ट्रम्प ने टाटा-विप्रो को ग्रीन कार्ड प्रोग्राम से सस्पेंड किया:8 आईटी कंपनियों के खिलाफ एक्शन, अमेरिका में काम कर रहे भारतीयों पर सीधा असर

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के प्रशासन ने गुरुवार को 8 बड़ी आईटी कंपनियों को ग्रीन कार्ड प्रोग्राम से सस्पेंड कर दिया है। इनमें चार भारतीय कंपनियां टाटा, इंफोसिस, विप्रो और एचसीएल भी शामिल हैं। इनके अलावा माइक्रोसॉफ्ट, एडोबी, कॉग्निजेंट और कैपजेमिनी पर भी एक्शन लिया गया है। अब ये सभी कंपनियां अपने कर्मचारियों के लिए परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम के लिए एप्लीकेशन नहीं दे पाएंगी। इसके तहत कंपनियां H-1B वीजा वाले कर्मचारियों के लिए ग्रीन कार्ड के लिए अप्लाई करती है। इस फैसले के बाद ट्रम्प सरकार ने कहा कि हम अमेरिकियों की नौकरियां छीनकर विदेशियों को नौकरी पर नहीं रख सकते। फैसले के बाद इन कंपनियों के जरिए अमेरिका में ग्रीन कार्ड पाने की कोशिश कर रहे हजारों भारतीय कर्मचारियों की प्रॉसेस रुक सकती है। सवाल- इन कंपनियों के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई? जवाब- अमेरिकी श्रम विभाग ने इन कंपनियों को PERM यानी परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रक्रिया से सस्पेंड किया है। अब इन कंपनियों के नए आवेदन स्वीकार नहीं किए जाएंगे। जो आवेदन पहले से चल रहे हैं, उनकी प्रक्रिया भी रोक दी गई है। सवाल- PERM क्या होता है? जवाब- अमेरिका में किसी विदेशी कर्मचारी को नौकरी के आधार पर ग्रीन कार्ड दिलाने के लिए कंपनी को पहले यह साबित करना होता है कि उस नौकरी के लिए कोई योग्य अमेरिकी कर्मचारी उपलब्ध नहीं है। इस पूरी प्रक्रिया को PERM यानी परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन कहा जाता है। सवाल- इसका ग्रीन कार्ड से क्या संबंध है? जवाब- PERM ग्रीन कार्ड पाने की प्रक्रिया का एक जरूरी कदम है। अगर यह प्रक्रिया रुक जाती है तो कंपनी अपने कर्मचारी के ग्रीन कार्ड की आगे की प्रक्रिया भी नहीं बढ़ा पाती। सवाल- क्या भारतीय कर्मचारियों का ग्रीन कार्ड रद्द हो गया? जवाब- नहीं। जिन लोगों को पहले ही ग्रीन कार्ड मिल चुका है, उन पर इस फैसले का असर नहीं है। इसका असर उन कर्मचारियों पर पड़ सकता है जिनका ग्रीन कार्ड प्रोसेस चल रही है या जो जल्द इसके लिए आवेदन करने वाले थे। सवाल- भारतीय कर्मचारियों पर असर क्यों पड़ेगा? जवाब- टाटा, इंफोसिस, विप्रो और एचसीएल में बड़ी संख्या में भारतीय आईटी कर्मचारी अमेरिका में काम करते हैं। इनमें कई कर्मचारी H-1B वीजा पर हैं और आगे चलकर अपनी कंपनी की मदद से ग्रीन कार्ड पाने की कोशिश करते हैं। अब PERM प्रक्रिया रुकने से उनके ग्रीन कार्ड में देरी हो सकती है। सवाल- क्या H-1B वीजा भी रद्द होगा? जवाब- नहीं। H-1B वीजा और ग्रीन कार्ड अलग हैं। H-1B वीजा विदेशी कर्मचारी को कुछ समय के लिए अमेरिका में नौकरी करने की अनुमति देता है। वहीं ग्रीन कार्ड अमेरिका में स्थायी रूप से रहने और काम करने की अनुमति देता है। इसलिए PERM पर रोक लगने से H-1B वीजा अपने आप रद्द नहीं होगा। सवाल- जिनके पास पहले से ग्रीन कार्ड है, उनका क्या होगा? जवाब- उनका ग्रीन कार्ड रद्द नहीं होगा। इस फैसले का असर उन लोगों पर है जिनकी ग्रीन कार्ड प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है। सवाल- अमेरिका ने यह कार्रवाई क्यों की? जवाब- अमेरिकी श्रम मंत्री कीथ सोंडरलिंग ने आरोप लगाया कि कुछ कंपनियां विदेशी कर्मचारियों को नौकरी देने के लिए इमिग्रेशन नियमों का गलत इस्तेमाल कर रही हैं। उनके मुताबिक, 2009 से इन 8 कंपनियों ने करीब 30 लाख विदेशी कर्मचारियों के लिए आवेदन किए। इस दौरान उन्हें 2.30 लाख से ज्यादा H-1B वीजा और 1 लाख से ज्यादा PERM मंजूरियां मिलीं। सोंडरलिंग का दावा है कि इससे अमेरिकी कर्मचारियों की बड़ी संख्या में नौकरियां प्रभावित हुईं। हालांकि, कंपनियों के खिलाफ लगाए गए आरोप अभी अंतिम रूप से साबित नहीं हुए हैं। सवाल- जेडी वेंस ने माइक्रोसॉफ्ट पर क्या आरोप लगाया? जवाब- अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि माइक्रोसॉफ्ट ने पिछले साल करीब 6,000 अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से हटाया, जबकि कंपनी को करीब 6,300 H-1B वीजा और 3,000 ग्रीन कार्ड मिले। वेंस का आरोप है कि कुछ कंपनियां अमेरिकी कर्मचारियों की जगह विदेशी कर्मचारियों को रखने के लिए इमिग्रेशन नियमों का इस्तेमाल कर रही हैं। सवाल- क्या सभी भारतीय आईटी कर्मचारियों पर असर पड़ेगा? जवाब- नहीं। इसका असर खास तौर पर उन भारतीय कर्मचारियों पर पड़ेगा जिनका ग्रीन कार्ड प्रोसेस इन 8 कंपनियों के जरिए चल रहा है या जो इसके लिए आवेदन करने वाले हैं। सिर्फ H-1B वीजा पर काम कर रहे कर्मचारियों का वीजा इस फैसले से अपने आप रद्द नहीं होगा। सवाल- कितने भारतीय प्रभावित होंगे? जवाब- अमेरिकी सरकार ने अभी यह नहीं बताया है कि कितने भारतीय कर्मचारी प्रभावित होंगे। यह भी साफ नहीं है कि रोक कितने समय तक रहेगी। हालांकि, टाटा, इंफोसिस, विप्रो और एचसीएल जैसी बड़ी भारतीय कंपनियों के शामिल होने से बड़ी संख्या में भारतीय कर्मचारियों की ग्रीन कार्ड योजनाओं पर असर पड़ने की आशंका है। सवाल- अब आगे क्या होगा? जवाब- फिलहाल इन कंपनियों के नए PERM आवेदन स्वीकार नहीं किए जाएंगे और पुराने लंबित आवेदनों की प्रक्रिया भी रुकी रहेगी। अब इन कंपनियों के कर्मचारियों का ग्रीन कार्ड प्रोसेस कब शुरू होगा, यह अमेरिकी सरकार के अगले फैसले पर निर्भर करेगा।

फील्डमार्शल ने नए डीजल इंजन लॉन्च किए, टैक्ट्रर और खेती की मशीनों में आएंगे काम; ARAI से मिली मंजूरी

