ITR Filing Deadline: 31 अगस्त की ITR डेडलाइन छूटने पर क्या होगा? फिर कैसे भर सकते हैं रिटर्न, कितना देना पड़ेगा जुर्माना

अगर आपने अभी तक ITR दाखिल नहीं की है, तो आपके पास सिर्फ कुछ दिन बचे हैं। असेसमेंट ईयर 2026-27 के लिए कुछ टैक्सपेयर्स के लिए ITR फाइल करने की आखिरी तारीख 31 अगस्त 2026 है। समय पर रिटर्न दाखिल करने से लेट फीस और बकाया टैक्स पर लगने वाले ब्याज से बच सकते हैं।

अगर 31 अगस्त तक रिटर्न नहीं भर पाए, तो भी मामला खत्म नहीं होगा। आप 31 दिसंबर 2026 तक बिलेटेड ITR दाखिल कर सकते हैं। लेकिन इसके लिए लेट फीस देनी पड़ सकती है। साथ ही, कुछ मामलों में टैक्स लॉस को आगे कैरी फॉरवर्ड करने का फायदा भी छूट सकता है।

31 अगस्त की डेडलाइन उन कुछ टैक्सपेयर्स पर लागू होती है, जिन्हें ITR-3, ITR-4, ITR-5 या ITR-7 दाखिल करना है। इसमें ऐसे लोग शामिल हैं जिनकी बिजनेस या प्रोफेशन से आय है, लेकिन उनके खातों का टैक्स ऑडिट जरूरी नहीं है।

31 अगस्त की डेडलाइन छूट गई तो क्या होगा?

डेडलाइन निकल जाने का मतलब यह नहीं है कि अब ITR नहीं भर सकते। आप 31 दिसंबर 2026 तक बिलेटेड रिटर्न दाखिल कर सकते हैं। हालांकि, अगर उससे पहले आपका असेसमेंट पूरा हो जाता है, तो उसके बाद रिटर्न दाखिल नहीं किया जा सकता।

देरी से ITR भरने पर लेट फीस भी लगती है। अगर आपकी कुल आय ₹5 लाख से ज्यादा है, तो ₹5,000 तक की लेट फीस लग सकती है। वहीं ₹5 लाख तक की कुल आय वालों के लिए यह फीस ₹1,000 है।

अगर आपका टैक्स भी बकाया है, तो उस पर 1% प्रति महीने या महीने के किसी हिस्से के लिए ब्याज लग सकता है। यह ब्याज इनकम टैक्स एक्ट की धारा 234A के तहत लगता है।

क्या देर से ITR भरने पर रिफंड मिलेगा?

हां, सिर्फ डेडलाइन चूकने से आपका टैक्स रिफंड खत्म नहीं हो जाता। अगर आपको रिफंड मिलना है, तो आप 31 दिसंबर 2026 तक बिलेटेड रिटर्न दाखिल करके उसे क्लेम कर सकते हैं।

लेकिन रिटर्न दाखिल करने के बाद उसे वेरिफाई करना जरूरी है। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने ई-वेरिफिकेशन के लिए 30 दिन का समय दिया है। रिटर्न वेरिफाई होने के बाद ही रिफंड की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

नुकसान को आगे एडजस्ट करने में दिक्कत

डेडलाइन के बाद ITR भरने का एक बड़ा नुकसान हो सकता है। यह लॉस को आगे कैरी फॉरवर्ड करने से जुड़ा है। मान लीजिए आपको बिजनेस, शेयर बाजार या F&O ट्रेडिंग में नुकसान हुआ है। आप इस नुकसान को आने वाले वर्षों की कमाई से एडजस्ट करके टैक्स बचा सकते हैं। लेकिन अगर आपने ITR समय पर दाखिल नहीं किया, तो कुछ तरह के नुकसान को आगे ले जाने का फायदा नहीं मिल सकता।

यानी सिर्फ लेट फीस का मामला नहीं है। देर से ITR भरने पर भविष्य में टैक्स बचाने का मौका भी जा सकता है।

ITR में गलती हो गई तो क्या करें?

अगर ITR दाखिल करने के बाद आपको कोई गलती दिखती है या कोई जानकारी छूट गई है, तो आप धारा 139(5) के तहत रिवाइज्ड रिटर्न दाखिल कर सकते हैं।

असेसमेंट ईयर 2026-27 के लिए आम तौर पर रिवाइज्ड रिटर्न 31 मार्च 2027 तक दाखिल की जा सकती है। हालांकि, अगर उससे पहले असेसमेंट पूरा हो जाता है, तो यह सुविधा खत्म हो सकती है। रिवाइज्ड रिटर्न दाखिल करने पर पुरानी रिटर्न की जगह नई रिटर्न मानी जाती है। इसे भी दोबारा वेरिफाई करना पड़ता है।

लेकिन एक बात ध्यान रखें। देर से ITR भरने की वजह से जो टैक्स लाभ पहले ही खो चुके हैं, रिवाइज्ड रिटर्न दाखिल करने से वे वापस नहीं मिलते। इसमें कुछ तरह के लॉस को आगे कैरी फॉरवर्ड करने का फायदा भी शामिल है।

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Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।

सीएम डॉ. मोहन यादव ने कैबिनेट के अहम फैसलों पर लगाई मुहर, प्रदेश के विकास के लिए 10 हजार 630 करोड़ रुपये मंजूर

सीएम डॉ. मोहन यादव ने कैबिनेट के अहम फैसलों पर लगाई मुहर, प्रदेश के विकास के लिए 10 हजार 630 करोड़ रुपये मंजूर

भोपाल। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 25 अगस्त को मध्यप्रदेश के विकास के लिए कई अहम फैसले लिए। उनके नेतृत्व में कैबिनेट ने प्रदेश के इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ्य, सायबर सुरक्षा और सामाजिक कल्याण को गति देने के लिए 10 हजार 630 करोड़ रुपये के महत्वपूर्ण प्रस्तावों को स्वीकृति दी। कैबिनेट ने मप्र सड़क विकास निगम द्वारा नाबार्ड इंफ्रॉस्ट्रक्चर डेवलपमेंट असिस्टेंस (निडा) से 4 हजार 600 करोड़ रुपये का ऋण प्राप्त किए जाने के लिए राज्य शासन द्वारा प्रत्याभूति (गारंटी) प्रदाय किए जाने का अनुमोदन दिया। सड़क कनेक्टिविटी को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से मध्यप्रदेश सड़क विकास निगम (एमपीआरडीसी) को 12 मार्गों के निर्माण के लिए नाबार्ड इंफ्रॉस्ट्रक्चर डेवलपमेंट अस्सिटेंस के माध्यम से 4,600 करोड़ रुपये के ऋण के लिए शासकीय गारंटी देने के प्रस्ताव का अनुमोदन किया गया।

इन मार्गों में भोपाल-विदिशा मार्ग, खलघाट-मनावर-मांगोद, मंदसौर-सीतामऊ-मप्र, सीतामऊ-बसई-सुवासरा, पूर्वी भोपाल बायपास 4-लेन मार्ग को 6-लेन मय पेव्ड, नीमच-मनासा-रामपुरा झालावाड मार्ग एसएस-7, इंदौर-देपालपुर मार्ग का 4-लेन मय पेव्हड शोल्डर, चापडा-नेवरी से देवास तक एसएच-64 का 2-लेन मय, दिनारा-दतिया,सेवड़ा मार्ग,आगर-सांरगपुर मार्ग, सोयत-माचलपुर-जीरापुर, राहतगढ़-खुरई से खिमलासा मार्ग तथा सुन्दरा- सिंहपुर-कोठी-बिरसिंहपुर-सेमरिया गोहदा-सिरमोर शामिल है।

 

राज्य की 22 प्रमुख सड़कों का स्वामित्व हस्तांतरण नाममात्र मूल्य पर 'मप्र सड़क विकास निगम' (एमपीआरडीसी) को किया जाएगा। इसके बदले निगम का संचालक मंडल राज्य सरकार के पक्ष में अपनी अंश पूंजी (शेयर) जारी करेगा। इस ऋण के ब्याज और ऋण का भुगतान हस्तांतरित मार्ग से प्राप्त टोल संग्रहण और अन्य स्त्रोतों से प्राप्त राशि से किया जाएगा। मध्यप्रदेश राजमार्ग निधि अधिनियम, 2012 में संशोधन किया जाकर इस मार्गों पर टोल संग्रहण और अन्य स्त्रोतों से प्राप्त राशि को सीधे निगम की आय माना जाएगा। स्वीकृत ऋण सीमा के भीतर मार्गों में परिवर्तन और नवीन मार्गों के चयन का अधिकार निगम के संचालक मंडल के पास रहेगा। परियोजना के तहत राशि का आहरण 'जस्ट इन टाइम' (जेआईटी) सिद्धांत के अनुसार केवल आवश्यकता पड़ने पर ही किया जाएगा।

 

सिवनी-बालाघाट मार्ग निर्माण पर फोकस-कैबिनेट ने सिवनी-बालाघाट 91.64 किमी मार्ग, 4-लेन मय पेव्हड शोल्डर के साथ निर्माण और अन्य आवश्यक कार्यों के लिए कुल 3,960 करोड़ 9 लाख रुपये का अनुमोदन दिया। स्वीकृति अनुसार मार्ग निर्माण के लिए हाईब्रिड एन्यूटी मॉडल (एचएएम) के मॉडल कंसेशन एग्रीमेंट के आधार पर परियोजना और वित्तीय लागत 3,458 करोड़ 93 लाख रुपये की स्वीकृति दी है। परियोजना निर्माण लागत का 40 प्रतिशत राशि 704 करोड़ 38 लाख रुपये राज्य बजट के माध्यम से और शेष 60 प्रतिशत 2,253 करोड़ 39 लाख रुपये संचालन अवधि में 15 वर्षों तक छः माही एन्यूटी के रूप में राज्य बजट के माध्यम से व्यय किया जाएगा।

