NSE के शेयर लिस्ट होते ही बन सकते हैं रॉकेट, एक्सपर्ट ने बताई कहां तक जा सकती है कीमत

एनएसई के शेयर इस महीने 24 तारीख को बीएसई पर लिस्ट हो जाएंगे। लिस्ट होते ही शेयर रॉकेट बन सकते हैं। इस शेयर में 17 सितंबर से 21 सितंबर के बीच निवेश किया जा सकता है। एक लॉट 8 शेयरों का होगा। प्रत्येक 1 रुपये फैस वैल्यू वाले शेयर का प्राइस बैंड 1,700-1,85 रुपये है।

संस्थागत निवेशकों की डिमांड से मिलेगा सपोर्ट

कनवर्जेंट फाइनेंस के मैनेजिंग पार्टनर हर्ष राघवन का कहना है कि लिस्टिंग के चार से छह हफ्तों में एनएसई का शेयर 20-25 फीसदी चढ़ सकता है। उनका कहना है कि इंस्टीट्यूशनल इनवेस्टर्स की डिमांड से इस शेयर को सपोर्ट मिलेगा। एनएसई आईपीओ पर सीएनबीसी-टीवी18 के मार्केट फोरम में उन्होंने कहा, “मुझे उम्मीद है कि लिस्टिंग के 4-6 हफ्ते में यह शेयर 20-25 फीसदी चढ़ जाएगा।”

म्यूचुअल फंड्स के पास एनएसई के शेयर नहींं

उन्होंने कहा कि एनएसई में पहले से कई शेयरहोल्डर्स की हिस्सेदारी है। लेकिन, बड़े म्यूचुअल फंड्स हाउसेज और ग्लोबल इंस्टीट्यूशनल इनवेस्टर्स के पास एनएसई के ज्यादा शेयर नहीं हैं। इसलिए शेयर के लिस्ट होते ही संस्थागत निवेशकों की बड़ी दिलचस्पी इस शेयर में दिखेगी। रिटेल इनवेस्टर्स को काफी समय से इस आईपीओ का इंतजार रहा है।

कम से कम 8 शेयरों के लिए करना होगा अप्लाई

इस आईपीओ में निवेश करने के लिए प्राइस बैंड के ऊपरी लेवल पर कम से कम 14,280 रुपये की बोली लगानी होगी। प्राइस बैंड के ऊपरी लेवल पर एक्सचेंज की वैल्यूएशन 4.41 लाख करोड़ रुपये है। यह आईपीओ पूरी तरह से ऑफर फॉर सेल (OFS) होगा। इसका मतलब है कि एनएसई आईपीओ में इनवेस्टर्स को नए शेयर इश्यू नहीं करेगा, जिससे उसके पास कोई पैसा नहीं आएगा।

ये पुराने इनवेस्टर्स बेच रहे एनएसई के शेयर

इस आईपीओ में कई पुराने इनवेस्टर्स अपने शेयर बेचने जा रहे हैं। इनमें एसबीआई ग्रुप, कनाडा पेंशन प्लान इनवेस्टमेंट बोर्ड, अरांडा इनवेस्टमेंट्स, एमएस स्ट्रेटेजिक, न्यू इंडिया एश्योरेंस और बैंक ऑफ बड़ौदा शामिल हैं। इन इनवेस्टर्स को अपने रिटर्न पर कई गुना रिटर्न मिलने जा रहा है। एनएसई के शेयर 24 सितंबर को बीएसई में लिस्ट होंगे।

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राघवन का एनएसई में पहले से निवेश

राघवन एनएसई के पुराने निवेशकों में शामिल हैं। 2006 में उन्होंने गोल्डमैन सैक्स के जरिए एनएसई में निवेश किया था। फिर 2016 में उन्होंने फेयरफैक्स के जरिए एनएसई में निवेश किया। उन्होंने कहा कि उनके निवेश की वजह एक्सचेंज के लिए बड़ी संभावनाएं हैं। इंडियन इकोनॉमी में जैसे-जैसे फाइनेंशियल प्रोडक्ट्स में लोगों की दिलचस्पी बढ़ेगी, वैसे-वैसे एनएसी की स्थिति मजबूत होगी।

EPF Calculator: पीएफ से भी बनाया जा सकता है एक करोड़ रुपये का फंड! जानिए इसके लिए मंथली कितना करना होगा इन्वेस्टमेंट

एंप्लॉयी प्रोविडेंट फंड (ईपीएफ) की मदद से बड़ा रिटायरमेंट फंड बन सकता है। यह लंबी अवधि का निवेश है, जिससे पैसे को बढ़ने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है। लंबे समय तक नियमित रूप से निवेश करने पर ईपीएफ का रिटर्न बहुत अच्छा रहता है। सिर्फ प्राइवेट नौकरी करने वाले एंप्लॉयीज ईपीएफ के दायरे में आते हैं।

हर महीने ईपीएफ में करीब 10,750 रुपये का निवेश करीब 20-25 साल तक करने पर करीब 1 करोड़ रुपये का फंड तैयार हो जाता है। इस कैलकुलेशन में सालाना इंटरेस्ट रेट 8.25 फीसदी माना गया है। अगर एंप्लॉयी हर महीने वॉलेंटरी प्रोविडेंट फंड (VPF) में भी हर महीने 6,000 रुपये का निवेश करता है तो 24-25 साल में करीब 1.58 करोड़ रुपये का फंड तैयार हो सकता है।

यह ध्यान में रखना जरूरी है कि करियर में ब्रेक होने का असर ईपीएफ के फंड पर पड़ेगा। इसकी वजह यह है कि करियर ब्रेक की वजह से ईपीएफ में हर महीने होने वाला कंट्रिब्यूशन रुक जाता है। इसका असर लंबी अवधि में कंपाउंडिंग के फायदे पर पड़ता है।

ईपीएफओ के नियम के तहत, एंप्लॉयीज ईपीएफ में अपनी बेसिक सैलरी का 12 फीसदी हर महीने कंट्रिब्यूट करता है। एंप्लॉयर भी 12 फीसदी कंट्रिब्यूशन एंप्लॉयी के ईपीएफ में हर महीने करता है। इसका 8.33 फीसदी एंप्लॉयीज पेंशन स्कीम (EPS) में जाता है और 3.67 फीसदी ईपीएफ में जाता है।

क्लासिस लॉ में एसोसिएट मयंक पराशर ने इसे एक उदाहरण की मतलब से समझाया। उन्होंने कहा कि ऐसा एक एंप्लॉयी है जो लगातार 25 साल तक नौकरी करता है। उसका ईपीएफ में मंथली कंट्रिब्यूशन 10,750 रुपये है। उसका ईपीएफ फंड 24-25 सालों में सालाना 8.25 फीसदी इंटरेस्ट रेट से बढ़कर करीब 1 करोड़ रुपये हो जाएगा। इस कैलकुलेशन में यह माना गया है कि एंप्लॉयी के मंथली कंट्रिब्यूशन में कोई बदलाव नहीं होता है।

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करियर में ब्रेक का असर

पराशर ने कहा, “करियर में ब्रेक का असर ईपीएफ में पहले से जमा फंड पर नहीं पड़ेगा। लेकिन, ब्रेक के दौरान कंट्रिब्यूशन रुकने का असर रिटायरमेंट फंड पर पड़ेगा।” इसका मतलब है कि अगर एंप्लॉयी 3 साल का करियर ब्रेक लेता है तो उस दौरान ईपीएफ में कंट्रिब्यूशन रुक जाएगा। इसका असर लंबी अवधि में कंपाउंडिंग बेनेफिट पर पड़ेगा।

पराशर ने इसे भी एक उदाहरण की मदद से समझाया। उन्होंने कहा कि हम मान लेतें है कि एंप्लॉयी 25 साल की जगह सिर्फ 22 साल कंट्रिब्यूशन करता है। उन्होंने कहा, “ऐसी स्थिति में उसका ईपीएफ फंड करीब 76.6 लाख रुपये होगा। इसका मतलब है कि करियर ब्रेक की वजह से फंड करीब 24.9 लाख रुपये घट जाता है।”

उन्होंने कहा कि करियर ब्रेक के दौरान न सिर्फ कंट्रिब्यूशन रुक जाता है बल्कि कंट्रिब्यूशन पर मिलने वाला इंटरेस्ट और कंपाउंडिंग बेनेफिट भी नहीं मिलता है। इसे हम नीचे टेबल की मदद से समझ सकते हैं।

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VPF की मदद से बना सकते हैं बड़ा फंड

