Wealth Creation Tips: सिर्फ हाई सैलरी के भरोसे बैठे हैं तो धोखा खा जाएंगे, एक्सपर्ट ने बताए वेल्थ क्रिएशन के 5 तरीके

Wealth Creation Tips: वेल्थ क्रिएशन के लिए क्या ज्यादा सैलरी जरूरी है? आपकी इस बारे में क्या राय है? ज्यादातर लोग यह सोचते हैं कि इनवेस्टमेंट से मोटा पैसा बनाने के लिए ज्यादा सैलरी जरूरी है। वे सैलरी बढ़ने के इंतजार में इनवेस्टमेंट शुरू नहीं कर पाते, जबकि कम इनकम वाले लोग रेगुलर इनवेस्टमेंट से बड़ा फंड तैयार कर लेते हैं। आशीष कांचरला एंड एसोसिएट्स के फाउंडर और सीए ने बताया कि वेल्थ क्रिएशन के लिए मोटी सैलरी से ज्यादा जरूरी कुछ खास आदतें हैं।

पहले निवेश करें फिर खर्च

उन्होंने कहा कि वेल्थ क्रिएशन के आपके रास्ते में सबसे बड़ी बाधा रुपये-पैसे को लेकर आपकी पुरानी सोच है। हममें से ज्यादातर लोग पहले खर्च करने के बारे में सोचते हैं। पैसे बचने पर वे सेविंग्स के बारे में सोचते हैं। यह आदत वेल्थ क्रिएशन से आपको रोक देती है। अगर आप वेल्थ क्रिएट करना चाहते हैं तो पहले आपको सेविंग्स करनी होगी फिर बाकी पैसे से महीने का खर्च चलाना होगा। मान लीजिए आपकी सैलरी मंथली 1 लाख रुपये है तो आपको कम से कम हर महीने 20,000-30,000 रुपये सेविंग्स और निवेश के लिए इस्तेमाल करना होगा।

निवेश को बनाएं आदत

दूसरा, इनवेस्टमेंट किसी त्योहार की तरह नहीं है, जो साल में तीन बार या चार बार आता है। इसका नियमित होना जरूरी है। आपको हर महीने अनुशासित रूप से निवेश जारी रखना होगा। कई लोग निवेश शुरू तो करते हैं, लेकिन कुछ ही महीनों बाद उनके निवेश की गाड़ी पटरी से उतर जाती है। सबसे पहले आपको इनवेस्टमेंट अमाउंट सोच-समझकर तय करना होगा। अगर आप ज्यादा अमाउंट तय करेंगे तो फिर आपको उसे जारी रखने में दिक्कत आ सकती है।

 खर्च को नहीं बढ़ने दें

ज्यादातर लोगों का खर्च सैलरी बढ़ने के साथ ही बढ़ जाता है। यह वेल्थ क्रिएशन के लिए ठीक नहीं है। आपको अपने खर्च को सैलरी के हिसाब से बढ़ने से रोकना होगा। अगर आज आपकी सैलरी 1 लाख है, जो पांच साल बाद बढ़कर 2.5 लाख हो जाएगी तो इसका मतलब यह नहीं आपका खर्च भी 2.5 गुना हो जाना चाहिए। आपको बढ़ी हुई इनकम का इस्तेमाल इनवेस्टमेंट बढ़ाने के लिए करना चाहिए। इससे कम से ज्यादा वेल्थ आसानी से क्रिएट कर सकेंगे।

इंश्योरेंस सिर्फ प्रोटेक्शन के लिए

कई लोग इंश्योरेंस का मतलब ठीक तरह से नहीं समझते। एक्सपर्ट्स का कहना है कि बीमा का इस्तेमाल सिर्फ प्रोटेक्शन के लिए होना चाहिए, न कि इनवेस्टमेंट के लिए। अगर आप नौकरी करते हैं और आपकी फैमिली है, जिसमें बीवी और बच्चें हैं तो परिवार की फाइनेंशियल सिक्योरिटी आपकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। यहां इंश्योरेंस आपकी मदद करता है। टर्म पॉलिसी खरीदकर आप अपने परिवार को पर्याप्त फाइनेंशियल कवर दे सकते हैं। किसी अनहोनी की स्थिति में इंश्योरेंस से आपके परिवार को इतना पैसा मिल जाएगा कि उन्हें आर्थिक रूप से लाचार नहीं होना पड़ेगा। टर्म पॉलिसी का प्रीमियम एन्डॉमेंट पॉलिसी के प्रीमियम के मुकाबले काफी कम होता है।

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निवेश में डायवर्सिफिकेशन

सिर्फ निवेश करना पर्याप्त नहीं है। आप कहां अपने पैसे का निवेश कर रहे हैं, यह काफी मायने रखता है। पहला, आपके निवेश से मिलने वाला रिटर्न इनफ्लेशन रेट से काफी ज्यादा होना चाहिए। अगर ऐसा नहीं है तो आपके पैसे की वैल्यू लंबी अवधि में बढ़ने की जगह घटेगी। दूसरा, निवेश में डायवर्सिफिकेशन बहुत जरूरी है। आप कुछ पैसा अगर शेयर या म्यूचुअल फंड की स्कीम में लगा रहे हैं तो कुछ फिक्स्ड इनकम इंस्ट्रूमेंट्स में भी लगाना चाहिए। इसके अलावा आपके पोर्टफोलियो में कम से कम 10-15 फीसदी हिस्सेदारी बुलियन यानी गोल्ड और सिल्वर की होनी चाहिए। पीपीएफ, वीपीएफ, बैंक एफडी और बॉन्ड फंड्स फिक्स्ड इनकम के अच्छे ऑप्शंस हैं।

September 2026: दूध से लेकर LPG सिलेंडर तक… 1 सितंबर से बदल जाएंगे ये 9 बड़े नियम! आपकी जेब पर पड़ेगा बड़ा असर