निर्माण से पूर्व के कार्यकलाप (भू-अर्जन एवं अन्य कार्य) और सुपरविजन चार्जेस के लिए 501 करोड़ 16 लाख रुपये का भी अनुमोदन दिया है। सिवनी-बालाघाट मार्ग मध्यप्रदेश के दक्षिण-पूर्वी भाग में स्थित एक महत्वपूर्ण राज्य राजमार्ग-72 है, जो जिला मुख्यालय सिवनी को महत्वपूर्ण वन एवं खनिज क्षेत्र बालाघाट से जोड़ता है। यह मार्ग दो राष्ट्रीय राजमार्ग 44 (नागपुर-लखनादौन), राष्ट्रीय राजमार्ग 543 (गोंदिया-मण्डला) एवं राष्ट्रीय राजमार्ग 543 के (बालाघाट-भंडारा) मार्गों को भी जोड़ता है। यह मार्ग मलाजखंड तांबा परियोजना, भरवेली मैंगनीज़ माईन्स, कान्हा टाइगर रिज़र्व, पेंच टाईगर रिजर्व और छत्तीसगढ़ राज्य से संपर्क प्रदान करता है। बालाघाट खनिज एवं वन उत्पादों का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र है तथा सिवनी क्षेत्र कृषि, एवं पर्यटन का प्रमुख केंद्र है। यह मार्ग क्षेत्रीय आर्थिक विकास एवं लॉजिस्टिक कनेक्टिविटी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। पर्यटकों की आवाजाही में वृद्धि होने से कान्हा नेशनल पार्क, पेंच नेशनल पार्क सहित सिवनी तथा बालाघाट क्षेत्र की ग्रामीण एवं शहरी आबादी को लाभ मिलेगा। लगभग 8 से 10 लाख जनसंख्या को यह मार्ग बेहतर संपर्क प्रदान करेगा।

 

निर्धन और कमजोर वर्ग का होगा कल्याण-कैबिनेट ने सामाजिक न्याय एवं दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग की निर्धन और कमजोर वर्ग के सामाजिक और आर्थिक विकास से संबंधित  19 योजनाओं के वित्तीय वर्ष 2026 से 2031 तक निरन्तर संचालन के लिए 1 हजार 740 करोड़ रुपये की स्वीकृति दी है। यह योजनाएं समाज के गरीब, कमजोर, निर्धन, निराश्रित, वरिष्ठजनों, कन्या विवाह-निकाह सहायता, दिव्यांगजनों, नशा पीड़ितों एवं ट्रांसजेण्डर व्यक्तियों के सामाजिक, आर्थिक एवं समग्र विकास से संबंधित है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय निःशक्त पेंशन योजना, राष्ट्रीय परिवार सहायता योजना, मुख्यमंत्री कन्या अभिभावक पेंशन योजना, बहु विकलांग एवं मानसिक रूप से दिव्यांग व्यक्ति को आर्थिक सहायता योजना, अंध मूक बधिर शालाओं को अनुदान,अन्त्येष्टि सहायता योजना, मुख्यमंत्री निकाह योजना, अंधमूक बधिरों को वृत्तियां, विश्व विकलांग दिवस, दिव्यांजनों को आईटीआई प्रशिक्षण, दधीचि पुरस्कार योजना, कृत्रिम अंग उपकरण वितरण योजना, भारतीय कुष्ठ निवारण संघ को ब्लाक ग्रांट, दिव्यांगजनों के लिए बाधारहित वातावरण, अटल वयो अभ्युदय (एव्हीवायएवाय) योजना, माता-पिता भरण पोषण योजना, इंदिरा गांधी समाज सेवा पुरस्कार योजना, वरिष्ठ नागरिकों की राज्य परिषद, नशाबंदी कार्यक्रम और नशीली दवा की मांग में कमी लाने के लिये राष्ट्रीय कार्य योजना शामिल है।

 

मध्यप्रदेश धन्वंतरि स्वास्थ्य विश्वविद्यालय में भरे जाएंगे पद-कैबिनेट ने मध्यप्रदेश धन्वंतरि स्वास्थ्य विश्वविद्यालय उज्जैन के प्रभावी संचालन के लिए 154 नियमित पद, 1 संविदा पद और 89 आउटसोर्स के माध्यम से रखे जाने वाले व्यक्तियों इस प्रकार कुल 244 पदों-व्यक्तियों को रखे जाने की स्वीकृति दी है। पदों के वेतनमान, भर्ती पद्धति, सेवा शर्तों और पद-स्वरूप का परीक्षण वित्त विभाग एवं लागू विश्वविद्यालयीन परिनियम, अध्यादेश और सेवा नियमों के अनुसार की जाएगी। विश्वविद्यालय की स्थापना से प्रदेश में स्वास्थ्य विज्ञान शिक्षा प्रशासन का संस्थागत विकेन्द्रीकरण होगा।

इंदौर, उज्जैन, भोपाल, ग्वालियर, नर्मदापुरम और चंबल संभाग के 31 जिलों के अंतर्गत आने वाले स्वास्थ्य विज्ञान शिक्षण संस्थानों के लिए संबद्धता, निरीक्षण, परीक्षा और अन्य विश्वविद्यालयीन सेवाओं के लिए पृथक प्रशासनिक व्यवस्था उपलब्ध होने से निर्णय एवं सेवा प्रदायगी में अधिक समयबद्धता एवं उत्तरदायित्व सुनिश्चित किया जा सकेगा। पाठ्यक्रम, परीक्षा और मूल्यांकन प्रणाली के मानकीकरण, परीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता, समयबद्ध परिणाम एवं प्रमाण-पत्र प्रदाय तथा संस्थाओं के अकादमिक निरीक्षण की सुदृढ़ व्यवस्था से चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विज्ञान शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होगा। स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए गुणवत्तापूर्ण एवं सक्षम मानव संसाधन उपलब्ध कराने की राज्य की दीर्घकालीन क्षमता सुदृढ़ होगी।

 

राज्य कम्प्यूटर सेक्युरिटी इंसीडेंट-रेसपान्स ऑपरेशन सेन्टर को आर्थिक मदद-कैबिनेट ने राज्य कम्प्यूटर सेक्युरिटी इंसीडेंट-रेसपान्स ऑपरेशन सेन्टर की स्थापना से संबंधित योजना की वित्तीय वर्ष 2026-2027 से 2030-2031 तक निरंतर संचालन के लिए 80 करोड़ रुपये की स्वीकृति दी है। गतिविधियों के सुचारू संचालन के लिए प्रशासनिक, तकनीकी, परामर्श, इंसीडेंट रिस्पांस, फॉरेंसिक और एसओसी कार्य के लिए 25 नवीन पदों सहित अनुमानित वित्तीय लागत राशि 3.99 करोड़ रुपये की स्वीकृति दी है। इसके साथ ही पूर्व से स्वीकृत 21 मानव संसाधनों के वेतन पुनर्निर्धारण के लिए 3.24 करोड़ रुपये की स्वीकृति दी है।

एमपी-सीईआरटी के उपरोक्त स्वीकृत तकनीकी मानव संसाधनों को पीईएमटी फ्रेमवर्क अनुरूप प्रबंधन किया जाएगा। निर्णय अनुसार पीईएमटी फ्रेमवर्क में प्रिंसिपल कंसलटेंट से 5 पद, सीनियर कंसलटेंट से 8 एवं कंसलटेंट से 3 पदों को सरेंडर (अभ्यर्पण) किया जाकर इसका उपयोग एमपीसीईआरटी पद संरचना अंतर्गत सृजित किए जाने वाले नवीन पदों की आवश्यकताओं की पूर्ति की जाएगी। वर्तमान आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए एमपी-सीईआरटी अन्तर्गत अल्प-अवधि के लिए 50 हजार रुपये तक अधिकतम 2 विषय विशेषज्ञों की सेवाएं अनुबंधित की जाएंगी।

साथ ही प्रदेश में साइबर सिक्यूरिटी प्रशिक्षित मानव संसाधन की उपलब्धता में सकारात्मक भागीदारी बनाये रखने की दृष्टि से एमपीसीईआरटी में प्रतिवर्ष राष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित संस्थानों यथा एनएफएसयू-आईआईटी-एनआईटी-आईआईएसईआर/सीडीएसी आदि संस्थानों से उत्तीर्ण ग्रेजुएट इंजीनियर्स को मध्यप्रदेश कम्प्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम एमपीसीईआरटी में प्रति वर्ष एक वर्ष के लिए इंजीनियरिंग स्नातक उत्तीर्ण 10 प्रशिक्षुओं को 25 हजार रुपये प्रति माह का प्रशिक्षण भत्ते की दर से एक वर्ष के लिए साक्षात्कार के आधार पर नियुक्ति की जाएगी। प्रदेश में सायबर सुरक्षा घटनाओं के प्रभावी प्रबंधन, त्वरित प्रतिक्रिया, जोखिम न्यूनीकरण तथा महत्वपूर्ण शासकीय सूचना अवसंरचना की सुरक्षा के लिए राज्य स्तर पर मध्यप्रदेश कम्प्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम (एमपी-सीईआरटी) की स्थापना की गई है। वर्तमान समय में शासन की अधिकांश सेवाएं, नागरिक केंद्रित प्लेटफॉर्म, डिजिटल भुगतान प्रणालियां, डेटा भंडार, क्लाउड अवसंरचना तथा विभिन्न विभागों की महत्वपूर्ण सूचना प्रणालियां सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी पर आधारित हैं।

