LTCG Tax: क्या अमेरिकी शेयरों की कमाई पर मिलेगा ₹1.25 लाख टैक्स छूट का फायदा? जानें क्या कहते हैं नियम

LTCG Tax on Global Stocks: बजट 2027 से पहले लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) टैक्स और सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के रुख ने इक्विटी टैक्सेशन पर नई बहस छेड़ दी है। विदेशी निवेशकों की निकासी और भारतीय इक्विटी की प्रतिस्पर्धा को लेकर चिंताओं के बीच निवेशक राहत की उम्मीद कर रहे हैं।

एक बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत में चुनिंदा इक्विटी निवेशों पर मिलने वाली ₹1.25 लाख सालाना LTCG टैक्स छूट का फायदा विदेशी शेयरों पर भी मिल सकता है। आइए जानते हैं कि विदेशी शेयरों पर कैपिटल गेन्स पर टैक्स कैसे लगता है और कौन से निवेश इसके दायरे में आते हैं।

क्या ग्लोबल शेयरों पर ₹1.25 लाख की सालाना LTCG टैक्स छूट मिलती है?

आयकर अधिनियम, 2025 की धारा 198 के तहत मिलने वाला ₹1.25 लाख का सालाना थ्रेशोल्ड सिर्फ इसलिए विदेशी शेयरों के मुनाफे पर लागू नहीं होता कि वे विदेशी एक्सचेंजों पर सूचीबद्ध हैं या लंबे समय तक रखे गए हैं।

इस प्रावधान में केवल वे लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स शामिल हैं जो योग्य इक्विटी शेयरों, इक्विटी-ओरिएंटेड म्यूचुअल फंड्स की यूनिट्स और बिजनेस ट्रस्टों की यूनिट्स से मिलते हैं, बशर्ते वे निर्धारित सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) की शर्तों को पूरा करते हों।

विदेशी शेयर आमतौर पर इन शर्तों को पूरा नहीं करते हैं। धारा 197 के तहत उनके लॉन्ग-टर्म मुनाफे पर बिना ₹1.25 लाख की छूट के 12.5 प्रतिशत की दर से टैक्स लगता है, जिसमें लागू सरचार्ज और सेस शामिल हैं।

उदाहरण के लिए, अगर किसी भारतीय निवासी को अमेरिकी शेयरों से ₹1 लाख का लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन होता है, तो यह मुनाफा सिर्फ इसलिए टैक्स-फ्री नहीं हो जाता कि यह ₹1.25 लाख से कम है। किसी अन्य राहत या एडजस्टमेंट को छोड़कर, इस पर सरचार्ज और सेस से पहले ₹12,500 का टैक्स बनेगा।

ग्लोबल शेयरों पर LTCG और STCG की गणना कैसे की जाती है?

विदेशी शेयरों पर कैपिटल गेन्स की गणना, बिक्री मूल्य में से खरीद लागत और ट्रांसफर से जुड़े योग्य खर्चों को घटाकर की जाती है। निवेशकों को इसमें विदेशी मुद्रा रूपांतरण के नियमों का भी ध्यान रखना होता है।

धारा 2(101) के तहत, विदेशी एक्सचेंजों पर सूचीबद्ध शेयर उन एसेट्स की श्रेणी में आते हैं जिन पर मान्यता प्राप्त भारतीय स्टॉक एक्सचेंजों पर सूचीबद्ध विशिष्ट प्रतिभूतियों के मुकाबले 24 महीने की होल्डिंग पीरियड की परीक्षा लागू होती है।

24 महीने या उससे कम समय के लिए रखे गए विदेशी शेयरों से होने वाले मुनाफे को शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन्स (STCG) माना जाता है और निवेशक के लागू इनकम-टर्म स्लैब दरों के अनुसार टैक्स लगाया जाता है। वहीं, 24 महीने से अधिक समय तक रखे गए शेयर बिना इंडेक्सेशन के 12.5 प्रतिशत की लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स दर के दायरे में आते हैं।

किन अन्य निवेशों को इस छूट से बाहर रखा गया है?

पीएनएएम एंड कंपनी एलएलपी (PNAM & Co. LLP) के पार्टनर मोहित गुप्ता के अनुसार, ₹1.25 लाख का थ्रेशोल्ड सभी प्रकार के लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स के लिए यूनिवर्सल छूट नहीं है। धारा 198 के दायरे से बाहर रहने वाले प्रमुख निवेश ये हैं:

रियल एस्टेट: जमीन या मकान की बिक्री से होने वाला मुनाफा।

सोना और चांदी: भौतिक कीमती धातुओं से होने वाला लाभ।

डेट-ओरिएंटेड म्यूचुअल फंड: टैक्स का तरीका विशिष्ट म्यूचुअल फंड्स के विशेष नियमों समेत लागू प्रावधानों पर निर्भर करता है।

इंटरनेशनल म्यूचुअल फंड: अगर वे विदेशी इक्विटी में निवेश करते हैं और इक्विटी-ओरिएंटेड फंड की वैधानिक परिभाषा पर खरे नहीं उतरते हैं, तो वे इसके पात्र नहीं हैं।

बॉन्ड और डिबेंचर: टैक्स का स्वरूप इंस्ट्रूमेंट और लागू नियमों के अनुसार अलग-अलग होता है।

अन्य गैर-पात्र एसेट्स: वे मुनाफे जो धारा 198 की पात्रता और STT शर्तों को पूरा नहीं करते।

निवेशकों को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

निवेशकों को सबसे पहले यह जांचना चाहिए कि क्या उनके निवेश धारा 198 के तहत योग्य हैं और क्या निर्धारित STT शर्तें पूरी होती हैं।

  • ₹1.25 लाख की छूट की सीमा पात्र मुनाफे के लिए एक संयुक्त वार्षिक सीमा है, न कि प्रत्येक स्टॉक, ब्रोकर, डीमैट खाते या म्यूचुअल फंड निवेश के लिए अलग-अलग मिलने वाली छूट।
  • कैपिटल गेन्स की गणना को सही साबित करने के लिए निवेशकों को खरीद और बिक्री की पुष्टि, ब्रोकरेज स्टेटमेंट, ट्रांजैक्शन खर्च और विदेशी मुद्रा रूपांतरण के रिकॉर्ड संभाल कर रखने चाहिए।
  • निवेशक की रेसिडेंशियल स्थिति और फाइलिंग की परिस्थितियों के आधार पर विदेशी निवेशों में विदेशी संपत्ति और विदेशी आय से जुड़े अतिरिक्त खुलासे की जरूरत पड़ सकती है।
  • जिन निवेशकों ने विदेश में टैक्स चुकाया है, उन्हें अलग से यह आकलन करना चाहिए कि क्या वे लागू प्रावधानों और संधि की शर्तों के तहत विदेशी कर क्रेडिट का दावा कर सकते हैं।

मुख्य अंतर यह है कि किसी निवेश को लंबे समय तक होल्ड करने मात्र से उसका मुनाफा स्वचालित रूप से ₹1.25 लाख की छूट के योग्य नहीं हो जाता। अपनी टैक्स देनदारी की गणना करने से पहले निवेशकों को एसेट कैटेगरी और प्रासंगिक वैधानिक शर्तों की जांच जरूर करनी चाहिए।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Investment Mantra : मनीफ्रंट के मोहित गांग से जानें ग्लोबल इंन्वेस्टिंग क्यों है जरुरी, क्या हैं इसके तरीके

Investment Mantra : पिछले कुछ समय से भारतीय बाजार ने ग्लोबल मार्केट को अंडरपरफॉर्म किया है। यही वजह है कि इन दिनों ग्लोबल इंवेस्टिंग का ट्रेंड बढ़ रहा है। अब सवाल है कि ग्लोबल इन्वेस्टिंग करना कैसे है। इसके क्या-क्या विकल्प मौजूद हैं। किन फंड्स के जरिए हम ग्लोबल मार्केट का एक्सपोजर ले सकते हैं। ग्लोबल इंवेस्टिंग के मौके और चुनौतियों पर खास चर्चा के लिए हमारे साथ हैं Moneyfront के को-फाउंडर & CEO मोहित गांग।

मोहित गांग की राय

पिछले 2 साल भारतीय बाजार का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा है। 2 साल से US, यूरोप,एशियाई बाजारों ने अच्छा प्रदर्शन किया। रुपए में गिरावट का भी असर इन्वेंस्ट पर पड़ रहा है। करेंसी हेजिंग मुश्किल होगी। रुपए में गिरावट से ग्लोबल इंवेस्टिंग में ज्यादा रिटर्न मिलता है। रुपया मजबूत होने पर विदेशी निवेश पर कम रिटर्न मिलता है। ऐसे में हमें 10-15 या फिर 25-30 फीसदी ग्लोबल एक्सपोजर रखना चाहिए

ग्लोबल इन्वेस्टिंग क्यों जरूरी और कैसे करें?