Financial Rule Changes September 2026: सितंबर का महीना शुरू होते ही आम आदमी से लेकर निवेशकों और करदाताओं के लिए कई नियम बदलने वाले हैं। सितंबर 2026 में दूध की कीमतों से लेकर डीमैट अकाउंट, एडवांस टैक्स, एलपीजी सिलेंडर बायोमेट्रिक और फ्लाइट में सफर तक से जुड़े 9 बड़े बदलाव लागू हो रहे हैं। 1 सितंबर 2026 से लागू होने वाले इन सभी 9 महत्वपूर्ण बदलावों के बारे में विस्तार से जानिए।

1. डीमैट और म्यूचुअल फंड में नॉमिनेशन के नए नियम

1 सितंबर 2026 से डीमैट अकाउंट और म्यूचुअल फंड फोलियो के लिए नॉमिनेशन के नए दिशानिर्देश लागू हो जाएंगे। निवेशकों को सलाह दी जाती है कि वे अपने खातों का नॉमिनेशन स्टेटस तुरंत चेक करें और आवश्यक प्रक्रिया या ऑप्ट-आउट फॉर्म समय रहते पूरा कर लें।

2. SEBI के नए ETF रूल्स

शेयर बाजार के नियामक सेबी का नया एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ETF) फ्रेमवर्क 7 सितंबर 2026 से लागू होने जा रहा है। इसमें बेस प्राइस, प्राइस बैंड, प्री-ओपन कॉल ऑक्शन और क्लोज-आउट प्रक्रियाओं में बदलाव शामिल हैं। पहले इसे लागू करने की समयसीमा अलग थी, जिसे बढ़ाकर 7 सितंबर किया गया है।

3. FCNR(B) डिपॉजिट पर स्पेशल स्वैप विंडो बंद

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की FCNR(B) डिपॉजिट के लिए विशेष डॉलर-रुपया स्वैप सुविधा 31 अगस्त को समाप्त हो रही है। 1 सितंबर से नई FCNR(B) एफडी पर यह स्पेशल फैसिलिटी नहीं मिलेगी। हालांकि, FCNR(B) डिपॉजिट बंद नहीं हुए हैं, लेकिन अब इन पर ब्याज दरें बैंक की सामान्य दरों के आधार पर तय होंगी।

4. एडवांस टैक्स चुकाने की लास्ट डेट: 15 सितंबर

करदाताओं के लिए 15 सितंबर 2026 एडवांस टैक्स की अगली किश्त जमा करने की अंतिम तिथि है। नियमों के तहत, योग्य टैक्सपेयर्स को 15 सितंबर तक अपनी कुल एडवांस टैक्स देनदारी का कम से कम 45% हिस्सा सरकार को जमा करना अनिवार्य है।

5. छोटी बचत योजनाओं की ब्याज दरों में बदलाव

सितंबर का आखिरी दिन यानी 30 सितंबर छोटी बचत योजनाओं में निवेश करने वालों के लिए बेहद अहम है। केंद्र सरकार अक्टूबर-दिसंबर 2026 तिमाही के लिए पीपीएफ (PPF), सुकन्या समृद्धि और एनएससी (NSC) जैसी स्मॉल सेविंग्स स्कीम्स की नई ब्याज दरों की समीक्षा और घोषणा करेगी।

6. इंटरनेशनल फ्लाइट्स: बोर्डिंग पास पर स्टैंप की जरूरत खत्म

1 सितंबर 2026 से भारत से विदेश यात्रा करने वाले यात्रियों को इमिग्रेशन काउंटर पर बोर्डिंग पास पर मोहर लगवाने की बाध्यता से छूट दे दी गई है। अब यात्री अपने मोबाइल में इलेक्ट्रॉनिक बोर्डिंग पास का उपयोग कर सकते हैं या प्रिंटेड पास दिखाकर इमिग्रेशन की प्रक्रिया पूरी कर सकते हैं।

7. LPG e-KYC की अनिवार्यता

घरेलू एलपीजी उपभोक्ताओं के लिए बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन (e-KYC) कराने की समयसीमा 31 अगस्त यानी आज तक है। जिन उपभोक्ताओं ने अभी तक ई-केवाईसी पूरी नहीं की है, उन्हें 1 सितंबर के बाद रसोई गैस सिलेंडर की रीफिल बुकिंग या सब्सिडी दरों का लाभ लेने में दिक्कत का सामना करना पड़ सकता है।

8. मुंबई में दूध की कीमतें बढ़ीं

मुंबई में 1 सितंबर से ताजा भैंस के दूध के थोक दामों में ₹9 प्रति लीटर की बढ़ोतरी होने वाली है। इसके बाद अब दूध की नई दरें ₹102 प्रति लीटर तक पहुंच गई हैं। यह रिवाइज्ड रेट अगले छह महीनों के लिए लागू रहेंगे।

9. मुंबई में ऑटो और टैक्सी के किराए में बढ़ोतरी

मुंबई में रोजाना सफर करने वाले यात्रियों के लिए भी झटका लगने वाला है। 1 सितंबर से मुंबई में ऑटो-रिक्शा और टैक्सी के बेस फेयर में बढ़ोतरी होने वाली है, जिससे लोकल ट्रैवलिंग थोड़ी महंगी हो जाएगी।

Tax-Saving Mutual Fund: टैक्स बचाने वाला इकलौता म्यूचुअल फंड प्लान, तो सबसे कम लॉक-इन वाला ऑप्शन भी

Tax-Saving Mutual Fund: इक्विटी मार्केट में निवेश से अच्छा रिटर्न हासिल किया जा सकता है और जो निवेशक कंजर्वेटिव हैं, वे म्यूचु्अल फंड्स के जरिए अपने पोर्टफोलियो में इक्विटी मार्केट का एक्सपोजर रखते हैं। हालांकि इसमें एक खामी ये है कि इसमें जो पैसे लगाते हैं, उस पर कोई टैक्स डिडक्शन नहीं मिलता है, सिवाय एक विकल्प में। यहां उसी एक म्यूचुअल फंड ऑप्शन यानी ELSS (इक्विटी लिंक्ड सेविंग्स स्कीम) के बारे में बताया जा रहा है, जिसमें निवेश से अच्छा रिटर्न हासिल कर सकते हैं और ऐसा भी नहीं है कि टैक्स बेनेफिट्स मिल रहा है, तो रिटर्न म्यूचुअल फंड्स के बाकी विकल्पों की तुलना में फीका रहेगा, बल्कि महंगाई को बीट करते हुए तगड़ा रिटर्न भी हासिल किया जा सकता है। इसके अलावा एक और खास बात ये है कि इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 80सी के तहत पुरानी टैक्स रिजीम में जितने भी तरीके हैं टैक्स बचाने के, उसमें सबसे कम लॉक-इन भी इसी का है।

