मंत्रियों, सांसदों और विधायकों को नहीं मिलेगी बागवानी सब्सिडी; केंद्र सरकार ने बदले NHB के नियम, कितनी मिलती थी सब्सिडी, क्या था नियम?

Horticulture subsidy rules: केंद्र सरकार ने नेशनल हॉर्टिकल्चर बोर्ड (NHB) की कमर्शियल हॉर्टिकल्चर और कोल्ड स्टोरेज स्कीम के तहत आर्थिक मदद पाने के लिए योग्यता के नियमों को और सख्त कर दिया है। अब संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के अलावा मौजूदा मंत्रियों, सांसद (MP), विधायक (MLA), मेयर और जिला पंचायत अध्यक्षों समेत कई कैटेगरी के लोग योजना के लाभ से बाहर होंगे। नई गाइडलाइंस 21 अगस्त को जारी की गईं। इसी के साथ ये तुरंत लागू हो गई हैं।

बदली हुई गाइडलाइंस के अनुसार, केंद्र और राज्य सरकार के मंत्रालयों और विभागों, पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स, ऑटोनॉमस बॉडीज और लोकल बॉडीज के कर्मचारियों को भी NHB से आर्थिक मदद पाने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया है।

हालांकि, मल्टी-टास्किंग स्टाफ (MTS) और क्लास IV कर्मचारियों को इस नियम से छूट दी गई है। इसके अलावा, ₹10,000 या उससे अधिक की मासिक पेंशन पाने वाले रिटायर्ड कर्मचारी या पेंशनभोगी भी इस स्कीम के तहत योग्य नहीं होंगे।

बदली हुई गाइडलाइंस के तहत, इन कैटेगरी में आने वाले लोगों के परिवार के सदस्य स्कीम के तहत एक बार आर्थिक मदद ले सकते हैं, बशर्ते वे परिवार की नई परिभाषा के तहत योग्यता के नियमों को पूरा करते हों।

‘परिवार’ की इस परिभाषा में आवेदक के जीवनसाथी, माता-पिता, बेटे और बेटियाँ शामिल हैं। NHB स्कीम के तहत आर्थिक मदद के लिए प्रति परिवार केवल एक सदस्य ही योग्य है। गाइडलाइंस के अनुसार, परिवार के किसी भी सदस्य को दी गई आर्थिक मदद को पूरे परिवार को दी गई मदद माना जाएगा।

नियमों में क्यों करने पड़े बदलाव?

NHB ने कहा कि इन बदलावों का मकसद आर्थिक मदद को तर्कसंगत बनाना, फायदों का समान वितरण सुनिश्चित करना, सब्सिडी के दोहराव को रोकना और स्कीम को लागू करने की प्रक्रिया को ज़्यादा पारदर्शी और असरदार बनाना है। ये बदलाव कुछ हफ्ते पहले यह पता चलने के बाद किए गए हैं कि केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी और BJP सांसद लुंबा राम ने NHB स्कीम के तहत फायदा उठाया था।

मंत्री ने सब्सिडी लौटाया

कृषि राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने 28 जुलाई को संसद को बताया था कि चौधरी ने संबंधित बैंक को सब्सिडी की रकम लौटा दी थी। बैंक को निर्देश दिया गया था कि वह फंड NHB को वापस भेज दे। ‘हॉर्टिकल्चर फसलों के उत्पादन और कटाई के बाद के मैनेजमेंट के जरिए कमर्शियल हॉर्टिकल्चर का विकास’ नाम की इस स्कीम का मकसद बड़े पैमाने पर हॉर्टिकल्चर फसलों की कमर्शियल खेती (मुनाफे के लिए) को बढ़ावा देना है।

इस स्कीम में तीन तरह की सब्जियां जैसे शिमला मिर्च, खीरा और टमाटर और आठ तरह के फूल जैसे गुलाब, लिली और गुलदाउदी शामिल हैं। इस स्कीम के तहत प्रोजेक्ट की लागत का 50% सब्सिडी के तौर पर दिया जाता था, जिसकी अधिकतम सीमा प्रति परिवार 1 करोड़ रुपये तय की गई थी।

केंद्र सरकार की बागवानी सब्सिडी स्कीम का पूरा नाम Mission for Integrated Development of Horticulture (MIDH) है। यह केंद्र की अहम योजना है। यह फल, सब्जी, फूल, मसाले, मशरूम, नर्सरी आदि बागवानी गतिविधियों को कवर करती है। सब्सिडी काम और फसल के हिसाब से अलग होती है।

MLA Salary: कार, बंगला और लाखों के भत्ते! जानिए किस राज्य के विधायक कमाते हैं सबसे ज्यादा पैसा

MLA Salary: तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के सभी 234 विधायकों को सरकारी गाड़ी और हर महीने अतिरिक्त भत्ता देने के फैसले के बाद अब विधायकों की सैलरी और उन्हें मिलने वाली दूसरी सुविधाएं चर्चा में हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि विधायकों को वेतन के अलावा और क्या-क्या सुविधाएं मिलती हैं।

नई व्यवस्था के तहत तमिलनाडु के हर विधायक को एक सरकारी गाड़ी मिलेगी। इसके अलावा गाड़ी, पेट्रोल-डीजल और मेंटेनेंस के खर्च के लिए हर महीने 75,000 रुपये और एक सहायक (असिस्टेंट) के लिए 25,000 रुपये दिए जाएंगे। यानी हर विधायक को वेतन के अलावा हर महीने कुल 1 लाख रुपये की अतिरिक्त सुविधा मिलेगी। राज्य सरकार ने विधायकों के लिए हेल्थ इंश्योरेंस कवर भी बढ़ा दिया है।

इस फैसले के बाद देशभर में विधायकों की सैलरी और उन्हें मिलने वाली सुविधाओं को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। अलग-अलग राज्यों में विधायकों की बेसिक सैलरी, भत्तों और दूसरी सुविधाओं में काफी अंतर देखने को मिलता है।

यह राज्यों का विषय है

सांसदों की सैलरी और भत्ते संसद तय करती है, लेकिन विधायकों की सैलरी और उन्हें मिलने वाली सुविधाएं राज्य सरकार के दायरे में आती हैं। हर राज्य की विधानसभा अपने विधायकों के वेतन और भत्तों से जुड़े नियम और कानून तय करती है।

विधायकों के लिए कोई एकसमान राष्ट्रीय वेतन संरचना नहीं है। उनकी कमाई में सिर्फ बेसिक सैलरी ही शामिल नहीं होती। राज्य सरकारें विधायकों को विधानसभा क्षेत्र के खर्च, ऑफिस और स्टाफ, यात्रा, रहने, फोन और कम्युनिकेशन, इलाज और दूसरे आधिकारिक खर्चों के लिए अलग-अलग भत्ते भी देती हैं।

पीआरएस विधायी अनुसंधान के अनुसार, अधिकांश राज्यों में, विधायक कानून के माध्यम से अपने वेतन और भत्ते स्वयं निर्धारित करते हैं। इसके परिणामस्वरूप राज्यों में मूल वेतन और समग्र वेतन पैकेज दोनों में महत्वपूर्ण अंतर देखने को मिलता है।

किस राज्य में विधायकों को सबसे अधिक वेतन मिलता है?

2025 में द ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट के अनुसार, तेलंगाना राज्य में विधायकों को सबसे अधिक वेतन 2.75 लाख रुपये दिया जाता था। के. चंद्रशेखर राव के नेतृत्व वाली बीआरएस सरकार के दौरान सभी भत्तों सहित यह वेतन 1.25 लाख रुपये से बढ़कर 2.75 लाख रुपये हो गया था।

किस राज्य में विधायकों का वेतन सबसे कम है?

