Viral Video: कानपुर में कचरे के ढेर पर फेंकी गई एक्सपायर्ड चॉकलेट्स के लिए मची भयंकर लूट, क्या इसे बच्चों को खिलाएंगे?

Kanpur expired chocolate dump: सोशल मीडिया पर उत्तर प्रदेश के कानपुर का एक चौंकाने वाला वीडियो वायरल हो रहा है। वीडियो में दावा किया जा रहा है कि कानपुर के पनकी में कचरे के ढेर पर फेंकी गई एक्सपायर्ड टॉफियों और चॉकलेट्स को उठाने के लिए लोगों में होड़ मची हुई है। एक फैक्ट्री द्वारा कचरे में फेंकी गई इन मिठाइयों और चॉकलेट्स को इकट्ठा करने के लिए पुरुषों और महिलाएं टूट पड़े हैं। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होते ही फूड सेफ्टी, वेस्ट मैनेजमेंट और गरीबी को लेकर बहस छिड़ गई है कि कोई एक्सपायर्ड चॉकलेट के लिए कैसे क्रेजी हो सकता है और क्या लोग इसे घर ले जाकर अपने बच्चों को खिलाएंगे?

न्यूज18 की रिपोर्ट के मुताबिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर @Delhiite नाम के यूजर ने इस वीडियो को शेयर करते हुए इसे अजीब होड़ बताया है। यूजर का कहना है कि एक्सपायर्ड चॉकलेट लूटने के लिए टूट पड़े लोगों में बुनियादी कॉमन सेंस पूरी तरह से गायब नजर आया।

वीडियो के वायरल होते ही इंटरनेट पर लोगों की ओर से तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ लोगों ने जहां एक्सपायर्ड चीजों को उठाने वालों की आलोचना की और इसके हेल्थ पर पड़ने वाले खराब असर की बात कही, तो दूसरे कुछ लोगों का मानना था कि इस घटना को गरीबी और महंगाई के नजरिए से भी देखा जाना चाहिए।

महंगाई और गरीबी पर छिड़ी तीखी बहस

कचरे के ढेर पर मची इस लूट को लेकर कई यूजर्स ने देश में बढ़ती महंगाई और आर्थिक तंगी पर चिंता जताई। एक यूजर ने कमेंट करते हुए तंज कसा कि भाई महंगाई इतनी बढ़ गई है कि अब कचरा भी बजट शॉपिंग डेस्टिनेशन बन गया है। वहीं दूसरे यूजर ने सहानुभूति जताते हुए लिखा कि यह सामान्य समझ की कमी से ज्यादा गरीबी और असमर्थता को दर्शाता है। इसी गरीबी ने लोगों को कचरे से खाना उठाने पर मजबूर किया होगा। एक दूसरे व्यक्ति ने लिखा कि सोचिए उस स्तर तक पहुंचने के लिए कितनी तंगी रही होगी कि लोग इस जोखिम को उठाने के लिए तैयार हो गए।

कुछ यूजर्स ने लोगों के पहनावे को लेकर सवाल उठाए। एक यूजर ने लिखा कि जिस तरह से लोगों ने कपड़े पहने हैं, उससे लगता है कि वे सभी स्कूल और कॉलेज गए होंगे। समझ नहीं आता कि उन्हें क्या सिखाया गया है कि वे एक्सपायर्ड सामान उठा रहे हैं। दूसरे यूजर ने लिखा कि लोग फ्री की टॉफियों के लिए इंफेक्शन का खतरा मोल ले रहे हैं, ऐसा लगता है जैसे कॉमन सेंस गायब हो चुका है।

कंपनी और FSSAI पर उठे सवाल, नियमों के उल्लंघन का आरोप

इस पूरी घटना के बाद कंपनियों द्वारा खराब और एक्सपायर्ड सामान को नष्ट करने के तरीके पर भी सवाल उठे हैं। सोशल मीडिया पर एफएसएसएआई और संबंधित अधिकारियों को टैग करते हुए एक यूजर ने लिखा कि उस फैक्ट्री मालिक को जल्द से जल्द पकड़ा जाना चाहिए और सजा मिलनी चाहिए क्योंकि एक्सपायर्ड सामान को नष्ट करने की एक तय प्रक्रिया होती है। एक दूसरे यूजर ने कहा कि एक्सपायर्ड आइटम को निपटाने का यह मानक तरीका नहीं है और इसके लिए दोषी ब्रांड के खिलाफ मामला दर्ज किया जाना चाहिए।

(डिस्क्लेमर: यह लेख यूजर-जनरेटेड कंटेंट और सोशल मीडिया पोस्ट पर आधारित है। ओरिजिनल पोस्ट में किए गए दावों की मनीकंट्रोल द्वारा स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की गई है।)

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8000 रुपये की शर्ट का ब्रांड बनाया और खुद ही बेचने निकला ये 16 साल का लड़का बना स्टार! लोग बोले-यही है भारत का असली Gen Z

बिना किसी फैमिली बैकग्राउंड, बिना किसी बड़े सपोर्ट और बिना किसी मार्केटिंग टीम के एक 16 साल के लड़के ने कुछ अपना अलग खड़ा करने का सपना देखा और उसे पूरा कर दिखाया। मध्य प्रदेश के जबलपुर के रहने वाले महेंद्र ने बेलवारो नाम से अपना एक यूनिक शर्ट ब्रांड लॉन्च किया है। सोशल मीडिया पर जब इस युवा एंटरप्रेन्योर का खुद अपनी शर्ट्स बेचने और कॉन्फिडेंस के साथ लोगों से कनेक्ट करने का वीडियो वायरल हुआ तो उसने लाखों लोगों का दिल जीत लिया।

डिजिटल क्रिएटर के पास पहुंचा 16 साल का महेंद्र

हमारी सहयोगी न्यूज 18 की रिपोर्ट के मुताबिक, महेंद्र की कहानी तब सामने आई जब वह एक कपड़े के ब्रांड के मालिक और डिजिटल क्रिएटर शुभम शिवहरे के स्टूडियो के बाहर पहुंचा। महेंद्र ने बेझिझक शुभम से संपर्क किया और सीधे अपनी बात रखी। उसने शुभम से कहा कि उसने अपना खुद का शर्ट ब्रांड बनाया है और वह अपनी शर्ट्स बेचना चाहता है। इसके बाद दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई।

8000 रुपये की शर्ट और ब्रांडिंग का अनोखा गणित

बातचीत के दौरान महेंद्र ने शुभम को अपने ब्रांड बेलवारो का प्रमोशन वीडियो दिखाया। खास बात यह है कि इस 16 साल के लड़के ने अपने ब्रांड का लोगो, पैकेजिंग और सोशल मीडिया अकाउंट सब कुछ खुद ही तैयार किया है। जब शुभम ने उससे एक शर्ट की कीमत पूछी तो महेंद्र ने बताया कि वह एक शर्ट 8000 रुपये में बेच रहा है।

