महाराष्ट्र में 1972 से भी ज्यादा गंभीर सूखे की आशंका, सोलापुर में सिर्फ 48.65% बारिश, किसानों पर कितना बड़ा संकट?

महाराष्ट्र के सोलापुर जिले पर सूखे का बड़ा संकट मंडरा रहा है। जिले में इस बार औसत बारिश का सिर्फ 50% ही बरसा है, जिससे खेतों में दरारें पड़ गई हैं। हालात का जायजा लेने खुद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस 23 सितंबर को सोलापुर पहुंचे।

मुख्यमंत्री ने दौरा करने के बाद कहा कि मौजूदा हालात 1972 के ऐतिहासिक सूखे से भी ज्यादा खतरनाक हो सकते हैं। सोलापुर इस समय राज्य का सबसे ज्यादा प्रभावित जिला बन गया है।

जिले में औसत बारिश का सिर्फ करीब 50 फीसदी पानी ही बरसा है। इसकी वजह से खरीफ की सभी फसलों को नुकसान हुआ है। बार्शी और धनोर इलाके में करीब 90 हजार हेक्टेयर में लगी सोयाबीन की फसल पूरी तरह खराब हो गई है, जबकि कई चीनी उत्पादक इलाकों में गन्ने की फसल रुक गई है।

किसानों के लिए सरकार ने की ये तैयारी

फडणवीस ने किसानों से हिम्मत बनाए रखने की अपील करते हुए कहा कि सरकार इस मुश्किल समय में उनके साथ है। सरकार की पहली प्राथमिकता पीने के पानी को बचाना है। इसके अलावा फसल नुकसान, पशुओं के चारे, फसल बीमा, आर्थिक मदद और अनाज की व्यवस्था को लेकर भी योजना बनाई जा रही है। सूखे को लेकर सरकार की ओर से जल्द नोटिफिकेशन या प्रस्ताव जारी करने की बात भी कही गई है।

सूखे से मछली पालन भी प्रभावित

बारिश की कमी का असर अब खेती के साथ मछली पालन पर भी दिखाई दे रहा है। कम पानी की वजह से तालाबों और जलाशयों में मछली पालन मुश्किल हो रहा है। इससे मछली उत्पादन के साथ मछुआरों की कमाई पर भी असर पड़ सकता है।

सूखे की स्थिति को लेकर कैबिनेट सब-कमेटी की बैठक भी हुई। इसमें अधिकारियों से फसल नुकसान का सर्वे जल्द पूरा करने को कहा गया है, ताकि प्रभावित किसानों की स्थिति का सही पता चल सके। इसके अलावा जल संरक्षण के कामों में भी तेजी लाने के निर्देश दिए गए हैं।

Bullet train India: भारत की खुद की 350 kmph स्पीड वाली बुलेट ट्रेन का प्लान आया सामने, जानिए जापान की E10 सीरीज को कैसे देगा टक्कर

Bullet train India: भारत अब हाई-स्पीड रेल के क्षेत्र में अपनी तकनीक और ट्रेनें विकसित करने की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रहा है। रेलवे मंत्रालय ने 2030 तक 350 किमी प्रति घंटे की डिजाइन स्पीड वाली स्वदेशी बुलेट ट्रेन तैयार करने की योजना बनाई है। यह ट्रेन जापान की अगली पीढ़ी की E10 सीरीज की हाई-स्पीड ट्रेनों की क्षमता के बराबर होगी। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा, “भारत की अगली पीढ़ी की बुलेट ट्रेन को 350 किलोमीटर प्रति घंटे की टॉप स्पीड के हिसाब से प्लान किया जा रहा है। ट्रेन के डिज़ाइन का काम अगले छह महीनों में शुरू होने की उम्मीद है।” 2

016 में शुरू हुआ 508 किलोमीटर लंबा मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर अभी बन रहा है। इसे फिलहाल 320 kmph तक की रफ्तार से चलने वाली ट्रेनों के लिए बनाया जा रहा है। इसके ऑपरेशन का पहला चरण अगस्त 2027 में शुरू होने की उम्मीद है। इसके साथ ही मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल (MAHSR) कॉरिडोर की लागत में भी बड़ा इजाफा हुआ है। कैबिनेट ने प्रोजेक्ट की संशोधित लागत को 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक मंजूरी दी है। यह 2015 में तैयार शुरुआती अनुमान की तुलना में लगभग दोगुनी है।