इंजीनियरिंग कंपनी Fieldmarshal P.M. Diesels Private Limited ने 15 HP और 18 HP कैटेगरी में नए सिंगल-सिलेंडर डीजल इंजन लॉन्च किए हैं। कंपनी के मुताबिक, ये भारत के पहले ARAI-अप्रूव्ड और TREM V-कम्प्लायंट सिंगल-सिलेंडर डीजल इंजन हैं। यह लॉन्च कंपनी के 60 साल से ज्यादा लंबे इंजीनियरिंग सफर में अहम पड़ाव है।

कॉम्पैक्ट ट्रैक्टर और खेती की मशीनों के लिए डिजाइन

नए इंजन खास तौर पर कॉम्पैक्ट ट्रैक्टर और खेती की मशीनों के लिए बनाए गए हैं। कंपनी का कहना है कि इनमें बेहतर टेक्नोलॉजी, ईंधन की बचत और मजबूती पर फोकस किया गया है। साथ ही, इनका डिजाइन कॉम्पैक्ट रखा गया है, ताकि खेती से जुड़े अलग-अलग कामों में इनका इस्तेमाल आसान हो।

देश में विकसित की गई EGR टेक्नोलॉजी

इन इंजनों में भारत में विकसित EGR सिस्टम लगाया गया है। यह उत्सर्जन को कम करने में मदद करता है। साथ ही, इंजन के सुचारू संचालन पर भी फोकस किया गया है। कंपनी के मुताबिक, यह टेक्नोलॉजी नए TREM V उत्सर्जन मानकों का पालन सुनिश्चित करती है।

TREM V टेक्नोलॉजी के लिए पेटेंट फाइलिंग

Fieldmarshal ने अपनी TREM V इंजन टेक्नोलॉजी से जुड़ी कई राष्ट्रीय पेटेंट फाइलिंग भी की हैं। कंपनी के मुताबिक, इससे देश में ही R&D, इंजीनियरिंग और बौद्धिक संपदा तैयार करने पर उसका फोकस दिखता है।

कंपनी अब एडवांस्ड इंजन, ट्रैक्टर और खेती के मशीनीकरण से जुड़े समाधान विकसित करने पर आगे बढ़ रही है। इसके अलावा कृषि, स्वच्छ ऊर्जा, जल समाधान और बुनियादी ढांचे के क्षेत्रों में भी विस्तार की योजना है।

कंपनी ने क्या कहा?

Fieldmarshal P.M. Diesels के डायरेक्टर ऋषि पटेल ने कहा कि TREM V इंजन प्लेटफॉर्म कंपनी की इंजीनियरिंग यात्रा में एक अहम पड़ाव है। उन्होंने कहा कि छह दशकों से ज्यादा समय से कंपनी का फोकस ऐसे प्रोडक्ट बनाने पर रहा है, जो वास्तविक कामकाजी परिस्थितियों में भरोसेमंद प्रदर्शन दे सकें।

उन्होंने कहा कि ARAI से मंजूर TREM V-कम्प्लायंट 15 HP और 18 HP सिंगल-सिलेंडर इंजन का लॉन्च और इससे जुड़ी पेटेंट फाइलिंग भारत की इंजीनियरिंग क्षमताओं को दिखाती है।

अमेरिका ने माइक्रोसॉफ्ट, TCS, विप्रो, इंफोसिस को ग्रीन कार्ड प्रोग्राम से सस्पेंड किया, H-1B के दुरुपयोग का आरोप

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

अमेरिका ने माइक्रोसॉफ्ट, TCS, विप्रो, इंफोसिस को ग्रीन कार्ड प्रोग्राम से सस्पेंड किया, H-1B के दुरुपयोग का आरोप

ट्रंप प्रशासन ने माइक्रोसॉफ्ट, TCS और इंफोसिस समेत कई टेक कंपनियों के खिलाफ बड़ा कदम उठाया है। अमेरिका ने इन कंपनियों को एक इमिग्रेशन प्रोग्राम से सस्पेंड कर दिया है। प्रशासन का आरोप है कि इन कंपनियों ने वर्कर वीजा सिस्टम का बड़े पैमाने पर गलत इस्तेमाल किया।

अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने गुरुवार को वॉशिंगटन में इसकी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य से अमेरिका में किसी कंपनी ने इस सिस्टम का माइक्रोसॉफ्ट से ज्यादा गलत इस्तेमाल नहीं किया है।

Infosys, Wipro और HCL भी कार्रवाई के दायरे में

अमेरिकी श्रम सचिव Keith Sonderling ने बताया कि Microsoft के अलावा कई दूसरी टेक कंपनियों पर भी कार्रवाई हुई है। इनमें Cognizant Technology Solutions, Infosys, TCS, Wipro, HCL Technologies और Capgemini शामिल हैं।

Sonderling ने कहा कि इस मामले में कई संघीय जांच चल रही हैं। जिस प्रोग्राम पर कार्रवाई हुई है, वह अमेरिकी कंपनियों को विदेशी कर्मचारियों के लिए स्थायी निवास यानी ग्रीन कार्ड स्पॉन्सर करने में मदद करता है।

ट्रंप प्रशासन क्यों सख्त हुआ?

ट्रंप प्रशासन लंबे समय से इमिग्रेशन सिस्टम पर सख्ती की बात करता रहा है। अब कानूनी और गैर-कानूनी दोनों रास्तों से होने वाले प्रवासन पर कार्रवाई बढ़ाई जा रही है।

H-1B वीजा प्रोग्राम भी लंबे समय से ट्रंप के समर्थकों के निशाने पर है। उनका कहना है कि इस प्रोग्राम से अमेरिकी कर्मचारियों के रोजगार के अवसर प्रभावित होते हैं।

ट्रंप समर्थक यह भी आरोप लगाते रहे हैं कि H-1B सिस्टम में बड़े पैमाने पर गलत इस्तेमाल होता है। इसी वजह से यह प्रोग्राम अमेरिकी इमिग्रेशन पॉलिसी की बहस में लगातार बना हुआ है।

कंपनियों के लिए क्या मतलब है?

इस फैसले से सबसे बड़ी चिंता विदेशी कर्मचारियों को अमेरिका में लंबे समय तक रखने की प्रक्रिया को लेकर है। ग्रीन कार्ड स्पॉन्सरिंग पर असर पड़ने से कंपनियों के लिए विदेशी कर्मचारियों की लॉन्ग टर्म प्लानिंग मुश्किल हो सकती है।

इसका असर खासकर उन भारतीय आईटी कंपनियों पर पड़ सकता है, जिनका अमेरिकी कारोबार बड़ा है और जो बड़ी संख्या में भारतीय टेक प्रोफेशनल्स को अमेरिका में भेजती हैं। हालांकि, इस फैसले का वास्तविक वित्तीय असर कितना होगा, यह आगे होने वाली संघीय जांच और सरकार के अगले कदमों पर निर्भर करेगा।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

वेबदुनिया के 27 साल: 23 सितंबर 1999 को शुरू हुआ हिंदी इंटरनेट का ऐतिहासिक सफर

वेबदुनिया के 27 साल: 23 सितंबर 1999 को शुरू हुआ हिंदी इंटरनेट का ऐतिहासिक सफर

webdunia  27th anniversary

वेबदुनिया डॉट कॉम केवल एक वेबसाइट या डिजिटल मंच भर नहीं है, बल्कि यह भारत में भाषाई डिजिटल क्रांति का वह अग्रदूत है जिसने वैश्विक पटल पर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं का परचम लहराया। 23 सितंबर 1999 का दिन हिंदी इंटरनेट के इतिहास में एक मील का पत्थर और स्वर्णिम अध्याय सिद्ध हुआ, जब दुनिया के पहले हिंदी पोर्टल ‘वेबदुनिया’ का आधिकारिक आगाज हुआ। जिस दौर में इंटरनेट का दायरा केवल अंग्रेजी भाषा तक सीमित माना जाता था और भाषाई सीमाओं के कारण बहुसंख्यक भारतवासी सूचना-प्रौद्योगिकी के इस महामार्ग से कटे हुए थे, उस समय वेबदुनिया ने आकर भारतीय भाषाई समाज के लिए डिजिटल युग के नए द्वार खोल दिए।

