यमन के हूती विद्रोही चीन से मंगाए गए पुर्जों की मदद से नई बैलिस्टिक मिसाइल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ब्रिटेन की संस्था कॉन्फ्लिक्ट आर्मामेंट रिसर्च (CAR) की बुधवार को जारी रिपोर्ट में यह बात कही गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, विद्रोही ईरान में डिजाइन हुई खैबर शिकन मिसाइल जैसी मिसाइल तैयार करना चाहते हैं, जिसकी मारक क्षमता करीब 1500 किलोमीटर है। अगर हूती ऐसा हथियार बनाने में सफल होते हैं, तो वे सऊदी अरब के अलावा इजराइल को भी ज्यादा सटीक तरीके से निशाना बना सकते हैं। हथियार बनाने के लिए जरूरी सामान जुटा रहे हूती रिपोर्ट के मुताबिक, यमन के अधिकारियों ने जुलाई में चीन से भेजे गए दो संदिग्ध सामानों की खेप पकड़ी थी। इनमें मिसाइल बनाने में इस्तेमाल होने वाले कई अहम पुर्जे मिले। पकड़ी गई खेप चीन से भेजी गई थी। इसे यमन के होदेइदा बंदरगाह पहुंचाया जाना था। इजराइली अधिकारियों का कहना है कि इस बंदरगाह का इस्तेमाल ईरान हथियारों की सप्लाई के लिए करता रहा है। पकड़ी गई खेप में क्या-क्या मिला? रिपोर्ट तैयार करने वाली संस्था के वरिष्ठ विश्लेषक फैबियन हिंज के मुताबिक, हूती ईरान में डिजाइन की गई खास तरह की मिसाइल बनाने की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने कहा कि इन पुर्जों का इस्तेमाल आम नागरिक कामों में करना मुश्किल है। हूतियों की हथियार बनाने की क्षमता पहले से ज्यादा हूती करीब दो दशक पहले यमन में एक विद्रोही संगठन के तौर पर उभरे थे। शुरुआत में उनके पास यमन की सेना से हासिल सोवियत दौर के और उत्तर कोरिया में बने हथियार थे। समय के साथ उन्हें ज्यादा आधुनिक हथियार और तकनीक मिलने लगी। ईरान पर निर्भरता घटाने की कोशिश क्यों? ईरान लंबे समय से हूतियों को हथियार बनाने की तकनीक, डिजाइन और जरूरी पुर्जे देता रहा है। लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक, अब हूती चीन समेत दूसरे देशों से भी हथियार बनाने का सामान जुटाने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिकी थिंक टैंक फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसीज के ईरान कार्यक्रम के वरिष्ठ निदेशक बेहनाम बेन तालेब्लू ने कहा कि हथियार बनाने के लिए कई जगहों से सामान मिलना किसी संगठन के लिए फायदेमंद होता है। उनके मुताबिक, ईरान पर रोक के बीच हूती सामान जुटाने के दूसरे रास्ते तलाश रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि हूती अभी मिसाइल के लिए जरूरी जटिल सिस्टम के लिए ईरान पर निर्भर हैं। वे दूसरे देशों से मिले पुर्जों को जोड़कर कुछ हथियार बना सकते हैं, लेकिन आधुनिक हथियारों की पूरी तकनीक खुद विकसित नहीं कर सकते। चीन के लिए कूटनीतिक चुनौती बढ़ सकती है चीन ईरान और सऊदी अरब, दोनों से बड़ी मात्रा में तेल खरीदता है। 2023 में चीन ने दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने में भी भूमिका निभाई थी। चीन ने सऊदी अरब के एयरपोर्ट पर हूतियों के हमलों की निंदा की है और संघर्ष कम करने की अपील की है। अब अगर चीन से आए पुर्जों का इस्तेमाल हूती मिसाइल बनाने में होने के दावे की पुष्टि होती है, तो सऊदी अरब और चीन के रिश्तों पर दबाव बढ़ सकता है। चीन सऊदी अरब का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार भी है। मध्य पूर्व के विशेषज्ञ क्रिस्टियन उलरिचसन के मुताबिक, सऊदी अरब के बुनियादी ढांचे और एयरपोर्ट पर हमलों के बाद चीन पर इस मुद्दे को लेकर ज्यादा दबाव पड़ सकता है। फिलहाल यह साफ नहीं होता कि चीन की सरकार ने जानबूझकर हूतियों को मिसाइल बनाने के लिए सामान भेजा था। ————————- यह खबर भी पढ़ें… होर्मुज में बारूदी सुरंग से टकराकर जहाज डूबा: जंग शुरू होने के बाद पहली बार ऐसा हुआ होर्मुज स्ट्रेट में समुद्री बारूदी सुरंग से टकराकर बुधवार सुबह एक मालवाहक जहाज डूब गया। जहाज में 2500 कंटेनर थे। ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने यह जानकारी दी। पूरी खबर यहां पढ़ें…
इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि वह 27 अक्टूबर को होने वाले चुनाव से पहले ईरान पर हमला नहीं करना चाहते। बुधवार को इजराइली आर्मी रेडियो से बातचीत में उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले ईरान पर हमला करना ठीक नहीं होगा। हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ईरान ने इजराइल पर हमला किया, तो उसे कड़ा जवाब दिया जाएगा। नेतन्याहू ने कहा कि अगर ईरान इजराइल पर मिसाइलें दागता है, तो उनके विरोधी इसके लिए भी उन्हें ही जिम्मेदार ठहराएंगे। विपक्ष का आरोप है कि नेतन्याहू चुनाव से पहले ईरान के साथ लड़ाई शुरू कर सकते हैं। जून के बाद से ईरान और इजराइल के बीच सीधा हमला नहीं अमेरिका और इजराइल ने 28 फरवरी को ईरान पर हमले किए थे। इसके जवाब में ईरान ने इजराइल और खाड़ी देशों पर हमले किए। जून के बाद से दोनों देशों के बीच सीधे हमले नहीं हुए हैं। नेतन्याहू ने कहा कि मिडिल-ईस्ट के कई देश इजराइल की सैन्य कामयाबी के बाद उससे संपर्क कर रहे हैं। हालांकि, उन्होंने यह साफ नहीं किया कि क्या इजराइल सऊदी अरब को हूती विद्रोहियों के हमलों से बचाने में मदद कर रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले एक हफ्ते में सऊदी अरब पर हूतियों के हमले बढ़े हैं। शनिवार, 10 अक्टूबर को रियाद एयरपोर्ट पर हुए हमले में 13 लोगों की मौत हुई थी। 