350 किमी प्रति घंटे की रफ्तार वाली B35 ट्रेन

रेलवे मंत्रालय की योजना के तहत भारत अपनी B35 हाई-स्पीड ट्रेन विकसित करेगा। इसका डिजाइन स्पीड 350 किमी प्रति घंटा रखी जाएगी। इसका उद्देश्य भारत में ऐसी स्वदेशी हाई-स्पीड ट्रेन तैयार करना है, जो दुनिया की आधुनिक बुलेट ट्रेन तकनीक के स्तर की हो। रिपोर्ट के मुताबिक, इसका लक्ष्य जापान की अगली पीढ़ी की E10 सीरीज से मेल करना है।

जापान ने दिसंबर 2024 में भारत सरकार को बताया था कि उसकी मौजूदा E5 सीरीज की ट्रेनों का उत्पादन चरणबद्ध तरीके से बंद किया जा रहा है। जापान के अनुसार, E10 ट्रेनों का उत्पादन 2030 से शुरू होगा। ये 2034 तक संचालन के लिए उपलब्ध हो सकती हैं। भारत इन ट्रेनों के उपलब्ध होने तक अपने स्वदेशी विकल्प को तैयार करने पर काम कर रहा है।

पहले B28 ट्रेनें होंगी तैयार

भारत की तत्काल योजना B28 हाई-स्पीड ट्रेनों के निर्माण की है। मुंबई-अहमदाबाद हाई स्पीड रेल कॉरिडोर पर शुरुआत में इन्हीं ट्रेनों को चलाया जाएगा। इंडियन रेलवे के मुताबिक, BEML को 32 B28 ट्रेनों के निर्माण का कॉन्ट्रैक्ट मिल चुका है। इसके अलावा BEML को 15 और B28 ट्रेनों के निर्माण के लिए 5,400 करोड़ रुपये का अलग कॉन्ट्रैक्ट मिला है। इस तरह कुल 47 B28 ट्रेनों के निर्माण की योजना है।

  • B28 ट्रेनों की डिजाइन स्पीड: 280 किमी प्रति घंटा
  • अधिकतम ऑपरेटिंग स्पीड: 249 किमी प्रति घंटा

2027 की शुरुआत में प्रोटोटाइप का ट्रायल

B28 ट्रेन के दो प्रोटोटाइप तैयार किए जाएंगे। इनका ट्रायल 2027 की पहली तिमाही में शुरू होने की उम्मीद है। इसके बाद ट्रेनों के प्रदर्शन, सुरक्षा और हाई-स्पीड संचालन से जुड़ी जांच के आधार पर आगे का उत्पादन और संचालन किया जाएगा।

भारत का अपना ट्रेन कंट्रोल सिस्टम भी

स्वदेशी हाई-स्पीड ट्रेनों के साथ भारत अपना Bharat Train Control System (BTCS) भी विकसित करेगा। यह सिस्टम ट्रेन की रफ्तार, ट्रेनों के बीच दूरी, संचालन और सुरक्षा को नियंत्रित करने में मदद करेगा।

रिपोर्ट के मुताबिक, BTCS की अवधारणा चीन के Chinese Train Control System (CTCS) जैसी होगी। इसका इस्तेमाल हाई-स्पीड और सामान्य रेल नेटवर्क में ट्रेन की गति और सुरक्षा प्रबंधन के लिए किया जाता है।

प्रोजेक्ट के इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी लागत में इजाफा

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल प्रोजेक्ट की लागत में भी भारी वृद्धि हुई है। 2015 में इस प्रोजेक्ट की शुरुआती अनुमानित लागत करीब 1.11 लाख करोड़ रुपये थी। अब इसकी संशोधित लागत 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गई है। रिपोर्ट के मुताबिक लागत बढ़ने के प्रमुख कारणों में जमीन अधिग्रहण, इंफ्रास्ट्रक्चर और सिग्नलिंग सिस्टम की लागत में बढ़ोतरी शामिल है।