 

तकनीकी नवाचार और फोंट की समस्या का ऐतिहासिक समाधान

शुरुआती दौर में हिंदी इंटरनेट के समक्ष सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती फोंट की असमानता (Non-compatibility) थी। पाठक या उपयोगकर्ता तक हिंदी सामग्री तब तक नहीं पहुँच पाती थी जब तक उनके कंप्यूटर में संबंधित विशेष फोंट डाउनलोड न हो। वेबदुनिया ने इस बाधा को भांपते हुए ‘डायनैमिक फोंट’ (Dynamic Font) की क्रांतिकारी तकनीक विकसित की। इस नवाचार के माध्यम से पाठकों को बिना किसी अतिरिक्त फोंट को डाउनलोड किए सीधे हिंदी सामग्री पढ़ने की सुविधा मिली। इस एक तकनीकी छलांग ने हिंदी को सीधे वेब पेजों पर ला खड़ा किया और भारतीय भाषाई इंटरनेट के स्वप्न को पूर्ण यथार्थ में बदल दिया।

 

27 वर्षों की निर्बाध यात्रा और निरंतर विस्तार

वेबदुनिया ने 23 सितंबर 2026 को अपनी अनवरत और सफलतम यात्रा के 27 वर्ष पूरे कर लिए हैं। समय के साथ यह पोर्टल केवल हिंदी तक सीमित न रहकर तमिल, तेलुगु, मराठी, गुजराती, मलयालम, कन्नड़ और बांग्ला जैसी 8 प्रमुख भारतीय भाषाओं में अपनी सेवाएं देने लगा। भारत के सुदूर ग्रामीण इलाकों में रहने वाले आम नागरिकों से लेकर दुनिया भर में फैले अप्रवासी भारतीयों (NRIs) तक, वेबदुनिया आज भी प्रामाणिक, विश्वसनीय और तथ्यपरक सामग्री का सबसे विश्वसनीय माध्यम बनी हुई है।

 

सामग्री की विविधता और अनूठे आयाम

वेबदुनिया की लोकप्रियता का एक बड़ा आधार इसकी विषय-वस्तु की विविधता और हर वर्ग के पाठक की रुचि का ध्यान रखना है। यह पोर्टल समाचार और समसामयिक विषयों से आगे बढ़कर विभिन्न विषयों पर समृद्ध सामग्री उपलब्ध कराता है:

 

राजनीति और खेल: चुनावी हलचलों की बारीकियों से लेकर क्रिकेट के रोमांच तक, वेबदुनिया अपने विशेष कवरेज और तीव्र गति से सटीक जानकारी देने के लिए जानी जाती है।

 

धर्म, अध्यात्म और कुंभ कवरेज: आस्था और भारतीय संस्कृति को केंद्र में रखते हुए पोर्टल पर संपूर्ण ‘रामचरितमानस’, ‘श्रीमद्भगवद्गीता’, ‘रामशलाका प्रश्नावली’ और प्रयागराज/हरिद्वार कुंभ का व्यापक और सीधा कवरेज उपलब्ध कराया गया।

 

ज्योतिष और पारंपरिक विद्या: जन्म कुंडली निर्माण, गुण-मिलान (पत्रिका मिलान) से लेकर आधुनिक टैरो कार्ड रीडिंग और दैनिक राशिफल तक, ज्योतिष क्षेत्र में इसकी सामग्री बेहद लोकप्रिय है।

 

जीवनशैली और मनोरंजन: बॉलीवुड, साहित्य, पर्यटन, सेहत, महिला एवं बाल जगत, हास्य-व्यंग्य (चुटकुले) तथा संबंधों से जुड़ी ज्ञानवर्धक सामग्री इसके मुख्य आकर्षणों में से हैं।

 

अप्रवासी भारतीयों (NRIs) के लिए सांस्कृतिक सेतु

वेबदुनिया की सबसे विशिष्ट और विनम्र भूमिका विदेशों में बसे भारतीय समुदाय को अपनी जड़ों से जोड़े रखने की रही है। सात समंदर पार बैठे भारतीयों तक भारतीय कला, धर्म, व्रत-त्योहारों के सटीक मुहूर्त, परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को उनकी अपनी भाषा में पहुँचाकर इस पोर्टल ने एक डिजिटल सांस्कृतिक सेतु का कार्य किया है।

 

इंटरनेट पर सत्यता और फैक्ट-चेक का माध्यम

आज के दौर में जहाँ इंटरनेट और सोशल मीडिया पर भ्रामक व गलत जानकारियों (Misinformation) की भरमार है, वहाँ वेबदुनिया ने विशेष रूप से धर्म, अध्यात्म, ज्योतिष और ऐतिहासिक तथ्यों को लेकर एक ‘फैक्ट-चेकर’ और प्रामाणिक संदर्भ-कोश की भूमिका निभाई है। करोड़ों पाठकों का भरोसा आज भी इसकी निष्पक्षता और शुद्धता पर कायम है।

 

वेबदुनिया से जुड़े कुछ अन्य ऐतिहासिक व महत्वपूर्ण तथ्य:

स्थापना का श्रेय: वेबदुनिया की शुरुआत इंदौर (मध्य प्रदेश) स्थित ‘नई दुनिया’ समाचार समूह के दूरदर्शी उद्यमियों और इसके संस्थापक विनय छजलानी जी की अथक मेहनत एवं सपर्मण से हुई थी। 

 

माइक्रोसॉफ्ट और वैश्विक कंपनियों के साथ साझेदारी: जब माइक्रोसॉफ्ट और अन्य वैश्विक टेक दिग्गजों ने भारत में अपनी भाषाई सेवाएं शुरू करने का विचार किया, तब वेबदुनिया उनके प्रमुख तकनीकी और कंटेंट पार्टनर्स में से एक बनी। वेबदुनिया ने याहू, गुगल और तमाम वैश्विक कंपनियों के साथ काम करके भारत में इंटरनेट क्रांति और लोकलाइजेशनन को जन्म दिया।

 

यूनिकोड (Unicode) दौर में सुगम परिवर्तन: डायनैमिक फोंट के दौर से निकलकर जब दुनिया ‘यूनिकोड’ मानक पर आई, तब भी वेबदुनिया ने सबसे पहले इस बदलाव को अपनाकर अपनी संपूर्ण सामग्री को यूनिकोड में स्थानांतरित किया, जिससे यह मोबाइल और आधुनिक सर्च इंजनों पर अधिक सुलभ हो गई।

 

सॉफ्टवेयर व सर्च इंजन विकास: वेबदुनिया ने शुरुआती दौर में हिंदी में सर्च इंजन, हिंदी ईमेल सेवा (‘पत्र’) और हिंदी चैट रूम जैसी सुविधाएं भी विकसित की थीं, जो उस समय के भारतीय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं के लिए एकदम नया अनुभव थीं।

 

