यमन ने हूतियों को खदेड़ने के लिए फौज भेजी:इनके कब्जे में देश का एक-तिहाई हिस्सा, यहां 80% आबादी रहती है

यमन की सऊदी समर्थित सरकार ने हूती विद्रोहियों को खदेड़ने और कब्जे वाले इलाकों को वापस लेने के लिए फौज भेजना शुरू कर दिया है। राष्ट्रपति राशद अल-अलीमी ने रविवार को इसका ऐलान करते हुए कहा कि सरकारी सेना पूरे यमन में राज्य का नियंत्रण बहाल करेगी। यमन में हूतियों का करीब एक-तिहाई इलाके पर नियंत्रण है। यहां देश की करीब 80% आबादी रहती है। यही वजह है कि हूतियों का क्षेत्रफल कम होने के बावजूद उनका देश की आबादी और अहम शहरों पर बड़ा प्रभाव है। हूतियों ने यमन के पश्चिमी तट पर कब्जा बढ़ाया हूतियों ने पिछले 48 घंटों में यमन के पश्चिमी तट पर कई रणनीतिक पहाड़ियों पर कब्जा किया है। अगर हूती इस इलाके को सरकारी इलाके से काट देते हैं, तो सरकार पूरी तरह इस पर नियंत्रण खो देगी। हूतियो ने इस इलाके में यमन के तीसरे सबसे बड़े शहर ताइज पर भी कब्जा बढ़ाया है। यहां सैकड़ों लोग रहते हैं और हजारों सरकारी समर्थक लड़ाके भी तैनात हैं। शहर पर दबाव बढ़ने से आम लोगों के लिए भी मुश्किलें बढ़ सकती हैं। यमनी पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक मोहम्मद अल-कादी के मुताबिक, आसपास की पहाड़ियों पर कब्जा हूतियों को मजबूत रक्षा स्थिति देता है। इससे तट की ओर होने वाली किसी भी सैन्य कार्रवाई का सामना करना उनके लिए आसान होगा और इन इलाकों को वापस लेना सरकार के लिए मुश्किल हो सकता है। बाब अल-मंदेब पर भी हूतियों की नजर हूतियों की हालिया बढ़त सिर्फ जमीन तक सीमित नहीं है। उन्होंने बाब अल-मंदेब स्ट्रेट के आसपास भी अपनी स्थिति मजबूत की है। यह लाल सागर और अदन की खाड़ी को जोड़ने वाला अहम समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। दुनिया का 12% तेल इसी रास्ते से होकर गुजरता है। हाल ही में हूतियों ने दक्षिणी लाल सागर में दो और अहम द्वीपों ग्रेटर हनीश और लेसर हनीश पर कब्जा कर लिया है। ये द्वीप बाब-अल मंदेब स्ट्रेट से करीब 160 किमी उत्तर में हैं। इन पर कब्जे से लाल सागर के समुद्री रास्ते पर उनका दबदबा और मजबूत हो गया है। यूरोप और एशिया के बीच आने-जाने वाले जहाजों के लिए यह रास्ता बेहद अहम है। ऐसे में इस इलाके पर हूतियों का नियंत्रण बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय शिपिंग पर भी असर पड़ सकता है। होर्मुज स्ट्रेट में तनाव के बीच बाब अल-मंदेब की अहमियत और बढ़ गई है। 12 साल से चल रही हैं यमन में लड़ाई यमन में सरकार और हूतियों के बीच करीब 12 साल से लड़ाई चल रही है। सऊदी अरब यमन की सरकार का समर्थन करता है, जबकि हूतियों को ईरान का समर्थन मिलता है। 2022 में दोनों पक्षों के बीच सीजफायर हुआ था। इसके बाद बड़े पैमाने पर लड़ाई काफी कम हो गई थी। अब हूतियों की बढ़त के बाद यमन में फिर बड़े गृहयुद्ध का खतरा पैदा हो गया है। युद्ध से यमन पहले ही गंभीर मानवीय संकट में है। देश का बुनियादी ढांचा क्षतिग्रस्त हो चुका है। वर्ल्ड फूड प्रोग्राम के मुताबिक, कुछ इलाकों में हर 4 में से 3 परिवारों को पर्याप्त खाना नहीं मिल रहा। नई लड़ाई में हजारों लोग विस्थापित हो चुके हैं। ऐसे में अगर सैन्य अभियान लंबा चला, तो यमन में भूख और विस्थापन का संकट और बढ़ सकता है। सऊदी अरब भी हूतियों पर हमला कर सकता है सऊदी अरब भी यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ जंग शुरू करने की तैयारी कर रहा है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी 1 लाख से ज्यादा सैनिकों को उतार सकता है। इसका मकसद बाब अल-मंदेब स्ट्रेट को हूतियों के कब्जे से छुड़ाना और समुद्री व्यापार का रास्ता सुरक्षित करना है। रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब के सामने सैन्य कार्रवाई के दो विकल्प हैं – इस ऑपरेशन का नेतृत्व यमन की सेनाएं करेंगी, जिन्हें सऊदी अरब का समर्थन मिलेगा। जरूरत पड़ने पर सऊदी अरब हवाई हमले भी कर सकता है। ———————– यह खबर भी पढ़ें… अल-कायदा ने फ्लाईदुबई हमले के आरोपी की तारीफ की: कहा- जंग अभी खत्म नहीं हुई, अमेरिकी-इजराइली विमानों पर 9/11 जैसे हमले करो आतंकी संगठन अल-कायदा ने फ्लाईदुबई की फ्लाइट में भारतीय पायलट स्मित मच्छर पर हमला करने वाले ओमानी को-पायलट हमाम अल-हमामी की तारीफ की। पूरी खबर पढ़ें…

संडे प्रोफाइल : लुइज लूला दा सिल्वा:ट्रम्प को चेताने वाले लूला ब्राजील में चौथी बार मैदान में

ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा इन दिनों राष्ट्रपति चुनाव को लेकर चर्चा में हैं। उधर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भी इस चुनाव में दिलचस्पी दिखा रहे है। हालांकि लूला ने अमेरिका को चुनाव से दूर रहने को कहा है। 80 वर्षीय लूला दा सिल्वा चौथी बार राष्ट्रपति बनने के लिए चुनाव लड़ रहे हैं। उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी सीनेटर फ्लावियो बोल्सोनारो हैं, जो पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के बेटे हैं। ट्रम्प ने फ्लावियो का औपचारिक समर्थन नहीं किया है, लेकिन बोल्सोनारो परिवार से उनकी नजदीकी रही है। मई में फ्लावियो ने व्हाइट हाउस में ट्रम्प से मुलाकात भी की थी। इसी बीच अमेरिका के डेमोक्रेट सांसदों ने ट्रम्प प्रशासन पर ब्राजील के चुनाव को प्रभावित करने के लिए आर्थिक और राजनीतिक दबाव डालने के आरोप लगाए हैं। लूला ने इसे ब्राजील की संप्रभुता का मुद्दा बनाया है। उन्होंने कहा कि ब्राजील का चुनाव ब्राजील के लोगों का मामला है और अमेरिका को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। 27 अक्टूबर 1945 को पर्नाम्बुको में जन्मे लूला ने 12 साल की उम्र में जूते पॉलिश किए, ऑफिस बॉय रहे और तकनीकी प्रशिक्षण के बाद मेटल वर्कर बने। फैक्ट्री में काम करते हुए मजदूर आंदोलन से जुड़े और 1975 में मेटल वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष बने। सैन्य शासन के दौरान बड़ी हड़तालों का नेतृत्व किया। 1980 में गिरफ्तार हुए और 31 दिन जेल में रहे। इसी साल दूसरे नेताओं के साथ वर्कर्स पार्टी बनाई। 1986 में लूला सांसद बने। 1989 में पहली बार राष्ट्रपति चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। 1994 और 1998 में भी हार मिली। 2002 में चौथे प्रयास में राष्ट्रपति बने और 2006 में दोबारा चुने गए। उनके पहले दो कार्यकाल के दौरान ब्राजील में गरीबी और आय-असमानता में कमी आई। बोल्सा फैमिलिया जैसे नकद सहायता कार्यक्रम का विस्तार हुआ, रोजगार और वास्तविक न्यूनतम वेतन बढ़ा। विश्व बैंक के अनुसार इस दौर के बदलावों में इन नीतियों के साथ आर्थिक वृद्धि और अनुकूल वैश्विक परिस्थितियों की भी भूमिका रही। इसके बाद लूला का राजनीतिक सफर पलटा। भ्रष्टाचार के मामलों में दोषी ठहराए जाने के बाद 2018 में जेल गए। 2019 में रिहा हुए। 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अदालत के पास इन मामलों की सुनवाई का अधिकार नहीं होने के आधार पर उनकी दोषसिद्धियां रद्द कर दीं। इससे उनके चुनाव लड़ने का रास्ता खुला और 2022 में तीसरी बार राष्ट्रपति बने। अब 80 साल के लूला चौथा कार्यकाल चाहते हैं। उनके सामने उसी बोल्सोनारो परिवार की अगली पीढ़ी है, जिसके जायर बोल्सोनारो को उन्होंने हराया था। अर्थव्यवस्था, महंगाई और अपराध जैसे घरेलू मुद्दों के बीच अमेरिकी दबाव और संप्रभुता भी इस चुनावी बहस का हिस्सा बन चुके हैं। इसलिए यह चुनाव केवल चौथी जीत नहीं, बल्कि यह भी तय करेगा कि चार दशक से ब्राजील की राजनीति के केंद्र में रहे लूला का राजनीतिक प्रभाव आगे कितना कायम रहता है।

Punjab Politics: पंजाब के स्कूलों में शिक्षकों की कमी पर AAP विधायक ने उठाई आवाज, कुछ ही देर बाद केजरीवाल की पार्टी ने किया सस्पेंड

Punjab Politics: पंजाब से एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायक सुखवीर सिंह मैसरखाना ने शनिवार (3 अक्टूबर) को अपनी पार्टी के नेतृत्व और पंजाब सरकार पर आरोप लगाया कि वे उनके निर्वाचन क्षेत्र के कुछ सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी की समस्या का समाधान नहीं कर रहे हैं। हालांकि, इसके कुछ देर बाद ही मैसरखाना को पार्टी से बाहर कर दिया गया। आम आदमी पार्टी ने मैसरखाना के आरोपों को खारिज करते हुए उन्हें कथित तौर पर पार्टी विरोधी गतिविधियों और अनुशासनहीनता के आरोप में निलंबित कर दिया।

इससे पहले, पंजाब के बठिंडा जिले की मौर विधानसभा सीट से विधायक सुखवीर सिंह मैसरखाना (Maur AAP MLA Sukhveer Singh Maiserkhanal) ने फेसबुक पर कहा कि शिक्षकों की कमी से जुड़ी उनकी शिकायत का समाधान नहीं होने से परेशान होकर उन्होंने सोशल मीडिया का सहारा लिया। पंजाब में आप सरकार के तहत स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में उपलब्धियों के पार्टी के दावों पर सवाल उठाते हुए विधायक ने आरोप लगाया कि जमीनी स्तर पर स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है।

टीचर्स की कमी का उठाया था मुद्दा

सुखवीर सिंह मैसरखाना ने एक इमोशनल वीडियो जारी कर पंजाब सरकार पर राज्य के सरकारी स्कूलों में टीचरों की कमी को दूर करने में नाकाम रहने का आरोप लगाया था। रूंधे गले से AAP विधायक ने कहा कि उनका बेटा भी सरकार के ‘उत्कृष्ट विद्यालय’ में पढ़ता है, जहां शिक्षकों की कमी है। उन्होंने दावा किया कि सत्तारूढ़ दल के विधायकों में वह अकेले ऐसे विधायक हैं, जिनके बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं। विधायक ने दावा किया कि पार्टी नेतृत्व के सामने यह मुद्दा उठाने के बाद उन्हें बताया गया कि मुख्यमंत्री ने उन्हें बुलाया है। उन्होंने दावा किया, “लेकिन उन्होंने मुझसे मुलाकात नहीं की। मैं आखिर कब तक इसे बर्दाश्त करूंगा? मैंने पार्टी का क्या बिगाड़ा है?”

‘मैं थक गया हूं, शिक्षकों की मांग करते-करते’

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, AAP विधायक ने कहा कि वह लगातार सरकार और पार्टी नेतृत्व से स्कूलों में शिक्षक उपलब्ध कराने की अपील करते रहे, लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गई। उन्होंने कहा कि उन्होंने दिल्ली के पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया को बताया था कि उनके बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं और वहां भी पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं। उन्होंने सवाल किया कि अगर सरकारी स्कूलों की स्थिति नहीं सुधरी तो चुनाव के समय सरकार जनता से वोट कैसे मांगेगी।

अब पार्टी पंजाब चुनाव में टिकट नहीं देगी?