एंप्लॉयी के करियर में अगर कोई ब्रेक नहीं होता है और वह अगर वीपीएफ में हर महीने अतिरिक्त 6000 रुपये का कंट्रिब्यूशन करता है तो ईपीएफ में हर महीने का कंट्रिब्यूशन बढ़कर 16,750 रुपये हो जाता है। इससे 25 साल में उसके लिए करीब 1.58 करोड़ रुपये का फंड तैयार हो जाता है।

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इस उदाहरण से पता चलता है कि नियमित रूप से कंट्रिब्यूशन होने पर ईपीएफ बड़ा रिटायरमेंट फंड तैयार करने में मदद कर सकता है। अगर आप वीपीएफ के जरिए अतिरिक्त कंट्रिब्यूशन कर सकते हैं तो आपके लिए और बड़ा फंड तैयार हो जाता है। लेकिन, करियर ब्रेक की वजह से रिटायरमेंट फंड का आकार कम हो जाता है।

डिसक्लेमर: मनीकंट्रोल पर एक्सपर्ट्स की तरफ से व्यक्त विचार उनके अपने विचार होते हैं। ये वेबसाइट या इसके मैनेजमेंट के विचार नहीं होते। मनीकंट्रोल की यूजर्स को सलाह है कि उन्हें निवेश का फैसला लेने से पहले सर्टिफायड एक्सपर्ट्स की राय लेनी चाहिए।

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SIP vs NPS: हर महीने ₹5,000 निवेश करें तो 30 साल में कितना फंड बनेगा? समझिए पूरा कैलकुलेशन

SIP vs NPS: रिटायरमेंट के लिए हर महीने ₹5,000 निवेश करना अच्छी रकम हो सकती है। इससे 30 जैसी लंबी अवधि में बड़ा फंड भी बन सकता है। लेकिन, असल सवाल है कि ₹5,000 SIP में लगाएं या NPS में? तुलना को आसान बनाने के लिए दोनों में अलग-अलग रिटर्न मानते हैं। SIP में 12% और NPS में 10% औसत सालाना रिटर्न लेते हैं।

मान लेते हैं कि निवेश की शुरुआत 30 साल की उम्र में होती है। हर महीने ₹5,000 निवेश किया जाता है। निवेश 30 साल तक जारी रहता है। यानी 60 साल की उम्र तक कुल ₹18 लाख निवेश होंगे।

30 साल बाद कितना फंड बनेगा?

SIP में 12% औसत रिटर्न मिलने पर ₹5,000 महीने का निवेश करीब ₹1.76 करोड़ का फंड बना सकता है। NPS में 10% औसत रिटर्न मानने पर कॉर्पस करीब ₹1.14 करोड़ हो सकता है।

यानी इस उदाहरण में SIP का अनुमानित फंड NPS से करीब ₹62 लाख ज्यादा रहेगा।

पैमानाSIPNPS
हर महीने निवेश₹5,000₹5,000
निवेश की अवधि30 साल30 साल
कुल निवेश₹18 लाख₹18 लाख
अनुमानित सालाना रिटर्न12%10%
अनुमानित कॉर्पस₹1.76 करोड़₹1.14 करोड़
अनुमानित रिटर्न₹1.58 करोड़₹96 लाख

SIP में ज्यादा पैसा क्यों बनेगा?

यहां सिर्फ 2% रिटर्न का अंतर है। लेकिन 30 साल में कंपाउंडिंग इस अंतर को काफी बड़ा बना देती है। SIP में ₹18 लाख का कुल निवेश 12% औसत रिटर्न पर करीब ₹1.76 करोड़ हो सकता है। यानी करीब ₹1.58 करोड़ की रकम अनुमानित रिटर्न से जुड़ सकती है।

हालांकि, 12% रिटर्न तय नहीं है। इक्विटी म्यूचुअल फंड बाजार से जुड़े होते हैं। कुछ साल रिटर्न काफी ज्यादा हो सकता है। कुछ साल नुकसान भी हो सकता है।

NPS में कितना फंड बनेगा?

NPS में 10% औसत रिटर्न मानें तो ₹5,000 महीने का निवेश 30 साल में करीब ₹1.14 करोड़ बना सकता है। इसमें आपका कुल निवेश ₹18 लाख होगा। बाकी करीब ₹96 लाख अनुमानित रिटर्न होगा।

NPS का मकसद रिटायरमेंट के लिए लंबी अवधि में पैसा तैयार करना है। इसमें निवेश बाजार से जुड़ा होता है। इसलिए यहां भी 10% रिटर्न की कोई गारंटी नहीं है।

NPS में एग्जिट का नियम अलग

NPS और SIP में सबसे बड़ा अंतर पैसा निकालने के समय आता है। NPS में रिटायरमेंट पर पूरा कॉर्पस अपनी मर्जी से निकालने की सुविधा नहीं होती। मौजूदा नियमों के तहत सामान्य एग्जिट में गैर-सरकारी सब्सक्राइबर के लिए 80% तक रकम एकमुश्त निकालने और कम से कम 20% रकम एन्‍युटी में लगाने का विकल्प है। छोटे कॉर्पस के लिए अलग नियम लागू हो सकते हैं।

एन्‍युटी से रिटायरमेंट के बाद नियमित आय मिलती है। हालांकि, पेंशन कितनी मिलेगी यह एन्‍युटी रेट और चुने गए प्लान पर निर्भर करेगा।

SIP में पैसा निकालना आसान

SIP में ऐसा लॉक-इन स्ट्रक्चर नहीं है। म्यूचुअल फंड की स्कीम के नियमों के मुताबिक आप जरूरत पड़ने पर अपनी यूनिट बेच सकते हैं।

यही SIP की बड़ी खासियत है। रिटायरमेंट के अलावा घर, बच्चों की पढ़ाई या किसी दूसरी जरूरत के लिए भी पैसा इस्तेमाल किया जा सकता है।

टैक्स में भी अंतर

SIP और NPS का टैक्स ट्रीटमेंट अलग है। SIP में टैक्स म्यूचुअल फंड के प्रकार और कैपिटल गेन पर निर्भर करता है। इसलिए 30 साल बाद बनने वाले पूरे कॉर्पस को सीधे टैक्स फ्री नहीं माना जा सकता।

NPS में भी लंपसम और एन्‍युटी को लेकर अलग टैक्स नियम हैं। एन्‍युटी से बाद में मिलने वाली पेंशन आपकी इनकम का हिस्सा मानी जाती है और उस पर लागू नियमों के हिसाब से टैक्स लगता है।

फिर SIP या NPS?

अगर आपकी प्राथमिकता ज्यादा लिक्विडिटी और लचीलापन है, तो SIP बेहतर विकल्प हो सकता है। वहीं, रिटायरमेंट के लिए अलग पैसा बनाना है और लंबे समय तक निवेश बनाए रखना है, तो NPS का स्ट्रक्चर काम आ सकता है।

इस उदाहरण में ₹5,000 महीने के निवेश पर SIP का अनुमानित फंड ₹1.76 करोड़ और NPS का करीब ₹1.14 करोड़ है। लेकिन सिर्फ बड़ा कॉर्पस देखकर फैसला नहीं करना चाहिए। रिटर्न के साथ टैक्स, लिक्विडिटी और एग्जिट नियम भी देखना जरूरी है।

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Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।

8th Pay Commission: वेतन आयोग के इस नियम से टेंशन में पेंशनर्स, REWA ने PM मोदी से कर दी ये बड़ी मांग

8th Pay Commission Pension Revision: 8वें वेतन आयोग को लेकर एक तरफ जहां बैठकों का दौर जारी है, वहीं दूसरी तरफ देश के करीब 69 लाख पेंशनर्स और फैमिली पेंशनर्स की धड़कनें तेज हो गई हैं। पेंशनभोगियों के मन में यह बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि क्या 8वां वेतन आयोग उनकी पेंशन में भी बढ़ोतरी की सिफारिश करेगा या नहीं?

इसी भ्रम को दूर करने के लिए रिटायर्ड एंप्लाइज वेलफेयर एसोसिएशन (REWA) ने सीधा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखी है। एसोसिएशन ने सरकार से मांग की है कि 8वें वेतन आयोग के नियम और शर्तों यानी ‘टर्म्स ऑफ रेफरेंस’ (ToR) में तुरंत संशोधन किया जाए, ताकि 1 जनवरी 2026 से पहले रिटायर हुए कर्मचारियों की पेंशन रिवीजन का रास्ता पूरी तरह साफ हो सके।

आइए आसान भाषा में समझते हैं कि पूरा मामला क्या है और पेंशनर्स क्यों चिंतित हैं।

बैठकों का दौर जारी, लेकिन पेंशनर्स को क्यों है डर?