वेबदुनिया डॉट कॉम केवल भारतीय भाषाओं का पहला इंटरनेट पोर्टल ही नहीं है, बल्कि यह भारत के डिजिटल पुनर्जागरण और भाषाई सशक्तिकरण की एक ऐतिहासिक गाथा है। 1999 से शुरू हुई इसकी 27 वर्षों की यह अनवरत यात्रा इस बात का प्रमाण है कि तकनीक जब अपनी संस्कृति, भाषा और जड़ों से जुड़ती है, तो वह कितनी व्यापक और सर्वस्पर्शी बन जाती है। ‘डायनैमिक फोंट’ जैसी क्रांतिकारी शुरुआत से लेकर 8 भारतीय भाषाओं में विस्तार करने और डिजिटल दौर में प्रामाणिक सामग्री के ‘फैक्ट-चेकर’ के रूप में उभरने तक, वेबदुनिया ने हर कदम पर भाषाई इंटरनेट को नई दिशा दी है।

 

सुदूर गाँवों के आम पाठकों से लेकर विदेश में बसे अप्रवासी भारतीयों तक को एक सांस्कृतिक और सूचनात्मक सूत्र में पिरोने का जो कार्य वेबदुनिया ने किया है, वह अविस्मरणीय है। आने वाले समय में भी जब-जब भारत में डिजिटल क्रांति और हिंदी इंटरनेट के इतिहास का मूल्यांकन होगा, वेबदुनिया को भाषाई तकनीक की बुनियाद रखने वाले एक युगांतरकारी पथप्रदर्शक (Pioneer) के रूप में सदैव याद रखा जाएगा।

 

अमेरिका में AI को लेकर तीन खेमे:मस्क को सभ्यता मिटने का डर, ट्रम्प को चीन से पिछड़ने की चिंता, तीसरा पक्ष इंसानी कंट्रोल चाहता

अमेरिका में AI के विकास की रफ्तार को लेकर बहस तेज है। इसे लेकर तीन अलग-अलग खेमे बन गए हैं। इलॉन मस्क समेत कुछ टेक दिग्गजों को डर है कि AI अगर इंसानों के कंट्रोल से बाहर हुआ तो पूरी मानव सभ्यता के लिए खतरा बन सकता है। वे इसे परमाणु हथियार से भी ज्यादा खतरनाक मानते हैं। वहीं, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प AI की रफ्तार धीमी करने के पक्ष में नहीं हैं। उनका जोर अमेरिका को AI की दौड़ में चीन से आगे रखने पर है। उनका मानना है कि ज्यादा रोक-टोक से अमेरिका पीछे रह सकता है। तीसरा खेमा AI को लेकर बीच का रास्ता चाहता है। वह इसकी रफ्तार रोकने के बजाय सुरक्षा नियम और इंसानी निगरानी बनाए रखने के पक्ष में है। नेताओं से लेकर टेक दिग्गजों तक अलग-अलग राय AI को लेकर अमेरिका में छिड़ी यह बहस अब टेक कंपनियों से निकलकर राजनीति के केंद्र में पहुंच गई है। दिलचस्प बात यह है कि इस मुद्दे पर वामपंथी और दक्षिणपंथी, दोनों तरफ के कुछ नेता AI को लेकर चिंता जता रहे हैं। आम तौर पर एक-दूसरे से अलग रहने वाले इन दोनों खेमों में बहुत कम मुद्दों पर सहमति दिखती है। लेकिन AI की यह बहस सिर्फ राजनीति या टेक कंपनियों तक सीमित नहीं है। आने वाले समय में इसके फैसले हमारी नौकरी, पढ़ाई, कारोबार और रोजमर्रा की जिंदगी को भी प्रभावित कर सकते हैं। साथ ही, यह भी तय होगा कि AI के इस्तेमाल को लेकर नियम कैसे बनाए जाएंगे। AI का विकास धीमा करने के पक्ष में… डारियो अमोडेई AI कंपनी एंथ्रोपिक के को-फाउंडर और CEO हैं। उन्होंने 2021 में OpenAI छोड़कर एंथ्रोपिक शुरू की थी। कंपनी ने खुद को AI की सुरक्षा पर ज्यादा ध्यान देने वाली कंपनी के तौर पर पेश किया है। अमोडेई कई बार चेतावनी दे चुके हैं कि भविष्य की AI बेहद खतरनाक हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा है कि इसका इस्तेमाल जैविक हथियार बनाने जैसे खतरनाक कामों में हो सकता है। वे लंबे समय से AI पर सरकारी नियम बनाने की मांग करते रहे हैं। हाल ही में उन्होंने 3,800 शब्दों का एक लेख लिखकर दुनियाभर में AI के विकास की रफ्तार धीमी करने का प्रस्ताव रखा है। रुख बदलने वाले… सैम ऑल्टमैन OpenAI के को-फाउंडर और CEO हैं। 2023 में उन्होंने AI से इंसानों के खत्म होने के खतरे की चेतावनी वाले बयान पर हस्ताक्षर किए थे। इसी साल उन्होंने अमेरिकी सीनेट में ताकतवर AI मॉडल पर नियम बनाने का समर्थन भी किया। बाद में उनका रुख कुछ नरम पड़ा। 2025 के बीच तक ऑल्टमैन का कहना था कि AI में बड़े बदलाव धीरे-धीरे होंगे और उन्हें संभालना संभव है। फिर जुलाई 2026 में OpenAI ने बताया कि उसके दो AI मॉडल टेस्टिंग के दौरान बिना इंसानी मदद के सिस्टम से बाहर निकल गए। उन्होंने चोरी की लॉगिन डिटेल्स और सिक्योरिटी खामी का इस्तेमाल कर Hugging Face के सर्वर तक पहुंच बनाई। इस घटना के बाद ऑल्टमैन ने कहा कि अब AI के विकास की रफ्तार धीमी करने का समय आ गया है। उन्होंने अमोडेई की इस मांग का भी समर्थन किया कि AI मॉडल का विकास कुछ धीमा किया जाना चाहिए। इलॉन मस्क लंबे समय से AI के खतरों को लेकर चेतावनी देते रहे हैं। उनका अनुमान है कि AI के इंसानों के लिए खतरनाक साबित होने की संभावना 10 से 20% तक है। उन्होंने AI को परमाणु हथियारों से भी ज्यादा खतरनाक बताया है और समय रहते इसके लिए नियम बनाने की मांग की है। मस्क ने खुद AI कंपनी xAI शुरू की है और ट्रम्प के चुनाव अभियान में बड़ी रकम दी थी। ट्रम्प प्रशासन में वह कुछ समय तक सरकारी नियमों में बदलाव से जुड़े काम से भी जुड़े रहे। इसके बावजूद शनिवार को उन्होंने अमोडेई की AI विकास धीमा करने की मांग का समर्थन किया। सोशल मीडिया पर मस्क ने लिखा, “डारियो सही हैं।” AI पर बीच का रास्ता चाहते हैं… सत्या नडेला माइक्रोसॉफ्ट के चेयरमैन और CEO हैं। AI की दौड़ में माइक्रोसॉफ्ट OpenAI