जमीन अधिग्रहण की लागत में तीन गुना से ज्यादा वृद्धि हुई है। यह खर्च बढ़कर करीब 19,700 करोड़ रुपये हो गया है। प्रोजेक्ट के इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी लागत में भी करीब 50% की वृद्धि हुई है। यह अब 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो गई है। 2015 के अनुमान की तुलना में ट्रेन सिग्नलिंग सिस्टम पर होने वाला खर्च भी करीब 100% बढ़ गया है। मौजूदा अनुमान के अनुसार, भविष्य में आने वाली जापानी ट्रेनों की लागत को छोड़कर पूरे प्रोजेक्ट पर करीब 399 करोड़ रुपये प्रति किलोमीटर खर्च आ रहा है।

508 किलोमीटर लंबा है मुंबई-अहमदाबाद कॉरिडोर

मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर की कुल लंबाई 508 किलोमीटर है। इस पर शुरुआत में B28 हाई-स्पीड ट्रेनें चलाई जाएंगी। कॉरिडोर को दिसंबर 2030 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इस प्रोजेक्ट के पूरा होने के बाद मुंबई और अहमदाबाद के बीच हाई-स्पीड रेल सेवा शुरू होगी। भारत में पहली बार इस तरह की हाई-स्पीड बुलेट ट्रेन सेवा का संचालन होगा।

भारत की हाई-स्पीड रेल योजना में अब दो चरण

पूरे प्लान को आसान भाषा में समझें तो भारत की योजना दो स्तरों पर आगे बढ़ रही है। इससे भारत का लक्ष्य सिर्फ हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर बनाने तक सीमित नहीं रहेगा। बल्कि भविष्य में हाई-स्पीड ट्रेन और उसके कंट्रोल सिस्टम को देश में ही विकसित करने की दिशा में भी आगे बढ़ेगा।

  • पहला चरण: मुंबई-अहमदाबाद कॉरिडोर के लिए B28 ट्रेनों का स्वदेशी निर्माण और संचालन होगा।
  • दूसरा चरण: इसी अनुभव और तकनीकी क्षमता के आधार पर 2030 तक 350 किमी प्रति घंटे की डिजाइन स्पीड वाली B35 स्वदेशी हाई-स्पीड ट्रेन को विकसित करना है।

फिलहाल, BEML और इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF) मिलकर B28 बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। इसे 280 kmph तक की रफ्तार के लिए डिजाइन किया गया है। इसका प्रोटोटाइप अगले साल की शुरुआत तक पूरा होने की उम्मीद है। अगस्त 2027 तक मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर के एक हिस्से पर इसका ऑपरेशन शुरू होने की योजना है।

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भारत में एक दशक का सबसे असमान मानसून! CRISIL ने चेताया- फसलों की पैदावार, रबी बुआई पर भी खतरा

देश में इस साल मानसून की असमान चाल ने कृषि क्षेत्र और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सामने बड़ी चिंता खड़ी कर दी है। हमारी सहयोगी सीएनबीसी टीवी 18 की एक रिपोर्ट में रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की ताजा रिपोर्ट के हवाले से बताया गया है कि 2026 में भारत को पिछले एक दशक के सबसे अधिक असमान और विषमतापूर्ण मानसून का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि मानसूनी बारिश में 14 प्रतिशत की कमी के बावजूद किसानों ने बुआई का रकबा घटने नहीं दिया लेकिन अब असली खतरा फसलों की पैदावार और आगामी रबी (सर्दियों की) फसल की बुआई पर मंडरा रहा है।

10 साल में सबसे असमान मानसून: बारिश में 14% की भारी कमी

क्रिसिल के रेनफॉल्स डिस्टॉर्शन इंडेक्स (RDI) के मुताबिक इस साल यह इंडेक्स 14.4 पर पहुंच गया है। ये बीते 10 वर्षों में मानसून की सबसे असमान चाल की ओर इशारा कर रहा है। 7 सितंबर तक देश में सामान्य के मुकाबले बारिश की कमी 14 प्रतिशत दर्ज की गई है। इसके अलावा सितंबर महीने में भी सामान्य से कम बारिश रहने का अनुमान है।