AAP विधायक ने कहा कि उन्हें पता है कि आगामी चुनाव में पार्टी उन्हें टिकट नहीं देगी। मैसरखाना ने कहा, “लेकिन मैं लोगों के लिए लड़ता रहूंगा।” विधायक ने कहा कि उन्होंने अपनी शिकायत पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचाई, लेकिन उसका कोई समाधान नहीं हुआ। उन्होंने कहा, ‘‘मुझे बताइए कि मैं कहां गलत हूं।’’ मैसरखाना ने आशंका जताई कि उनके खिलाफ FIR दर्ज की जा सकती है।

विधायक के इस तरह खुलकर नाराजगी जताने के बाद आप की पंजाब इकाई के महासचिव हरचंद सिंह बरसट ने कहा कि मैसरखाना को तत्काल प्रभाव से पार्टी से निलंबित कर दिया गया है। AAP विधायक के बयान का हवाला देते हुए प्रदेश BJP ने कहा कि उनकी स्थिति ने राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी के शिक्षा क्रांति के दावे की पोल खोल दी है।

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शिक्षा मंत्री ने आरोपों को बताया ‘राजनीति से प्रेरित’

पंजाब के शिक्षा मंत्री हरजोत सिंह बैंस ने इस मामले में विधायक के आरोपों को ‘राजनीति से प्रेरित’ बताया है। उन्होंने कहा कि मैसरखाना के विधानसभा क्षेत्र में 90 प्रतिशत से अधिक शिक्षक पद भरे हुए हैं। मंत्री के मुताबिक, रामनगर स्थित School of Eminence में 30 स्वीकृत पदों के मुकाबले 25 शिक्षक कार्यरत हैं। जबकि स्कूल में करीब 580 स्टूडेंट हैं। यानी सरकार और विधायक की ओर से स्कूल में शिक्षकों की स्थिति को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं। इस घटनाक्रम ने पंजाब में सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की उपलब्धता, AAP सरकार के शिक्षा सुधारों और पार्टी के भीतर असहमति को लेकर नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है।

मतदाताओं का नहीं पार्टियों का प्रदर्शन है

असल में कुछ प्रक्रियागत मामलों में चुनाव आयुक्तों की असहमति थी, जिसे उन्होंने जाहिर किया और आयोग ने उसे ठीक किया। जब इसकी रिपोर्ट मीडिया में आई तो विपक्ष ने इसको अपने लिए अवसर मान कर प्रदर्शन शुरू कर दिया। यह विशुद्ध रूप से एक राजनीतिक आंदोलन है, जो राजनीतिक दलों द्वारा प्रायोजित है और विपक्षी राजनीतिक दलों के फायदे के लिए है। आम मतदाता भी इस बात को समझ रहा है।

महात्मा गांधी की जयंती यानी दो अक्टूबर पर देश के कई हिस्सों में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन हुए। हाल के महीनों में दूसरी बार राजनीतिक दलों और गैर राजनीतिक संगठनों ने सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन किया। दिल्ली से मुंबई तक खूब शोरगुल हुआ। लेकिन जून और जुलाई में दिल्ली के जंतर मंतर पर चले 36 दिन के आंदोलन और गांधी जयंती पर हुए इस आंदोलन में एक बुनियादी अंतर है, जो अलग अलग जगहों पर प्रदर्शनों में दिख भी रहा है। 20 जून से शुरू होकर 25 जुलाई तक जंतर मंतर पर चला आंदोलन पेपर लीक से प्रभावित हुए छात्रों और उनके समर्थन में उतरे एक नए संगठन कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी का था। बाद में लेफ्ट पार्टियों और समाजवादी पार्टी के अलावा शरद पवार की एनसीपी और उद्धव ठाकरे की शिव सेना के नेता भी इसमें शामिल हुए थे। लेकिन बुनियादी रूप से वह आंदोलन प्रभावित छात्रों का था, जिनकी संख्या बहुत बड़ी थी।

गौरतलब है कि 2026 की नीट परीक्षा करीब 24 लाख छात्रों ने दी थी, जो पेपर लीक होने और दोबारा परीक्षा होने से प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुए थे। उसी समय कई और परीक्षाओं में गड़बड़ी की खबरें आई थीं, जिनसे प्रभावितों की संख्या बहुत बड़ी हो गई थी। तभी उस आंदोलन का आयाम बहुत बड़ा हो गया था। हजारों लोग हर दिन प्रदर्शन में शामिल हो रहे थे और लाखों नहीं, बल्कि करोड़ों लोग हर दिन डिजिटल माध्यम से उस आंदोलन से जुड़ रहे थे। लोगों का एक भावनात्मक लगाव आंदोलन से दिख रहा था। आंदोलन की जगह पर मीडिया और सोशल मीडिया के लोग जब किसी से बात करते थे तो वह प्रभावित परिवार का हिस्सा निकलता था। प्रभावित छात्र या उसके परिजन आंदोलन में शामिल थे इसलिए उसकी तीव्रता बहुत ज्यादा थी। उसमें आक्रोश भी बहुत ज्यादा था।

तभी सरकार ने छात्रों व युवाओं की भावनाओं को समझा और उस हिसाब से कार्रवाई की। सरकार ने दो बड़े मंत्रियों को भेज कर बात कराई, सोनम वांगचुक का अनशन समाप्त कराया और छात्रों की सारी मांगें मान कर आंदोलन खत्म कराया।

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए अभी जो आंदोलन हो रहा है वह बुनियादी रूप से छात्रों व युवाओं को आंदोलन से भिन्न है। यह प्रभावित पक्ष का आंदोलन नहीं है। इसमें ऐसे लोग नहीं दिख रहे हैं, जिनके वोट कट गए हैं। याद करें कैसे जंतर मंतर पर आंदोलन के दौरान उन छात्रों की तस्वीरें रखी गई थीं, जिन्होंने पेपर लीक के बाद सुसाइड किया था। उनके परिजनों को आंदोलन में आमंत्रित किया गया था। इस बार का आंदोलन चाहे दिल्ली का जंतर मंतर हो या मुंबई का शिवाजी पार्क कहीं भी प्रभावित लोग नहीं दिखे।

प्रदर्शनकारियों ने ऐसे लोगों को मंच पर नहीं प्रस्तुत किया, जिनका नाम कट गया है। अगर यह आंदोलन मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में नाम काटे जाने के खिलाफ है तो इसमें अनिवार्य रूप से उन लोगों को शामिल होना चाहिए, जिनके नाम कटे हैं। हालांकि यह जरूरी नहीं है कि हर बार प्रभावित पक्ष ही आंदोलन करे। कई बार प्रभावित पक्ष ऐसा करने में सक्षम नहीं होता है तो उसकी लड़ाई सिविल सोसायटी या राजनीतिक दल लड़ते हैं। लेकिन जब प्रभावितों की संख्या करोड़ों में हो और मुद्दा राजनीतिक अधिकार का हो तब निश्चित रूप से प्रभावित लोग इसमें शामिल होते हैं।