8वां वेतन आयोग इन दिनों अलग-अलग राज्यों का दौरा कर कर्मचारियों और यूनियनों के साथ बैठकें कर रहा है। आयोग ने 7 और 8 सितंबर को चेन्नई के आईटीसी ग्रैंड चोल में बैठकें कीं और आज, 10 सितंबर को पुडुचेरी में दिनभर की अहम बैठक चल रही है। इन बैठकों में केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों की सैलरी, भत्तों और पेंशन ढांचे पर मंथन हो रहा है।

लेकिन इस सब के बीच पेंशनर्स एसोसिएशन REWA का कहना है कि सरकार द्वारा तय किए गए नियमों (ToR) में पेंशनर्स को लेकर स्थिति पूरी तरह साफ नहीं है।

नियमों का वो पेच, जिसने बढ़ाई 69 लाख पेंशनर्स की चिंता

REWA के मुताबिक, सारा भ्रम वेतन आयोग के नोटिफिकेशन के पॉइंट 2(e) की वजह से पैदा हुआ है। इस नियम में डेथ-कम-रिटायरमेंट ग्रैच्युटी (DCRG), एनपीएस (NPS), यूपीएस (UPS) और पेंशन स्ट्रक्चर की समीक्षा की बात तो कही गई है, लेकिन यह ‘कर्मचारियों’ के संदर्भ में लिखा गया है।

REWA का कहना है कि इसमें 1 जनवरी 2026 से पहले रिटायर हो चुके पेंशनर्स और फैमिली पेंशनर्स का स्पष्ट रूप से जिक्र नहीं है। इसी वजह से लाखों पेंशनभोगियों में यह डर पैदा हो गया है कि कहीं आयोग की सिफारिशें केवल मौजूदा कर्मचारियों तक ही सीमित न रह जाएं।

पिछले वेतन आयोगों से कैसे अलग है 8वां CPC?

एसोसिएशन ने पीएम मोदी को भेजी अपनी चिट्ठी में पुराने वेतन आयोगों के आंकड़ों का हवाला भी दिया है:

7वां वेतन आयोग: इसके नियम (ToR) में रिटायरमेंट से जुड़े फायदों और प्री-रिटायरमेंट (पुराने) पेंशनर्स की पेंशन रिवीजन का साफ जिक्र था।

5वां और 6ठा वेतन आयोग: इन दोनों आयोगों के नियमों में भी ‘पेंशनर्स’ और ‘फैमिली पेंशनर्स’ शब्द को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया था।

REWA का कहना है कि उन्होंने इससे पहले वित्त मंत्री और वित्त सचिव से भी इस मुद्दे पर स्पष्टीकरण मांगा था, लेकिन सरकार की ओर से कोई आधिकारिक जवाब नहीं आया। इसी वजह से सोशल मीडिया और पेंशनर्स यूनियनों के बीच इस पर असमंजस लगातार बढ़ रहा है।

पेंशनर्स एसोसिएशन की सरकार से क्या हैं 2 मुख्य मांगें?

REWA ने प्रधानमंत्री से अपील करते हुए दो प्रमुख बातें रखी हैं:

नियमों में हो औपचारिक बदलाव: 8वें वेतन आयोग के ToR में आधिकारिक संशोधन कर यह साफ लिखा जाए कि आयोग 1 जनवरी 2026 से पहले रिटायर हुए सभी पेंशनभोगियों और फैमिली पेंशनर्स की पेंशन बढ़ाने की सिफारिश करेगा।

अंतरिम प्रेस नोट जारी हो: जब तक औपचारिक संशोधन नहीं होता, तब तक केंद्र सरकार एक प्रेस नोट या बयान जारी कर लाखों पेंशनर्स का भ्रम और तनाव दूर करे।

Stocks to Watch: Sensex की एक्सपायरी; ICICI Bank, Wipro, IRB Infra समेत इन 11 स्टॉक्स पर फोकस

Stocks to Watch: अधिकतर एशियाई बाजारों से कमजोर रुझानों के बीच गिफ्ट निफ्टी से आज घरेलू मार्केट में फ्लैट शुरुआत के संकेत मिल रहे हैं। चूंकि आज सेंसेक्स की वीकली एक्सपायरी है तो मार्केट में तेज हलचल दिख सकती है। एक कारोबारी दिन पहले 9 सितंबर को सेंसेक्स (Sensex) 813.35 प्वाइंट्स यानी 1.08% की गिरावट के साथ 74,764.23 और निफ्टी 50 (Nifty 50) भी 203.60 प्वाइंट्स यानी 0.86% की फिसलन के साथ 23,431.50 पर बंद हुआ था। अब आज इंडिविजुअल स्टॉक्स की बात करें तो अपनी खास कॉरपोरेट एक्टिविटीज के चलते कुछ स्टॉक्स में तेज हलचल दिख सकती है। यहां इन शेयरों के बारे में डिटेल्स दी जा रही है।

Stocks to Watch: आज इन स्टॉक्स पर फोकस

Dilip Buildcon

दिलीप बिल्डकॉन ने ओडिशा के पारादीप से छत्तीसगढ़ के रायपुर तक एलपीजी पाइपलाइन को लेकर PNGRB (पेट्रोलियम एंड नेचुरल गैस रेगुलेटरी बोर्ड) से LoI (लेटर ऑफ इंटेंट) मिलने के बाद ₹1,800 करोड़ के प्रोजेक्ट के लिए सबसे कम बोली लगाई है।

Indian Bank

इंडियन बैंक ने एनएसई के आईपीओ में ऑफर फॉर सेल विंडो के तहत के जरिए अपनी 17.91% होल्डिंग यानी 15 लाख इक्विटी शेयर बेचने का प्रस्ताव पेश किया है। हालांकि इसके लिए रेगुलटेरी अप्रूवल लेना है।

Shakti Pumps India

शक्ति पंप्स (इंडिया) को महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी से मैगेल त्याला सौर कृषि पंप योजना के तहत पूरे महाराष्ट्र में 3 HP, 5 HP और 7.5 HP क्षमता वाले 10,000 ऑफ-ग्रिड सोलर फोटोवोल्टिक वॉटर पंपिंग सिस्टम (SPWPS) के लिए लेटर ऑफ एम्पैनलमेंट मिला है। इन 10,000 पंपों की कुल वैल्यू लगभग ₹235.92 करोड़ है, और इसे वर्क ऑर्डर जारी होने के 60 दिनों के भीतर पूरा करना है।

ICICI Bank

आईसीआईसीआई बैंक को आरबीआई से इस बात की मंजूरी मिल गई है कि आवेदक आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल एसेट मैनेजमेंट कंपनी अब सीएसबी बैंक, डीसीबी बैंक, कोटक महिंद्रा बैंक और एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक में 9.95% तक वोटिंग राइट्स हासिल कर सकती है।

IRB Infrastructure Developers

आईआरबी इंफ्रा डेवलपर्स का अगस्त महीने में टोल रेवेन्यू सालाना आधार पर 25% बढ़कर ₹807.4 करोड़ पर पहुंच गया।

Wipro

विप्रो ने नैस्डैक पर लिस्टेड क्राउडस्ट्राइक (CrowdStrike) के साथ मिलकर अपना चीफ इन्फॉर्मेशन सिक्योरिटी ऑफिसर (CISO) कमांड सेंटर लॉन्च किया है। इस कमांड सेंटर को एआई से जुड़े एडवांस्ड रिस्क के खिलाफ कंपनियों की सिक्योरिटी को मजबूत करने के लिए डिजाइन किया गया है।

Hindustan Zinc

हिंदुस्तान जिंक ने कंसंट्रेट यानी कच्चे खनिज को लाने-ले जाने के लिए 30 इलेक्ट्रिक ट्रक को लेकर लॉजिस्टिक्स सॉल्यूशन कंपनी MFL इंडिया के साथ छह साल का ट्रांसपोर्टेशन कॉन्ट्रैक्ट किया है।

Juniper Green Energy

जुनिपर ग्रीन एनर्जी की पूर्ण मालिकाना हक वाली सब्सिडियरी जुनिपर ग्रीन स्पार्क टेन ने 75 MW के विंड-सोलर हाइब्रिड पावर प्रोजेक्ट को पूरी तरह से चालू कर दिया है। यह प्रोजेक्ट साइट पर विंड कैपेसिटी के आखिरी 10 MW के चालू होने के बाद पूरा हुआ है। इसके चालू होने के बाद जुनिपर ग्रीन एनर्जी और उसकी सब्सिडियरी कंपनियों की कुल ऑपरेशनल कैपेसिटी लगभग 2,604 MWp हो गई है और साथ ही लगभग 500 MWh की बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) कैपेसिटी भी है।