देश के प्रमुख कृषि क्षेत्रों में बारिश की असमानता बेहद गंभीर रही है। दक्षिण प्रायद्वीप में सामान्य से 27 प्रतिशत कम बारिश हुई है। इसी तरह पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में सामान्य से 24 प्रतिशत कम बारिश देखने को मिली है।

बुआई का रकबा तो बच गया पर कैसे?

रिपोर्ट के मुताबिक, बारिश की भारी कमी और देरी के बावजूद किसानों ने स्थानीय परिस्थितियों, रुक-रुक कर हुई बारिश और राज्य सरकारों की सलाह के मुताबिक अपनी बुआई योजनाओं में बदलाव किया है। 4 सितंबर तक कुल बुआई का स्तर सामान्य रकबे के 98 प्रतिशत और पिछले साल के स्तर के 96 प्रतिशत पर पहुंच गया है। चावल, तुअर (अरहर), मक्का, मूंगफली और गन्ना की बुआई सामान्य स्तर को पार कर चुकी है। कपास (कॉटन), बाजरा, ज्वार, मूंग, उड़द और सोयाबीन की बुआई का प्रदर्शन अभी भी कमजोर बना हुआ है।

जून के महीने में मूंगफली की बुआई पिछले साल से 42 प्रतिशत पीछे चल रही थी। लेकिन जुलाई और अगस्त में गुजरात में बारिश की स्थिति में हुए सुधार से इसका रकबा सुधरा और अंततः पिछले साल के आंकड़े को पार कर गया।

अब असली खतरा: फसलों की पैदावार पर संकट

क्रिसिल का कहना है कि फिलहाल कमजोर बारिश से पैदा होने वाले कृषि संकट की पहली कड़ी यानी कम बुआई तो टल गई है लेकिन अब सारा खतरा फसलों की पैदावार पर आ गया है। सीमित सिंचाई सुविधाओं वाली फसलें बारिश न होने पर सबसे ज्यादा प्रभावित होती हैं। क्रिसिल के डेफिसिएंट रेनफॉल इम्पैक्ट पैरामीटर (DRIP) ने कपास, बाजरा, मक्का, तुअर, मूंगफली और सोयाबीन में बड़े जोखिम की ओर इशारा किया है।

इसे गुजरात की ही उदाहरण से समझा जा सकता है। यहां मूंगफली की बुआई तो अच्छी हुई है लेकिन 2024-25 के आंकड़ों के मुताबिक इसके कुल कृषि क्षेत्र का केवल 49.3 प्रतिशत हिस्सा ही सिंचित है। अगस्त के अंत और सितंबर में बारिश सुस्त पड़ने से इस फसल की पैदावार पर असर पड़ सकता है। क्रिसिल के मुताबिक खरीफ फसलों से होने वाली किसानों की आय पर मध्यम असर पड़ेगा। हालांकि ग्रामीण मांग पर इसका तुरंत बड़ा झटका लगने की संभावना कम है।

क्या झटके को झेल पाएगी ग्रामीण अर्थव्यवस्था?

रिपोर्ट के मुताबिक बीते वर्षों की तुलना में ग्रामीण भारत की स्थिति अब अधिक मजबूत हुई है। ग्रामीण परिवार अब सिर्फ फसल की आय पर निर्भर नहीं हैं। पशुपालन, मत्स्य पालन और वानिकी अब कृषि व संबद्ध क्षेत्र के कुल उत्पादन में 40 प्रतिशत से अधिक का योगदान देते हैं। शुद्ध बोए गए क्षेत्र में सिंचाई का दायरा 2015-16 के 48.8 प्रतिशत के स्तर से बढ़कर 2024-25 में करीब 60 फीसदी हो गया है।

पिछले 4 वर्षों का बेहतर मानसून, अच्छा उत्पादन, कम महंगाई और सरकारी सहायता योजनाओं से ग्रामीणों की वित्तीय स्थिति सुधरी है। पीएम-किसानके तहत मिलने वाले 6000 रुपये, 17 राज्यों में जारी कैश-ट्रांसफर योजनाएं और खाद्यान्न सहायता इस दबाव को कम करने में मदद करेंगे।

रबी की फसल के लिए सबसे बड़ी चिंता क्यों?

