UPI Payment पर 6 साल बाद फिर लगेगा MDR! क्यों हो रही वापसी, किनमें बंटेगा इसका पैसा

UPI Payment Charges: लगभग छह साल बाद यूपीआई से लेन-देन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) वापस आ सकता है। दुकानदार को ₹2,000 या उससे अधिक के यूपीआई पेमेंट पर 0.3% का चार्ज लग सकता है। इसके लागू होने का कानूनी रास्ता तब साफ हुआ, जब सरकार ने अगस्त में पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट में बदलाव किया और जीरो-एमडीआर प्रोटेक्शन को हटा दिया। 21 अगस्त की फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक अब यूपीआई से पेमेंट पर जीरो की बजाय 0.3% के शुल्क का नियम अगले दो हफ्ते के भीतर लागू किया जा सकता है। हालांकि केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने साफ कर दिया है कि ग्राहकों और छोटे कारोबारियों पर इसका भार नहीं डाला जाएगा। सरकार की कोशिश इस पेमेंट सिस्टम से जुड़ी एंटिटीज को डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर बनाए रखने पर होने वाले खर्च के कुछ हिस्से की भरपाई है। ₹2,000 या इससे अधिक के लेन-देन पर MDR लागू होने से इलेक्ट्रॉनिक्स, सिक्योरिटीज, कपड़े और अधिक दाम वाली खरीदारी प्रभावित हो सकती है।

किसे मिलेगा UPI Payment में MDR का पैसा

एमडीआर का पैसा किसी एक को नहीं मिलेगा बल्कि बैंक, फिनटेक कंपनियां और इस लेन-देन में शामिल अन्य एंटिटीज में बंटेगा। साल 2019 तक एमडीआर वाली व्यवस्था लागू थी लेकिन फिर डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने के लिए इसे जीरो कर दिया गया। इसे हटाए जाने से पहले ₹100 से अधिक मूल्य वाले ऑफलाइन क्यूआर कोड के जरिए किए गए P2M (पर्सन-टू-मर्चेंट) पेमेंट पर 0.3% शुल्क लगता था, जिसे इश्यूअर (Issuer) और एक्वायरर (Acquirer) बैंकों के बीच बराबर बांटा जाता था। एमडीआर की अधिकतम सीमा भी ₹100 थी, जिसे साल 2020 में पूरी तरह समाप्त कर दिया गया।

अब इसे फिर लाया जा रहा है। इसका पैसा पेमेंट चेन में चार प्लेयर्स के बीच बंटेगा। एक हिस्सा ग्राहक के बैंक को, दूसरा हिस्सा पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर और ट्रांजैक्शन हैंडल करने वाले इसके बैंक को, तीसरा हिस्सा दुकानदार की तरफ से यानी एक्वायरिंग बैंकों और उसके पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर को तो चौथा हिस्सा यूपीआई नेटवर्क चलाने और लेन-देन का निपटारा करने वाली NPCI को मिलेगा। एमडीआर में सबसे अधिक हिस्सा इंटरचेंज शुल्क के रूप में इश्यूइंग बैंक यानी ग्राहकों के बैंक को तो सबसे कम हिस्सा एनपीसीआई को मिलेगा।

क्यों हुई वापसी

भर्तृहरि महताब के नेतृत्व में फाइनेंस से जुड़ी संसदीय स्थायी समिति ने 12 अगस्त को अपनी रिपोर्ट में जिक्र किया कि यूपीआई को बढ़ावा देने और जीरो-MDR के कारण इंडस्ट्री के रेवेन्यू लॉस की भरपाई के लिए सरकार ने सिर्फ ₹2,000 करोड़ एलॉट किए हैं जोकि डिजिटल पेमेंट इंडस्ट्री की अनुमानित सालाना लागत ₹20,700 करोड़ से बहुत ही कम है। कमेटी ने आगाह किया है कि इसके चलते साइबर सिक्योरिटी, फर्जीवाड़े की रोकथाम और पेमेंट नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर में जरूरी निवेश प्रभावित हो सकता है। चूंकि अब एआई का इस्तेमाल बढ़ा है तो साइबर खतरे भी बढ़े हैं, जिससे चिंता और गंभीर हो गई है। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा भी कह चुके हैं कि यूपीआई हमेशा फ्री नहीं रह सकता है और कोई न कोई इसका खर्च चुका रहा है।

हालांकि सिर्फ एमडीआर ही इन खर्चों की भरपाई के लिए पर्याप्त नहीं है। डिपार्टमेंट ऑफ फाइनेंशियल सर्विसेज ने संसदीय समिति को बताया कि फंडिंग के बोझ को कम करने के लिए दो विकल्पों पर विचार किया जा रहा है- अधिक वैल्यू वाले यूपीआई पेमेंट पर एमडीआर को दोबारा लागू करना या आने वाले वषों में सरकारी सहायता को धीरे-धीरे कम करना। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में देश में करीब ₹314 लाख करोड़ के 24,000 करोड़ से अधिक UPI लेनदेन हुए। इसमें से 71% P2P (पर्सन-टू-पर्सन) और बाकी P2M (पर्सन-टू-मर्चेंट) थे। पी2एम में सिर्फ 4% की वैल्यू ही ₹2,000 या उससे अधिक थी यानी कि अधिकतर यूपीआई पेमेंट एमडीआर के दायरे से बाहर रहेगा तो छोटे कारोबारियों को बाहर रखने से इसका दायरा और सीमित हो जाता है।

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JLR MD Rawdon Glover on Jaguar’s repositioning and working with Tata Motors

JLR MD Rawdon Glover on Jaguar's repositioning and working with Tata Motors
Raqdon Glover JLR MD

Rawdon Glover has worked with the JLR group for over 13 years and took charge as Managing Director 3 years ago. From the sidelines of our first drive with the Jaguar Type 01, we speak to Glover, who tells us about Jaguar’s new direction, taking risky decisions, core markets and upcoming products. 