भारत का ग्लोबल मार्केट कैप में हिस्सा 3–4% है। सिर्फ घरेलू मार्केट में निवेश करने पर ज्यादा निर्भरता का रिस्क बढ़ता है। भारत में बिग टेक, AI और सेमीकंडक्टर में कम विकल्प हैं। इससे ग्लोबल लीडर कंपनियों की ग्रोथ स्टोरी में निवेश का मौका मिलता है। ग्लोबल इन्वेस्टिंग से इन सेक्टरों में तेजी का फायदा मिल सकता है। लंबी अवधि में रुपया हर साल 2–4% कमजोर होता है। ग्लोबल इन्वेस्टिंग से FX रिटर्न का फायदा मिलता है। इससे साइकिल डायवर्सिफिकेशन का भी फायदा मिलता है। US, चीन और यूरोप के बाजार भारत से अलग हैं। इससे पोर्टफोलियो में गिरावट कम होती है।

भारत में ग्लोबल इन्वेस्टिंग के विकल्प

हम इंटरनेशनल म्यूचुअल फंड्स और फीडर फंड्स के जरिए ग्लोबल इन्वेस्टिंग कर सकते हैं। US फंड्स (Nasdaq, S&P 500) में भी निवेश किया जा सकता है। इंटरनेशनल ETFs में निवेश किया जा सकता है। इंडियन एक्सचेंज के जरिए Nasdaq 100 ETF और S&P 500 ETF में निवेश किया जा सकता है। IBKR, Vested, Viewtrade, Stockal जैसे ब्रोकर्स के जरिए डायरेक्ट ग्लोबल इन्वेस्टिंग भी हो सकती है। LRS के तहत $250,000/साल लिमिट तय है। मल्टी-एसेट फंड्स के जरिए भी ग्लोबल इन्वेस्टिंग हो सकती है। कुछ फंड्स में इंटरनेशनल इक्विटी का भी एक्सपोजर होता है। गिफ्ट सिटी के जरिए भी निवेश कर सकते हैं। AIFs और ऑफशोर फंड्स India में रजिस्टर्ड होते हैं। दिक्कत सिर्फ यह है कि RBI की लिमिट्स के चलते निवेश का फ्लो काफी सीमित है।

ग्लोबल इन्वेस्टिंग के फायदे

इससे बेहतर टैक्स एफिशिएंसी मिलती है। इंडियन कैपिटल गेन नहीं लगता। डॉलर में निवेश की सुविधा मिलती है। इससे ग्लोबल स्ट्रैटेजीज तक पहुंच मिलती है। गिफ्ट सिटी से नए फंड लॉन्च हो रहे हैं। HNIs/UHNIs क्लाइंट्स के लिए ग्लोबल इन्वेस्टिंग का गेटवे बन सकता है

निष्कर्ष

ग्लोबल इन्वेस्टिंग अब सिर्फ़ डाइवर्सिफ़िकेशन (अलग-अलग जगहों पर निवेश) नहीं, बल्कि जरूरत बन गई है। ओवरसीज़ मार्केट में अलग-अलग थीम्स में निवेश करने के लिए ‘गिफ़्ट सिटी’ का रास्ता सबसे अच्छा और टैक्स के लिहाज से फायदेमंद है। ब्रोकिंग ऐप्स के ज़रिए सीधे निवेश करने में कई दिक्कतें आ सकती हैं, जैसे कि US में एस्टेट टैक्स और डिविडेंड पर विदहोल्डिंग टैक्स। इसलिए निवेशकों को इस रास्ते को चुनने में ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए।

भले ही रिडेम्पशन (निवेश भुनाने) पर आपको 0% टैक्स देना पड़े, फिर भी आपको इन ट्रांजैक्शन्स की जानकारी अपने भारतीय इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) में देनी होगी। क्योंकि यह निवेश RBI की ‘लिबरलाइज़्ड रेमिटेंस स्कीम’ (LRS) के तहत विदेशी मुद्रा (USD) में किया जाता है, इसलिए कानूनी तौर पर आपको ‘शेड्यूल FA’ (विदेशी संपत्ति) के तहत इन यूनिट्स की जानकारी देनी होगी और रिडेम्पशन को ‘एग्ज़म्प्ट इनकम’ (टैक्स-मुक्त आय) के तौर पर दिखाना होगा।

 

 

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SIP vs NPS: हर महीने ₹5,000 निवेश करें तो 30 साल में कितना फंड बनेगा? समझिए पूरा कैलकुलेशन

SIP vs NPS: रिटायरमेंट के लिए हर महीने ₹5,000 निवेश करना अच्छी रकम हो सकती है। इससे 30 जैसी लंबी अवधि में बड़ा फंड भी बन सकता है। लेकिन, असल सवाल है कि ₹5,000 SIP में लगाएं या NPS में? तुलना को आसान बनाने के लिए दोनों में अलग-अलग रिटर्न मानते हैं। SIP में 12% और NPS में 10% औसत सालाना रिटर्न लेते हैं।

मान लेते हैं कि निवेश की शुरुआत 30 साल की उम्र में होती है। हर महीने ₹5,000 निवेश किया जाता है। निवेश 30 साल तक जारी रहता है। यानी 60 साल की उम्र तक कुल ₹18 लाख निवेश होंगे।

30 साल बाद कितना फंड बनेगा?

SIP में 12% औसत रिटर्न मिलने पर ₹5,000 महीने का निवेश करीब ₹1.76 करोड़ का फंड बना सकता है। NPS में 10% औसत रिटर्न मानने पर कॉर्पस करीब ₹1.14 करोड़ हो सकता है।

यानी इस उदाहरण में SIP का अनुमानित फंड NPS से करीब ₹62 लाख ज्यादा रहेगा।

पैमानाSIPNPS
हर महीने निवेश₹5,000₹5,000
निवेश की अवधि30 साल30 साल
कुल निवेश₹18 लाख₹18 लाख
अनुमानित सालाना रिटर्न12%10%
अनुमानित कॉर्पस₹1.76 करोड़₹1.14 करोड़
अनुमानित रिटर्न₹1.58 करोड़₹96 लाख

SIP में ज्यादा पैसा क्यों बनेगा?

यहां सिर्फ 2% रिटर्न का अंतर है। लेकिन 30 साल में कंपाउंडिंग इस अंतर को काफी बड़ा बना देती है। SIP में ₹18 लाख का कुल निवेश 12% औसत रिटर्न पर करीब ₹1.76 करोड़ हो सकता है। यानी करीब ₹1.58 करोड़ की रकम अनुमानित रिटर्न से जुड़ सकती है।

हालांकि, 12% रिटर्न तय नहीं है। इक्विटी म्यूचुअल फंड बाजार से जुड़े होते हैं। कुछ साल रिटर्न काफी ज्यादा हो सकता है। कुछ साल नुकसान भी हो सकता है।

NPS में कितना फंड बनेगा?