के साथ बड़ी साझेदारी कर चुका है और अब अपने AI टूल्स पर भी तेजी से काम कर रहा है। हालांकि, नडेला AI को बिना रोक-टोक आगे बढ़ाने के पक्ष में नहीं हैं। उनका कहना है कि इसका विकास सोच-समझकर और इंसानी निगरानी में होना चाहिए। उनका तर्क है कि ऐसी सुपरइंटेलिजेंस का कोई फायदा नहीं, जो इंसानों के कंट्रोल से बाहर हो या लोगों के काम न आए। इसके साथ ही नडेला AI के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल और खुले AI सिस्टम को बढ़ावा देने के पक्ष में हैं। सुंदर पिचाई अल्फाबेट और गूगल के CEO हैं। वह AI के खतरों को मानते हैं, लेकिन इसके लिए बहुत कड़े नियमों के पक्ष में नहीं हैं। पिचाई का कहना है कि AI के इस्तेमाल के हिसाब से अलग-अलग नियम बनाए जाने चाहिए। उनके मुताबिक, AI के जोखिम से निपटना जरूरी है, लेकिन इसके फायदों से पीछे रह जाना भी बड़ा खतरा हो सकता है। मार्क जुकरबर्ग मेटा के चेयरमैन और CEO हैं। उनका मानना है कि AI अगर कुछ बड़ी कंपनियों तक सीमित रहा तो यह ज्यादा बड़ा खतरा हो सकता है। इसके बजाय वह AI को ज्यादा लोगों तक पहुंचाने को सुरक्षा का एक तरीका मानते हैं। जुकरबर्ग ने चेतावनी दी है कि अमेरिका में AI मॉडल बनाने और जारी करने की रफ्तार धीमी हुई तो इसका फायदा चीन को मिल सकता है। हालांकि, वह AI की सुरक्षा को लेकर चिंताओं को भी मानते हैं। इसी वजह से मेटा भविष्य में अपने सबसे शक्तिशाली AI मॉडल सभी के लिए खुले तौर पर जारी न करने का फैसला कर सकती है। एलेक्जेंडर वेंग 2025 में मेटा से जुड़े और कंपनी में AI से जुड़े बड़े प्रोजेक्ट्स की जिम्मेदारी संभाली। वह मेटा के AI असिस्टेंट एजेंट ‘म्यूस’ के विकास से भी जुड़े हैं। वेंग ने एक स्ट्रैटिजी पेपर में सुपरइंटेलिजेंस को परमाणु बम के बाद सबसे खतरनाक चीज बताया। उनका कहना है कि अमेरिका को AI को सिर्फ टेक्नोलॉजी के तौर पर नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और दूसरे देशों को रोकने की रणनीति के नजरिए से भी देखना चाहिए। AI का विकास तेजी से जारी रखने के पक्ष में जेनसन हुआंग एनवीडिया के को-फाउंडर और CEO हैं। एनवीडिया के चिप्स का इस्तेमाल AI बनाने वाली ज्यादातर बड़ी कंपनियां करती हैं। हुआंग AI के तेज विकास के प्रमुख समर्थकों में हैं। उनका कहना है कि कंपनियों को सरकार से AI पर ज्यादा नियम बनाने की मांग नहीं करनी चाहिए। AI से नौकरियां जाने और अमेरिकी चिप्स दूसरे देशों को बेचने जैसे मुद्दों पर उनका एंथ्रोपिक के CEO डारियो अमोडेई से सार्वजनिक मतभेद भी रहा है। डेविड सैक्स टेक निवेशक हैं। ट्रम्प प्रशासन में वह AI और क्रिप्टो से जुड़े मामलों की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। वह AI के डर के आधार पर सख्त नियम बनाने के खिलाफ हैं। सैक्स अमेरिकी राज्यों के अलग-अलग AI कानून बनाने का भी विरोध करते हैं। इसके बजाय वह कम सरकारी दखल वाली नीति चाहते हैं। उनका कहना है कि AI कंपनियां तेजी से नई तकनीक विकसित कर रही हैं, इसलिए उनकी रफ्तार रोकने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। अमेरिकी राजनीति में भी AI को लेकर दो राय नियम बनाने के पक्ष में… बर्नी सैंडर्स निर्दलीय अमेरिकी सीनेटर हैं। AI के तेज विकास के आलोचक रहे हैं। उनका कहना है कि AI से बड़ी कंपनियों की ताकत बढ़ सकती है और इसका असर कामगारों पर पड़ सकता है। सैंडर्स ने नए AI डेटा सेंटर बनाने पर रोक लगाने का प्रस्ताव दिया है। साथ ही, बड़ी AI कंपनियों पर 50% टैक्स लगाने और उससे सार्वजनिक फंड बनाने की बात कही है। उन्होंने सुपरइंटेलिजेंस पर स्थायी रोक लगाने का भी प्रस्ताव रखा है। इसके अलावा, उनका प्रस्ताव है कि तब तक AI के एडवांस विकास पर रोक रहे, जब तक ऐसे सिस्टम को लेकर सुरक्षा इंतजाम तय नहीं हो जाते। नियमों के विरोध में… माइक जॉनसन अमेरिकी स्पीकर मानते हैं कि AI के खतरे बढ़ रहे हैं, लेकिन वह जल्दबाजी में नियम बनाने के पक्ष में नहीं हैं। वे कहते हैं कि जल्दबाजी में ऐसे नियम नहीं बनाने चाहिए जिनसे चीन को फायदा मिल सकता है। जॉनसन ने AI के कारण इंसानों के खत्म हो जाने की आशंकाओं को खारिज किया है। डोनाल्ड ट्रम्प चाहते हैं कि AI के मामले में अमेरिका चीन से आगे रहे। उन्होंने AI में अमेरिका की बढ़त बनाए रखना अपनी प्राथमिकता बनाई है। इसके लिए वह AI को तेजी से आगे बढ़ाने के पक्ष में हैं। इसमें AI डेटा सेंटर के लिए ज्यादा बिजली की व्यवस्था करना और ऐसे AI मॉडल को बढ़ावा देना शामिल है, जिनका इस्तेमाल ज्यादा लोग कर सकें। एनवीडिया के CEO जेनसन हुआंग के साथ एक कॉन्फ्रेंस में ट्रम्प ने यह भी कहा था कि AI के विकास में सरकार को ज्यादा दखल नहीं देना चाहिए। ———————- यह खबर भी पढ़ें… ओपनएआई का 90 साल पुरानी गणित पहेली सुलझाने का दावा: यह दुनिया के 7 सबसे मुश्किल सवालों में एक; 88 घंटे में जवाब ढूंढा ओपनएआई ने दावा किया है कि उसकी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीक ने गणित की दुनिया के सबसे मुश्किल सवालों में से एक को सॉल्व कर दिया है। AI को इसे सुलझाने में सिर्फ 88 घंटे लगे। पूरी खबर पढ़ें…