दक्षिण-पश्चिम मानसून न सिर्फ खरीफ की फसल तय करता है, बल्कि यह मिट्टी की नमी, भूजल स्तर और जलाशयों को भरता है जो रबी (गेहूं, सरसों आदि) की बुआई के लिए बेहद जरूरी हैं। अब इससे जुड़े शुरुआती आंकड़े चिंता को और बढ़ा रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 7 सितंबर तक देश के करीब 45 फीसदी जिलों में बारिश की कमी दर्ज की गई है जबकि पिछले चार सालों में यह आंकड़ा 20-30 फीसदी के बीच था। अगस्त 1901 के बाद से इस साल का अगस्त महीना सबसे गर्म दर्ज किया गया और आईएमडी ने सितंबर में भी सामान्य से अधिक तापमान रहने का अनुमान जताया है।

आईआईटी गांधीनगर के कंबाइंड ड्रॉट इंडेक्स के मुताबिक देश में सूखा प्रभावित क्षेत्र जुलाई के अंत में 35.1 प्रतिशत से बढ़कर 2 सितंबर तक 42 प्रतिशत पर पहुंच गया है। 3 सितंबर तक देश के 178 प्रमुख जलाशयों में पानी का भंडारण लॉन्ग-पीरियड एवरेज से 3 फीसदी और पिछले साल के मुकाबले 18 फीसदी कम था। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, राजस्थान और कर्नाटक जैसे प्रमुख रबी उत्पादक राज्यों में जलाशयों का स्तर विशेष रूप से कम है।

सितंबर महीना तय करेगा दिशा

रबी की फसल देश के कुल खाद्यान्न उत्पादन का लगभग आधा हिस्सा होती है। इसमें अकेले गेहूं का योगदान रबी उत्पादन में करीब 70 फीसदी है। क्रिसिल ने चेतावनी दी है कि अगर सितंबर में भी बारिश की कमी बनी रहती है और मौसम की यह विषमता सर्दियों के मौसम में फैलती है तो इसका दबाव ग्रामीण मांग, खाद्य पदार्थों की कीमतों और देश की कुल कृषि विकास दर पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे सकता है।

Weather Update: यूपी, बिहार, झारखंड समेत इन राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट, दिल्ली-मुंबई में भी बरेसेंगे बादल, IMD ने जारी किया अपडेट

Weather Update: मंगलवार, 1 सितंबर को देश के कई हिस्सों में मानसून सक्रिय बना हुआ है। ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़, बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में भारी से बहुत भारी बारिश होने की संभावना है। वहीं, मुंबई और कोलकाता में भी बारिश हो सकती है, जबकि दिल्ली में दोपहर और शाम के समय हल्की बारिश के साथ गरज-चमक होने की संभावना है।

मौसम विभाग के मुताबिक, अगस्त महीने में देश में औसत से 16 फीसदी कम बारिश हुई।

दिल्ली, मुंबई और कोलकाता में बारिश का दिन

दिल्ली में आसमान में आंशिक रूप से बादल छाए रहने और दोपहर व शाम के समय कई जगहों पर हल्की बारिश के साथ आंधी-तूफान और बिजली कड़कने की संभावना है। रात में तापमान 25°C से 27°C और दिन में 34°C से 36°C के बीच रहने का अनुमान है।

आने वाले दिनों में भी दिल्ली में बारिश जारी रह सकती है। IMD ने 3 से 5 सितंबर के बीच दिल्ली और पड़ोसी राज्यों हरियाणा और पंजाब में व्यापक बारिश का अनुमान लगाया है।

