रेलवे को भारी पड़ी रिजर्व कोच से यात्री के सामान की चोरी, दिल्ली के कंज्यूमर कमिशन ने सुनाया 1.45 लाख रुपये हर्जाना देने का आदेश

दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग ने उत्तर रेलवे को एक पैसेंजर को 1.45 लाख रुपये देने का आदेश दिया है, जिसका बैग ट्रेन के एक आरक्षित कोच से चोरी हो गया था। आयोग ने कहा कि रेलवे यह कहकर जिम्मेदारी से बच नहीं सकता कि यात्री का सामान टिकट के तहत कवर नहीं होता। कमीशन ने यह भी कहा कि रेलवे स्टाफ घुसपैठ को रोकने में नाकाम रहा और यात्री को FIR दर्ज कराने में ठीक से मदद नहीं की। उपभोक्ता आयोग ने 6 अक्टूबर, 2026 को उत्तर रेलवे की अपील खारिज कर दी और जिला आयोग के आदेश को बरकरार रखा।

7 जून 2014 का है मामला

दिल्ली राज्य उपभोक्ता आयोग के आदेश के मुताबिक, अजय कुमार 7 जून, 2014 को महानंदा एक्सप्रेस से दिल्ली से पटना जा रहे थे। इस दौरान दो बिना इजाजत वाले लोग उनके आरक्षित कोच में घुसे और उनका ट्रॉली बैग चुरा लिया। बैग में कथित तौर पर 1.2 लाख रुपये की ज्वेलरी, कपड़े और दूसरा सामान था। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक, कुमार ने आरोप लगाया कि वह तुरंत कोच में TTE के पास गए और FIR दर्ज कराने के लिए कहा। लेकिन, FIR 23 अप्रैल, 2015 को ही दर्ज हुई। शिकायत करने वाले ने रेलवे अधिकारियों से संपर्क करना जारी रखा और बाद में पता चला कि मई 2017 में केस को अनट्रेस्ड मार्क कर दिया गया था। फिर उसने नुकसान के लिए हर्जाने की मांग करते हुए उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।

उत्तर रेलवे ने कहा कि सामान उसके पास बुक नहीं किया गया था और वह पैसेंजर की पर्सनल कस्टडी में था। उसने रेलवे एक्ट के सेक्शन 100 का भी हवाला दिया, जो रेलवे स्टाफ की लापरवाही साबित होने तक सामान के लिए रेलवे की जिम्मेदारी को सीमित करता है। उसने आगे कहा कि मामला चोरी से जुड़ा है और इसे क्रिमिनल लॉ के तहत निपटाया जाना चाहिए।

जिला उपभोक्ता आयोग ने 16 अप्रैल, 2024 को कुमार के पक्ष में फैसला सुनाया, जिसमें उत्तर रेलवे को 7 सितंबर, 2017 से 9% सालाना ब्याज के साथ 1.2 लाख रुपये और हर्जाने के तौर पर 25,000 रुपये देने का निर्देश दिया। रेलवे ने उस आदेश को राज्य आयोग के सामने चुनौती दी।

आयोग ने रेलवे को जिम्मेदार क्यों ठहराया?

अध्यक्ष जस्टिस संगीता ढींगरा सहगल और मेंबर बिमला कुमारी की बेंच ने कहा कि जिला आयोग का रेलवे को लापरवाही और सेवा में कमी के लिए जिम्मेदार ठहराना सही था। बेंच ने कहा कि मुद्दा सिर्फ यह नहीं था कि यात्री ने अपना सामान अपनी कस्टडी में रखा था या नहीं। बल्कि यह था कि रेलवे ने बिना इजाजत वाले लोगों को रिजर्व्ड कोच में घुसने से रोकने के लिए सही कदम उठाए थे या नहीं। कमीशन ने कहा, “जो यात्री रिजर्व्ड टिकट खरीदता है, वह अपनी निजी सुरक्षा और सामान की सुरक्षा और सिक्योरिटी का सही भरोसा पाने का हकदार है।”

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Insurance Claim: एलआईसी ने क्लेम किया रिजेक्ट, फोरम ने लगाई फटकार, अब चुकाने होंगे ₹10 लाख