मिसाल के तौर पर राजधानी दिल्ली में 47 लाख लोगों के नाम कटे हैं। दिल्ली में एसआईआर से पहले 1.45 करोड़ मतदाता थे, जिनमें से अब 97 लाख ही मतदाता बचे हैं। अगर दिल्ली के साथ एनसीआर मिला लें यानी नोएडा, गाजियाबाद और गुरुग्राम को जोड़ दें तो नाम कटने वालों की संख्या एक करोड़ के करीब पहुंच जाएगी। अगर इनमें से एक फीसदी आदमी भी आंदोलन करने उतरे तो वह संख्या एक लाख होगी। लेकिन दो अक्टूबर को दिल्ली के आंदोलन में 10 हजार लोग नहीं जुटे, जबकि आम आदमी पार्टी और लेफ्ट की तीनों पार्टियों ने भीड़ जुटाने के लिए पूरा जोर लगाया था। लेफ्ट की तीन पार्टियों के छात्र संगठन लगे हुए थे और परदे के पीछे से कांग्रेस के छात्र संगठन के लोग भी जुटे थे। फिर भी भीड़ नहीं जुटी, जबकि जून और जुलाई में हुए आंदोलन में बिना किसी प्रयास के लोग जुट रहे थे।

जाहिर है वोट कटने वाले आंदोलन से आम आदमी का जुड़ाव नहीं बन रहा है। जबकि यह एक राजनीतिक मुद्दा है। यह महंगाई या बेरोजगारी की तरह कोई सार्वभौमिक मुद्दा नहीं है, बल्कि व्यक्ति के राजनीतिक अधिकार से जुड़ा मुद्दा है और व्यापक रूप से वैयक्तिक है। तभी इस मुद्दे को लेकर हो रहे आंदोलन में प्रभावितों को शामिल होना चाहिए था, जो नहीं हो रहे हैं। इसका अर्थ है कि यह कोई वास्तविक मुद्दा नहीं है, बल्कि राजनीतिक दलों द्वारा गढ़ा गया एक मुद्दा है, जिसका मकसद धारणा को प्रभावित करना है।

पहले दिन से यह स्पष्ट दिख रहा है कि एसआईआर के खिलाफ आंदोलन स्वंयस्फूर्त नहीं है, बल्कि राजनीतिक दलों द्वारा प्रायोजित है, जिसका उद्देश्य देश में एक झूठा नैरेटिव स्थापित करना है। राहुल गांधी ने पिछले साल जून में बिहार में एसआईआर शुरू होने के बाद इसके खिलाफ 16 दिन तक यात्रा की थी। उसी समय उनको लग गया था कि इससे जनता का कनेक्ट नहीं है। बाद में नतीजों से यह प्रमाणित भी हुआ। तभी उन्होंने यह मुद्दा छोड़ दिया था। कॉकरोच जनता पार्टी के दिल्ली के सफल आंदोलन के बाद राहुल गांधी को यह चिंता सताने लगी है कि राजनीति में नई शक्तियों का उदय हो रहा है।

जिस तरह से आम आदमी पार्टी ने दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस को रिप्लेस किया और टीवीके ने तमिलनाडु में डीएमके व अन्ना डीएमके दोनों को रिप्लेस किया उस तरह किसी नई शक्ति के उभरने और किसी अन्य राज्य में कांग्रेस को रिप्लेस करने का खतरा भी कांग्रेस को दिख रहा है। इसलिए भी वह ऐसे गढ़े हुए मुद्दों पर आंदोलन कर रही है या उसमें शामिल हो रही है ताकि प्रासंगिकता बनी रहे।

वास्तविकता यह है कि एसआईआर का मुद्दा आम आदमी का मुद्दा है ही नहीं। यह राजनीतिक दलों का मुद्दा है, जो अपनी लगातार हो हार का ठीकरा चुनाव आयोग पर फोड़ना चाहती हैं। विपक्षी पार्टियों की हार राजनीतिक कारणों से है। उनकी संगठनात्मक क्षमता कमजोर होने और नेतृत्व की कमी से उनकी हार हो रही है। लेकिन अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने और खुद को दिलासा देने के लिए वे चुनाव आयोग को निशाना बना रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि एसआईआर की प्रक्रिया में कानूनी और तकनीकी वजहों से कुछ ऐसे लोगों के नाम कटे होंगे, जो वास्तव में मतदाता हैं। लेकिन उनकी संख्या बहुत कम है और उनके पास नाम जुड़वाने के विकल्प हैं। जितनी संख्या में विपक्ष दावा कर रहा है अगर उतनी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम कटे होते तो अब तक देश में क्रांति हो गई होती।

चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर एक अंग्रेजी अखबार की जिस रिपोर्ट के बाद से नए सिरे से आंदोलन शुरू हुए हैं वह रिपोर्ट भी तकनीकी और कानूनी असंगति को ज्यादा दिखाती है। उसमें भी यह कहीं नहीं कहा गया है कि दोनों चुनाव आयुक्त एसआईआऱ के फैसले से सहमत नहीं हैं। एसआईआर का फैसला पूर्ण चुनाव आयोग का संपूर्ण सहमति से किया गया फैसला है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट की भी मुहर है। चुनाव आय़ोग संविधान से मिले अधिकार के तहत ही यह काम कर रहा है। असल में कुछ प्रक्रियागत मामलों में चुनाव आयुक्तों की असहमति थी, जिसे उन्होंने जाहिर किया और आयोग ने उसे ठीक किया। जब इसकी रिपोर्ट मीडिया में आई तो विपक्ष ने इसको अपने लिए अवसर मान कर प्रदर्शन शुरू कर दिया। यह विशुद्ध रूप से एक राजनीतिक आंदोलन है, जो राजनीतिक दलों द्वारा प्रायोजित है और विपक्षी राजनीतिक दलों के फायदे के लिए है। आम मतदाता भी इस बात को समझ रहा है। इसलिए वह इन प्रदर्शनों में शामिल नहीं हो रहा है।  (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)