मुंबई में भी बारिश जारी रहने की संभावना है, क्योंकि कोंकण और गोवा क्षेत्र में 6 सितंबर तक व्यापक बारिश का अनुमान है। IMD को उम्मीद है कि मंगलवार को भी इस क्षेत्र में बारिश जारी रहेगी। हालांकि, बुलेटिन में मुंबई के लिए अलग से कोई खास अनुमान नहीं दिया गया है।

वहीं, कोलकाता और गंगा के मैदानी इलाकों वाले पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में मंगलवार को भारी बारिश हो सकती है। IMD ने 31 अगस्त और 1 सितंबर को गंगा के मैदानी इलाकों वाले पश्चिम बंगाल में भारी बारिश और क्षेत्र के कुछ हिस्सों में तेज हवाएं चलने का भी अनुमान लगाया है।

देश के बाकी हिस्सों का मौसम

मंगलवार को भुवनेश्वर और ओडिशा के दूसरे इलाकों में भारी बारिश का सबसे ज्यादा खतरा है। IMD ने ओडिशा में कहीं-कहीं भारी से बहुत भारी बारिश का अनुमान लगाया है। बता दें कि जैसे-जैसे मौसम का सिस्टम जमीन की ओर बढ़ेगा, राज्य में कहीं-कहीं बहुत ज्यादा भारी बारिश भी हो सकती है।

हैदराबाद और तेलंगाना के दूसरे हिस्सों में छिटपुट बारिश हो सकती है, साथ ही आंधी-तूफान, बिजली कड़कने और तेज हवाएं चलने की भी संभावना है। हवा की रफ्तार 30-40 किमी/घंटा हो सकती है और झोंके 50 किमी/घंटा तक पहुंच सकते हैं।

मंगलवार को बेंगलुरु में छिटपुट बारिश होने की संभावना है, क्योंकि दक्षिण आंतरिक कर्नाटक में आम तौर पर हल्की लेकिन लगातार बारिश का दौर जारी है।

चेन्नई और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में 2 सितंबर तक छिटपुट बारिश हो सकती है, साथ ही आंधी-तूफान, बिजली कड़कने और तेज हवाएं चलने की भी संभावना है। हवा की रफ्तार 40-50 किमी/घंटा तक पहुंच सकती है और कुछ इलाकों में हवा के झोंके और भी तेज हो सकते हैं।

मध्य और पूर्वी भारत में भारी बारिश का दायरा बढ़ा

मंगलवार को सबसे ज्यादा चिंता ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश को लेकर है। IMD ने इन इलाकों में भारी से बहुत भारी बारिश की चेतावनी दी है, जबकि पूर्वी मध्य प्रदेश में 5 सितंबर तक बारिश जारी रहने की संभावना है। वहीं, छत्तीसगढ़ पर खास तौर पर ज्यादा खतरा है, क्योंकि वहां 1 सितंबर को कहीं-कहीं बहुत ज्यादा बारिश होने का अनुमान है।

भारी बारिश के कारण कई जगहों पर जलभराव हो सकता है, निचले इलाकों में बाढ़ आ सकती है और संवेदनशील जगहों पर सड़क व रेल यातायात में रुकावट आ सकती है। IMD ने अगले 24 घंटों में छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड और गंगा के मैदानी इलाकों वाले पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में अचानक बाढ़ (flash floods) का कम से मध्यम खतरा भी बताया है।

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El Nino: मजबूत अल नीनो का असर, जुलाई में राहत के बाद फिर गहराया सूखा संकट! 14% की गिरावट के साथ सितंबर में भी कम बारिश का अलर्ट

भारत में इस साल का मॉनसून अब कमजोर पड़ता नजर आ रहा है। मौसम विभाग (IMD) के मुताबिक, मॉनसून सीजन के आखिरी महीने सितंबर में देश के ज्यादातर हिस्सों में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है। मॉनसून के दौरान बारिश की कमी पहले ही चिंता का कारण बनी हुई है। 1 जून से 31 अगस्त तक देश में सामान्य के मुकाबले 14 फीसदी कम बारिश हुई है। अब सितंबर में भी कम बारिश का अनुमान है, ऐसे में पूरे मॉनसून सीजन में बारिश की कमी और बढ़ सकती है। मौसम विभाग ने इस दौरान अल नीनो के असर की संभावना भी जताई थी, जिसे मॉनसून की बारिश को प्रभावित करने वाली अहम वजहों में से एक माना जाता है।