NPS में 10% औसत रिटर्न मानें तो ₹5,000 महीने का निवेश 30 साल में करीब ₹1.14 करोड़ बना सकता है। इसमें आपका कुल निवेश ₹18 लाख होगा। बाकी करीब ₹96 लाख अनुमानित रिटर्न होगा।

NPS का मकसद रिटायरमेंट के लिए लंबी अवधि में पैसा तैयार करना है। इसमें निवेश बाजार से जुड़ा होता है। इसलिए यहां भी 10% रिटर्न की कोई गारंटी नहीं है।

NPS में एग्जिट का नियम अलग

NPS और SIP में सबसे बड़ा अंतर पैसा निकालने के समय आता है। NPS में रिटायरमेंट पर पूरा कॉर्पस अपनी मर्जी से निकालने की सुविधा नहीं होती। मौजूदा नियमों के तहत सामान्य एग्जिट में गैर-सरकारी सब्सक्राइबर के लिए 80% तक रकम एकमुश्त निकालने और कम से कम 20% रकम एन्‍युटी में लगाने का विकल्प है। छोटे कॉर्पस के लिए अलग नियम लागू हो सकते हैं।

एन्‍युटी से रिटायरमेंट के बाद नियमित आय मिलती है। हालांकि, पेंशन कितनी मिलेगी यह एन्‍युटी रेट और चुने गए प्लान पर निर्भर करेगा।

SIP में पैसा निकालना आसान

SIP में ऐसा लॉक-इन स्ट्रक्चर नहीं है। म्यूचुअल फंड की स्कीम के नियमों के मुताबिक आप जरूरत पड़ने पर अपनी यूनिट बेच सकते हैं।

यही SIP की बड़ी खासियत है। रिटायरमेंट के अलावा घर, बच्चों की पढ़ाई या किसी दूसरी जरूरत के लिए भी पैसा इस्तेमाल किया जा सकता है।

टैक्स में भी अंतर

SIP और NPS का टैक्स ट्रीटमेंट अलग है। SIP में टैक्स म्यूचुअल फंड के प्रकार और कैपिटल गेन पर निर्भर करता है। इसलिए 30 साल बाद बनने वाले पूरे कॉर्पस को सीधे टैक्स फ्री नहीं माना जा सकता।

NPS में भी लंपसम और एन्‍युटी को लेकर अलग टैक्स नियम हैं। एन्‍युटी से बाद में मिलने वाली पेंशन आपकी इनकम का हिस्सा मानी जाती है और उस पर लागू नियमों के हिसाब से टैक्स लगता है।

फिर SIP या NPS?

अगर आपकी प्राथमिकता ज्यादा लिक्विडिटी और लचीलापन है, तो SIP बेहतर विकल्प हो सकता है। वहीं, रिटायरमेंट के लिए अलग पैसा बनाना है और लंबे समय तक निवेश बनाए रखना है, तो NPS का स्ट्रक्चर काम आ सकता है।

इस उदाहरण में ₹5,000 महीने के निवेश पर SIP का अनुमानित फंड ₹1.76 करोड़ और NPS का करीब ₹1.14 करोड़ है। लेकिन सिर्फ बड़ा कॉर्पस देखकर फैसला नहीं करना चाहिए। रिटर्न के साथ टैक्स, लिक्विडिटी और एग्जिट नियम भी देखना जरूरी है।

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Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।

Tax-Saving Mutual Fund: टैक्स बचाने वाला इकलौता म्यूचुअल फंड प्लान, तो सबसे कम लॉक-इन वाला ऑप्शन भी

Tax-Saving Mutual Fund: इक्विटी मार्केट में निवेश से अच्छा रिटर्न हासिल किया जा सकता है और जो निवेशक कंजर्वेटिव हैं, वे म्यूचु्अल फंड्स के जरिए अपने पोर्टफोलियो में इक्विटी मार्केट का एक्सपोजर रखते हैं। हालांकि इसमें एक खामी ये है कि इसमें जो पैसे लगाते हैं, उस पर कोई टैक्स डिडक्शन नहीं मिलता है, सिवाय एक विकल्प में। यहां उसी एक म्यूचुअल फंड ऑप्शन यानी ELSS (इक्विटी लिंक्ड सेविंग्स स्कीम) के बारे में बताया जा रहा है, जिसमें निवेश से अच्छा रिटर्न हासिल कर सकते हैं और ऐसा भी नहीं है कि टैक्स बेनेफिट्स मिल रहा है, तो रिटर्न म्यूचुअल फंड्स के बाकी विकल्पों की तुलना में फीका रहेगा, बल्कि महंगाई को बीट करते हुए तगड़ा रिटर्न भी हासिल किया जा सकता है। इसके अलावा एक और खास बात ये है कि इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 80सी के तहत पुरानी टैक्स रिजीम में जितने भी तरीके हैं टैक्स बचाने के, उसमें सबसे कम लॉक-इन भी इसी का है।

ELSS में निवेश के क्या हैं टैक्स बेनेफिट्स

ईएलएसएस म्यूचुअल फंड्स में निवेश पर पुरानी टैक्स रिजीम में इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 80सी के तहत एक वित्त वर्ष में ₹1.50 लाख तक के निवेश पर डिडक्शन क्लेम कर सकते हैं।

एक साल से अधिक होल्डिंग को रिडीम करने पर यानी लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) में से ₹1 लाख से अधिक जितना मुनाफा है, उस पर 10% की दर से तो एक साल से कम वाली होल्डिंग को रिडीम करने पर यानी शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन (STCG) पर 20% की दर से टैक्स देना होगा।

ईएलएसएस की यूनिट्स के रिडेम्प्शन पर कोई TDS (टैक्स डिडक्टेड ऐट सोर्स) नहीं है।

टैक्स बेनेफिट्स के अलावा और क्या है खासियतें

ईएलएसएस इकलौता ऐसा म्यूचुअल फंड प्लान हैं, जिसमें टैक्स बेनेफिट्स मिलता है।

एक और खास बात ये है कि सेक्शन 80सी के तहत जिन-जिन विकल्पों में जितने भी निवेश प्लान हैं, उनमें सबसे कम लॉक-इन पीरियड इसी का है जैसे कि पीपीएफ में 15 साल का लॉक-इन है तो टैक्स-सेविंग्स एफडी का लॉक-इन पांच साल है लेकिन ईएलएसएस के मामले में तीन ही साल है।

ईएलएसएस में लॉक-इन पीरियड खत्म होने के बाद यूनिट्स बेचने पर कोई एग्जिट लोड नहीं लगेगा।

इसमें चाहें तो एकमुश्त निवेश कर सकते हैं या एसआईपी (SIP) यानी एक नियमित समय अंतराल पर थोड़ा-थोड़ा करके भी लंबे समय में अच्छा फंड तैयार कर सकते हैं।

कैसा है रिटर्न के मामले में

ईएलएसएस में रिटर्न भी तगड़ा मिलता है। सिर्फ तीन साल के ही आंकड़ों को लेकर बात करें तो मोतीलाल ओसवाल ईएलएसएस टैक्स फंड डायरेक्ट ग्रोथ में सालाना 23.84%, आईटीआई ईएलएसएस टैक्स सेवर फंड डायरेक्ट ग्रोथ में 19.45%, व्हाइटओक कैपिटल ईएलएसएस टैक्स फंड डायरेक्ट ग्रोथ में 18.63%, एचएसबीसी ईएलएसएस टैक्स सेवर फंड डायरेक्ट ग्रोथ में 18.34% और जेएम ईएलएसएस टैक्स सेवर फंड डायरेक्ट ग्रोथ में 18.27% की रफ्तार से बढ़ा है।

डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

पहली बार मार्केट में पैसा लगाने से पहले नोट कर लें ये 5 पॉइंट्स, नुकसान से बचाएगी समझदारी

First Time Investor Tips: शेयर बाजार या म्यूचुअल फंड में पहली बार निवेश करना काफी रोमांचक हो सकता है, लेकिन बिना तैयारी के बाजार में उतरा गया एक गलत कदम आपकी मेहनत की कमाई पर भारी पड़ सकता है। अगर आप भी एक नए निवेशक हैं और पहली बार मार्केट में पैसा लगाने का मन बना रहे हैं, तो शुरुआत करने से पहले वित्तीय विशेषज्ञों के ये 5 सबसे जरूरी नियम जरूर नोट कर लें।

1. सबसे पहले बनाएं अपना फाइनेंशियल गोल

निवेश केवल पैसा लगाने का नाम नहीं है, बल्कि यह आपके भविष्य की जरूरतों को पूरा करने का माध्यम है। पैसा लगाने से पहले यह स्पष्ट करें कि आप रिटायरमेंट, घर खरीदने, बच्चों की पढ़ाई या वेल्थ क्रिएशन में से किस उद्देश्य के लिए निवेश कर रहे हैं। आपका लक्ष्य अल्पकालिक या दीर्घकालिक ही यह तय करेगा कि आपको इक्विटी, डेट या हाइब्रिड फंड में से किसमें पैसा लगाना चाहिए।

2. इमरजेंसी फंड तैयार रखें और जल्दी शुरुआत करें

बाजार में बड़ा दांव लगाने से पहले अपने पास एक सुरक्षा कवच यानी इमरजेंसी फंड जरूर रखें। अपनी किसी भी बड़ी इन्वेस्टमेंट से पहले 3 से 6 महीने के लिविंग एक्सपेंस को किसी आसानी से निकलने वाले सेविंग्स या लिक्विड अकाउंट में रखें। इससे बाजार के उतार-चढ़ाव के दौरान आपको पैनिक में अपने शेयर बेचने नहीं पड़ेंगे। इसके साथ ही जितनी जल्दी संभव हो छोटे-छोटे अमाउंट से इन्वेस्ट करना शुरू कर दें। शुरुआती निवेश से आपको पावर ऑफ कंपाउंडिंग का ज्यादा समय तक फायदा मिलता है।

3. ‘डाइवर्सिफिकेशन’ अपनाएं, सारा पैसा एक जगह न लगाएं

शेयर बाजार का सबसे पहला नियम है कि, ‘कभी भी अपने सारे अंडे एक ही टोकरी में न रखें’। अपने पैसे को किसी एक कंपनी या सिर्फ एक सेक्टर में लगाने के बजाय अलग-अलग एसेट क्लासेज इक्विटी, गोल्ड, डेट और अलग-अलग सेक्टर्स में बांटें। अगर आपका एक इन्वेस्टमेंट खराब परफॉर्म करता है, तो दूसरे स्टॉक्स या फंड्स आपके पोर्टफोलियो को बैलेंस रखेंगे।

4. सोशल मीडिया की टिप्स से बचें, रीसर्च पर भरोसा करें

सोशल मीडिया फिनफ्लुएंसर्स, वॉट्सऐप टिप्स या मार्केट की अफवाहों के आधार पर कभी भी आंख बंद करके पैसा न लगाएं। किसी भी शेयर में निवेश करने से पहले कंपनी के बिजनेस मॉडल, बैलेंस शीट, कर्ज की स्थिति और वैल्यूएशन को समझें।म्यूचुअल फंड चुनते वक्त फंड मैनेजर के ट्रैक रिकॉर्ड, एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) और एक्सपेंस रेशियो की जांच करें।

5. मार्केट टाइम करने के बजाय SIP का रास्ता चुनें

मार्केट में ‘बॉटम’ पर खरीदना और ‘टॉप’ पर बेचना लगभग असंभव है। इसलिए मार्केट टाइमिंग के चक्कर में न पड़ें। बाजार की चाल का अंदाजा लगाने के बजाय SIP या नियमित पीरियोडिक इन्वेस्टमेंट का जरिया अपनाएं। इससे बाजार के उतार-चढ़ाव में आपकी खरीदारी की लागत औसतन कम हो जाती है और लंबी अवधि में बेहतर रिटर्न पाने की संभावना बढ़ती है।

अन्य महत्वपूर्ण बातें जिन पर ध्यान देना जरूरी है

ब्रोकरेज चार्ज, एक्सपेंस रेशियो, एसटीटी (STT) और कैपिटल गेन टैक्स जैसे खर्चों को नजरअंदाज न करें, क्योंकि ये आपके कुल रिटर्न को प्रभावित करते हैं। बाजार में गिरावट देखकर पैनिक में आकर अपने एसेट्स न बेचें और न ही ट्रेंडिंग शेयर्स के पीछे भागें। साथ ही साथ हर 6 महीने या एक साल में अपने पोर्टफोलियो को रीबैलेंस करें ताकि वह आपके फाइनेंशियल गोल्स के हिसाब से अलाइन रहे।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

SBI म्यूचुअल फंड का बड़ा धमाका: कम जोखिम में ज्यादा रिटर्न के लिए नई SIF स्ट्रेटेजी लॉन्च, जानिए कितना करना होगा मिनिमम निवेश

SBI Mutual Fund New SIF Launch: देश के सबसे बड़े एसेट मैनेजर एसबीआई म्यूचुअल फंड ने अपने स्पेशलाइज्ड इन्वेस्टमेंट फंड (SIF) फ्रेमवर्क के तहत दूसरी इन्वेस्टमेंट स्ट्रेटेजी पेश की है। फंड हाउस ने ‘मैग्नम इक्विटी एक्स-टॉप 100 लॉन्ग शॉर्ट फंड’ लॉन्च किया है।

यह फंड मुख्य रूप से मार्केट कैप के आधार पर भारत की टॉप 100 कंपनियों के बाहर की कंपनियों में निवेश करेगा। साथ ही उतार-चढ़ाव और जोखिम को मैनेज करने के लिए डेरिवेटिव्स के जरिए सीमित शॉर्ट पोजिशन्स का इस्तेमाल करेगा।

NFO की प्रमुख तारीखें और बेंचमार्क

अगर आप एसबीआई म्यूचुअल फंड की इस नई स्ट्रेटेजी में निवेश करने का विचार कर रहे हैं, तो ये मुख्य तारीखें याद रखें:

  • NFO ओपनिंग डेट: 7 अगस्त 2026
  • NFO क्लोजिंग डेट: 20 अगस्त 2026
  • फंड का प्रकार: ओपन-एंडेड स्ट्रेटेजी
  • बेंचमार्क: BSE 500 TRI (टोटल रिटर्न इंडेक्स)

पैसा कहां और कैसे निवेश करेगा यह फंड?

फंड हाउस के अनुसार, यह फंड अपनी कुल एसेट्स का बंटवारा इस तरह करेगा:

इक्विटी एलोकेशन: कुल एसेट्स का 65% से 100% हिस्सा टॉप-100 से बाहर की कंपनियों के शेयरों और इक्विटी-लिंक्ड इंस्ट्रूमेंट्स में लगाया जाएगा।

टॉप-100 कंपनियों में एक्सपोजर: जरूरत पड़ने पर 35% तक का हिस्सा टॉप-100 कंपनियों में लगाया जा सकता है।

डेट और अन्य विकल्प: 35% तक डेट और मनी मार्केट इंस्ट्रूमेंट्स में, 20% तक InvITs में और 35% तक गोल्ड-सिल्वर ईटीएफ (ETFs) सहित अन्य म्यूचुअल फंड यूनिट्स में निवेश किया जा सकता है।

विदेशी बाजारों में निवेश: रेगुलेटरी नियमों के तहत नेट एसेट्स का 35% तक ओवरसीज इक्विटीज, विदेशी ईटीएफ और डेट सिक्योरिटीज में अलॉट किया जा सकता है।

कम से कम कितना करना होगा निवेश?

