नाम से चल रहे दो कॉल सेंटरों में कुल 194 लोग काम कर रहे थे। इन कॉल सेंटरों का संचालन और नियंत्रण अहमदाबाद के हर्षिल रावल और रवि रामी तथा उनके सहयोगियों के हाथ में था। वहीं, पुणे के हिंजवड़ी फेज-II स्थित Gera’s Imperial Complex में चल रहे कॉल सेंटर में 22 लोग काम कर रहे थे। इसे अहमदाबाद के विपुल कोटाडिया और उसके सहयोगियों द्वारा संचालित किए जाने की जानकारी सामने आई है।

नागालैंड, मिजोरम और मणिपुर से युवाओं की भर्ती

जांच में पता चला कि कॉल सेंटरों में काम करने वाले कई कर्मचारियों की पहचान स्थानीय नेटवर्क के जरिए की गई थी। इनमें बड़ी संख्या में नागालैंड, मिजोरम और मणिपुर जैसे पूर्वोत्तर राज्यों से आए लोग शामिल थे। ईडी के मुताबिक, इनमें से ज्यादातर कर्मचारी निम्न आय वर्ग और बेरोजगार पृष्ठभूमि से थे। उन्हें करीब 30 हजार से 50 हजार रुपये मासिक वेतन दिया जाता था। इसके अलावा पीड़ितों से सफलतापूर्वक रकम वसूलने पर इंसेंटिव भी दिया जाता था।

ऐसे चलता था US नागरिकों को ठगने का पूरा खेल

जांच में फर्जी कॉल सेंटर के काम करने का पूरा तरीका सामने आया है। सबसे पहले मास्टरमाइंड कथित तौर पर अमेरिकी नागरिकों का डेटा हासिल करते थे। इसके बाद सिस्टम के जरिए बड़े पैमाने पर स्पैम ई-मेल या कंप्यूटर पर पॉप-अप अलर्ट भेजे जाते थे। इन फर्जी अलर्ट में पीड़ितों को बताया जाता था कि उनके कंप्यूटर में वायरस है, बैंक अकाउंट खतरे में है या उनकी पहचान और कानूनी स्थिति से जुड़ी कोई गंभीर समस्या है। इसके साथ एक फर्जी टोल-फ्री हेल्पलाइन नंबर दिया जाता था। पीड़ित जब उस नंबर पर फोन करता था तो कॉल सेंटर में उसे अलग-अलग स्तर के कर्मचारियों के पास भेजा जाता था।

Opener से Banker और फिर Closer

इस फर्जीवाड़े को तीन चरणों में अंजाम दिया जाता था, उसे हम इस तरह से समझ सकते हैं:-

  • पहला चरण:- Opener/Dialler.. शुरुआत में Opener पीड़ित से बात करता था। वह खुद को Amazon, Microsoft, PayPal जैसी कंपनियों के टेक्निकल सपोर्ट कर्मचारी के तौर पर पेश कर सकता था। उसका मकसद पीड़ित का भरोसा हासिल करना और उसकी चिंता का स्तर समझना होता था।
  • दूसरा चरण- Banker: इसके बाद Banker की भूमिका आती थी। वह कथित तौर पर पीड़ित के बैंक अकाउंट, उपलब्ध रकम और चल-अचल संपत्तियों के बारे में जानकारी हासिल करता था, ताकि पैसे वसूलने का तरीका तय किया जा सके।
  • तीसरा चरण- Closer:- इसके बाद कॉल Closer को ट्रांसफर की जाती थी। Closer पीड़ित पर दबाव बनाने के लिए खुद को अमेरिकी कानून प्रवर्तन एजेंसी, बैंक के फ्रॉड डिविजन या किसी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर पेश करता था। पीड़ित को तत्काल भुगतान नहीं करने पर कानूनी या आर्थिक नुकसान की धमकी दी जाती थी।

Gift Card, कैश और गोल्ड के जरिए वसूली

ED की जांच में सामने आया कि पीड़ितों से रकम हासिल करने के लिए पारंपरिक बैंकिंग चैनल के बजाय अलग-अलग तरीकों का इस्तेमाल किया जाता था। पीड़ितों को Apple और Google Play जैसे गिफ्ट कार्ड खरीदने, कैश भेजने या सोना खरीदने के लिए मजबूर किया जाता था। कुछ मामलों में अमेरिका में मौजूद कूरियर के जरिए पीड़ितों से कैश या गोल्ड कलेक्ट करने की व्यवस्था भी की जाती थी। इसके बाद रकम को क्रिप्टोकरेंसी, हवाला और अन्य माध्यमों के जरिए भारत सहित दूसरे देशों में ट्रांसफर कर कथित तौर पर मनी लॉन्ड्रिंग की जाती थी।

Cloud के जरिए रिमोट कंट्रोल

ED के अनुसार, पटियाला और पुणे के कॉल सेंटरों में लगे कंप्यूटरों को मास्टरमाइंड Cloud के जरिए रिमोट तरीके से नियंत्रित करते थे। टारगेट का नाम और संपर्क विवरण भी कर्मचारियों को ऑनलाइन उपलब्ध कराया जाता था। कॉल-ब्लास्ट की शुरुआती प्रक्रिया भी मास्टरमाइंड द्वारा नियंत्रित सिस्टम और IT सपोर्ट टीम के जरिए संचालित की जाती थी। इसके बाद Opener, Banker और Closer की पूरी प्रक्रिया के जरिए पीड़ित से रकम वसूलने का काम होता था।