ELSS में निवेश के क्या हैं टैक्स बेनेफिट्स

ईएलएसएस म्यूचुअल फंड्स में निवेश पर पुरानी टैक्स रिजीम में इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 80सी के तहत एक वित्त वर्ष में ₹1.50 लाख तक के निवेश पर डिडक्शन क्लेम कर सकते हैं।

एक साल से अधिक होल्डिंग को रिडीम करने पर यानी लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) में से ₹1 लाख से अधिक जितना मुनाफा है, उस पर 10% की दर से तो एक साल से कम वाली होल्डिंग को रिडीम करने पर यानी शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन (STCG) पर 20% की दर से टैक्स देना होगा।

ईएलएसएस की यूनिट्स के रिडेम्प्शन पर कोई TDS (टैक्स डिडक्टेड ऐट सोर्स) नहीं है।

टैक्स बेनेफिट्स के अलावा और क्या है खासियतें

ईएलएसएस इकलौता ऐसा म्यूचुअल फंड प्लान हैं, जिसमें टैक्स बेनेफिट्स मिलता है।

एक और खास बात ये है कि सेक्शन 80सी के तहत जिन-जिन विकल्पों में जितने भी निवेश प्लान हैं, उनमें सबसे कम लॉक-इन पीरियड इसी का है जैसे कि पीपीएफ में 15 साल का लॉक-इन है तो टैक्स-सेविंग्स एफडी का लॉक-इन पांच साल है लेकिन ईएलएसएस के मामले में तीन ही साल है।

ईएलएसएस में लॉक-इन पीरियड खत्म होने के बाद यूनिट्स बेचने पर कोई एग्जिट लोड नहीं लगेगा।

इसमें चाहें तो एकमुश्त निवेश कर सकते हैं या एसआईपी (SIP) यानी एक नियमित समय अंतराल पर थोड़ा-थोड़ा करके भी लंबे समय में अच्छा फंड तैयार कर सकते हैं।

कैसा है रिटर्न के मामले में

ईएलएसएस में रिटर्न भी तगड़ा मिलता है। सिर्फ तीन साल के ही आंकड़ों को लेकर बात करें तो मोतीलाल ओसवाल ईएलएसएस टैक्स फंड डायरेक्ट ग्रोथ में सालाना 23.84%, आईटीआई ईएलएसएस टैक्स सेवर फंड डायरेक्ट ग्रोथ में 19.45%, व्हाइटओक कैपिटल ईएलएसएस टैक्स फंड डायरेक्ट ग्रोथ में 18.63%, एचएसबीसी ईएलएसएस टैक्स सेवर फंड डायरेक्ट ग्रोथ में 18.34% और जेएम ईएलएसएस टैक्स सेवर फंड डायरेक्ट ग्रोथ में 18.27% की रफ्तार से बढ़ा है।

डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

PPF Vs SSY: हर महीने ₹5000 निवेश करें तो पीपीएफ और सुकन्या समृद्धि योजना में कितना पैसा बनेगा? जानिए पूरा हिसाब

PPF Vs SSY: अपनी बेटी के हायर एजुकेशन, शादी या दूसरी लंबे समय की फाइनेंशियल जरूरतों के लिए बचत की शुरुआत करते समय माता-पिता के मन में सबसे पहला सवाल यही उठता है कि पैसा कहां निवेश किया जाए। सरकार द्वारा समर्थित पब्लिक प्रोविडेंट फंड (PPF) और सुकन्या समृद्धि योजना (SSY) दो सबसे लोकप्रिय और सुरक्षित विकल्प हैं। हालांकि इनकी एलिजिबिलिटी, इंट्रेस्ट रेट, मैच्योरिटी और समय से पहले पैसे निकालने के नियमों के मामले में दोनों योजनाएं एक-दूसरे से काफी अलग हैं।

वर्तमान में सुकन्या समृद्धि योजना 8.2 प्रतिशत का हायर इंट्रेस्ट रेट देती है। वहीं पीपीएफ पर 7.1 प्रतिशत की दर से ब्याज मिल रहा है। हालांकि सुकन्या योजना में मिलने वाला अधिक रिटर्न सख्त विड्रॉल नियमों के साथ आता है जबकि पीपीएफ में ज्यादा फ्लेक्सिबिलिटी मिलती है।

बैंकबाजार के सीईओ आदिल शेट्टी कहते हैं कि पीपीएफ और सुकन्या समृद्धि योजना दोनों ही सरकार के सपोर्ट से चलने वाली बचत योजनाएं हैं, लेकिन उनकी एलिबिलिटी, टेन्योर, इंट्रेस्ट रेट और निकासी के नियम अलग-अलग हैं। ये बातें उन्हें अलग-अलग बचत जरूरतों के हिसाब से बनाते हैं।’ उन्होंने आगे कहा कि सही ऑप्शन का चुनाव बच्ची की उम्र, निवेश की समयसीमा और इस बात पर निर्भर करता है कि आप बेटी के भविष्य के लिए इन्वेस्ट करना चाहते हैं या आपका लॉन्ग टर्म गोल कुछ और है।

सुकन्या समृद्धि योजना (SSY): ज्यादा इंट्रेस्ट पर विड्रॉल के नियम सख्त

सुकन्या समृद्धि योजना का खाता 10 साल से कम उम्र की बच्ची के लिए खोला जा सकता है। यह अकाउंट ओपन होने के डेट से 21 साल में मैच्योर होता है। इसमें सिर्फ शुरुआती 15 वर्षों तक ही कंट्रीब्यूशन करना होता है। अभी इस योजना पर 8.2 प्रतिशत की दर से इंट्रेस्ट दिया जा रहा है।