पीआरएस की एक रिपोर्ट के अनुसार, केरल के विधायकों का मासिक वेतन 70,000 रुपये है, जो देश के सबसे कम वेतन पाने वाले विधायकों में से एक है। उनके मासिक वेतन में 2,000 रुपये का निश्चित भत्ता, 25,000 रुपये का निर्वाचन क्षेत्र भत्ता, 20,000 रुपये का न्यूनतम मासिक यात्रा भत्ता, 11,000 रुपये का टेलीफोन भत्ता, 4,000 रुपये का सूचना भत्ता और 8,000 रुपये का उपभोग भत्ता शामिल है। उन्हें राज्य के भीतर यात्रा के लिए 1,000 रुपये और केरल के बाहर यात्रा के लिए 1,200 रुपये का दैनिक भत्ता भी मिलता है।

हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि कम वेतन वाले राज्य में विधायकों को कम सुविधाएं मिलती हैं। इन्हें आवास, सरकारी आवास, इलाज, यात्रा खर्च की भरपाई, स्टाफ सपोर्ट और दूसरी सुविधाएं अलग से दी जाती हैं।

विधायकों को वेतन के अलावा और क्या मिलता है?

विधायक का मासिक वेतन राज्य द्वारा विधायक पर किए जाने वाले कुल व्यय का केवल एक हिस्सा है।

सामान्य सुविधाओं और भत्तों में शामिल हैं:

  • निर्वाचन क्षेत्र के कार्यों से संबंधित खर्चों के लिए निर्वाचन क्षेत्र भत्ता
  • कर्मचारियों और प्रशासनिक खर्चों के लिए सेक्रेटेरियल या ऑफिस भत्ता
  • सरकारी यात्राओं के लिए यात्रा और परिवहन भत्ता
  • विधानसभा सत्रों और समिति की बैठकों में भाग लेने के लिए दैनिक भत्ता
  • राज्य की राजधानी में आवास
  • विधायक और कुछ राज्यों में परिवार के सदस्यों के लिए मेडिकल सुविधाएं
  • टेलीफोन और संचार भत्ता
  • वाहन सुविधाएं या वाहन भत्ता
  • कार्यालय उपकरण और स्टेशनरी भत्ता
  • विधानसभा छोड़ने के बाद पेंशन और अन्य लाभ, जो राज्य के नियमों पर निर्भर करते हैं
  • हरियाणा में आवास और कार सुविधा
  • कुछ राज्य पारंपरिक वेतन-भत्ते मॉडल से परे भी लाभ प्रदान करते हैं।

हरियाणा में विधायकों को सिर्फ सैलरी और भत्ते ही नहीं, बल्कि घर और गाड़ी खरीदने के लिए 1 करोड़ रुपये तक का लोन लेने की सुविधा भी मिलती है। यह लोन घर, मोटर कार या दोनों के लिए लिया जा सकता है।

इसके अलावा, विधायकों और उनके परिवार के सदस्यों के लिए मेडिकल ट्रीटमेंट की सुविधा भी दी जाती है। राज्य सरकार घर में बदलाव कराने और उसकी मरम्मत के लिए भी विधायकों को एडवांस राशि उपलब्ध कराती है।

ओडिशा का विधायक विकास कोष

एक और महत्वपूर्ण अंतर विधायक द्वारा व्यक्तिगत रूप से प्राप्त लाभों और उनके निर्वाचन क्षेत्र से जुड़े कोषों के बीच है।

ओडिशा की विधायक स्थानीय क्षेत्र विकास योजना के तहत वित्त वर्ष 2025-26 से हर विधानसभा क्षेत्र को 5 करोड़ रुपये दिए जाते हैं। इस राशि को सामान्य विकास, शिक्षा और सड़क से जुड़े कामों के लिए बांटा जाता है।

हालांकि, इस राशि को विधायक का वेतन या व्यक्तिगत लाभ नहीं माना जाना चाहिए। यह सार्वजनिक धन है जो विधायक द्वारा प्रतिनिधित्व किए जाने वाले निर्वाचन क्षेत्र में विकास कार्यों के लिए निर्धारित किया गया है।

विधायकों के वेतन में इतना अंतर क्यों होता है?

इस अंतर के पीछे कई कारण हैं:

  • आर्थिक रूप से मजबूत राज्यों के पास उच्च वेतन देने की वित्तीय क्षमता अधिक हो सकती है, हालांकि राजनीतिक प्राथमिकताएं भी मायने रखती हैं।
  • उच्च जीवन यापन और परिचालन लागत वाले राज्यों के विधायकों को अधिक भत्ते मिल सकते हैं।
  • अगर किसी विधायक का क्षेत्र बहुत बड़ा, दूर-दराज या कई इलाकों में फैला हुआ है, तो उसका यात्रा खर्च भी ज्यादा हो सकता है। ऐसे में उसे ज्यादा यात्रा भत्ता मिल सकता है
  • कई बार राज्य सरकारें और विधानमंडल विधायकों की मांगों के बाद समय-समय पर वेतन और भत्तों में संशोधन करते हैं।

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कम होंगे बैंकर्स के लिए अदालतों के चक्कर! बदला 135 पुराना बैंकिंग कानून, ये है 5 बड़ी बातें

संसद ने इस महीने की शुरुआत में बैंकर्स बुक एविडेंस बिल 2026 (Bankers’ Books Evidence Bill 2026) पारित किया। इसका लक्ष्य बैंक रिकॉर्ड से जुड़े 135 साल पुराने कानून को बदलना और पारंपरिक बैंकिंग रिकॉर्ड को डिजिटल दौर के अनुरूप बनाना है। इससे जुड़ा कानून पहली बार वर्ष 1891 में उस समय पास किया गया था, जब बैंकिंग रिकॉर्ड्स मुख्य रूप से कागजी रूप में रखे जाते थे। अब नए कानून में बैंक के डिजिटल रूप को अधिक महत्ता दी गई है और इससे कोर्ट-कचहरी के मामले में बैंकिंग रिकॉर्ड को हासिल करने तथा इस्तेमाल करने के तरीके में बदलाव होगा। यहां इस कानून से जुड़े पांच अहम पहलू दिए गए हैं। हालांकि इससे ग्राहकों के डेटा की प्राइवेसी को लेकर चर्चा शुरू हो सकती है।

डिजिटल बैंक रिकॉर्ड्स को सबूत के तौर पर मान्यता

सबसे बड़े बदलावों में से एक इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल रिकॉर्ड्स को बैंकर्स बुक्स के तौर पर मान्यता देना है। साल 1891 का कानून फिजिकल बुक्स, लेजर्स और दूसरे ट्रेडिशनल रिकॉर्ड्स को ध्यान में रखकर बनाया गया था। नए बिल के मुताबिक बैंकों को अधिकतर ट्रांजैक्शन और अकाउंट्स की जानकारी इलेक्ट्रॉनिक रूप में रखनी ही होगी। इसका मतलब है कि बैंकों के डिजिटल रिकॉर्ड किसी कानूनी मामले में साक्ष्य के तौर पर इस्तेमाल किए जा सकेंगे।