 

अतिथि गृह के उन्नयन और संचालन के लिए राशि स्वीकृत-कैबिनेट ने आवासीय आयुक्त कार्यालय मप्र भवन नई दिल्ली में संचालित विभिन्न कार्यक्रमों से संबंधित योजनाओं को 16वें वित्त आयोग की अवधि 01 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2031 तक निरंतर संचालन के लिए राजस्व एवं पूंजीगत मद की 250 करोड़ 67 लाख रुपये की स्वीकृति प्रदान की है। स्वीकृति अनुसार आवासीय आयुक्त कार्यालय, मध्यप्रदेश भवन, नई दिल्ली के लिए राजस्व एवं पूंजीगत मद में 191 करोड़ 828 लाख रुपये, ज्यूडिशियल स्टॉफ के लिए परिवहन व्यवस्था के लिए 1 करोड़ 55 लाख रुपये, विशेष आयुक्त कार्यालय, मप्र शासन, नई दिल्ली के लिए राजस्व एवं पूंजीगत मद में 6.593 करोड़ रुपये, मध्या लोक, मुम्बई कार्यालय के लिए 4.2655 करोड़ रुपये और विभागीय परिसम्पतियों का संधारण के लिए राजस्व मद में 1 करोड़ 76 लाख रुपये की स्वीकृति दी गई है। इसी तरह नई दिल्ली में प्रस्तावित मध्यांचल भवन के विस्तार निर्माण कार्य के लिए पूंजीगत मद में 44.5803 करोड़ रुपये और नई दिल्ली में प्रस्तावित कार्यालयों की स्थापना के लिए 10 लाख रुपये की स्वीकृति दी।

 

आपसी सहमति से भूमि क्रय नीति में संशोधन की स्वीकृति-कैबिनेट ने आपसी सहमति से भूमि क्रय नीति 12 नवम्बर 2014 में संशोधन की स्वीकृति दी है। इसके अनुसार संगणित पुनर्वास अनुदान के अतिरिक्त ग्रामीण क्षेत्र में स्थित निजी कृषि भूमि पर स्थापित स्थावर परिसंपत्तियों को छोड़कर कृषि भूमि के लिये कलेक्टर द्वारा जारी की गई गाईडलाईन की तत्समय प्रभावशील दर के अनुसार संगणित मूल्य से दौगुनी राशि भी पुनर्वास अनुदान के रूप में दी जाएगी। नीति के अनुरूप प्रारूपों में आवश्यक संशोधन कर विभाग अपने स्तर से जारी कर सकेगा और अतिरिक्त आवश्यक प्रारूपों को भी जारी कर सकेगा। सार्वजनिक हित की परियोजनाओं में भूमि का अर्जन, भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 के अंतर्गत किया जाता है जिसमें ग्रामीण क्षेत्र की कृषि भूमि के लिये वह कारक जिसके आधार पर बाजार मूल्य को गुणित किया जाना है।

मध्यप्रदेश राजपत्र अधिसूचना 24 अप्रैल 2026 से 1.00 के स्थान पर 2.00 किया गया है। इसे शीघ्र क्रियान्वित करने के लिए आपसी सहमति से भूमि क्रय नीति, 12 नवम्बर 2014 में संशोधन किया गया है। राज्य सरकार के विभिन्न विभागों-उपक्रमों को उनकी अधोसंरचना निर्माण कार्यों एवं विकास परियोजनाओं के क्रियान्वयन के लिए समय-समय पर निजी भूमि की आवश्यकता पड़ने पर भू-अर्जन की प्रक्रिया में लगने वाले अतिरिक्त समय और लागत को बचाने की दृष्टि से प्रतिफल का भुगतान करके भू-धारकों की आपसी सहमति से भूमि प्राप्त की जा सके तथा शासकीय परियोजनाओं को निर्धारित समयावधि में क्रियान्वित किए जाने के लिए राज्य शासन द्वारा “आपसी सहमति से भूमि क्रय नीति” 14 नवम्बर, 2014 से लागू की गई है।

 

कैबिनेट ने महिला टी-20 वर्ल्डकप क्रिकेट 2025 (ब्लाइंड) की 3 खिलाडियों को कुल प्रोत्साहन राशि 75 लाख रुपये और महिला खिलाड़ियों के 3 प्रशिक्षक को कुल प्रोत्साहन राशि 3 लाख रुपये इस तरह कुल 78 लाख रुपये की प्रतिपूर्ति प्रोत्साहन मद से करने की कार्योत्तर स्वीकृति प्रदान की है। महिला टी-20 वर्ल्डकप क्रिकेट 2025 (ब्लाइंड) 23 नवंबर 2025 कोलंबो (श्रीलंका) में नेपाल को पराजित कर स्वर्ण पदक जीतने पर उल्लेखनीय उपलब्धि के दृष्टिगत राज्य शासन द्वारा भारतीय विजेता टीम की सदस्य एवं मध्यप्रदेश की खिलाडी सुनिता सराठे (नर्मदापुरम), दुर्गा येबले (बैतूल) एवं सुषमा पटेल (दमोह) को 25-25 लाख रुपये, जिसमें से 10-10 लाख रुपये नगद एवं 15-15 लाख रुपये फिक्सड डिपाजिट के रूप में तथा महिला खिलाडियों के प्रशिक्षक सोनू गोलकर, ओमप्रकाश पाल और दीपक पाहड़े को एक-एक लाख रुपये इस प्रकार कुल 78 लाख रुपये की राशि प्रोत्साहन स्वरूप प्रदान करने की कार्योत्तर स्वीकृति दी गई।

Delhi Lakshmi Yojana First Installment: कंफर्म हो गया, 26 अगस्त को लक्ष्मी योजना की जारी होगी पहली किस्त, ऐसे चेक करें स्टेटस

Delhi Lakshmi Yojana First Installment: दिल्ली की महिलाओं के लिए एक बड़ी खुशखबरी सामने आई है। दिल्ली सरकार की महत्वाकांक्षी दिल्ली लक्ष्मी योजना की पहली किस्त 26 अगस्त को जारी होने जा रही है। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता बुधवार को एक भव्य कार्यक्रम के दौरान लाभार्थियों के खातों में 2500 रुपये की पहली किस्त ट्रांसफर करेंगी। इस योजना की शुरुआत दिल्ली में महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त, आत्मनिर्भर और स्वावलंबी बनाने के उद्देश्य से की गई है।

तालकटोरा स्टेडियम में भव्य कार्यक्रम, 2500 महिलाओं को मिलेगी किस्त

इस योजना की पहली किस्त जारी करने के लिए दिल्ली सरकार द्वारा तालकटोरा स्टेडियम में एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। यह कार्यक्रम 26 अगस्त की सुबह 11 बजे शुरू होगा। इस विशेष समारोह में लगभग 2500 महिलाओं को सांकेतिक रूप से पहली किस्त दी जाएगी। आपको बता दें कि दिल्ली लक्ष्मी योजना 1 अगस्त से प्रभावी हुई थी और अब तक इस योजना के तहत 6 लाख से अधिक महिलाओं ने अपना पंजीकरण कराया है।

2500 रुपये का पूरा गणित: बैंक खाते और एफडी/आरडी का नियम

दिल्ली लक्ष्मी योजना के तहत पात्र महिलाओं को हर महीने 2500 रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान की जानी है। ये मदद 1 सितंबर से लाभार्थियों के बैंक खातों में जमा होना शुरू हो जाएगी। हालांकि इस 2500 रुपये की राशि को पूरा का पूरा अकाउंट में नहीं भेजा जाएगा। बाय डिफॉल्ट 2500 रुपये में से 1500 रुपये लाभार्थी महिला के RD या फिक्स्ड डिपॉजिट (खाते में जमा किए जाएंगे। बाकी 1000 रुपये लाभार्थी के उस बैंक खाते में ट्रांसफर किए जाएंगे जो सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी वॉलेट से जुड़ा होगा। आरडी या एफडी में जमा की गई राशि पर 31 जुलाई 2029 तक लॉक-इन पीरियड लागू रहेगा।

अगर कोई लाभार्थी महिला चाहे तो वह पूरी 2500 रुपये की राशि को भी एफडी या आरडी में जमा करने का विकल्प चुन सकती है, जिस पर भी समान समय तक लॉक-इन पीरियड लागू रहेगा।

ऐसे चेक करें अपनी एप्लीकेशन का स्टेटस

अगर आपने दिल्ली लक्ष्मी योजना के लिए आवेदन किया है और अपने आवेदन की स्थिति देखना चाहते हैं, तो इन आसान स्टेप्स का पालन कर सकते हैं:

  • सबसे पहले दिल्ली लक्ष्मी योजना के आधिकारिक पोर्टल dly.delhi.gov.in पर जाएं।
  • होमपेज पर दिखाई दे रहे Track Application विकल्प पर क्लिक करें।
  • इसके बाद आपके सामने एक नया पेज खुलेगा, जहां आपको अपना पंजीकृत मोबाइल नंबर, जन्म तिथि और स्क्रीन पर दिखाई दे रहा कैप्चा डालना करना होगा।
  • सभी जानकारी भरने के बाद Sign In बटन पर क्लिक करें। इसके बाद आपके आवेदन का स्टेटस स्क्रीन पर प्रदर्शित हो जाएगा।

क्या अभी भी किया जा सकता है आवेदन?