सेबी के स्पेशलाइज्ड इन्वेस्टमेंट फंड (SIF) नियमों के तहत इसमें निवेश की सीमाएं इस प्रकार हैं:

नए निवेशकों के लिए: मिनिमम इन्वेस्टमेंट ₹10 लाख रखा गया है।

मौजूदा मैग्नम SIF निवेशकों के लिए: अगर पैन लेवल पर उनकी कुल मैग्नम SIF होल्डिंग कम से कम ₹10 लाख है, तो वे प्रति एप्लिकेशन ₹1 लाख से भी एक्स्ट्रा निवेश कर सकते हैं।

फंड मैनेजर, एग्जिट लोड और टैक्सेशन नियम

इस स्ट्रेटेजी का प्रबंधन गौरव मेहता करेंगे, जो एसबीआई के पहले SIF ऑफरिंग ‘मैग्नम हाइब्रिड लॉन्ग शॉर्ट फंड’ को भी मैनेज करते हैं। अलॉटमेंट के 3 महीने के भीतर यूनिट्स रिडीम या स्विच करने पर 1% का एग्जिट लोड लगेगा। 3 महीने पूरे होने के बाद निकासी पर कोई एग्जिट लोड नहीं लगेगा।

चालू टैक्स नियमों के अनुसार, 12 महीने से अधिक समय तक होल्ड की गई यूनिट्स पर मिलने वाले लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) पर 12.5% टैक्स (प्लस सरचार्ज और सेस) लगेगा। एक वित्त वर्ष में ₹1.25 लाख तक का कैपिटल गेन पूरी तरह टैक्स-फ्री रहेगा।

एसबीआई फंड्स मैनेजमेंट के एमडी और सीईओ देबाशीष मिश्रा के अनुसार, ‘यह नया फंड शोध-आधारित निवेश और भारत के बढ़ते बाजार में निवेशकों के लिए विविधता लाने के उद्देश्य से पेश किया गया है।’ बता दें कि अप्रैल-जून 2026 तिमाही के दौरान एसबीआई म्यूचुअल फंड का औसतन एयूएम (AAUM) ₹12.57 लाख करोड़ से अधिक रहा है।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

VIDEO: भारत में 30% और स्वीडन में 35% टैक्स देकर क्या मिलता है? युवती ने वीडियो में बताया दोनों देशों में क्या-क्या मिलती है सरकार सुविधा

स्वीडन में रहने वाली भारतीय मूल की एक युवती का वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है। भारतीय मूल के एक एचआर प्रोफेशनल ने वहां के टैक्स सिस्टम और लोगों को मिलने वाली सरकारी सुविधाओं की तुलना भारत से की है। वीडियो में उसने बताया कि, वहां लोग 30 से 35 प्रतिशत तक टैक्स देते हैं, लेकिन बदले में उन्हें अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं, मुफ्त शिक्षा और कई दूसरी सरकारी सुविधाएं मिलती हैं। इस वीडियो के वायरल होने के बाद भारत और स्वीडन के टैक्स सिस्टम और सरकारी सुविधाओं को लेकर सोशल मीडिया पर लोगों के बीच चर्चा शुरू हो गई है।

एचआर प्रोफेशनल और डिजिटल क्रिएटर कृतिका साकोरिया हाल ही में स्वीडन के गोथेनबर्ग शहर में रहने गई हैं। उन्होंने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो शेयर करते हुए बताया कि वहां 30 से 35 प्रतिशत तक इनकम टैक्स देना पड़ता है। इसके बदले लोगों को इतनी अच्छी सरकारी सुविधाएं मिलती हैं।

सरकार कैसे कर रहे पैसों का इस्तेमाल

वीडियो में कृतिका ने लिखा, “30 प्रतिशत टैक्स देना पहली नजर में बहुत ज्यादा लगता है, लेकिन जब आपको रोजमर्रा की जिंदगी में मिलने वाली सुविधाएं दिखाई देती हैं, तब इसकी अहमियत समझ आती है।” उन्होंने अपने वीडियो के कैप्शन में लिखा कि टैक्स को सिर्फ उसकी दर से नहीं, बल्कि उसके बदले मिलने वाली सरकारी सुविधाओं के आधार पर भी देखा जाना चाहिए। इस वीडियो पर उन्होंने लिखा, ‘भारत में 30% टैक्स देने के बाद’ वहीं कुछ देर बाद लिखा, स्वीडन में 35% टैक्स देने के बाद’।

कृतिका ने कहा, “हर देश की अपनी व्यवस्था होती है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि टैक्स के बदले लोगों को क्या मिलता है? टैक्स सिर्फ पैसे देने का नाम नहीं है, बल्कि यह भी मायने रखता है कि सरकार उन पैसों का इस्तेमाल समाज के लिए किस तरह करती है।”

 

क्या-क्या मिलती है सुविधाएं

कृतिका ने अपनी पोस्ट में लिखा, “स्वीडन में टैक्स देने के बाद मुझे ऐसी कई सुविधाएं मिलती हैं, जो मेरी रोजमर्रा की जिंदगी को बेहतर और आसान बनाती हैं।” कमेंट सेक्शन में लोगों के सवालों का जवाब देते हुए कृतिका ने बताया कि स्वीडन में टैक्स देने वालों को कई तरह की सुविधाएं मिलती हैं। इनमें कम खर्च में स्वास्थ्य सेवाएं, मुफ्त शिक्षा, माता-पिता के लिए सवेतन अवकाश, सामाजिक सुरक्षा, बच्चों के लिए आर्थिक सहायता, साफ-सुथरे सार्वजनिक स्थान, बेहतर सड़कें और अन्य बुनियादी सुविधाएं शामिल हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वहां लोगों को काम और निजी जीवन के बीच अच्छा संतुलन बनाए रखने का अवसर मिलता है।

लोगों ने किया कमेंट

इस वीडियो के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने भारत के टैक्स सिस्टम और सरकारी सुविधाओं को लेकर जमकर अपनी राय दी। कई यूजर्स ने कृतिका की बात से सहमति जताई। एक यूजर ने लिखा, “कुछ लोग भारत की मौजूदा व्यवस्था का बचाव करने में लगे रहते हैं, लेकिन जब तक कमियां स्वीकार नहीं की जाएंगी, बदलाव संभव नहीं है।” एक यूजर ने लिखा, “अगर वहां बेहतर सुविधाएं मिल रही हैं, तो वहीं रहो और वापस मत आना।” वहीं एक और यूजर ने लिखा, “सिर्फ 30 प्रतिशत नहीं, जीएसटी, सेस और दूसरे टैक्स जोड़ने के बाद लोगों पर टैक्स का बोझ और बढ़ जाता है।”

एक अन्य यूजर ने कहा, “आयकर के अलावा कैपिटल गेन टैक्स, कारों पर टैक्स और पेट्रोल-डीजल पर भारी टैक्स भी देना पड़ता है।” सोशल मीडिया पर लोगों ने कई तरह से कमेंट किए हैं।

(डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर यूज़र द्वारा शेयर किए गए कंटेंट पर आधारित है। मनीकंट्रोल इन दावों की न तो स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है और न ही इनका समर्थन करता है।)

Revised ITR Rules: 31 जुलाई से पहले भरा ITR और हो गई गलती? जानें रिवाइज्ड रिटर्न दाखिल करने का सही तरीका

How to File Revised ITR: इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) दाखिल करने की अंतिम तारीख 31 जुलाई 2026 खत्म हो चुकी है। कई टैक्सपेयर्स ने आखिरी समय की जल्दबाजी में अपना रिटर्न तो जमा कर दिया, लेकिन बाद में पता चला कि कोई बैंक ब्याज, शेयर बाजार से हुआ मुनाफा या फिर कोई टैक्स सेविंग डिडक्शन जोड़ना छूट गया है।

अगर आपने भी अपने ITR में कोई गलत जानकारी भर दी है या कोई आय छिपा ली है, तो घबराने की जरूरत नहीं है। इनकम टैक्स एक्ट का सेक्शन 139(5) आपको अपनी गलती सुधारने का पूरा मौका देता है। आइए जानते हैं कि धारा 139(5) के तहत रिवाइज्ड रिटर्न दाखिल करने के नियम, डेडलाइन और आसान तरीका क्या है।

क्या होता है ‘रिवाइज्ड रिटर्न’ (सेक्शन 139(5))?