शर्ट की इतनी ज्यादा कीमत सुनकर शुभम हैरान रह गए और उन्होंने पूछा कि यह इतनी महंगी क्यों है? इस पर महेंद्र ने बहुत ही आत्मविश्वास से जवाब दिया कि एक शर्ट को बनाने की लागत लगभग 3000 रुपये आती है जबकि बाकी का खर्च ब्रांडिंग का है। महज 16 साल की उम्र में अपने प्रोडक्ट और बिजनेस को खड़ा करने के लिए महेंद्र की लगन और उसका आत्मविश्वास अब चर्चा का विषय बना हुआ है। पर असल कहानी सिर्फ इतनी नहीं है।

पिता का साया नहीं, मां भी नहीं करतीं काम

पहले वीडियो के वायरल होने के बाद शुभम ने दोबारा महेंद्र से मुलाकात की और उसकी निजी जिंदगी की कहानी लोगों के साथ शेयर की। महेंद्र ने बताया कि उसके सिर पर पिता का साया नहीं है। वह अपनी मां, दो छोटे भाइयों और एक बहन के साथ रहता है। उसकी मां फिलहाल कोई काम नहीं करती हैं। बिना किसी आर्थिक मदद और बिना किसी बिजनेस कनेक्शन के वह अकेले ही अपने ब्रांड को प्रमोट करने की कोशिश में जुटा है।

शुभम ने इंस्टाग्राम पर उसकी कहानी शेयर करते हुए लिखा कि 16 साल की उम्र में जब ज्यादातर बच्चे अपने भविष्य के बारे में सोचना शुरू ही करते हैं तब महेंद्र अपना भविष्य खुद बनाने की कोशिश कर रहा है। उसके पास संसाधन भले कम हैं लेकिन सपने बहुत बड़े हैं।

सोशल मीडिया पर मिली तारीफ और लोगों ने बढ़ाए मदद के हाथ

सोशल मीडिया पर महेंद्र के इस जज्बे और हिम्मत की जमकर सराहना हो रही है। इंटरनेट यूज़र्स उसकी कड़ी मेहनत और लगन देखकर काफी प्रभावित है। कई लोग उसके ब्रांड की मदद के लिए भी आगे आए हैं। एक यूजर ने कमेंट करते हुए लिखा कि यही असली Gen Z है जिसका भारत को इंतजार है। वहीं एक दूसरे यूजर ने कहा कि ऐसे ही बच्चे बड़े होकर बिड़ला और टाटा जैसे बड़े ब्रांड बनाते हैं।

शर्ट की क्वॉलिटी पर कमेंट करते हुए एक यूजर ने लिखा कि शर्ट देखने में काफी अच्छी लग रही है, इसकी लाइनिंग, मटीरियल और कॉलर काफी प्रीमियम दिख रहे हैं।

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Opinion: Freak accidents are almost always human negligence

Opinion: Freak accidents are almost always human negligence
Opinion: Freak accidents are almost always human negligence

Going by the amount of social media chatter around any NCAP test, you’d think India is one safety-obsessed nation. Awareness is rising, but safety is far from ingrained in our ethos like it is in, say, Japan. We all know the current state of road safety is appalling, but I’m not talking about driving manners or vehicle collisions or crash ratings. Of late, there’s another aspect of road safety that’s really been bothering me; the road itself and everything around it. 

During the rains in Mumbai last month, two girls were electrocuted in a water-logged street. Luckily, timely intervention from a passer-by and medical treatment at a hospital saved them. Last year, an auto-rickshaw driver had his head 

pierced by a falling iron rod from metro construction; thankfully emergency neurosurgery saved him too. Not everyone is so lucky though, if you can even call these accidents lucky. A concrete slab from an under-construction girder bridge fell onto a moving auto-rickshaw and car and resulted in one death and multiple injuries.

You would have read the horrific news of a 25-year-old biker in Delhi who died after his motorcycle plunged into an unbarricaded, 14-foot-deep construction pit dug up and left open. And it’s not just bikes; people have fallen into open manholes, flooded over with water, and lost their lives, and recently a 20-year-old student died after his car plunged into an open drain. Two years ago, a massive illegal billboard blew over and killed 17 people and injured over 75 others during heavy winds in Mumbai. This monsoon season, a tree collapsed onto a school bus and took the life of an 11-year-old child. 

This is the aspect of road safety that has been bothering me recently, not because car crashes and other accidents do not, but because these are all too often termed ‘freak accidents’ or ‘random happenings’. Nonsense! These are not freak incidents, but accidents caused by negligence and unaccountability. So many folks say, ‘oh, his/her time had come’. Again, nonsense. Would you say all those poor kids who died in Africa due to starvation died because their time had come? No. They died because of human action, or inaction. 

So, really, I write this column only to highlight this fact; to remind us all that it isn’t random. As the saying goes, ‘everything happens for a reason’. Here it’s callousness, from those in charge and from us. So, the next time you express outrage over a non-5-star NCAP-rated car, spare some words of outrage for these incidents too.

नौकरी का रिजेक्शन मिला तो उम्मीदवार ने कंपनी को ही कर दिया रिजेक्ट, जवाब हुआ वायरल

नौकरी की तलाश के दौरान बार-बार आने वाले रिजेक्शन ईमेल उम्मीदवारों का हौसला तोड़ सकते हैं। कई बार लोग ऐसे मेल पढ़कर निराश हो जाते हैं, लेकिन एक शख्स ने इसका बिल्कुल उल्टा तरीका अपनाया। कंपनी की ओर से मिले रिजेक्शन के बाद उसने निराश होने के बजाय ऐसा मजेदार जवाब भेज दिया, जिसने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। उसने कंपनी के फैसले को चुपचाप स्वीकार करने के बजाय मजाकिया अंदाज में उसी रिजेक्शन को वापस कंपनी की ओर मोड़ दिया। उसका जवाब सोशल मीडिया पर शेयर होते ही तेजी से वायरल होने लगा।

खास बात यह रही कि इस मजेदार अंदाज ने उन लोगों को भी खूब हंसाया, जो लंबे समय से नौकरी की तलाश में हैं और लगातार रिजेक्शन का सामना कर रहे हैं। पोस्ट पर लोगों ने अपने अनुभव साझा किए और कई यूजर्स ने इस अंदाज को आत्मविश्वास से भरा बताया। वहीं, कुछ लोगों ने इसे नौकरी के रिजेक्शन से निपटने का मजेदार तरीका माना।

‘आपने मुझे रिजेक्ट किया, लेकिन मैं इसे स्वीकार नहीं करता’

X पर @DeepStarts नाम के यूजर ने इस मजेदार जवाब का स्क्रीनशॉट शेयर किया। कैप्शन था, “Bro rejected the rejection email” यानी भाई ने रिजेक्शन वाले ईमेल को ही रिजेक्ट कर दिया। स्क्रीनशॉट में Keane नाम के शख्स का जवाब दिखता है। उसने कंपनी को धन्यवाद देते हुए लिखा कि उसने उम्मीदवार को रिजेक्ट करने में जो दिलचस्पी दिखाई, वह काबिले-तारीफ है। इसके बाद उसने कंपनी के फैसले की तारीफ करते हुए पूरा मामला ही उलट दिया।