जो महिलाएं अभी तक इस योजना में आवेदन नहीं कर सकी हैं, वे पोर्टल पर जाकर कभी भी आवेदन कर सकती हैं। दिल्ली लक्ष्मी योजना के लिए आवेदन प्रक्रिया पूरे साल खुली रहेगी। इसके लिए महिलाएं dly.delhi.gov.in/Account/Login पर जाकर आवेदन कर सकती हैं। हर महीने की अंतिम तारीख को उस महीने मिलने वाले आवेदनों के लिए कट-ऑफ तारीख माना जाएगा। इसके बाद स्वीकृत होने वाले पात्र आवेदनों को अगले महीने से योजना का लाभ दिया जाएगा।

कौन कर सकता है आवेदन? पात्रता और शर्तें

दिल्ली लक्ष्मी योजना का लाभ उठाने के लिए सरकार ने कुछ जरूरी पात्रता मापदंड तय किए हैं-

  • आवेदन जमा करने की तिथि पर महिला की आयु 21 से 60 वर्ष के बीच होनी चाहिए और वह अपने परिवार की सबसे बड़ी महिला सदस्य होनी चाहिए।
  • परिवार की वार्षिक आय 2.5 लाख रुपये से अधिक नहीं होनी चाहिए।
  • महिला दिल्ली की पंजीकृत मतदाता होनी चाहिए। इसके अलावा आवेदक, उसके पति या उसके माता-पिता में से कोई भी आवेदन की तिथि पर कम से कम 10 वर्षों से दिल्ली का निवासी होना चाहिए।
  • पिछले 12 महीनों के दौरान परिवार की बिजली की खपत 2400 यूनिट से अधिक नहीं होनी चाहिए।

कौन नहीं होगा पात्र?

  • सरकारी पेंशन या नियमित वित्तीय सहायता प्राप्त करने वाली महिलाएं इस योजना के लिए पात्र नहीं हैं।
  • आयकरदाता, जीएसटी भरने वाले, सरकारी कर्मचारी और जन प्रतिनिधि इस योजना से बाहर रखे गए हैं।
  • अगर आवेदक या उसके परिवार का कोई सदस्य चार पहिया वाहन का मालिक है या सरकार, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम, बोर्ड या स्थानीय निकाय में काम करता है तो लाभ नहीं मिलेगा।
  • जिन आवेदकों के 3 से अधिक बच्चे हैं या जिनका आपराधिक रिकॉर्ड है, वे भी इस योजना की शर्तों के तहत अपात्र हैं।

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मंत्रियों, सांसदों और विधायकों को नहीं मिलेगी बागवानी सब्सिडी; केंद्र सरकार ने बदले NHB के नियम, कितनी मिलती थी सब्सिडी, क्या था नियम?

Horticulture subsidy rules: केंद्र सरकार ने नेशनल हॉर्टिकल्चर बोर्ड (NHB) की कमर्शियल हॉर्टिकल्चर और कोल्ड स्टोरेज स्कीम के तहत आर्थिक मदद पाने के लिए योग्यता के नियमों को और सख्त कर दिया है। अब संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के अलावा मौजूदा मंत्रियों, सांसद (MP), विधायक (MLA), मेयर और जिला पंचायत अध्यक्षों समेत कई कैटेगरी के लोग योजना के लाभ से बाहर होंगे। नई गाइडलाइंस 21 अगस्त को जारी की गईं। इसी के साथ ये तुरंत लागू हो गई हैं।

बदली हुई गाइडलाइंस के अनुसार, केंद्र और राज्य सरकार के मंत्रालयों और विभागों, पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स, ऑटोनॉमस बॉडीज और लोकल बॉडीज के कर्मचारियों को भी NHB से आर्थिक मदद पाने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया है।

हालांकि, मल्टी-टास्किंग स्टाफ (MTS) और क्लास IV कर्मचारियों को इस नियम से छूट दी गई है। इसके अलावा, ₹10,000 या उससे अधिक की मासिक पेंशन पाने वाले रिटायर्ड कर्मचारी या पेंशनभोगी भी इस स्कीम के तहत योग्य नहीं होंगे।

बदली हुई गाइडलाइंस के तहत, इन कैटेगरी में आने वाले लोगों के परिवार के सदस्य स्कीम के तहत एक बार आर्थिक मदद ले सकते हैं, बशर्ते वे परिवार की नई परिभाषा के तहत योग्यता के नियमों को पूरा करते हों।

‘परिवार’ की इस परिभाषा में आवेदक के जीवनसाथी, माता-पिता, बेटे और बेटियाँ शामिल हैं। NHB स्कीम के तहत आर्थिक मदद के लिए प्रति परिवार केवल एक सदस्य ही योग्य है। गाइडलाइंस के अनुसार, परिवार के किसी भी सदस्य को दी गई आर्थिक मदद को पूरे परिवार को दी गई मदद माना जाएगा।

नियमों में क्यों करने पड़े बदलाव?

NHB ने कहा कि इन बदलावों का मकसद आर्थिक मदद को तर्कसंगत बनाना, फायदों का समान वितरण सुनिश्चित करना, सब्सिडी के दोहराव को रोकना और स्कीम को लागू करने की प्रक्रिया को ज़्यादा पारदर्शी और असरदार बनाना है। ये बदलाव कुछ हफ्ते पहले यह पता चलने के बाद किए गए हैं कि केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी और BJP सांसद लुंबा राम ने NHB स्कीम के तहत फायदा उठाया था।

मंत्री ने सब्सिडी लौटाया

कृषि राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने 28 जुलाई को संसद को बताया था कि चौधरी ने संबंधित बैंक को सब्सिडी की रकम लौटा दी थी। बैंक को निर्देश दिया गया था कि वह फंड NHB को वापस भेज दे। ‘हॉर्टिकल्चर फसलों के उत्पादन और कटाई के बाद के मैनेजमेंट के जरिए कमर्शियल हॉर्टिकल्चर का विकास’ नाम की इस स्कीम का मकसद बड़े पैमाने पर हॉर्टिकल्चर फसलों की कमर्शियल खेती (मुनाफे के लिए) को बढ़ावा देना है।

इस स्कीम में तीन तरह की सब्जियां जैसे शिमला मिर्च, खीरा और टमाटर और आठ तरह के फूल जैसे गुलाब, लिली और गुलदाउदी शामिल हैं। इस स्कीम के तहत प्रोजेक्ट की लागत का 50% सब्सिडी के तौर पर दिया जाता था, जिसकी अधिकतम सीमा प्रति परिवार 1 करोड़ रुपये तय की गई थी।

केंद्र सरकार की बागवानी सब्सिडी स्कीम का पूरा नाम Mission for Integrated Development of Horticulture (MIDH) है। यह केंद्र की अहम योजना है। यह फल, सब्जी, फूल, मसाले, मशरूम, नर्सरी आदि बागवानी गतिविधियों को कवर करती है। सब्सिडी काम और फसल के हिसाब से अलग होती है।

MLA Salary: कार, बंगला और लाखों के भत्ते! जानिए किस राज्य के विधायक कमाते हैं सबसे ज्यादा पैसा

MLA Salary: तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के सभी 234 विधायकों को सरकारी गाड़ी और हर महीने अतिरिक्त भत्ता देने के फैसले के बाद अब विधायकों की सैलरी और उन्हें मिलने वाली दूसरी सुविधाएं चर्चा में हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि विधायकों को वेतन के अलावा और क्या-क्या सुविधाएं मिलती हैं।

नई व्यवस्था के तहत तमिलनाडु के हर विधायक को एक सरकारी गाड़ी मिलेगी। इसके अलावा गाड़ी, पेट्रोल-डीजल और मेंटेनेंस के खर्च के लिए हर महीने 75,000 रुपये और एक सहायक (असिस्टेंट) के लिए 25,000 रुपये दिए जाएंगे। यानी हर विधायक को वेतन के अलावा हर महीने कुल 1 लाख रुपये की अतिरिक्त सुविधा मिलेगी। राज्य सरकार ने विधायकों के लिए हेल्थ इंश्योरेंस कवर भी बढ़ा दिया है।

इस फैसले के बाद देशभर में विधायकों की सैलरी और उन्हें मिलने वाली सुविधाओं को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। अलग-अलग राज्यों में विधायकों की बेसिक सैलरी, भत्तों और दूसरी सुविधाओं में काफी अंतर देखने को मिलता है।

यह राज्यों का विषय है

सांसदों की सैलरी और भत्ते संसद तय करती है, लेकिन विधायकों की सैलरी और उन्हें मिलने वाली सुविधाएं राज्य सरकार के दायरे में आती हैं। हर राज्य की विधानसभा अपने विधायकों के वेतन और भत्तों से जुड़े नियम और कानून तय करती है।

विधायकों के लिए कोई एकसमान राष्ट्रीय वेतन संरचना नहीं है। उनकी कमाई में सिर्फ बेसिक सैलरी ही शामिल नहीं होती। राज्य सरकारें विधायकों को विधानसभा क्षेत्र के खर्च, ऑफिस और स्टाफ, यात्रा, रहने, फोन और कम्युनिकेशन, इलाज और दूसरे आधिकारिक खर्चों के लिए अलग-अलग भत्ते भी देती हैं।

पीआरएस विधायी अनुसंधान के अनुसार, अधिकांश राज्यों में, विधायक कानून के माध्यम से अपने वेतन और भत्ते स्वयं निर्धारित करते हैं। इसके परिणामस्वरूप राज्यों में मूल वेतन और समग्र वेतन पैकेज दोनों में महत्वपूर्ण अंतर देखने को मिलता है।

किस राज्य में विधायकों को सबसे अधिक वेतन मिलता है?