असली रिकॉर्ड की जगह सर्टिफाइड कॉपी का इस्तेमाल

नए बैंकिंग कानून में मौजूदा नियम को बनाए रखा गया है, जिसके तहत बैंक रिकॉर्ड की सर्टिफाइड कॉपी या उनके किसी हिस्से को सबूत के तौर पर पेश किया जा सकता है। यह इसलिए अहम है क्योंकि बैंकों के पास भारी-भरकम ट्रांजैक्शन डेटा होता है। हर कानूनी मामले के लिए मूल रिकॉर्ड पेश करने बहुत समय लग सकता है। हालांकि अब नई व्यवस्था के तहत असली बैंकर बुक के बजाय सर्टिफाइड कॉपी से काम चल जाएगा, जिससे अदालतों के लिए बैंक ट्रांजैक्शन की जांच करना आसान हो जाएगा। हालांकि इसमें ऐसे प्रावधान भी किया गया है जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि रिकॉर्ड भरोसेमंद हैं।

कानूनी एजेंसियों की ग्राहकों के खातों की जानकारी मांगना

इस बिल में एक प्रावधान है जिसे लेकर बहस छिड़ सकती है। इसके तहत लॉ एंफोर्समेंट एजेंसियां किसी ग्राहक के बैंक अकाउंट की जानकारी मांग सकते हैं। इस बिल में कुछ खास रैंक के पुलिस अधिकारियों को बिना किसी अदालती आदेश के सीधे बैंक से ही बैंकिंग अकाउंट की जानकारी हासिल करने का अधिकार मिला है। कुछ मामलों में बैंकों को इसके बारे में ग्राहकों को भी बताना होगा लेकिन किसी जांच, वित्तीय अपराध या नेशनल सिक्योरिटीज से जुड़े मामले में ऐसी कोई बाध्यता नहीं है।

बैंक अधिकारियों को बार-बार कोर्ट में पेश होने से राहत

नए बिल में बैंक अधिकारियों को ऐसी स्थितियों में राहत दी गई है, जब उनके इंस्टीट्यूशंस किसी कानूनी कार्यवाही में सीधे तौर पर शामिल न हों। किसी अधिकारी को बैंक के रिकॉर्ड पेश करने या उनमें शामिल लेन-देन को साबित करने के लिए कोर्ट में पेश होने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। हालांकि रिकॉर्ड की सत्यता पर संदेह या जांच के आदेश का पालन नही होने की स्थिति में कोर्ट रिकॉर्ड पेश करने का आदेश दे सकता है। इसका लक्ष्य बैंक अधिकारियों पर रूटीन बैंकिंग रिकॉर्ड से जुड़े कोर्ट केस में बार-बार पेश होने का बोझ कम करना है।

फाइनेंस सेक्टर की दूसरी एंटिटीज तक बढ़ा दायरा

नए बिल से केंद्र सरकार को इसके प्रावधान फाइनेंशियल सेक्टर दूसरी एंटिटीज या क्लास ऑफ एंटिटीज जैसे कि NBFC (नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनीज), पेंशन फंड्स, बीमा कंपनियां इत्यादि पर लागू करने का अधिकार मिलता है। इन एंटिटीज पर कानून लागू करते समय शर्तें, छूट या बदलाव भी तय कर सकती है।

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Mutual Fund vs EPF vs PPF vs NPS: इमरजेंसी में पैसों की जरूरत? जानिए किस निवेश से पैसा सबसे जल्दी निकलता है

Mutual Fund vs EPF vs PPF vs NPS: जब अचानक पैसों की जरूरत पड़ जाए, तो सिर्फ रिटर्न मायने नहीं रखता। यह भी उतना ही जरूरी है कि पैसा आपके बैंक खाते में कितनी जल्दी पहुंचे। किसी निवेश में रकम अगले कारोबारी दिन मिल सकती है। कुछ योजनाओं में कई दिन या हफ्ते भी लग सकते हैं। ऐसे में अगर आप रिटायरमेंट के लिए निवेश कर रहे हैं, तो हर स्कीम का विड्रॉल टाइमलाइन जानना जरूरी है।

आनंद राठी वेल्थ के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर जसमीत सिंह के मुताबिक, हर निवेश का मकसद अलग होता है। लिक्विड और शॉर्ट ड्यूरेशन डेट म्यूचुअल फंड सबसे ज्यादा लिक्विड माने जाते हैं, जबकि EPF, PPF और NPS को लंबे समय के निवेश के लिए बनाया गया है।

सबसे पहले एक नजर में विड्रॉल टाइमलाइन

निवेश विकल्प
पैसा मिलने का समय

लिक्विड/ओवरनाइट म्यूचुअल फंड
अगले कारोबारी दिन

इक्विटी म्यूचुअल फंड1-3 कारोबारी दिन
NPST+2
EPF3-5 दिन (ऑनलाइन), अधिकतम 20 दिन
PPFआमतौर पर कुछ कारोबारी दिन

NPS में T+2 में प्रोसेस हो सकता है विड्रॉल

नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) का विड्रॉल टाइमलाइन सबसे साफ माना जाता है। PFRDA ने सितंबर 2022 में एग्जिट विड्रॉल का समय T+4 से घटाकर T+2 कर दिया था। इसका मतलब है कि जरूरी मंजूरी मिलने के बाद विड्रॉल दो कारोबारी दिनों के भीतर प्रोसेस हो सकता है। हालांकि, रिटायरमेंट पर एन्युटी खरीदने जैसी प्रक्रिया होने पर पूरा पैसा तुरंत खाते में नहीं आता।

आंशिक निकासी के लिए भी नियम तय हैं। NPS में अपनी जमा राशि का अधिकतम 25% तक आंशिक विड्रॉल किया जा सकता है। इसके लिए तय शर्तें पूरी करनी होती हैं।

PPF में तय T+1 या T+2 नियम नहीं

पब्लिक प्रोविडेंट फंड (PPF) में कोई तय T+1 या T+2 भुगतान नियम नहीं है। निकासी की अनुमति मिलने के बाद बैंक या पोस्ट ऑफिस में आवेदन देना होता है। इसके बाद रकम संबंधित संस्था की प्रोसेसिंग के अनुसार खाते में आती है।

बैंक वाले PPF खातों में आमतौर पर कुछ कारोबारी दिनों में पैसा मिल जाता है। हालांकि, समय बैंक, ब्रांच और ऑनलाइन या ऑफलाइन आवेदन पर निर्भर करता है। जसमीत सिंह के मुताबिक, PPF में पांच वित्तीय वर्ष पूरे होने के बाद ही साल में एक बार आंशिक निकासी की जा सकती है।

EPF में 3-5 दिन में भी मिल सकता है पैसा

EPF में 2026 के बाद प्रक्रिया पहले से तेज हुई है। नए Employees’ Provident Funds Scheme, 2026 के तहत पूरी तरह सही क्लेम का निपटारा 20 दिनों के भीतर करना होगा। अगर बिना वजह देरी होती है, तो संबंधित अधिकारी पर 12% सालाना पेनल ब्याज भी लगाया जा सकता है।

साथ ही, ऑटोमेटेड प्रोसेसिंग के तहत कई ऑनलाइन क्लेम लगभग 3 दिन में भी निपटाए जा रहे हैं। हालांकि, आधार-UAN लिंकिंग, नियोक्ता की जानकारी या दूसरे वेरिफिकेशन की वजह से समय 2-3 हफ्ते तक भी जा सकता है।

म्यूचुअल फंड सबसे तेज विकल्पों में शामिल

अगर सिर्फ जल्दी पैसा निकालना प्राथमिकता है, तो ओपन-एंडेड म्यूचुअल फंड सबसे आसान विकल्पों में गिने जाते हैं। AMFI के मुताबिक, कारोबारी दिनों में रिडेम्प्शन करने पर आमतौर पर पैसा 1 से 3 कारोबारी दिनों में मिल जाता है। लिक्विड और ओवरनाइट फंड में यह अगले कारोबारी दिन भी आ सकता है।

इक्विटी फंड में आमतौर पर लिक्विड फंड की तुलना में थोड़ा ज्यादा समय लगता है।

किस स्कीम में सबसे ज्यादा पाबंदियां हैं?