रिजेक्शन स्वीकार करने से कर दिया इनकार

Keane ने मजाकिया अंदाज में लिखा कि उसे इस साल कई रिजेक्शन ईमेल मिल चुके हैं। इसलिए काफी सोच-विचार के बाद उसने इस बार कंपनी के रिजेक्शन को स्वीकार नहीं करने का फैसला किया है। उसने कंपनी को उसे रिजेक्ट करने के लिए धन्यवाद भी दिया और आखिर में ऐसी लाइन लिख दी जिसने पूरे ईमेल को और मजेदार बना दिया। उसने कहा कि वह जल्द ही कंपनी की टीम में शामिल होने की उम्मीद करता है।

सोशल मीडिया पर लोगों को खूब पसंद आया अंदाज

इस पोस्ट ने उन लोगों का खास ध्यान खींचा, जो नौकरी के लिए लगातार आवेदन करने और बार-बार रिजेक्शन झेलने का अनुभव रखते हैं। पोस्ट को लाखों व्यूज और हजारों लाइक्स मिले। एक यूजर ने कहा कि अब जब भी उसे नौकरी के लिए रिजेक्शन मिलेगा, वह भी यही तरीका अपनाएगा। एक अन्य यूजर ने लिखा कि Keane ने भर्ती प्रक्रिया के पूरे खेल को ही पलट दिया।

किसी ने हंसी, किसी ने कहा- इसे सच में आजमाएंगे

कई लोगों को यह जवाब इतना मजेदार लगा कि वे अपनी हंसी नहीं रोक पाए। कुछ यूजर्स ने Keane के आत्मविश्वास की भी तारीफ की और कहा कि वह ‘ना’ सुनकर रुकने वालों में से नहीं है। हालांकि, कुछ लोगों के लिए यह सिर्फ मजाक नहीं था। एक यूजर ने साफ कहा कि लोग भले ही इस पर हंस रहे हों, लेकिन वह खुद भी इस तरीके को आजमाने के बारे में गंभीरता से सोच रहा है। यानी नौकरी का एक सामान्य रिजेक्शन ईमेल, Keane के जवाब की वजह से ऐसा वायरल हुआ कि लोगों को रिजेक्शन मिलने के बाद भी मुस्कुराने की एक वजह मिल गई।

छुट्टी पर जाते ही कर्मचारी ने भेजा मजेदार मेल, किसी ने तारीफ की तो किसी ने बताया दिखावा

What Brazil’s 50-year ethanol experiment tells us

What Brazil’s 50-year ethanol experiment tells us
E20 fuel in Brazil

The forced introduction of E20 has set social media ablaze, with outraged car and bike owners complaining bitterly of damage to their vehicles and a drop in fuel efficiency. The anger isn’t irrational. The efficiency drop is real and, going by Autocar India’s own tests, larger than the figures the government itself has acknowledged. 

But while there’s no debate over the mileage penalty, the bigger fear is long-term damage to the vast majority of cars on our roads that are not E20-compliant. It’s a worry fanned by social media and by the way the government has handled the concern. Field trials conducted by the Automotive Research Association of India (ARAI) before the rollout reportedly found no major compatibility issues even in legacy vehicles. 

However, that report has never been made public, which has only deepened suspicion among car and bike owners. Most damaging of all was the Society of Indian Automobile Manufacturers (SIAM) formally flagging alarming levels of contamination in a letter it was later forced to publicly withdraw. Crucially, SIAM’s concern was contaminated fuel carrying worrying levels of chlorine, not the blend itself. That distinction has been lost in the noise, and it sits at the heart of the confusion, even panic, among customers fearing the worst.

So, is E20 the menace it is being made out to be, or is fuel contamination the bigger issue? The fact is, there is no workshop epidemic yet, though sceptics will argue it’s only a matter of time before engines start giving trouble. What social media is amplifying right now is the theoretical damage of a higher blend. That doesn’t make the concerns baseless, since long-term effects take years to show, but the truth is that panic and outrage are currently running well ahead of the evidence. Which makes it worth studying the one country that actually has the evidence, gathered over 50 years: Brazil.

The Brazil experience

If you think India’s leap from E10 to E20 was abrupt, consider what happened there. In November 1975, squeezed by the oil crisis and desperate to protect its foreign currency reserves, the Brazilian government launched Proalcool and shoved its motorists in at the deep end. “The blends with gasoline started at 20 percent. It went very soon up to 30 percent, and it was imposed by the government,” says Peter Gilbert, head of Operational Marketing and Customer Tech Services at Infineum Brazil, a fuel and lubricant additive specialist company whose business, it should be said, depends on ethanol-blended fuels working well. 

The documented history broadly bears him out, with one point worth noting: there was a brief low-blend ramp-up with E10, but that lasted roughly two to three years against the five decades of E20 and above since. Compare that with India, which took nearly two decades from its 2003 blending programme to reach E10. And like India, Brazil never kept an escape hatch. “There was no E0 when E20 was introduced,” says Gilbert, and there is none today: the mandated blend has since climbed through 25, 27 and 30 percent, and since August this year, all pumps in Brazil, including the super-premium ones, dispense E32.

But what is telling is the kind of cars running around on E20 in the late 1970s. Back then, cars were mainly carburetted with no fuel injection, no closed-loop control and no lambda sensors – machinery far cruder than even the oldest E10-era car on Indian roads today. So what broke?

According to Gilbert, remarkably little that could be pinned on E20 itself. “There weren’t any major issues reported,” he says. “There were issues related to the materials of the fuel system, the gaskets and the rubbers used at that time, but that has changed.”

His colleague Leandro Benvenutti, Infineum’s product manager for Latin America, says the trouble in 1970s and 1980s Brazil came almost entirely from dedicated alcohol cars running pure hydrous ethanol (E100), not from petrol cars on E20. “Everything we can remember from that time is related to these alcohol vehicles, not to the gasoline vehicles using E20,” he says. Carburettor corrosion, clogged jets, perished hoses and O-rings: all of it, in their experience, traced back to E100. “If there were problems in the other [non-flex fuel] vehicles, they were really not important at all.”

A caveat both experts volunteer: 1970s Brazil is not 2020s India, and the comparison is not like-for-like. “It’s difficult to correlate to vehicles today,” Gilbert admits. What the Brazilian record offers is not proof that nothing will go wrong here, but a large, long-running natural experiment in which the E20-specific damage everyone feared did not show up.

So what about India’s E10 cars?

Asked what he’d tell a worried Indian owner running an E10-era car on E20, Benvenutti replies, “There is no reason for panic. We don’t expect any immediate impact.” Note the word immediate. The honest answer regarding the long term is unknown, and to their credit, neither of Infineum’s experts pretends otherwise. Over years, rubber components in cars whose materials weren’t specified for E20 may embrittle sooner, and Benvenutti concedes older cars and motorcycles “may see issues with time”. But complicating the issue is attribution – what is due to ethanol and what is not. Rubber parts perish with pure petrol, too. 