टेक दिग्गज अब ‘किसान’ बने; अमेरिका में कृषिभूमि की होड़:गेट्स-बेजोस 7 लाख एकड़ जमीन पर आलू-गाजर उगा रहे, जुकरबर्ग पाल रहे मवेशी

दुनिया के सबसे अमीर और टेक दिग्गजों में अब पशु-पालन और खेती का शौक बढ़ रहा है। अमेरिका में खेती की जमीन अब सिर्फ किसान की जरूरत नहीं, अरबपतियों के लिए बड़ा निवेश और शौक बन चुकी है। कोई यहां मवेशी पाल रहा है, तो कोई जमीन खरीदकर भविष्य ज्यादा सुरक्षित कर रहा है। मेटा के सीईओ मार्क जुकरबर्ग हवाई के काउआई द्वीप पर करीब 2,871 करोड़ रु. के 4,000 एकड़ कोउलाउ रेंच पर वाग्यू और एंगस नस्ल के मवेशी पाल रहे हैं। वहीं, रेडिट के सह-संस्थापक एलेक्सिस ओहानियन फ्लोरिडा में अपने फार्म पर केले के बाग और मधुमक्खी पालन कर रहे हैं। हालांकि, इन दिग्गजों के खेती-बारी का नया शौक अमेरिका में कृषि जमीनों को एक बेहद महंगे ‘एसेट क्लास’ में बदल दिया है। ‘ द लैंड रिपोर्ट’ के अनुसार, माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स के पास 2.75 लाख एकड़ कृषि भूमि है, जिससे वे अमेरिका के 44वें सबसे बड़े भूस्वामी बन गए हैं। अमेजन के संस्थापक जेफ बेजोस 4.62 लाख एकड़ और वॉलमार्ट घराने से जुड़े स्टेन क्रोनके 27 लाख एकड़ जमीन के मालिक हैं। क्रोनके ने 2025 में न्यू मैक्सिको में 9.38 लाख एकड़ जमीन खरीदी, जिसे अमेरिकी इतिहास की सबसे बड़ी रैंच बिक्री बताया गया। अलग-अलग राज्यों में इन जमीनों पर आलू, गाजर, प्याज, सोयाबीन, मक्का और कपास जैसी फसलें उगाई जाती हैं। कुछ किसानों को लीज पर भी दी जाती है। पीपुल्स कंपनी के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका में कृषि भूमि 411 लाख करोड़ की परिसंपत्ति बन चुकी है। अमेरिकी कृषि विभाग के मुताबिक, बीते वर्ष खेतों के मूल्य में 4.3% की बढ़ोतरी हुई। नेशनल यंग फार्मर्स कोएलिशन की पॉलिसी निदेशक एरिन फॉस्टर के अनुसार, जमीन की कीमतें इतनी बढ़ गई हैं कि पहली बार खेती में उतरने वाले युवा या छोटे किसान प्रतिस्पर्धा से पूरी तरह बाहर हो गए हैं। जमीन में निवेश क्यों? महंगाई के साथ बढ़ती है कीमत महंगाई से सुरक्षित बचाव – सीमित प्राकृतिक संसाधन होने के कारण जमीन की कीमतें हमेशा महंगाई के साथ बढ़ती हैं। एआई और डेटा सेंटर्स की मांग – टेक कंपनियों (एआई हाइपरस्केलर्स) को विशाल डेटा सेंटर बनाने के लिए बड़े भूभाग की जरूरत होती है। लाइफस्टाइल और नॉन-फाइनेंशियल फायदे – कोरोना महामारी के बाद बड़े परिसरों में शिकार, मछली पकड़ने और खुद का ऑर्गेनिक अन्न उगाने का रुझान बढ़ा है।

Bill Gates AI Warning: AI की रफ्तार देख सन्न रह गए बिल गेट्स! नौकरियों को लेकर दे दी ये बड़ी चेतावनी

Bill Gates AI Warning: माइक्रोसॉफ्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर अब तक की सबसे बड़ी चेतावनी दी है। एक इंटरव्यू में गेट्स ने कहा कि AI की तरक्की जिस तेज रफ्तार से हो रही है, वह उनकी उम्मीदों से कहीं ज्यादा आगे निकल चुकी है। उन्होंने आगाह किया कि अगर सरकारों और टेक कंपनियों ने समय रहते कड़े कदम नहीं उठाए, तो दुनिया को बड़े पैमाने पर नौकरियों के नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।

‘मैं खुद हैरान हूं’: कोडिंग में AI ने दी मात

‘द न्यू यॉर्क टाइम्स’ को दिए इंटरव्यू में कोडिंग और सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट के क्षेत्र में दशकों का अनुभव रखने वाले बिल गेट्स ने स्वीकार किया कि Anthropic के Claude जैसे AI टूल्स की क्षमताओं ने उन्हें पूरी तरह चौंका दिया है।

गेट्स ने कहा, ‘यह विचार कि अब ये AI टूल्स कई मामलों में मुझसे भी बेहतर काम कर रहे हैं, यह मेरे लिए हैरान कर देने वाला है।’

गेट्स के मुताबिक, AI क्रांति पुरानी औद्योगिक या डिजिटल क्रांतियों से बिल्कुल अलग है। पहले की तकनीकों ने पुरानी नौकरियां खत्म करके नए रोजगार पैदा किए थे, लेकिन AI जिस पैमाने पर इंसानों को रिप्लेस कर रहा है, उससे दूसरे क्षेत्रों में नई नौकरियां बच पाना मुश्किल होगा।

टेक कंपनियां क्यों छुपा रही हैं AI का असली खतरा?

गेट्स ने टेक इंडस्ट्री के दिग्गजों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि कंपनियां भारी फंड जुटाने के चक्कर में इसके खतरों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं कर रही हैं। उन्होंने कहा, ‘प्राइवेट में AI समझने वाले लोग बेहद डरे हुए हैं। लेकिन कोई खुलकर नहीं बोल रहा क्योंकि इससे अगली ट्रिलियन डॉलर की फंडिंग रुकने का डर है।’

कंपनियां बिना किसी सुरक्षा मानकों के सिर्फ इस उम्मीद में आगे बढ़ रही हैं कि AI का अच्छा पहलू इसके बुरे असर को ढक लेगा।

गेट्स ने क्या सुझाया AI का समाधान?

AI के बढ़ते खतरे से आम जनता और नौकरियों को बचाने के लिए बिल गेट्स ने दो प्रमुख प्रस्ताव रखे हैं:

AI Tax: कंपनियों द्वारा इंसानों की जगह AI का इस्तेमाल करने पर टैक्स लगाया जाना चाहिए। इस टैक्स से मिलने वाले राजस्व का इस्तेमाल नौकरियां गंवाने वाले लोगों की मदद के लिए किया जाए।

‘Human Reserved’ जॉब्स: कुछ संवेदनशील पेशों (जैसे- केयरगिविंग, नर्सिंग और व्यक्तिगत देखभाल) को पूरी तरह ‘ह्यूमन रिजर्व्ड’ घोषित किया जाए, ताकि इन क्षेत्रों में AI के प्रवेश पर बैन रहे और इंसानी नौकरियां सुरक्षित रहें।

जैविक हथियारों का बड़ा खतरा

नौकरियों के अलावा, बिल गेट्स ने एडवांस AI से उत्पन्न होने वाले अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा खतरों पर भी चिंता जताई। गेट्स ने चेतावनी दी कि अगर AI का इस्तेमाल नए मॉलिक्यूल्स या खतरनाक बायोलॉजिकल हथियार बनाने में किया गया, तो यह तबाही ला सकता है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सख्त समझौते और मैंडेटरी रिव्यू की मांग की है, ताकि AI का दुरुपयोग बायो-टेररिज्म के लिए न हो सके।

बिल गेट्स का मानना है कि AI सुरक्षा का मुद्दा अब वैश्विक स्वास्थ्य जितना ही गंभीर हो चुका है और वे इसे दुनिया भर के नेताओं के सामने उठाएंगे। उन्होंने साफ कहा कि इनोवेशन हमेशा सही हो ऐसा जरूरी नहीं, और फिलहाल AI जिस दिशा में जा रहा है, वह एक बड़ी चेतावनी है।

US Stocks में निवेश का सबसे सुनहरा मौका! पराग पारिख ने 90% घटाई एंट्री फीस, जानिए अब कितने में खरीद पाएंगे Apple-Google के शेयर!

US Stock Market: भारतीय रिटेल निवेशकों के लिए अमेरिकी शेयर बाजार में निवेश करना अब काफी आसान और किफायती हो गया है। पराग पारिख की GIFT City स्थित इकाई ‘PPFAS GIFT’ ने अपने दो प्रमुख इंटरनेशनल फंड्स में न्यूनतम निवेश सीमा को $5000 से घटाकर सिर्फ $500 कर दिया है।

यानी अब एंट्री टिकट में सीधे 90% की कटौती कर दी गई है, जिससे आम निवेशक भी कम रकम के साथ S&P 500 और Nasdaq 100 जैसे दिग्गजों में पैसा लगा सकेंगे।

₹4.79 लाख नहीं, अब सिर्फ ₹48000 से करें शुरुआत

रुपए और डॉलर के मौजूदा एक्सचेंज रेट (लगभग ₹95.74 प्रति डॉलर) के हिसाब से इस कटौती का सीधा गणित ये है कि, पहले $5000 की न्यूनतम सीमा के कारण निवेशकों को कम से कम ₹4.79 लाख की भारी-भरकम राशि की जरूरत होती थी।अब $500 की नई सीमा लागू होने के बाद आप मात्र ₹48000 से यूएस मार्केट में अपना पोर्टफोलियो शुरू कर सकते हैं।

PPFAS GIFT ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर इस फैसले की जानकारी देते हुए बताया कि इस कदम का मकसद छोटे निवेशकों के लिए ग्लोबल इन्वेस्टिंग के दरवाजे खोलना है।

किन दो फंड्स में घटा न्यूनतम निवेश?