गुजरात के अहमदाबाद से होता था रकम का प्रोसेसिंग और लेयरिंग

जांच में सामने आया कि कथित तौर पर हर्षिल रावल और रवि रामी पीड़ितों से हासिल रकम के आगे के ट्रांसफर और प्रोसेसिंग की व्यवस्था करते थे। ED के मुताबिक, अपराध से हासिल रकम को विभिन्न माध्यमों से भारतीय मुद्रा में बदला जाता था। इसके बाद इस पैसे का इस्तेमाल चल-अचल संपत्तियां खरीदने में किया जाता था या रकम को क्रिप्टो/बिटकॉइन के रूप में रखा जाता था। कुछ रकम देश के बाहर भी रखे जाने की जानकारी जांच में सामने आई है।

Digital Evidence से सामने आई पूरी चेन

ED की तलाशी के दौरान बड़ी मात्रा में डिजिटल साक्ष्य बरामद हुए हैं। इन साक्ष्यों से कथित तौर पर हवाला ऑपरेटरों, अंगड़िया फर्मों और अमेरिका में पीड़ितों से वसूली गई रकम के कलेक्शन में शामिल लोगों की भूमिका सामने आई है। जांच एजेंसी के मुताबिक, डिजिटल एविडेंस से भारत के अलग-अलग हिस्सों में संचालित फर्जी कॉल सेंटरों के बीच एक संगठित नेटवर्क की जानकारी मिली है।

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बिजनेस ट्रिप का बहाना पड़ा भारी, एयरपोर्ट पर पासपोर्ट के इस राज ने खोल दी पति की पोल!

पासपोर्ट की एक गड़बड़ी से खुला व्यक्ति की छिपी हुई ट्रिप का पूरा सीक्रेट

मुंबई: पुणे के एक बिजनेसमैन की विदेश यात्रा से जुड़ा मामला इन दिनों चर्चा में है। उसने पत्नी को इमिग्रेशन से जुड़ी परेशानी बताकर यात्रा रद्द होने की बात कही, लेकिन असल कहानी कुछ और थी। जिस महिला के साथ वह विदेश जाने वाला था, उसके पासपोर्ट में दिक्कत के चलते इमिग्रेशन क्लियर नहीं हो पाया और पूरी यात्रा रद्द करनी पड़ी। इसके बाद इस मामले में कई ऐसी बातें सामने आईं, जिनसे कहानी ने अलग मोड़ ले लिया।

पत्नी से छिपाई ट्रिप की बात

46 साल के इस बिजनेसमैन ने अपनी पत्नी को बताया था कि वह बिजनेस ट्रिप के लिए कुआलालंपुर जा रहा है। लेकिन वह एक दूसरी महिला के साथ विदेश यात्रा पर निकला था। मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर इमिग्रेशन जांच के दौरान अधिकारियों को पता चला कि महिला जिस पासपोर्ट का इस्तेमाल कर रही थी, उसे पहले ही खोया हुआ घोषित किया जा चुका था।

एयरपोर्ट से अचानक बदला ये प्लान

महिला को इमिग्रेशन पर रोके जाने के बाद बिजनेसमैन को लगा कि अब उसकी पत्नी को असली बात पता चल सकती है। इसके बाद उसने अपनी यात्रा रद्द कर दी और मोबाइल फोन बंद कर दिया। पुलिस के मुताबिक, वह महिला के साथ दक्षिण मुंबई छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस यानी CSMT चला गया। एयरपोर्ट से निकलने से पहले उसने वहां मौजूद लैंडलाइन फोन से पत्नी को कॉल किया और बताया कि इमिग्रेशन की परेशानी के कारण उसे अपना मोबाइल फोन जमा करना पड़ा है।

पत्नी ने दर्ज कराई किडनैपिंग की FIR

अगले दिन बिजनेसमैन ने अपनी पत्नी से थोड़ी देर WhatsApp वीडियो कॉल पर बात की और इमिग्रेशन की समस्या वाली वही बात दोहराई। इसके बाद उसका फोन नेटवर्क से बाहर हो गया और पत्नी उससे कांटेक्ट नहीं कर पाई। काफी समय तक कोई जानकारी नहीं मिलने पर उसने पुलिस से कांटेक्ट किया। उसकी शिकायत के आधार पर पुलिस ने अपहरण की FIR दर्ज कर जांच शुरू कर दी।

FIR की जानकारी मिलते ही सामने आया ये सच

मामले की FIR दर्ज होने की जानकारी मिलने के बाद बिजनेसमैन खुद सहार पुलिस स्टेशन पहुंचा। यह वही पुलिस स्टेशन है, जिसके अधिकार क्षेत्र में मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट आता है। पुलिस के सामने उसने स्वीकार किया कि इमिग्रेशन से जुड़ी परेशानी की जो कहानी उसने अपनी पत्नी को बताई थी, वह सच नहीं थी। उसने खुद यह कहानी बनाई थी ताकि अपनी ट्रिप और उसके साथ मौजूद महिला की बात पत्नी से छिपा सके।