इनकम टैक्स एक्ट की धारा 139(5) के तहत अगर किसी टैक्सपेयर को अपना ओरिजिनल ITR सबमिट करने के बाद यह अहसास होता है कि उससे कोई गलत जानकारी चली गई है या कोई ब्योरा दर्ज होने से रह गया है, तो वह एक संशोधित रिटर्न दाखिल कर सकता है।

कौन कर सकता है फाइल?: जिस भी व्यक्ति ने सेक्शन 139(1) के तहत समय पर (31 जुलाई तक या समय बीतने के बाद बिलेटेड रिटर्न (सेक्शन 139(4)) जमा किया है, वह रिवाइज्ड रिटर्न दाखिल कर सकता है।

कितनी बार कर सकते हैं रिवाइज?: कानूनन आप अपने ITR को एक से अधिक बार भी रिवाइज कर सकते हैं, बशर्ते वह डेडलाइन के भीतर हो।

रिवाइज्ड ITR दाखिल करने की अंतिम तारीख

वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए रिवाइज्ड रिटर्न दाखिल करने की अंतिम तारीख 31 दिसंबर 2026 है। अगर इनकम टैक्स विभाग द्वारा आपके रिटर्न का एसेसमेंट (सेक्शन 144) पहले ही पूरा कर लिया जाता है, तो एसेसमेंट पूरा होने के बाद या 31 दिसंबर 2026 जो भी पहले हो तक ही आप इसे रिवाइज कर सकेंगे।

रिवाइज्ड ITR फाइल करते समय ध्यान रखें ये 4 अहम बातें

1- ओरिजिनल ITR का पावती नंबर: रिवाइज्ड रिटर्न भरते समय आपको अपने पुराने ITR का पावती नंबर और फाइल करने की तारीख दर्ज करनी होगी।

2- सही ITR फॉर्म का चयन: आप जिस फॉर्म (ITR-1, ITR-2 आदि) में पहले रिटर्न दाखिल कर चुके हैं, उसी फॉर्म का उपयोग करें, जब तक कि आपकी आय के स्रोतों में बदलाव न हुआ हो।

3- AIS और Form 26AS से मिलान: नई फाइलिंग से पहले अपने Annual Information Statement (AIS) को दोबारा ध्यान से जांचें ताकि इस बार कोई ब्याज, डिविडेंड या कैपिटल गेन छूट न जाए।

4- ई-वेरिफिकेशन अनिवार्य: ओरिजिनल ITR की तरह ही रिवाइज्ड ITR को भी सबमिट करने के बाद 30 दिनों के भीतर e-Verify करना अनिवार्य है। बिना वेरिफिकेशन के आपका रिवाइज्ड रिटर्न अमान्य माना जाएगा।

ई-फाइलिंग पोर्टल पर रिवाइज्ड ITR भरने का स्टेप-बाय-स्टेप तरीका

  • स्टेप 1: इनकम टैक्स विभाग के ई-फाइलिंग पोर्टल (eportal.incometax.gov.in) पर जाएं और अपने PAN/Aadhaar तथा पासवर्ड से लॉगिन करें।
  • स्टेप 2: ‘e-File’ टैब में जाएं > ‘Income Tax Returns’ > ‘File Income Tax Return’ पर क्लिक करें।
  • स्टेप 3: Assessment Year 2026-27 चुनें और Filing Type में ‘Revised Return u/s 139(5)’ सिलेक्ट करें।
  • स्टेप 4: स्क्रीन पर मांगे जाने अनुसार अपने ओरिजिनल ITR का Acknowledgement Number और Filing Date दर्ज करें।
  • स्टेप 5: अब फॉर्म में जहाँ भी गलती हुई थी (जैसे आय बढ़ाना, छूटी हुई डिडक्शन जोड़ना या बैंक डिटेल सही करना), उसे ठीक करें।
  • स्टेप 6: टैक्स लायबिलिटी की दोबारा गणना करें और अगर कोई अतिरिक्त टैक्स बनता है, तो उसका भुगतान करें।
  • स्टेप 7: रिटर्न सबमिट करें और तुरंत Aadhaar OTP या नेट बैंकिंग के जरिए इसे e-Verify कर दें।

ITR Filing 2026 Deadline: 31 जुलाई से पहले ऐसे भरें आयकर रिटर्न, पेनल्टी से बचें

income tax

अगर आपने वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए अपना आयकर रिटर्न (ITR) अभी तक दाखिल नहीं किया है, तो तुरंत सावधान हो जाएं! व्यक्तिगत करदाताओं और वेतनभोगियों के लिए बिना  किसी लेट फीस के ITR फाइल करने की अंतिम तिथि 31 जुलाई 2026 है।

 

अंतिम समय में इनकम टैक्स पोर्टल पर ट्रैफिक का दबाव बढ़ने से सर्वर स्लो होने या पेमेंट अटकने की समस्या हो सकती है। यदि आप 31 जुलाई की समय सीमा चूक जाते हैं, तो आपको  भारी लेट फीस, ब्याज और कई वित्तीय नुकसान उठाने पड़ सकते हैं।
 

धारा 234F के तहत पेनल्टी (Late Fee Slabs) 

आयकर कानून की धारा 234F के अनुसार, नियत तारीख के बाद रिटर्न (Belated Return) दाखिल करने पर निम्नलिखित जुर्माना लागू होता है:

 

कुल वार्षिक आय (Total Income) 31 जुलाई के बाद ITR फाइल करने पर लेट फीस

2.5 लाख तक रुपए (मूल छूट सीमा) कोई पेनल्टी नहीं

2.5 लाख से 5 लाख रुपए तक 1,000 रुपए अधिकतम लेट फीस

5 लाख रुपए से अधिक 5,000 रुपए लेट फीस

 

समय पर ITR न भरने के 4 बड़े नुकसान

1. धारा 234A के तहत ब्याज : यदि आपका कोई टैक्स बकाया है, तो समय सीमा समाप्त होने के बाद आपको बकाए टैक्स पर 1% प्रति माह की दर से ब्याज देना होगा। 
 

2. नुकसान (Losses) को कैरी फॉरवर्ड न कर पाना : शेयर बाजार, फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) या बिजनेस से हुए नुकसान को अगले वर्षों के मुनाफे से एडजस्ट (Carry Forward) करने का विकल्प समाप्त हो जाता है।
 

3. ओल्ड टैक्स रिजीम का विकल्प बंद: यदि आप पुरानी कर व्यवस्था (Old Tax Regime) चुनना चाहते थे, तो समय सीमा बीत जाने के बाद आप केवल न्यू टैक्स  रिजीम (New Tax Regime) के तहत ही बेलैटेड रिटर्न भर पाएंगे।

4. रिफंड में देरी : यदि आपका TDS कटा है और आप रिफंड के हकदार हैं, तो देर से फाइल करने पर आपका रिफंड अटक सकता है या उसमें काफी देरी हो सकती है।

 

पोर्टल पर ऑनलाइन ITR फाइल करने की चरणबद्ध प्रक्रिया

समय सीमा समाप्त होने से पहले घर बैठे आधिकारिक पोर्टल (incometax.gov.in) पर आसानी से ITR फाइल करने के लिए इन स्टेप्स का पालन करें:
 