Benvenutti recalls his father’s flex-fuel car whose fuel hose dried out and leaked after years of use. “Was that really caused by the ethanol, or was that something going to happen anyway after five or ten years?” If there is a cost to owners, in other words, it is most likely a shortened life for cheap parts such as hoses, gaskets and O-rings rather than failures of expensive ones. “The risk for the metal components, the hard components like valves, injectors and pumps, is much lower if you maintain this product within spec,” explains Gilbert. That last clause matters, and we’ll revisit it.

On material margins, Benvenutti is careful not to overclaim. He believes manufacturers build in buffers. “If I am developing an engine, I would prefer to keep some buffer,” he remarks but adds that he is not a materials specialist and that the buffer may mean a component lasting eight years instead of 10. Whether every manufacturer selling in India engineered that headroom is a question only the manufacturers can answer.

Calibration is key

The more concrete near-term issue isn’t corrosion. It’s calibration. E20 carries less energy per litre, so the engine management system must inject more fuel to keep the mixture correct. Most closed-loop systems that have been around since the move to BS-II fuel-injection in 2000 should easily adapt, but if an older car’s injectors or fuel-trim maps run out of adjustment range, the mixture runs lean. The tell-tale? “Probably the most impactful result will be a light on your cluster. You will see the malfunction indication light on,” says Benvenutti. If your check engine light comes on after the switch to E20, that’s your car telling you it can’t fully compensate. Whether yours will is a manufacturer-by-manufacturer, even model-by-model chance.

Then there is Brazil’s import experience, which is genuinely striking and even reassuring. European and Japanese cars homologated for E10 markets are sold in Brazil and run on E30, now E32, every day. “I haven’t seen any report on issues with those engines,” says Gilbert. And there is no exemption at the top of the market. With no E0 sold anywhere in the country, every Ferrari, Lamborghini and Porsche in Brazil fills up on E32; even the super-premium pumps dispense it. Ask whether a supercar owner can escape the blend, and the answer is emphatic. “No way,” says Benvenutti. 

Low volumes are no excuse to offer a special blend, unlike in India, where supercars have the safety net of a high-priced E0 premium fuel. Benvenutti points out that even a manufacturer bringing in a handful of sports cars must ensure the car is fit for the market’s fuel. “I would not imagine any OEM bringing one unit and selling it if that’s not prepared for that market.” The one genuine weak spot he flags concerns independent, grey-market imports, which arrive exactly as built for the European or Japanese market with no local adaptation. Much of ethanol’s impact is based on anecdotal data rather than any controlled study, but it is decades of anecdotes across millions of cars, from hatchbacks to hypercars.

How much evidence of ethanol impact is there?

Enough of it to take seriously. Start with a fact that rarely features in the Indian debate: Brazil is not a country of new cars. Punishing taxes on new vehicles and tight credit mean Brazilians hold on to their cars for a long time, and the tax system actively rewards them for doing so. Most states have long exempted the oldest cars from the annual IPVA vehicle tax, and a constitutional amendment now makes that exemption national for anything 20 years or older. The result, as per the Brazilian auto components association Sindipeças, is a fleet averaging over 11 years old, with 7.3 million vehicles past 16 years and some 220,000 past 25. Every one of them fills up on E27-to-E32 petrol because nothing else is sold. No doubt, much of this ageing fleet is flex-fuel, engineered from birth to drink anything up to E100, so their survival may seem overplayed, but only up to a point. 

Flex-fuel technology arrived in Brazil only in 2003 with the Volkswagen Golf, which means the country’s first two and a half decades on E20-and-higher blends were served entirely by ordinary petrol cars, and the earliest of those were designed for no ethanol whatsoever; the blend was simply imposed on them, which is exactly what’s happening in India today. The cars that predate the flex era and the imported non-flex cars still running on E32 haven’t seen a trend of ethanol casualties. There is no scrapyard full of ethanol victims; the old cars are still on the road.

Then there’s the formal testing. Before Brazil raised its mandate from E27 to E30 in August 2025, a working group under the country’s Ministry of Mines and Energy ran durability tests on vehicles representative of the national fleet. ANFAVEA, Brazil’s association of vehicle manufacturers (the counterpart to our SIAM), reported that the tests showed no adverse effects on engine durability or performance, with one telling condition attached: provided fuel quality standards are met. Independently, a year-long University of Nebraska-Lincoln study ran E30 in ordinary non-flex-fuel state government vehicles in the US and found no adverse effects either. None of this is a guarantee for every ageing car in India, but it is consistent, multi-source evidence that corroborates Infineum’s findings.

The dangerous C word 

So is the all-clear justified? Only conditionally, and the condition is the same one ANFAVEA attached: clean fuel made and blended to specification. And this is where India’s real problem appears to lie. If genuine damage is occurring in Indian fuel systems, the evidence points not to the ethanol blend but to what’s riding along with it: chloride contamination picked up during the production process and from storage tanks. SIAM’s now-withdrawn letter reported chloride levels of up to 500 ppm in samples from vehicle tanks and 350 ppm at retail outlets, figures the petroleum ministry has vehemently contested. Ministry officials say their own testing found high chlorine levels at just two pumps and that plastic sample containers had corrupted some tests and thrown up false readings. Yet, even a fraction of SIAM’s figures would dwarf the 3 ppm the ministry itself treats as the acceptable ceiling. 

Also, 3 ppm is only a guideline. India has yet to mandate BIS limits for chloride in fuel ethanol – something Brazil has enforced by law at 1 ppm for years. Chlorides corrode fuel pumps, injectors and valves regardless of whether a car was designed for E10 or E20, which is precisely why blaming the blend misdiagnoses the disease. The Brazilian experience, in short, largely acquits ethanol. It says nothing to acquit the fuel quality actually coming out of Indian pumps, and fixing that is a question of standards and enforcement, not of retreating to E10. 

The E20 debate, now thoroughly political, will no doubt rage on: the government and its agencies on one side, and on the other, opposition parties and a swarm of influencers and social media experts riding the outrage for popularity and views, but few of them have bothered to put an independent expert on record. The good thing is that science and first-hand experience – Brazil’s, in this case – take no sides. And that’s the side we are on.