Why the major shift in the positioning of Jaguar?

Putting Jaguar back on a firm footing for the next 90 years is the main job. And if you look at the task, it’s brand management where sometimes you need small incremental changes. But if you look at today’s technical changes, competitive context, how the brand was performing globally and a host of factors, what was called for was a big shift. That requires you to be bold and confident.

Why go for a radical and polarising design?

We’re ok with polarising. If you look at our history, it was bold evolutions, for example the XJS, the spiritual successor to the E-Type. It would have been easy to say let’s just make a modern example of the E-Type, but that’s not what we did, and if you look back at reviews, it was applauded for its dynamics and refinement, but the design was seen as polarising. Now it’s a design icon. So, I’d rather have four out of ten absolutely love the car, rather than have everyone go – yeah, it’s ok.

Isn’t going all-electric a massively risky move?

The EV landscape is evolving rapidly, many new brands are coming in, and I believe one will crack the EV glass ceiling, so why not Jaguar? So we ripped up the EV rulebook because, in the luxury space, it wasn’t working. So it’s not designed as an EV without an engine and a really cab-forward layout. But it’s about presence and performance, and to deliver the level of performance and refinement, electric is best.

Would the car sit above the XJ in terms of price?
All of the vehicles coming off this platform would be between GBP 1,20,000 and GBP 1,50,000. We see a white space at the top end of the premium segment, but underneath established luxury players. That’s where we want to be, and with this vehicle what you get is the stature, the presence, the drama of those uber-luxury brands at the top end of the premium price point.

What are the core markets, and how does India figure in the plan?

We used to sell in 130 markets, but we’ll narrow this to just eight or nine, with 85 percent of the volume. North America will remain a large part, China will become important, and the UK, Germany and some Nordics, where they have really embraced EVs, will be the mainstay. Then in markets like the Middle East and India, which have been small, we think we can really break into them now. The retail would, of course, still be through the existing JLR network.

FTAs do not favour EVs, so is the 01 capable of being locally assembled?

Manufacturing this outside of the UK is not currently in the plan. All production will be built out of Solihull, so all exports to other markets will be CBUs, but that doesn’t rule out local production outside UK. As you know, the geopolitical situation is so fluid at the moment, but in time we could consider production elsewhere.

Is there a more chauffeur-driven offering from Jaguar coming?

The 01 is unashamedly driver-focussed, it has four comfortable seats, but it’s a four-door GT, not a four-door sedan designed as a luxury chauffeur-driven car. There will be other vehicles off this platform that will share the same design language, but will have a distinct personality and target different groups, and they would be accessible to a wider audience. So, yes absolutely, there will be a chauffeur-driven-focused model from Jaguar.

Would an SUV body style be part of the portfolio?

What you shouldn’t expect from us is a high-sided Jaguar that is a Range Rover competitor. We already have the best SUV on the planet, and part of the house of brand’s strategy is to differentiate the brands. All I can say, for now, is that you can expect a variety of vehicles from us, and there will be vehicles slightly higher positioned, but all will drive like a Jaguar.

How has it been working with Tata Motors?

Unwavering is the word. There is nobody more dedicated and passionate about our success than the shareholders, and that’s an incredibly privileged position to be in. It puts a little pressure, but having somebody like PB Balaji come onto our board is great. He’s been on the journey with us, he understands it inside and out, and for him, Jaguar is personal. It’s important to our chairman and even was to Ratan Tata. I was reading stories about Ratan Tata driving about in his father’s XK120, so it’s really important to Tata that Jaguar wins. In all my interactions with the board, there is never talk of tempering ambitions, it’s always, just go for it.

फ्रांस में सितंबर में खुलेगा पहला बड़ा हिंदू मंदिर:पेरिस के पास होगा उद्घाटन, 13 दिन तक चलेगा भारतीय संस्कृति उत्सव

