Shaan: शान के नाम से मशहूर शांतनु मुखर्जी और उनकी पत्नी राधिका मुखर्जी ने बांद्रा वेस्ट में तीन अपार्टमेंट खरीदे हैं। CRE Matrix के हाथ लगे प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन डॉक्यूमेंट्स के मुताबिक, ये प्रॉपर्टीज़ टर्नर रोड पर ‘पामेरा डेवलपमेंट’ का हिस्सा हैं और इन्हें डेवलपर NVK रियल्टी LLP से खरीदा गया है।
ये तीनों घर इस लग्ज़री प्रोजेक्ट की ऊपरी मंजिलों पर हैं और इनका कुल एरिया 6,267.87 स्क्वेयर फ़ीट है। रजिस्ट्रेशन डॉक्यूमेंट्स से पता चलता है कि इस खरीद के लिए कपल ने ₹47.64 करोड़ चुकाए, जिसमें हर अपार्टमेंट की कीमत लगभग ₹15.88 करोड़ थी।
यह डील आधिकारिक तौर पर 20 अगस्त, 2026 को रजिस्टर हुई थी और इसमें ₹2.70 करोड़ की स्टाम्प ड्यूटी का भुगतान किया गया था। इस खरीद के साथ नौ कार पार्किंग की जगहें भी मिली हैं। तीन अलग-अलग घरों के बजाय, इन अपार्टमेंट्स को मिलाकर एक बड़ा घर बना दिया गया है। अब यह घर उस कपल की प्रॉपर्टी का हिस्सा बन गया है।
पामेरा प्रोजेक्ट का बॉलीवुड के इतिहास से भी कनेक्शन है। डेवलपर की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक, टर्नर रोड वाली इस प्रॉपर्टी में पहले मशहूर एक्ट्रेस माला सिन्हा रहती थीं। स्क्वायर यार्ड्स द्वारा देखे गए प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन डॉक्यूमेंट्स के अनुसार, 2025 में शान और उनकी पत्नी ने पुणे के प्रभाचीवाड़ी में ₹10 करोड़ में एक लग्ज़री बंगला खरीदा था।
इस डील में प्लॉट और बंगला दोनों शामिल थे। प्लॉट का साइज लगभग 0.4 हेक्टेयर या करीब 4,787.92 वर्ग गज है, जबकि बना हुआ एरिया (बिल्ट-अप एरिया) लगभग 5,500 वर्ग फुट है, जो करीब 511.04 वर्ग मीटर के बराबर है। इस खरीद पर ₹50 लाख की स्टाम्प ड्यूटी और ₹30,000 की रजिस्ट्रेशन फीस लगी। शान ‘कल हो ना हो’, ‘तनु वेड्स मनु’ और ‘दस’ जैसी फिल्मों के गानों समेत कई पॉपुलर बॉलीवुड गानों के लिए जाने जाते हैं।
इससे पहले 2026 में, सिंगर श्रेया घोषाल ने अपने माता-पिता शमीष्ठा घोषाल और बिस्वजीत घोषाल के साथ मिलकर वर्ली में ₹29.70 करोड़ में एक अपार्टमेंट खरीदा था। जैपकी.कॉम (Zapkey.com) द्वारा देखे गए रजिस्ट्रेशन डॉक्यूमेंट्स के अनुसार, जुबिन नौटियाल ने भी मध आइलैंड इलाके में ₹4.94 करोड़ में 4 BHK अपार्टमेंट खरीदा था।
स्क्वायर यार्ड्स को मिले डॉक्यूमेंट्स के मुताबिक, सिंगर स्टेबिन बेन ने अपने परिवार के सदस्यों बेन अलेक्जेंडर और ज्योत्सना बेन के साथ मिलकर पिछले साल बांद्रा में ₹6.67 करोड़ में एक डुप्लेक्स अपार्टमेंट खरीदा था। वहीं, स्क्वायर यार्ड्स को मिले प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन डॉक्यूमेंट्स के अनुसार, कंपोजर और सिंगर अनु मलिक और उनकी पत्नी अंजू मलिक ने सांताक्रूज वेस्ट में लगभग ₹14.49 करोड़ में दो अपार्टमेंट बेचे।
तमिलनाडु सरकार ने नवजात बच्चों के लिए शुरू की जाने वाली ‘मामा गोल्ड रिंग योजना’ के तहत करीब 1.28 लाख सोने की अंगूठियां बनवाने का ऑर्डर दिया है। इन अंगूठियों पर करीब 220 करोड़ रुपये खर्च होंगे। सरकार ने इसके लिए दो बड़ी ज्वेलरी रिटेल चेन को काम सौंपा है। एक अधिकारी ने शनिवार को यह जानकारी दी।
इस योजना के तहत चार महीने के दौरान एक लाख से ज्यादा नवजात बच्चों को सोने की अंगूठी दी जाएगी। सरकार इस कल्याणकारी योजना की शुरुआत 15 सितंबर से करने जा रही है। इसी दिन द्रविड़ आंदोलन के प्रमुख नेता सीएन अन्नादुरई की जयंती भी है।
बता दें कि नवजात बच्चों को सोने की अंगूठी देने का यह वादा टीवीके (TVK) के चुनावी घोषणापत्र में शामिल था।
22 जून से अस्पताल में पैदा हुए बच्चों को मिलेगा योजना का लाभ
इस स्कीम का फायदा उन नवजात बच्चों को मिलेगा जो 22 जून को सरकारी अस्पतालों में पैदा हुए हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि इसी दिन मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय का जन्मदिन भी है।
एक मोटे अनुमान के मुताबिक, लगभग 128.5 किलोग्राम वजन वाली 1,28,499 अंगूठियों (22-कैरेट) की लागत 220 करोड़ रुपये होगी और तमिलनाडु सरकार ने कुल 4,41,667 अंगूठियों (एक साल के लिए) की सप्लाई के लिए 755.83 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान किया है।
हालांकि, अंगूठियों के शुरुआती बैच की अंतिम लागत में बदलाव हो सकता है, लेकिन राज्य सरकार ने मौजूदा बाजार दरों पर सोने का भुगतान करने का जिम्मा लिया है।