यह योजना उन माता-पिता के लिए ज्यादा बेहतर है जो अपनी बेटी के भविष्य के लिए फोकस होकर फंड बनाना चाहते हैं।

पैसे निकालने के नियम: SSY से आप जब चाहें तब पैसे नहीं निकाले जा सकते। नियम के मुताबिक बच्ची के 18 वर्ष का होने के बाद हायर एजुकेशन के खर्चों के लिए पिछले वित्तीय वर्ष के अंत में मौजूद बैलेंस का 50 फीसदी तक आंशिक रूप से निकालने की अनुमति देते हैं। यह रकम एक बार में या कुछ वर्षों की किश्तों में ली जा सकती है।

समय से पहले खाता बंद करना: बच्ची के 18 साल का होने के बाद शादी होने की स्थिति में खाता बंद किया जा सकता है। इसके अलावा खाताधारक की मौत या फाइनेंशियल क्राइसिस जैसी गंभीर परिस्थितियों में भी शर्तों के तहत समय से पहले खाता बंद करने की अनुमति है।

पब्लिक प्रोविडेंट फंड (PPF): इन्वेस्टमेंट में ज्यादा फ्लेक्सिबिलिटी के लिए पीपीएफ की शुरुआती मैच्योरिटी अवधि 15 साल की होती है। इसे 5-5 साल के ब्लॉक में आगे बढ़ाया जा सकता है। इसमें फिक्स्ड टेन्योर के बाद लोन और पार्टिशयस विड्रॉल की सुविधा मिलती है।

खाता खोलने के वर्ष के अंत से 5 साल पूरे होने के बाद कुछ खास परिस्थितियों या वजहों से पीपीएफ खाते को समय से पहले बंद किया जा सकता है, जैसे-

खाताधारक, जीवनसाथी, बच्चों या आश्रित माता-पिता की गंभीर बीमारी के इलाज के लिए।

खाताधारक या उनके बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए (प्रवेश का प्रमाण पत्र देने पर)।

खाताधारक की निवास स्थिति में बदलाव होने पर।

यह सुविधा उन माता-पिता के लिए फायदेमंद है जो अपनी बेटी के लिए बचत तो करना चाहते हैं लेकिन उस पैसे को सिर्फ उसी के खर्चों से पूरी तरह बांधकर नहीं रखना चाहते।

PPF VS SSY कैलकुलेशन: हर महीने ₹5000 के निवेश पर कितना मिलेगा रिटर्न?

अगर आप PPF और SSY दोनों में हर महीने ₹5000 (यानी ₹60000 सालाना) इन्वेस्ट करते हैं तो मौजूदा इंट्रेस्ट रेट पर ही कैलकुलेट किया जाए तो भी दोनों की मैच्योरिटी पर बड़ी फर्क देखने को मिलता है। पहले बात करते हैं पीपीएफ की। अगर आप हर महीने ₹5000 डालते हैं तो 15 साल में आप कुल 9 लाख रुपये जमा करेंगे। 7.1 फीसदी के इंट्रेस्ट रेट के हिसाब से आपको 7 लाख 27 हजार के करीब ब्याज मिलेगा। 15 साल बाद आपकी कुल मैच्योरिटी राशि ₹1627284 हो जाएगी.

अगर आप सुकन्या समृद्धि योजना (SSY) में अपनी बेटी के लिए हर महीने ₹5000 जमा करते हैं, तो 8.2 प्रतिशत की वर्तमान ब्याज दर के आधार पर आपको काफी अधिक रिटर्न मिलेगा। इस योजना के नियमानुसार आपको सिर्फ शुरुआती 15 सालों तक ही पैसे जमा करने होते हैं। इससे आपकी कुल जमा राशि 9 लाख रुपये ही रहेगी. हालांकि खाता खोलने की तारीख से 21 वर्ष में मैच्योर होने की वजह से अगले 6 वर्षों तक आपकी जमा राशि पर ब्याज जुड़ता रहेगा। इस तरह 21 साल की मैच्योरिटी पूरी होने पर आपको करीब ₹18 लाख 71 हजार का सिर्फ इंट्रेस्ट मिलेगा और आपकी कुल मैच्योरिटी 27 लाख 71 हजार से ज्यादा हो जाएगी।

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कौन सा विकल्प आपके लिए सबसे सही है?

अगर आपका एकमात्र उद्देश्य अपनी बेटी के भविष्य के लिए एक बड़ा और डेडिकेटेड फंड तैयार करना है, तो उच्च ब्याज दर (8.2%) की वजह से सुकन्या समृद्धि योजना अधिक फायदेमंद है। अगर आप उच्च ब्याज दर के बजाय निवेश में अधिक फ्लेक्सिबिलिटी और इमरजेंसी में पैसे निकालने की सुविधा चाहते हैं, तो पीपीएफ ज्यादा बेहतर विकल्प है।

डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

PPF vs NSC: ₹10 लाख के निवेश पर कहां मिलेगा ज्यादा रिटर्न? समझिए 5 साल का पूरा गणित और टैक्स कैलकुलेशन

PPF vs NSC Investment Return Comparison: अगर आपके पास ₹10 लाख हैं और आप उसे अगले 5 सालों के लिए सरकारी गारंटी वाली स्कीम में बिना किसी रिस्क के जमा करना चाहते हैं, तो स्मॉल सेविंग्स स्कीम्स सबसे बेहतरीन जरिया हैं।

स्मॉल सेविंग्स में दो सबसे पसंदीदा विकल्प पब्लिक प्रॉविडेंट फंड (PPF) और नेशनल सेविंग्स सर्टिफिकेट (NSC) हैं। चालू वित्त वर्ष (जुलाई-सितंबर 2026 तिमाही) के लिए सरकार ने पीपीएफ की ब्याज दर 7.1% और एनएससी की ब्याज दर 7.7% पर बरकरार रखी है।

अगर आप ₹10 लाख का निवेश करते हैं, तो 5 साल में कहां ज्यादा फायदा मिलेगा? जानिए पूरी कैलकुलेशन।

₹10 लाख के निवेश पर 5 साल की कैलकुलेशन

अगर हम दोनों स्कीम्स में ₹10 लाख के कॉर्पस पर 5 साल के ग्रोथ की तुलना करें, तो आंकड़े इस प्रकार हैं:

PPF कैलकुलेशन (7.1% ब्याज): ₹10 लाख की जमा राशि 5 साल में 7.1% सालाना ब्याज दर के हिसाब से बढ़कर लगभग ₹14,09,120 हो जाएगी। इसमें आपको 5 साल में करीब ₹4,09,120 का प्री-टैक्स ब्याज मिलेगा।

NSC कैलकुलेशन (7.7% ब्याज): ₹10 लाख का निवेश 5 साल में 7.7% की चक्रवृद्वि ब्याज दर के हिसाब से बढ़कर ₹14,49,030 हो जाएगा। यानी 5 साल में करीब ₹4,49,030 का प्री-टैक्स मुनाफा होगा।

ध्यान रहे कि पीपीएफ में एक वित्त वर्ष में अधिकतम ₹1.5 लाख ही जमा करने की इजाजत है। इसलिए ₹10 लाख का यह आंकड़ा तुलनात्मक गणना के लिए 7.1% ब्याज के आधार पर दर्शाया गया है। NSC में निवेश की कोई ऊपरी सीमा नहीं होती।

प्री-टैक्स रिटर्न में NSC आगे, लेकिन टैक्स का पेंच समझें

कागजों पर 5 साल में NSC, PPF की तुलना में सीधे तौर पर ₹39,910 का ज्यादा रिटर्न देता दिख रहा है। लेकिन असली गणित टैक्स Slab के बाद बदलता है:

PPF पर EEE स्टेटस: पीपीएफ पूरी तरह से ‘EEE’ कैटगरी में आता है। यानी जमा राशि, मिला हुआ ब्याज और मैच्योरिटी अमाउंट तीनों पूरी तरह से टैक्स-फ्री होते हैं।

NSC पर टैक्स नियम: एनएससी से मिलने वाला ब्याज आपके इनकम टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्सेबल होता है। हालांकि, पहले 4 सालों के री-इन्वेस्टेड इंटरेस्ट पर सेक्शन 80C के तहत छूट क्लेम की जा सकती है, लेकिन आखिरी साल का ब्याज पूरी तरह टैक्सेबल रहता है। Higher Tax Slab वाले निवेशकों के लिए NSC का नेट रिटर्न कम हो सकता है।

मैच्योरिटी और लिक्विडिटी में कौन सा बेहतर?

NSC (5 साल का लॉक-इन): एनएससी की मैच्योरिटी ठीक 5 साल में पूरी हो जाती है। इसके अलावा, इसमें निवेश करते ही ब्याज दर पूरे 5 साल के लिए लॉक हो जाती है, जो मार्केट में ब्याज दरें घटने पर भी नहीं बदलती।

PPF (15 साल का लॉक-इन): पीपीएफ मूल रूप से 15 साल की लंबी अवधि की स्कीम है। हालांकि, इसमें 7वें साल से आंशिक निकासी और तीसरे साल से लोन की सुविधा मिलती है। पीपीएफ की ब्याज दरों की समीक्षा सरकार हर तिमाही करती है।

PPF vs NSC: ₹10 लाख निवेश की तुलना

PPF vs NSC: ₹10 लाख निवेश की तुलना

आपके लिए कौन सा विकल्प है बेस्ट?

अगर आपकी प्राथमिकता 5 साल की फिक्स्ड अवधि, गारंटीड रिटर्न और ज्यादा ब्याज दर है और आप लोअर टैक्स स्लैब में आते हैं तो NSC आपके लिए बेस्ट है। दूसरी ओर, अगर आपका लक्ष्य लंबी अवधि के लिए पूरी तरह से टैक्स-फ्री फंड बनाना है, तो PPF से बेहतर कोई विकल्प नहीं है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि अपने वित्तीय लक्ष्यों के हिसाब से पोर्टफोलियो को डायवर्सिफाई करके दोनों स्कीम्स का सही अनुपात में इस्तेमाल करना चाहिए।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

PPF vs SIP: 15 साल बाद कौन ज्यादा पैसा देगा? पूरा कैलकुलेशन समझिए

PPF vs SIP: हर साल अगर आपके पास निवेश के लिए ₹1.5 लाख हैं, तो सबसे बड़ा सवाल यही होता है। पैसा PPF में डालें या SIP करें? दोनों 15 साल के लिए अच्छे विकल्प माने जाते हैं। लेकिन दोनों का खेल अलग है। PPF में सरकार की गारंटी मिलती है। SIP में शेयर बाजार की ग्रोथ का फायदा मिलता है।

यही वजह है कि 15 साल बाद दोनों का रिजल्ट भी अलग निकलता है। अगर सिर्फ कमाई देखें तो SIP आगे निकल सकती है। लेकिन सुरक्षा और टैक्स के मामले में PPF की अपनी ताकत है।

PPF और SIP में सबसे बड़ा फर्क

PPF एक सरकारी बचत योजना है। इसमें ब्याज तय होता है और फिलहाल यह 7.1% है। इसमें पैसा सुरक्षित रहता है और मैच्योरिटी पर मिलने वाली रकम भी टैक्स-फ्री होती है।

दूसरी तरफ SIP, म्यूचुअल फंड में निवेश का तरीका है। इसमें कोई तय रिटर्न नहीं होता। बाजार अच्छा चला तो कमाई ज्यादा हो सकती है। बाजार कमजोर रहा तो रिटर्न भी कम हो सकता है।

15 साल का हिसाब

मान लेते हैं कि आप हर साल ₹1.5 लाख निवेश करते हैं। यानी SIP में हर महीने ₹12,500 डालते हैं। तुलना के लिए SIP में 12% सालाना औसत रिटर्न का उदाहरण लिया गया है। यह इक्विटी म्यूचुअल फंड अमूमन लॉन्ग टर्म में देते हैं।

पैमानाPPF
SIP (12% उदाहरण)

हर साल निवेश₹1.5 लाख₹1.5 लाख
कुल निवेश₹22.5 लाख₹22.5 लाख
अनुमानित रिटर्न7.10%12.00%
15 साल बाद रकम₹40.7 लाख₹63.1 लाख
कुल मुनाफा₹18.2 लाख₹40.6 लाख

यानी इस मामले में SIP, PPF से करीब ₹22 लाख ज्यादा पैसा बना सकती है।

उदाहरण से समझिए

मान लीजिए राहुल और अमित दोनों हर साल ₹1.5 लाख निवेश करते हैं। राहुल PPF चुनता है। अमित हर महीने ₹12,500 की SIP करता है।

15 साल बाद राहुल के पास करीब ₹40.7 लाख होंगे। वहीं अमित के पास करीब ₹63.1 लाख हो सकते हैं। दोनों ने बराबर पैसा लगाया, लेकिन रिटर्न का फर्क करीब ₹22 लाख तक पहुंच गया।

अगर SIP का रिटर्न बदल जाए तो?