जंतर मंतर पर दूसरे दिन भी प्रदर्शन

नई दिल्ली। शनिवार को लगातार दूसरे दिन जंतर मंतर पर वामपंथी पार्टियों के छात्र संगठनों और सिविल सोसायटी के लोगों ने प्रदर्शन किया। जाने माने वकील  और सपा समर्थित राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल भी शनिवार को प्रदर्शन में शामिल हुए। सिब्बल के अलावा मशहूर वकील प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव भी उनके साथ थे। सीपीआई माले के छात्र संगठन आईसा की नेता नेहा बोरा ने दूसरे दिन भी आंदोलन का नेतृत्व किया। प्रदर्शनकारियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और एसआईआर स्थगित करने की मांग की।

पुलिस ने शुक्रवार की ही तरह शनिवार को भी जंतर मंतर पर चारों तरफ बैरिकेडिंग कर रखी थी। प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने धरने की जगह तक जाने से रोक दिया। योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और नेहा बोरा सहित करीब डेढ़ सौ प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने हिरासत में लिया। इससे पहले प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस की झड़प भी हुई। हिरासत में लेने के बाद पुलिस सभी को बस में बैठा कर सेंट्रल दिल्ली से बाहर ले गई। शनिवार के प्रदर्शन में आम आदमी पार्टी के नेता शामिल नहीं हुए।

इससे पहले शुक्रवार को आम आदमी पार्टी और लेफ्ट के साथ सिविल सोसायटी के लोगों ने प्रदर्शन किया। इस दौरान सात सौ से ज्यादा प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया था। जंतर मंतर के आसपास पांच हजार से ज्यादा जवान तैनात थे। बाद में शुक्रवार की शाम को आईसा का नेहा बोरा ने वीडियो संदेश जारी करके कहा था कि प्रदर्शन जारी रहेगा और कार्यकर्ता जंतर मंतर लौटें। बोरा ने कहा था कि हिरासत में लिए जाने से प्रदर्शनकारी डरेंगे नहीं। उन्होंने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग के समर्थन में लगातार जुटने की अपील की थी।

उनकी अपील पर शनिवार को भी लेफ्ट के छात्र संगठनों के लोग जंतर मंतर पहुंचे। प्रदर्शनकारियों ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया का विरोध किया। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे तक प्रदर्शन जारी रखने का ऐलान किया है। शनिवार के प्रदर्शन में आईसा के अलावा एसएफआई और कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई के छात्र भी शामिल हुए।

‘आपके साहस पर UAE को गर्व है’; Flydubai के ‘हीरो’ भारतीय पायलट स्मित मच्छार से मिले दुबई के क्राउन प्रिंस, कैप्टन की बहादुरी के हुए कायल

Dubai Crown Prince met Smit Machchhar: फ्लाईदुबई फ्लाइट के ‘हीरो’ भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छार से दुबई के क्राउन प्रिंस और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के उप प्रधानमंत्री हमदान बिन मोहम्मद अल मकतूम ने शनिवार (3 अक्टूबर) को मुलाकात की। इस मुलाकात की तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए अल मकतूम ने भारतीय हीरो की जमकर तारीफ की है। मच्छार ने उस समय असाधारण साहस और सूझबूझ का परिचय दिया था, जब उनके ओमानी को-पायलट ने फ्लाईदुबई के प्लेन को उड़ान के दौरान उन पर चाकू से हमला कर दिया था। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद मच्छर ने विमान को सुरक्षित रखने और यात्रियों की जान बचाने में अहम भूमिका निभाई थी।

क्राउन प्रिंस ने अस्पताल में मच्छर से मुलाकात की, जहां वह हमले के बाद स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं। मुलाकात के बाद हमदान बिन मोहम्मद ने कहा कि कैप्टन मच्छर ने साहस, जिम्मेदारी और मानव जीवन के प्रति देखभाल की सर्वोच्च भावना का प्रदर्शन किया है। उन्होंने कहा कि UAE के नेतृत्व और देश की ओर से मच्छर को पूरा सम्मान और प्रशंसा दी जाती है।

‘हमें गर्व है कि वह हमारी टीम का हिस्सा हैं’

दुबई के क्राउन प्रिंस ने कैप्टन मच्छर की तारीफ करते हुए कहा कि उन्हें गर्व है कि वह UAE की टीम का हिस्सा हैं और अब वह देश की कहानी का भी हिस्सा बन चुके हैं। उन्होंने कहा कि मच्छर का साहस उस भावना को दर्शाता है, जिसके लिए UAE जाना जाता है करुणा, शांति और मानव जीवन की रक्षा…। 30 सितंबर को फ्लाईदुबई की फ्लाइट FZ1073 के कॉकपिट में हुई हाथापाई के दौरान वे घायल हो गए थे।

बोइंग 737 मैक्स 8 विमान दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट से तेल अवीव जा रहा था, तभी उसे सऊदी अरब के तबुक की ओर मोड़ दिया गया। शेख हमदान ने आतंकी घटना के दौरान यात्रियों की सुरक्षा के लिए मच्छार की हिम्मत, जिम्मेदारी की भावना और बहादूरी की तारीफ की। शेख हमदान ने कहा कि स्मित मच्छार ने बेहद हिम्मत, जिम्मेदारी और लोगों की जान की परवाह दिखाई। उन्होंने UAE के नेतृत्व की ओर से भी पायलट की तारीफ की और उन्हें देश के लिए गर्व का जरिया बताया।

UAE के राष्ट्रपति के सलाहकार ने की स्मित मच्छार की प्रशंसा

संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के राष्ट्रपति के एक वरिष्ठ सलाहकार ने भारतीय कैप्टन स्मित मच्छार की शुक्रवार को प्रशंसा करते हुए कहा कि उनके साहसिक कदमों ने एक गंभीर आतंकवादी घटना के दौरान बड़ी दुर्घटना को होने से रोक दिया। ‘गल्फ न्यूज’ के अनुसार, यूएई के राष्ट्रपति के राजनयिक सलाहकार अनवर गर्गाश ने X पर लिखा, “फ्लाईदुबई के भारतीय पायलट स्मित मच्छार अत्यधिक प्रशंसा के पात्र हैं। उन्होंने एक गंभीर आतंकवादी घटना और संभावित बड़ी त्रासदी का सामना करते हुए साहस और जिम्मेदारी का परिचय दिया।”

गर्गाश ने एक पोस्ट में कहा, “सबसे कठिन परिस्थितियों में दिखाई गई उनकी पेशेवर दक्षता और नैतिक दृढ़ता उन्हें सच्चा नायक बनाती है।” उन्होंने कहा कि भविष्य में चरमपंथ और आतंकवाद की संभावित घटनाओं से निपटने के लिए सतर्कता जरूरी है। उन्होंने साथ ही इस हमले को लेकर साजिश के सिद्धांतों को बढ़ावा देने के खिलाफ आगाह किया। फ्लाईदुबई का विमान सऊदी अरब के तबुक में उतरा था। वहां एक अस्पताल में प्राथमिक जांच के बाद मच्छार को आगे के इलाज के लिए अबू धाबी ले जाया गया।