गोल्ड रिंग सप्लाई का जिम्मा दो कंपनियों को मिला
अंगूठियां बनाने और सप्लाई करने में जॉयअलुक्कास (Joyalukkas) को 70 फीसदी और कल्याण ज्वेलर्स (Kalyan Jewellers) को 30 फीसदी हिस्सा मिला है। इसके तहत जॉयअलुक्कास करीब 89,949 अंगूठियां, जबकि कल्याण ज्वेलर्स 38,550 अंगूठियां तैयार करेगा।
सूत्रों के अनुसार, तमिलनाडु में आज की बाजार दर के हिसाब से, इस स्कीम के तहत एक सोने की अंगूठी की लागत सरकार को लगभग 14,850 रुपये प्रति ग्राम पड़ेगी।
सरकार ने शुक्रवार देर रात बताया कि तमिलनाडु मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन (TNMSC) ने जून से सितंबर तक लाभार्थियों के लिए जरूरी 1,28,499 सोने की अंगूठियां सप्लाई करने के लिए जोयालुक्कास और कल्याण ज्वैलर्स को 70:30 के अनुपात में वर्क ऑर्डर जारी किए हैं।
सीएम विजय ने विधानसभा चुनाव से पहले इस योजना का किया था ऐलान
बता दें कि मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने अप्रैल में हुए विधानसभा चुनाव से पहले इस योजना का ऐलान किया था, जिसका लाभ सरकारी अस्पतालों में जन्म लेने वाले बच्चों को मिलेगा। इस योजना का मकसद सरकारी अस्पतालों में प्रसव को बढ़ावा देना है।
सरकार की एक प्रेस रिलीज के मुताबिक, “एक-एक ग्राम वजन वाली 4,41,667 सोने की अंगूठियां सप्लाई करने के सरकारी आदेश के बाद, 11 कंपनियों ने 14 जुलाई को तमिलनाडु मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन के टेंडर में हिस्सा लिया और TN टेंडर्स पोर्टल के जरिए अपनी कीमत की जानकारी जमा की।”
जॉयअलुक्कास ने एक ग्राम सोने की कीमत को छोड़कर सिर्फ 0.01 रुपये की सबसे कम बोली लगाई। इसमें प्रोसेसिंग फीस, इंश्योरेंस, ट्रांसपोर्टेशन और BIS हॉलमार्किंग जैसे सभी अतिरिक्त खर्च शामिल थे।
सरकार ने बताया कि जब संबंधित कानूनों के तहत 10 अन्य बोलीदाताओं को जीतने वाली कीमत के बारे में बताया गया, तो कल्याण ज्वैलर्स ने भी उसी कीमत की बोली लगाई।
सरकार ने कहा, “थाईमामन गोल्ड रिंग स्कीम को तमिलनाडु सरकार की स्वास्थ्य सेवाओं में लोगों का भरोसा बढ़ाने, सरकारी अस्पतालों में जन्मे बच्चे के जन्म को यादगार बनाने और मातृत्व की खुशी व महत्व का जश्न मनाने के लिए लागू किया जा रहा है।”
1 पैसे की बोली पर विधानसभा में हंगामा
इस हफ्ते विधानसभा में इस स्कीम के टेंडर को लेकर जोरदार बहस हुई। विपक्षी पार्टियों DMK और AIADMK ने खरीद की प्रक्रिया पर सवाल उठाए और “टेंडर के बहुत ही अजीब नतीजे” के बारे में पूछा, क्योंकि सफल बोली लगाने वाले ने अतिरिक्त शुल्क के तौर पर ₹0.01 (एक पैसा) की बोली लगाई थी।
विपक्षी पार्टियों के अनुसार, दूसरी प्रतिस्पर्धी कंपनियों ने अतिरिक्त शुल्क के तौर पर ₹410.97 से लेकर ₹15,000 से ज्यादा तक की बोली लगाई थी।
जॉयलुक्कास ने एक बयान में कहा: “इस टेंडर की कीमत लगभग 755 करोड़ रुपये है, जिसमें सोने की कीमत कुल खरीद मूल्य का मुख्य हिस्सा है।” कंपनी ने कहा कि उसने “मौजूदा सोने की कीमत से सिर्फ 1 पैसा ज्यादा का सांकेतिक सर्विस चार्ज” कोट किया था।
वहीं, विपक्ष ने सवाल उठाया कि यह खरीद तमिलनाडु मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन के जरिए क्यों की गई और तर्क दिया कि TNMSC को सिर्फ दवाइयां, मेडिकल उपकरण खरीदने और हेल्थकेयर बिल्डिंग बनाने के लिए बनाया गया था।
इस दौरान स्वास्थ्य मंत्री अरुणराज ने इस कदम का बचाव करते हुए कहा कि यह योजना राज्य की हेल्थकेयर सेवाओं में जनता का भरोसा मजबूत करने के लिए बहुत जरूरी है।
म्यूचुअल फंड में निवेश से जोरदार रिटर्न में फंड सेलेक्शन का बड़ा हाथ है। अगर निवेश के लिए सही फंड का चुनाव हो जाए तो फिर पैसे बढ़ना तय है। आईसीआईसीआई एएमसी के फंड ने निवेशकों को मालामाल किया है। इस फंड का नाम आईसीआआईसीआई वैल्यू प्रूडेंशियल फंड है। इस फंड ने सिर्फ 1 लाख रुपये के निवेश को 22 साल में 46.6 लाख रुपये बना दिया है।
इस फंड ने एकमुश्त और सिप दोनों निवेशकों को किया मालामाल
ICICI Prudential Asset Management Company ने अपने इस फंड के बारे में बताया है। ICICI Prudential Value Fund की शुरुआत 22 साल पहले हुई थी। इस फंड ने शुरुआत में पैसे लगाने वाले एकमुश्त और सिप दोनों निवेशकों को मालामाल किया है। इसका कंपाउंडेड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) 19.11 फीसदी है। इसने Nifty Total Return Index (TRI) के मुकाबले काफी ज्यादा रिटर्न दिया है। इस अवधि में निफ्टी 50 टीआरआई का सीएजीआर 14.63 फीसदी है।