यहीं असली बात है। SIP में कोई गारंटी नहीं होती। इसलिए अलग-अलग रिटर्न पर तस्वीर बदल जाती है।

SIP का औसत रिटर्न15 साल बाद रकम
8%₹43 लाख
10%₹52 लाख
12%₹63 लाख
15%₹84 लाख

यानी 8% पर SIP और PPF का फर्क बहुत कम रह जाता है। लेकिन 12-15% रिटर्न मिलने पर अंतर तेजी से बढ़ जाता है।

टैक्स में कौन आगे है?

PPF का सबसे बड़ा फायदा टैक्स है। इसमें जमा किया गया पैसा, मिलने वाला ब्याज और मैच्योरिटी पर मिलने वाली रकम तीनों टैक्स-फ्री रहती हैं।

SIP में टैक्स देना पड़ सकता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपने किस तरह के म्यूचुअल फंड में निवेश किया है और कितने समय बाद पैसा निकाला है।

किसे क्या चुनना चाहिए?

अगर आपको बिना जोखिम वाला विकल्प चाहिए, तो PPF ज्यादा सुकून देता है। इसमें पैसा सुरक्षित रहता है और रिटर्न भी तय रहता है। अगर आपका लक्ष्य ज्यादा पैसा बनाना है और आप बाजार के उतार-चढ़ाव झेल सकते हैं, तो SIP बेहतर विकल्प बन सकती है।

दोनों में निवेश ज्यादा बेहतर

मान लीजिए आपके पास हर साल ₹1.5 लाख हैं। ऐसे में पूरा पैसा सिर्फ एक जगह लगाने की जरूरत नहीं है। आप ₹75,000 PPF में और ₹75,000 SIP में लगा सकते हैं।

इससे एक तरफ सरकारी सुरक्षा मिलती है। दूसरी तरफ बाजार की ग्रोथ का फायदा भी मिलता है। यही वजह है कि कई वित्तीय सलाहकार लंबी अवधि के लिए इस तरह का संतुलन बेहतर मानते हैं।

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Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।

EPF Retirement Investment: रिटायरमेंट के बाद नियमित कमाई के लिए EPF का पैसा कहां लगाएं? एक्सपर्ट्स से जानिए

EPF Retirement Investment: कई सैलरीड कर्मचारी रिटायरमेंट के समय Employees’ Provident Fund (EPF) में काफी अच्छा खासा पासा जमा कर लेते हैं। लेकिन जैसे ही सैलरी बंद होती है, असली चुनौती शुरू होती है। सवाल यह होता है कि इस पैसे को लंबे समय तक कैसे चलाया जाए। क्या पूरा पैसा EPF में ही रखा जाए या महंगाई से बचने के लिए कुछ हिस्सा बाजार से जुड़े निवेश में लगाया जाए? कितना जोखिम लेना सही होगा? और एकमुश्त रकम से नियमित आय कैसे बनाई जाए?

अगर आपके पास EPF में बड़ा कॉर्पस है, तो रिटायरमेंट के बाद लक्ष्य सिर्फ पैसे को सुरक्षित रखना नहीं होता। जरूरी यह भी है कि यह पैसा आने वाले वर्षों में आपके खर्चों को पूरा करने के लिए काम करता रहे।

रिटायरमेंट के बाद EPF पर ब्याज कैसे मिलता है

रिटायरमेंट के बाद EPF पर मिलने वाले ब्याज को लेकर अक्सर उलझन रहती है। Kustodian Life के फाउंडर कुणाल काबरा बताते हैं कि EPF नियमों के मुताबिक- 58 साल को आधिकारिक रिटायरमेंट उम्र माना जाता है। रिटायरमेंट के बाद EPF में योगदान बंद हो जाता है, लेकिन बैलेंस पर कुछ समय तक ब्याज मिलता रहता है।

नियम दो तरह से लागू होते हैं। अगर कोई व्यक्ति 58 साल की उम्र में रिटायर होता है, तो उसके EPF बैलेंस पर तीन साल तक यानी 61 साल की उम्र तक ब्याज मिलता है। लेकिन अगर कोई 58 साल से पहले रिटायर होता है, तो उसे ब्याज सिर्फ 58 साल की उम्र तक ही मिलेगा। इसका मतलब है कि 58 साल एक तरह से कट-ऑफ उम्र है। तीन साल तक ब्याज मिलने का फायदा तभी मिलता है, जब रिटायरमेंट आधिकारिक उम्र यानी 58 साल पर हो।

इसे उदाहरण से समझिए

अब मान लीजिए कि अगर कोई 57 साल में रिटायर होता है, तो उसे ब्याज 60 साल तक मिलेगा। अगर कोई 55 साल में रिटायर होता है, तो ब्याज 58 साल तक मिलेगा। यहां तक कि अगर कोई 45 साल में रिटायर होता है, तब भी ब्याज केवल 58 साल तक ही मिलेगा।

आमतौर पर EPF पर मिलने वाली ब्याज दर करीब 8 प्रतिशत के आसपास रहती है, लेकिन यह ब्याज इन्हीं तय सीमाओं के भीतर मिलता है। यहां तक कि अगर कोई व्यक्ति 58 के बाद भी काम करता रहे, तब भी नए EPF योगदान आम तौर पर बंद हो जाते हैं। ब्याज 61 साल की उम्र तक ही सीमित रहता है। इसी वजह से एक्सपर्ट मानते हैं कि रिटायरमेंट के बाद केवल EPF पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होता।