7 अक्टूबर के हमले के बाद भी सत्ता में लौट सकते हैं नेतन्याहू टाइम्स ऑफ इजराइल के मुताबिक चुनाव से पहले प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता में वापसी की संभावना बनी हुई है। 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले में बड़ी संख्या में लोग मारे गए थे। इसे इजराइल की सुरक्षा व्यवस्था की बड़ी नाकामी माना गया था। विपक्ष का आरोप है कि नेतन्याहू ने हमले की जिम्मेदारी नहीं ली और सुरक्षा में चूक के लिए सेना व अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया। हमले की जांच के लिए स्वतंत्र आयोग बनाने की मांग भी उठी, लेकिन इस पर विवाद बना रहा। इसके बावजूद विपक्ष नेतन्याहू को कड़ी चुनौती नहीं दे पा रहा है। कुछ सर्वे में विपक्ष आगे है, तो कुछ में नेतन्याहू का गठबंधन बढ़त बनाए हुए है। विपक्ष में एकजुटता की कमी का फायदा मिल सकता है टाइम्स ऑफ इजराइल के मुताबिक, विपक्षी नेताओं के बीच मतभेद नेतन्याहू के लिए फायदेमंद हो सकते हैं। गादी आइजेनकोट, नफ्ताली बेनेट और एविगडोर लिबरमैन जैसे नेता उन्हें चुनौती दे रहे हैं, लेकिन विपक्ष अब तक एकजुट होकर चुनाव प्रचार नहीं कर पाया है। दूसरी ओर, नेतन्याहू टीवी कार्यक्रमों, सोशल मीडिया और जनसभाओं के जरिए अपने समर्थकों को जोड़ने में जुटे हैं। वह यह भी कोशिश कर रहे हैं कि दक्षिणपंथी पार्टियों के वोट आपस में न बंटें। छोटी पार्टियों के वोट तय करेंगे चुनाव का नतीजा इजराइल की संसद में 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए किसी गठबंधन को कम से कम 61 सांसदों का समर्थन चाहिए। किसी पार्टी को संसद में सीटें पाने के लिए कम से कम 3.25% वोट हासिल करना जरूरी है। ऐसे में छोटी पार्टियों का प्रदर्शन भी अहम होगा। अगर कोई पार्टी जरूरी वोट नहीं जुटा पाती, तो उसे संसद में एक भी सीट नहीं मिलेगी। इससे दूसरी पार्टियों के लिए सरकार बनाने का रास्ता आसान हो सकता है। ———————- ये खबर भी पढ़ें…. इजराइल हूती विद्रोहियों के खिलाफ क्यों लड़ना चाहता है:अमेरिका के जरिए नेतन्याहू ने मदद का मैसेज भेजा, सऊदी ने इनकार किया इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सऊदी अरब से हूतियों के खिलाफ लड़ाई में इजराइल को शामिल करने की इजाजत मांगी है। इजराइली अखबार हारेत्ज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू ने यह प्रस्ताव अमेरिका के जरिए सऊदी अरब को भेजा है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

Samajwadi Party Rebel MLAs: उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव 2027 से ठीक पहले अमेठी में सियासी सरगर्मी अपने चरम पर पहुंच गई है। अमेठी जनपद के गौरीगंज स्थित मंगलम भवन के सामने मैदान में आयोजित एक विशाल राजनीतिक कार्यक्रम में समाजवादी पार्टी (सपा) के तीन बागी विधायकों ने अपने सैकड़ों समर्थकों के साथ भाजपा की विधिवत सदस्यता ग्रहण कर ली है। अमेठी के राजनीतिक इतिहास में यह पहला मौका है जब एक साथ इतनी भारी संख्या में दिग्गज नेताओं ने दल-बदल किया है।
समारोह में दिग्गजों की रही मौजूदगी
भाजपा की राष्ट्रीय महामंत्री बनने के बाद पूर्व केंद्रीय मंत्री और अमेठी की पूर्व सांसद स्मृति ईरानी मंगलवार को पहली बार अमेठी पहुंचीं। उनकी अगुवाई और मौजूदगी में यह बड़ा राजनीतिक फेरबदल हुआ। इस दौरान मुख्य रूप से पंकज चौधरी (भाजपा प्रदेश अध्यक्ष), अमरपाल मौर्य (पिछड़ा वर्ग मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष), दारा सिंह चौहान (यूपी सरकार के मंत्री) तथा कई अन्य सांसद, विधायक और स्थानीय वरिष्ठ नेता भी शामिल थे।
राष्ट्रीय महामंत्री श्रीमती @smritiirani एवं प्रदेश अध्यक्ष श्री @mppchaudhary ने विधायक गौरीगंज श्री राकेश प्रताप सिंह, विधायक गोसाईगंज श्री अभय सिंह और विधायक कालपी श्री विनोद चतुर्वेदी को भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण कराई। https://t.co/v4g8EkcQZu
— BJP Uttar Pradesh (@BJP4UP) October 14, 2026
कौन हैं भाजपा में शामिल होने वाले सपा विधायक?