वैल्यू इनवेस्टिंग की स्ट्रेटेजी का करता है इस्तेमाल
आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल वैल्यू फंड की शुरुआत 16 अगस्त, 2004 को हुई थी। इस फंड ने हाल ही में 22 साल पूरे किए हैं। यह फंड वैल्यू ओरिएंटेड इक्विटी इनवेस्टमेंट स्ट्रेटेजी का इस्तेमाल करता है। इस फंड का फोकस उन कंपनियों के शेयरों में निवेश करने पर होता है, जिनमें उनके इंटिनसिक वैल्यू से कम पर ट्रेडिंग हो रही होती है। ऐसी कंपनी छोटी या बड़ी हो सकती है।
तीन साल और पांच साल के टाइम फ्रेम में भी अच्छा रिटर्न
इस फंड का रिटर्न तीन साल और पांच साल के टाइम फ्रेम में भी बहुत अच्छा है। यह क्रमश: 13.44 फीसदी और 16.05 फीसदी है। अगर किसी निवेशक ने इस फंड की शुरुआत के समय इसमें हर महीने 10,000 रुपये का सिप शुरू किया होता तो उसका पैसा बढ़कर 2.37 करोड़ रुपये हो गया होता। यह 17.04 फीसदी का सीएजीआर रिटर्न है। 31 जुलाई को इस फंड का एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) 61,102.29 करोड़ रुपये था।
93 फीसदी पैसे का निवेश शेयरों में, फाइनेंशियल कंपनियों में ज्यादा निवेश
इस फंड ने अपना 93.31 पैसा शेयरों में निवेश किया है। सबसे ज्यादा 38.10 फीसदी निवेश फाइनेंशियल सर्विसेज कंपनियों के शेयरों में है। इसके बाद 9.08 फीसदी का निवेश हेल्थकेयर सर्विसेज कंपनियों के शेयरों में है। उसके बाद 9 फीसदी का निवेश एफएमसीजी कंपनियों के शेयरों में है। इस फंड ने 2022 में अपने बेंचमार्क को निफ्टी 500 वैल्यू 50 टीआरआई से बदलकर निफ्टी 500 टीआरआई कर दिया था।
निवेश से पहले अपने फाइनेंशियल एडवाइजर की राय जरूर लें
अगर आप इस फंड में निवेश करना चाहते हैं तो आपको पहले अपने फाइनेंशियल एडवाइजर की सलाह लेनी चाहिए। एक्सपर्ट्स का कहना है कि किसी फंड के पिछले रिटर्न को देख भविष्य में उसके रिटर्न का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। निवेशक को रिस्क लेने की अपनी क्षमता, निवेश की अवधि और निवेश के लक्ष्य को ध्यान में रख निवेश का फैसला करना चाहिए।
भारत से बड़ी संख्या में लोग बेहतर नौकरी, कमाई और भविष्य की तलाश में विदेश का रुख करते हैं। लेकिन कुछ लोगों की कहानी सिर्फ नौकरी तक सीमित नहीं रहती। वे नए देश में अपनी मेहनत और हुनर के दम पर ऐसा काम शुरू कर देते हैं, जिसमें उनकी जड़ों की झलक भी दिखाई देती है। दुबई में रहने वाले राजस्थान के एक शख्स की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। उसने विदेश में अपना कारोबार शुरू किया, लेकिन इसके लिए किसी विदेशी खाने को नहीं चुना, बल्कि भारत की मशहूर स्ट्रीट फूड पानीपुरी को अपना जरिया बनाया।
जिस पानीपुरी को भारत में लोग सड़क किनारे ठेलों और दुकानों पर बड़े चाव से खाते हैं, वही अब दुबई में इस शख्स की पहचान बन गई है। खास बात यह है कि उसके यहां रोजाना बड़ी संख्या में ग्राहक पहुंचते हैं। उसकी कहानी सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद लोग उसकी मेहनत और परिवार के लिए किए जा रहे प्रयासों की तारीफ कर रहे हैं।
रोज 500 से 1000 लोग पहुंचते हैं
इस शख्स की कहानी का एक वीडियो इंस्टाग्राम पर @emirateslovesindia ने शेयर किया है। वीडियो में उसने बताया कि वह पिछले करीब दो साल से दुबई में रह रहा है और वहां पानीपुरी का कारोबार कर रहा है। जब उससे ग्राहकों की संख्या के बारे में पूछा गया तो उसने बताया कि रोजाना करीब 500 से 600 ग्राहक आते हैं और कई बार यह आंकड़ा 1,000 तक पहुंच जाता है। हालांकि, वीडियो में कारोबार की सटीक जगह और उसकी कमाई का खुलासा नहीं किया गया।
एक नहीं, कई फ्लेवर की पानीपुरी
दुबई में ग्राहकों को सिर्फ आम पानीपुरी का स्वाद नहीं मिलता। शख्स ने बताया कि उनके यहां कई अलग-अलग फ्लेवर उपलब्ध हैं। इनमें जीरा, लहसुन, खट्टा-मीठा, हाजमोला, नींबू और सामान्य फ्लेवर शामिल हैं। यानी देसी पानीपुरी को दुबई में थोड़ा अलग अंदाज देकर लोगों के सामने पेश किया जा रहा है।
कमाई का आधा हिस्सा भेजता है घर
इस शख्स की कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा उसकी कमाई को लेकर है। उसने बताया कि वह अपनी कमाई का 50 फीसदी हिस्सा घर भेजता है, जबकि बाकी 50 फीसदी रकम दुबई में अपने खर्चों के लिए रखता है। उसकी यह बात सोशल मीडिया यूजर्स को खास तौर पर पसंद आई, क्योंकि विदेश में रहते हुए भी वह अपने परिवार की आर्थिक मदद करना जारी रख रहा है।