2025 में द ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट के अनुसार, तेलंगाना राज्य में विधायकों को सबसे अधिक वेतन 2.75 लाख रुपये दिया जाता था। के. चंद्रशेखर राव के नेतृत्व वाली बीआरएस सरकार के दौरान सभी भत्तों सहित यह वेतन 1.25 लाख रुपये से बढ़कर 2.75 लाख रुपये हो गया था।

किस राज्य में विधायकों का वेतन सबसे कम है?

पीआरएस की एक रिपोर्ट के अनुसार, केरल के विधायकों का मासिक वेतन 70,000 रुपये है, जो देश के सबसे कम वेतन पाने वाले विधायकों में से एक है। उनके मासिक वेतन में 2,000 रुपये का निश्चित भत्ता, 25,000 रुपये का निर्वाचन क्षेत्र भत्ता, 20,000 रुपये का न्यूनतम मासिक यात्रा भत्ता, 11,000 रुपये का टेलीफोन भत्ता, 4,000 रुपये का सूचना भत्ता और 8,000 रुपये का उपभोग भत्ता शामिल है। उन्हें राज्य के भीतर यात्रा के लिए 1,000 रुपये और केरल के बाहर यात्रा के लिए 1,200 रुपये का दैनिक भत्ता भी मिलता है।

हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि कम वेतन वाले राज्य में विधायकों को कम सुविधाएं मिलती हैं। इन्हें आवास, सरकारी आवास, इलाज, यात्रा खर्च की भरपाई, स्टाफ सपोर्ट और दूसरी सुविधाएं अलग से दी जाती हैं।

विधायकों को वेतन के अलावा और क्या मिलता है?

विधायक का मासिक वेतन राज्य द्वारा विधायक पर किए जाने वाले कुल व्यय का केवल एक हिस्सा है।

सामान्य सुविधाओं और भत्तों में शामिल हैं:

  • निर्वाचन क्षेत्र के कार्यों से संबंधित खर्चों के लिए निर्वाचन क्षेत्र भत्ता
  • कर्मचारियों और प्रशासनिक खर्चों के लिए सेक्रेटेरियल या ऑफिस भत्ता
  • सरकारी यात्राओं के लिए यात्रा और परिवहन भत्ता
  • विधानसभा सत्रों और समिति की बैठकों में भाग लेने के लिए दैनिक भत्ता
  • राज्य की राजधानी में आवास
  • विधायक और कुछ राज्यों में परिवार के सदस्यों के लिए मेडिकल सुविधाएं
  • टेलीफोन और संचार भत्ता
  • वाहन सुविधाएं या वाहन भत्ता
  • कार्यालय उपकरण और स्टेशनरी भत्ता
  • विधानसभा छोड़ने के बाद पेंशन और अन्य लाभ, जो राज्य के नियमों पर निर्भर करते हैं
  • हरियाणा में आवास और कार सुविधा
  • कुछ राज्य पारंपरिक वेतन-भत्ते मॉडल से परे भी लाभ प्रदान करते हैं।

हरियाणा में विधायकों को सिर्फ सैलरी और भत्ते ही नहीं, बल्कि घर और गाड़ी खरीदने के लिए 1 करोड़ रुपये तक का लोन लेने की सुविधा भी मिलती है। यह लोन घर, मोटर कार या दोनों के लिए लिया जा सकता है।

इसके अलावा, विधायकों और उनके परिवार के सदस्यों के लिए मेडिकल ट्रीटमेंट की सुविधा भी दी जाती है। राज्य सरकार घर में बदलाव कराने और उसकी मरम्मत के लिए भी विधायकों को एडवांस राशि उपलब्ध कराती है।

ओडिशा का विधायक विकास कोष

एक और महत्वपूर्ण अंतर विधायक द्वारा व्यक्तिगत रूप से प्राप्त लाभों और उनके निर्वाचन क्षेत्र से जुड़े कोषों के बीच है।

ओडिशा की विधायक स्थानीय क्षेत्र विकास योजना के तहत वित्त वर्ष 2025-26 से हर विधानसभा क्षेत्र को 5 करोड़ रुपये दिए जाते हैं। इस राशि को सामान्य विकास, शिक्षा और सड़क से जुड़े कामों के लिए बांटा जाता है।

हालांकि, इस राशि को विधायक का वेतन या व्यक्तिगत लाभ नहीं माना जाना चाहिए। यह सार्वजनिक धन है जो विधायक द्वारा प्रतिनिधित्व किए जाने वाले निर्वाचन क्षेत्र में विकास कार्यों के लिए निर्धारित किया गया है।

विधायकों के वेतन में इतना अंतर क्यों होता है?

इस अंतर के पीछे कई कारण हैं:

  • आर्थिक रूप से मजबूत राज्यों के पास उच्च वेतन देने की वित्तीय क्षमता अधिक हो सकती है, हालांकि राजनीतिक प्राथमिकताएं भी मायने रखती हैं।
  • उच्च जीवन यापन और परिचालन लागत वाले राज्यों के विधायकों को अधिक भत्ते मिल सकते हैं।
  • अगर किसी विधायक का क्षेत्र बहुत बड़ा, दूर-दराज या कई इलाकों में फैला हुआ है, तो उसका यात्रा खर्च भी ज्यादा हो सकता है। ऐसे में उसे ज्यादा यात्रा भत्ता मिल सकता है
  • कई बार राज्य सरकारें और विधानमंडल विधायकों की मांगों के बाद समय-समय पर वेतन और भत्तों में संशोधन करते हैं।

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कम होंगे बैंकर्स के लिए अदालतों के चक्कर! बदला 135 पुराना बैंकिंग कानून, ये है 5 बड़ी बातें

संसद ने इस महीने की शुरुआत में बैंकर्स बुक एविडेंस बिल 2026 (Bankers’ Books Evidence Bill 2026) पारित किया। इसका लक्ष्य बैंक रिकॉर्ड से जुड़े 135 साल पुराने कानून को बदलना और पारंपरिक बैंकिंग रिकॉर्ड को डिजिटल दौर के अनुरूप बनाना है। इससे जुड़ा कानून पहली बार वर्ष 1891 में उस समय पास किया गया था, जब बैंकिंग रिकॉर्ड्स मुख्य रूप से कागजी रूप में रखे जाते थे। अब नए कानून में बैंक के डिजिटल रूप को अधिक महत्ता दी गई है और इससे कोर्ट-कचहरी के मामले में बैंकिंग रिकॉर्ड को हासिल करने तथा इस्तेमाल करने के तरीके में बदलाव होगा। यहां इस कानून से जुड़े पांच अहम पहलू दिए गए हैं। हालांकि इससे ग्राहकों के डेटा की प्राइवेसी को लेकर चर्चा शुरू हो सकती है।

डिजिटल बैंक रिकॉर्ड्स को सबूत के तौर पर मान्यता

सबसे बड़े बदलावों में से एक इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल रिकॉर्ड्स को बैंकर्स बुक्स के तौर पर मान्यता देना है। साल 1891 का कानून फिजिकल बुक्स, लेजर्स और दूसरे ट्रेडिशनल रिकॉर्ड्स को ध्यान में रखकर बनाया गया था। नए बिल के मुताबिक बैंकों को अधिकतर ट्रांजैक्शन और अकाउंट्स की जानकारी इलेक्ट्रॉनिक रूप में रखनी ही होगी। इसका मतलब है कि बैंकों के डिजिटल रिकॉर्ड किसी कानूनी मामले में साक्ष्य के तौर पर इस्तेमाल किए जा सकेंगे।

असली रिकॉर्ड की जगह सर्टिफाइड कॉपी का इस्तेमाल

नए बैंकिंग कानून में मौजूदा नियम को बनाए रखा गया है, जिसके तहत बैंक रिकॉर्ड की सर्टिफाइड कॉपी या उनके किसी हिस्से को सबूत के तौर पर पेश किया जा सकता है। यह इसलिए अहम है क्योंकि बैंकों के पास भारी-भरकम ट्रांजैक्शन डेटा होता है। हर कानूनी मामले के लिए मूल रिकॉर्ड पेश करने बहुत समय लग सकता है। हालांकि अब नई व्यवस्था के तहत असली बैंकर बुक के बजाय सर्टिफाइड कॉपी से काम चल जाएगा, जिससे अदालतों के लिए बैंक ट्रांजैक्शन की जांच करना आसान हो जाएगा। हालांकि इसमें ऐसे प्रावधान भी किया गया है जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि रिकॉर्ड भरोसेमंद हैं।

कानूनी एजेंसियों की ग्राहकों के खातों की जानकारी मांगना

इस बिल में एक प्रावधान है जिसे लेकर बहस छिड़ सकती है। इसके तहत लॉ एंफोर्समेंट एजेंसियां किसी ग्राहक के बैंक अकाउंट की जानकारी मांग सकते हैं। इस बिल में कुछ खास रैंक के पुलिस अधिकारियों को बिना किसी अदालती आदेश के सीधे बैंक से ही बैंकिंग अकाउंट की जानकारी हासिल करने का अधिकार मिला है। कुछ मामलों में बैंकों को इसके बारे में ग्राहकों को भी बताना होगा लेकिन किसी जांच, वित्तीय अपराध या नेशनल सिक्योरिटीज से जुड़े मामले में ऐसी कोई बाध्यता नहीं है।

बैंक अधिकारियों को बार-बार कोर्ट में पेश होने से राहत

नए बिल में बैंक अधिकारियों को ऐसी स्थितियों में राहत दी गई है, जब उनके इंस्टीट्यूशंस किसी कानूनी कार्यवाही में सीधे तौर पर शामिल न हों। किसी अधिकारी को बैंक के रिकॉर्ड पेश करने या उनमें शामिल लेन-देन को साबित करने के लिए कोर्ट में पेश होने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। हालांकि रिकॉर्ड की सत्यता पर संदेह या जांच के आदेश का पालन नही होने की स्थिति में कोर्ट रिकॉर्ड पेश करने का आदेश दे सकता है। इसका लक्ष्य बैंक अधिकारियों पर रूटीन बैंकिंग रिकॉर्ड से जुड़े कोर्ट केस में बार-बार पेश होने का बोझ कम करना है।