स्कीमनिकासी की स्थिति
म्यूचुअल फंडसबसे आसान
EPFतय उद्देश्यों के लिए
PPFसीमित निकासी
NPS Tier-1सबसे ज्यादा नियम

NPS Tier-1 में निकासी सिर्फ तय परिस्थितियों में होती है। वहीं PPF और EPF में भी आंशिक निकासी के अपने नियम हैं।

निवेशकों के लिए सबसे जरूरी सीख

सबसे जल्दी पैसा देने वाला विकल्प हमेशा सबसे अच्छा रिटायरमेंट निवेश नहीं होता। म्यूचुअल फंड लिक्विड हैं, लेकिन बाजार के उतार-चढ़ाव से जुड़े रहते हैं। PPF सरकार की गारंटी वाली सुरक्षा देता है, जबकि NPS पूरी तरह रिटायरमेंट को ध्यान में रखकर बनाया गया है।

जसमीत सिंह की सलाह है कि कम से कम 6 महीने के खर्च ऐसी जगह रखें, जहां जरूरत पड़ने पर तुरंत पैसा मिल सके। इससे PPF, EPF या NPS जैसे लंबे समय के निवेश को बीच में तोड़ने की नौबत नहीं आएगी।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

मुसीबत में कौन सा फंड देगा आपका साथ? जानिए EPF, NPS, PPF और म्यूचुअल फंड्स से निकासी की पूरी टाइमलाइन

Retirement Options Withdrawal Timelines: रिटायरमेंट फंड या लंबी अवधि का पोर्टफोलियो बनाते समय हम अक्सर सिर्फ ब्याज दर या मिलने वाले रिटर्न पर ध्यान देते हैं। लेकिन इमरजेंसी के समय सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह होता है कि रिडेम्पशन या विदड्रॉल रिक्वेस्ट डालने के बाद पैसा आपके बैंक खाते में कितनी जल्दी आता है?

कुछ ऑप्शन जहां 24 से 48 घंटे में पैसे ट्रांसफर कर देते हैं, वहीं कुछ में हफ्तों का समय लग जाता है। आनंद राठी वेल्थ लिमिटेड के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर जसमीत सिंह के मुताबिक, ‘लिक्विड और इलिक्विड इंस्ट्रूमेंट्स के अंतर को समझना जरूरी है। क्योंकि हर निवेश तुरंत पैसे देने के लिए नहीं बना होता।’

आइए जानते हैं भारत के 4 सबसे लोकप्रिय निवेश विकल्पों EPF, NPS, PPF और Mutual Funds की निकासी टाइमलाइन और उनके नियमों का पूरा गणित।

1. Mutual Funds: सबसे तेज और आसान निकासी (1 से 3 दिन)

अगर आपको तुरंत और बिना किसी शर्त के पैसे की जरूरत है, तो ओपन-एंडेड म्यूचुअल फंड सबसे बेहतर विकल्प साबित होते हैं। लिक्विड और ओवरनाइट फंड्स का पैसा कट-ऑफ टाइम के आधार पर T+1 (अगले वर्किंग डे) या उसी दिन क्रेडिट हो जाता है। इक्विटी और अन्य डेट फंड्स का पैसा 1 से 3 कार्य दिवसों (T+1 to T+3) में बैंक अकाउंट में आ जाता है।

इसमें पैसा निकालने के लिए किसी विशेष कारण (जैसे- बीमारी, शादी या पढ़ाई) की आवश्यकता नहीं होती। वैसे ये मार्केट-लिंक्ड होते हैं, इसलिए NAV में उतार-चढ़ाव का जोखिम बना रहता है।

2. NPS (नेशनल पेंशन सिस्टम): T+2 सेटलमेंट टाइमलाइन

राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली में क्लेम प्रोसेसिंग की समयसीमा को काफी सुधारा गया है। सितंबर 2022 से PFRDA ने NPS एग्जिट विदड्रॉल की समयसीमा T+4 से घटाकर T+2 (2 सेटलमेंट डेज) कर दी है। हालांकि, पूरा फंड ट्रांसफर होने की प्रक्रिया में एन्युटी खरीदने के नियम भी लागू होते हैं।

एनपीएस टियर-1 खाते से आप केवल अपने योगदान का अधिकतम 25% ही निकाल सकते हैं। इसके लिए विशिष्ट कारणों (जैसे- बीमारी, घर, बच्चों की पढ़ाई) का होना अनिवार्य है।

3. कर्मचारी भविष्य निधि(EPF): 3 दिन से 20 दिन की समयसीमा

जून 2026 में लागू नए कर्मचारी भविष्य निधि योजना, 2026 के तहत ईपीएफओ ने क्लेम सेटलमेंट के नियमों को सख्त और तेज किया है। पूरी तरह से सही पाए गए क्लेम को निपटाने के लिए 20 दिनों की वैधानिक समयसीमा तय की गई है। अगर बिना किसी कारण 20 दिनों से अधिक देरी होती है, तो कमिश्नर के वेतन से 12% वार्षिक ब्याज की दर से हर्जाना वसूला जा सकता है। ऑनलाइन और ऑटोमेटेड सिस्टम के जरिए योग्य क्लेम 3 से 5 दिनों में सेटल हो जाते हैं।

ईपीएफ से केवल तय कारणों जैसे- मेडिकल, शादी, घर आदि के लिए ही आंशिक निकासी संभव है। अगर आधार-UAN लिंकिंग या एंप्लॉयर वेरिफिकेशन में कोई गड़बड़ी हो, तो पैसे आने में 2 से 3 हफ्ते का समय लग सकता है।

4. पब्लिक प्रॉविडेंट फंड(PPF): कोई निश्चित T+2 वादा नहीं

पब्लिक प्रॉविडेंट फंड में पैसा निकालने की कोई केंद्रीय ऑनलाइन T+1 या T+2 व्यवस्था नहीं है। आवेदन करने के बाद बैंक या पोस्ट ऑफिस की आंतरिक प्रक्रिया के आधार पर 2 से 5 कार्य दिवसों में पैसा अकाउंट में आता है। पीपीएफ में 5 वित्तीय वर्ष पूरे होने के बाद ही साल में केवल एक बार आंशिक निकासी की अनुमति होती है, जो कि पात्र बैलेंस के एक तय हिस्से तक ही सीमित रहती है।

EPF vs NPS vs PPF vs Mutual Funds किसमें कितना समय और कितनी छूट?

EPF vs NPS vs PPF vs Mutual Funds किसमें कितना समय और कितनी छूट?