दुबई की जिंदगी भी है पसंद
सिर्फ कारोबार ही नहीं, शख्स ने दुबई में अपनी जिंदगी के बारे में भी बात की। उसने बताया कि उसे वहां का खाना, रहन-सहन और घूमना काफी पसंद है। उसके मुताबिक, दुबई की अच्छी सड़कें और बेहतर सेवाएं भी उसे पसंद आती हैं। यानी राजस्थान से हजारों किलोमीटर दूर रहने के बावजूद उसने वहां अपनी मेहनत से कमाई का रास्ता बना लिया है।
वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया यूजर्स ने शख्स की मेहनत और उसके कारोबार की तारीफ की। कई लोगों को यह बात खास लगी कि वह विदेश में रहकर भी भारतीय स्ट्रीट फूड को लोगों तक पहुंचा रहा है और अपनी कमाई का एक हिस्सा परिवार को भेजता है।
हरिद्वार के कांवड़ मेले में एक यूट्यूब सोशल एक्सपेरिमेंट ने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी है। यूट्यूबर पुरुषोत्तम वशिष्ठ और उनके दोस्त सचिन ने यह जानने की कोशिश की कि अगर कोई व्यक्ति धार्मिक मेले में भिखारी बनकर पैसे मांगे, तो एक दिन में कितनी रकम जुटा सकता है। सचिन करीब 8 घंटे तक भिखारी का हुलिया बनाकर लोगों के बीच घूमे और दोनों के मुताबिक इस दौरान करीब ₹4,000 जमा हुए।
फटे कपड़े, हाथ में कटोरा और गले में QR कोड
एक्सपेरिमेंट के लिए सचिन ने फटे-पुराने कपड़े पहने और हाथ में छोटा सा कटोरा लेकर श्रद्धालुओं के बीच पैसे मांगने लगे। इस प्रयोग को थोड़ा अलग बनाने के लिए उन्होंने गले में UPI QR कोड भी लटका रखा था, ताकि लोग चाहें तो डिजिटल पेमेंट से भी मदद कर सकें। शुरुआत में दोनों को लगा था कि पूरे दिन में शायद ₹1,000 से ₹2,000 तक ही मिल पाएंगे।
शुरुआत में मिले सिर्फ ₹130
मेले में पैसे मांगने के शुरुआती घंटों में सचिन को ज्यादा सफलता नहीं मिली। काफी कोशिश के बाद उनके पास करीब ₹130 ही जमा हुए। कुछ लोगों ने पैसे देने से साफ इनकार कर दिया, जबकि कुछ श्रद्धालुओं ने उनकी मदद की। कई लोगों ने पैसे न होने की बात कहकर आगे बढ़ना बेहतर समझा, तो कुछ ने सचिन के साथ अच्छा व्यवहार किया।
दुकानदार ने दे दी चश्मे की जोड़ी
मेले में घूमते हुए सचिन कई दुकानदारों से भी बातचीत करने लगे। इसी दौरान एक सनग्लास विक्रेता ने उन्हें चश्मे की एक जोड़ी दे दी। इस घटना के बाद सचिन ने मजाकिया अंदाज में खुद को ‘प्रोफेशनल भिखारी’ तक कह दिया। वहीं, गले में लगे UPI QR कोड से भी करीब ₹40 का डिजिटल भुगतान मिला।
असली भिखारी से हुई दिलचस्प बातचीत
एक वक्त सचिन एक असली भिखारी के पास जाकर बैठ गए। दोनों के बीच बातचीत हुई। बताया गया कि उस व्यक्ति को अपना नाम और वह पहले कहां रहता था, इसकी जानकारी तक याद नहीं थी। यह मुलाकात एक्सपेरिमेंट के दौरान सामने आई उन स्थितियों में से एक थी, जिसने भिक्षावृत्ति के पीछे छिपी व्यक्तिगत परेशानियों की ओर भी ध्यान खींचा।
चार घंटे में ₹800, आठ घंटे में ₹4 हजार
करीब चार घंटे बाद सचिन ने अपनी जमा रकम गिनी तो उनके पास लगभग ₹800 थे। इसके बाद उन्होंने कई घंटे और मेले में बिताए। कभी लोगों ने पैसे दिए तो कभी उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा। इस दौरान कुछ जगहों पर सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें वहां से हटने के लिए भी कहा। बारिश और लगातार पैदल चलने की वजह से एक्सपेरिमेंट उनके लिए शारीरिक रूप से भी काफी थकाऊ बन गया। करीब 8 घंटे बाद दोनों ने दावा किया कि कुल मिलाकर लगभग ₹4,000 जमा हुए। यानी इस प्रयोग में औसतन करीब ₹500 प्रति घंटे की रकम जुटी।
₹4 हजार से लाखों की कमाई का हिसाब
इसके बाद दोनों ने इसी आंकड़े के आधार पर अनुमान लगाना शुरू किया। उनका कहना था कि अगर रोजाना इतनी ही रकम मिलती रहे तो महीने में करीब ₹1.2 लाख तक जुटाए जा सकते हैं। वायरल पोस्ट में इससे भी ज्यादा कमाई का एक अनुमान सामने आया, जिसमें 12-13 घंटे रोजाना काम करने पर ₹8,000 से ₹10,000 प्रतिदिन तक की संभावित कमाई की बात कही गई। हालांकि, ये सिर्फ इस एक्सपेरिमेंट पर आधारित अनुमान हैं। इससे यह साबित नहीं होता कि वास्तविक जिंदगी में भीख मांगने वाले लोग नियमित रूप से इतनी रकम कमाते हैं।
A YouTuber, Puroshottam Vashisht, became a beggar for 8 hours at Haridwar’s kawad Mela 2026.
He dressed like a beggar, hung a UPI QR code around his neck and walked around asking devotees for money.