34 हजार फीट की ऊंचाई पर हुआ था हमला

यह घटना फ्लाईदुबई की फ्लाइट FZ1073 में हुई थी। विमान दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट से इजरायल के तेल अवीव जा रहा था। विमान में करीब 180 लोग सवार थे। बताया गया है कि विमान जब सऊदी अरब के हवाई क्षेत्र के ऊपर करीब 34,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ रहा था, तभी ओमानी नागरिक कट्टरपंथी को-पायलट ने कैप्टन स्मित मच्छार पर हमला कर दिया।

हमले में कैप्टन गंभीर रूप से घायल हो गए। लेकिन इसके बावजूद उन्होंने स्थिति को संभालने और विमान में सवार लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अपनी जिम्मेदारी निभाई। वह फ्लाइट के कॉकपिट का दरवाजा खोलने में कामयाब रहे जिससे यात्रियों को हमलावर को काबू में करने का मौका मिला। विमान में 174 यात्री सवार थे। स्मिट की वजह से विमान सुरक्षित रूप से सऊदी अरब में उतरा, जहां अधिकारियों ने को-पायलट को हिरासत में ले लिया।

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मुश्किल हालात में बचाई यात्रियों की जान

हमले के बाद विमान में अफरा-तफरी की स्थिति पैदा हो गई थी। इसके बावजूद कैप्टन मच्छार ने कॉकपिट को सुरक्षित करने और विमान पर कंट्रोल बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में विमान की सऊदी अरब में इमरजेंसी लैंडिंग कराई गई। इस घटना के बाद UAE समेत कई देशों की एजेंसियां मामले की जांच कर रही हैं। UAE के अधिकारियों ने कैप्टन मच्छर के साहस और पेशेवर रवैये की सार्वजनिक रूप से सराहना की है।

मच्छार ने शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कहा कि उन्होंने ठान लिया था कि वह विमान में सवार लोगों की जान नहीं जाने देंगे। हवा में को-पायलट के हमले के बाद भी उनमें जितनी भी ताकत बची थी, उसी के सहारे उन्होंने विमान को सुरक्षित बचा लिया। पीएम मोदी ने यूएई के एक अस्पताल में भर्ती मच्छार से फोन पर बात की।

रानी दुर्गावती जयंती 2026: स्वाभिमान के लिए सीने में घोंप ली थी कटार, जानें गोंडवाना की महान महारानी के अमर बलिदान की कहानी

रानी दुर्गावती जयंती 2026: स्वाभिमान के लिए सीने में घोंप ली थी कटार, जानें गोंडवाना की महान महारानी के अमर बलिदान की कहानी

Learn story of immortal sacrifice of great Queen Durgavati of Gondwana

Birth Anniversary of Heroic Queen Durgavati 2026: स्वाभिमान, साहस और सुशासन का अमर प्रतीक भारत के इतिहास में कई वीरांगनाओं ने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर किए, किंतु गोंडवाना की महारानी दुर्गावती का व्यक्तित्व और कृतित्व अद्वितीय है। प्रति वर्ष 5 अक्टूबर को मनाई जाने वाली रानी दुर्गावती जयंती केवल एक ऐतिहासिक स्मरण उत्सव नहीं, बल्कि उस भारतीय नारी शक्ति का जयघोष है जिसने साम्राज्यवादी शक्तियों के सामने कभी भी अपना शीश नहीं झुकाया। आइए जानते हैं वीरांगना महारानी दुर्गावती के अदम्‍य साहस, बलिदान और सुशासन की अमर कहानी विस्‍तार से… 

 

चंदेल और गोंड राजवंशों की एकजुटता

महारानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर 1524 को महोबा के प्रख्यात चंदेल राजवंश में हुआ था। ये वही महान राजवंश है जिसने विश्वप्रसिद्ध खजुराहो के मंदिरों का निर्माण कराया। महारानी दुर्गावती के पिता राजा शालिवाहन थे। दुर्गावती का विवाह गोंडवाना (गढ़-मंडला) साम्राज्य के राजा संग्राम शाह के प्रतापी पुत्र दलपत शाह से हुआ। इस विवाह ने उत्तर भारत की 2 विशाल शक्तियों को एक सूत्र में बांध दिया।

 

जब महारानी दुर्गावती ने खुद संभाली गोंडवाना की बागडोर

विवाह के कुछ ही वर्षों पश्चात राजा दलपत शाह का असमय निधन हो गया। उस समय उनका पुत्र वीर नारायण मात्र पांच वर्ष का बालक था। साम्राज्य पर संकट के बादल मंडराते देख रानी ने हताश होने के बजाय गोंडवाना की बागडोर स्वयं अपने हाथों में ली और अपने पुत्र को सिंहासन पर बैठाकर उसकी संरक्षिका बनीं।

 

गोंडवाना का स्वर्णिम युग एवं जनहितकारी सुशासन

महारानी दुर्गावती केवल एक महान योद्धा ही नहीं, बल्कि एक अत्यंत दूरदर्शी और कुशल प्रशासिका भी थीं। उनके शासनकाल को गोंडवाना साम्राज्य का स्वर्णिम काल कहा जाता है। रानी के न्यायप्रिय और पारदर्शी शासन में गढ़-मंडला राज्य इतना समृद्ध हो गया था कि प्रजा अपना कर (टैक्स) स्वर्ण मुद्राओं में चुकाया करती थी।

 

जल प्रबंधन और वास्तुकला

महारानी दुर्गावती ने राज्य में कृषि और जल संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए अनेक विशाल तालाबों, बावडियों और मंदिरों का निर्माण कराया। जबलपुर का प्रसिद्ध ‘रनिताल’, ‘चेरीताल’ और अपनी दासी के नाम पर बनवाया गया ‘आधारताल’ आज भी उनकी दूरदर्शिता के जीवंत प्रमाण हैं।

 

महारानी दुर्गावती का सशक्त सैन्य बल

महारानी दुर्गावती ने एक विशाल और अनुशासित सेना का गठन किया, जिसमें पैदल सैनिकों, घुड़सवारों और प्रशिक्षित हाथियों का बड़ा बेड़ा शामिल था। महारानी दुर्गावती स्वयं अस्त्र-शस्त्र चलाने में निपुण थीं और अक्सर सफेद हाथी पर सवार होकर सैन्य टुकड़ियों का नेतृत्व करती थीं।

 