Biocon

प्राइवेट इक्विटी फर्म ट्रू नॉर्थ की सहयोगी कंपनी एक्टिव पाइन एलएलपी ने बायोकॉन के 1.65 करोड़ शेयर (1.02% हिस्सेदारी) ₹638.37 करोड़ में ₹385 के भाव पर बेच दिए। इसकी जून 2026 तक कंपनी में कुल 1.08% हिस्सेदारी (1.76 करोड़ इक्विटी शेयर) थी। ये शेयर 12 बड़े ग्लोबल और घरेलू निवेशकों- आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल म्यूचुअल फंड, एसबीआई म्यूचुअल फंड, कोटक महिंद्रा एएमसी, आदित्य बिड़ला सन लाइफ एएमसी, बीएनबी परिबास आर्बिट्रेज, सिटीग्रुप ग्लोबल मार्केट्स सिंगापुर, व्हाइटओक कैपिटल म्यूचुअल फंड, आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल लाइफ इंश्योरेंस कंपनी, बजाज लाइफ इंश्योरेंस, सोसिएट जेनरल, एडलवाइस म्यूचुअल फंड और गवर्नमेंट पेंशन फंड ग्लोबल की तरफ से नॉर्जेस बैंक ने प्रति शेयर ₹385 के भाव पर खरीदे।

Khadim India

एंजल इन्वेस्टर पंकज प्रसून ने प्रति शेयर ₹116.19 के भाव पर जूते-चप्पल बनाने वाली खादिम इंडिया के अतिरिक्त 4.18 लाख शेयर ₹4.86 करोड़ में खरीदे हैं। जून 2026 तक कंपनी में उनकी पहले से ही 1.62% हिस्सेदारी (2.97 लाख शेयर) थी। वहीं दूसरी तरफ एम्बिट इन्वेस्टमेंट एडवाइजर्स ने प्रति शेयर ₹115.97 के भाव पर ₹4.27 करोड़ में खादिम इंडिया के 3.69 लाख शेयर बेच दिए।

Mangalam Global Enterprise

लेमन ग्रुप के निवेश वाली Veloce Fintech ने वेलोस अपॉर्च्यूनिटीज फंड और वेलोस अपॉर्च्यूनिटीज फंड-II के जरिए मंगलम ग्लोबल एंटरप्राइज के 1.17 करोड़ इक्विटी शेयर (3.57% होल्डिंग) ₹18.26 करोड़ में प्रति शेयर ₹15.5 के भाव पर खरीदे। वहीं निवेशक चुंगथ करुणाकरण पद्मा कुमार ने अपने पूरे 1.24 करोड़ शेयर (3.78% हिस्सेदारी) ₹19.3 करोड़ में समान भाव पर बेच दिए।

Stocks to Watch: इन पर भी रहेगी नजर

आज इन कंपनियों के आएंगे रिजल्ट: गजा अल्टरनेटिव एसेट मैनेजमेंट, शंकेश ज्वैलर्स।

एक्स-डिविडेंड: एपेक्स फ्रोजन फूड्स, केमक्रक्स एंटरप्राइजेज, दिवगी टॉर्कट्रांसफर सिस्टम्स, एलनेट टेक्नोलॉजीज, गणेश इकोस्फीयर, ग्राउअर एंड वेल इंडिया, हर्षदीप हॉर्टिको, इंडोको रेमेडीज, इंडसिल हाइड्रो पावर एंड मैंगनीज, जेएमजे फिनटेक, लिंक, एमएंडबी इंजीनियरिंग, पावर मेक प्रोजेक्ट्स, रेडिएंट कैश मैनेजमेंट सर्विसेज, सिकाजेन इंडिया, टीवीएस श्रीचक्र, वैलियंट कम्युनिकेशंस, जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेज

F&O बैन: आज बंधन बैंक, आईनॉक्स विंड, कीन्स टेक्नोलॉजी इंडिया, एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस, मणप्पुरम फाइनेंस, SAIL

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जर्मनी की दक्षिणपंथी पार्टी का चेहरा एलिस वीडल कैसे बनीं:लेस्बियन होकर भी समलैंगिक शादी के खिलाफ, श्रीलंका में जन्मी प्रवासी विरोधी नेता की पार्टनर