Insurance Claim:  बढ़ती बीमारी के डर और मेडिकल खर्चों के बोझ से बचने के लिए अब लाइफ इंश्योरेंस करवाना लोगों की पसंद बन रही है। परिवार के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए लाइफ इंश्योरेंस काफी करवाते हैं, लेकिन ऐसे में अगर किसी व्यक्ति ने लाइफ इंश्योरेंस करवाया हो और पॉलिसीधारक की मौत हो जाए। फिर इंश्योरेंस कंपनी क्लेम खारिज कर दें तो ऐसी स्थिति में परिवार क्या करेगा? कुछ ऐसा ही मामला गाजियाबाद से सामने आया है। जहां पर जिला उपभोक्ता आयोग ने लाइफ इंश्योरेंस LIC ऑफ इंडिया को पॉलिसीहोल्डर के नॉमिनी को 30 दिनों के भीतर 10 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया है।

द टाइम्स ऑफ इंडिया के हवाले से मिली खबर के मुताबिक गाजियाबाद जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने LIC ऑफ इंडिया को आदेश दिया है कि वह पॉलिसीहोल्डर के नॉमिनी को 30 दिनों के भीतर 10 लाख रुपये का भुगतान करने के आदेश दिया है। इस रकम में डेथ क्लेम के तौर पर 9.9 लाख रुपये और मानसिक परेशानी व कानूनी खर्च के लिए मुआवजे के तौर पर 5,000 रुपये शामिल हैं।

दरअसल, गाजियाबाद की रहने वाली नीलम मारवाह ने 3 जनवरी, 2017 को शिकायत दर्ज कराई थी। उन्होंने आयोग के अध्यक्ष अनिल कुमार पुंडीर और सदस्य शैलजा सचान व आरपी सिंह को बताया कि उनके पति पवनीश मारवाह ने 27 नवंबर, 2013 को बीमा कंपनी से 9.95 लाख रुपये की सम एश्योर्ड वैल्यू वाली पॉलिसी खरीदी थी।

5 दिसंबर, 2014 को उनके पति बीमार पड़ गए और बाद में अस्पताल में उनकी मौत हो गई। ऐसे में बीमा कंपनी में पॉलिसी क्लेम करने के बाद LIC ने क्लेम का निपटारा करने से इनकार कर दिया। कंपनी ने नीलम को एक पत्र में बताया कि क्लेम इसलिए खारिज कर दिया गया क्योंकि उनके पति ने पॉलिसी लेते समय अपनी पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में जानकारी छिपाई थी।

LIC के वकील ने कहा कि शिकायतकर्ता का क्लेम मिलने पर बीमा कंपनी ने कागजात की जांच की और बीमा पॉलिसी की शर्तों के आधार पर क्लेम खारिज कर दिया। साथ ही, 30 मार्च, 2016 को क्लेम खारिज करने का नोटिस भी भेजा गया। इस फैसले से असंतुष्ट होकर कानपुर में बीमा कंपनी के क्षेत्रीय कार्यालय में अपील की गई, लेकिन 30 जुलाई, 2016 को उसे भी खारिज कर दिया गया।

पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में जानकारी न देने के आरोप को बेबुनियाद बताते हुए शिकायतकर्ता ने आयोग से राहत की मांग की।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेज़ों को देखने के बाद गाजियाबाद आयोग ने कहा कि बीमा अनुबंध पूरी ईमानदारी (utmost good faith) का अनुबंध होता है, लेकिन बीमा कंपनी केवल इसी सिद्धांत के आधार पर मनमाने ढंग से किसी क्लेम को खारिज नहीं कर सकती।

आयोग ने कहा, “जब कोई बीमा कंपनी यह आरोप लगाती है कि बीमा कराने वाले व्यक्ति ने स्वास्थ्य से जुड़ी जरूरी बातें छिपाई थीं, तो यह साबित करने की जिम्मेदारी उसी कंपनी की होती है कि बताई गई बीमारी असल में थी और पॉलिसी लेते समय वह बीमारी अहम थी और उससे जोखिम पर असर पड़ता था। कंपनी को यह भी साबित करना होगा कि बीमा कराने वाले व्यक्ति को उस बीमारी के बारे में पता था, उसने जान-बूझकर और धोखाधड़ी से ये बातें छिपाई थीं, और बताई गई बीमारी का व्यक्ति की मौत या बीमा से जुड़े जोखिम से अहम और सीधा संबंध था।” आयोग ने आगे कहा कि LIC पेश किए गए दस्तावेज़ों के आधार पर इन बातों को साबित करने में नाकाम रही है।