फ्रांस में पेरिस के पास बुसी-सेंट-जॉर्जेस में सितंबर 2026 में BAPS स्वामीनारायण हिंदू मंदिर का उद्घाटन होगा। इसे फ्रांस का पहला बड़ा हिंदू मंदिर बताया जा रहा है। मंदिर के उद्घाटन के साथ 2 से 14 सितंबर तक 13 दिन का ‘फेस्टिवल ऑफ कल्चर’ होगा। इसमें लोगों को हिंदू परंपराओं, भारतीय कला, संगीत और संस्कृति के बारे में जानने का मौका मिलेगा। यह मंदिर सिर्फ पूजा के लिए नहीं होगा। यहां सांस्कृतिक और सामुदायिक कार्यक्रम भी होंगे। उद्घाटन में भारतीय मूल के लोगों के साथ हिंदू समुदाय और भारतीय संस्कृति में रुचि रखने वाले लोगों के पहुंचने की उम्मीद है। मंदिर के खुलने से फ्रांस में रहने वाले भारतीय और हिंदू समुदाय को पूजा और संस्कृति से जुड़ने के लिए एक बड़ा केंद्र मिलेगा। भारत में तराशे गए पत्थरों से बना मंदिर पेरिस के पास बने BAPS स्वामीनारायण मंदिर में भारत से लाए गए खास पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। इन्हें भारत में करीब 1,000 साल पुरानी नक्काशी की तकनीकों से तैयार किया गया है। कई हिस्सों पर कारीगरों ने हाथ से बारीक नक्काशी की है। भारत में तैयार किए गए इन पत्थरों को फ्रांस लाकर मंदिर में लगाया गया। इस काम में भारतीय कारीगरों के साथ फ्रांस के विशेषज्ञ भी शामिल रहे। इनमें नोट्रे-डाम कैथेड्रल की मरम्मत से जुड़े कारीगर भी थे। इस तरह मंदिर में भारतीय शिल्पकला और फ्रांस की आधुनिक निर्माण तकनीक का मेल देखने को मिलता है। मंदिर की संरचना में गुंबद, स्तंभ और शिखर जैसी पारंपरिक हिंदू वास्तुकला शामिल है। मंदिर उद्घाटन से पहले हुई विशेष पूजा मंदिर के शिखरों और मुख्य गुंबद पर लगाए जाने वाले पवित्र कलश और ध्वज की विशेष पूजा की गई। इस पूजा में बड़ी संख्या में संतों और श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया। इस दौरान वैदिक मंत्रों का जाप किया गया और शांति, सद्भाव और सभी लोगों की भलाई के लिए प्रार्थना की गई 1970 में आया था फ्रांस में हिंदू मंदिर बनाने का आइडिया BAPS पेरिस की वेबसाइट के मुताबिक, फ्रांस में हिंदू मंदिर बनाने का आइडिया 1970 में आया था। इसके करीब 25 साल बाद, 1995 में पेरिस में मंदिर बनाने की योजना पर काम आगे बढ़ा।
2017 में बुसी-सेंट-जॉर्जेस में मंदिर के लिए जमीन मिली। इसके बाद 2021 में निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ी। करीब 56 साल बाद अब 2026 में मंदिर बनकर तैयार है। BAPS ने दुनिया में 1,300 से ज्यादा मंदिर बनाए बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था यानी BAPS स्वामीनारायण परंपरा से जुड़ी एक वैश्विक हिंदू संस्था है। यह सिर्फ धार्मिक गतिविधियां नहीं चलाती, बल्कि शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक सेवा से भी जुड़ी है। BAPS के मंदिर भारत के अलावा अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका और यूरोप के कई देशों में हैं। यहां पूजा और धार्मिक कार्यक्रमों के साथ भारतीय संस्कृति, भाषा, संगीत, कला और बच्चों से जुड़े कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। BAPS के मुताबिक, दुनिया भर में उसके 1,300 से ज्यादा मंदिर हैं और इसका नेटवर्क 50 से ज्यादा देशों में फैला है। पेरिस के पास बना BAPS स्वामीनारायण मंदिर भी इसी वैश्विक नेटवर्क का हिस्सा है। भारत में अक्षरधाम भी BAPS ने बनाया BAPS के बनाए सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में दिल्ली का स्वामीनारायण अक्षरधाम भी शामिल है। इसके अलावा गुजरात के गांधीनगर में भी अक्षरधाम परिसर है। दिल्ली का अक्षरधाम पारंपरिक भारतीय शैली में बनाया गया है। इसे बनाने में हजारों कारीगरों और स्वयंसेवकों ने काम किया था। BAPS के मुताबिक, मंदिर को पारंपरिक वास्तु और शिल्प परंपराओं के अनुसार तैयार किया गया है।

खबर अपडेट हो रही है…

FPI ने भारतीय शेयरों में बढ़ाई खरीद, अगस्त में अब तक लगाए ₹23544 करोड़

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने अगस्त में भारतीय शेयर बाजार में अपनी खरीद तेज कर दी है। कंपनियों के बेहतर तिमाही नतीजों, रुपये की स्थिरता और बाजार की बेहतर संभावनाओं से निवेशकों का भरोसा मजबूत हुआ है। FPI ने अगस्त में अब तक भारतीय शेयर बाजार में 23,544 करोड़ रुपये डाले हैं। इससे पहले जुलाई में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयरों में 20,200 करोड़ रुपये का निवेश किया था। जुलाई से पहले लगातार 4 महीने सेलिंग की थी।

सेंट्रल डिपॉजिटरी सर्विसेज (इंडिया) लिमिटेड (CDSL) के आंकड़ों के मुताबिक, FPI ने जून में 49,340 करोड़ रुपये, मई में 32,963 करोड़ रुपये, अप्रैल में 60,847 करोड़ रुपये और मार्च में रिकॉर्ड 1.17 लाख करोड़ रुपये की बिकवाली की थी। फरवरी में उन्होंने भारतीय शेयरों में 22,615 करोड़ रुपये का निवेश किया था।