1.ई-फाइलिंग पोर्टल पर लॉगिन करें: PAN और पासवर्ड तैयार रखें।

आधिकारिक वेबसाइट incometax.gov.in पर जाएं। अपनी यूजर आईडी (PAN) और पासवर्ड का उपयोग करके लॉगिन करें।
 

2.File Income Tax Return चुनें:

लॉगिन के बाद मुख्य डैशबोर्ड पर e-File > Income Tax Returns > File Income Tax Return विकल्प पर क्लिक करें।
 

3.आकलन वर्ष (Assessment Year) का चयन करें:

आकलन वर्ष में AY 2026-27 का चयन करें। इसके बाद ऑनलाइन फाइलिंग (Online Mode) चुनें और 'Start New Filing' पर क्लिक करें।
 

4.करदाता स्थिति एवं सही ITR फॉर्म का चुनाव करें:

अपनी स्थिति Individual चुनें। यदि आपकी केवल वेतन, एक मकान संपत्ति या ब्याज से आय है, तो ITR-1 (Sahaj) चुनें।
 

5.AIS और Form 26AS से आंकड़ों का मिलान करें:

अपने फॉर्म 16, AIS (Annual Information Statement) और Form 26AS के आंकड़ों की जांच करें। यदि कोई टैक्स बकाया दिखता है, तो e-Pay Tax  के माध्यम से तुरंत भुगतान करें।
 

6.समीक्षा करें और e-Verify पूरा करें:

अपनी सभी जानकारियों की दोबारा समीक्षा करके Submit पर क्लिक करें। इसके बाद अपने आधार OTP या नेट बैंकिंग का उपयोग करके e-Verification प्रक्रिया तुरंत पूरी  करें (बिना ई-वेरिफिकेशन के ITR अमान्य माना जाता है)।
 

ITR सबमिट करने से पहले अंतिम चेकलिस्ट 

– AIS/TIS की जांच: अपने पोर्टल पर जाकर AIS जरूर डाउनलोड करें और उसमें दर्ज ब्याज, डिविडेंड या शेयर ट्रेडिंग की जानकारी अपने रिकॉर्ड से मिलाएं।

– बैंक खाता वैलिडेट करें: सुनिश्चित करें कि आपका बैंक खाता पोर्टल पर पूर्व-सत्यापित (Pre-validated) है ताकि रिफंड सीधे आपके खाते में आ सके।

– ई-वेरिफिकेशन न भूलें: ITR फाइल करने के 30 दिनों के भीतर ई-वेरिफिकेशन करना अनिवार्य है।

सलाह: यदि पोर्टल पर अत्यधिक लोड के कारण तकनीकी समस्या आए, तो स्क्रीनशॉट लेकर रखें और थोड़ा रुककर पुनः प्रयास करें। 31 जुलाई की मध्यरात्रि से पहले अपनी प्रक्रिया पूरी कर लें। 

 

आयकर रिटर्न (ITR) भरते समय सही फॉर्म चुनना सबसे महत्वपूर्ण चरण है। गलत फॉर्म चुनने पर इनकम टैक्स डिपार्टमेंट आपके रिटर्न को 'Defective Return' (धारा  139(9)) करार दे सकता है। 

व्यक्तिगत करदाताओं (Individuals) के लिए ITR-1 (Sahaj) और ITR-2 सबसे आम फॉर्म हैं। 

ITR-1 (Sahaj) और ITR-2 में मुख्य अंतर 

विषय ITR-1 (Sahaj) ITR-2

पात्रता (Eligibility) केवल भारत के निवासी (Resident Individuals) निवासी (Resident), अनिवासी (NRI) और HUF

कुल आय सीमा ₹50 लाख तक ₹50 लाख से अधिक (कोई सीमा नहीं)

मकान संपत्ति (House Property) केवल 1 मकान संपत्ति से आय 1 से अधिक मकान संपत्तियों से आय

कैपिटल गेन्स (शेयर, MF, प्रॉपर्टी) केवल Section 112A के तहत ₹1.25 लाख तक LTCG सभी प्रकार के Capital Gains (STCG/LTCG,  प्रॉपर्टी, सोना आदि)

विदेशी संपत्ति / आय (Foreign Assets) अनुमति नहीं है विदेश में संपत्ति, शेयर (RSUs/ESOPs) या आय होने पर अनिवार्य

कृषि आय (Agricultural Income) ₹5,000 तक ₹5,000 से अधिक होने पर

डायरेक्टर / अनलिस्टेड शेयर कंपनी में डायरेक्टर या अनलिस्टेड शेयरधारक फाइल नहीं कर सकते कंपनी के डायरेक्टर या अनलिस्टेड शेयरधारक फाइल कर सकते हैं

आपके लिए कौन सा फॉर्म सही है?

1. आपको ITR-1 (Sahaj) चुनना चाहिए यदि:
 

• आपकी कुल वार्षिक आय ₹50 लाख तक है। 

• आपकी आय का मुख्य स्रोत वेतन (Salary), पेंशन (Pension) या ब्याज/डिविडेंड (Other Sources) है। 

• आपके पास केवल 1 मकान संपत्ति (Single House Property) है। 

• आपकी कृषि आय (Agricultural Income) ₹5,000 या उससे कम है। 

• आपने शेयर या म्यूचुअल फंड बेचे हैं, लेकिन आपका कुल लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन (Section 112A u/s) ₹1.25 लाख के अंदर है और कोई अन्य कैपिटल गेन  या लॉस नहीं है। 

2. आपको ITR-2 चुनना चाहिए यदि: 

• आपकी कुल वार्षिक आय ₹50 लाख से अधिक है। 

• आपने शेयर, म्यूचुअल फंड, जमीन, मकान या सोना बेचा है और आपको Short-Term Capital Gain (STCG) या अधिक LTCG हुआ है। 

• आपके पास 2 या उससे अधिक मकान हैं जिनसे किराया या आय आती है। 

• आपकी विदेशी आय है या विदेश में कोई बैंक खाता/कंपनी शेयर (जैसे MNCs से मिले US Stocks/ESOPs) हैं। 

• आपकी कृषि आय ₹5,000 से अधिक है। 

• आप किसी कंपनी में डायरेक्टर (Director) हैं या आपके पास अनलिस्टेड कंपनियों के शेयर हैं। 

• आपका आवासीय दर्जा NRI (Non-Resident Indian) या RNOR है। 

ध्यान दें: बिजनेस या प्रोफेशन से आय (जैसे फ्रीलांसिंग, कंसल्टेंसी, ट्रेडिंग या बिज़नेस प्रॉफिट) कमाने वाले व्यक्ति ITR-1 या ITR-2 का उपयोग नहीं कर सकते। उनके लिए ITR-3  या ITR-4 लागू होता है। 

 

 

आयकर पोर्टल (Income Tax Portal) से AIS (Annual Information Statement) डाउनलोड करना और उसका Form 16 से मिलान  (Reconciliation) करना आयकर रिटर्न (ITR) फाइल करने का सबसे महत्वपूर्ण चरण है। इससे आपके ITR में किसी प्रकार के मिसमैच की संभावना खत्म हो जाती है।
 

1. AIS कैसे डाउनलोड करें? (Step-by-Step Guide) 
 

1.इ-फाइलिंग पोर्टल पर लॉगिन करें:

आयकर विभाग की आधिकारिक वेबसाइट incometax.gov.in पर जाएं। अपने PAN (यूजर ID) और पासवर्ड से लॉगिन करें।

2.Services मेनू में जाएं:

लॉगिन के बाद मुख्य मेनू बार पर Services टैब पर क्लिक करें और ड्रॉपडाउन से Annual Information Statement (AIS) चुनें।

3.AIS पोर्टल पर रिडायरेक्ट हों:

स्क्रीन पर एक पॉप-अप मैसेज आएगा, वहां Proceed पर क्लिक करें। यह आपको एक नए Compliance Portal पर ले जाएगा।

4.असेसमेंट ईयर और फाइल फॉर्मेट चुनें:

Compliance Portal पर AIS टैब पर क्लिक करें। ऊपर से सही असेसमेंट ईयर (जैसे AY 2026-27) चुनें।

5.PDF या Excel में डाउनलोड करें:PDF खोलने के लिए पासवर्ड डालें.