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₹12 लाख का सोलर पैनल और सिर्फ 2 घंटे का बैकअप ! नोएडा के इस कंज्यूमर को अब इंट्रेस्ट समेत वापस मिलेंगे पूरे पैसे

बिजली का बिल कम करने के लिए सोलर सिस्टम लगवाना नोएडा के कृष्ण यादव को काफी महंगा पड़ गया। करीब 12 लाख रुपये का सोलर सिस्टम लगवाने के बाद उन्हें उम्मीद थी कि इससे बिजली की जरूरत काफी हद तक पूरी हो जाएगी, लेकिन सिस्टम शुरू से ही ठीक से काम नहीं कर पाया। शुरुआत में करीब दो घंटे का बैकअप मिला और बाद में यह समय घटकर करीब एक घंटे रह गया। बार-बार शिकायत करने और इंजीनियर से जांच कराने के बाद भी समस्या दूर नहीं हुई। आखिरकार कृष्ण यादव ने जिला उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया, जहां सुनवाई के बाद आयोग ने कंपनी को पूरी रकम ब्याज समेत वापस करने का आदेश दिया।

करीब 12 लाख रुपये में खरीदा था सोलर सिस्टम

नोएडा के सेक्टर-91 स्थित ग्राम होशियारपुर निवासी कृष्ण यादव ने एआरएस इंटरप्राइजेज से स्मार्टन सोलर सिस्टम 15 केवीए खरीदने और लगवाने का अनुबंध किया था। कंपनी की ओर से दिए गए कोटेशन के आधार पर उन्होंने चॉइस फिनसर्व प्राइवेट लिमिटेड से 7 लाख 80 हजार रुपये का लोन कराया। इसके अलावा उन्होंने 4 लाख 20 हजार 600 रुपये नकद कंपनी को दिए। इस तरह सोलर सिस्टम के लिए कुल 12 लाख 600 रुपये का भुगतान किया गया। सिस्टम लगवाने के बाद जब इसका इस्तेमाल शुरू हुआ तो यह उम्मीद के मुताबिक काम नहीं कर पाया।

शुरू से ही नहीं मिला सही बैकअप

कृष्ण यादव के मुताबिक, घर पर सिस्टम लगने के बाद से ही इसमें परेशानी आने लगी थी। सिस्टम करीब दो घंटे का बैकअप देने के बाद बंद हो जाता था। उन्होंने इस समस्या की जानकारी कंपनी को दी, जिसके बाद कंपनी ने सर्विस इंजीनियर मनीष कुमार को जांच के लिए भेजा। इंजीनियर ने सिस्टम की गुणवत्ता में कमी की बात कही और उसे ठीक करने की कोशिश की। मरम्मत के बाद भी समस्या खत्म नहीं हुई और सिस्टम करीब एक घंटे का ही बैकअप दे पाया। इसके बाद वह फिर बंद हो गया। इससे साफ था कि केवल मरम्मत करने से भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो रहा था।

बार-बार शिकायत के बाद भी नहीं मिली मदद

मरम्मत के बाद दोबारा समस्या आने पर कृष्ण यादव ने डीलर से संपर्क किया, लेकिन उन्हें संतोषजनक समाधान नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने स्मार्टन पावर सिस्टम्स की कस्टमर केयर सर्विस से भी शिकायत की। उनका कहना था कि कंपनी से संपर्क करने और समस्या बताने के बावजूद सोलर सिस्टम ठीक नहीं हुआ। जब लगातार शिकायतों के बाद भी कोई समाधान नहीं निकला तो उन्होंने 11 मई 2025 को जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराई। उनका आरोप था कि उन्हें खराब या घटिया गुणवत्ता वाला पावर यूनिट दिया गया, जो खरीदने के बाद से ही सही तरीके से काम नहीं कर रहा था।