हाल की खरीदारी के बावजूद विदेशी निवेशकों की ओर से साल 2026 में अब तक भारतीय शेयर बाजारों में सेलिंग का आंकड़ा करीब 2,30,000 करोड़ रुपये रहा है। साल 2025 में उन्होंने 1.66 लाख करोड़ रुपये की सेलिंग की थी।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, जियोजीत इन्वेस्टमेंट्स के चीफ इनवेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट वी. के. विजयकुमार का कहना है कि FPI की भारतीय बाजार में वापसी के पीछे कई कारण हैं। इनमें कंपनी के जून तिमाही के बेहतर नतीजे, रुपये की स्थिरता और व्यापक बाजार में कंपनियों की ग्रोथ की अच्छी संभावनाएं प्रमुख हैं। विदेशी निवेशक आकर्षक वैल्यूएशंस वाले बड़े बैंकिंग और आईटी शेयरों में तगड़ी खरीद नहीं कर रहे हैं। इसके बजाय वे हाई वैल्यूएशंस के बावजूद चुनिंदा मझोली कंपनियों के शेयरों में पैसे लगा रहे हैं।

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बाजार की आगे की दिशा के लिए निवेशकों की नजर कच्चे तेल की कीमतों और अमेरिका-ईरान के बीच जारी भू-राजनीतिक तनाव पर रहेगी। विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी ऋण या बॉन्ड बाजार में भी दिखाई दी है। अगस्त में अब तक उन्होंने फुली एक्सेसिबल रूट (FAR) के तहत ऋण बाजार में 852 करोड़ रुपये का निवेश किया है। वहीं जनरल रूट के जरिए 995 करोड़ रुपये निकाले हैं।

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Rakesh Jhunjhunwala: सिर्फ ₹3 के शेयर ने राकेश झुनझुनवाला को बना दिया अरबपति! जानें ‘बिग बुल’ के उस सबसे बड़े मास्टर स्ट्रोक के बारे

Rakesh Jhunjhunwala Inspirational Journey: जब 1985 में 25 साल का एक नौजवान हाथ में महज 5 हजार रुपये लेकर शेयर बाजार के दंगल में उतरा, तो दलालों ने उसे सिर्फ एक ‘मुंगेरीलाल’ समझा था। पिता की सख्त हिदायत थी कि, ‘एक भी रुपया उधार मत लेना!’ लेकिन उस लड़के की आंखों में दलाल स्ट्रीट को फतह करने का जुनून था। फिर शुरू हुआ सही दांव, सटीक टाइमिंग और लोहे जैसे धैर्य का वो खेल, जिसने उस मामूली लड़के को भारत का ‘बिग बुल’ बना दिया।

₹5,000 से ₹40,000 करोड़ का विशाल साम्राज्य खड़ा करने वाले राकेश झुनझुनवाला की यह कहानी सिर्फ शेयर बाजार का गणित नहीं, बल्कि भारत के इतिहास का सबसे रोमांचक और प्रेरणादायक सफर है। आइए जानते हैं उस एक ‘मास्टर स्ट्रोक’ के बारे में जिसने रातों-रात उनकी किस्मत बदल दी।

शुरुआती जीवन और शेयर बाजार में पहला कदम

राकेश झुनझुनवाला का जन्म 5 जुलाई 1960 को हुआ था। उनके पिता इनकम टैक्स ऑफिसर थे, जो अक्सर अपने दोस्तों के साथ शेयर बाजार की बातें किया करते थे। वहीं से युवा राकेश के मन में बाजार को लेकर उत्सुकता जागी।

पिता की सलाह पर उन्होंने पहले अपनी पढ़ाई पूरी की और वर्ष 1985 में चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) बने। जब उन्होंने शेयर बाजार में उतरने की इच्छा जताई, तो उनके पिता ने अनुमति तो दी लेकिन दो सख्त शर्तें रखीं। पिता या दोस्तों से पैसा उधार नहीं लेना है, और किसी भी नुकसान की जिम्मेदारी खुद उठानी होगी। राकेश झुनझुनवाला ने 1985 में अपनी बचत के ₹5000 के साथ बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) में कदम रखा। उस समय सेंसेक्स महज 150 अंकों के आसपास था।

टाटा टी ने दिया पहला बड़ा ब्रेकआउट

राकेश झुनझुनवाला को अपनी पहली बड़ी सफलता 1986 में मिली, जब उन्होंने टाटा टी के शेयरों पर बड़ा दांव लगाया। उन्होंने ₹43 के भाव पर टाटा टी के 5000 शेयर खरीदे। महज 3 महीने के भीतर ही उस शेयर की कीमत ₹43 से बढ़कर ₹143 हो गई।

इस एक सौदे से उन्हें करीब ₹5 लाख का बड़ा मुनाफा हुआ। 1986 से 1989 के बीच उन्होंने कई सही दांव लगाकर लगभग ₹20-25 लाख का मुनाफा कमाया, जिसने उन्हें बाजार में बड़ी पूंजी के साथ खेलने का मौका दिया।