फाइनेंस सेक्टर की दूसरी एंटिटीज तक बढ़ा दायरा

नए बिल से केंद्र सरकार को इसके प्रावधान फाइनेंशियल सेक्टर दूसरी एंटिटीज या क्लास ऑफ एंटिटीज जैसे कि NBFC (नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनीज), पेंशन फंड्स, बीमा कंपनियां इत्यादि पर लागू करने का अधिकार मिलता है। इन एंटिटीज पर कानून लागू करते समय शर्तें, छूट या बदलाव भी तय कर सकती है।

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Mutual Fund vs EPF vs PPF vs NPS: इमरजेंसी में पैसों की जरूरत? जानिए किस निवेश से पैसा सबसे जल्दी निकलता है

Mutual Fund vs EPF vs PPF vs NPS: जब अचानक पैसों की जरूरत पड़ जाए, तो सिर्फ रिटर्न मायने नहीं रखता। यह भी उतना ही जरूरी है कि पैसा आपके बैंक खाते में कितनी जल्दी पहुंचे। किसी निवेश में रकम अगले कारोबारी दिन मिल सकती है। कुछ योजनाओं में कई दिन या हफ्ते भी लग सकते हैं। ऐसे में अगर आप रिटायरमेंट के लिए निवेश कर रहे हैं, तो हर स्कीम का विड्रॉल टाइमलाइन जानना जरूरी है।

आनंद राठी वेल्थ के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर जसमीत सिंह के मुताबिक, हर निवेश का मकसद अलग होता है। लिक्विड और शॉर्ट ड्यूरेशन डेट म्यूचुअल फंड सबसे ज्यादा लिक्विड माने जाते हैं, जबकि EPF, PPF और NPS को लंबे समय के निवेश के लिए बनाया गया है।

सबसे पहले एक नजर में विड्रॉल टाइमलाइन

निवेश विकल्प
पैसा मिलने का समय

लिक्विड/ओवरनाइट म्यूचुअल फंड
अगले कारोबारी दिन

इक्विटी म्यूचुअल फंड1-3 कारोबारी दिन
NPST+2
EPF3-5 दिन (ऑनलाइन), अधिकतम 20 दिन
PPFआमतौर पर कुछ कारोबारी दिन

NPS में T+2 में प्रोसेस हो सकता है विड्रॉल

नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) का विड्रॉल टाइमलाइन सबसे साफ माना जाता है। PFRDA ने सितंबर 2022 में एग्जिट विड्रॉल का समय T+4 से घटाकर T+2 कर दिया था। इसका मतलब है कि जरूरी मंजूरी मिलने के बाद विड्रॉल दो कारोबारी दिनों के भीतर प्रोसेस हो सकता है। हालांकि, रिटायरमेंट पर एन्युटी खरीदने जैसी प्रक्रिया होने पर पूरा पैसा तुरंत खाते में नहीं आता।

आंशिक निकासी के लिए भी नियम तय हैं। NPS में अपनी जमा राशि का अधिकतम 25% तक आंशिक विड्रॉल किया जा सकता है। इसके लिए तय शर्तें पूरी करनी होती हैं।

PPF में तय T+1 या T+2 नियम नहीं

पब्लिक प्रोविडेंट फंड (PPF) में कोई तय T+1 या T+2 भुगतान नियम नहीं है। निकासी की अनुमति मिलने के बाद बैंक या पोस्ट ऑफिस में आवेदन देना होता है। इसके बाद रकम संबंधित संस्था की प्रोसेसिंग के अनुसार खाते में आती है।

बैंक वाले PPF खातों में आमतौर पर कुछ कारोबारी दिनों में पैसा मिल जाता है। हालांकि, समय बैंक, ब्रांच और ऑनलाइन या ऑफलाइन आवेदन पर निर्भर करता है। जसमीत सिंह के मुताबिक, PPF में पांच वित्तीय वर्ष पूरे होने के बाद ही साल में एक बार आंशिक निकासी की जा सकती है।

EPF में 3-5 दिन में भी मिल सकता है पैसा

EPF में 2026 के बाद प्रक्रिया पहले से तेज हुई है। नए Employees’ Provident Funds Scheme, 2026 के तहत पूरी तरह सही क्लेम का निपटारा 20 दिनों के भीतर करना होगा। अगर बिना वजह देरी होती है, तो संबंधित अधिकारी पर 12% सालाना पेनल ब्याज भी लगाया जा सकता है।

साथ ही, ऑटोमेटेड प्रोसेसिंग के तहत कई ऑनलाइन क्लेम लगभग 3 दिन में भी निपटाए जा रहे हैं। हालांकि, आधार-UAN लिंकिंग, नियोक्ता की जानकारी या दूसरे वेरिफिकेशन की वजह से समय 2-3 हफ्ते तक भी जा सकता है।

म्यूचुअल फंड सबसे तेज विकल्पों में शामिल

अगर सिर्फ जल्दी पैसा निकालना प्राथमिकता है, तो ओपन-एंडेड म्यूचुअल फंड सबसे आसान विकल्पों में गिने जाते हैं। AMFI के मुताबिक, कारोबारी दिनों में रिडेम्प्शन करने पर आमतौर पर पैसा 1 से 3 कारोबारी दिनों में मिल जाता है। लिक्विड और ओवरनाइट फंड में यह अगले कारोबारी दिन भी आ सकता है।

इक्विटी फंड में आमतौर पर लिक्विड फंड की तुलना में थोड़ा ज्यादा समय लगता है।

किस स्कीम में सबसे ज्यादा पाबंदियां हैं?

स्कीमनिकासी की स्थिति
म्यूचुअल फंडसबसे आसान
EPFतय उद्देश्यों के लिए
PPFसीमित निकासी
NPS Tier-1सबसे ज्यादा नियम

NPS Tier-1 में निकासी सिर्फ तय परिस्थितियों में होती है। वहीं PPF और EPF में भी आंशिक निकासी के अपने नियम हैं।

निवेशकों के लिए सबसे जरूरी सीख

सबसे जल्दी पैसा देने वाला विकल्प हमेशा सबसे अच्छा रिटायरमेंट निवेश नहीं होता। म्यूचुअल फंड लिक्विड हैं, लेकिन बाजार के उतार-चढ़ाव से जुड़े रहते हैं। PPF सरकार की गारंटी वाली सुरक्षा देता है, जबकि NPS पूरी तरह रिटायरमेंट को ध्यान में रखकर बनाया गया है।

जसमीत सिंह की सलाह है कि कम से कम 6 महीने के खर्च ऐसी जगह रखें, जहां जरूरत पड़ने पर तुरंत पैसा मिल सके। इससे PPF, EPF या NPS जैसे लंबे समय के निवेश को बीच में तोड़ने की नौबत नहीं आएगी।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

मुसीबत में कौन सा फंड देगा आपका साथ? जानिए EPF, NPS, PPF और म्यूचुअल फंड्स से निकासी की पूरी टाइमलाइन

Retirement Options Withdrawal Timelines: रिटायरमेंट फंड या लंबी अवधि का पोर्टफोलियो बनाते समय हम अक्सर सिर्फ ब्याज दर या मिलने वाले रिटर्न पर ध्यान देते हैं। लेकिन इमरजेंसी के समय सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह होता है कि रिडेम्पशन या विदड्रॉल रिक्वेस्ट डालने के बाद पैसा आपके बैंक खाते में कितनी जल्दी आता है?

कुछ ऑप्शन जहां 24 से 48 घंटे में पैसे ट्रांसफर कर देते हैं, वहीं कुछ में हफ्तों का समय लग जाता है। आनंद राठी वेल्थ लिमिटेड के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर जसमीत सिंह के मुताबिक, ‘लिक्विड और इलिक्विड इंस्ट्रूमेंट्स के अंतर को समझना जरूरी है। क्योंकि हर निवेश तुरंत पैसे देने के लिए नहीं बना होता।’

आइए जानते हैं भारत के 4 सबसे लोकप्रिय निवेश विकल्पों EPF, NPS, PPF और Mutual Funds की निकासी टाइमलाइन और उनके नियमों का पूरा गणित।

1. Mutual Funds: सबसे तेज और आसान निकासी (1 से 3 दिन)

अगर आपको तुरंत और बिना किसी शर्त के पैसे की जरूरत है, तो ओपन-एंडेड म्यूचुअल फंड सबसे बेहतर विकल्प साबित होते हैं। लिक्विड और ओवरनाइट फंड्स का पैसा कट-ऑफ टाइम के आधार पर T+1 (अगले वर्किंग डे) या उसी दिन क्रेडिट हो जाता है। इक्विटी और अन्य डेट फंड्स का पैसा 1 से 3 कार्य दिवसों (T+1 to T+3) में बैंक अकाउंट में आ जाता है।

इसमें पैसा निकालने के लिए किसी विशेष कारण (जैसे- बीमारी, शादी या पढ़ाई) की आवश्यकता नहीं होती। वैसे ये मार्केट-लिंक्ड होते हैं, इसलिए NAV में उतार-चढ़ाव का जोखिम बना रहता है।