मुग़ल आक्रामकता के विरुद्ध अदम्य शौर्य

अकबर की साम्राज्यवादी नीति के तहत जब मुग़ल सेनापति आसफ़ ख़ां ने गोंडवाना की अपार धन-संपदा और समृद्धि को हड़पने के लिए आक्रमण किया, तो रानी ने अधीनता स्वीकार करने से स्पष्ट इनकार कर दिया। जबलपुर के समीप स्थित ‘नारई नाले’ के निकट मुग़ल सेना और गोंडवाना के सैनिकों के बीच भीषण युद्ध हुआ।

 

रानी दुर्गावती ने रणनीतिक कौशल का परिचय देते हुए मुग़ल सेना को कई बार पीछे हटने पर मजबूर कर दिया और पहले दिन की लड़ाई में मुग़लों के छक्के छुड़ा दिए। युद्ध भूमि में रानी के युवा पुत्र राजकुमार वीर नारायण ने भी अभूतपूर्व वीरता दिखाई।

 

मातृभूमि के लिए दिया सर्वोच्च बलिदान

युद्ध के अंतिम चरण में रानी दुर्गावती को 2 तीर लगे, एक गर्दन में और दूसरा आंख के पास। रानी समझ गईं कि अब मूर्छित होना या बंदी बनना तय है। मुग़लों के हाथों बंदी बनकर अपने स्वाभिमान से समझौता करने के बजाय, उन्होंने अपनी ही कटार निकालकर अपने वक्षस्थल में घोंप ली और मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति प्राप्त की।

 

महारानी दुर्गावती जयंती का सामाजिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व

महारानी दुर्गावती की जयंती आज की आधुनिक नारियों को यह संदेश देती है कि महिलाएं केवल परिवार की संरक्षक ही नहीं, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र की रक्षक और कुशल प्रशासिका बनने में पूर्णतः सक्षम हैं। जबलपुर के पास स्थित ‘बरेला’ गांव में जहां रानी ने अपने प्राण त्यागे थे, आज भी उनकी समाधि स्थित है। यह स्थान देशप्रेमी नागरिकों के लिए एक पवित्र तीर्थ स्थल के समान है।

6 दिन के मेगा हेल्थ कैंप से गाजीपुर पहुंचीं सुपर स्पेशलिटी सेवाएं, डॉक्टरों की 35000 मरीजों की जांच और 346 सर्जरियां की गईं

उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के ग्रामीणों को हाल ही में स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़ी सुपर स्पेशलिटी सेवाओं का अनुभव प्राप्त हुआ। इससे पहले इन्हें अव्वल दर्जे की स्पेशलिस्ट हेल्थकेयर सेवाएं पाने के लिए वाराणसी या लखनऊ जैसे शहरों का रुख करना पड़ता था। लेकिन छह दिनों तक ऐसी कई सेवाओं का लाभ उन्हें अपने ही जिले में पाने का मौका मिला। यह अवसर उन्हें जिले में सेवा संकल्प अभियान के तहत आयोजित एक मेगा हेल्थ कैंप के जरिए मिला।

यह 6 दिनों का था, जिसका उद्घाटन 26 सितंबर को राज्य के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने किया। इस कैंप में 35,200 मरीजों ने चेकअप कराया और 346 सर्जरी की गईं। इसमें ऐसे मुश्किल प्रोसीजर भी शामिल थे जिनके लिए आम तौर पर मरीजों को जिले से बाहर जाना पड़ता है। युवा बीजेपी नेता अभिनव सिन्हा के नेतृत्व में इस कैंप का आयोजन किया गया था। इसमें ओपीडी सेवा 28 सितंबर तक चलीं, जिसके बाद 28 सितंबर से 1 अक्टूबर तक सर्जरी हुईं।

इस पहल की खास बात यह थी कि एक ही जगह पर इतनी बड़ी मात्रा में स्पेशलिस्ट केयर उपलब्ध थी। इसमें 498 डॉक्टरों और हेल्थकेयर वर्कर्स की टीम ने हिस्सा लिया, जिसमें AIIMS दिल्ली, जसलोक हॉस्पिटल मुंबई, अपोलो हॉस्पिटल दिल्ली और हेरिटेज हॉस्पिटल वाराणसी से जुड़े स्पेशलिस्ट शामिल थे। मरीजों को कार्डियोलॉजी, न्यूरोलॉजी और गैस्ट्रोएंटरोलॉजी से लेकर ऑर्थोपेडिक्स, ऑप्थल्मोलॉजी, गायनेकोलॉजी, पीडियाट्रिक्स, डर्मेटोलॉजी, यूरोलॉजी और प्लास्टिक सर्जरी तक 15 विशेषज्ञ सेवाएं मिलीं। तीन दिन के ओपीडी फेज के दौरान, 35,828 लैब टेस्ट भी किए गए। कैंप में 346 सर्जरी हुईं, जिसमें 140 आंखों की सर्जरी और 206 दूसरे प्रोसीजर शामिल थे। इनमें ऑर्थोपेडिक्स, जनरल सर्जरी और प्लास्टिक सर्जरी से जुड़े 22 बड़े मुश्किल केस थे।

जनरल मेडिसिन, ऑर्थोपेडिक्स, ऑप्थल्मोलॉजी और न्यूरोलॉजी में कुल मिलाकर 21,120 मरीज आए – जो OPD में आने वालों का 60% है। बाकी 11 स्पेशलिटी OPD में और 14,080 मरीजों का इलाज किया गया। इस बड़े मेडिकल ऑपरेशन में 350 से ज्यादा वॉलंटियर्स ने मदद की, जिन्हें “गाजीपुर के स्वस्थ योद्धा” कहा गया, जिन्होंने मरीजों को रजिस्ट्रेशन, नेविगेशन और जगह पर देखभाल में मदद की। मेडिकल टीम में फैकल्टी और कंसल्टेंट, रेजिडेंट, इंटर्न, नर्स, पैरामेडिक्स और फार्मासिस्ट शामिल थे।

आयोजनकर्ता अभिनव सिन्हा ने कहा कि इस कैंप का मकसद अच्छी हेल्थकेयर ग्रामीण और दूर-दराज के इलाकों में लोगों तक, बिना उन्हें लंबी दूरी तय किए पहुंचाना था। इस पहल को 2026 में उत्तर प्रदेश में आयोजित सबसे बड़ा हेल्थ कैंप बताया, और कहा कि इस मॉडल को राज्य में कहीं और भी दोहराया जा सकता है। गाजीपुर से बड़ी बात यह है कि सिर्फ छह दिनों में, एक अस्थायी हेल्थकेयर इकोसिस्टम ने कंसल्टेशन, डायग्नोस्टिक्स, स्पेशलिस्ट ट्रीटमेंट और सर्जरी को एक ही जगह पर ला दिया — जिससे हेल्थकेयर को मरीजों तक पहुंचाने पर ध्यान दिया गया, न कि मरीज़ों को हेल्थकेयर सेंटर जाने पर।