एक्सपेरिमेंट के अंत में दोनों ने माना कि बाहर से आसान दिखने वाला यह काम असल में बेहद थका देने वाला है। घंटों तक अजनबियों के पास जाकर मदद मांगना मानसिक और शारीरिक रूप से काफी मुश्किल लगा। सचिन को जहां कुछ लोगों ने पैसे देकर मदद की, वहीं कुछ लोगों के खराब व्यवहार का भी सामना करना पड़ा। दोनों ने लोगों को सलाह दी कि भीख मांगने को कमाई का जरिया बनाने के बजाय मेहनत और ईमानदारी से कमाने की कोशिश करनी चाहिए।
₹4 हजार की कमाई ने छेड़ दी बड़ी बहस
वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया यूजर्स ने 8 घंटे में ₹4,000 जमा होने पर हैरानी जताई। कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि क्या धार्मिक आयोजनों और पर्यटन स्थलों पर भीख मांगना कुछ लोगों के लिए कमाई का स्थायी जरिया बन गया है।
वहीं, कई यूजर्स ने इस एक्सपेरिमेंट से बड़े निष्कर्ष निकालने से बचने की सलाह दी। उनका कहना था कि सिर्फ 8 घंटे का प्रयोग उन लोगों की असली जिंदगी को नहीं दर्शा सकता, जो गरीबी, बेघरपन, बीमारी, दिव्यांगता, शोषण या लंबे समय से चली आ रही आर्थिक परेशानियों के कारण भीख मांगने को मजबूर हैं।
उम्मीद है कि Apple अपने सालाना सितंबर लॉन्च इवेंट में iPhone 18 Pro Max को पेश करेगा। इस इवेंट में कंपनी iPhone 18 Pro और एक नया iPhone Ultra भी लॉन्च कर सकती है। हालांकि Apple ने अभी तक इस इवेंट की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है, लेकिन कई रिपोर्ट्स से पता चलता है कि यह इवेंट 9 सितंबर को हो सकता है। इसके बाद उसी हफ्ते प्री-ऑर्डर शुरू हो सकते हैं और महीने के आखिर तक बिक्री भी शुरू होने की उम्मीद है।
मौजूदा लीक और रिपोर्ट्स के आधार पर iPhone 18 Pro Max से क्या-क्या उम्मीदें हैं, आइए उन पर एक नजर डालते हैं।
अनुमानित लॉन्च डेट
Apple हर साल सितंबर में अपने नए फ्लैगशिप iPhone लॉन्च करता है। इस साल भी कंपनी इसी परंपरा को जारी रख सकती है। अगर सामने आ रही रिपोर्ट्स सही साबित होती हैं, तो iPhone 18 Pro Max को 9 सितंबर को कैलिफोर्निया के क्यूपर्टिनो स्थित Steve Jobs Theatre में लॉन्च किया जा सकता है।
यह इवेंट Apple के CEO John Ternus के कार्यकाल में होने वाला कंपनी का पहला iPhone लॉन्च भी हो सकता है।
डिजाइन और डिस्प्ले
iPhone 18 Pro Max के डिजाइन में कोई बड़ा बदलाव होने की उम्मीद नहीं है। इसके बजाय, Apple पिछली जेनरेशन के डिजाइन को ही बरकरार रख सकता है और इसमें कुछ छोटे-मोटे बदलाव कर सकता है।
लीक से पता चलता है कि फोन में 6.9-इंच का LTPO OLED डिस्प्ले हो सकता है, जिसमें ProMotion टेक्नोलॉजी और 120Hz तक का अडैप्टिव रिफ्रेश रेट होगा। Apple के आउटडोर में बेहतर विजिबिलिटी के लिए पीक ब्राइटनेस को भी बेहतर बनाने की उम्मीद है। जहां कुछ रिपोर्ट में छोटे Dynamic Island का संकेत मिलता है, वहीं दूसरी रिपोर्ट बताती हैं कि यह बदलाव आने वाली किसी दूसरी जेनरेशन में देखने को मिल सकता है।
नया A20 Pro प्रोसेसर
iPhone 18 Pro Max में Apple का A20 Pro चिपसेट होने की उम्मीद है, जो खबरों के अनुसार 2nm मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस पर बेस्ड है।
इस प्रोसेसर के साथ 12GB RAM मिल सकती है, जिससे मल्टीटास्किंग बेहतर होने के साथ फोन में AI से जुड़े काम भी तेजी से किए जा सकेंगे। नया चिपसेट ग्राफिक्स परफॉर्मेंस, पावर एफिशिएंसी और फोन की ओवरऑल स्पीड को भी बेहतर बना सकता है।
कैमरा अपग्रेड
उम्मीद है कि Apple कैमरे में सुधार पर ध्यान देगा, खासकर Pro Max मॉडल के लिए। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस स्मार्टफोन में वेरिएबल अपर्चर वाला कैमरा हो सकता है, जिससे यूजर्स सेंसर में आने वाली रोशनी की मात्रा को एडजस्ट कर सकेंगे। इससे डेप्थ ऑफ फील्ड और कम रोशनी में फोटोग्राफी पर बेहतर कंट्रोल मिलेगा।
इसके अलावा, इस फोन में ट्रिपल-कैमरा सेटअप बरकरार रहने की उम्मीद है, साथ ही A20 Pro चिप की वजह से बेहतर इमेज प्रोसेसिंग का फायदा भी मिलेगा, जिससे फोटो और वीडियो दोनों की क्वालिटी बेहतर होगी।
बैटरी और चार्जिंग
बैटरी की क्षमता के बारे में अभी कोई जानकारी नहीं मिली है, लेकिन रिपोर्ट्स बताती हैं कि Apple बैटरी का साइज बहुत ज्यादा बढ़ाने के बजाय हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर ऑप्टिमाइजेशन पर ध्यान देगा।
A20 Pro प्रोसेसर और iOS में सुधार के कॉम्बिनेशन से बैटरी लाइफ बेहतर होने की उम्मीद है।
भारत में अनुमानित कीमत
उम्मीद है कि iPhone 18 Pro Max अपने पिछले मॉडल से महंगा होगा। रिपोर्ट्स के अनुसार, Apple दुनिया भर में इसकी कीमत में लगभग $200 की बढ़ोतरी कर सकता है, जिससे भारत में भी इसकी लॉन्च कीमत 20,000 रुपये तक बढ़ सकती है।
लॉन्च से पहले की सभी जानकारियों की तरह, ये डिटेल्स भी लीक और इंडस्ट्री रिपोर्ट्स पर आधारित हैं। उम्मीद है कि Apple सितंबर में होने वाले लॉन्च इवेंट के दौरान इसके स्पेसिफिकेशन्स, कीमत और उपलब्धता की पुष्टि करेगा।
अगर आप एक ऐसा फोन खरीदने की सोच रहे हैं, जो प्रीमियम भी हो और आपके बजट में भी हो तो यह आर्टिकल आपको जरूर पढ़नी चाहिए। दरअसल, Amazon पर Samsung Galaxy S26 Ultra 5G (12GB RAM + 256GB स्टोरेज) को ऑफर के तहत 87,400 रुपये की प्रभावी कीमत में खरीदा जा सकता है। इसमें मौजूदा डिस्काउंट के साथ योग्य स्मार्टफोन एक्सचेंज और कैशबैक ऑफर का फायदा शामिल है। फिलहाल यह स्मार्टफोन Amazon पर 1,24,999 रुपये में लिस्टेड है, जबकि इसकी MRP 1,69,999 रुपये है।
₹87,400 की कीमत कैसे पाएं
Samsung Galaxy S26 Ultra 5G की कीमत 87,400 रुपये तक लाने के लिए आपको Amazon पर मिल रहे अलग-अलग ऑफर्स का फायदा एक साथ उठाना होगा।