यह बदलाव PPFAS Alternate Asset Managers IFSC द्वारा GIFT City से ऑफर किए जाने वाले दो आउटबाउंड पैसिव फंड्स पर लागू हुआ है:

Parag Parikh IFSC S&P 500 Fund of Fund: यह फंड अमेरिका की 500 सबसे बड़ी लिस्टेड कंपनियों के इंडेक्स (S&P 500) को ट्रैक करने वाले एक्यूपुलेटिंग ETFs और UCITS में निवेश करता है। यह अमेरिकी लार्ज-कैप मार्केट में ब्रॉड एक्सपोजर देता है।

Parag Parikh IFSC Nasdaq 100 Fund of Fund: यह फंड Nasdaq 100 इंडेक्स में पैसिव निवेश की सुविधा देता है। इसमें अमेरिका की टॉप 100 गैर-वित्तीय कंपनियां शामिल हैं, जिनमें टेक्नोलॉजी और टेक-ओरिएंटेड ग्रोथ कंपनियों की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है।

आम निवेशकों के लिए क्यों अहम है यह फैसला?

जो निवेशक अपने कुल पोर्टफोलियो का 5% या 10% हिस्सा ही अमेरिकी बाजार में लगाना चाहते थे, उनके लिए ₹4.8 लाख एकमुश्त लगाना काफी मुश्किल था।

अब केवल ₹48000 में निवेशक अपने पोर्टफोलियो को ग्लोबल डाइवर्सिफाई कर सकते हैं। GIFT City के जरिए इन फंड्स में निवेश करने पर भारतीय निवासियों को अलग से किसी विदेशी ब्रोकरेज अकाउंट खोलने का झंझट नहीं रहता।

GIFT City के जरिए कैसे काम करता है निवेश?

गुजरात स्थित GIFT City भारत का पहला इंटरनेशनल फाइनेंशियल सर्विसेज सेंटर (IFSC) है। यहां वित्तीय सेवाएं भारतीय रुपए के बजाय विदेशी मुद्रा (यूएस डॉलर) में ऑफर की जाती हैं। निवासी भारतीय नागरिक लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम(LRS) नियमों के तहत अपनी गाढ़ी कमाई को डॉलर बेस करेंसी वाले इन दोनों फंड्स में पार्क कर सकते हैं।

कम एंट्री टिकट का मतलब जोखिम कम होना नहीं!

न्यूनतम निवेश घटने से फंड में एंट्री आसान हुई है, लेकिन इससे जुड़ा मार्केट रिस्क कम नहीं हुआ है। निवेशकों का रिटर्न अमेरिकी शेयर बाजार के प्रदर्शन के साथ-साथ डॉलर के मुकाबले रुपए की चाल पर निर्भर करेगा। S&P 500 इंडेक्स स्थिर और ब्रॉड मार्केट एक्सपोजर देता है, जबकि Nasdaq 100 इंडेक्स ज्यादा टेक-फोकस्ड होने के कारण ज्यादा वोलेटाइल हो सकता है।

अगर आप अपने निवेश को एपल, माइक्रोसॉफ्ट, गूगल या एनवीडिया जैसी दिग्गज अमेरिकी कंपनियों में लगाना चाहते थे, तो GIFT City के रास्ते PPFAS का यह फैसला आपके एंट्री बैरियर को 90% तक खत्म कर देता है। हालांकि, किसी भी इंटरनेशनल फंड में दांव लगाने से पहले अपनी रिस्क कैपेसिटी और करेंसी रिस्क का आकलन जरूर कर लें।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

US Fed ने नहीं बदली ब्याज दरें, क्या होगा इसका भारतीय बाजार पर असर और गिफ्ट निफ्टी से क्या मिल रहा है संकेत

Gift Nifty Indicator: गुरुवार को भारतीय बेंचमार्क इंडेक्स Sensex और Nifty के मामूली गिरावट के साथ खुलने की संभावना है। Wall Street में रात भर हुई भारी बिकवाली के बाद GIFT Nifty सुस्त शुरुआत का संकेत दे रहा है। AI से जुड़े खर्च को लेकर बनी चिंताएं और US Federal Reserve के पॉलिसी फैसले के बाद अनिश्चितता ने पॉजिटिव इंस्टीट्यूशनल फ्लो और बुधवार की घरेलू बाजार की जोरदार रैली के असर को कम कर दिया है।

सुबह करीब 8:00 बजे GIFT Nifty 88 अंक या 0.36 फीसदी गिरकर 24,215 पर ट्रेड कर रहा था, जिससे संकेत मिलता है कि Nifty 50 बुधवार के 24,250.20 के क्लोजिंग लेवल से नीचे खुल सकता है। यह कमजोर संकेत बुधवार को भारतीय शेयरों में जोरदार रिकवरी के बाद आया है। Sensex 888.68 अंक या 1.16 फीसदी बढ़कर 77,654.60 पर पहुंच गया, जबकि Nifty 264.85 अंक या 1.10 फीसदी बढ़कर 24,250.20 पर बंद हुआ।

US फेड मीटिंग का नतीजा

उम्मीद के मुताबिक, US फेडरल रिज़र्व ने चेयर केविन वॉर्श की अगुवाई में गुरुवार को ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया। यह लगातार पांचवीं पॉलिसी मीटिंग थी जिसमें सेंट्रल बैंक ने दरों को स्थिर रखने का फ़ैसला किया, क्योंकि अधिकारी मॉनेटरी पॉलिसी में बदलाव करने से पहले महंगाई के आउटलुक और व्यापक आर्थिक स्थितियों का आकलन कर रहे थे।

यह घोषणा फेडरल रिज़र्व की दो दिन की फेडरल ओपन मार्केट कमेटी (FOMC) मीटिंग खत्म होने के बाद की गई।फेड ने अपनी बेंचमार्क ब्याज दर को 3.50%-3.75% पर बनाए रखा। इसने महंगाई, बेरोज़गारी और कुल आर्थिक विकास के अपने अनुमानों को भी जून की पॉलिसी मीटिंग में पेश किए गए अनुमानों के मुकाबले काफ़ी हद तक जस का तस रखा।

एशियाई बाजारों में तेजी

Federal Reserve द्वारा ब्याज दरों में कोई बदलाव न करने के बाद गुरुवार को एशियाई शेयरों मेंबढ़त के साथ कारोबार हुआ। वहीं, ग्लोबल टेक्नोलॉजी शेयरों में भारी बिकवाली के बाद निवेशक AI से जुड़े खर्च के आउटलुक का आकलन करते रहे। जापान को छोड़कर एशिया-पैसिफिक शेयरों के MSCI के सबसे बड़े इंडेक्स में 1 फीसदी से अधिक की बढ़त हुई, जबकि जापान के Nikkei में लगभग 2 फीसदी की तेजी आई। दक्षिण कोरिया के Kospi में हफ्ते की शुरुआत में भारी नुकसान के बाद 4 फीसदी की रिकवरी हुई, हालांकि यह साप्ताहिक आधार पर बड़ी गिरावट की ओर बढ़ रहा था। Nasdaq फ्यूचर्स में 1.2 फीसदी की बढ़त हुई, जबकि यूरोपियन फ्यूचर्स ने हल्की पॉजिटिव शुरुआत का संकेत दिया।