फिक्स्ड इनकम का इंतजाम जरूरी

रिटायरमेंट के बाद सुरक्षित निवेश वाले हिस्से में भी केवल एक साधन पर निर्भर रहना सही नहीं माना जाता। Master Capital Services में वेल्थ मैनेजमेंट की AVP आकांक्षा शुक्ला कहती हैं कि EPF मुख्य रूप से बचत जमा करने का साधन है, न कि रिटायरमेंट में नियमित आय देने वाला साधन।

इसलिए रिटायरमेंट के बाद बचत को इस तरह व्यवस्थित करना जरूरी होता है कि उससे नियमित आय मिलती रहे। उदाहरण के तौर पर Senior Citizens’ Savings Scheme (SCSS) अपेक्षाकृत ज्यादा और स्थिर आय दे सकती है। वहीं बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट भी अपनी सादगी और तय रिटर्न की वजह से कई लोगों की पसंद बने रहते हैं, खासकर उन लोगों के लिए जो मासिक आय चाहते हैं।

इसके अलावा डेट म्यूचुअल फंड पोर्टफोलियो में लचीलापन और लिक्विडिटी जोड़ सकते हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इनके जरिए जरूरत के मुताबिक समय-समय पर पैसे निकालना आसान हो सकता है।

रिटायरमेंट में भी इक्विटी की भूमिका

कई रिटायर्ड लोगों को लगता है कि इक्विटी से पूरी तरह दूर रहना सुरक्षित रहेगा। लेकिन ऐसा करने से एक और जोखिम पैदा हो सकता है। समय के साथ महंगाई आपकी खरीद क्षमता को कम कर सकती है।

आकांक्षा शुक्ला के मुताबिक, बढ़ती औसत उम्र और महंगाई को देखते हुए रिटायरमेंट पोर्टफोलियो में इक्विटी की भूमिका अब धीरे धीरे जरूरी होती जा रही है।

आमतौर पर 15 से 20 प्रतिशत तक इक्विटी निवेश, खासकर लार्ज-कैप, इंडेक्स या हाइब्रिड फंड के जरिए, पोर्टफोलियो को लंबे समय में बढ़ने में मदद कर सकता है। यहां मकसद बहुत ज्यादा रिटर्न कमाना नहीं होता, बल्कि यह सुनिश्चित करना होता है कि आपका कॉर्पस समय के साथ खत्म न हो।

सही एसेट एलोकेशन क्यों जरूरी है

रिटायरमेंट के बाद पोर्टफोलियो का संतुलन बहुत महत्वपूर्ण होता है। इससे एक तरफ नियमित आय मिलती रहती है और दूसरी तरफ महंगाई से भी बचाव होता है।

आकांक्षा शुक्ला के अनुसार अगर किसी के पास करीब 3 करोड़ रुपये का कॉर्पस है, तो निवेश को चार हिस्सों में बांटना एक सामान्य रणनीति हो सकती है। इसमें EPF और अन्य फिक्स्ड इनकम साधन, डेट निवेश, इक्विटी और एक छोटा इमरजेंसी फंड शामिल हो सकता है। असल में यह डिस्ट्रीब्यूशन कुछ इस तरह हो सकता है:

  • 40 से 50 प्रतिशत फिक्स्ड इनकम
  • 30 से 35 प्रतिशत डेट निवेश
  • 15 से 20 प्रतिशत इक्विटी
  • और एक छोटा इमरजेंसी फंड

एकमुश्त रकम से नियमित आय कैसे बनाएं

रिटायरमेंट के समय मिलने वाली बड़ी रकम को सही तरीके से निवेश करना जरूरी होता है। Arihant Capital Markets की CEO Wealth स्वाति जैन के अनुसार, पूरी रकम एक साथ निवेश करने की बजाय Systematic Transfer Plan (STP) का इस्तेमाल किया जा सकता है।

इसमें पैसा पहले कम जोखिम वाले डेट या लिक्विड फंड में रखा जाता है और फिर 6 से 12 महीनों के दौरान धीरे धीरे इक्विटी या हाइब्रिड फंड में ट्रांसफर किया जाता है। इससे बाजार के उतार चढ़ाव का जोखिम कम हो जाता है।

नियमित आय के लिए Systematic Withdrawal Plan (SWP) भी बेहतर तरीका हो सकता है। इसमें निवेश से तय अंतराल पर एक निश्चित रकम निकाली जाती है, जिससे नियमित कैश फ्लो बना रहता है।

एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि एक से दो साल के खर्च के बराबर रकम सुरक्षित निवेश में रखी जाए, ताकि बाजार गिरने के समय मजबूरी में पैसे निकालने की जरूरत न पड़े। इसके बाद SWP के जरिए नियमित आय बनाई जा सकती है।

रिटायरमेंट में सुरक्षित निकासी कितनी हो

स्वाति जैन के मुताबिक, इसके लिए बकेट रणनीति अपनाना इस्तेमाल हो सकता है। इसमें छोटे समय की जरूरतों के लिए डेट निवेश से SWP किया जाता है और लंबी अवधि की ग्रोथ के लिए इक्विटी में निवेश रखा जाता है।

एक्सपर्ट्स आम तौर पर 4 से 5 प्रतिशत सालाना निकासी को सुरक्षित मानते हैं। यानी अगर किसी के पास 3 करोड़ रुपये का कॉर्पस है, तो वह सालाना लगभग 12 से 15 लाख रुपये निकाल सकता है। यह दर आम तौर पर 20 से 25 साल तक टिकाऊ मानी जाती है, बशर्ते पोर्टफोलियो संतुलित बना रहे। अगर शुरुआती वर्षों में इससे ज्यादा पैसा निकाला जाए, तो भविष्य में कॉर्पस जल्दी खत्म होने का खतरा बढ़ सकता है।

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Disclaimer: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए सलाह या विचार एक्सपर्ट/ब्रोकरेज फर्म के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदायी नहीं है। यूजर्स को मनीकंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले हमेशा सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