अगर आपके पास अच्छी कंडीशन में Apple iPhone 16 (128GB) है, तो उसे एक्सचेंज करने पर 31,350 रुपये तक का एक्सचेंज वैल्यू मिल सकता है। इसके अलावा, एलिजिबल क्रेडिट कार्ड से पेमेंट करने पर 6,249 रुपये तक का Amazon Pay Balance कैशबैक भी मिल सकता है।
इन दोनों ऑफर्स का फायदा लेने के बाद Samsung Galaxy S26 Ultra 5G की प्रभावी कीमत 87,400 रुपये तक आ जाती है।
EMI और दूसरे ऑफर
ग्राहक एलिजिबल कार्ड पर 18 महीने के लिए ₹6,944 प्रति महीने से शुरू होने वाली ‘नो कॉस्ट EMI’ का विकल्प भी चुन सकते हैं। चुने गए बैंक और पेमेंट के तरीके के आधार पर पेमेंट से जुड़े अतिरिक्त ऑफर भी मिल सकते हैं।
Samsung Galaxy S26 Ultra के फीचर्स
Samsung Galaxy S26 Ultra में 200MP का प्राइमरी कैमरा दिया गया है। फोन में Snapdragon 8 Elite Gen 5 प्रोसेसर, 5,000mAh की बैटरी, 12GB RAM और 256GB स्टोरेज मिलती है। इसके अलावा, फोन में Samsung के AI-powered फीचर्स भी दिए गए हैं। इनमें Photo Assist, Creative Studio और Built-in Privacy Display जैसे फीचर्स शामिल हैं।
ध्यान रखने वाली बातें
₹87,400 की कीमत एक ‘इफेक्टिव प्राइस’ (असरदार कीमत) है और यह ज्यादा से ज्यादा एक्सचेंज वैल्यू और कैशबैक ऑफर का फायदा उठाने के बाद ही मिलती है। एक्सचेंज की रकम पुराने डिवाइस की हालत और पिकअप के समय सफल वेरिफिकेशन पर निर्भर करती है, जबकि कैशबैक के लिए संबंधित कार्ड की शर्तें और नियम लागू होते हैं।
सोचिए, आपने अपनी पसंद का पिज्जा ऑर्डर किया हो, उसकी पूरी कीमत चुकाई हो और डिलीवरी का इंतजार भी किया हो। लेकिन जब डिब्बा खुले तो सामने आया पिज्जा उम्मीद से काफी छोटा हो। उत्तराखंड के एक ग्राहक के साथ कुछ ऐसा ही हुआ, जब उसने 10 इंच का पिज्जा मंगाया, लेकिन उसे कथित तौर पर 7 इंच का पिज्जा मिला। आमतौर पर ऐसी स्थिति में लोग शिकायत करके या रिफंड मांगकर मामला खत्म कर देते हैं। लेकिन इस ग्राहक ने इसे सिर्फ छोटी सी गलती मानकर छोड़ने के बजाय अपनी शिकायत को आगे बढ़ाने का फैसला किया।
उसने पहले संबंधित प्लेटफॉर्म पर मामला उठाया और जब बात नहीं बनी तो उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया। मामला वहां पहुंचने के बाद सिर्फ पिज्जा के साइज का विवाद नहीं रहा, बल्कि ग्राहक के अधिकार और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर दी गई जानकारी के मुताबिक सामान मिलने की जिम्मेदारी का सवाल भी बन गया। अब इस मामले में आयोग का फैसला चर्चा में है।
रिफंड नहीं मिला तो बढ़ाया मामला
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, ग्राहक ने ऑनलाइन फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म से दो पिज्जा ऑर्डर किए थे। इनकी कुल कीमत ₹505 थी और ऐप पर पिज्जा का साइज 10 इंच बताया गया था। डिलीवरी मिलने के बाद ग्राहक ने पिज्जा का साइज देखा तो उसे वह काफी छोटा लगा। उसका आरोप था कि पिज्जा सिर्फ 7 इंच का था। उसने तुरंत ऐप के ग्राहक सहायता केंद्र पर शिकायत की और रिफंड की मांग की। शिकायत के बावजूद जब मामला हल नहीं हुआ, तो उसने आगे शिकायत करने का फैसला किया।
हेल्पलाइन से लेकर उपभोक्ता आयोग तक पहुंचा
ग्राहक ने पहले राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन में शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद उसने सीपीजीआरएएमएस के जरिए भी शिकायत की और संबंधित पक्षों को कानूनी नोटिस भेजा।
जब इन कोशिशों के बाद भी रिफंड नहीं मिला, तो उसने हरिद्वार जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में मामला दर्ज करा दिया।
डिलीवरी प्लेटफॉर्म ने दी ये दलील
सुनवाई के दौरान ऑनलाइन फूड डिलीवरी कंपनी ने कहा कि वह सिर्फ ग्राहक और रेस्टोरेंट के बीच एक माध्यम है। कंपनी के मुताबिक, पिज्जा बनाने, पैक करने और बेचने की जिम्मेदारी उसकी नहीं है।वहीं, संबंधित रेस्टोरेंट ने मामले में अपना जवाब दाखिल नहीं किया। इसके बाद आयोग ने उसके खिलाफ एकतरफा कार्रवाई की।
आयोग ने कंपनी की दलील नहीं मानी
आयोग ने शिकायतकर्ता और डिलीवरी प्लेटफॉर्म की ओर से पेश किए गए दस्तावेजों और हलफनामों की जांच की। इसमें पाया गया कि ग्राहक को मिला पिज्जा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बताए गए साइज से अलग था। आयोग ने यह भी माना कि शिकायत करने के बाद ग्राहक को रिफंड नहीं दिया गया। डिलीवरी प्लेटफॉर्म का यह कहना कि वह सिर्फ एक माध्यम है, आयोग को स्वीकार नहीं हुआ।
आयोग के अनुसार, ग्राहक का ऑर्डर स्वीकार करने, रेस्टोरेंट से तालमेल करने और उसे ग्राहक तक पहुंचाने में प्लेटफॉर्म की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इसलिए वह पूरी सेवा प्रक्रिया का हिस्सा है।
3 इंच छोटे पिज्जा को माना सेवा में कमी
आयोग ने कहा कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर जिस साइज का पिज्जा दिखाया गया था, ग्राहक को उसके मुताबिक पिज्जा नहीं मिला। 10 इंच की जगह 7 इंच का पिज्जा देना सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार माना गया। मामले की सुनवाई जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष गगन कुमार गुप्ता और सदस्य डॉ. अमरेश रावत व रंजना गोयल ने की।
₹505 के ऑर्डर पर मिलेंगे ₹10,520
ग्राहक ने पिज्जा के लिए ₹505 और ₹15 डिलीवरी शुल्क का भुगतान किया था। लेकिन आयोग के आदेश के बाद उसे सिर्फ पिज्जा की रकम वापस नहीं मिलेगी। आयोग ने फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म और रेस्टोरेंट को संयुक्त रूप से ₹10,520 देने का आदेश दिया है। यह रकम 45 दिनों के भीतर देनी होगी।
इसमें ₹520 पिज्जा और डिलीवरी शुल्क के लिए, ₹5,000 मानसिक और शारीरिक परेशानी के मुआवजे के तौर पर और ₹5,000 मुकदमे के खर्च के रूप में शामिल हैं।
यानी 10 इंच के पिज्जा की जगह 7 इंच का पिज्जा मिलने से शुरू हुआ विवाद आखिरकार ग्राहक को मूल ऑर्डर की कीमत से 20 गुना से भी ज्यादा रकम मिलने के आदेश तक पहुंच गया।