- राकेश प्रताप सिंह : गौरीगंज विधानसभा क्षेत्र से तीन बार के सपा विधायक। पार्टी विरोधी गतिविधियों और रामचरितमानस विवाद के बाद सपा ने इन्हें निष्कासित कर दिया था। 2024 के लोकसभा चुनाव में इन्होंने खुलकर भाजपा प्रत्याशी स्मृति ईरानी का समर्थन किया था और गौरीगंज से अयोध्या तक राम मंदिर पदयात्रा भी निकाली थी।
- अभय सिंह (अभय प्रताप सिंह) : गोसाईगंज (अयोध्या) से विधायक हैं। उन्होंने अपनी पत्नी, पूर्व जिला पंचायत सदस्य सरिता सिंह और पिता भगवान बख्श सिंह समेत भारी संख्या में समर्थकों के साथ भाजपा की सदस्यता ली।
- विनोद चतुर्वेदी : जालौन के कालपी विधानसभा क्षेत्र से सपा विधायक, जो अपने कई समर्थकों के साथ भाजपा में शामिल हुए।
क्या कहा राकेश प्रताप सिंह ने?
सपा से निष्कासित और गौरीगंज विधायक राकेश प्रताप सिंह ने भाजपा में शामिल होने पर स्पष्ट कहा कि वे ‘राष्ट्र और राम’ के लिए भाजपा का साथ देने जा रहे हैं। गौरतलब है कि इन तीनों ही विधायकों ने पहले राज्यसभा चुनाव के दौरान भी पार्टी लाइन से हटकर क्रॉस वोटिंग करते हुए भाजपा उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान किया था।
राजनीतिक समीकरण और आगे की राह
यह पूरा घटनाक्रम अवध और बुंदेलखंड क्षेत्र के राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा के टिकट पर जीतकर सदन पहुंचे इन तीनों कद्दावर विधायकों का पार्टी छोड़कर भाजपा में जाना, समाजवादी पार्टी के लिए एक तगड़ा झटका है। वहीं, आगामी 2027 के चुनावों से पहले इस बड़े फेरबदल से भाजपा की ज़मीनी पकड़ कितनी मजबूत होती है, यह तो आने वाला वक्त ही तय करेगा, लेकिन फिलहाल अमेठी का यह सियासी घटनाक्रम राज्य की राजनीति में चर्चा का केंद्र बना हुआ है।
केंद्र सरकार को वित्त वर्ष 2026-27 में विनिवेश और एसेट मॉनेटाइजेशन से 88,000 करोड़ रुपये मिलेंगे। इससे FY19 के बाद पहली बार यह पैसा बजट में तय लक्ष्य से ज्यादा होगा। आधिकारिक सूत्रों ने यह जानकारी दी। इसमें आईडीबीआई के निजीकरण को बड़ा हाथ होगा।
बजट में 80000 करोड़ जुटाने का टारगेट
सरकार ने बजट में FY27 में विनिवेश और एसेट मॉनेटाइजेशन से 80,000 करोड़ रुपये जुटाने का टारगेट तय किया है। आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि आईडीबीआई बैंक की स्ट्रेटेजिक स्ट्रक्चरिंग से केंद्र सरकार को करीब 26,000 करोड़ रुपये मिलेंगे। यूनियन कैबिनेट ने बुधवार को आईडीबीआई बैंक की स्ट्रेटेजिक रीस्ट्रक्चरिंग को मंजूरी दे दी।
सरकार आईडीबीआई बैंक में बेच रही हिस्सेदारी
सरकार और एलआईसी दोनों आईडीबीआई बैंक में कंबाइंड 60.72 फीसदी हिस्सेदारी बेचने जा रहे हैं। फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स की सब्सिडियरी कनाडा इंक यह हिस्सेदारी खरीदेगी। इस डील और शेयर पर्चेज एग्रीमेंट के इस साल दिसंबर तक पूरा हो जाने की उम्मीद है। डिपार्टमेंट ऑफ इनवेस्टमेंट एंड पब्लिक एसेट मैनेजमेंट (DIPAM) के मुताबिक, सरकार आईडीबीआई बैंक में अपनी 30.48 फीसदी हिस्सेदारी बेचेगी, जबकि LIC अपनी 30.24 हिस्सेदारी बेचेगी।
सरकार पहले ही जुटा चुकी है 62,124 करोड़ रुपये
इस डील के बाद भी IDBI Bank में सरकार और LIC की कंबाइंड 34 फीसदी हिस्सेदारी बनी रहेगी। इस साल 10 सितंबर तक सरकार ने विनिवेश और एसेट मॉनेटाइजेशन से 62,124 करोड़ रुपये जुटा लिए थे। यह इस वित्त वर्ष के लिए तय बजट टारगेट से सिर्फ 17,876 करोड़ रुपये कम था। आईडीबीआई बैंक में हिस्सेदारी की बिक्री से यह टारगेट पूरा हो जाएगा।
FY19 के बाद पहली बार टारगेट से ज्यादा पैसे आएंगे
सरकार वित्त वर्ष 2018-19 के बाद पहली बार विनिवेश और एसेट मॉनेटाइजेशन से बजट में तय लक्ष्य से ज्यादा पैसे जुटाएगी। पिछले वित्त वर्ष में सरकार ने विनिवेश और एसेट मॉनेटाइजेशन से 45,306 करोड़ रुपये जुटाए थे, जो 47,000 करोड़ रुपये के तय लक्ष्य का करीब 96 फीसदी था। इसमें से 16,886 करोड़ रुपये विनिवेश से आए थे, जबकि 28,420 करोड़ रुपये एसेट मॉनेटाइजेशन से आए थे।
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जियोपॉलिटिकल टेंशन की वजह से बढ़ा विनिवेश पर फोकस
जियोपॉलिटिकल टेंशन बढ़ने की वजह से विनिवेश और एसेट मॉनेटाइजेशन पर सरकार का फोकस बढ़ा है। इसकी वजह यह है कि अमेरिका और ईरान की लड़ाई के बाद की स्थितियों ने सरकार पर वित्तीय दबाव बढ़ाया है। क्रूड की कीमतें इस लड़ाई की वजह से काफी बढ़ी हैं। पिछले कुछ हफ्तों से तो ब्रेंट क्रूड लगातार 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना हुआ है। इससे सरकार का इंपोर्ट बिल लगातार बढ़ रहा है।