जांच के बाद पुलिस का कहना है कि इस मामले में आगे की कार्रवाई को लेकर कोर्ट में ‘C समरी’ क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की जाएगी। पुलिस के अनुसार, ऐसी रिपोर्ट उन मामलों में इस्तेमाल की जाती है, जहां जांच के दौरान शिकायत के पीछे गलतफहमी या तथ्यों से जुड़ी स्थिति सामने आती है। इस मामले में भी जांच के बाद पूरी कहानी स्पष्ट हुई और सामने आया कि इमिग्रेशन को लेकर बताई गई बात सही नहीं थी।

व्यवस्था को चुभने वाले अधिकारी

मुंढे मई 2026 में एफडीए आयुक्त बने। कुछ ही महीनों में विभाग ने हजारों निरीक्षण किए, सैकड़ों लाइसेंस निलंबित किए, करोड़ों रुपये का मिलावटी या असुरक्षित माल जब्त किया और गुटखा-पान मसाला के अवैध कारोबार पर कठोर कार्रवाई की। बड़े ब्रांड, पुराने होटल, क्विक-कॉमर्स गोदाम, यहाँ तक कि मुंबई हाईकोर्ट की कैंटीन भी इस दायरे से बाहर नहीं रहे। संदेश साफ था, नियम छोटे-बड़े के भेद से नहीं चलेंगे। अब वही सख्ती निजी अस्पतालों के उपभोग्य सामान पर दिख रही है।

महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषध प्रशासन के आयुक्त तुकाराम मुंढे इन दिनों एक बार फिर उन अधिकारियों की पंक्ति में खड़े दिखते हैं, जिनकी उपस्थिति व्यवस्था को असहज कर देती है। होटल-रेस्तरां की रसोइयों से शुरू हुआ उनका अभियान अब अस्पतालों के बिलों तक पहुँच गया है। सवाल केवल एक अधिकारी के तेवर का नहीं है। सवाल यह है कि जनता के स्वास्थ्य और जेब के बीच खड़ी लूट को रोकने वाले अधिकारी भारत में इतने दुर्लभ क्यों हैं? और जब वे दिखते हैं तो उनकी पदावधि इतनी छोटी क्यों रह जाती है?

मुंढे मई 2026 में एफडीए आयुक्त बने। कुछ ही महीनों में विभाग ने हजारों निरीक्षण किए, सैकड़ों लाइसेंस निलंबित किए, करोड़ों रुपये का मिलावटी या असुरक्षित माल जब्त किया और गुटखा-पान मसाला के अवैध कारोबार पर कठोर कार्रवाई की। बड़े ब्रांड, पुराने होटल, क्विक-कॉमर्स गोदाम, यहाँ तक कि मुंबई हाईकोर्ट की कैंटीन भी इस दायरे से बाहर नहीं रहे। संदेश साफ था, नियम छोटे-बड़े के भेद से नहीं चलेंगे। अब वही सख्ती निजी अस्पतालों के उपभोग्य सामान पर दिख रही है।

एक सर्वे में सामने आया कि अस्पताल ने आईवी इन्फ्यूजन सेट 11.05 रुपये में खरीदा, पर मरीज के बिल में उसकी कीमत 325 रुपये लिखी गई। यह करीब 2,841 प्रतिशत का अंतर है। सिरिंज 6.75 रुपये में खरीदी गई, बिल में 57.20 रुपये। कैथेटर 29.41 रुपये में लिया गया, मरीज से 310 रुपये वसूले गए। मुंढे ने राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण और केंद्रीय औषध विभाग को पत्र लिखकर ट्रेड मार्जिन पर लगाम लगाने की माँग की है।

यह महज मूल्य का खेल नहीं है। अस्पताल के बिल का सबसे मोटा हिस्सा अक्सर वह होता है जिसका उपचार से सीधा संबंध कम और खरीद-बिक्री की श्रृंखला से ज्यादा होता है। उल्लेखनीय है कि जब मरीज सरकारी योजना या निजी बीमा के दायरे में होता है, तो यह लूट और निर्लज्ज हो जाती है। मरीज सोचता है कि खर्च कंपनी या सरकार उठाएगी। अस्पताल जानता है कि क्लेम पास होने की प्रक्रिया जटिल है, मरीज कमजोर है और पूछताछ कम होती है। नतीजा यह कि खपत की वस्तुएँ मनमाने मार्जिन पर चढ़ जाती हैं, कमरे-जांच-उपकरण के पैकेज फुला दिए जाते हैं और बीमा का पैसा अंततः समाज के उसी वर्ग से वसूला जाता है जो प्रीमियम चुकाता है। सरकारी योजनाओं में भी यही तर्क काम करता है और सार्वजनिक धन निजी लाभ में बदल जाता है।