जर्मनी के सैक्सोनी-आनहाल्ट में सितंबर 2026 के चुनाव में अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (AfD) ने बड़ी जीत हासिल की है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह पहली बार है, जब जर्मनी में कोई दक्षिणपंथी पार्टी किसी राज्य में इतनी बड़ी जीत के साथ सत्ता के करीब पहुंची है। AfD दूसरे देशों से आकर जर्मनी में बसे लोगों और समलैंगिक शादी के खिलाफ अपने सख्त रुख के लिए जानी जाती है। लेकिन AfD की कहानी में एक बात सबसे ज्यादा चौंकाती है। AfD पार्टी की चीफ एलिस वीडेल खुद लेस्बियन हैं। उनकी शादी श्रीलंका में जन्मी एक महिला से हुई है। यानी जिस पार्टी की नीतियां समलैंगिक शादी और प्रवासियों के खिलाफ हैं, उसी पार्टी की सबसे ताकतवर नेता की अपनी निजी जिंदगी इससे बिल्कुल अलग है। जर्मनी में AfD के बढ़ते प्रभाव के पीछे वीडेल का बड़ा हाथ माना जाता है। लेकिन उनकी राजनीति को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि आखिर एलिस वीडेल कौन हैं और वह ऐसी पार्टी का चेहरा कैसे बनीं, जिसकी सोच उनकी अपनी जिंदगी से बिल्कुल अलग है? बचपन: नाजी अतीत वाले फैमिली में जन्म जर्मन अखबार डाय वेल्ट के मुताबिक वीडल का बचपन ऐसे माहौल में बीता, जहां राजनीति को लेकर काफी चर्चा होती थी। हालांकि, उनके माता-पिता किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़े नहीं थे। वीडल के दादा हंस वीडल हिटलर की नाजी पार्टी से जुड़े हुए थे। इस दौरान उनकी काफी तरक्की हुई और उन्हें जज बना दिया गया। उनका परिवार तब सिलेसिया में रहता था। यह अब पोलैंड का इलाका है। द्वितीय विश्व युद्ध में जब हिटलर की हार हुई तो उनका परिवार सिलेसिया से भागकर पश्चिमी जर्मनी आ गया। यहां वीडल परिवार ने फर्नीचर का काम शुरू किया। 1979 में एलिस वीडल का जन्म हुआ। 1985 में जब वीडल के दादा की मौत हुई, तब वह सिर्फ छह साल की थीं। वीडल के मुताबिक, उनके दादा ने नाजी शासन के दौरान जो काम किए थे, उस बारे में परिवार में कभी बातचीत नहीं हुई। टीचर को चिढ़ाने के लिए मर्सिडीज से स्कूल जाती थीं अपने स्कूली दिनों को लेकर वीडल ने बताया कि उनके स्कूल के ज्यादातर शिक्षक वामपंथी विचारधारा से प्रभावित थे। वह कहती हैं, “वे मुझे पसंद नहीं करते थे और मैं भी उन्हें पसंद नहीं करती थी। उनको चिढ़ाने के लिए वह कभी-कभी अपने पिता की मर्सिडीज से स्कूल जाती थीं।” स्कूली दिनों में वीडल डॉक्टर बनना चाहती थीं। लेकिन उनके पिता इसके खिलाफ थे। उनकी सलाह पर वीडल ने इकोनॉमिक्स और बिजनेस की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने बैंकिंग और बिजनेस में करियर शुरू किया। कुछ समय उन्होंने अमेरिकी इनवेस्टमेंट कंपनी गोल्डमैन सैक्स में काम किया। इसके बाद वह चीन चली गईं। मंदारिन सीखी, चीन की अर्थव्यवस्था समझी चीन में वीडल ने बैंक ऑफ चाइना में काम किया और 5 साल तक वहां रहीं। इसी दौरान उन्होंने मंदारिन यानी चीनी भाषा सीखी और बिजनेस कंसल्टेंट के तौर पर भी काम किया। चीन में रहते हुए उनकी दिलचस्पी वहां की अर्थव्यवस्था में बढ़ी और उन्होंने चीन की पेंशन व्यवस्था के भविष्य पर रिसर्च शुरू की। 2011 में उन्होंने इसी विषय पर डॉक्टरेट पूरी की और इसके बाद जर्मनी लौट आईं। राजनीति में आने से पहले वीडल अर्थशास्त्र पढ़ चुकी थीं, बैंक में काम कर चुकी थीं और चीन में कई साल बिता चुकी थीं। यानी राजनीति में आने से पहले ही उन्हें पैसे, कारोबार और अर्थव्यवस्था की अच्छी समझ थी। प्यार-परिवार: पार्टनर के ताना मारने पर राजनीति में एंट्री साल 2007 में वीडल की मुलाकात सारा बॉसार्ड से हुई। सारा स्विट्जरलैंड की फिल्म निर्माता हैं। उनका जन्म श्रीलंका में हुआ था और बचपन में एक स्विस परिवार ने उन्हें गोद ले लिया था। दोनों की दोस्ती धीरे-धीरे रिश्ते में बदल गई और 2009 से वे साथ रहने लगीं। आज वीडल और सारा स्विट्जरलैंड में अपने दो गोद लिए हुए बेटों के साथ रहती हैं। दोनों बच्चों की परवरिश साथ मिलकर करती हैं। सारा के मुताबिक वह खुद घर में पत्नी की जिम्मेदारियां निभाती हैं। दोनों ने अपने रिश्ते को काफी निजी रखा है और उनकी पहली मुलाकात कब और कहां हुई, इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं है। वीडल के मुताबिक, AfD में शामिल होने का आइडिया उन्हें उनकी पार्टनर सारा से ही मिला था। एक पार्टी में वीडल लगातार यूरोपीय संघ की राजनीति पर बातें किए जा रही थीं। उनकी लंबी-लंबी बातें सुनकर सारा परेशान हो गईं। उन्होंने वीडल से कहा, अगर राजनीति पर इतनी ही बातें करनी हैं तो खुद राजनीति में क्यों नहीं चली जातीं? सारा की यह बात वीडल के मन में बैठ गई। राजनीति: देखते ही देखते AfD का सबसे बड़ा चेहरा बन गईं 2013 में वीडल नई-नई बनी AfD पार्टी से जुड़ गईं। उस समय पार्टी का मुख्य मुद्दा प्रवासी या समलैंगिक विवाह नहीं बल्कि यूरो और यूरोजोन संकट था। AfD इस बात के खिलाफ थी कि जर्मनी आर्थिक संकट से जूझ रहे दूसरे यूरोपीय देशों को लगातार पैसे दे। वीडल भी यूरो को लेकर जर्मनी की नीतियों की आलोचना करती थीं। यही वजह थी कि वह इस नई पार्टी के साथ जुड़ीं। AfD में शामिल होने के बाद वीडल का कद तेजी से बढ़ने लगा। कुछ ही समय में वह पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व में पहुंच गई थीं। उनकी पहचान ऐसी नेता के तौर पर बनने लगी, जो आर्थिक मामलों को अच्छी तरह समझती थीं और पार्टी की बात को मीडिया के सामने मजबूती से रख सकती थीं। 2015 में बदली AfD की राजनीति, शरणार्थी बने बड़ा मुद्दा फिर आया 2015, वह साल जिसने जर्मनी की राजनीति की दिशा बदल दी। सीरिया में 2011 से चल रहा गृहयुद्ध तब तक और ज्यादा हिंसक हो चुका था। अपनी जान बचाने के लिए सीरिया के लाखों लोग घर छोड़कर सुरक्षित ठिकाने की तलाश में निकल पड़े। सिर्फ सीरिया ही नहीं, अफगानिस्तान, इराक और कुछ दूसरे देशों में युद्ध और हिंसा से परेशान लोग भी यूरोप की ओर बढ़ने लगे। कुछ ही महीनों में यूरोप पहुंचने वाले शरणार्थियों की संख्या तेजी से बढ़ गई और बड़ी संख्या में लोग जर्मनी पहुंचने लगे। शरणार्थी संकट AfD के लिए बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया। यानी जो पार्टी शुरुआत में यूरो और आर्थिक मुद्दों को लेकर बनी थी, वह धीरे-धीरे प्रवासियों और शरणार्थियों के विरोध के लिए पहचानी जाने लगी। एक साल बाद 2016 में AfD ने अपना पहला घोषणापत्र जारी किया। इसमें समलैंगिता का विरोध भी जुड़ गया। पार्टी ने स्कूलों में सेक्स और यौन विविधता से जुड़ी शिक्षा का विरोध किया। विरोधाभास: लेस्बियन होकर भी समलैंगिक शादी के खिलाफ यहीं एलिस वीडेल और AfD को लेकर विरोधाभाष दिखता है। जो पार्टी प्रवासियों और समलैंगिक विवाह के खिलाफ है, उसी पार्टी की सबसे बड़ी नेता खुद एक समलैंगिक महिला हैं और एक अप्रवासी महिला के साथ परिवार चला रही हैं। जब वीडल से पूछा गया कि वह खुद लेस्बियन होने के बावजूद ऐसी पार्टी की नेता क्यों हैं, जो समलैंगिक अधिकारों का विरोध करती है, तो उनका जवाब था कि उनका लेस्बियन होना और AfD की नेता होना ही एक बड़ा राजनीतिक संदेश है। वीडल का कहना है कि समलैंगिक लोगों के लिए सबसे बड़ा खतरा कुछ मुस्लिम गिरोहों से है। उनका तर्क है कि अगर जर्मनी दूसरे देशों से आने वाले लोगों की संख्या पर रोक लगाए और आव्रजन को सख्त करे, तो समलैंगिक लोगों की सुरक्षा बढ़ेगी। यानी वीडल अपनी लेस्बियन पहचान को AfD से अलग नहीं देखतीं। वह इसी पहचान का हवाला देकर पार्टी की प्रवासियों को लेकर सख्त नीति का बचाव करती हैं। यही विरोधाभास उन्हें AfD का एक अलग तरह का चेहरा बनाता है। वीडल समलैंगिक शादी को कानूनी मान्यता देने के खिलाफ रही हैं। हालांकि, वह समलैंगिक जोड़ों को कानूनी पार्टनरशिप देने के पक्ष में हैं। इसका मतलब है कि शादी किए बिना भी दो लोगों के रिश्ते को कानून की मान्यता मिल जाए और उन्हें संपत्ति, मेडिकल फैसलों और कुछ आर्थिक या पारिवारिक मामलों में कानूनी अधिकार मिल सकें। जर्मनी की अगली चांसलर की रेस में 2013 में बनी AfD को उसी साल के चुनाव में 4.7% वोट मिले थे। अब हाल के सर्वे में पार्टी को करीब 27-28% वोट मिल रहे हैं। यानी करीब एक दशक में AfD का समर्थन कई गुना बढ़ गया है। पूर्वी जर्मनी में मजबूत पकड़: सैक्सोनी और थुरिंगिया जैसे राज्यों में AfD का मजबूत आधार है। हाल ही में सैक्सोनी-अनहाल्ट में पार्टी को करीब 44% वोट मिले, जो उसका अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन है। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती सरकार बनाने की होगी। जर्मनी की दूसरी बड़ी पार्टियां अब तक AfD के साथ गठबंधन करने से इनकार करती रही हैं। इसलिए सिर्फ सबसे ज्यादा वोट मिल जाना वीडल के चांसलर बनने के लिए काफी नहीं होगा। उन्हें सरकार बनाने के लिए दूसरी पार्टियों का समर्थन भी हासिल करना होगा। यही तय करेगा कि AfD की बढ़ती ताकत 2029 में एलिस वीडल को जर्मनी की चांसलर की कुर्सी तक पहुंचा पाती है या नहीं। ————————– यह खबर भी पढ़ें… जर्मनी में पहली बार कट्टरपंथी AfD पार्टी ने चुनाव जीता:यूरोप में दक्षिणपंथी पार्टियों का दबदबा बढ़ा, फ्रांस में ले-पेन, ब्रिटेन में नाइजल फराज मजबूत

पूर्वी जर्मनी के छोटे से राज्य सैक्सोनी-अनहाल्ट में रविवार को दक्षिणपंथी पार्टी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (AfD) ने बड़ी जीत हासिल की। यूरोप में शायद पहली बार हुआ है जब किसी राज्य चुनाव के नतीजे को लोकतंत्र के भविष्य से इतना जोड़कर देखा गया है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

जर्मनी की दक्षिणपंथी पार्टी का चेहरा एलिस वीडल कैसे बनीं:खुद लेस्बियन, पार्टनर श्रीलंका में जन्मी; फिर भी समलैंगिक शादी और प्रवासियों के खिलाफ