वो एक शेयर जिसने बना दिया अरबपति

अगर किसी एक शेयर ने उनकी जिंदगी बदली, तो वो था टाटा ग्रुप का टाइटन कंपनी।उन्होंने वर्ष 2002-03 के दौरान टाइटन के लगभग 6 करोड़ शेयर औसतन ₹3 प्रति शेयर के बेहद सस्ते भाव पर खरीदे। बाजार में तमाम उतार-चढ़ाव आए, लेकिन उन्होंने टाइटन में अपनी हिस्सेदारी को सालों-साल बनाए रखा। आगे चलकर टाइटन का शेयर हजारों रुपये के स्तर पर पहुंच गया। अकेले टाइटन के शेयर से ही उनकी नेटवर्थ में ₹10,000 करोड़ से ज्यादा का इजाफा हुआ।

इसके अलावा सिल्सा लैब (Sesa Goa), लुपिन, क्रिसिल और स्टार हेल्थ जैसे शेयरों में उनके शुरुआती निवेश ने उन्हें भारतीय बाजार का सबसे सफल रिटेल निवेशक बना दिया। अपने जीवन के आखिरी दौर में उन्होंने भारत की नई एयरलाइन अकासा एयर में भी बड़ा निवेश किया।

राकेश झुनझुनवाला की सफलता के 4 सबसे बड़े मंत्र

1. लंबी अवधि का धैर्य: वे ट्रेडिंग से ज्यादा लंबी अवधि के वैल्यू इन्वेस्टिंग पर भरोसा करते थे। उनका मानना था कि अगर कंपनी का फंडामेंटल मजबूत है, तो समय के साथ शेयर बढ़ेगा ही।

2. भारत की ग्रोथ पर पक्का भरोसा: वे हमेशा कहते थे कि भारत की अर्थव्यवस्था पर दांव लगाओ। वे भारतीय बाजार को लेकर हमेशा बेहद बुलिश रहते थे।

3. गलतियों से सीखना: झुनझुनवाला का मानना था कि बाजार में गलतियां होना स्वाभाविक है, लेकिन अपनी गलती को जल्दी स्वीकार करना और घाटे को काटना ही असली समझदारी है।

4. जब सब डरें, तब निवेश करें: 1992 के हर्षद मेहता घोटाले या 2008 की वैश्विक मंदी उन्होंने हर बड़े संकट और मंदी को एक बेहतरीन खरीदारी के मौके के रूप में देखा।

निवेशकों के लिए हमेशा प्रेरणास्रोत रहेंगे ‘बिग बुल’

14 अगस्त 2022 को 62 वर्ष की उम्र में भले ही भारत के ‘बिग बुल’ ने दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनकी छोड़ी हुई विरासत आज भी दलाल स्ट्रीट की हर धड़कन में जिंदा है। ₹5000 की मामूली पूंजी से शुरू होकर देश की सबसे बड़ी एविएशन कंपनी और बहुचर्चित इन्वेस्टमेंट फर्म्स में विशाल हिस्सेदारी बनाने का उनका यह सफर सिर्फ एक निवेशक की कामयाबी नहीं, बल्कि हर आम इंसान के बड़े सपने देखने और उन्हें सच करने की सबसे बड़ी मिसाल है। राकेश झुनझुनवाला भले आज हमारे बीच न हों, लेकिन उनका एक-एक सबक आज भी करोड़ों निवेशकों को बाजार के तूफानों से टकराने और अपनी किस्मत खुद लिखने का हौसला देता है।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

F&O में कई साल बाद घाटा हुआ कम लेकिन, SEBI की रिपोर्ट में रिटेलर्स को परेशान करने वाली बातें आई सामने

F&O, Rupees Printing Machine or Destroyer: इक्विटी डेरिवेटिव्स मार्केट में वित्त वर्ष 2026 के दौरान कई वर्षों बाद पहली बार बड़ी गिरावट देखने को मिली। हालांकि बाजार नियामक सेबी (SEBI) की ताजा ट्रेडर स्कोरकार्ड रिपोर्ट के मुताबिक मूल समस्या अभी भी बनी हुई है कि अधिकतर रिटेल ट्रेडर्स F&O (Futures & Options) को एक व्यवस्थित ट्रेडिंग प्रक्रिया की बजाय किस्मत आजमाने जैसा मानते हैं। एफएंडओ में कुल नुकसान और ट्रेडर्स की संख्या दोनों कम तो हुई, लेकिन 10 में से करीब 9 रिटेल ट्रेडर्स अब भी घाटे में रहे। सेबी के आंकड़ों से सामने आया है कि वित्त वर्ष 2026 में जो सुधार दिखा भी है, वह स्ट्रैटेजी यानी रणनीति के चलते नहीं बल्कि ट्रेडर्स की संख्या घटने से आया।