होर्मुज स्ट्रेट में समुद्री बारूदी सुरंग से टकराकर बुधवार सुबह एक मालवाहक जहाज डूब गया। जहाज में 2500 कंटेनर थे। ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने यह जानकारी दी। AP की रिपोर्ट के मुताबिक, टक्कर के बाद जहाज में आग लग गई थी। जंग शुरू होने के बाद यह पहली बार है, जब बारूदी सुरंग से टकराकर कोई जहाज डूबा है। फिलहाल जहाज पर कितने लोग सवार थे और इस घटना में किसी की मौत हुई या नहीं, इसकी जानकारी नहीं मिली है। IRGC बोली- जहाज खतरनाक रास्ते से जा रहा था IRGC ने बुधवार को बताया कि जहाज होर्मुज के पास एक ऐसे रास्ते से गुजर रहा था, जिसे इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं थी और रास्ता खतरनाक था। ईरान पहले भी कई बार चेतावनी दे चुका है कि अगर कोई जहाज उसकी ओर से तय किए गए रास्ते से हटकर चलेगा, तो उसके परिणाम की जिम्मेदारी उसी की होगी। IRGC ने कहा- कंटेनरों से दूर रहें घटना के बाद IRGC ने स्थानीय जहाजों और मछुआरों को सावधान रहने को कहा है। उसने समुद्र में तैर रहे कंटेनरों से दूर रहने की अपील की है। ये कंटेनर दूसरे जहाजों के लिए खतरा बन सकते हैं और समुद्री रास्ते पर आवाजाही में रुकावट डाल सकते हैं। होर्मुज स्ट्रेट फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है। यह दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक है। यहां से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और दूसरे सामान ले जाने वाले जहाज गुजरते हैं। इस इलाके में जहाजों की सुरक्षा को लेकर पहले से चिंता बनी हुई है। होर्मुज में 2 जहाजों पर मंगलवार को हमला हुआ था ब्रिटेन की समुद्री सुरक्षा निगरानी एजेंसी UKMTO के मुताबिक, मंगलवार को होर्मुज जलडमरूमध्य में दो व्यापारिक जहाजों पर अज्ञात चीजों से हमला हुआ। दोनों जहाजों को मामूली नुकसान पहुंचा, लेकिन किसी के घायल होने की खबर नहीं है। दोनों जहाज हमले के बाद भी अपना सफर जारी रखने में कामयाब रहे। एजेंसी ने यह नहीं बताया कि हमलों में किस चीज का इस्तेमाल किया गया था। समुद्री बारूदी सुरंग क्या होती है? समुद्री बारूदी सुरंग पानी में छिपाकर रखा गया एक तरह का बम होता है। कुछ सुरंगें जहाज के टकराने पर फटती हैं, जबकि कुछ जहाज के पास आने पर ही विस्फोट कर सकती हैं। टॉरपीडो या मिसाइलों के मुकाबले इन्हें बनाना और समुद्र में बिछाना बहुत आसान और सस्ता होता है। लेकिन एक बार बिछा दिए जाने के बाद इन्हें खोजना, पहचानना और समुद्र से बाहर निकालना (डिफ्यूज करना) बेहद मुश्किल, खर्चीला और जोखिम भरा काम होता है। इन्हें ढूंढने के लिए नौसेना सोनार, पानी के अंदर चलने वाले ड्रोन और रोबोट का इस्तेमाल करती है। जापान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी को आशंका थी कि होर्मुज में 80 से 150 तक सुरंगें बिछाई गई हो सकती हैं। हालांकि, अमेरिकी सेना का कहना था कि अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए तय रास्तों से ईरानी सुरंगें हटा दी गई थी। जंग के बाद होर्मुज से जहाजों की आवाजाही घटी अमेरिका और इजराइल के 28 फरवरी 2026 को ईरान पर हमले शुरू करने के बाद से होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। ईरान ने इस समुद्री रास्ते से गुजरने वाले जहाजों पर पाबंदियां लगाईं हैं और कई जहाजों पर हमले भी हुए। इसके चलते कई शिपिंग कंपनियां इस रास्ते से जहाज भेजने से बच रही हैं। रॉयटर्स के मुताबिक, 7 अक्टूबर को होर्मुज से सिर्फ 7 मालवाहक जहाज गुजरे थे। हालांकि, इस रास्ते से जहाजों की आवाजाही पूरी तरह बंद नहीं हुई है। कुछ जहाज अब भी गुजर रहे हैं, लेकिन युद्ध से पहले के मुकाबले इनकी संख्या काफी कम है। ————————- यह खबर भी पढ़ें… होर्मुज के पास जहाज पर ड्रोन हमला, 2 भारतीय लापता: भारत ने हमले रोकने को कहा होर्मुज स्ट्रेट के पास भारतीय क्रू वाले जहाज एमटी पेट्रो डॉल्फिन पर रविवार को ड्रोन से हमला हुआ। जहाज पर सवार 11 भारतीय नाविकों में से 9 को बचा लिया गया, जबकि 2 अब भी लापता हैं। हमले के पीछे कौन है, इसकी जानकारी सामने नहीं आई है। पूरी खबर यहां पढ़ें…