गुरुवार की रिकवरी के बावजूद, भारी AI निवेश पर रिटर्न को लेकर चिंताओं के बीच सेमीकंडक्टर शेयरों में भारी गिरावट के बाद निवेशक सतर्क बने रहे।

बुधवार को US शेयर बाजार में भारी गिरावट के साथ कारोबार खत्म हुआ, क्योंकि Federal Reserve ने अपनी बेंचमार्क ब्याज दर में कोई बदलाव नहीं किया और टेक्नोलॉजी शेयरों में हालिया गिरावट जारी रही। फेड ने ब्याज दरों को 3.50-3.75 प्रतिशत की रेंज में ही बनाए रखा, जो उम्मीदों के मुताबिक था, हालांकि तीन पॉलिसीमेकर्स ने दरों में 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी के पक्ष में असहमति जताई।

माइक्रोसॉफ्ट और मेटा प्लेटफॉर्म्स के नतीजों से पहले निवेशकों द्वारा AI-से जुड़े शेयरों में अपनी हिस्सेदारी कम करने के कारण डॉव जोन्स इंडस्ट्रियल एवरेज 2.19 प्रतिशत, S&P 500 1.52 प्रतिशत और नैस्डैक कम्पोजिट 1.74 प्रतिशत गिर गए।

क्रूड में नरमी

पिछले सेशन में तेजी के बाद कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आई, क्योंकि तनाव बढ़ने के बावजूद मध्य पूर्व से टैंकरों का आवागमन जारी रहा। ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स 1.42 प्रतिशत गिरकर 89.45 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया, जबकि US वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट क्रूड 0.66 प्रतिशत गिरकर 83.90 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। यह गिरावट ईरान संघर्ष के दौरान आई सबसे बड़ी तेजी के बाद हुई है; बुधवार को ब्रेंट में लगभग 8 प्रतिशत और WTI में 6.5 प्रतिशत से अधिक की तेजी आई थी।

हालांकि तेल की कीमतों में नरमी आई, लेकिन US राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नए बयानों और क्षेत्र में लगातार मिसाइल और ड्रोन हमलों के कारण जियोपॉलिटिकल तनाव बना हुआ है।

क्या होगा इसका भारतीय बाजार पर असर

एनरिच मनी के CEO पोनमुडी आर ने कहा कि फेडरल रिजर्व के ब्याज दरों को अपरिवर्तित रखने के फैसले से निकट भविष्य की एक बड़ी अनिश्चितता खत्म हो गई है, लेकिन पॉलिसीमेकर्स के बीच बंटे हुए वोट से संकेत मिलता है कि भविष्य की पॉलिसी का रास्ता डेटा पर निर्भर करेगा। कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और मध्य पूर्व में फिर से बढ़ा जियोपॉलिटिकल तनाव भी भारतीय बाजारों के लिए मुख्य जोखिम बने हुए हैं, जबकि FII और DII की खरीदारी से सपोर्ट मिल रहा है।

पोनमुडी ने कहा कि 24,200 के स्तर को फिर से हासिल करने के बाद निफ्टी में सकारात्मक रुख बना हुआ है। 24,300-24,400 का ज़ोन तत्काल रेजिस्टेंस बना हुआ है, और इसके ऊपर निर्णायक रूप से जाने पर 24,500-24,600 की ओर बढ़ने का रास्ता खुल सकता है। नीचे की ओर, 24,150-24,000 मुख्य सपोर्ट ज़ोन है, जबकि 24,000 के नीचे जाने पर 23,900-23,800 के स्तर की ओर प्रॉफिट-बुकिंग शुरू हो सकती है।

Stock Market Live Update: गिफ्ट निफ्टी दे रहा कमजोर शुरुआत के संकेत, फोकस में NBCC, MTAR Tech, Eicher Motors

(डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सार्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

IT Stocks : Infosys और TCS करीब 3% भागे, AI खर्च से जुड़ी चिंताएं कम होने से पूरे सेक्टर में आई हरियाली

IT Stocks: बुधवार को भारतीय IT शेयरों में जोरदार तेजी देखने को मिल रही है। इस तेजी को इन्फोसिस और TCS जैसी बड़ी कंपनियां लीड कर रही हैं। AI पर बहुत ज़्यादा खर्च और ऊंचे वैल्यूएशन को लेकर बनी चिंताओं के कारण निवेशकों ने अमेरिकी टेक्नोलॉजी कंपनियों के नतीजों से पहले सॉफ्टवेयर एक्सपोर्ट करने वाली कंपनियों के शेयरों की ओर रुख कर लिया है। इसका फायदा भारतीय आईटी कंपनियों को भी मिल रहा है। इसके चलते निफ्टी IT इंडेक्स आज सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाला इंडेक्स बन गया है। निवेशकों की नजर आज आने वाले अमेरिकी फेडरल रिजर्व के ब्याज दरों से जुड़े फैसले पर बनी हुई है।

फिलहाल निफ्टी IT इंडेक्स 2.47 फीसदी ऊपर कारोबार कर रहा है। निफ्टी आईटी बेंचमार्क इंडेक्सों से बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। निफ्टी में सिर्फ 0.93 प्रतिशत की बढ़त हुई है। इन्फोसिस 3.37 प्रतिशत बढ़कर निफ्टी में सबसे ज्यादा बढ़त हासिल करने वाले शेयरों में शामिल है। वहीं, TCS में 2.65 प्रतिशत, विप्रो में 1.78 प्रतिशत और HCL टेक्नोलॉजीज में 1.1 प्रतिशत की तेजी आई है। मिडकैप आईटी की बात करें तो कोफोर्ज में 4.42 प्रतिशत, KPIT टेक्नोलॉजीज में 4.07 प्रतिशत और पर्सिस्टेंट सिस्टम्स में 2.75 प्रतिशत की तेजी आई है।

एशियाई चिप शेयरो में लगातार बनी कमजोरी के बावजूद भारतीय IT शेयरों में रिकवरी देखने को मिल रही है। दक्षिण कोरियाई चिप बनाने वाली कंपनियों के शेयरों में भारी बिकवाली के बाद एशियाई बाजारों में भारी गिरावट आई है। AI के ऊंचे वैल्यूएशन,बढ़ती प्रतिस्पर्धा और ग्लोबल टेक्नोलॉजी कंपनियों द्वारा भारी कैपिटल खर्च को देखते हुए निवेशक अब चिप शेयरों से दूरी बना रहे हैं। इसका फायदा सॉफ्टवेयर एक्सपोर्ट करने वाली कंपनियों के शेयरों को मिल रहा है।

ऐसा लगता है कि निवेशक माइक्रोसॉफ्ट और मेटा के नतीजों से पहले भारतीय सॉफ्टवेयर एक्सपोर्टर कंपनियों के शेयर को खरीदने के लिए इनमें आए करेक्शन का फायदा उठा रहे हैं। इन दोनों कंपनियों के नतीजों से AI पर खर्च के ट्रेंड के बारे में नए संकेत मिलने की उम्मीद है।

बाजार की नजर आज आने वाले US फ़ेडरल रिज़र्व के पॉलिसी के जुड़े ऐलानों पर है। CME फेडवॉच के मुताबिक बाजार यह मान कर चल रहा है कि US फ़ेड ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं करेगा।

जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट वीके विजयकुमार का कहना कि दक्षिण कोरियाई चिप शेयरों में आई भारी गिरावट भारत के पक्ष में हो सकती है। यानी दूसरे शब्दों में कहें तो दक्षिण कोरिया में चिप शेयरों में आई भारी गिरावट भारत के लिए फायदेमंद हो सकती है।

 

डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।