एक्सपर्ट्स की ये है सबसे जरूरी सलाह

रिटायरमेंट पोर्टफोलियो बनाते समय केवल एक ही इंस्ट्रूमेंट पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। आनंद राठी वेल्थ के जसमीत सिंह सलाह देते हैं कि, ‘निवेशकों को अपने कम से कम 6 महीने के खर्च का इमरजेंसी फंड आसानी से सुलभ विकल्पों जैसे लिक्विड म्यूचुअल फंड या बैंक एफडी में रखना चाहिए, ताकि अनिश्चितता के समय लंबे समय के लिए किए गए EPF, PPF या NPS निवेश को समय से पहले न तोड़ना पड़े।’

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

अंग्रेजों ने भारत से लूटे 200 ट्रिलियन डॉलर! कभी दुनिया की 27% GDP था भारत, जानिए यहां से कितना लेकर गए

भारत और 15 अगस्त को अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। देश को 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से आजादी मिली थी। लेकिन आजादी मिलने के बाद देश को कई समस्याओं का सामना करना पड़ा था। आजादी के बाद देश की अर्थव्यवस्था बेहद कमजोर स्थिति में थी। अंग्रेजों ने करीब 200 साल तक भारत के संसाधनों का भरपूर इस्तेमाल अपने लिए किया। वहीं करीब 200 साल के ब्रिटिश शासन के दौरान भारत के संसाधनों और संपदा का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल ब्रिटेन के हितों के लिए किया गया।

न्यूज 18 के मुताबिक, अर्थशास्त्रियों के पुराने आकलनों के मुताबिक, 1765 से 1938 के बीच ब्रिटिश क्राउन और ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत से करीब 45 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति बाहर ले गई। लंबे समय तक चले इस आर्थिक शोषण का असर भारत की आर्थिक स्थिति पर पड़ा और आजादी के समय देश को कई बड़ी आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

नेहरू के सामने बड़ी समस्या

1947 के बाद पीएम जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती कमजोर अर्थव्यवस्था को संभालना, उद्योगों को बढ़ावा देना और देश में बुनियादी ढांचे का विकास करना था। लगभग दो शताब्दियों के औपनिवेशिक शासन के बाद भारत को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए सरकार को लंबे समय तक बड़े स्तर पर काम करना पड़ा।

करीब 200 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति गई बाहर

पुराने अनुमानों को अगर आज की आर्थिक स्थिति के हिसाब से देखा जाए और उनमें महंगाई, निवेश पर मिलने वाले रिटर्न और मौजूदा बाजार मूल्य को शामिल किया जाए, तो भारत से बाहर गई संपत्ति की अनुमानित कीमत 2026 में करीब 200 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है। ये आंकड़ा बताते हैं कि ब्रिटिश शासन में भारत की संपदा बाहर जाती रही, जिससे आजादी के समय देश की अर्थव्यवस्था कमजोर हो गई।

‘काउंसिल बिल्स’ बड़ा तरीका

भारत से पैसा बाहर ले जाने का एक बड़ा तरीका ‘काउंसिल बिल्स’ व्यवस्था थी। 1765 से पहले ईस्ट इंडिया कंपनी भारत से कपड़ा, मसाले और शोरा खरीदने के लिए ब्रिटेन से लाया गया सोना-चांदी इस्तेमाल करती थी। लेकिन बंगाल में टैक्स वसूलने का अधिकार मिलने के बाद कंपनी ने तरीका बदल दिया। इसके बाद भारत से मिले टैक्स के पैसे से ही भारतीय सामान खरीदा जाने लगा और इस तरह भारत की कमाई का बड़ा हिस्सा ब्रिटेन पहुंचने लगा।

  1. टैक्स वसूली: भारतीय किसानों और व्यापारियों से सीधे टैक्स लिया जाता था।
  2. टैक्स से खरीदारी: ब्रिटिश सरकार टैक्स से जुटाए गए राजस्व का करीब एक-तिहाई हिस्सा भारतीय सामान खरीदने में इस्तेमाल करती थी, जिसे बाद में ब्रिटेन भेज दिया जाता था।
  3. बिना असली भुगतान: भारतीयों को उनके ही टैक्स के पैसे से भुगतान किया जाता था, जिससे ब्रिटेन को भारत का कीमती सामान लगभग मुफ्त में मिलता था।

GDP में आई गिरावट

ब्रिटिश शासन के दौरान भारत की आर्थिक स्थिति में बड़ा बदलाव आया। 1700 के आसपास भारत का वैश्विक GDP में हिस्सा करीब 27% बताया जाता है, लेकिन 1947 तक यह घटकर 3% से भी कम रह गया। ब्रिटिश नीतियों का असर भारत के कपड़ा उद्योग पर भी पड़ा। भारतीय कपड़ों पर ब्रिटेन में भारी टैक्स लगाया गया, जबकि ब्रिटिश सामान भारत में आसानी से बिकने लगा। इससे ढाका, मुर्शिदाबाद और सूरत जैसे पुराने औद्योगिक केंद्रों को बड़ा नुकसान हुआ। काम कम होने के बाद कई कारीगर और बुनकर खेती पर निर्भर हो गए और भारत धीरे-धीरे तैयार सामान के बजाय कपास, अफीम और नील जैसी कच्ची उपज के निर्यातक देश के रूप में बदल गया।

दूसरे विश्व युद्ध में हुआ नुकसान

1858 के बाद भी भारत की कमाई का बड़ा हिस्सा ब्रिटिश सरकार से जुड़े खर्चों पर ही लगाया जाता रहा। ‘होम चार्ज’ के तहत भारतीय करदाताओं के पैसों से ब्रिटिश अधिकारियों की पेंशन, रेलवे निवेश पर ब्याज और विदेशों में ब्रिटिश सेना के अभियानों का खर्च उठाया जाता था। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान यह आर्थिक दबाव और बढ़ गया। युद्ध के खर्च और कर्ज का असर भारत में महंगाई और खाद्य संकट के रूप में दिखाई दिया। लंबे समय तक चले इस आर्थिक बोझ के कारण 1947 में आजादी मिलने तक भारत की अर्थव्यवस्था बेहद कमजोर स्थिति में पहुंच चुकी थी।

आज दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल भारत

आजादी के समय भारत की नई सरकार के सामने पैसों और संसाधनों की बड़ी कमी थी। देश में गरीबी और खाद्य संकट गंभीर था, उद्योग कमजोर हो चुके थे और विभाजन के बाद बड़ी संख्या में आए शरणार्थियों के पुनर्वास की जिम्मेदारी भी सरकार पर थी। सीमित सरकारी खजाने के बावजूद सड़कों, बिजली, सिंचाई और दूसरी जरूरी सुविधाओं के विकास पर काम शुरू करना पड़ा। लेकिन, आजादी के बाद के दशकों में भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में लगातार प्रगति की और आज वह दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। देश अब लंबे समय के विकास लक्ष्यों पर ध्यान देते हुए अपनी आर्थिक ताकत को और बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

इंडियन आर्मी में अग्निवीर बनना गल्फ जाने से बेहतर…जानिए गोरखा भर्ती में अड़ंगा लगाना नेपाल को कैसे पड़ रहा भारी

भारतीय सेना प्रमुख की काठमांडू यात्रा (16 अगस्त) से ठीक पहले नेपाल के पोखरा में पूर्व गोरखा सैनिकों और उनके समर्थकों ने एक बड़ा विरोध प्रदर्शन किया है। इन पूर्व सैनिकों की मुख्य मांग है कि भारत सरकार अपनी अग्निपथ योजना के तहत नेपाली युवाओं को भारतीय सेना में भर्ती करने की प्रक्रिया को तुरंत फिर से शुरू करे। हमारी सहयोगी वेबसाइट फर्स्टपोस्ट के एक एक्सप्लेनर आर्टिकल के मुताबिक यह प्रदर्शन बुधवार को इंडियन एक्स-सर्विसमेन गोरखा ब्रिगेड नेपाल पोखरा द्वारा आयोजित किया गया था। प्रदर्शनकारियों ने पोखरा स्टेडियम से कास्की जिले के जिला प्रशासन कार्यालय तक रैली निकाली और बाद में नेपाल की फेडरल गवर्नमेंट को दो सूत्री ज्ञापन सौंपा। इस ज्ञापन में अग्निवीर भर्ती को तत्काल बहाल करने और अपने नाम में सैनिक शब्द का इस्तेमाल करने वाले पूर्व सैनिक संगठनों का नवीनीकरण करने की मांग की गई है।