कंपनी ने नहीं रखा अपना पक्ष 

मामले की सुनवाई के दौरान कंपनी की ओर से कोई जवाब या काउंटर-क्लेम पेश नहीं किया गया। इसके बाद आयोग ने 10 अप्रैल 2026 को मामले में एकतरफा यानी ex-parte कार्यवाही जारी रखने का फैसला किया। आयोग ने शिकायतकर्ता की ओर से पेश किए गए दस्तावेज और लिखित बयान देखे। दूसरी तरफ से आरोपों को गलत साबित करने के लिए कोई सबूत पेश नहीं किया गया। आयोग ने माना कि शिकायत के बावजूद सोलर सिस्टम की समस्या का सही समाधान नहीं किया गया, जो सेवा में कमी के दायरे में आता है। इसके बाद 15 सितंबर को आयोग ने कंपनी को 30 दिनों के भीतर सिस्टम के लिए दी गई पूरी रकम 6 प्रतिशत ब्याज के साथ लौटाने का आदेश दिया। इसके अलावा कानूनी खर्च के तौर पर 5 हजार रुपये देने को भी कहा गया। रकम वापस मिलने के बाद कंपनी अपना सोलर सिस्टम वापस ले सकती है।

इस मामले से पता चलता है कि कोई महंगा घरेलू उपकरण या सोलर सिस्टम खरीदने के बाद अगर वह उम्मीद के मुताबिक काम नहीं करता और कंपनी शिकायत के बाद भी समस्या दूर नहीं करती, तो उपभोक्ता कानूनी मदद ले सकता है। ऐसे मामलों में खरीद से जुड़े बिल, भुगतान के कागज, लोन की जानकारी, शिकायत और सर्विस से जुड़े दस्तावेज संभालकर रखना भी काफी जरूरी होता है।

10 इंच की जगह 7 इंच का पिज्जा भेजना पड़ा भारी, ग्राहक की शिकायत पर मिला 10,520 रुपये का मुआवजा

सोचिए, आपने अपनी पसंद का पिज्जा ऑर्डर किया हो, उसकी पूरी कीमत चुकाई हो और डिलीवरी का इंतजार भी किया हो। लेकिन जब डिब्बा खुले तो सामने आया पिज्जा उम्मीद से काफी छोटा हो। उत्तराखंड के एक ग्राहक के साथ कुछ ऐसा ही हुआ, जब उसने 10 इंच का पिज्जा मंगाया, लेकिन उसे कथित तौर पर 7 इंच का पिज्जा मिला। आमतौर पर ऐसी स्थिति में लोग शिकायत करके या रिफंड मांगकर मामला खत्म कर देते हैं। लेकिन इस ग्राहक ने इसे सिर्फ छोटी सी गलती मानकर छोड़ने के बजाय अपनी शिकायत को आगे बढ़ाने का फैसला किया।

उसने पहले संबंधित प्लेटफॉर्म पर मामला उठाया और जब बात नहीं बनी तो उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया। मामला वहां पहुंचने के बाद सिर्फ पिज्जा के साइज का विवाद नहीं रहा, बल्कि ग्राहक के अधिकार और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर दी गई जानकारी के मुताबिक सामान मिलने की जिम्मेदारी का सवाल भी बन गया। अब इस मामले में आयोग का फैसला चर्चा में है।

रिफंड नहीं मिला तो बढ़ाया मामला

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, ग्राहक ने ऑनलाइन फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म से दो पिज्जा ऑर्डर किए थे। इनकी कुल कीमत ₹505 थी और ऐप पर पिज्जा का साइज 10 इंच बताया गया था। डिलीवरी मिलने के बाद ग्राहक ने पिज्जा का साइज देखा तो उसे वह काफी छोटा लगा। उसका आरोप था कि पिज्जा सिर्फ 7 इंच का था। उसने तुरंत ऐप के ग्राहक सहायता केंद्र पर शिकायत की और रिफंड की मांग की। शिकायत के बावजूद जब मामला हल नहीं हुआ, तो उसने आगे शिकायत करने का फैसला किया।

हेल्पलाइन से लेकर उपभोक्ता आयोग तक पहुंचा

ग्राहक ने पहले राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन में शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद उसने सीपीजीआरएएमएस के जरिए भी शिकायत की और संबंधित पक्षों को कानूनी नोटिस भेजा।

जब इन कोशिशों के बाद भी रिफंड नहीं मिला, तो उसने हरिद्वार जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में मामला दर्ज करा दिया।