क्या हैं आंकड़े

वित्त वर्ष 2026 में F&O में एक्टिव इंडिविजुअल ट्रेडर्स की संख्या 18% घटकर 87.5 लाख और कुल नेट नुकसान 18% घटकर ₹91,685 करोड़ रहा तो नुकसान में रहने वाले ट्रेडर्स का अनुपात भी 90.9% से घटकर 87.7% रह गया। हालांकि नुकसान में रहने वाले ट्रेडर का औसत नुकसान बढ़कर लगभग ₹1.17 लाख हो गया। इस प्रकार वित्त वर्ष 2026 में कम लोगों ने ट्रेडिंग की, लेकिन जो ट्रेडिंग में बने रहे, उन्होंने अभी काफी बड़ा रिस्क लिया और भारी नुकसान उठाया।

Options Buying अब भी रिटेलर्स की पहली पसंद

सेबी के बिहैवरियल एनालिसिस के मुताबिक करीब 99.3% इंडिविजुअल ट्रेडर्स ने कम से कम एक बार ऑप्शंस में ट्रेड किया, तो 93% ट्रेडर्स ने सिर्फ ऑप्शंस में ट्रेडिंग की और फ्यूचर्स में उनकी हिस्सेदारी बहुत सीमित रही। इसके अलावा सेबी के के स्ट्रैटेजी-वाइज स्टडी में सामने आया कि ऑप्शंस बायर्स को 90% नुकसान हुआ और रिटेलर्स को सबसे बड़ा झटका इसी ने दिया। इससे फटाफट पैसा बनाने की कोशिश, एक्सपायरी के दिन ट्रेडिंग, बिना ठोस रणनीति के डायरेक्शन बेट्स और जरूरत से ज्यादा बड़ी पोजिशंस लेना।

रिटेलर्स के लिए बढ़ी लड़ाई

सेबी की रिपोर्ट के मुताबिक रिटेल ट्रेडर्स का मुकाबला अब सिर्फ दूसरे इंडिविजुअल्स से नहीं है। मार्केट पर अब बड़े इंस्टीट्यूशंस, प्रोप्राइटरी ट्रेडिंग फर्म्स और एल्गोरिदम से चलने वाले उन ट्रेडर्स का दबदबा बढ़ रहा है जो एडवांस्ड एग्जीक्यूशन सिस्टम का इस्तेमाल करते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि ये टेक्नोलॉजी, रिस्क मॉडल्स, ऑटोमोटेड एग्जीक्यूशन और डिसिपलिन्ड पोजिशन साइजिंग का इस्तेमाल करते हैं। वित्त वर्ष 2026 प्रोप्रॉयटरी ट्रेडर्स ने लगभग ₹44,000 करोड़ और FPIs ने करीब ₹14,000 करोड़ की कमाई की। इन दोनों की कमाई का करीब 99% हिस्सा एल्गोरिदमिक ट्रेडिंग एंटिटीज से आया। एक तरह कई रिटेलर्स भावनाओं, सोशल मीडिया टिप्स और एक्सपायरी के दिन ट्रे़डिंग पर पर निर्भर हैं तो प्रोफेशनल ट्रेडर्स पहले से तय रणनीतियों, टेक्नोलॉजी और रिस्क मैनेजमेंट के के आधार पर ट्रेड कर रहे।

और भी खास बातें आई सामने

सेबी की रिपोर्ट में एक बात का खंडन हुआ कि अधिक अनुभव का मतलब घाटा कम होना है। जिन ट्रेडर्स ने लगातार चार या उससे अधिक वर्षों तक ट्रेडिंग की, उनमें भी नुकसान की दर बहुत अधिक रही यानी कि बार-बार एक ही गलती करने से ट्रेडिंग स्किल अपने आप नहीं बढ़ती। इसी तरह जिन ट्रेडर्स को लगातार दो साल नुकसान हुआ, उनमें से लगभग 90% ने ट्रेडिंग जारी रखी और फिर से नुकसान उठाया।

सेबी की रिपोर्ट में एक और परेशान करने वाली बात सामने आई कि अधिक ट्रेडिंग से नुकसान भी बड़ा हुआ। सबसे अधिक एक्टिव 42% ट्रेडर्स की कुल घाटे में 87% और टर्नओवर में 94% हिस्सेदारी रही। यह समस्या खासतौर से युवाओं और कम आय वाले ट्रेडर्स में अधिक दिखाई दी।

सेबी की रिपोर्ट में कम कैपिटल और अधिक रिस्क की बात सामने आई। लगभग 35% डेरिवेटिव्स ट्रेडर्स के पास कोई इक्विटी पोर्टफोलियो नहीं था, तो 78% के पास ₹1 लाख से कम की इक्विटी होल्डिंग थी। पोर्टफोलियो का साइज बढ़ने के साथ नुकसान की संभावना लगातार कम होती गई। बहुत कम या बिना इक्विटी होल्डिंग वाले ट्रेडर्स के लिए नुकसान की संभावना 93% रही तो ₹10 करोड़ से अधिक के पोर्टफोलियो वाले ट्रेडर्स के लिए यह लगभग 58% रही। इससे संकेत मिलता है कि बड़ी पूंजी वाले ट्रेडर्स आमतौर पर एक लिमिट में एक्सपोजर लेते हैं, जबकि कई छोटे ट्रेडर्स अपनी पूंजी के मुकाबले बहुत अधिक लेवरेज इस्तेमाल करते हैं।

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डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

 

Aprilia Tuono 457 vs Tuono 457 Special Edition: Price and differences explained

Aprilia Tuono 457 vs Tuono 457 Special Edition: Price and differences explained
Aprilia Tuono 457 vs Tuono 457 Special Edition: Price and differences explained

With the Special Edition, Aprilia has addressed almost all the major complaints with the Tuono 457 but what exactly are the changes? At first glance, both motorcycles look the same and they largely are the same as well. This is a case of small changes adding up to a markedly different (and better) final product.