जर्मनी के सैक्सोनी-आनहाल्ट में सितंबर 2026 के चुनाव में अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (AfD) ने बड़ी जीत हासिल की है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह पहली बार है, जब जर्मनी में कोई दक्षिणपंथी पार्टी किसी राज्य में इतनी बड़ी जीत के साथ सत्ता के करीब पहुंची है। AfD दूसरे देशों से आकर जर्मनी में बसे लोगों और समलैंगिक शादी के खिलाफ अपने सख्त रुख के लिए जानी जाती है। लेकिन इस पार्टी की कहानी में एक बात सबसे ज्यादा चौंकाती है। AfD की चीफ एलिस वीडल खुद लेस्बियन हैं। उनकी पार्टनर श्रीलंका में जन्मी हैं। यानी जिस पार्टी की नीतियां समलैंगिक शादी और प्रवासियों के खिलाफ हैं, उसी पार्टी की सबसे ताकतवर नेता की अपनी निजी जिंदगी इससे बिल्कुल अलग है। जर्मनी में AfD के बढ़ते प्रभाव के पीछे वीडल का बड़ा हाथ माना जाता है। लेकिन उनकी राजनीति को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि आखिर एलिस वीडल कौन हैं और वह ऐसी पार्टी का चेहरा कैसे बनीं, जिसकी सोच उनकी अपनी जिंदगी से बिल्कुल अलग है? बचपन: दादा हिटलर समर्थक थे, घर छोड़कर भागना पड़ा जर्मन अखबार डाय वेल्ट के मुताबिक वीडल का बचपन ऐसे माहौल में बीता, जहां राजनीति को लेकर काफी चर्चा होती थी। हालांकि, उनके माता-पिता किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़े नहीं थे। वीडल के दादा हंस वीडल हिटलर की नाजी पार्टी से जुड़े हुए थे। इस दौरान उनकी काफी तरक्की हुई। हिटलर ने उन्हें 1941 में नाजी कब्जे वाले वारसॉ में सैन्य न्यायधीश बनाया था। वीडल परिवार तब सिलेसिया में रहता था। यह अब पोलैंड का इलाका है। द्वितीय विश्व युद्ध में जब हिटलर की हार हुई तो वे भागकर पश्चिमी जर्मनी पहुंचे। यहां वीडल परिवार ने फर्नीचर का काम शुरू किया। 1979 में एलिस वीडल का जन्म हुआ। वह सिर्फ 6 साल की थीं, जब उनके दादा की मौत हो गई। एलिस के मुताबिक, नाजी शासन के दौरान उनके दादा ने क्या काम किए थे, इस बारे में परिवार में कभी बातचीत नहीं हुई। टीचर को चिढ़ाने के लिए मर्सिडीज से स्कूल जाती थीं अपने स्कूली दिनों को लेकर वीडल ने बताया कि उनके स्कूल के ज्यादातर शिक्षक वामपंथी विचारधारा से प्रभावित थे। वह कहती हैं, वे मुझे पसंद नहीं करते थे और मैं भी उन्हें पसंद नहीं करती थी। उनको चिढ़ाने के लिए मैं अपने पिता की मर्सिडीज से स्कूल जाती थी स्कूली दिनों में वीडल डॉक्टर बनना चाहती थीं। लेकिन उनके पिता इसके खिलाफ थे। उनका कहना था कि डॉक्टर की पूरी जिंदगी बीमार लोगों के बीच गुजरती है। ऐसे पेशे में जाने का कोई मतलब नहीं है। पिता की सलाह पर वीडल ने इकोनॉमिक्स और बिजनेस की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने बैंकिंग और बिजनेस में करियर शुरू किया। कुछ समय उन्होंने अमेरिकी इनवेस्टमेंट कंपनी गोल्डमैन सैक्स में काम किया। इसके बाद वह चीन चली गईं। मंदारिन सीखी, चीन की अर्थव्यवस्था समझी चीन में वीडल ने बैंक ऑफ चाइना में काम किया और 5 साल तक वहां रहीं। इसी दौरान उन्होंने मंदारिन यानी चीनी भाषा सीखी और बिजनेस कंसल्टेंट के तौर पर भी काम किया। चीन में रहते हुए उनकी दिलचस्पी वहां की अर्थव्यवस्था में बढ़ी और उन्होंने चीन की पेंशन व्यवस्था के भविष्य पर रिसर्च शुरू की। 2011 में उन्होंने इसी विषय पर डॉक्टरेट पूरी की और फिर जर्मनी लौट आईं। वीडल अर्थशास्त्र पढ़ चुकी थीं, बैंक में काम कर चुकी थीं और चीन में कई साल बिता चुकी थीं। यानी राजनीति में आने से पहले ही उन्हें पैसे, कारोबार और दुनियादारी की अच्छी समझ हो गई थी। प्यार-परिवार: पार्टनर के ताना मारने पर राजनीति में एंट्री साल 2007 में वीडल की मुलाकात सारा बॉसार्ड से हुई। सारा स्विट्जरलैंड की फिल्म निर्माता हैं। सारा का जन्म श्रीलंका में हुआ था। जब वह सिर्फ तीन महीने की थीं, तब स्विट्जरलैंड के एक पादरी दंपती ने उन्हें गोद ले लिया था। वीडल और सारा की दोस्ती धीरे-धीरे रिश्ते में बदल गई। दोनों 2009 से साथ हैं। वे स्विट्जरलैंड में अपने दो बेटों के साथ रहती हैं और मिलकर उनकी परवरिश करती हैं। सारा बोसार्ड ने दोनों बच्चों को स्पर्म डोनेशन की मदद से जन्म दिया। दोनों बच्चों के जैविक पिता अलग-अलग पुरुष हैं। यह कोई गुमनाम स्पर्म बैंक का मामला नहीं था। वीडल और सारा दोनों बच्चों के जैविक पिताओं को जानती हैं और बच्चों को भी अपने जैविक पिता की पहचान पता है। हालांकि, इन दोनों पुरुषों की पहचान सार्वजनिक नहीं की गई है। वीडल के मुताबिक, AfD में शामिल होने का आइडिया उन्हें उनकी पार्टनर सारा से ही मिला था। एक पार्टी में वीडल लगातार यूरोपीय संघ की राजनीति पर बातें किए जा रही थीं। उनकी लंबी-लंबी बातें सुनकर सारा परेशान हो गईं। उन्होंने वीडल से कहा, अगर राजनीति पर इतनी ही बातें करनी हैं तो खुद राजनीति में क्यों नहीं चली जातीं? सारा की यह बात वीडल के मन में बैठ गई… राजनीति: देखते ही देखते AfD का सबसे बड़ा चेहरा बन गईं 2013 में वीडल नई-नई बनी AfD पार्टी से जुड़ गईं। उस समय पार्टी का मुख्य मुद्दा प्रवासी या समलैंगिक विवाह नहीं, बल्कि यूरो और यूरोजोन संकट था। AfD इस बात के खिलाफ थी कि जर्मनी आर्थिक संकट से जूझ रहे दूसरे यूरोपीय देशों को लगातार पैसे दे। वीडल भी यूरो को लेकर जर्मनी की नीतियों की आलोचना करती थीं। यही वजह थी कि वह इस नई पार्टी के साथ जुड़ीं। AfD में शामिल होने के बाद वीडल का कद तेजी से बढ़ने लगा। कुछ ही समय में वह पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व में पहुंच गईं। उनकी पहचान ऐसी नेता के तौर पर बनने लगी, जो आर्थिक मामलों को अच्छी तरह समझती थीं और पार्टी की बात को मीडिया के सामने मजबूती से रख सकती थीं। 2015 में बदली AfD की सियासत, शरणार्थी को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया फिर आया 2015, वह साल जिसने जर्मनी की राजनीति की दिशा बदल दी। सीरिया में 2011 से चल रहा गृहयुद्ध और ज्यादा हिंसक हो चुका था। अपनी जान बचाने के लिए लाखों लोग घर छोड़कर सुरक्षित ठिकाने की तलाश में निकल पड़े। सिर्फ सीरिया ही नहीं, अफगानिस्तान, इराक और कुछ दूसरे देशों में युद्ध और हिंसा से परेशान लोग भी यूरोप की ओर बढ़ने लगे। कुछ ही महीनों में यूरोप पहुंचने वाले शरणार्थियों की संख्या तेजी से बढ़ गई और बड़ी संख्या में लोग जर्मनी पहुंचने लगे। शरणार्थी संकट AfD के लिए बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया। यानी जो पार्टी शुरुआत में यूरो और आर्थिक मुद्दों को लेकर बनी थी, वह धीरे-धीरे प्रवासियों और शरणार्थियों के विरोध के लिए पहचानी जाने लगी। एक साल बाद 2016 में AfD ने अपना पहला घोषणापत्र जारी किया। इसमें समलैंगिता का विरोध भी जुड़ गया। पार्टी ने स्कूलों में सेक्स और यौन विविधता से जुड़ी शिक्षा का विरोध किया। विरोधाभास: लेस्बियन होकर भी समलैंगिक शादी के खिलाफ यहीं एलिस वीडल और AfD को लेकर विरोधाभाष दिखता है। जो पार्टी प्रवासियों और समलैंगिक विवाह के खिलाफ है, उसी पार्टी की सबसे बड़ी नेता खुद एक समलैंगिक महिला हैं और एक अप्रवासी महिला के साथ परिवार चला रही हैं। जब वीडल से पूछा गया कि वह खुद लेस्बियन होने के बावजूद ऐसी पार्टी की नेता क्यों हैं, जो समलैंगिक अधिकारों का विरोध करती है, तो उनका जवाब था कि उनका लेस्बियन होना और AfD की नेता होना ही एक बड़ा राजनीतिक संदेश है। वीडल का कहना है कि समलैंगिक लोगों के लिए सबसे बड़ा खतरा कुछ मुस्लिम गिरोहों से है। उनका तर्क है कि अगर जर्मनी दूसरे देशों से आने वाले लोगों की संख्या पर रोक लगाए और आव्रजन को सख्त करे, तो समलैंगिक लोगों की सुरक्षा बढ़ेगी। यानी वीडल अपनी लेस्बियन पहचान को AfD से अलग नहीं देखतीं। वह इसी पहचान का हवाला देकर पार्टी की प्रवासियों को लेकर सख्त नीति का बचाव करती हैं। यही विरोधाभास उन्हें AfD का एक अलग तरह का चेहरा बनाता है। 2017 में वीडल ने खुद कहा था कि उनकी निजी जिंदगी और पार्टी की पारिवारिक नीति में पूरी तरह समानता नहीं है। उन्होंने यह भी माना था कि वह परिवार नीति के मामले में पार्टी लाइन से ज्यादा उदार हैं। वीडल समलैंगिक शादी को कानूनी मान्यता देने के खिलाफ रही हैं। हालांकि, वह समलैंगिक जोड़ों को कानूनी पार्टनरशिप देने के पक्ष में हैं। कानूनी पार्टनरशिप का मतलब है शादी किए बिना भी दो लोगों के रिश्ते को कानून की मान्यता मिल जाए और उन्हें संपत्ति, मेडिकल फैसलों और कुछ आर्थिक या पारिवारिक मामलों में कानूनी अधिकार मिल सकें। जर्मनी की अगली चांसलर की रेस में 2013 में बनी AfD को उसी साल के चुनाव में 4.7% वोट मिले थे। अब हाल के सर्वे में पार्टी को करीब 27-28% वोट मिल रहे हैं। यानी करीब एक दशक में AfD का समर्थन कई गुना बढ़ गया है। पूर्वी जर्मनी में मजबूत पकड़: सैक्सोनी और थुरिंगिया जैसे राज्यों में AfD का मजबूत आधार है। हाल ही में सैक्सोनी-अनहाल्ट में पार्टी को करीब 44% वोट मिले, जो उसका अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन है। अब AfD सबसे बड़ी चुनौती सरकार बनाने की होगी। जर्मनी की दूसरी बड़ी पार्टियां अब तक AfD के साथ गठबंधन करने से इनकार करती रही हैं। इसलिए सिर्फ सबसे ज्यादा वोट मिल जाना वीडल के चांसलर बनने के लिए काफी नहीं होगा। उन्हें सरकार बनाने के लिए दूसरी पार्टियों का समर्थन भी हासिल करना होगा। यही तय करेगा कि AfD की बढ़ती ताकत 2029 में एलिस वीडल को जर्मनी की चांसलर की कुर्सी तक पहुंचा पाती है या नहीं। ————————– यह खबर भी पढ़ें… जर्मनी में पहली बार कट्टरपंथी AfD पार्टी ने चुनाव जीता:यूरोप में दक्षिणपंथी पार्टियों का दबदबा बढ़ा, फ्रांस में ले-पेन, ब्रिटेन में नाइजल फराज मजबूत