डिलीवरी प्लेटफॉर्म ने दी ये दलील

सुनवाई के दौरान ऑनलाइन फूड डिलीवरी कंपनी ने कहा कि वह सिर्फ ग्राहक और रेस्टोरेंट के बीच एक माध्यम है। कंपनी के मुताबिक, पिज्जा बनाने, पैक करने और बेचने की जिम्मेदारी उसकी नहीं है।वहीं, संबंधित रेस्टोरेंट ने मामले में अपना जवाब दाखिल नहीं किया। इसके बाद आयोग ने उसके खिलाफ एकतरफा कार्रवाई की।

आयोग ने कंपनी की दलील नहीं मानी

आयोग ने शिकायतकर्ता और डिलीवरी प्लेटफॉर्म की ओर से पेश किए गए दस्तावेजों और हलफनामों की जांच की। इसमें पाया गया कि ग्राहक को मिला पिज्जा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बताए गए साइज से अलग था। आयोग ने यह भी माना कि शिकायत करने के बाद ग्राहक को रिफंड नहीं दिया गया। डिलीवरी प्लेटफॉर्म का यह कहना कि वह सिर्फ एक माध्यम है, आयोग को स्वीकार नहीं हुआ।

आयोग के अनुसार, ग्राहक का ऑर्डर स्वीकार करने, रेस्टोरेंट से तालमेल करने और उसे ग्राहक तक पहुंचाने में प्लेटफॉर्म की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इसलिए वह पूरी सेवा प्रक्रिया का हिस्सा है।

3 इंच छोटे पिज्जा को माना सेवा में कमी

आयोग ने कहा कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर जिस साइज का पिज्जा दिखाया गया था, ग्राहक को उसके मुताबिक पिज्जा नहीं मिला। 10 इंच की जगह 7 इंच का पिज्जा देना सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार माना गया। मामले की सुनवाई जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष गगन कुमार गुप्ता और सदस्य डॉ. अमरेश रावत व रंजना गोयल ने की।

₹505 के ऑर्डर पर मिलेंगे ₹10,520

ग्राहक ने पिज्जा के लिए ₹505 और ₹15 डिलीवरी शुल्क का भुगतान किया था। लेकिन आयोग के आदेश के बाद उसे सिर्फ पिज्जा की रकम वापस नहीं मिलेगी। आयोग ने फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म और रेस्टोरेंट को संयुक्त रूप से ₹10,520 देने का आदेश दिया है। यह रकम 45 दिनों के भीतर देनी होगी।

इसमें ₹520 पिज्जा और डिलीवरी शुल्क के लिए, ₹5,000 मानसिक और शारीरिक परेशानी के मुआवजे के तौर पर और ₹5,000 मुकदमे के खर्च के रूप में शामिल हैं।

यानी 10 इंच के पिज्जा की जगह 7 इंच का पिज्जा मिलने से शुरू हुआ विवाद आखिरकार ग्राहक को मूल ऑर्डर की कीमत से 20 गुना से भी ज्यादा रकम मिलने के आदेश तक पहुंच गया।

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कस्टमर ने ऑर्डर किया iPhone तो उसकी जगह भेज दिया Beard Oil, अब Flipkart और सेलर को देना होगा इतना जुर्माना

ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म Flipkart और उसपर मौजूद सेलर से जुड़े एक केस में उपभोक्ता अदालत ने सख्त रुख अपनाया है। आईफोन का ऑर्डर देने वाले एक ग्राहक को फोन की जगह बियर्ड ग्रोथ ऑयल डिलिवर करने के मामले में अदालत ने ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और सेलर को ग्राहक को 1.11 लाख रुपये से अधिक की रकम लौटाने के साथ-साथ 70000 हजार रुपये का मुआवजा और मुकदमे का खर्च देने का आदेश दिया है। पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, अतिरिक्त डीसीएफ, मुंबई ने इस महीने की शुरुआत में दिए अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि बिना किसी प्रभावी राहत के ग्राहक की शिकायतों को बार-बार बंद करना अनुचित व्यापार व्यवहार है।

क्या है पूरा मामला?