प्रदर्शन के दौरान पूर्व सैनिक और उनके परिजन अपने हाथों में बैनर और तख्तियां लिए हुए थे। इन पर ‘अग्निपथ के तहत नेपाली युवाओं को भारतीय सेना में भर्ती करो’, ‘गृह मंत्रालय के पत्र को रद्द करो’ और ‘पूर्व सैनिकों की आवाज सुनो’ जैसे नारे लिखे थे। प्रदर्शन को संबोधित करते हुए ब्रिगेड के अध्यक्ष कर्नल कृष्ण बहादुर खत्री ने चेतावनी दी कि सुगौली संधि के दौर से चली आ रही 200 साल से भी अधिक पुरानी परंपरा अब खतरे में पड़ गई है। उन्होंने कहा कि सुगौली संधि के बाद भारत में नेपाली युवाओं की भर्ती की प्रक्रिया शुरू हुई थी और यह 207 वर्षों से लगातार जारी थी। भारत द्वारा अग्निपथ योजना लागू किए जाने के बाद नेपाल सरकार ने विभिन्न कारणों का हवाला देते हुए नेपाली युवाओं को भारतीय सेना में भर्ती होने से रोक दिया है, जिससे सैकड़ों युवाओं के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो गया है।

नेपाल की ‘रातोपाटी’ मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पूर्व सैनिकों द्वारा सरकार को सौंपे गए ज्ञापन में कहा गया है कि 50 डिग्री सेल्सियस तापमान वाले खाड़ी (गल्फ) देशों में जाकर न्यूनतम वेतन पर काम करने की तुलना में भारतीय सेना में नौकरी करना सैकड़ों गुना बेहतर है। अग्निपथ योजना के तहत चार साल की सेवा के दौरान युवा विभिन्न सुविधाओं के साथ लगभग 45 से 50 लाख रुपये कमा लेते हैं।

क्या है भारत की अग्निपथ योजना?

भारत सरकार ने साल 2022 में सैन्य भर्ती प्रक्रिया में बदलाव लाने के उद्देश्य से अग्निपथ योजना की घोषणा की थी। इस योजना के तहत भारतीय सशस्त्र बलों में अधिकारी रैंक से नीचे (सैनिक, एयरमैन और नाविक) के जवानों को चार साल के कार्यकाल के लिए भर्ती किया जाता है। चार साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद योग्यता और संगठनात्मक जरूरतों के आधार पर अधिकतम 25 प्रतिशत अग्निवीरों को 15 साल के स्थायी कमीशन के लिए शामिल किया जाता है, जबकि बाकी 75 प्रतिशत को एकमुश्त राशि देकर सेवामुक्त कर दिया जाता है। इन्हें पेंशन नहीं दी जाती।

अगर किसी अग्निवीर की ड्यूटी के दौरान मृत्यु हो जाती है तो उनके परिवार को 1 करोड़ रुपये की एकमुश्त राशि और बची हुई सेवा अवधि का पूरा वेतन मिलता है। वहीं दिव्यांगता के मामले में सैन्य सेवा के कारण हुई विकलांगता के प्रतिशत के आधार पर 44 लाख रुपये तक का मुआवजा दिया जाता है। इस योजना की घोषणा के समय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि अग्निपथ सशस्त्र बलों के लिए एक गेम चेंजर है और यह सेना को युवा, हाई-टेक और अति-आधुनिक बनाता है। इस योजना का उद्देश्य सशस्त्र बलों में युवा खून को शामिल करना और सेना के वेतन तथा पेंशन बिल को कम करना है।

नेपाल को अग्निपथ योजना पर क्यों थी आपत्ति?

अग्निपथ योजना से पहले भारतीय सेना स्वतंत्रता के समय नेपाल, भारत और ब्रिटेन के बीच साइन की गई त्रिपक्षीय संधि के तहत नेपाली गोरखा सैनिकों की भर्ती करती थी। इस संधि के तहत गोरखा सैनिकों की चार रेजिमेंट (2nd, 6th, 7th और 10th) ब्रिटिश सेना को सौंपी गई थीं। बाकी रेजिमेंट (1st, 3rd, 4th, 5th, 8th और 9th) भारतीय सेना के पास रहीं। आजादी के तुरंत बाद भारत ने 11वीं गोरखा राइफल्स नाम से एक नई रेजिमेंट भी बनाई थी। इस समझौते में भारतीय सेना में सेवारत नेपाली गोरखा सैनिकों के नियम, शर्तें, सेवानिवृत्ति के लाभ और पेंशन तय की गई थी।

रिपोर्टों के मुताबिक किसी भी समय भारतीय सेना में लगभग 32000 से 35000 नेपाली गोरखा सैनिक अपनी सेवाएं देते थे। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक नेपाल में भारतीय सेना के पूर्व सैनिकों की आबादी लगभग 1.32 लाख है। जब भारत ने अग्निपथ योजना की शुरुआत की तो काठमांडू स्थित नेपाल सरकार ने भारतीय सेना में अपने युवाओं की भर्ती पर रोक लगा दी। नेपाल सरकार का तर्क था कि यह योजना 1947 के त्रिपक्षीय समझौते के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है और भर्ती नियमों में किसी भी बदलाव से पहले नेपाल से चर्चा की जानी चाहिए थी। नेपाली टाइम्स से बातचीत में नेपाल के इतिहासकार प्रत्युष ओंटा ने भी कहा था कि त्रिपक्षीय समझौते का सदस्य होने के नाते भारत सरकार को कोई भी फैसला लेने से पहले नेपाल से राय लेनी चाहिए थी।

गोरखा भर्ती रोकने से नेपाल को क्या हो रहा है नुकसान?

भारतीय सेना में गोरखा भर्ती पर रोक लगाने का नेपाल का फैसला खुद उसी पर भारी पड़ रहा है और देश को इसका बड़ा आर्थिक व सामाजिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। जब नेपाली गोरखा भारतीय सेना में सेवा देते थे तो वे हर साल लगभग 1000 करोड़ रुपये का रेमिटेंस अपने घर नेपाल भेजते थे। भारत में नेपाल के पूर्व राजदूत रणजीत राय के मुताबिक यह पैसा नेपाल की अर्थव्यवस्था के लिए एक बहुत बड़ा सहारा था।

त्रिभुवन विश्वविद्यालय (काठमांडू) के सेन्ट्रल डिपार्टमेंट ऑफ रूरल डेवलपमेंट स्टडीज के लेक्चरर डॉ. रत्न मणि नेपाल के शोध पत्र ‘द गुरखा रिक्रूटमेंट, रेमिटेंस एंड डेवलपमेंट’ के मुताबिक विदेशी सेनाओं में काम करने वाले गोरखाओं से मिलने वाला रेमिटेंस नेपाल के दूर-दराज गांवों में सामाजिक आधुनिकीकरण और उद्यमिता विकास का एक स्थायी जरिया रहा है। इसके अलावा सेवानिवृत्त गोरखा राइफल्स के जवान दोनों देशों के बीच एक महत्वपूर्ण सद्भावना कड़ी (का काम करते हैं।

भारतीय सेना में नौकरी के अवसर बंद होने की वजह से नेपाल के कई युवा अब आजीविका के लिए रूस-यूक्रेन युद्ध में रूसी सेना की ओर से लड़ने चले गए हैं। काठमांडू सरकार के अनुमान के मुताबिक 200 से अधिक नेपाली युवा पुतिन की सेना में शामिल होने के लिए रूस जा चुके हैं। आपको बता दें कि पूर्व रक्षा प्रमुख (CDS) जनरल अनिल चौहान ने इस मुद्दे पर कहा था कि भारतीय सेना में नेपाली गोरखाओं की भर्ती पर अंतिम फैसला काठमांडू सरकार को ही लेना है। अब यह काठमांडू पर निर्भर करता है कि वह अग्निपथ योजना के तहत अपने सैनिकों को भारतीय सेना में सेवा के लिए भेजता है या नहीं। उन्होंने स्पष्ट किया था कि नेपाल के नागरिकों के लिए अलग योजना और भारतीय नागरिकों के लिए अलग योजना नहीं हो सकती।