Mutual Fund vs EPF vs PPF vs NPS: इमरजेंसी में पैसों की जरूरत? जानिए किस निवेश से पैसा सबसे जल्दी निकलता है

Mutual Fund vs EPF vs PPF vs NPS: जब अचानक पैसों की जरूरत पड़ जाए, तो सिर्फ रिटर्न मायने नहीं रखता। यह भी उतना ही जरूरी है कि पैसा आपके बैंक खाते में कितनी जल्दी पहुंचे। किसी निवेश में रकम अगले कारोबारी दिन मिल सकती है। कुछ योजनाओं में कई दिन या हफ्ते भी लग सकते हैं। ऐसे में अगर आप रिटायरमेंट के लिए निवेश कर रहे हैं, तो हर स्कीम का विड्रॉल टाइमलाइन जानना जरूरी है।

आनंद राठी वेल्थ के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर जसमीत सिंह के मुताबिक, हर निवेश का मकसद अलग होता है। लिक्विड और शॉर्ट ड्यूरेशन डेट म्यूचुअल फंड सबसे ज्यादा लिक्विड माने जाते हैं, जबकि EPF, PPF और NPS को लंबे समय के निवेश के लिए बनाया गया है।

सबसे पहले एक नजर में विड्रॉल टाइमलाइन

निवेश विकल्प
पैसा मिलने का समय

लिक्विड/ओवरनाइट म्यूचुअल फंड
अगले कारोबारी दिन

इक्विटी म्यूचुअल फंड1-3 कारोबारी दिन
NPST+2
EPF3-5 दिन (ऑनलाइन), अधिकतम 20 दिन
PPFआमतौर पर कुछ कारोबारी दिन

NPS में T+2 में प्रोसेस हो सकता है विड्रॉल

नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) का विड्रॉल टाइमलाइन सबसे साफ माना जाता है। PFRDA ने सितंबर 2022 में एग्जिट विड्रॉल का समय T+4 से घटाकर T+2 कर दिया था। इसका मतलब है कि जरूरी मंजूरी मिलने के बाद विड्रॉल दो कारोबारी दिनों के भीतर प्रोसेस हो सकता है। हालांकि, रिटायरमेंट पर एन्युटी खरीदने जैसी प्रक्रिया होने पर पूरा पैसा तुरंत खाते में नहीं आता।

आंशिक निकासी के लिए भी नियम तय हैं। NPS में अपनी जमा राशि का अधिकतम 25% तक आंशिक विड्रॉल किया जा सकता है। इसके लिए तय शर्तें पूरी करनी होती हैं।

PPF में तय T+1 या T+2 नियम नहीं

पब्लिक प्रोविडेंट फंड (PPF) में कोई तय T+1 या T+2 भुगतान नियम नहीं है। निकासी की अनुमति मिलने के बाद बैंक या पोस्ट ऑफिस में आवेदन देना होता है। इसके बाद रकम संबंधित संस्था की प्रोसेसिंग के अनुसार खाते में आती है।

बैंक वाले PPF खातों में आमतौर पर कुछ कारोबारी दिनों में पैसा मिल जाता है। हालांकि, समय बैंक, ब्रांच और ऑनलाइन या ऑफलाइन आवेदन पर निर्भर करता है। जसमीत सिंह के मुताबिक, PPF में पांच वित्तीय वर्ष पूरे होने के बाद ही साल में एक बार आंशिक निकासी की जा सकती है।

EPF में 3-5 दिन में भी मिल सकता है पैसा

EPF में 2026 के बाद प्रक्रिया पहले से तेज हुई है। नए Employees’ Provident Funds Scheme, 2026 के तहत पूरी तरह सही क्लेम का निपटारा 20 दिनों के भीतर करना होगा। अगर बिना वजह देरी होती है, तो संबंधित अधिकारी पर 12% सालाना पेनल ब्याज भी लगाया जा सकता है।

साथ ही, ऑटोमेटेड प्रोसेसिंग के तहत कई ऑनलाइन क्लेम लगभग 3 दिन में भी निपटाए जा रहे हैं। हालांकि, आधार-UAN लिंकिंग, नियोक्ता की जानकारी या दूसरे वेरिफिकेशन की वजह से समय 2-3 हफ्ते तक भी जा सकता है।

म्यूचुअल फंड सबसे तेज विकल्पों में शामिल

अगर सिर्फ जल्दी पैसा निकालना प्राथमिकता है, तो ओपन-एंडेड म्यूचुअल फंड सबसे आसान विकल्पों में गिने जाते हैं। AMFI के मुताबिक, कारोबारी दिनों में रिडेम्प्शन करने पर आमतौर पर पैसा 1 से 3 कारोबारी दिनों में मिल जाता है। लिक्विड और ओवरनाइट फंड में यह अगले कारोबारी दिन भी आ सकता है।

इक्विटी फंड में आमतौर पर लिक्विड फंड की तुलना में थोड़ा ज्यादा समय लगता है।

किस स्कीम में सबसे ज्यादा पाबंदियां हैं?

स्कीमनिकासी की स्थिति
म्यूचुअल फंडसबसे आसान
EPFतय उद्देश्यों के लिए
PPFसीमित निकासी
NPS Tier-1सबसे ज्यादा नियम

NPS Tier-1 में निकासी सिर्फ तय परिस्थितियों में होती है। वहीं PPF और EPF में भी आंशिक निकासी के अपने नियम हैं।

निवेशकों के लिए सबसे जरूरी सीख

सबसे जल्दी पैसा देने वाला विकल्प हमेशा सबसे अच्छा रिटायरमेंट निवेश नहीं होता। म्यूचुअल फंड लिक्विड हैं, लेकिन बाजार के उतार-चढ़ाव से जुड़े रहते हैं। PPF सरकार की गारंटी वाली सुरक्षा देता है, जबकि NPS पूरी तरह रिटायरमेंट को ध्यान में रखकर बनाया गया है।

जसमीत सिंह की सलाह है कि कम से कम 6 महीने के खर्च ऐसी जगह रखें, जहां जरूरत पड़ने पर तुरंत पैसा मिल सके। इससे PPF, EPF या NPS जैसे लंबे समय के निवेश को बीच में तोड़ने की नौबत नहीं आएगी।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।