मुंबई के पवई इलाके के रहने वाले शिकायतकर्ता ने 22 अप्रैल 2023 को फ्लिपकार्ट के जरिए नो-कॉस्ट ईएमआई स्कीम पर 111793 रुपये में Apple iPhone 14 Pro (128 GB) खरीदा था। अलग से ऑर्डर किया गया चार्जर और कवर तो बायर को डिलीवर हो गया लेकिन अगले दिन डिलीवर हुए मुख्य पैकेज में महंगे स्मार्टफोन की जगह बियर्ड ग्रोथ ऑयल (दाढ़ी बढ़ाने वाला तेल) और पैकिंग सामग्री निकली। शिकायतकर्ता ने अप्रैल से मई 2023 के बीच फ्लिपकार्ट के कस्टमर सपोर्ट से बार-बार संपर्क किया और सभी जरूरी दस्तावेज जमा किए लेकिन कंपनी इस मुद्दे को सुलझाने में नाकाम रही। इसके बजाय कोई रिफंड या रिप्लेसमेंट दिए बिना शिकायत को बार-बार रिजॉल्व्ड मार्क करके बंद कर दिया गया।

उपभोक्ता आयोग ने क्या सुनाया फैसला?

उपभोक्ता आयोग ने कहा कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए आवश्यक भुगतान करके ऑर्डर दिया गया था। इसलिए फ्लिपकार्ट की यह जिम्मेदारी थी कि वह यह सुनिश्चित करे कि उपभोक्ता को वही उत्पाद मिले जो उसने ऑर्डर किया है और उपभोक्ता की शिकायतों के निवारण के लिए एक प्रभावी तंत्र प्रदान करे। फोरम ने कहा कि एक ई-कॉमर्स संस्था बिक्री को सुगम बनाने के बाद खुद को सौदे से अलग नहीं कर सकती, विशेष रूप से तब जब उपभोक्ता तुरंत रिपोर्ट करता है कि पूरी तरह से अलग उत्पाद डिलीवर किया गया है।

शिकायत की जांच करने, गलत तरीके से डिलीवर किए गए पार्सल को वापस लेने, रिप्लेसमेंट या रिफंड देने में विफलता और राहत दिए बिना शिकायत को बार-बार बंद करना स्पष्ट रूप से सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार है। कोर्ट ने पाया कि सेलर इंटरनेशनल वैल्यू रिटेल प्राइवेट लिमिटेड भी बार-बार अनुरोध के बावजूद उत्पाद डिलीवर करने और शिकायत को ठीक करने में विफल रहा। इसलिए प्लेटफॉर्म और सेलर दोनों संयुक्त और अलग-अलग रूप से ग्राहक को हुए नुकसान और असुविधा के लिए जिम्मेदार हैं।

कितना देना होगा मुआवजा?

उपभोक्ता फोरम ने फ्लिपकार्ट और सेलर को 45 दिनों के भीतर भुगतान करने का निर्देश दिया है। मूल राशि 111793 रुपये का रिफंड जिस पर 22 अप्रैल 2023 से वास्तविक भुगतान तक 9 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज देना होगा। मानसिक पीड़ा और उत्पीड़न के मुआवजे के रूप में ₹50000, अदालती कार्यवाही के खर्च के रूप में ₹20,000 शिकायतकर्ता को रिफंड करने पड़ेंगे।

Apple India को मिली राहत

मामले में एक पक्ष ऐपल इंडिया ने भी लिखित बयान दाखिल कर तर्क दिया था कि शिकायत कानून या तथ्यों के आधार पर पोषणीय नहीं है और इसे खारिज किया जाना चाहिए। ऐपल इंडिया ने कहा कि वह स्वतंत्र डीलरों और रीसेलर्स के माध्यम से ऐपल ब्रांडेड उत्पादों को बेचने के व्यवसाय में लगी हुई है और ग्राहकों के प्रति ऐसे स्वतंत्र विक्रेताओं के दायित्वों पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है। आयोग ने उनके तर्क को स्वीकार करते हुए ऐपल इंडिया के खिलाफ शिकायत को खारिज कर दिया। आयोग ने नोट किया कि विवाद केवल एक गलत उत्पाद की डिलीवरी से संबंधित था और निर्माता को पैकेजिंग, डिस्पैच या सेवा में कथित कमी से जोड़ने वाला कोई सबूत नहीं था।

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