Independence Day 2026 : लालकिले की सुरक्षा के लिए एंटी-ड्रोन शील्ड तैनात, 20 हजार से ज्यादा लोगों की जांच; दिल्ली में ट्रैफिक डायवर्जन

Independence Day 2026 : लालकिले की सुरक्षा के लिए एंटी-ड्रोन शील्ड तैनात, 20 हजार से ज्यादा लोगों की जांच; दिल्ली में ट्रैफिक डायवर्जन

15 अगस्त को होने वाले स्वतंत्रता दिवस समारोह को लेकर राजधानी दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था बेहद कड़ी कर दी गई है। लालकिले और उसके आसपास के इलाकों में दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा की कई परतें तैयार की हैं। सुरक्षा व्यवस्था के तहत बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों की तैनाती के साथ एंटी-ड्रोन सिस्टम भी लगाए गए हैं।

 

सुरक्षा एजेंसियों ने लाल किले के आसपास रहने और काम करने वाले 20 हजार से अधिक लोगों की स्क्रीनिंग और वेरिफिकेशन भी किया है। किसी भी संभावित सुरक्षा चूक या व्यवधान को रोकने के लिए दिल्ली के कई हिस्सों में ट्रैफिक डायवर्जन और भारी वाहनों की आवाजाही पर प्रतिबंध लागू किए गए हैं।

 

 लाल किले के आसपास कड़ी सुरक्षा

 

दिल्ली पुलिस के मुताबिक, स्वतंत्रता दिवस समारोह के मद्देनजर लाल किले और आसपास के संवेदनशील इलाकों में व्यापक सुरक्षा इंतजाम किए गए हैं। पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां किसी भी संभावित खतरे से निपटने के लिए लगातार निगरानी कर रही हैं। सुरक्षा व्यवस्था के तहत एंटी-ड्रोन शील्ड तैनात की गई है ताकि आसमान से आने वाले किसी भी संभावित खतरे को समय रहते रोका जा सके।

 

20 हजार से ज्यादा लोगों का वेरिफिकेशन

 

सेंट्रल दिल्ली के डीसीपी रोहित राजबीर सिंह ने बताया कि लाल किले के आसपास के संवेदनशील क्षेत्र में रहने या काम करने वाले 20,000 से अधिक लोगों की स्क्रीनिंग और पहचान सत्यापन किया गया है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान लाल किला सबसे संवेदनशील स्थानों में से एक माना जाता है। इसलिए सुरक्षा व्यवस्था को कई स्तरों पर मजबूत किया गया है।

 

DTC बसों के रूट में बदलाव

 

दिल्ली पुलिस ने स्वतंत्रता दिवस को लेकर DTC बसों और अन्य बसों के संचालन के संबंध में भी एडवाइजरी जारी की है। अधिकारी के मुताबिक, प्रभावित मार्गों पर इस अवधि के दौरान DTC या अन्य बसें सामान्य रूप से संचालित नहीं होंगी। बसों के रूट डायवर्ट किए जाएंगे और उनके टर्मिनेशन पॉइंट रामलीला मैदान और तीस हजारी कोर्ट में निर्धारित किए गए हैं।

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मेहमानों के लिए पार्किंग की व्यवस्था

 

स्वतंत्रता दिवस समारोह में आने वाले आमंत्रित मेहमानों के लिए निर्धारित पार्किंग स्थानों को Google Maps पर चिह्नित किया गया है। लोगों से ट्रैफिक और पार्किंग से जुड़ी ताजा जानकारी के लिए दिल्ली ट्रैफिक पुलिस के आधिकारिक X अकाउंट को फॉलो करने की अपील की गई है।

 

सुबह 4 बजे से 11 बजे तक ट्रैफिक डायवर्जन

 

दिल्ली पुलिस के अनुसार, लाल किले के आसपास आम लोगों के लिए ट्रैफिक डायवर्जन सुबह 4 बजे से 11 बजे तक लागू रहेगा। इसके बाद ट्रैफिक प्रतिबंध हटा दिए जाएंगे। चांदनी चौक क्षेत्र की कुछ सड़कें प्रतिबंधित समय के दौरान बंद रहेंगी। हालांकि, पुलिस के मुताबिक दुकानों, बाजारों और शॉपिंग मॉल पर कोई प्रतिबंध नहीं रहेगा।

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भारी वाहनों की आवाजाही पर भी रोक

 

स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान सुरक्षा और यातायात व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के लिए दिल्ली के कई हिस्सों में भारी वाहनों की आवाजाही पर भी प्रतिबंध लगाए गए हैं। पुलिस का लक्ष्य समारोह के दौरान किसी भी तरह की सुरक्षा चूक और ट्रैफिक व्यवधान को रोकना है।

EPFO Higher Pension : ज्यादा पेंशन के लिए आवेदन किया है तो जानिए अब क्या करेगा EPFO, सरकार ने बताए 4 बड़े कदम

EPFO Higher Pension : ज्यादा पेंशन के लिए आवेदन किया है तो जानिए अब क्या करेगा EPFO, सरकार ने बताए 4 बड़े कदम

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EPFO Higher Pension: कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) के तहत ज्यादा पेंशन का इंतजार कर रहे कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए सरकार ने अहम जानकारी दी है। लोकसभा में पूछे गए सवाल के जवाब में सरकार ने बताया कि EPS के तहत उच्च पेंशन (Higher Pension) के आवेदनों के निपटारे में तेजी लाने के लिए EPFO चार प्रमुख कदम उठा रहा है। हालांकि, सरकार ने सभी लंबित मामलों के निपटारे या बकाया राशि (Arrears) के भुगतान के लिए कोई नई अंतिम समयसीमा घोषित नहीं की है।

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यह प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के नवंबर 2022 के फैसले के बाद शुरू हुई थी। इस फैसले में पात्र कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को निर्धारित शर्तों के अधीन वास्तविक उच्च वेतन के आधार पर पेंशन में योगदान का विकल्प दिया गया था।

 

EPFO क्या कर रहा है? जानिए 4 बड़े कदम

1. ऑनलाइन आवेदन की सुविधा

 

EPFO ने पात्र कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए Joint Option के Validation हेतु ऑनलाइन आवेदन की सुविधा शुरू की थी। इसका उद्देश्य उच्च वेतन पर पेंशन के विकल्प की प्रक्रिया को आसान बनाना था।

 

हालांकि, केवल ऑनलाइन आवेदन कर देने का मतलब यह नहीं है कि उच्च पेंशन मंजूर हो गई है। EPFO आवेदन की जांच करता है और यह सुनिश्चित करता है कि आवेदक निर्धारित पात्रता शर्तों को पूरा करता है या नहीं।

 

2. आवेदन और रिकॉर्ड की जांच

 

EPFO आवेदनों की जांच लागू नियमों के अनुसार कर रहा है। इसमें कर्मचारी के वेतन, PF योगदान और पुराने रिकॉर्ड की जांच की जा सकती है। जरूरत पड़ने पर नियोक्ता से अतिरिक्त जानकारी या दस्तावेज भी मांगे जा सकते हैं।

 

अगर वेतन या योगदान के रिकॉर्ड में कोई अंतर है अथवा जानकारी अधूरी है, तो आवेदन के निपटारे में अतिरिक्त समय लग सकता है।