2. NPS (नेशनल पेंशन सिस्टम): T+2 सेटलमेंट टाइमलाइन

राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली में क्लेम प्रोसेसिंग की समयसीमा को काफी सुधारा गया है। सितंबर 2022 से PFRDA ने NPS एग्जिट विदड्रॉल की समयसीमा T+4 से घटाकर T+2 (2 सेटलमेंट डेज) कर दी है। हालांकि, पूरा फंड ट्रांसफर होने की प्रक्रिया में एन्युटी खरीदने के नियम भी लागू होते हैं।

एनपीएस टियर-1 खाते से आप केवल अपने योगदान का अधिकतम 25% ही निकाल सकते हैं। इसके लिए विशिष्ट कारणों (जैसे- बीमारी, घर, बच्चों की पढ़ाई) का होना अनिवार्य है।

3. कर्मचारी भविष्य निधि(EPF): 3 दिन से 20 दिन की समयसीमा

जून 2026 में लागू नए कर्मचारी भविष्य निधि योजना, 2026 के तहत ईपीएफओ ने क्लेम सेटलमेंट के नियमों को सख्त और तेज किया है। पूरी तरह से सही पाए गए क्लेम को निपटाने के लिए 20 दिनों की वैधानिक समयसीमा तय की गई है। अगर बिना किसी कारण 20 दिनों से अधिक देरी होती है, तो कमिश्नर के वेतन से 12% वार्षिक ब्याज की दर से हर्जाना वसूला जा सकता है। ऑनलाइन और ऑटोमेटेड सिस्टम के जरिए योग्य क्लेम 3 से 5 दिनों में सेटल हो जाते हैं।

ईपीएफ से केवल तय कारणों जैसे- मेडिकल, शादी, घर आदि के लिए ही आंशिक निकासी संभव है। अगर आधार-UAN लिंकिंग या एंप्लॉयर वेरिफिकेशन में कोई गड़बड़ी हो, तो पैसे आने में 2 से 3 हफ्ते का समय लग सकता है।

4. पब्लिक प्रॉविडेंट फंड(PPF): कोई निश्चित T+2 वादा नहीं

पब्लिक प्रॉविडेंट फंड में पैसा निकालने की कोई केंद्रीय ऑनलाइन T+1 या T+2 व्यवस्था नहीं है। आवेदन करने के बाद बैंक या पोस्ट ऑफिस की आंतरिक प्रक्रिया के आधार पर 2 से 5 कार्य दिवसों में पैसा अकाउंट में आता है। पीपीएफ में 5 वित्तीय वर्ष पूरे होने के बाद ही साल में केवल एक बार आंशिक निकासी की अनुमति होती है, जो कि पात्र बैलेंस के एक तय हिस्से तक ही सीमित रहती है।

EPF vs NPS vs PPF vs Mutual Funds किसमें कितना समय और कितनी छूट?

EPF vs NPS vs PPF vs Mutual Funds किसमें कितना समय और कितनी छूट?

एक्सपर्ट्स की ये है सबसे जरूरी सलाह

रिटायरमेंट पोर्टफोलियो बनाते समय केवल एक ही इंस्ट्रूमेंट पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। आनंद राठी वेल्थ के जसमीत सिंह सलाह देते हैं कि, ‘निवेशकों को अपने कम से कम 6 महीने के खर्च का इमरजेंसी फंड आसानी से सुलभ विकल्पों जैसे लिक्विड म्यूचुअल फंड या बैंक एफडी में रखना चाहिए, ताकि अनिश्चितता के समय लंबे समय के लिए किए गए EPF, PPF या NPS निवेश को समय से पहले न तोड़ना पड़े।’

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

अंग्रेजों ने भारत से लूटे 200 ट्रिलियन डॉलर! कभी दुनिया की 27% GDP था भारत, जानिए यहां से कितना लेकर गए

भारत और 15 अगस्त को अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। देश को 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से आजादी मिली थी। लेकिन आजादी मिलने के बाद देश को कई समस्याओं का सामना करना पड़ा था। आजादी के बाद देश की अर्थव्यवस्था बेहद कमजोर स्थिति में थी। अंग्रेजों ने करीब 200 साल तक भारत के संसाधनों का भरपूर इस्तेमाल अपने लिए किया। वहीं करीब 200 साल के ब्रिटिश शासन के दौरान भारत के संसाधनों और संपदा का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल ब्रिटेन के हितों के लिए किया गया।

न्यूज 18 के मुताबिक, अर्थशास्त्रियों के पुराने आकलनों के मुताबिक, 1765 से 1938 के बीच ब्रिटिश क्राउन और ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत से करीब 45 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति बाहर ले गई। लंबे समय तक चले इस आर्थिक शोषण का असर भारत की आर्थिक स्थिति पर पड़ा और आजादी के समय देश को कई बड़ी आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

नेहरू के सामने बड़ी समस्या

1947 के बाद पीएम जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती कमजोर अर्थव्यवस्था को संभालना, उद्योगों को बढ़ावा देना और देश में बुनियादी ढांचे का विकास करना था। लगभग दो शताब्दियों के औपनिवेशिक शासन के बाद भारत को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए सरकार को लंबे समय तक बड़े स्तर पर काम करना पड़ा।

करीब 200 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति गई बाहर

पुराने अनुमानों को अगर आज की आर्थिक स्थिति के हिसाब से देखा जाए और उनमें महंगाई, निवेश पर मिलने वाले रिटर्न और मौजूदा बाजार मूल्य को शामिल किया जाए, तो भारत से बाहर गई संपत्ति की अनुमानित कीमत 2026 में करीब 200 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है। ये आंकड़ा बताते हैं कि ब्रिटिश शासन में भारत की संपदा बाहर जाती रही, जिससे आजादी के समय देश की अर्थव्यवस्था कमजोर हो गई।

‘काउंसिल बिल्स’ बड़ा तरीका

भारत से पैसा बाहर ले जाने का एक बड़ा तरीका ‘काउंसिल बिल्स’ व्यवस्था थी। 1765 से पहले ईस्ट इंडिया कंपनी भारत से कपड़ा, मसाले और शोरा खरीदने के लिए ब्रिटेन से लाया गया सोना-चांदी इस्तेमाल करती थी। लेकिन बंगाल में टैक्स वसूलने का अधिकार मिलने के बाद कंपनी ने तरीका बदल दिया। इसके बाद भारत से मिले टैक्स के पैसे से ही भारतीय सामान खरीदा जाने लगा और इस तरह भारत की कमाई का बड़ा हिस्सा ब्रिटेन पहुंचने लगा।

  1. टैक्स वसूली: भारतीय किसानों और व्यापारियों से सीधे टैक्स लिया जाता था।
  2. टैक्स से खरीदारी: ब्रिटिश सरकार टैक्स से जुटाए गए राजस्व का करीब एक-तिहाई हिस्सा भारतीय सामान खरीदने में इस्तेमाल करती थी, जिसे बाद में ब्रिटेन भेज दिया जाता था।
  3. बिना असली भुगतान: भारतीयों को उनके ही टैक्स के पैसे से भुगतान किया जाता था, जिससे ब्रिटेन को भारत का कीमती सामान लगभग मुफ्त में मिलता था।

GDP में आई गिरावट

ब्रिटिश शासन के दौरान भारत की आर्थिक स्थिति में बड़ा बदलाव आया। 1700 के आसपास भारत का वैश्विक GDP में हिस्सा करीब 27% बताया जाता है, लेकिन 1947 तक यह घटकर 3% से भी कम रह गया। ब्रिटिश नीतियों का असर भारत के कपड़ा उद्योग पर भी पड़ा। भारतीय कपड़ों पर ब्रिटेन में भारी टैक्स लगाया गया, जबकि ब्रिटिश सामान भारत में आसानी से बिकने लगा। इससे ढाका, मुर्शिदाबाद और सूरत जैसे पुराने औद्योगिक केंद्रों को बड़ा नुकसान हुआ। काम कम होने के बाद कई कारीगर और बुनकर खेती पर निर्भर हो गए और भारत धीरे-धीरे तैयार सामान के बजाय कपास, अफीम और नील जैसी कच्ची उपज के निर्यातक देश के रूप में बदल गया।

दूसरे विश्व युद्ध में हुआ नुकसान

1858 के बाद भी भारत की कमाई का बड़ा हिस्सा ब्रिटिश सरकार से जुड़े खर्चों पर ही लगाया जाता रहा। ‘होम चार्ज’ के तहत भारतीय करदाताओं के पैसों से ब्रिटिश अधिकारियों की पेंशन, रेलवे निवेश पर ब्याज और विदेशों में ब्रिटिश सेना के अभियानों का खर्च उठाया जाता था। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान यह आर्थिक दबाव और बढ़ गया। युद्ध के खर्च और कर्ज का असर भारत में महंगाई और खाद्य संकट के रूप में दिखाई दिया। लंबे समय तक चले इस आर्थिक बोझ के कारण 1947 में आजादी मिलने तक भारत की अर्थव्यवस्था बेहद कमजोर स्थिति में पहुंच चुकी थी।

आज दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल भारत

आजादी के समय भारत की नई सरकार के सामने पैसों और संसाधनों की बड़ी कमी थी। देश में गरीबी और खाद्य संकट गंभीर था, उद्योग कमजोर हो चुके थे और विभाजन के बाद बड़ी संख्या में आए शरणार्थियों के पुनर्वास की जिम्मेदारी भी सरकार पर थी। सीमित सरकारी खजाने के बावजूद सड़कों, बिजली, सिंचाई और दूसरी जरूरी सुविधाओं के विकास पर काम शुरू करना पड़ा। लेकिन, आजादी के बाद के दशकों में भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में लगातार प्रगति की और आज वह दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। देश अब लंबे समय के विकास लक्ष्यों पर ध्यान देते हुए अपनी आर्थिक ताकत को और बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