इजराइल जाने वाली उड़ानों में अब पाकिस्तान समेत 31 देशों के पायलटों और केबिन क्रू की तैनाती पर रोक लगाई जा रही है। ये नियम उन देशों के पायलटों और क्रू पर लागू होते हैं, जिनके देश के इजराइल के साथ राजनयिक संबंध नहीं हैं। इनमें पाकिस्तान के अलावा ईरान, ओमान, सऊदी अरब और बांग्लादेश जैसे देश शामिल हैं। 30 सितंबर 2026 को दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की फ्लाइट में ओमान के को-पायलट हमाम अल-हमामी ने भारतीय कैप्टन स्मित मच्छर पर हमला किया था। इसके बाद से इजराइल ने विदेशी एयरलाइंस के पायलटों और क्रू की जांच सख्त कर दी। नियम पहले से थे लेकिन पालन नहीं हो रहा था रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये नियम पहले से मौजूद थे, लेकिन इनका सख्ती से पालन नहीं हो रहा था। लागू नियमों के तहत राजनयिक संबंध न रखने वाले देशों के पायलट और केबिन क्रू इजराइल जाने वाली उड़ानों में ड्यूटी नहीं कर सकेंगे। कुछ मामलों में दूसरी नागरिकता रखने वाले कर्मचारियों पर भी रोक लग सकती है। इंडोनेशियाई पायलट के कारण फ्लाइट लौटानी पड़ी थी इजराइल के नियमों का असर मंगलवार को इथियोपियन एयरलाइंस की एक फ्लाइट पर भी पड़ा। द जेरूसलम पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, विमान इथियोपिया के हवाई क्षेत्र में था, तभी इजराइली अधिकारियों ने उसे वापस लौटने को कहा। अधिकारियों को पता चला था कि विमान में इंडोनेशियाई पायलट मौजूद है। इंडोनेशिया के इजराइल के साथ राजनयिक संबंध नहीं हैं। इसके बाद विमान इथियोपिया की राजधानी अदीस अबाबा लौट गया। वहां पायलट को बदला गया और फिर विमान ने दोबारा उड़ान भरी। इसके बाद वह तेल अवीव पहुंचा। इथियोपियन एयरलाइंस ने इसे गलती बताया। कंपनी का कहना था कि उसे जानकारी नहीं थी कि संबंधित पायलट इजराइल जाने वाली फ्लाइट नहीं उड़ा सकता। एयर फ्रांस ने कर्मचारियों से दूसरी नागरिकता की जानकारी मांगी फ्रांस की राष्ट्रीय एयरलाइन एयर फ्रांस का कहना है कि उसने अपने कर्मचारियों को नियमों की जानकारी दे दी है। फ्रांस की वेबसाइट मेडियापार्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, एयर फ्रांस ने कर्मचारियों से यह भी पूछा है कि क्या उनके पास किसी दूसरे देश की नागरिकता है। रिपोर्ट में दावा किया गया कि जानकारी छिपाने पर कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी दी गई। इजराइल ने विदेशी एयरलाइंस को नियमों की जानकारी भेजी इजराइल के चैनल N12 की रिपोर्ट के मुताबिक, वहां के परिवहन मंत्रालय ने 1 अक्टूबर को विदेशी एयरलाइंस को इन नियमों की जानकारी दी थी। नियमों का पालन कराने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से एयरलाइंस पर है। इजराइली अधिकारी हर उड़ान के क्रू की नागरिकता की नियमित जांच नहीं करते थे। इसी वजह से पाकिस्तान, ओमान, ईरान, इराक और लेबनान जैसे देशों के पायलट पहले भी तेल अवीव जाने वाली उड़ानें संचालित करते रहे। अब इजराइल इन नियमों का सख्ती से पालन करा रहा है। फिलहाल एयर फ्रांस, यूनाइटेड एयरलाइंस और स्मार्टविंग्स ने नियमों का पालन करने की बात कही है। ऐसे में इन एयरलाइंस को इजराइल जाने वाली उड़ानों के लिए पायलटों और केबिन क्रू की ड्यूटी में बदलाव करना पड़ सकता है। अभी यह साफ नहीं है कि कितनी और एयरलाइंस इन नियमों को लागू करेंगी। इसका असर उन कर्मचारियों पर भी पड़ सकता है जिनके पास किसी प्रतिबंधित देश के साथ-साथ दूसरे देश की नागरिकता भी है। ओमानी को-पायलट विमान को एयरपोर्ट से टकराना चाहता था 30 सितंबर 2026 को दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की फ्लाइट में ओमान के को-पायलट ने भारतीय कैप्टन स्मित मच्छर पर हमला कर दिया था। UAE के मुताबिक को-पायलट विमान को हाइजैक करके उसे इजराइल के बेन गुरियन एयरपोर्ट के टर्मिनल से टकराना चाहता था। हमले के दौरान विमान करीब 1 मिनट में 16 हजार फीट नीचे आ गया था। घायल कैप्टन ने कॉकपिट का दरवाजा खोल पाए इसके बाद यात्रियों और क्रू ने को-पायलट को काबू कर लिया। विमान में 174 यात्री और 8 क्रू मेंबर सवार थे। इसके बाद विमान को सऊदी अरब के तबुक शहर में इमरजेंसी लैंडिंग करानी पड़ी थी। ————————- ये खबर भी पढ़ें… अमेरिकी संसद में कैप्टन स्मित के सम्मान में प्रस्ताव पारित: आतंकी हमले को नाकाम करने की तारीफ की अमेरिकी संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा ने भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छर के सम्मान में प्रस्ताव पास किया है। इसे दोनों पार्टियों ने समर्थन दिया है। इसमें 30 सितंबर को फ्लाईदुबई की फ्लाइट में हुए हमले के दौरान कैप्टन मच्छर की बहादुरी की तारीफ की गई है। पूरी खबर यहां पढ़ें…