भारत को तुकाराम जैसे अधिकारियों की जरूरत है क्योंकि हमारे नियामक ढांचे में कानून पर्याप्त हैं, पर प्रवर्तन चयनात्मक है। खाद्य सुरक्षा, औषधि नियंत्रण और अस्पताल शुल्क, तीनों क्षेत्र उन जगहों पर हैं जहाँ आम आदमी सबसे असहाय होता है। वह मेनू नहीं पढ़ सकता कि पनीर असली है या नहीं; वह बिल नहीं काट सकता कि सेट ग्यारह का है या तीन सौ पच्चीस का; वह बीमा कंपनी से नहीं लड़ सकता जब अस्पताल कहता है कि पैकेज में सब शामिल है।

ऐसे में यदि कोई अधिकारी बिना चेतावनी निरीक्षण करता है, लाइसेंस निलंबित करता है और आंकड़े सार्वजनिक करता है, तो वह केवल विभाग नहीं चला रहा होता, वह बाजार की नैतिक सीमा खींच रहा होता है। गौरतलब है कि तुकाराम मुंढे प्रभाव तेज़ी से फैल रहा है। रसोई साफ होने लगीं, मेनू पर एनालॉग पनीर लिखा जाने लगा और अस्पताल अब कम से कम कीमतों की चर्चा से बच नहीं सकते। यह डर सुधार का पहला कदम है। स्थायी सुधार तभी आएगा जब एक व्यक्ति का अभियान संस्था की आदत बनेगी।

सवाल उठता है कि ऐसे अधिकारी बार-बार तबादले का शिकार क्यों होते हैं? मुंढे 2005 बैच के महाराष्ट्र काडर के आईएएस हैं। करीब इक्कीस वर्ष की सेवा में उनके पच्चीस के आसपास तबादले हुए हैं। सोलापुर में रेत माफिया, नवी मुंबई में अनावश्यक परियोजनाओं का विरोध, पुणे परिवहन में अनुपस्थित ड्राइवरों की छँटनी, स्वास्थ्य आयुक्त रहते सरकारी डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस पर रोक, हर जगह उन्होंने स्वार्थी हितों से टकराव चुना। तबादला सजा नहीं कहा जाता, पर व्यवहार में वह सजा ही है। ईमानदार अधिकारी को बार-बार हटाकर व्यवस्था यह संकेत देती है कि स्थिरता सुविधा के पक्ष में है, असुविधा के नहीं। राजनेता, स्थानीय व्यापारिक लॉबी, कभी विभाग के भीतर के कर्मचारी, सभी को एक ही शिकायत होती है: काम का दबाव, अचानक छापे, छवि खराब होना। जनसमर्थन सोशल मीडिया पर दिखता है, पर फाइलें सचिवालय में चलती हैं। जब तक तबादले की शक्ति बिना पारदर्शी कारण के बनी रहेगी, मुंढे जैसे अधिकारी अपवाद रहेंगे, आदर्श नहीं।

ऐसे में आलोचना भी जरूरी है। व्यवसाय जगत कहता है कि बिना सुधार का समय दिए लाइसेंस काटना अति है। अदालत ने कभी कहा कि मच्छर मारने के लिए तलवार न चलाई जाए। विभाग के कुछ कर्मचारियों ने कार्यभार की शिकायत की। ये बातें अनसुनी नहीं की जानी चाहिए। प्रवर्तन कठोर हो, पर पूर्वानुमान योग्य और समान भी हो। छोटे ढाबे और बड़े अस्पताल दोनों पर एक ही पैमाना लगे। मूल्य नियंत्रण ऐसा हो कि गुणवत्ता न गिरे और इनोवेटर का मार्जिन भी पूरी तरह न मिटे। बीमा कंपनियों और सरकारी योजनाओं को अस्पताल के खरीद मूल्य से बिल का मिलान अनिवार्य बनाना चाहिए। मरीज को बाहरी फार्मेसी से दवा लेने की स्वतंत्रता कागज पर नहीं, व्यवहार में मिलनी चाहिए।

आखिरकार प्रश्न व्यक्ति का नहीं, संस्कृति का है। भारत में सेवा भाव वाले अधिकारी भी पैदा होते हैं, गाँव के किसान परिवार से आईएएस बनने वाले मुंढे इसका जीवंत उदाहरण हैं। कमी यह है कि व्यवस्था उन्हें टिकाए नहीं रखती। जब तक ईमानदारी को करियर का जोखिम माना जाएगा, रसोई में कीड़े और बिल में दो हजार प्रतिशत मुनाफा सामान्य बने रहेंगे। देश को मुंढे जैसे और अधिकारियों की जरूरत है। उससे भी ज्यादा जरूरत है ऐसी प्रशासनिक सुरक्षा की, जिसमें वे एक पद पर पूरा कार्यकाल काट सकें, आंकड़े सुधार सकें और लॉबी के दबाव में विस्थापित न हों। स्वास्थ्य और भोजन मौलिक जरूरतें हैं। इन पर लूट को सहना शासन की विफलता है। एक अधिकारी का अभियान चेतावनी है। चेतावनी को नीति बनाना अब बाकी है।

Gold Price Today: सप्ताह के पहले दिन सोना सस्ता, कई शहरों में भाव फिसला; दिल्ली में ₹142990 पर आया 22 कैरेट