 

3. क्षेत्रीय कार्यालयों को समय पर निपटारे के निर्देश

 

सरकार के मुताबिक, EPFO ने अपने Regional Offices को उच्च वेतन पर पेंशन से जुड़े मामलों का समय पर निपटारा करने के निर्देश दिए हैं।

 

इसका मतलब है कि लंबित आवेदनों को निपटाने की जिम्मेदारी सिर्फ EPFO मुख्यालय की नहीं, बल्कि क्षेत्रीय कार्यालयों की भी है। इन कार्यालयों में ही आवेदनों के रिकॉर्ड और दस्तावेजों की काफी जांच होती है।

 

4. वीडियो कॉन्फ्रेंस से लगातार निगरानी

 

EPFO उच्च पेंशन के मामलों की प्रगति की Zonal और Regional Offices के साथ नियमित वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए समीक्षा भी कर रहा है।

 

इसका उद्देश्य लंबित मामलों की स्थिति जानना, रिकॉर्ड से जुड़ी समस्याओं की पहचान करना और जिन आवेदनों में देरी हो रही है, उन्हें जल्द निपटाना है।

 

99.2 फीसदी से ज्यादा आवेदन हो चुके हैं निपटाए

 

सरकार के मार्च 2026 में लोकसभा में दिए जवाब के मुताबिक, 31 जनवरी 2025 तक करीब 15.24 लाख Joint Options के आवेदन नियोक्ताओं की ओर से EPFO को भेजे गए थे। वहीं, 9 मार्च 2026 तक EPFO को प्राप्त 99.2 फीसदी से ज्यादा आवेदनों का निपटारा किया जा चुका था। हालांकि, यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। आवेदन का 'Disposed' होना और वास्तव में बढ़ी हुई पेंशन मिलना एक ही बात नहीं है।

 

आवेदन निपटने के बाद क्या होता है?

 

पात्र आवेदकों को EPFO की ओर से Demand Letter जारी किया जा सकता है। इसके बाद रिटायर्ड आवेदकों को निर्धारित राशि जमा करने और Form 10D सहित आवश्यक प्रक्रिया पूरी करनी होती है। इसके बाद पात्रता पूरी होने पर Pension Payment Order (PPO) जारी किया जा सकता है। वहीं, जो सदस्य अभी नौकरी में हैं, उन्हें निर्धारित आयु पर पेंशन का दावा करने और जरूरी फॉर्म जमा करने के बाद PPO मिलेगा।

 

क्या सरकार ने नई डेडलाइन घोषित की है?

 

नहीं।

 

उच्च पेंशन के लिए लंबित सभी मामलों को निपटाने या बकाया पेंशन का भुगतान करने के लिए सरकार ने फिलहाल कोई नई देशव्यापी अंतिम समयसीमा घोषित नहीं की है। सरकार का कहना है कि EPFO सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को समयबद्ध तरीके से लागू कर रहा है और मामलों की लगातार निगरानी की जा रही है।

 

पेंशन का इंतजार कर रहे लोगों को क्या करना चाहिए?

 

अगर आपने Higher Pension के लिए आवेदन किया है तो सिर्फ आवेदन जमा होने के आधार पर यह न मानें कि ज्यादा पेंशन मंजूर हो गई है। आपको अपने आवेदन की वर्तमान स्थिति, EPFO की ओर से जारी Demand Letter, आवश्यक अतिरिक्त योगदान और Form 10D जैसी औपचारिकताओं की स्थिति पर नजर रखनी चाहिए।

8th Pay Commission: 8वें वेतन आयोग की 18 महीने की डेडलाइन कब खत्म हो रही है? जानिए सरकार ने इस बारे क्या कहा

8th Pay Commission: केंद्र सरकार के लाखों एंप्लॉयीज और पेंशनर्स को 8वें वेतन आयोग की सिफारिशों का इंतजार है। इस बीच, आयोग की 18 महीने की डेडलाइन को लेकर चल रही चर्चा पर सरकार ने स्थिति स्पष्ट की है। गौरतलब है कि 8वें वेतन आयोग की सिफारिशों के आधार पर सरकार केंद्र सरकार के एंप्लॉयीज की सैलरी में बदलाव करेगी।

नवंबर 2025 में हुआ था आयोग का गठन

आठवें वेतन आयोग का गठन 3 नवंबर, 2025 को हुआ था। इसे 18 महीने में सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपनी है। इस हिसाब से आयोग को मई 2027 तक अपनी फाइनल रिपोर्ट सौंपनी होगी। इस बीच, सरकार ने कहा है कि उसे आयोग से अभी कोई रिपोर्ट नहीं मिली है और आयोग ने तय समय से पहले रिपोर्ट सौंपने के बारे में भी कुछ नहीं कहा है।

18 महीने के अंदर आयोग सौंपेगा अपनी रिपोर्ट

संसद के मानसून सत्र के दौरान वित्त मंत्रालय ने एक सवाल के जवाब में कहा कि आठवां वेतन आयोग गठन के 18 महीनों के अंदर अपनी रिपोर्ट सौंपेगा। उसने यह भी कहा कि उसने अब तक अपनी सिफारिशें नहीं सौंपी है। सरकार ने यह भी कहा कि आयोग को कामकाज की प्रगति के बारे में सरकार को नियमित रूप से बताने की जरूरत नहीं है।

अलग-अलग शहरों में आयोग एंप्लॉयीज यूनियंस से मिल रहा

अभी आयोग एंप्लॉयीज के प्रतिनिधियों, एंप्लॉयीज यूनियंस, पेंशनर्स के प्रतिनिधिमंडल और मामले से जुड़े दूसरे पक्षों से बातचीत कर रहा है। कोलकाता और दिल्ली सहित कई शहरों में आयोग एंप्लॉयीज के प्रतिनिधियों से चर्चा कर चुका है। यह आने वाले दिनों में जयपुर, चेन्नई, पुद्दुचेरी और चंडीगढ़ में एंप्लॉयीज के प्रतिनिधियों से बातचीत करेगा।

आयोग को एंप्लॉयीज के वेतन सहित इन मसलों पर देनी है रिपोर्ट

आठवें वेतन आयोग को पे स्केल के रिवीजन, डियरनेस अलाउन्स, पेंशन, फैमिली पेंशन और नौकरी से संबंधित दूसरी शर्तों के बारे में अपनी सिफारिशें सौंपनी है। सरकार ने अभी यह संकेत नहीं दिया है कि आयोग की सिफारिशों का केंद्र सरकार के एंप्लॉयीज और पेंशनर्स पर कितना असर पड़ेगा।

आयोग की सिफारिशों का असर करीब 70 एंप्लॉयीज और पेंशनर्स पर पड़ेगा

एक अनुमान के मुताबिक, 8वें वेतन आयोग की सिफारिशों का असर केंद्र सरकार के करीब 70 लाख एंप्लॉयीज और पेंशनर्स पर पड़ेगा। 1 मार्च, 2026 को केंद्र सरकार के एंप्लॉयीज की संख्या 35.77 लाख थी। 31 दिसंबर, 2025 को पेंशनर्स और फैमिली पेंशनर्स की संख्या 33.76 लाख थी।

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अगल साल के अंत तक लागू हो सकती हैं वेतन आयोग की सिफारिशें 

एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर आयोग अगले साल मई तक अपनी फाइनल सिफारिशें सरकार को सौंप देता है तो यह अगले साल के अंत तक लागू हो सकता है। सरकार आयोग की सिफारिशें मिलने के बाद उस पर व्यापक विचार करेगी। उसके बाद सिफारिशों को लागू करने के बारे में फैसला लेगी।