Business Idea: बिना दुकान खोले घर से शुरू करें कैटरिंग का बिजनेस! एक्सपर्ट से समझिए सिर्फ 50000 के बजट से कैसे होगी कमाई

3 बार रहे विधायक, मिला पद्म श्री और ओलंपिक में की भारत की कप्तानी, जानिए पंजाब कांग्रेस के नए बॉस परगट सिंह की पूरी कहानी

पंजाब में कांग्रेस की कमान अब परगट सिंह के हाथ में होगी। ये वही परगट सिंह हैं जिन्होंने हॉकी के मैदान में कई बार भारत का प्रतिनिधित्व किया है। अपनी हॉकी से विरोधी टीम को धूल चटाने वाले परगट सिंह तीन बार विधायक रह चुके हैं। पूर्व ओलंपियन और भारतीय हॉकी कप्तान अब राज्य की राजनीति में सबसे आगे हैं।

पद्मश्री से सम्मानित परगट सिंह जालंधर कैंटोनमेंट सीट से तीन बार विधायक रह चुके हैं। 61 साल के परगट सिंह को शुक्रवार को पंजाब कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। उन्होंने अगले साल की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले लुधियाना के सांसद अमरिंदर सिंह राजा वारिंग की जगह ली है। पंजाब के दोआबा इलाके के जाट सिख नेता सिंह की यह पदोन्नति राज्य इकाई के नेतृत्व को लेकर कई हफ्तों की अंदरूनी खींचतान के बाद हुई है, जिससे विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी के कैंपेन को नुकसान पहुंचने का खतरा था।

विजय इंदर सिंगला थे दौड़ में सबसे आगे

पंजाब के पूर्व मंत्री और हिंदू चेहरा विजय इंदर सिंगला को पंजाब कांग्रेस प्रमुख के पद की दौड़ में सबसे आगे माना जा रहा था। लेकिन पार्टी हाईकमान ने आखिरकार खिलाड़ी से नेता बने परगट सिंह को चुना क्योंकि वह 2027 के चुनावों से पहले राज्य इकाई के झगड़ते गुटों को साथ लेना चाहता है। लेकिन, सिंह का राजनीतिक करियर हॉकी के मैदान से शुरू हुए सफर का सिर्फ एक हिस्सा है।

खेल से राजनीति का सफर

मार्च 1965 में जालंधर के मीठापुर में जन्मे सिंह ने बतौर हॉकी खिलाड़ी 1992 बार्सिलोना और 1996 अटलांटा ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने नेशनल हॉकी टीम की कप्तानी की। देश बेहतरीन हॉकी डिफेंडर रहे सिंह के योगदान के लिए उन्हें 1989 में अर्जुन अवॉर्ड और 1998 में पद्म श्री मिला। अंतरराष्ट्रीय हॉकी से रिटायर होने के बाद, सिंह स्पोर्ट्स एडमिनिस्ट्रेशन से जुड़े, और चुनावी पॉलिटिक्स में आने से पहले उन्होंने पंजाब में डायरेक्टर ऑफ स्पोर्ट और सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस के तौर पर काम किया।

शिरोमणि अकाली दल के साथ शुरू हुआ राजनीतिक सफर

परगट सिंह का राजनीतिक सफर शिरोमणि अकाली दल (SAD) के साथ शुरू हुआ जब उन्होंने 2012 के पंजाब विधान सभा चुनाव में जालंधर कैंटोनमेंट सीट से चुनाव लड़ा। उन्होंने कांग्रेस कैंडिडेट को 6,000 से ज्यादा वोटों के मार्जिन से हराया। 2016 में, उन्हें एसएडी से सस्पेंड कर दिया गया था। 2017 के विधान सभा चुनाव में वह नवजोत सिंह सिद्धू के फ्रंट ‘आवाज-ए-पंजाब’ का हिस्सा बने। वर्तमान में कांग्रेस से जुड़े सिद्धू को जब पंजाब कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया, तो सिंह को पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी का जनरल सेक्रेटरी बनाया गया। उनकी चुनावी सफलता 2017 के विधानसभा चुनावों में भी जारी रही। उन्होंने अकाली दल के सरबजीत सिंह मक्कड़ को 29,000 से ज्यादा वोटों से हराया। 2022 के चुनावों में भी उन्होंने अपनी विधायकी बरकरार रखी। इस चुनाव में कांग्रेस 117 सदस्यों वाली विधानसभा में 18 सीटों पर सिमट गई थी।

राजनीति में भी कायम है मैदान की आक्रामकता

चरणजीत सिंह चन्नी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार में, सिंह के पास शिक्षा और खेल जैसे अहम मंत्रालय थे। पंजाब से जुड़े मामलों पर अपने विचार साझा करने के लिए जाने जाने वाले सिंह, लॉ एंड ऑर्डर, स्पोर्ट्स, एजुकेशन और अपने चुनाव क्षेत्र से जुड़े मामलों सहित कई मुद्दों पर वर्तमान सरकार पर आक्रामक रहे हैं। 1 जुलाई को, सिंह को 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस की मैनिफेस्टो कमेटी का सह अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। अभी, वह जम्मू और कश्मीर के इंचार्ज AICC सेक्रेटरी भी हैं।

क्षेत्रीय समीकरणों पर आधारित है पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष का पद

पंजाब में कांग्रेस अध्यक्ष पद पर उनकी तरक्की पार्टी के क्षेत्रीय समीकरण में भी फिट बैठती है। जाट सिख प्रताप सिंह बाजवा पंजाब विधानसभा में विपक्ष के नेता हैं। वहीं, जालंधर के सांसद चरणजीत सिंह चन्नी, जो दलित चेहरा हैं, पार्टी की कैंपेन कमेटी के प्रमुख हैं। गुरदासपुर के एमपी सुखजिंदर सिंह रंधावा भी जाट सिख हैं। पार्टी सूत्रों ने बताया कि कांग्रेस की पंजाब यूनिट के प्रेसिडेंट के तौर पर वारिंग की जगह लेने का फैसला पार्टी के पंजाब के इंचार्ज जनरल सेक्रेटरी सचिन पायलट से मिले ऑर्गेनाइज़ेशनल फीडबैक के बाद लिया गया।

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