सप्ताह के पहले दिन सोमवार को देश में सोने की कीमत में गिरावट लौटी है। कई शहरों में भाव नीचे आया है। 21 सितंबर की सुबह राजधानी दिल्ली में 24 कैरेट गोल्ड की कीमत फिसलकर 155980 रुपये प्रति 10 ग्राम हो गई। मुंबई में कीमत 155830 रुपये प्रति 10 ग्राम है। बीते सप्ताह अलग-अलग शहरों में 24 कैरेट गोल्ड की कीमत 1260 रुपये तक ​चढ़ी। वहीं 22 कैरेट गोल्ड 1150 रुपये तक महंगा हुआ। सोने का वैश्विक भाव एक सप्ताह में लगभग 1 प्रतिशत बढ़ा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में हाजिर सोना 4,390.11 डॉलर प्रति औंस पर है।

देश के कुछ बड़े शहरों में गोल्ड रेट

दिल्ली में सोने की कीमत: दिल्ली में 24 कैरेट सोने की कीमत 155980 रुपये प्रति 10 ग्राम है। 22 कैरेट का भाव 142990 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

मुंबई और कोलकाता: मुंबई और कोलकाता में 22 कैरेट सोने की कीमत 142840 रुपये प्रति 10 ग्राम, जबकि 24 कैरेट सोने की कीमत 155830 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

चेन्नई में सोने की कीमत: 24 कैरेट सोने की कीमत 155830 रुपये प्रति 10 ग्राम है। 22 कैरेट का भाव 142840 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

पुणे और बेंगलुरु में कीमत: इन दोनों शहरों में 24 कैरेट गोल्ड की कीमत 155830 रुपये प्रति 10 ग्राम और 22 कैरेट गोल्ड की कीमत 142840 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

शहर22 कैरेट सोने का आज का भाव (₹)24 कैरेट सोने का आज का भाव (₹)
दिल्ली142990155980
मुंबई142840155830
अहमदाबाद142890155880
चेन्नई142840155830
कोलकाता142840155830
हैदराबाद142840155830
जयपुर142990155980
भोपाल142890155880
लखनऊ142990155980
चंडीगढ़142990155980

एनालिस्ट्स के मुताबिक, नए हफ्ते में सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है। लेकिन यह सीमित दायरे में रहने की संभावना है। अमेरिकी डॉलर और बॉन्ड यील्ड में हलचल पर बाजार की नजर रहेगी। इसके अलावा पश्चिम एशिया के तनाव और कच्चे तेल की कीमतें भी सोने को प्रभावित करेंगे।

Gold Price Outlook: इस हफ्ते कैसी रहेगी सोने-चांदी की चाल, एक्सपर्ट्स से जानिए

चांदी की कीमत

सोने की तरह दूसरी कीमती धातु चांदी में भी सोमवार को गिरावट है। 21 सितंबर की सुबह चांदी लुढ़ककर 254900 रुपये प्रति किलोग्राम पर आ गई। बीते सप्ताह चांदी 10000 रुपये महंगी हुई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में हाजिर चांदी यानि कि स्पॉट सिल्वर की कीमत 66.70 डॉलर प्रति औंस है। इस साल जनवरी में देश के अंदर चांदी की कीमत 4 लाख रुपये प्रति किलोग्राम के रिकॉर्ड हाई पर पहुंच गई थी। ​सोने और चांदी की देश के अंदर कीमतें डोमेस्टिक फैक्टर्स के साथ-साथ ग्लोबल फैक्टर्स से भी प्रभावित होती हैं।

राहुल के इंदौर कार्यक्रम के बाद बढ़ा विवाद

नई दिल्ली। इंदौर में राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के बाद विवाद तेज हो गया है। भाजपा ने कांग्रेस और राहुल गांधी पर बड़ा हमला किया है। राहुल गांधी के मंच पर एक कॉमेडियन की मौजूदगी और नरेंद्र मोदी का मजाक बनाए जाने को ल कर भाजपा हमलावर है।  भाजपा ने कांग्रेस को जोकरों की पार्टी कहा है। यहां तक कि भाजपा ने यह आरोप भी लगाया है कि राहुल के कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी की मां का अपमान किया गया।

केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रीजीजू ने रविवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में लिखा, ‘कांग्रेस पार्टी कॉमेडियंस और जोकर्स की पार्टी बन गई है। वे हमेशा के लिए बाहर हो गए हैं… रेस्ट इन पीस’। केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रल्हाद जोशी ने भी कांग्रेस पर हमला किया और एक्स पर लिखा, ‘राहुल और कांग्रेस पार्टी नैतिक दिवालियापन के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं। छात्र संवाद का इस्तेमाल पीएम मोदी की दिवंगत मां का मजाक उड़ाने और उनका अपमान करने के लिए करना बुनियादी मानवीय संवेदना और राजनीतिक संस्कृति की चौंकाने वाली कमी दिखाता है’।