आप पूरे विवरण को PDF या JSON/Excel फॉर्मेट में डाउनलोड करने के लिए Download बटन पर क्लिक करें।
 

PDF खोलने का पासवर्ड Format: 

AIS की PDF फाइल पासवर्ड प्रोटेक्टेड होती है। इसका पासवर्ड आपका PAN (स्मॉल लेटर्स में) + आपकी जन्मतिथि (DDMMYYYY) होता है। 

उदाहरण: यदि आपका PAN ABCDE1234F और DOB 15/08/1990 है, तो पासवर्ड होगा: abcde1234f15081990।

2. Form 16 और AIS का मिलान (Reconciliation) कैसे करें? 

Form 16 आपके एम्प्लॉयर (कंपनी) द्वारा दी गई सैलरी और काटे गए TDS का प्रमाण है, जबकि AIS में आपकी सैलरी के अलावा बैंक ब्याज, डिविडेंड, शेयर ट्रेडिंग आदि की भी  जानकारी होती है। 

दोनों का मिलान करते समय निम्नलिखित बिंदुओं को क्रमानुसार जांचें:

1. ग्रॉस सैलरी (Gross Salary) का मिलान 

• Form 16 (Part B): अपनी कुल ग्रॉस सैलरी और एम्प्लॉयर द्वारा काटे गए कुल TDS की जांच करें। 

• AIS (Part B – TDS/TCS section): सैलरी कोड (192) के सामने दिख रही रकम और काटे गए TDS का मिलान Form 16 के Part A से  करें। 

• ध्यान दें: यदि आपने साल के दौरान नौकरी बदली है, तो दोनों एम्प्लॉयर्स के Form 16 की कुल रकम का जोड़ AIS की कुल सैलरी से मिलना चाहिए। 

2. TDS और Form 26AS से क्रॉस-चेक 

• Form 16 में दर्ज कुल TDS कटौती, AIS के TDS/TCS टैब और आपके Form 26AS में दिख रहे टैक्स क्रेडिट से पूरी तरह मैच होनी चाहिए। 

3. अन्य आय (Other Income) की पहचान 

AIS में सैलरी के अलावा कई ऐसी आय दर्ज होती हैं जो Form 16 में नहीं होतीं: 

• बैंक ब्याज (Savings/FD Interest): पासबुक और बैंक से मिले इंटरेस्ट सर्टिफिकेट से इसका मिलान करें। 

• डिविडेंड (Dividend Income): शेयर या म्यूचुअल फंड से मिले डिविडेंड को क्रॉस-चेक करें। 

• कैपिटल गेन्स (Shares/MF Sale): शेयर या प्रॉपर्टी बिक्री से हुई कमाई AIS के SFT Information में दिखती है।
 

यदि AIS में गलत जानकारी या अंतर दिखाई दे तो क्या करें? 
 

अगर AIS में कोई ऐसी इनकम दर्ज दिख रही है जो आपकी नहीं है या कोई आंकड़ा दो बार (Duplicate) दर्ज हो गया है, तो आप पोर्टल पर Feedback दे सकते हैं: 

1. AIS Portal पर उस गलत एंट्री/लाइन आइटम पर क्लिक करें। 

2. Optional / Feedback बटन चुनें।

3. उपयुक्त विकल्प चुनें (जैसे: Information is not correct, Income is not taxable, या Information relates to  other PAN/Year)।

4. इसे सबमिट कर दें। सबमिट करने के बाद आपकी TIS (Taxpayer Information Summary) अपने आप अपडेट हो जाएगी।

ITR Filing 2026: आखिरी मौके पर फाइल कर रहे रिटर्न? ये चीजें जरूर चेक करें, वरना बढ़ जाएगा नोटिस और रिफंड में देरी का खतरा

ITR Filing 2026: 31 जुलाई ITR फाइल करने की आखिरी तारीख है। ऐसे में ज्यादातर लोग जल्दबाजी में रिटर्न भर रहे हैं। लेकिन सिर्फ रिटर्न फाइल करना काफी नहीं है। ‘Submit’ बटन दबाने से पहले अगर कुछ जरूरी बातें चेक कर लें, तो बाद में रिफंड अटकने, नोटिस आने या रिटर्न दोबारा भरने जैसी परेशानी से बच सकते हैं।

सही ITR फॉर्म चुना है या नहीं?

सबसे पहले देख लें कि आपने अपनी कमाई के हिसाब से सही ITR फॉर्म चुना है या नहीं। गलत फॉर्म भरने पर आपका रिटर्न डिफेक्टिव माना जा सकता है। इसके साथ ही PAN, आधार, बैंक अकाउंट, मोबाइल नंबर और ईमेल जैसी जानकारी भी एक बार जरूर मिला लें।

ClearTax की टैक्स एक्सपर्ट चांदनी आनंदन कहती हैं कि रिटर्न सबमिट करने से पहले ITR फॉर्म, PAN, बैंक अकाउंट, आय, TDS, AIS, Form 26AS, डिडक्शन और टैक्स चालान जैसी सभी जानकारियां एक बार जरूर जांच लें। इससे बाद में परेशानी नहीं होगी।

AIS, TIS और Form 26AS से मिलान करें

रिटर्न भरने से पहले AIS, TIS और Form 26AS में दर्ज जानकारी का ITR से मिलान जरूर करें।

आपकी सैलरी, बैंक का ब्याज, कैपिटल गेन, शेयरों के सौदे और TDS का रिकॉर्ड इन तीनों में सही होना चाहिए। अगर कहीं कोई फर्क दिखे, तो पहले उसे ठीक करें। उसके बाद ही रिटर्न फाइल करें।

सिर्फ प्री-फिल्ड डेटा पर भरोसा न करें

ITR में पहले से भरी जानकारी देखकर निश्चिंत न हो जाएं। AQUILAW के लीड कंसल्टेंट राकेश गोयल का कहना है कि डिडक्शन का दावा तभी करें, जब उसके दस्तावेज आपके पास हों। कैपिटल गेन की सही कैलकुलेशन करें। अगर कोई टैक्स-फ्री आय है, तो उसे भी जरूर दिखाएं। क्योंकि कानून के हिसाब से सही रिटर्न भरने की जिम्मेदारी आपकी ही होती है, सिस्टम की नहीं।

ई-वेरिफिकेशन करना बिल्कुल न भूलें

कई लोग ‘Submit’ पर क्लिक करते ही मान लेते हैं कि काम पूरा हो गया। जबकि ऐसा नहीं है। ITR तभी पूरा माना जाता है, जब तय समय के भीतर उसका ई-वेरिफिकेशन भी कर दिया जाए। राकेश गोयल के मुताबिक, अगर आपने ई-वेरिफिकेशन नहीं किया, तो आयकर विभाग आमतौर पर उसे ऐसे मानता है जैसे रिटर्न कभी फाइल ही नहीं किया गया।

इसलिए ‘Submit’ दबाने से पहले दो-तीन मिनट जरूर निकालें। सारी जानकारी एक बार फिर देख लें। इतनी सी सावधानी आपको बाद की बड़ी परेशानी से बचा सकती है।

आपके PF का पैसा EPFO कहां निवेश करता है, आपको तगड़ा ब्याज कैसे मिलता है? समझिए पूरा हिसाब

Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।