ऋषभ पंत का एक पोस्ट और सोशल मीडिया पर मचा बवाल! लोगों ने दिया मजेदार रिएक्शन

भारतीय क्रिकेटर ऋषभ पंत का उत्तराखंड में जमीन खरीदने को लेकर किया गया सोशल मीडिया पोस्ट चर्चा में आ गया। भारतीय क्रिकेटर ऋषभ पंत उत्तराखंड में अपना घर बनाने की योजना बना रहे हैं। इसके लिए उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से जमीन तलाशने में मदद मांगी है। ऋषभ पंत ने सोशल मीडिया पर बताया कि वह दिल्ली से उत्तराखंड शिफ्ट होना चाहते हैं और काफी समय से वहां जमीन खरीदने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री से इस मामले में मदद करने और सही प्रक्रिया बताने की अपील की है।

वहीं पंत का ये पोस्ट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। कुछ लोग इस पोस्ट पर तरह-तरह से कमेंट कर रहे हैं। वहीं कुछ का कहना है कि पंत का अकाउंट किसी ने हैक कर लिया है।

सोशल मीडिया पर किया पोस्ट

ऋषभ पंत ने अपनी इच्छा जाहिर की है कि वह उत्तराखंड में रहकर अपने राज्य के विकास में योगदान देना चाहते हैं। उन्होंने सीएम पुष्कर सिंह धामी से घर बनाने के लिए सही जमीन तलाशने में मदद मांगी है। पंत ने कहा कि उत्तराखंड से उनका खास जुड़ाव है और वह अपनी जन्मभूमि के लिए कुछ करना चाहते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अगर राज्य सरकार उन्हें जमीन गिफ्ट में देती है तो उन्हें खुशी होगी, लेकिन वह सरकार की तय कीमत पर जमीन खरीदने के लिए भी तैयार हैं। पंत ने बताया कि, उन्हें जमीन खरीदने की प्रक्रिया की पूरी जानकारी नहीं है, इसलिए वह मुख्यमंत्री से इस मामले में मदद और सही जानकारी चाहते हैं।

लोगों ने किया कमेंट

पंत की इस अपील के बाद सोशल मीडिया पर लोगों की अलग-अलग रिएक्शन देखने को मिलीं। कुछ यूजर्स ने सवाल उठाया कि, अच्छी कमाई करने वाले एक इंटरनेशनल क्रिकेटर को जमीन गिफ्ट में लेने की बात क्यों करनी चाहिए।

एक यूजर ने पंत की आईपीएल से होने वाली कमाई का जिक्र करते हुए कहा कि इस तरह की मांग से लोगों के बीच गलत संदेश जा सकता है। यूजर ने ये भी कहा कि जब आम लोग ऐसे ही फायदे मांगते हैं तो अक्सर उनकी बुराई की जाती है।

पोस्ट पर लोगों ने किया कमेंट

कुछ यूजर्स ने कहा कि, “भारत में जमीन खरीदने और घर बनाने में पेपरवर्क, देरी और दूसरी दिक्कतें आ सकती हैं। उन्हें लगा कि अगर कोई हाई-प्रोफाइल क्रिकेटर प्रोसेस को समझने में स्ट्रगल कर रहा है, तो आम लोगों के लिए यह अनुभव और भी मुश्किल हो सकता है।” पंत के पोस्ट की टाइमिंग भी चर्चा का विषय बन गई। एक यूजर ने मजाक करते हुए कहा कि, जब पंत श्रीलंका में थे और भारत को वहां टेस्ट सीरीज खेलनी है, उसी दौरान उन्होंने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री से जमीन को लेकर मदद मांगी।

Dog Surgery Viral Video: 26 साल के करोड़पति ने ‘कुत्ता’ बनने के लिए उड़ाए 220 करोड़? वायरल वीडियो ने खड़े किए सवाल

सोशल मीडिया पर इन दिनों एक ऐसा वीडियो चर्चा में है, जिसने लोगों को हैरान कर दिया है। वायरल पोस्ट में दावा किया जा रहा है कि जापान के 26 वर्षीय करोड़पति जासो ने खुद को कुत्ते जैसा दिखाने के लिए करीब 220 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। पोस्ट के मुताबिक, उन्होंने कई सर्जरी करवाईं और अब उनका हाव-भाव और रहन-सहन कुत्ते जैसा है। हालांकि, इस दावे की अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

करोड़ों रुपये खर्च करने का दावा

वायरल पोस्ट में कहा गया है कि जासो ने अपनी शक्ल और शरीर को कुत्ते जैसा बनाने के लिए बड़ी रकम खर्च की। दावा यह भी है कि सर्जरी के बाद वह कुत्ते की तरह चलने-फिरने और रहने की कोशिश करते हैं। वीडियो के साथ शेयर किया गया यह दावा सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गया और देखते ही देखते लोग इस असामान्य कहानी पर अपनी प्रतिक्रियाएं देने लगे।

करोड़पति ने चुना ऐसा अजीब शौक?

वीडियो वायरल होने के बाद यूजर्स के बीच सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर हुई कि अगर किसी व्यक्ति के पास करोड़ों रुपये हैं तो वह उन्हें अपनी पसंद के मुताबिक खर्च कर सकता है, लेकिन 220 करोड़ रुपये खर्च कर खुद को कुत्ते जैसा बनाने का दावा लोगों को असामान्य लगा। कुछ यूजर्स ने इस पर मजेदार टिप्पणियां कीं, जबकि कुछ ने इसे इंसान के अनोखे शौक की मिसाल बताया।

सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

पोस्ट के कमेंट सेक्शन में लोगों की प्रतिक्रियाएं भी अलग-अलग रहीं। कुछ लोगों ने मजाक करते हुए कहा कि आमतौर पर करोड़पति महंगी कार, बंगला या लग्जरी लाइफस्टाइल पर पैसा खर्च करते हैं, लेकिन यहां मामला बिल्कुल अलग है। वहीं, कुछ यूजर्स ने वीडियो को लेकर हैरानी जताई और कहा कि अगर यह दावा सही है तो इतनी बड़ी रकम खर्च करने का फैसला वाकई चौंकाने वाला है।

कुछ लोगों ने वीडियो पर ही उठाए सवाल

हर कोई वायरल दावे को सच मानने के लिए तैयार नहीं है। कई सोशल मीडिया यूजर्स ने सवाल किया कि वीडियो में दिखाई देने वाला व्यक्ति आखिर कौन है और क्या वाकई उसने इतनी बड़ी रकम सर्जरी पर खर्च की है। कुछ लोगों ने यह भी सवाल उठाया कि सोशल मीडिया पर वायरल होने वाली तस्वीरों और वीडियो के साथ कई बार अधूरी या गलत जानकारी जोड़ दी जाती है। ऐसे में केवल पोस्ट या वीडियो के आधार पर किसी बड़े दावे को सच मानना सही नहीं होगा।

अभी तक दावे की पुष्टि नहीं

फिलहाल जासो के बारे में किए जा रहे इन दावों की किसी विश्वसनीय आधिकारिक स्रोत से पुष्टि सामने नहीं आई है। इसलिए 220 करोड़ रुपये खर्च करने, कई सर्जरी कराने या कुत्ते जैसा जीवन जीने की बात को फिलहाल सोशल मीडिया का दावा ही माना जाना चाहिए। वीडियो जरूर तेजी से वायरल हो रहा है, लेकिन इसके पीछे की वास्तविक कहानी क्या है, यह आधिकारिक जानकारी सामने आने के बाद ही स्पष्ट हो पाएगी।

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‘Fine Shyt’ रिलीज होते ही विवादों में Guru Randhawa! ऑफिस में महिलाओं के डांस पर क्यों उठे सवाल?