दूसरी ओर कांग्रेस ने इसका जवाब दिया और भाजपा व आरएसएस पर शिक्षा व्यवस्था को खोखला और भ्रष्ट करने का आरोप लगाया। कांग्रेस महासचिव और संचार विभाग के प्रमुख जयराम रमेश ने कहा कि राहुल गांधी छात्रों के साथ खड़े हैं, इसलिए सरकार से सवाल पूछ रहे हैं और जवाबदेही मांग रहे हैं। गौरतलब है कि राहुल गांधी ने शनिवार को इंदौर में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में हिस्सा लिया। इस कार्यक्रम की थीम ‘सिस्टम बनाम स्टूडेंट्स’ रखी गई थी। यह कार्यक्रम इससे पहले कोटा, देहरादून, प्रयागराज और पुणे में हो चुका है। इंदौर में छात्रों ने शिक्षा, भर्ती, परीक्षा, आरक्षण, हॉस्टल और रोजगार से जुड़े मुद्दे उठाए।

इस कार्यक्रम में राहुल गांधी ने कहा कि शिक्षा बच्चों का अधिकार है, कोई अहसान या सुविधा नहीं। कार्यक्रम में स्टैंडअप कॉमेडियन पुलकित मणि ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अंदाज से मिलते जुलते हाव भाव और संवाद किए। राहुल गांधी भी उनके साथ हंसते नजर आए। वे राहुल से जबरदस्ती गले लगते दिखे, जिसक बाद राहुल ने परेशान होने की एक्टिंग की। गौरतलब है कि इस तरह का एक एक्ट राहुल गांधी और पूर्व सांसद संदीप दीक्षित पहले दिल्ली में भी कर चुके हैं। उसे इंदौर में एक स्टैंडअप कॉमेडियन के जरिए दोहराया गया। उसी एक्ट को लेकर भाजपा सबसे ज्यादा आहत है और कांग्रेस पर हमलावर है।

ChatGPT से लेकर फेक Insta अकाउंट तक… पुलिस के 5053 पेज की चार्जशीट से खुले केतन हत्याकांड के कई अनसुलझे राज

पुणे के ऐतिहासिक लोहागढ़ किले में 18 जून को युवा बिजनेसमैन केतन अग्रवाल की सनसनीखेज हत्या ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था। केतन की हत्या के आरोप में पुलिस ने केतन की मंगेतर सिया गोयल, उसके प्रेमी चेतन चौधरी और उनके साथी रितेश हांगे को गिरफ्तार किया है। वहीं अब पुणे पुलिस ने इस हत्याकांड का पूरा ब्यौरा अदालत में दिया है। पुणे की अदालत में 5,053 पेज की चार्जशीट में पुलिस ने 26 साल के कारोबारी केतन अग्रवाल की हत्या की कथित साजिश का पूरा ब्यौरा दिया है। पुलिस के मुताबिक, केतन की 18 जून को लोहागढ़ किले से धक्का दिए जाने के बाद मौत हो गई थी। चार्जशीट में पुलिस ने इस मामले से जुड़ी घटनाओं और कथित साजिश की जानकारी दी है।

बता दें, केतन अग्रवाल की मौत के बाद पुलिस ने उसकी मंगेतर सिया गोयल, उसके कथित प्रेमी चेतन चौधरी और रितेश हांगे को गिरफ्तार किया है। केतन और सिया दोनों पुणे के रहने वाले थे। दोनों की फरवरी में सगाई हुई थी और नवंबर में जयपुर में एक बड़े समारोह में उनकी शादी होने वाली थी।

मारने के लिए किया रिसर्च

पुलिस की चार्जशीट में खुलासा हुआ है कि केतन अग्रवाल की हत्या के लिए तीनों आरोपियों ने महीनों तक बाकायदा रिसर्च और प्लानिंग की थी। चार्जशीट के मुताबिक, केतन अग्रवाल की हत्या की कथित साजिश कई चरणों में बनी। शुरुआत में आरोपियों के बीच उसे गंभीर रूप से घायल करने की बात हुई। इसके बाद उन्होंने हमला करने के लिए महाराष्ट्र के बाहर से किसी व्यक्ति को बुलाने पर भी विचार किया। लेकिन, बाद में आरोपियों ने कथित तौर पर यह काम खुद करने का फैसला किया। पुलिस के मुताबिक, आरोपियों ने बाहरी व्यक्ति को प्लान में शामिल करने का विचार इसलिए छोड़ दिया, क्योंकि उन्हें डर था कि वह राज खोल सकता है। बाद में वह व्यक्ति इस मामले में गवाह बन गया।

चैटजीपीटी और पॉडकास्ट सुने

चार्जशीट के मुताबिक, इसके बाद सिया गोयल और चेतन चौधरी ने खुद केतन अग्रवाल को मारने की तैयारी शुरू कर दी। चार्जशीट में कहा गया कि दोनों ने हत्या से जुड़ी फिल्में देखीं, चैटजीपीटी का इस्तेमाल किया और पुलिस से बचने के तरीकों से जुड़े पॉडकास्ट सुने। पुलिस के मुताबिक, आरोपियों ने मेघालय के चर्चित हनीमून हत्या मामले के बारे में भी जानकारी जुटाई थी, जिसमें इंदौर के रहने वाले राजा रघुवंशी की मई 2025 में मेघालय में हनीमून के दौरान कथित तौर पर हत्या कर दी गई थी। इसके बाद पुलिस का दावा कि सिया गोयल और चेतन चौधरी ने लोनावाला के आसपास कई जगहों की रेकी की और एक सुनसान जगह की तलाश की। दोनों कथित तौर पर टाइगर पॉइंट समेत कई जगहों पर गए और आखिर में लोहागढ़ किले को चुना।