पूर्वी जर्मनी के छोटे से राज्य सैक्सोनी-अनहाल्ट में रविवार को दक्षिणपंथी पार्टी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (AfD) ने बड़ी जीत हासिल की। यूरोप में शायद पहली बार हुआ है जब किसी राज्य चुनाव के नतीजे को लोकतंत्र के भविष्य से इतना जोड़कर देखा गया है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

8th Pay Commission Pension: 8वें वेतन आयोग में कितनी बढ़ेगी पेंशन? समझिए फिटमेंट फैक्टर का पूरा गणित

8th Pay Commission Pension Calculator: 8वें वेतन आयोग को लेकर केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के बीच चर्चाएं तेज हैं। अगर सरकार 8वें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करती है, तो पेंशनर्स की बुनियादी पेंशन में एक बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है।

मौजूदा 7वें वेतन आयोग के नियमों के मुताबिक, रिटायरमेंट के समय किसी भी पात्र केंद्रीय कर्मचारी की पेंशन उसकी आखिरी बेसिक पे या औसत वेतन का 50 फीसदी तय की जाती है। स्टाफ-साइड नेशनल काउंसिल (NC-JCM) ने 8वें वेतन आयोग के तहत 3.833 के फिटमेंट फैक्टर और सालाना इंक्रीमेंट को 3% से बढ़ाकर 6% करने का प्रस्ताव रखा है।

आइए आसान भाषा में गणित और कैलकुलेटर के जरिए समझते हैं कि लेवल 7 के केंद्रीय कर्मचारी की पेंशन में अलग-अलग फिटमेंट फैक्टर के हिसाब से कितना इजाफा हो सकता है।

पहले जानिए कैसे तय होती है पेंशन?

7वें वेतन आयोग के तहत रिवाइज्ड पेंशन निकालने का फॉर्मूला इस प्रकार है:

शुरुआती बेसिक पे का 50% ✕ फिटमेंट फैक्टर= रिवाइज्ड बेसिक पेंशन

7वें वेतन आयोग में लेवल 7 के कर्मचारी की शुरुआती बेसिक पे ₹44,900 होती है।इसका 50% यानी बेस पेंशन ₹22,450 बनती है।

अलग-अलग फिटमेंट फैक्टर पर लेवल 7 पेंशनर्स की कितनी बढ़ेगी पेंशन?

अगर सरकार मौजूदा 50% वाले पेंशन फ्रेमवर्क को बरकरार रखती है, तो अलग-अलग संभावित फिटमेंट फैक्टर (2.24, 2.57 और 3.833) के आधार पर पेंशन का अनुमान नीचे दी गई तालिका में दिया गया है:

अलग-अलग फिटमेंट फैक्टर पर लेवल 7 पेंशनर्स की कितनी बढ़ेगी पेंशन?

कर्मचारियों की क्या है मांग?

कर्मचारी यूनियनों की प्रतिनिधि संस्था NC-JCM ने मांग की है कि 8वें वेतन आयोग में न्यूनतम वेतन को बढ़ाकर ₹69,000 किया जाए। इसके लिए उन्होंने 3.833 फिटमेंट फैक्टर लागू करने का प्रस्ताव दिया है। अगर यह मांग मंजूर होती है, तो लेवल 7 के पेंशनर्स की बेसिक पेंशन सीधे ₹22,450 से बढ़कर ₹86,050 से अधिक हो सकती है।

ध्यान दें: यह पूरी गणना शुरुआती बेसिक पे के आधार पर एक अनुमानित उदाहरण है। 8वें वेतन आयोग के तहत पेंशन की अंतिम रूपरेखा आयोग की सिफारिशों और केंद्र सरकार के अंतिम फैसले पर ही निर्भर करेगी।

8th Pay Commission: एक्शन में 8वां वेतन आयोग! कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए ये है 5 बड़े अपडेट्स

8th Pay Commission Latest News: केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए 8वें वेतन आयोग से जुड़ी बड़ी खबर है। आयोग का दो दिवसीय चेन्नई दौरा आज, 7 सितंबर से शुरू हो गया है। 7 और 8 सितंबर के इस दौरे के दौरान आयोग कर्मचारी यूनियनों और प्रमुख हितधारकों से मुलाकात कर उनकी मांगों, चिंताओं और सुझावों पर सीधी चर्चा करेगा।

चेन्नई से पहले आयोग दिल्ली, लद्दाख, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और ओडिशा जैसे राज्यों का दौरा कर चुका है। आइए आपको बताते हैं कि इस दौरे का क्या मतलब है, बैठक में किन मुद्दों पर बात होगी और 8वें वेतन आयोग को लेकर अब तक के 5 सबसे बड़े अपडेट्स क्या हैं।

चेन्नई बैठक में किन अहम मुद्दों पर होगी चर्चा?