पंजाबी सिंगर गुरु रंधावा एक बार फिर अपने नए म्यूजिक वीडियो को लेकर चर्चा में हैं। उनका नया गाना ‘Fine Shyt’ रिलीज होने के कुछ ही दिनों में सोशल मीडिया पर बहस का विषय बन गया है। जहां कुछ यूजर्स ने गाने के म्यूजिक और कोरियोग्राफी को लेकर नाराजगी जताई, वहीं कई लोगों ने वीडियो के कॉन्सेप्ट पर सवाल उठाए हैं। खासतौर पर कॉरपोरेट ऑफिस में महिला कर्मचारियों के तौर पर दिखाए गए कलाकारों को गुरु रंधावा के किरदार के आसपास डांस करते हुए दिखाने को लेकर आपत्ति जताई जा रही है।

कॉरपोरेट ऑफिस में दिखाया गया है पूरा सेटअप

‘Fine Shyt’ का म्यूजिक वीडियो एक कॉरपोरेट ऑफिस के माहौल में फिल्माया गया है। वीडियो में Guru Randhawa एक सीनियर प्रोफेशनल के किरदार में नजर आते हैं। वहीं, कई महिला कलाकार ऑफिस कर्मचारियों के रूप में दिखाई देती हैं, जो उनके किरदार के आसपास डांस और परफॉर्म करती नजर आती हैं।

वीडियो के इसी सेटअप ने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी। आलोचना करने वाले यूजर्स का कहना है कि गाने में डांस और ग्लैमर दिखाना अलग बात है, लेकिन कामकाजी महिलाओं को उनके वर्कप्लेस के संदर्भ में इस तरह पेश करना एक अलग संदेश देता है।

वीडियो में Disclaimer भी, लेकिन विवाद नहीं थमा

वीडियो की शुरुआत में एक डिस्क्लेमर दिया गया है। इसमें बताया गया है कि वीडियो में दिखाई देने वाले सभी लोग 18 वर्ष से अधिक उम्र के हैं और वीडियो में दिखाए गए घटनाक्रम काल्पनिक हैं। इसके अलावा दर्शकों को मजाकिया अंदाज में चेतावनी दी गई है कि वे वीडियो में दिखाए गए डांस मूव्स को अपने ऑफिस में दोहराने की कोशिश न करें। ऐसा करने पर HR की कार्रवाई या बैन का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, इस डिस्क्लेमर के बावजूद सोशल मीडिया पर वीडियो के कॉन्सेप्ट को लेकर सवाल उठते रहे।

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Instagram पर वायरल हुई आलोचना

Instagram यूजर @sohasyap ने वीडियो का एक हिस्सा शेयर करते हुए इसकी आलोचना की। उन्होंने कहा कि उन्हें वीडियो में महिलाओं के डांस या उनके कॉस्ट्यूम से परेशानी नहीं है, बल्कि आपत्ति इस बात पर है कि उन्हें कामकाजी महिलाओं के रूप में एक पुरुष के आसपास डांस करते हुए क्यों दिखाया गया।

पोस्ट में यह सवाल भी उठाया गया कि इस तरह का कॉन्सेप्ट ऑफिस सेटिंग में रखने की जरूरत क्या थी। यूजर के मुताबिक, इसी तरह की एनर्जी और डांस को किसी अलग, एस्थेटिक सेट पर भी फिल्माया जा सकता था।

लड़कियों को नहीं, कॉन्सेप्ट को जिम्मेदार ठहराएं

वीडियो का बचाव करने वाले लोगों की प्रतिक्रियाओं के बाद Instagram यूजर ने अपनी बात विस्तार से स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि उनकी आलोचना वीडियो में काम कर रही महिला कलाकारों के खिलाफ नहीं है।

उनका कहना था कि ये महिलाएं अपने काम के लिए वीडियो का हिस्सा बनी हैं और इसलिए निशाना कलाकारों को नहीं, बल्कि वीडियो के कॉन्सेप्ट और उसे बनाने वाली टीम को बनाया जाना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि गुरु रंधावा एक बड़े कलाकार हैं और उनके म्यूजिक वीडियो बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचते हैं। ऐसे में वीडियो में दिखाई जाने वाली चीजें किसी न किसी तरह दर्शकों पर प्रभाव डाल सकती हैं।

विदेशी कलाकारों पर सवाल क्यों नहीं?’

अपनी सफाई में Instagram यूजर ने उन लोगों को भी जवाब दिया जिन्होंने इसे संकीर्ण सोच का मामला बताया था। उन्होंने कहा कि उनका सवाल ग्लोबल या विदेशी कलाकारों द्वारा किए जाने वाले ऐसे कंटेंट से अलग नहीं है।

उनका तर्क था कि अगर किसी वीडियो में महिलाओं को जिस तरह प्रस्तुत किया गया है, वह चर्चा का विषय बन सकता है तो कलाकार चाहे कोई भी हो, उस पर सवाल उठाना गलत नहीं है।

सोशल मीडिया पर गाने की म्यूजिक और कोरियोग्राफी भी निशाने पर

‘Fine Shyt’ को लेकर सोशल मीडिया पर सिर्फ वीडियो की थीम ही चर्चा में नहीं रही। कई यूजर्स ने गाने की म्यूजिक और कोरियोग्राफी को लेकर भी अपनी नाराजगी जाहिर की। एक यूजर ने गाने को सीधे तौर पर ‘Noise Pollution’ बताया। वहीं एक अन्य यूजर ने भविष्यवाणी करते हुए कहा कि आलोचना के बावजूद यह गाना सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर सकता है और जल्द ही इस पर बड़ी संख्या में डांस रील्स देखने को मिल सकती हैं। एक अन्य कमेंट में गाने को लेकर व्यंग्य किया गया, जबकि एक हिंदी कमेंट में यूजर ने गाना सुनने के बाद अपनी नाराजगी बेहद मजाकिया अंदाज में जाहिर की।

‘गुरु रंधावा इस्तीफा दोकमेंट ने खींचा ध्यान

बहस के बीच एक यूजर ने ‘गुरु रंधावा इस्तीफा दो’ लिखकर कमेंट किया। यह टिप्पणी हालिया छात्र प्रदर्शनों में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग से जोड़कर की गई थी।

यानी एक म्यूजिक वीडियो पर शुरू हुई बहस में सोशल मीडिया यूजर्स ने राजनीतिक तंज का एंगल भी जोड़ दिया।

डांस स्टाइल को लेकर भी यूजर्स ने साधा निशाना

कुछ लोगों ने वीडियो की कोरियोग्राफी पर भी सवाल उठाए। एक यूजर ने तंज करते हुए कहा कि गुरु रंधावा के लिए डांस का मतलब शायद सिर्फ एक खास तरह के बोल्ड या अजीब स्टेप्स रह गया है।

वहीं एक अन्य यूजर ने वीडियो की ऑफिस सेटिंग को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की। उसके मुताबिक, वर्कप्लेस को इस तरह के चित्रण से जोड़ना उचित नहीं है और वीडियो बनाने वालों ने आलोचना की असली वजह को समझने के बजाय सिर्फ उम्र और किरदार से जुड़े सवालों पर ध्यान दिया।

कामकाजी महिलाओं की ऐसी तस्वीर क्यों?’