Aprilia Tuono 457 vs Tuono 457 Special Edition: Design

Slightly different, with a new colour

The most obvious change is the updated decals and the brand-new Mamba Black colour. The new colourway, which is exclusive to the Special Edition at the moment, gets a blacked out chassis and swingarm which wasn’t the case earlier. Even on the Puma Gray colour (carried over from earlier), Aprilia has updated the decals so the India-specific Special Edition does look different compared to the international version of the Tuono 457.

Aprilia Tuono 457 vs Tuono 457 Special Edition: Comfort

Seat, handlebar, and suspension all see upgrades

Starting off with changes that are visible, Aprilia has updated the Tuono 457’s seat to be slightly different now from the RS 457. Although the main difference is the extra padding, the seat profile has been slightly changed too to make sure longer stints are more comfortable. It results in the Special Edition having a 10mm taller seat height at 810mm, but we don’t expect anyone to complain about that. The next change is to the handlebar that now gets a 10mm taller riser even though the bar itself is unchanged. Lastly, there’s a standard flyscreen above the headlight, but we’d chalk that as strictly an aesthetical improvement. Finally, the brake lever is now adjustable though the clutch lever remains non-adjustable.

The changes that won’t be visible are to the suspension. At launch, the Tuono appeared to share the exact same suspension setup as the RS 457, which was jostling to most, literally and figuratively. On the Special Edition, Aprilia has made the front suspension softer on both damping and spring preload. While the rear has a softer compression damping and spring preload; rebound damping remains where it was earlier.

Aprilia Tuono 457 vs Tuono 457 Special Edition: Price

Costs Rs 2,000 extra now

With all the upgrades, Aprilia has priced the Tuono 457 Special Edition at Rs 3.99 lakh (ex-showroom), a Rs 2,000 increase from before. Despite the name, this is the only Tuono you can buy in India now so if you were a fan of the earlier Tuono, tough luck.

Aprilia Tuono 457 vs Tuono 457 Special Edition: What did not change

Engine, chassis, and most features

The Tuono 457’s engine immediately became a favourite at launch so Aprilia has not changed that in any way. The Special Edition retains the 457cc twin-cylinder, liquid-cooled engine with a parallel twin configuration. No changes to the performance figures either with the power (47.6hp) and (43.5Nm) torque remaining exactly the same.

Like we mentioned at the beginning, the list of upgrades on the Tuono 457 Special Edition isn’t long. However, most of them make a meaningful difference to how the motorcycle is to ride which is what Aprilia seems to have wanted. It remains to be seen whether these changes will help make the Tuono any more popular than before.

गूगल पर एक स्टार रिव्यू देने से भड़क गई कंपनी, महिला पर ठोक दिया केस

अमेरिका ने एक कंपनी ने महिला के ऊपर इसलिए केस कर दिया क्योंकि उसने गूगल पर कंपनी को केवल एक स्टार रेटिंग दी थी। कंपनी मानहानि का मुकदमा दर्ज करवाते हुए महिला से 25,000 डॉलर हर्जाना देने की मांग की है।

Compaq की धमाकेदार वापसी! लॉन्च किया 11,000mAh बैटरी वाला QTab Ultra लॉन्च, जानें कीमत

कभी PC की दुनिया में अपनी खास पहचान बनाने वाला Compaq अब करीब दो दशक बाद नए अंदाज में वापसी कर रहा है। साल 2002 में HP के अधिग्रहण के बाद लगभग गायब हो चुका यह ब्रांड अब इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेस मार्केट में अपनी दूसरी पारी शुरू करने की तैयारी में है। इस बार Compaq की नजर एंट्री-लेवल Android डिवाइसेस पर है और कंपनी ने इसी कड़ी में Compaq QTab Ultra 12.6 Android Tablet लॉन्च किया है।

Compaq QTab Ultra की खूबियां

लेटेस्ट Compaq QTab Ultra में 12.6 इंच की InCell AMOLED डिस्प्ले दी गई है। इसका रेजोल्यूशन 1600 x 2560 पिक्सल है। बड़ी स्क्रीन की वजह से इस टैबलेट पर वीडियो देखने और गेमिंग का मजा तो लिया ही जा सकता है, साथ ही यह पढ़ाई, ड्रॉइंग और ऑफिस के काम के लिए भी काफी उपयोगी हो सकता है।

कॉम्पैक का यह टैब Android 15 पर रन करता है, जो 5GHz Wi-Fi, Bluetooth 5.0, GPS और USB-C सपोर्ट के साथ आता है। इस टैब को कंपनी ने 11,000mAh की बैटरी के साथ लॉन्च किया है, जो 500 घंटे तक स्टेंडबाय टाइम का बैकअप ऑफर करता है। यह टैब 18W फास्ट चार्जिंग को सपोर्ट करता है।