क्यों चुना गया लोहागढ़

चार्जशीट के मुताबिक, आरोपियों ने आखिर में लोहागढ़ किले को इसलिए चुना क्योंकि पिछले साल मार्च में वहां एक महिला की मौत हो चुकी थी। जांचकर्ताओं का आरोप है कि आरोपियों को लगा कि केतन अग्रवाल की मौत को सेल्फी लेते समय अचानक गिरने की घटना बताया जा सकता है। चार्जशीट के मुताबिक, 14 जून को सिया गोयल और केतन अग्रवाल लोहागढ़ गए थे। पुलिस का आरोप है कि सिया ने केतन को चट्टान से धक्का देने की कोशिश की, लेकिन केतन ने पेड़ पकड़कर खुद को बचा लिया। पूछने पर सिया ने कथित तौर पर कहा कि उसने सांप देखा था और केतन को बचाने की कोशिश की थी।

पासपोर्ट फाड़ कर फेंक दिया

जांचकर्ताओं के मुताबिक, सिया गोयल 4 जून को लोहागढ़ किला जाना चाहती थी, क्योंकि आरोपियों की कथित योजना बाली जाने से पहले ही केतन अग्रवाल को मारने की थी। चार्जशीट के अनुसार, 6 जून को प्री-वेडिंग फोटोशूट के लिए जाते समय सिया ने कथित तौर पर केतन का पासपोर्ट फाड़ दिया और उसे एक कैफे के वॉशरूम में फेंक दिया। पुलिस का दावा है कि पासपोर्ट खराब होने की वजह से दोनों की बाली यात्रा रद्द हो गई।

नकली इंस्टा अंकाउट भी बनाया

पुलिस का आरोप है कि रितेश हांगे ने आरोपियों की एक जान-पहचान वाली महिला की तस्वीर का इस्तेमाल कर ‘माही’ नाम से एक नकली इंस्टाग्राम अकाउंट बनाया था। पुलिस के मुताबिक, इस अकाउंट से केतन अग्रवाल को मैसेज भेजे गए और उसे 18 जून को लोहागढ़ जाने के लिए तैयार किया गया। उसे बताया गया था कि यह सिया गोयल से जुड़ा सरप्राइज बर्थडे प्लान है।

चार्जशीट के मुताबिक, केतन अग्रवाल की मौत के बाद नकली इंस्टाग्राम अकाउंट डिलीट कर दिया गया था। पुलिस का आरोप है कि 18 जून को चेतन चौधरी किले के एक दूसरे रास्ते से अंदर गया और बाद में सिया गोयल के इशारे पर उसके साथ शामिल हो गया।

सिया ने केतन को दिया धक्का

पुलिस के मुताबिक, सिया ने केतन का ध्यान भटकने पर उसे पीछे से धक्का दिया, जिसके बाद चेतन ने उसे लात मारी और वह किले से नीचे गिर गया। पुलिस ने बताया कि चार्जशीट में पांच चश्मदीदों समेत 100 से ज्यादा लोगों के बयान शामिल हैं। इसके अलावा जांच में मोबाइल डेटा, व्हाट्सऐप चैट, तस्वीरें, कॉल रिकॉर्ड और दूसरी तकनीकी जानकारी को भी सबूत के तौर पर शामिल किया गया है।

20 लाख खर्च कर MBA ग्रेजुएट ने शुरू की शिमला मिर्च की खेती, सालाना 2.25 करोड़ का कमा रही मुनाफा

MBA ग्रेजुएट प्रणिता वामन ने कोरोना काल में 20 लाख का एक समझदारीभरा निवेश किया था, जिसके बाद से आज वह करोड़ों का प्रोफिट कमा रही हैं। उन्होंने COVID-19 लॉकडाउन के दौरान शिमला मिर्च की खेती करनी शुरू की थी। एक एकड़ से शुरू हुआ काम आज 25 एकड़ के फार्म तक पहुंच चुका है। उनका टर्नओवर 4 करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है।

30Stades की रिपोर्ट के मुताबिक उनकी ये जर्नी फूड प्रोसेसिंग सेक्टर में इंटर्नशिप के साथ शुरू हुई थी, जहां उन्होंने मॉर्डन एग्रीकल्चर (आधुनिक खेती) में संभावनाओं को खोजा । 2020 में एक एकड़ पॉलीहाउस खेती से शुरू हुआ यह काम अब 25 एकड़ के खेती के कारोबार में तक पहुंच गया है, जिससे प्रणिता वामन का सालाना ₹4 करोड़ का टर्नओवर होता है।

MBA से खेती तक का सफर

प्रणिता वामन महाराष्ट्र के पुणे जिले के जुन्नार तालुका के कलवाड़ी गांव से ताल्लुक रखती हैं। वह एक किसान परिवार में पली-बढ़ी हैं। उनके पिता टीचर थे, लेकिन वॉलंटरी रिटायरमेंट लेने के बाद भी वे फलों और सब्जियों की खेती से जुड़े रहे। उन्होंने 2019 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज पुणे से एग्री बिजनेस मैनेजमेंट में MBA किया है। अपनी डिग्री करने के बाद उन्होंने एक फूड प्रोसेसिंग कंपनी में इंटर्नशिप करनी शुरू किया था।