एक अन्य सोशल मीडिया यूजर ने इस विवाद को महिलाओं के रोजगार और समाज में उनकी स्थिति से जोड़ते हुए अपनी बात रखी।

उसका कहना था कि महिलाओं को आज भी घर से बाहर निकलकर निजी कंपनियों में काम करने को लेकर कई तरह की सामाजिक पाबंदियों और सवालों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में लोकप्रिय म्यूजिक वीडियो में ऑफिस जाने वाली महिलाओं को इस तरह दिखाना उन धारणाओं को और मजबूत कर सकता है जिनसे कामकाजी महिलाएं पहले से जूझ रही हैं।

विवाद के बीच असली सवाल कॉन्सेप्ट पर

‘Fine Shyt’ को लेकर सोशल मीडिया की बहस ने गाने से ज्यादा उसके विजुअल प्रेजेंटेशन को चर्चा में ला दिया है। जहां कुछ यूजर्स इसे महज मनोरंजन और म्यूजिक वीडियो का हिस्सा मान रहे हैं, वहीं आलोचकों का कहना है कि बड़े कलाकारों के कंटेंट का व्यापक प्रभाव होता है।

फिलहाल, गुरु रंधावा के ‘Fine Shyt’ को लेकर सोशल मीडिया पर बहस जारी है। किसी को गाने की म्यूजिक और कोरियोग्राफी पसंद नहीं आई, तो किसी ने ऑफिस सेटिंग में महिलाओं की प्रस्तुति को लेकर सवाल उठाए हैं। वहीं कुछ यूजर्स इसे सिर्फ एक काल्पनिक म्यूजिक वीडियो मानते हुए आलोचना को जरूरत से ज्यादा बता रहे हैं।

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‘Fine Shyt’ रिलीज होते ही विवादों में Guru Randhawa! ऑफिस में महिलाओं के डांस पर क्यों उठे सवाल?

पंजाबी सिंगर गुरु रंधावा एक बार फिर अपने नए म्यूजिक वीडियो को लेकर चर्चा में हैं। उनका नया गाना ‘Fine Shyt’ रिलीज होने के कुछ ही दिनों में सोशल मीडिया पर बहस का विषय बन गया है। जहां कुछ यूजर्स ने गाने के म्यूजिक और कोरियोग्राफी को लेकर नाराजगी जताई, वहीं कई लोगों ने वीडियो के कॉन्सेप्ट पर सवाल उठाए हैं। खासतौर पर कॉरपोरेट ऑफिस में महिला कर्मचारियों के तौर पर दिखाए गए कलाकारों को गुरु रंधावा के किरदार के आसपास डांस करते हुए दिखाने को लेकर आपत्ति जताई जा रही है।

कॉरपोरेट ऑफिस में दिखाया गया है पूरा सेटअप

‘Fine Shyt’ का म्यूजिक वीडियो एक कॉरपोरेट ऑफिस के माहौल में फिल्माया गया है। वीडियो में Guru Randhawa एक सीनियर प्रोफेशनल के किरदार में नजर आते हैं। वहीं, कई महिला कलाकार ऑफिस कर्मचारियों के रूप में दिखाई देती हैं, जो उनके किरदार के आसपास डांस और परफॉर्म करती नजर आती हैं।

वीडियो के इसी सेटअप ने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी। आलोचना करने वाले यूजर्स का कहना है कि गाने में डांस और ग्लैमर दिखाना अलग बात है, लेकिन कामकाजी महिलाओं को उनके वर्कप्लेस के संदर्भ में इस तरह पेश करना एक अलग संदेश देता है।

वीडियो में Disclaimer भी, लेकिन विवाद नहीं थमा

वीडियो की शुरुआत में एक डिस्क्लेमर दिया गया है। इसमें बताया गया है कि वीडियो में दिखाई देने वाले सभी लोग 18 वर्ष से अधिक उम्र के हैं और वीडियो में दिखाए गए घटनाक्रम काल्पनिक हैं। इसके अलावा दर्शकों को मजाकिया अंदाज में चेतावनी दी गई है कि वे वीडियो में दिखाए गए डांस मूव्स को अपने ऑफिस में दोहराने की कोशिश न करें। ऐसा करने पर HR की कार्रवाई या बैन का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, इस डिस्क्लेमर के बावजूद सोशल मीडिया पर वीडियो के कॉन्सेप्ट को लेकर सवाल उठते रहे।

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Instagram पर वायरल हुई आलोचना

Instagram यूजर @sohasyap ने वीडियो का एक हिस्सा शेयर करते हुए इसकी आलोचना की। उन्होंने कहा कि उन्हें वीडियो में महिलाओं के डांस या उनके कॉस्ट्यूम से परेशानी नहीं है, बल्कि आपत्ति इस बात पर है कि उन्हें कामकाजी महिलाओं के रूप में एक पुरुष के आसपास डांस करते हुए क्यों दिखाया गया।

पोस्ट में यह सवाल भी उठाया गया कि इस तरह का कॉन्सेप्ट ऑफिस सेटिंग में रखने की जरूरत क्या थी। यूजर के मुताबिक, इसी तरह की एनर्जी और डांस को किसी अलग, एस्थेटिक सेट पर भी फिल्माया जा सकता था।

लड़कियों को नहीं, कॉन्सेप्ट को जिम्मेदार ठहराएं

वीडियो का बचाव करने वाले लोगों की प्रतिक्रियाओं के बाद Instagram यूजर ने अपनी बात विस्तार से स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि उनकी आलोचना वीडियो में काम कर रही महिला कलाकारों के खिलाफ नहीं है।

उनका कहना था कि ये महिलाएं अपने काम के लिए वीडियो का हिस्सा बनी हैं और इसलिए निशाना कलाकारों को नहीं, बल्कि वीडियो के कॉन्सेप्ट और उसे बनाने वाली टीम को बनाया जाना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि गुरु रंधावा एक बड़े कलाकार हैं और उनके म्यूजिक वीडियो बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचते हैं। ऐसे में वीडियो में दिखाई जाने वाली चीजें किसी न किसी तरह दर्शकों पर प्रभाव डाल सकती हैं।

विदेशी कलाकारों पर सवाल क्यों नहीं?’