इजराइल जाने वाली उड़ानों में अब पाकिस्तान समेत 31 देशों के पायलटों और केबिन क्रू की तैनाती पर रोक लगाई जा रही है। ये नियम उन देशों के पायलटों और क्रू पर लागू होते हैं, जिनके देश के इजराइल के साथ राजनयिक संबंध नहीं हैं। इनमें पाकिस्तान के अलावा ईरान, ओमान, सऊदी अरब और बांग्लादेश जैसे देश शामिल हैं। 30 सितंबर 2026 को दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की फ्लाइट में ओमान के को-पायलट हमाम अल-हमामी ने भारतीय कैप्टन स्मित मच्छर पर हमला किया था। इसके बाद से इजराइल ने विदेशी एयरलाइंस के पायलटों और क्रू की जांच सख्त कर दी। इंडोनेशियाई पायलट के कारण फ्लाइट लौटानी पड़ी थी इजराइल के नियमों का असर मंगलवार को इथियोपियन एयरलाइंस की एक फ्लाइट पर भी पड़ा। द जेरूसलम पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, विमान इथियोपिया के हवाई क्षेत्र में था, तभी इजराइली अधिकारियों ने उसे वापस लौटने को कहा। अधिकारियों को पता चला था कि विमान में इंडोनेशियाई पायलट मौजूद है। इंडोनेशिया के इजराइल के साथ राजनयिक संबंध नहीं हैं। इसके बाद विमान इथियोपिया की राजधानी अदीस अबाबा लौट गया। वहां पायलट को बदला गया और फिर विमान ने दोबारा उड़ान भरी। इसके बाद वह तेल अवीव पहुंचा। इथियोपियन एयरलाइंस ने इसे गलती बताया। कंपनी का कहना था कि उसे जानकारी नहीं थी कि संबंधित पायलट इजराइल जाने वाली फ्लाइट नहीं उड़ा सकता। एयर फ्रांस ने कर्मचारियों से दूसरी नागरिकता की जानकारी मांगी फ्रांस की राष्ट्रीय एयरलाइन एयर फ्रांस का कहना है कि उसने अपने कर्मचारियों को नियमों की जानकारी दे दी है। फ्रांस की वेबसाइट मेडियापार्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, एयर फ्रांस ने कर्मचारियों से यह भी पूछा है कि क्या उनके पास किसी दूसरे देश की नागरिकता है। रिपोर्ट में दावा किया गया कि जानकारी छिपाने पर कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी दी गई। इजराइल ने विदेशी एयरलाइंस को नियमों की जानकारी भेजी इजराइल के चैनल N12 की रिपोर्ट के मुताबिक, वहां के परिवहन मंत्रालय ने 1 अक्टूबर को विदेशी एयरलाइंस को इन नियमों की जानकारी दी थी। नियमों का पालन कराने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से एयरलाइंस पर है। इजराइली अधिकारी हर उड़ान के क्रू की नागरिकता की नियमित जांच नहीं करते थे। इसी वजह से पाकिस्तान, ओमान, ईरान, इराक और लेबनान जैसे मुस्लिम बहुल देशों के पायलट पहले भी तेल अवीव जाने वाली उड़ानें संचालित करते रहे। अब इजराइल इन नियमों का सख्ती से पालन करा रहा है। फिलहाल एयर फ्रांस, यूनाइटेड एयरलाइंस और स्मार्टविंग्स ने नियमों का पालन करने की बात कही है। ऐसे में इन एयरलाइंस को इजराइल जाने वाली उड़ानों के लिए पायलटों और केबिन क्रू की ड्यूटी में बदलाव करना पड़ सकता है। अभी यह साफ नहीं है कि कितनी और एयरलाइंस इन नियमों को लागू करेंगी। इसका असर उन कर्मचारियों पर भी पड़ सकता है जिनके पास किसी प्रतिबंधित देश के साथ-साथ दूसरे देश की नागरिकता भी है। ओमानी को-पायलट विमान को एयरपोर्ट से टकराना चाहता था 30 सितंबर 2026 को दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की फ्लाइट में ओमान के को-पायलट ने भारतीय कैप्टन स्मित मच्छर पर हमला कर दिया था। UAE के मुताबिक को-पायलट विमान को हाइजैक करके उसे इजराइल के बेन गुरियन एयरपोर्ट के टर्मिनल से टकराना चाहता था। हमले के दौरान विमान करीब 1 मिनट में करीब15 हजार फीट नीचे आ गया था। घायल कैप्टन ने कॉकपिट का दरवाजा खोल पाए इसके बाद यात्रियों और क्रू ने को-पायलट को काबू कर लिया। विमान में 174 यात्री और 8 क्रू मेंबर सवार थे। इसके बाद विमान को सऊदी अरब के तबुक शहर में इमरजेंसी लैंडिंग करानी पड़ी थी। ————————- ये खबर भी पढ़ें… अमेरिकी संसद में कैप्टन स्मित के सम्मान में प्रस्ताव पारित: आतंकी हमले को नाकाम करने की तारीफ की अमेरिकी संसद के निचले सदन प्रतिनिधि सभा ने भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छर के सम्मान में प्रस्ताव पास किया है। इसे दोनों पार्टियों ने समर्थन दिया है। इसमें 30 सितंबर को फ्लाईदुबई की फ्लाइट में हुए हमले के दौरान कैप्टन मच्छर की बहादुरी की तारीफ की गई है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ संपर्क बढ़ाते हुए रूस को कई रियायतें दी हैं। उनके इन कदमों की अमेरिका में दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं ने आलोचना की है, जिससे मध्यावधि चुनाव से पहले रिपब्लिकन पार्टी को मुश्किल सवालों का सामना करना पड़ रहा है।
मतदान में करीब तीन सप्ताह शेष रहने के बीच ट्रंप के हाल के फैसलों ने पुतिन के साथ उनके एक दशक पुराने संबंधों को फिर चर्चा में ला दिया है। शुक्रवार को पुतिन से बातचीत के बाद ट्रंप ने ऐसे कई कदम उठाए, जिनकी आलोचकों के अनुसार रूस को बिना किसी ठोस रियायत के फायदा हुआ है।