The Range Rover Sport EV has been a long time coming. After what feels like an eternity of teasers and test mules, the electric Range Rovers will finally be launched globally in September this year and should arrive in Indian showrooms around March 2027. Look at the car and you may wonder what took the company so long, because this appears to be just the regular Range Rover Sport. That, as it turns out, is entirely the point.
Under the familiar skin sit 300 patents’ worth of tech, a new 800V electrical architecture, two 326hp motors and a 118.5kWh battery, all validated over 60,000 hours of testing, the most for any Range Rover yet. The motors are Land Rover’s own design, developed in-house because nothing off the shelf could deliver the kind of instant, finely controlled torque the brand demanded for serious off-roading. The only real giveaways on the outside are a grille with narrower air slots and a new set of alloys with a more aero design, in keeping with the EV theme. Land Rover deliberately didn’t tamper with the styling because customers were clear – don’t change it, just make it better.
The new architecture, motors and battery have gone through 60,000 hours of testing.
So, is it better? A specially curated lap of the Goodwood circuit, complete with gravel stages and some party tricks, was our chance to find out.
Range Rover Sport Electric Prototype: performance, ride and handling
Set off, and the first impression is of eerie silence. All you can hear is the blower working overtime on a hot Goodwood day. Even when the tarmac ends and the gravel begins, the Sport EV feels like a magic carpet, gliding along on a pillow of velvet. The ride quality is absolutely exceptional, better even than the standard car’s, and that’s saying something.
When you want a quick turn of pace, the combined 550hp and 850Nm don’t leave you wanting. Engage launch control, and the Sport EV catapults forward hard enough to be a genuine shock, though the delivery is measured rather than manic. There is, however, a hint of torque steer from the front axle under hard acceleration, a slight tug at the wheel that reminds you how much force is being exerted. The brakes on our prototype also felt a bit grabby, with a sharp initial bite. Land Rover engineers admit this isn’t the final calibration and say production cars will have a more progressive pedal feel.
The Sport EV feels like a magic carpet, gliding along on a pillow of velvet.
Then came the fun exercises, laid out to prove that this plush, polished and uber-refined Range Rover can do things no owner would ever dare attempt. The Sport EV climbed a staircase – a cheeky nod to the brand’s world record 999-step climb – and we even drove it through the fuselage of an Airbus. Silly? Absolutely. But it showcased what makes an electric drivetrain so effective off road. Torque arrives instantly from zero rpm and builds with perfect linearity, and because the electronics can meter out drive to each motor with such precision, there’s no need for the old hardware of locking diffs and low-range gearboxes. Raise the suspension to off-road height, let the cameras and hill descent control do their thing, and the car simply walks over obstacles. The single-pedal mode is something the engineers have finally nailed too, and it works seamlessly alongside hill descent control when needed.
The big surprise is how tidily this near 2.8-tonne SUV handles. Flick the wheel suddenly, and you can feel the mass move, but otherwise, it stays impressively planted through corners, helped by a centre of gravity that sits a significant 73mm lower than in the combustion car. Range Rovers have always had a top-heavy feel when pushed; this one doesn’t.
Questions remain. A real-world range of 531km is promised, but given the bluff shape and sheer size of this flagship EV, that figure could prove optimistic if driven briskly. Some owners may have liked the convenience of a frunk in their EV, which is absent, and packaging the rear motor has killed off any seven-seat option. Then again, these are misses most owners may not miss at all.
Prototype badging aside, there’s little to separate this from the combustion-engined Sport.
Pricing isn’t announced yet, but expect it to sit above the locally assembled combustion equivalents. More importantly, on this evidence, it will set a new benchmark for luxury for the brand. The electric Range Rover Sport doesn’t reinvent the formula, but it quietly perfects it.
Suzuki first showed the e-Access back in January 2025, but it was actually launched only a year later, in January 2026. While the e-Access has definitely lost the first mover advantage in the burgeoning EV market, has it at least come prepared?
e-Access Design and Features – 6/10
Unusual design won’t be to everyone’s tastes, features aren’t ground-breaking.