इसके अलावा, इस टैब में स्टायलस पेन और प्रोटेक्टिव केस भी मिलेगा। साथ ही इसमें एक्सटर्नल कीबोर्ड का भी सपोर्ट दिया गया है। यह टैब 12GB RAM और 512 GB की इंटरनल स्टोरेज के साथ आता है। टैब में microSD कार्ड का स्लॉट भी दिया गया है, जो 2TB तक स्टोरेज सपोर्ट करता है।

Compaq QTab Ultra की कीमत

कीमत की बात करें तो, Compaq QTab Ultra 12.6 को फिलहाल मैक्सिको में MXN 8,499 (करीब 48,000 रुपये) की कीमत पर लॉन्च किया गया है। कंपनी टैबलेट के साथ प्रोटेक्टिव केस, स्टायलस, पावर अडैप्टर और चार्जिंग केबल भी दे रही है। हालांकि, अभी Compaq ने दूसरे देशों के बाजार में इस टैबलेट की लॉन्चिंग को लेकर कोई जानकारी नहीं दी है।

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SIP Calculator: हर महीने SIP से ₹5 हजार इनवेस्ट कर सकता हूं, 10 साल में कितना बड़ा फंड बन जाएगा?

पिछले कुछ सालों में सेविंग्स और निवेश को लेकर लोगों की सोच बदली है। खासकर युवा निवेश के पुराने तरीकों का इस्तेमाल नहीं करना चाहते। वे म्यूचुअल फंड जैसे निवेश के विकल्पों में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं। इसमें सिप का बड़ा हाथ है। सिप के जरिए कोई व्यक्ति हर महीने अपनी क्षमता के हिसाब से म्यूचुअल फंड की स्कीम में निवेश कर सकता है। जरूरत पड़ने पर वह अपना पैसा निकाल सकता है।

अच्छे रिटर्न की वजह से सिप में बढ़ रही दिलचस्पी

सिप से निवेश में दिलचस्पी बढ़ने का सबसे बड़ा कारण इसका रिटर्न है। सिप से लंबी अवधि तक निवेश कर लोगों ने बड़े फंड बनाए हैं। अब तो लोग रिटायरमेंट बाद के खर्च के लिए भी सिप से म्यूचुअल फंड की इक्विटी स्कीम में निवेश के बारे में सोचने लगे हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि म्यूचुअल फंड्स की स्कीम में सिप या एकमुश्त निवेश पर तभी अच्छा रिटर्न मिलता है, जब निवेश लंबी अवधि के लिए किया जाए।

हर महीने 5000 रुपये के सिप से तैयार हो सकता है बड़ा फंड

गाजियाबाद के रहने वाले मनोहर लाल एक जूता फैक्ट्री में काम करते हैं। उन्होंने बताया है कि वह हर महीने म्यूचुअल फंड में सिप के जरिए 5000 रुपये का निवेश कर सकते हैं। उनका सवाल है कि अगर वह यह निवेश लगातार 10 साल तक करते हैं तो इससे कितना बड़ा फंड वह बना सकते हैं?

लंबी अवधि में म्यूचुअल फंड का सालान रिटर्न कम से कम 12%

मनीकंट्रोल ने यह सवाल एक्सपर्ट से पूछा। एक्सपर्ट ने बताया कि सिप से 10 साल तक लगातार निवेश करने पर काफी बड़ा फंड तैयार हो सकता है। उन्होंने कहा कि म्यूचुअल फंड की स्कीम का सालाना रिटर्न लंबी अवधि में कम से कम 12 फीसदी रहता है। म्यूचुअल फंड की स्कीम के पिछले रिटर्न को देख यह अनुमान लगाया गया है।

5000 रुपये के मंथली सिप से 10 साल में तैयार होगा 11 लाख का फंड

अगर लाल हर महीने 5000 का निवेश सिप से करते हैं तो इसका मतलब है कि वह 10 साल में कुल 6,00,000 रुपये का निवेश करेंगे। अगर इस पर सालाना 12 फीसदी का रिटर्न मान लिया जाए तो उनका पैसा 10 साल में बढ़कर 11,20,179 रुपये हो जाएगा। इसका मतलब है कि उनके कुल 6 लाख रुपये के निवेश पर 5,20,179 रुपये का रिटर्न मिलेगा।

सिप अमाउंट हर साल 10 फीसदी बढ़ाने पर तैयार होगा 16 लाख का फंड

अगर वह हर साल निवेश के अमाउंट में 10 फीसदी इजाफा करते हैं तो उनके लिए और बड़ा फंड तैयार हो जाएगा। चूंकि लाल नौकरी करते हैं, जिससे हर साल उनकी सैलरी कुछ-न-कुछ बढ़ती रहेगी। इसलिए हर साल सिप के अमाउंट को 10 फीसदी बढ़ाने में उन्हें किसी तरह की दिक्कत नहीं आएगी। अगर वह हर साल 10-10 फीसदी सिप अमाउंट बढ़ाते हैं तो 10 साल में उनके लिए 16,34,449 रुपये का फंड तैयार हो जाएगा।

# यह कैलकुलेशन ऑनलाइन उपलब्ध सिप कैलकुलेटर पर आधारित है।