श्री ट्रंप ने शुक्रवार को वैश्विक बाजार में लाखों टन रूसी डीजल की आपूर्ति की अनुमति देने संबंधी समझौते की घोषणा की। आलोचकों का कहना है कि इससे रूस के युद्ध से होने वाली आय सीमित करने के उद्देश्य से लगाए गए प्रतिबंधों में ढील मिली है। उन्होंने शनिवार को यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की की रूसी तेल रिफाइनरियों को निशाना बनाने के लिए आलोचना की और यूक्रेन से अपना नेता बदलने की मांग की।
इसके अगले दिन श्री ट्रंप ने तत्काल ‘ऊर्जा संघर्षविराम’ की घोषणा की। रूस ने हालांकि यूक्रेन की ऊर्जा अवसंरचना पर हमले जारी रखे और अमेरिका की ओर से इसका कोई स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया।
श्री ट्रंप ने सोमवार को उन खुफिया आकलनों पर आधारित खबरों को खारिज कर दिया, जिनमें कहा गया था कि रूस ईरान को अमेरिकी सैन्य ठिकानों की जानकारी देकर उसके युद्ध प्रयासों में मदद कर रहा है।
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उन्होंने मंगलवार को डीजल समझौते का बचाव करते हुए इस आशंका को भी खारिज किया कि इससे होने वाली आय रूस के युद्ध को वित्तपोषित करने में मदद कर सकती है। रिपब्लिकन सांसदों ने हालांकि इस समझौते को ‘विश्वासघात’ और ‘दुश्मन को दिया गया उपहार’ बताया।
ऊर्जा विश्लेषकों ने सवाल उठाया है कि क्या डीजल समझौते से ईरान से जुड़े युद्ध के कारण बढ़ी ईंधन कीमतों में उल्लेखनीय कमी आएगी। यूरोप में अमेरिकी रुख को लेकर नाटो के भीतर मतभेद बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। रूस पर तोड़फोड़, साइबर हमलों और ड्रोन घुसपैठ की घटनाओं को तेज करने के आरोप भी हैं।
राजनीतिक रूप से श्री ट्रंप ऐसे रूसी नेता के साथ नजदीकी बढ़ा रहे हैं, जो अमेरिकी मतदाताओं के बीच अलोकप्रिय हैं। जनवरी में यूगोव के एक सर्वेक्षण में श्री ट्रंप को 2024 में वोट देने वाले 81 प्रतिशत लोगों ने श्री पुतिन के प्रति प्रतिकूल राय व्यक्त की थी।
रूसी राष्ट्रपति के साथ श्री ट्रंप के संबंध 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के बाद से विवादों में रहे हैं। श्री ट्रंप ने सोमवार को फिर कहा कि श्री पुतिन, श्री जेलेंस्की की तुलना में युद्ध समाप्त करने के लिए अधिक इच्छुक हैं। उन्होंने पत्रकारों से कहा, “मुझे वास्तव में लगता है कि पुतिन, जेलेंस्की से अधिक समझौता करना चाहते हैं।
मध्यावधि चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी के कांग्रेस में अपना नियंत्रण खोने की आशंका है। ऐसा होने पर श्री ट्रंप का विधायी एजेंडा प्रभावित हो सकता है और उनके प्रशासन को कांग्रेस की बढ़ती जांच तथा समन का सामना करना पड़ सकता है।
श्री ट्रंप ने चुनावी नतीजों से अपने संबंध को अलग रखने की कोशिश की है। उन्होंने मंगलवार को अपने सोशल मीडिया मंच ‘ट्रुथ सोशल’ पर लिखा मैं चुनाव नहीं लड़ रहा हूं, मैं पहले ही भारी बहुमत से जीत चुका हूं।
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इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सऊदी अरब से हूतियों के खिलाफ सैन्य अभियान में इजराइल को शामिल करने की इजाजत मांगी है। इजराइली अखबार हारेत्ज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू ने यह प्रस्ताव अमेरिका की मध्यस्थता के जरिए सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के सामने रखा। हालांकि, सऊदी क्राउन प्रिंस ने इस प्रस्ताव का विरोध किया है। उन्हें डर है कि इजराइली सेना की भागीदारी से सऊदी अरब में जनता की नाराजगी बढ़ सकती है। लेकिन इजराइल आखिर इस सैन्य अभियान में जुड़ना क्यों चाहता है… दरअसल इसकी मुख्य रूप से 3 वजहें हैं… 1. इजराइल सऊदी के साथ संबंध मजबूत करना चाहता है सऊदी अरब यमन में सक्रिय हूती विद्रोहियों के खिलाफ सैन्य अभियान चला रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, इजराइल को उम्मीद थी कि सऊदी अरब के साथ सैन्य सहयोग से दोनों अमेरिकी सहयोगियों के संबंध मजबूत होंगे। इजराइल को यह भी उम्मीद थी कि इससे भविष्य में दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध सामान्य करने का समझौता भी हो सकता है। 