The e-Access is a ground-up new product, which has very little shared with its massively popular petrol-powered namesake. Its design is a clean-sheet one, and most people found it quite polarising. The swooping, double ‘duck-bill’ front end, mated to a contrasting, boxy rear section, doesn’t really gel well cohesively. Like all Suzuki two-wheelers, the e-Access feels solidly built, and the quality is quite decent too.
Decent is also a good way to describe its feature set, which includes the same bright and logically laid-out 4.2-inch TFT display as the 125cc Access and Burgman Street. In terms of riding modes, there are 3 in total – Eco, Ride B and Ride A – but on the move, you can only switch between Eco and either of the Ride modes. Both Ride A and Ride B give you full power, and the only difference is in the levels of regenerative braking. A has stronger regen, while in B, it is more gentle. To toggle between A and B, you have to be at a standstill, and this is a needless hoop to jump through.
Keyless ignition convenient to have, and very few e-scooters offer it today.
The feature set also includes a very convenient keyless ignition system, a spacious, open cubby on the front apron with a USB-A charger and an oddly-shaped, very small 17-litre underseat boot. In an age where most rivals routinely offer 30-35 litres of boot space, the e-Access falls woefully short, and in fact, even the latest-gen ICE Access gives you more.
17L boot feels archaic today, charger cables need to be folded just right to fit inside.
It comes with a reasonably sized 600W charger, which took 6 hours flat to top up a flat battery to full. Suzuki also provides a well-thought-out bag in which you can store the charger, which is another neat touch. However, if you don’t pack the charger’s cables just right and place the bag inside the boot, it won’t close. Moreover, once the charger is in the boot, there’s very little free space available. This is a consequence of Suzuki positioning the batteries under the seat, which also has some ramifications on the scooter’s handling, but more on that later.
One silver lining is that the e-Access’ seat stays in the position you leave it in once you open it, courtesy of a small spring-loaded mechanism at the hinge, which is quite a neat touch.
Seat stays open on its own without needing to keep it manually propped open.
e-Access Performance and Range – 6/10
Range and performance are just about adequate.
Every EV has shortcomings, but the important question is, can they be overlooked in the interest of the savings it brings via lower running costs? Unlike most mainstream manufacturers, which use NMC (Nickel Manganese Cobalt) batteries, Suzuki has chosen LFP (Lithium Ferrous Phosphate) chemistry for the e-Access. LFP cells typically have a longer life and lower risk of thermal runaway incidents, but the trade-off is lower energy density, and ergo, lower range.
Neutral ergonomics and well-judged suspension help keep you comfortable.
With a 3.072kWh LFP battery pack and a claimed 95km IDC range, range was never going to be the e-Access’ USP. In our tests, using Ride A mode (maximum power, maximum regenerative braking), we managed to cover a little over 88km on a single charge. This is a decent number in isolation, but quite a bit lower compared to rivals with similarly sized batteries, which can cover upwards of 100km.
One positive is that, once the range indicator had calibrated to our riding style, its predictions proved to be accurate, and the number shown on screen could be relied upon as the actual distance you’d go. Using Eco mode will obviously increase range on a single charge, but performance will be much gentler. What is nice is that even in Eco, the e-Access can maintain pace with big-city traffic as well as climb flyovers.
Motor delivers power in a predictable, unhurried manner, but the powertrain is quite noisy.
While the performance never feels inadequate, it is definitely a letdown on a machine bearing the ‘Access’ badge. In our tests, the e-Access took nearly 12 seconds to complete the 0-60kph sprint, which not only makes it slower than most other well-known e-scooters, but also much slower than the Access 125 that takes 7.68s for the same test. In fact, its performance, even in the most powerful Ride A mode, is so mellow that even the gentle Honda Activa 110 would leave it in the dust in a traffic-light grand prix. Another bug bear we have with the e-Access’ powertrain is that the powertrain is on the noisier side among all the reputed EVs on sale today.
e-Access Ride and Handling – 7/10
It’s light, easy and intuitive to ride, but over-eager handling is a mismatch.
To sit on, the e-Access feels pleasantly ‘normal’, and while this is certainly a compact machine, taller riders will be reasonably accommodated. However, while its low 765mm perch will be welcoming for shorter folks, riders over 6 feet will find it a bit too low. With a flat seat, spacious floorboard and well-tuned suspension, the e-Access is quite a comfortable machine and will isolate you to a great degree from all but the worst of bumps on our roads.
Suspension is well set up and shields you from bumps, but is more taut than floaty.
Like the new Burgman, its suspension is not overtly soft and feels quite taut, which isn’t necessarily a deal breaker, but something to watch out for. Braking power is quite good, although the lack of ABS and a sharp bite mean you have to be mindful when slowing down.
Brakes work well, but are quite sharp and bitey. Lack of ABS is a downer at this price.
At 122kg, it is fairly light, and slicing through traffic is a breeze. In fact, the scooter displays a tendency to lean over onto its side quicker than you’d expect, which is partly down to its smaller 12-in wheels and thinner tyres. It is also another consequence of Suzuki mounting the battery pack vertically under the seat. As a result of the centre of gravity being fairly high, the e-Access almost ‘falls’ into a corner, and this behaviour won’t be to everyone’s liking.
e-Access Price and Verdict – 6/10
All said and done, it’s not the average features, tiny storage area, mellow performance or lacklustre range which will dissuade you from buying it. These are all things that buyers could overlook in exchange for the quality assurance that comes with the Suzuki Access name. However, the deal breaker here is the super-steep Rs 1.92 lakh asking price, which is very difficult to justify when similarly specced, proven options from reputed Indian brands like TVS, Bajaj, Vida (Hero) and Ather cost up to Rs 60,000 less.
Gets some things right, but it’s far too expensive.
The e-Access gets some things right, like good comfort, and has typical Japanese strengths, like the promise of reliability, longevity and good quality. However, today’s market values a good price point without compromising on range, storage and quick charging times. For the e-Access to follow in the successful footsteps of its ICE namesake, simply leveraging an established name and charging an unreasonably stiff premium for it is unlikely to pay off.