इंटरर्नशिप से मिले एक्सपीरिएंस ने वामन को हाई-टेक खेती, खासकर पॉलीहाउस खेती के बारे में जानने के लिए काफी मोटीवेट किया। कम संसाधन में किसान फसल उगाने की स्थितियों को कैसे मैनेज कर सकते हैं, फसल की पैदावार और क्वालिटी बेहतर कैसे बना सकते हैं और पौधों को खराब मौसम से कैसे बचा सकते हैं? यह सब उन्होंने सीखा। बदलते मौसम के पैटर्न को देखते हुए कंट्रोल किए गए माहौल में सही तरीके से खेती आसानी से की जा सकती है।

वामन ने बताया कि हम तेजी से बदलते मौसम का सामना करते रहते हैं। आज लगातार अच्छी कमाई करने का एकमात्र तरीका हाई-टेक खेती है। यह बेहद फायदेमंद भी है।

प्रणिता ने शिमला मिर्च की खेती को ही क्यों चुना?

MBA ग्रेजुएट ने कहा खेती करने की प्लानिंग तो करली गई, लेकिन फिर हमारे सामने अगला सवाल यह था कि क्या उगाया जाए? वामन ने शिमला मिर्च (कैप्सिकम) को चुनने से पहले लेट्यूस और ब्रोकली जैसी कई सब्जियों को उगाने के बारे में भी विचार किया था। आखिरकार फिर उन्होंने शिमला मिर्च की फसल को चुना क्योंकि इसकी मांग हर मौसम में बनी रहती है।

वामन ने कहा कि “मैंने लेट्यूस, ब्रोकली और दूसरी विदेशी सब्जियों की खेती करने के बारे में विचार किया था। लेकिन शिमला मिर्च की मांग की डिमांड को देखते हुए हमने इसे फाइनल किया। शिमला मिर्च सालभर डिमांड में रहती है। इसका कोई खास सीजन नहीं होता है।

सालभर बाजार में रहती है डिमांड

ये शहरों के बाजारों में सालभर बिकती है। शिमला का यूज होटल, रेस्टोरेंट और फूड बिजनेस में बड़े पैमाने पर किया जाता है। खासकर लाल और पीली शिमला मिर्च अक्सर हरी शिमला मिर्च के मुकाबले ज्यादा महंगी बिकती हैं। इस फसल का एक बड़ा इंटरनेशनल मार्केट भी है।

वामन के मुताबिक उन्होंने मार्च 2020 में वामन ने 50% सरकारी सब्सिडी के साथ 20 लाख रुपये का निवेश करके एक पॉलीहाउस में एक एकड़ ज़मीन पर शिमला मिर्च की खेती शुरू की थी। उन्होंने KVK बारामती से लाए गए 12,000 पौधे लगाए थे। फसल जून-जुलाई में पूरी तरह से तैयार हो गई थी। लेकिन उनकी पहली फसल कटने का समय कोविड-19 लॉकडाउन लग गया था, जिससे बाजार बुरी तरह से प्रभावित हुए थे।

खरीदार ढूंढना था चुनौती

कमर्शियल खेती में नए होने की वजह से खरीदार ढूंढना उनके लिए एक बड़ी चुनौती बन गई थी। वामन ने माना “फील्ड में नई होने के नाते मुझे ये पता नहीं था कि अपनी फसल को कहां बेचना है। इसके बाद उन्होंने ऑनलाइन थोक सब्जी खरीदारों को ढूंढना शुरू किया। अपनी फसल बेचने के लिए उन्होंने नासिक से लेकर मुंबई तक के व्यापारियों से संपर्क किया। वामन ने बताया कि काफी मशक्कत के बाद मुझे शिमला मिर्च खरीदने के लिए एक व्यापारी मिला था। लॉकडाउन के दौरान कई किसानों ने इसकी खेती बंद कर दी थी।”

उनकी पहली फसल में 40 टन लाल, पीली और हरी शिमला मिर्च हुई, जो 80 रुपये प्रति किलो के भाव से बिकी थी। इससे उन्होंने 32 लाख रुपये कमाए थे। अपना 20 लाख रुपये का इंवेस्टमेंट निकालने के बाद वामन ने 2021 तक खेती का दायरा बढ़ाकर 1 से 25 एकड़ कर लिया था। इसमें छह एकड़ में पॉलीहाउस और 19 एकड़ में शेड नेट का इस्तेमाल किया, जिनसे अलग-अलग पैदावार और कीमतें मिलीं।

जानकारी के लिए बता दें कि पॉलीहाउस खेती से सालाना प्रति एकड़ लगभग 30-32 टन पैदावार मिलती है, जबकि शेड नेट के तहत यह 22-24 टन होती है। वामन ने बताया कि पॉलीहाउस से उन्हें प्रति एकड़ 30 लाख रुपये का टर्नओवर होता है, जिसमें 8-10 लाख रुपये का खर्च आता है। 25 एकड़ में वह सालाना 4 करोड़ रुपये का टर्नओवर और लगभग 2.25 करोड़ रुपये का मुनाफा आराम से कमा लेती हैं।