इस दो दिवसीय बैठक में कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के वेतन और भत्तों में संशोधन को लेकर मुख्य रूप से इन मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा:

  • फिटमेंट फैक्टर: बेसिक सैलरी और पेंशन बढ़ाने के लिए सबसे अहम ‘फिटमेंट फैक्टर’ के मल्टीपल पर चर्चा।
  • सैलरी और पेंशन रिवीजन: सेवारत कर्मचारियों के वेतन और रिटायर्ड कर्मचारियों की पेंशन में सुधार।
  • भत्ते: महंगाई भत्ते (DA) समेत अन्य भत्तों में बढ़ोतरी के सुझाव।
  • वर्किंग कंडीशंस: कर्मचारियों के काम करने के माहौल को बेहतर बनाने पर राय।

8वें वेतन आयोग की वेबसाइट के 5 सबसे नए अपडेट्स

वेतन आयोग ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर आने वाले महीनों के बैठकों और दौरों का पूरा शेड्यूल जारी किया है:

8वें वेतन आयोग की वेबसाइट के 5 सबसे नए अपडेट्स

केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए इसका क्या अर्थ है?

केंद्र सरकार ने 3 नवंबर 2025 को 8वें वेतन आयोग का गठन किया था और इसे अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपने के लिए 18 महीने का समय दिया गया था। 18 महीने की समयसीमा में से आयोग अब तक 10 महीने का काम पूरा कर चुका है और लगातार अलग-अलग राज्यों का दौरा कर रिपोर्ट तैयार करने में जुटा है।

फिटमेंट फैक्टर पर अभी क्या है स्थिति?

सोशल मीडिया और मीडिया रिपोर्टों में 2.15, 2.28 या 2.57 जैसे फिटमेंट फैक्टर को लेकर तरह-तरह के गणित और अनुमान लगाए जा रहे हैं। लेकिन कर्मचारियों को यह समझना जरूरी है कि अभी तक किसी भी फिटमेंट फैक्टर या सैलरी में बढ़ोतरी को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। ऐतिहासिक संदर्भ:

6ठां वेतन आयोग: फिटमेंट फैक्टर 1.86 था।

7वां वेतन आयोग: फिटमेंट फैक्टर 2.57 तय किया गया था।

अब देखना होगा कि 8वां वेतन आयोग किस फिटमेंट फैक्टर की सिफारिश करता है। अंतिम मुहर सरकार की सिफारिशें स्वीकार करने के बाद ही लगेगी।

आगे का पूरा शेड्यूल

चेन्नई दौरे के बाद आयोग का शेड्यूल काफी व्यस्त रहने वाला है:

9 सितंबर 2026: पुडुचेरी

16 से 18 सितंबर 2026: चंडीगढ़

7 और 8 अक्टूबर 2026: बेंगलुरु

Housing Prices: घर बनवाना महंगा हुआ! 5 साल में 34% बढ़ी लागत; ईरान संकट ने और बढ़ाई मुश्किल

Housing Prices: देश के सात बड़े शहरों में घरों की कीमत तेजी से बढ़ी है। 2021 से 2025 के बीच इनमें 59% का उछाल आया। वहीं, इसी दौरान घर बनाने की लागत करीब 34% बढ़ी। यानी घरों का दाम निर्माण लागत के मुकाबले काफी तेज बढ़ी है। Anarock Research की रिपोर्ट में इसकी बड़ी वजह जमीन की बढ़ती कीमतों को बताया गया है।

दाम किस तरह से बढ़ रहे हैं?

2021 में एक स्टैंडर्ड-प्लस रेजिडेंशियल प्रोजेक्ट की औसत निर्माण लागत ₹2,681 प्रति वर्ग फुट थी। 2025 में यह बढ़कर ₹3,604 प्रति वर्ग फुट हो गई। यानी सालाना करीब 6.9% की बढ़ोतरी हुई।

दूसरी तरफ, घरों की औसत कीमत 2021 में ₹5,826 प्रति वर्ग फुट थी। 2025 में यह बढ़कर ₹9,260 प्रति वर्ग फुट हो गई। इसकी सालाना बढ़ोतरी करीब 12% रही।

निर्माण लागत का कितना हाथ?

Anarock के मुताबिक, घरों की कीमत बढ़ने में करीब 66% योगदान निर्माण लागत का रहा। बाकी 34% बढ़ोतरी जमीन की कीमत, डेवलपर मार्जिन और मांग-सप्लाई जैसे कारणों से हुई।

Anarock Group के वाइस चेयरमैन संतोष कुमार के मुताबिक, पिछले पांच साल में बड़े शहरों में जमीन की कीमत तेजी से बढ़ी है। इंफ्रास्ट्रक्चर, मांग-सप्लाई, लोकेशन और डेवलपर की कीमत तय करने की रणनीति का भी असर पड़ा है।

जमीन की कीमत 120% तक बढ़ी

रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 से 2026 की पहली छमाही के बीच सात बड़े शहरों में जमीन की कीमत 50-120% तक बढ़ी। NCR में जमीन की कीमत 70-130% तक बढ़ी। बेंगलुरु में भी इसमें 60-120% का उछाल आया।

संतोष कुमार के मुताबिक, महंगी जमीन का सीधा असर प्रोजेक्ट की लागत और घर की कीमत पर पड़ता है। खासकर उन इलाकों में जहां इंफ्रास्ट्रक्चर तेजी से बन रहा है। ऐसे इलाकों में प्रोजेक्ट शुरू होने से पहले ही जमीन महंगी हो जाती है।

पश्चिम एशिया तनाव से भी बढ़ा दबाव

निर्माण लागत पर अब ईरान युद्ध यानी पश्चिम एशिया विवाद का भी असर पड़ा है। Anarock का अनुमान है कि इससे कुल निर्माण लागत में 8-10% की और बढ़ोतरी हुई है। स्टील और ईंधन से जुड़ी लॉजिस्टिक्स लागत सबसे ज्यादा बढ़ी है।

स्टील की कीमत करीब 20% बढ़ी है। TMT बार करीब ₹72,000 प्रति टन पहुंच गया है। ईंधन और साइट लॉजिस्टिक्स की लागत 15-20% बढ़ी है। टाइल्स, ग्लास और हार्डवेयर जैसे फिनिशिंग मटेरियल भी 8-12% महंगे हुए हैं। वहीं MEP यानी मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल और प्लंबिंग की लागत 9-13% बढ़ी है।

लेबर अभी भी सबसे बड़ा खर्च

किसी प्रोजेक्ट की कुल लागत में लेबर का हिस्सा करीब 25-30% है। हालांकि, इसकी लागत में बढ़ोतरी बाकी चीजों के मुकाबले कम रही। लेबर कॉस्ट करीब 5-6% बढ़ी है। सीमेंट की कीमत में भी करीब 4-5% की बढ़ोतरी हुई है।

MEP लागत में तेजी ज्यादा रही। 2023 से 2025 के बीच कोर बिल्डिंग की लागत 13% बढ़कर ₹2,212 प्रति वर्ग फुट हो गई। वहीं MEP लागत 17% से ज्यादा बढ़कर ₹788 प्रति वर्ग फुट पहुंच गई। 2025 में कुल निर्माण लागत में MEP का हिस्सा करीब 22% था।

नए और पुराने प्रोजेक्ट पर अलग असर

बढ़ती लागत से पहले लॉन्च और बिक चुके प्रोजेक्ट पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसे प्रोजेक्ट में डेवलपर के पास कीमत बढ़ाने की गुंजाइश कम होती है। इससे मार्जिन प्रभावित हो सकता है।

नए प्रोजेक्ट में कीमत बढ़ाने की गुंजाइश ज्यादा है। लेकिन यहां भी एक सीमा है। मिड-इनकम और अफोर्डेबल हाउसिंग में ज्यादा कीमत बढ़ाना मुश्किल हो सकता है। इसकी वजह घर खरीदारों की सीमित भुगतान क्षमता है।

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