2. इजराइल ईरान समर्थित हूतियों को कमजोर करना चाहता है ईरान और हूती विद्रोहियों के बीच लंबे समय से संबंध हैं। सऊदी अरब और अमेरिका का आरोप है कि ईरान हूतियों को हथियार, ट्रेनिंग और तकनीकी मदद देता है। इससे हूती ड्रोन और मिसाइलों से हमले करने में सक्षम हुए हैं। इस ही वजह से हूती इजराइल और क्षेत्र के कई देशों के लिए बड़ा सुरक्षा खतरा बन चुके हैं। हूतियों ने क्षेत्रीय समुद्री व्यापार और जहाजों को प्रभावित करने वाले हमले किए हैं। उन्होंने ईरान के साथ जारी तनाव के बीच इजराइल को भी निशाना बनाया है। इसलिए इजराइल इस सैन्य अभियान में शामिल होकर हूतियों को कमजोर करना चाहता है। 3. इजराइल सऊदी के साथ सैन्य तालमेल भी बढ़ा सकता है हूतियों की गतिविधियों से सऊदी अरब को भी खतरा रहा है। सऊदी अरब लंबे समय से अपनी दक्षिणी सीमा के पास हूतियों को सुरक्षा चुनौती मानता है। इजराइल सऊदी की मदद कर क्षेत्र की एक बड़ी अरब शक्ति के साथ सैन्य तालमेल भी बढ़ सकता है। हालांकि, इससे रियाद के सामने राजनीतिक जोखिम भी हैं। सऊदी अरब से जुड़े सैन्य अभियानों में इजराइली सेना की भागीदारी पर देश के अंदर और पूरे अरब जगत में विरोध हो सकता है। यह विरोध खास तौर पर तब बढ़ सकता है, जब फिलिस्तीनी मुद्दा अब भी हल नहीं हुआ है। सऊदी और इजराइल के बीच फिलिस्तीन को लेकर मतभेद सऊदी अरब और इजराइल के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं। हालांकि दोनों ईरान के खिलाफ एक ही रुख अपनाते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प भी कई बार सऊदी से इजराइल के साथ संबंध बनाने की अपील कर चुके है। इसके लिए अमेरिका ने अब्राहम समझौता भी सामने रखा है। अब्राहम समझौते के तहत इजराइल ने 2020 में कई अरब देशों के साथ संबंध सामान्य किए थे। सऊदी अरब का कहना है कि इजराइल के साथ संबंध सामान्य करने का फैसला फिलिस्तीनी मुद्दे पर प्रगति से जुड़ा होना चाहिए। इसमें एक फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना भी शामिल है। लेकिन नेतन्याहू फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना का विरोध करते रहे हैं। 2015 से जारी है सऊदी और हूतियों की लड़ाई ————————- यह खबर भी पढ़ें… सऊदी अरब हूतियों को क्यों नहीं हरा पा रहा: अमेरिकी इंटेलिजेंस और एडवांस हथियार भी बेअसर; अब तेल-गैस की कमाई में हिस्सा मांग रहे विद्रोही सऊदी अरब के पास दुनिया के सबसे आधुनिक हथियारों में शामिल लड़ाकू विमान और मिसाइलें हैं। अमेरिका भी उसे हथियार और खुफिया जानकारी देकर मदद करता रहा है। इसके बावजूद सऊदी अरब यमन के हूती विद्रोहियों को हरा नहीं पाया। पूरी खबर पढ़ें…
Gold Silver Prices Today: दिल्ली सर्राफा बाजार में 13 अक्तूबर को लगातार दूसरे दिन सोने में गिरावट आई। यह 400 रुपये गिरकर 1,56,600 रुपये प्रति 10 ग्राम पर बंद हुआ। चांदी में भी गिरावट देखने को मिली। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने में हल्की तेजी थी, जबकि चांदी पर दबाव था।
चांदी में 500 रुपये की गिरावट
दिल्ली सर्राफा बाजार में चांदी 500 रुपये गिरकर 2,26,000 रुपये प्रति किलोग्राम पर रही। सोने और चांदी की कीमतों पर रुपये में मजबूती का असर पड़ा। बीते दो सत्रों में रुपये में 1.5 फीसदी की मजबूती आई है। रुपये में मजबूती से गोल्ड के आयात की लागत घट जाती है। इसका असर इसके घरेलू प्राइस पर पड़ता है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी गिरी चांदी
अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना 0.03 फीसदी चढ़कर 4,172 डॉलर प्रति औंस पर चल रहा था। सिल्वर 0.97 फीसदी गिरकर 59,60 डॉलर प्रति औंस पर चल रहा था। क्रूड ऑयल की कीमतों में हल्की कमजोरी देखने को मिली। हालांकि, ब्रेंट क्रूड अब भी 105 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना हुआ है।
क्रूड ऑयल 100 डॉलर के ऊपर
क्रूड ऑयल की कीमतें लगातार 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई है। इससे अमेरिका सहित दूसरे देशों में महंगाई तेजी से बढ़ने का डर है। इस महीने के आखिर में अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व की मॉनेटरी पॉलिसी आने वाली है। बुलियन मार्केट की नजरें फेड के फैसले पर लगी हैं। अगर फेड इंटरेस्ट रेट बढ़ाता है तो इसका खराब असर सोने की कीमतों पर पड़ सकता है।
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सोने और चांदी की कीमतों पर दबाव
इस साल की शुरुआत में सोने और चांदी की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई थीं। उसके बाद उनमें तेज गिरावट आई। फरवरी के अंत में अमेरिका और ईरान के बीच शुरू लड़ाई ने सोने और चांदी पर दबाव और बढ़ा दिया। तब से सोने और चांदी की कीमतें सीमित दायरे में चढ़ और उतर रही हैं।