अपनी सफाई में Instagram यूजर ने उन लोगों को भी जवाब दिया जिन्होंने इसे संकीर्ण सोच का मामला बताया था। उन्होंने कहा कि उनका सवाल ग्लोबल या विदेशी कलाकारों द्वारा किए जाने वाले ऐसे कंटेंट से अलग नहीं है।

उनका तर्क था कि अगर किसी वीडियो में महिलाओं को जिस तरह प्रस्तुत किया गया है, वह चर्चा का विषय बन सकता है तो कलाकार चाहे कोई भी हो, उस पर सवाल उठाना गलत नहीं है।

सोशल मीडिया पर गाने की म्यूजिक और कोरियोग्राफी भी निशाने पर

‘Fine Shyt’ को लेकर सोशल मीडिया पर सिर्फ वीडियो की थीम ही चर्चा में नहीं रही। कई यूजर्स ने गाने की म्यूजिक और कोरियोग्राफी को लेकर भी अपनी नाराजगी जाहिर की। एक यूजर ने गाने को सीधे तौर पर ‘Noise Pollution’ बताया। वहीं एक अन्य यूजर ने भविष्यवाणी करते हुए कहा कि आलोचना के बावजूद यह गाना सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर सकता है और जल्द ही इस पर बड़ी संख्या में डांस रील्स देखने को मिल सकती हैं। एक अन्य कमेंट में गाने को लेकर व्यंग्य किया गया, जबकि एक हिंदी कमेंट में यूजर ने गाना सुनने के बाद अपनी नाराजगी बेहद मजाकिया अंदाज में जाहिर की।

‘गुरु रंधावा इस्तीफा दोकमेंट ने खींचा ध्यान

बहस के बीच एक यूजर ने ‘गुरु रंधावा इस्तीफा दो’ लिखकर कमेंट किया। यह टिप्पणी हालिया छात्र प्रदर्शनों में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग से जोड़कर की गई थी।

यानी एक म्यूजिक वीडियो पर शुरू हुई बहस में सोशल मीडिया यूजर्स ने राजनीतिक तंज का एंगल भी जोड़ दिया।

डांस स्टाइल को लेकर भी यूजर्स ने साधा निशाना

कुछ लोगों ने वीडियो की कोरियोग्राफी पर भी सवाल उठाए। एक यूजर ने तंज करते हुए कहा कि गुरु रंधावा के लिए डांस का मतलब शायद सिर्फ एक खास तरह के बोल्ड या अजीब स्टेप्स रह गया है।

वहीं एक अन्य यूजर ने वीडियो की ऑफिस सेटिंग को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की। उसके मुताबिक, वर्कप्लेस को इस तरह के चित्रण से जोड़ना उचित नहीं है और वीडियो बनाने वालों ने आलोचना की असली वजह को समझने के बजाय सिर्फ उम्र और किरदार से जुड़े सवालों पर ध्यान दिया।

कामकाजी महिलाओं की ऐसी तस्वीर क्यों?’

एक अन्य सोशल मीडिया यूजर ने इस विवाद को महिलाओं के रोजगार और समाज में उनकी स्थिति से जोड़ते हुए अपनी बात रखी।

उसका कहना था कि महिलाओं को आज भी घर से बाहर निकलकर निजी कंपनियों में काम करने को लेकर कई तरह की सामाजिक पाबंदियों और सवालों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में लोकप्रिय म्यूजिक वीडियो में ऑफिस जाने वाली महिलाओं को इस तरह दिखाना उन धारणाओं को और मजबूत कर सकता है जिनसे कामकाजी महिलाएं पहले से जूझ रही हैं।

विवाद के बीच असली सवाल कॉन्सेप्ट पर

‘Fine Shyt’ को लेकर सोशल मीडिया की बहस ने गाने से ज्यादा उसके विजुअल प्रेजेंटेशन को चर्चा में ला दिया है। जहां कुछ यूजर्स इसे महज मनोरंजन और म्यूजिक वीडियो का हिस्सा मान रहे हैं, वहीं आलोचकों का कहना है कि बड़े कलाकारों के कंटेंट का व्यापक प्रभाव होता है।

फिलहाल, गुरु रंधावा के ‘Fine Shyt’ को लेकर सोशल मीडिया पर बहस जारी है। किसी को गाने की म्यूजिक और कोरियोग्राफी पसंद नहीं आई, तो किसी ने ऑफिस सेटिंग में महिलाओं की प्रस्तुति को लेकर सवाल उठाए हैं। वहीं कुछ यूजर्स इसे सिर्फ एक काल्पनिक म्यूजिक वीडियो मानते हुए आलोचना को जरूरत से ज्यादा बता रहे हैं।

14 महीने तक किसी को नहीं हुआ शक, दो कंपनियों में चुपचाप करता रहा नौकरी; लेकिन मर्जर ने ऐसा फंसाया कि अब समझ नहीं आ रहा क्या करे!

The Last House Advertising: ‘द लास्ट हाउस’ का प्रमोशन देख लोगों के उड़े होश, नेटफ्लिक्स ने क्रिटविटी की सारी हदें की पार

The Last House Advertising: ‘द लास्ट हाउस’ (The Last House) को प्रमोट करने के लिए नेटफिलिक्स ने बेहद अनोखा तरीका खोजा है। लॉस एंजिल्स के सनसेट बुलेवार्ड पर एक बेहद यूनिक और लाइव आउट-ऑफ-होम (OOH) विज्ञापन लगाया गया है। खास बात ये हैं कि इस लाइव एक्सपीरिएंशियल मार्केटिंग कैंपेन में कुछ ऐसा जोड़ा गया है, जिसे देख हर कोई हैरान है।

दरअसल लाइव आउट-ऑफ-होम में जमीन से 30 फीट ऊपर एक बिलबोर्ड लगा है।, जिसमें एक लिविंग रूम में बनाया गया है। इतना ही नहीं इसके अंदर एक परफॉर्मर को रहने के लिए छोड़ दिया गया है। वह समय-समय पर आते जाते लोगों को क्रिएटिव स्लोगन वाले बोर्ड दिखाता है। कभी कॉफी पीता दिखता है।

बिलबोर्ड के अंदर रह रहा व्यक्ति आपको किताबें पढ़ता दिखता है, ताश खेलता नजर आता, दूरबीन से देखता है और नीचे से गुजरने वाले लोगों से बातचीत करता भी नजर आएगा। यह अनोखा विज्ञापन फिल्म की कहानी को दिखाता है, जिसमें एक परिवार अचानक अपने ही घर के अंदर फंस जाता है और सालों तक बाहर नहीं आ पाता है।

बिलबोर्ड पर आप “द लास्ट हाउस आप कब तक जिंदा रह सकते हैं?” (The Last House How long can you survive?) लिखा देख सकते हैं। यह लाइव प्रमोशन कैंपेन 6 अगस्त से 8 अगस्त 2026 तक चलने वाला है, जो फिल्म के प्रीमियर होते ही बंद कर दिया जाएगा।

कास्ट और डायरेक्टर की बात करें तो इस फिल्म का निर्देशन लुई लेटेरियर (Louis Leterrier) ने किया है। वहीं इसमें ग्रेटा ली (Greta Lee) व वैगनर मौरा (Wagner Moura) लीड रोल में हैं। फिल्म 7 अगस्त 2026 से Netflix पर स्ट्रीम की जा रही है।