इंडियन आर्मी में अग्निवीर बनना गल्फ जाने से बेहतर…जानिए गोरखा भर्ती में अड़ंगा लगाना नेपाल को कैसे पड़ रहा भारी

भारतीय सेना प्रमुख की काठमांडू यात्रा (16 अगस्त) से ठीक पहले नेपाल के पोखरा में पूर्व गोरखा सैनिकों और उनके समर्थकों ने एक बड़ा विरोध प्रदर्शन किया है। इन पूर्व सैनिकों की मुख्य मांग है कि भारत सरकार अपनी अग्निपथ योजना के तहत नेपाली युवाओं को भारतीय सेना में भर्ती करने की प्रक्रिया को तुरंत फिर से शुरू करे। हमारी सहयोगी वेबसाइट फर्स्टपोस्ट के एक एक्सप्लेनर आर्टिकल के मुताबिक यह प्रदर्शन बुधवार को इंडियन एक्स-सर्विसमेन गोरखा ब्रिगेड नेपाल पोखरा द्वारा आयोजित किया गया था। प्रदर्शनकारियों ने पोखरा स्टेडियम से कास्की जिले के जिला प्रशासन कार्यालय तक रैली निकाली और बाद में नेपाल की फेडरल गवर्नमेंट को दो सूत्री ज्ञापन सौंपा। इस ज्ञापन में अग्निवीर भर्ती को तत्काल बहाल करने और अपने नाम में सैनिक शब्द का इस्तेमाल करने वाले पूर्व सैनिक संगठनों का नवीनीकरण करने की मांग की गई है।

प्रदर्शन के दौरान पूर्व सैनिक और उनके परिजन अपने हाथों में बैनर और तख्तियां लिए हुए थे। इन पर ‘अग्निपथ के तहत नेपाली युवाओं को भारतीय सेना में भर्ती करो’, ‘गृह मंत्रालय के पत्र को रद्द करो’ और ‘पूर्व सैनिकों की आवाज सुनो’ जैसे नारे लिखे थे। प्रदर्शन को संबोधित करते हुए ब्रिगेड के अध्यक्ष कर्नल कृष्ण बहादुर खत्री ने चेतावनी दी कि सुगौली संधि के दौर से चली आ रही 200 साल से भी अधिक पुरानी परंपरा अब खतरे में पड़ गई है। उन्होंने कहा कि सुगौली संधि के बाद भारत में नेपाली युवाओं की भर्ती की प्रक्रिया शुरू हुई थी और यह 207 वर्षों से लगातार जारी थी। भारत द्वारा अग्निपथ योजना लागू किए जाने के बाद नेपाल सरकार ने विभिन्न कारणों का हवाला देते हुए नेपाली युवाओं को भारतीय सेना में भर्ती होने से रोक दिया है, जिससे सैकड़ों युवाओं के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो गया है।

नेपाल की ‘रातोपाटी’ मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पूर्व सैनिकों द्वारा सरकार को सौंपे गए ज्ञापन में कहा गया है कि 50 डिग्री सेल्सियस तापमान वाले खाड़ी (गल्फ) देशों में जाकर न्यूनतम वेतन पर काम करने की तुलना में भारतीय सेना में नौकरी करना सैकड़ों गुना बेहतर है। अग्निपथ योजना के तहत चार साल की सेवा के दौरान युवा विभिन्न सुविधाओं के साथ लगभग 45 से 50 लाख रुपये कमा लेते हैं।

क्या है भारत की अग्निपथ योजना?

भारत सरकार ने साल 2022 में सैन्य भर्ती प्रक्रिया में बदलाव लाने के उद्देश्य से अग्निपथ योजना की घोषणा की थी। इस योजना के तहत भारतीय सशस्त्र बलों में अधिकारी रैंक से नीचे (सैनिक, एयरमैन और नाविक) के जवानों को चार साल के कार्यकाल के लिए भर्ती किया जाता है। चार साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद योग्यता और संगठनात्मक जरूरतों के आधार पर अधिकतम 25 प्रतिशत अग्निवीरों को 15 साल के स्थायी कमीशन के लिए शामिल किया जाता है, जबकि बाकी 75 प्रतिशत को एकमुश्त राशि देकर सेवामुक्त कर दिया जाता है। इन्हें पेंशन नहीं दी जाती।

अगर किसी अग्निवीर की ड्यूटी के दौरान मृत्यु हो जाती है तो उनके परिवार को 1 करोड़ रुपये की एकमुश्त राशि और बची हुई सेवा अवधि का पूरा वेतन मिलता है। वहीं दिव्यांगता के मामले में सैन्य सेवा के कारण हुई विकलांगता के प्रतिशत के आधार पर 44 लाख रुपये तक का मुआवजा दिया जाता है। इस योजना की घोषणा के समय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि अग्निपथ सशस्त्र बलों के लिए एक गेम चेंजर है और यह सेना को युवा, हाई-टेक और अति-आधुनिक बनाता है। इस योजना का उद्देश्य सशस्त्र बलों में युवा खून को शामिल करना और सेना के वेतन तथा पेंशन बिल को कम करना है।

नेपाल को अग्निपथ योजना पर क्यों थी आपत्ति?

अग्निपथ योजना से पहले भारतीय सेना स्वतंत्रता के समय नेपाल, भारत और ब्रिटेन के बीच साइन की गई त्रिपक्षीय संधि के तहत नेपाली गोरखा सैनिकों की भर्ती करती थी। इस संधि के तहत गोरखा सैनिकों की चार रेजिमेंट (2nd, 6th, 7th और 10th) ब्रिटिश सेना को सौंपी गई थीं। बाकी रेजिमेंट (1st, 3rd, 4th, 5th, 8th और 9th) भारतीय सेना के पास रहीं। आजादी के तुरंत बाद भारत ने 11वीं गोरखा राइफल्स नाम से एक नई रेजिमेंट भी बनाई थी। इस समझौते में भारतीय सेना में सेवारत नेपाली गोरखा सैनिकों के नियम, शर्तें, सेवानिवृत्ति के लाभ और पेंशन तय की गई थी।

रिपोर्टों के मुताबिक किसी भी समय भारतीय सेना में लगभग 32000 से 35000 नेपाली गोरखा सैनिक अपनी सेवाएं देते थे। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक नेपाल में भारतीय सेना के पूर्व सैनिकों की आबादी लगभग 1.32 लाख है। जब भारत ने अग्निपथ योजना की शुरुआत की तो काठमांडू स्थित नेपाल सरकार ने भारतीय सेना में अपने युवाओं की भर्ती पर रोक लगा दी। नेपाल सरकार का तर्क था कि यह योजना 1947 के त्रिपक्षीय समझौते के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है और भर्ती नियमों में किसी भी बदलाव से पहले नेपाल से चर्चा की जानी चाहिए थी। नेपाली टाइम्स से बातचीत में नेपाल के इतिहासकार प्रत्युष ओंटा ने भी कहा था कि त्रिपक्षीय समझौते का सदस्य होने के नाते भारत सरकार को कोई भी फैसला लेने से पहले नेपाल से राय लेनी चाहिए थी।

गोरखा भर्ती रोकने से नेपाल को क्या हो रहा है नुकसान?

भारतीय सेना में गोरखा भर्ती पर रोक लगाने का नेपाल का फैसला खुद उसी पर भारी पड़ रहा है और देश को इसका बड़ा आर्थिक व सामाजिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। जब नेपाली गोरखा भारतीय सेना में सेवा देते थे तो वे हर साल लगभग 1000 करोड़ रुपये का रेमिटेंस अपने घर नेपाल भेजते थे। भारत में नेपाल के पूर्व राजदूत रणजीत राय के मुताबिक यह पैसा नेपाल की अर्थव्यवस्था के लिए एक बहुत बड़ा सहारा था।

त्रिभुवन विश्वविद्यालय (काठमांडू) के सेन्ट्रल डिपार्टमेंट ऑफ रूरल डेवलपमेंट स्टडीज के लेक्चरर डॉ. रत्न मणि नेपाल के शोध पत्र ‘द गुरखा रिक्रूटमेंट, रेमिटेंस एंड डेवलपमेंट’ के मुताबिक विदेशी सेनाओं में काम करने वाले गोरखाओं से मिलने वाला रेमिटेंस नेपाल के दूर-दराज गांवों में सामाजिक आधुनिकीकरण और उद्यमिता विकास का एक स्थायी जरिया रहा है। इसके अलावा सेवानिवृत्त गोरखा राइफल्स के जवान दोनों देशों के बीच एक महत्वपूर्ण सद्भावना कड़ी (का काम करते हैं।

भारतीय सेना में नौकरी के अवसर बंद होने की वजह से नेपाल के कई युवा अब आजीविका के लिए रूस-यूक्रेन युद्ध में रूसी सेना की ओर से लड़ने चले गए हैं। काठमांडू सरकार के अनुमान के मुताबिक 200 से अधिक नेपाली युवा पुतिन की सेना में शामिल होने के लिए रूस जा चुके हैं। आपको बता दें कि पूर्व रक्षा प्रमुख (CDS) जनरल अनिल चौहान ने इस मुद्दे पर कहा था कि भारतीय सेना में नेपाली गोरखाओं की भर्ती पर अंतिम फैसला काठमांडू सरकार को ही लेना है। अब यह काठमांडू पर निर्भर करता है कि वह अग्निपथ योजना के तहत अपने सैनिकों को भारतीय सेना में सेवा के लिए भेजता है या नहीं। उन्होंने स्पष्ट किया था कि नेपाल के नागरिकों के लिए अलग योजना और भारतीय नागरिकों के लिए अलग योजना नहीं हो सकती।