जून से सितंबर तक चलने वाले चार महीने के मॉनसून में सितंबर का महीना काफी अहम माना जाता है, लेकिन इस बार कम बारिश का अनुमान किसानों और जल संसाधनों को लेकर चिंता बढ़ा सकता है। हालांकि, बारिश का असर अलग-अलग राज्यों और इलाकों में अलग रह सकता है।

1901 के बाद दूसरा सबसे गर्म रहा अगस्त

अगस्त के दौरान देश के कई क्षेत्रों में गर्मी का असर काफी ज्यादा देखने को मिला। अगस्त में देश के कई हिस्सों में तापमान ने पुराने रिकॉर्ड के करीब पहुंचकर चिंता बढ़ाई। दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत में यह महीना 1901 के बाद दूसरा सबसे गर्म अगस्त रहा। वहीं, पूर्वी और पूर्वोत्तर इलाकों में अगस्त तीसरा सबसे गर्म रहा। उत्तर-पश्चिम भारत में भी तापमान काफी ज्यादा रहा और यहां 126 साल के रिकॉर्ड में पांचवां सबसे गर्म अगस्त दर्ज किया गया। इससे साफ है कि इस साल अगस्त में देश के अलग-अलग हिस्सों में गर्मी का असर काफी ज्यादा रहा।

सितंबर में कब होगी बारिश

IMD चीफ मृत्युंजय महापात्रा ने कहा, “देश के कई हिस्सों में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है। हालांकि, उत्तर-पश्चिम, उत्तर-पूर्व, पूर्व, पूर्व-मध्य और दक्षिण-पूर्वी प्रायद्वीपीय भारत के कुछ इलाकों में सामान्य से ज्यादा बारिश हो सकती है।” उन्होंने कहा कि फिलहाल भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में “मजबूत अल नीनो की स्थिति” बनी हुई है, जिसके चलते मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक है। महापात्रा ने कहा, “आने वाले महीनों में इन स्थितियों के और मजबूत होने की संभावना है।” उन्होंने संकेत दिया कि इसका सितंबर की बारिश पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।

IOD की स्थिति नॉर्मल

अल नीनो की स्थिति को आमतौर पर भारत में कमजोर मॉनसून और ज्यादा गर्मी से जोड़कर देखा जाता है। वहीं, हिंद महासागर में फिलहाल इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) की स्थिति सामान्य है और इसके सितंबर तक ऐसी ही रहने की संभावना है। सकारात्मक IOD मॉनसून को मजबूत करने और बारिश बढ़ाने में मदद कर सकता है, लेकिन मौजूदा समय में ऐसी स्थिति नहीं है। ऐसे में मॉनसून को हिंद महासागर से बारिश बढ़ाने के लिए कोई खास मदद मिलने की उम्मीद नहीं है।

बारिश का रिकॉर्ड

इस साल मॉनसून की बारिश का असर देशभर में एक जैसा नहीं रहा। मौसम विभाग के मुताबिक, जून में बारिश की कमी 35% तक पहुंच गई थी। मॉनसून बारिश के वितरण का आकलन किए गए कुल 741 जिलों में से 312 जिलों (42%) में 31 अगस्त तक सामान्य से कम बारिश हुई, जबकि 38 जिलों (5%) में बहुत कम बारिश दर्ज की गई।

फसलों पर पड़ेगा असर

सितंबर में अगर बारिश उम्मीद के मुताबिक नहीं हुई तो इसका सीधा असर किसानों और खरीफ फसलों पर पड़ सकता है। भले ही ज्यादातर खरीफ फसलों की बुवाई लगभग पूरी हो चुकी है, लेकिन इस साल फसल का कुल रकबा पिछले साल के मुकाबले करीब 2 फीसदी कम है। ऐसे में बारिश की कमी किसानों की मुश्किलें और बढ़ा सकती है। खेतों में नमी बनाए रखने के लिए उन्हें सिंचाई का सहारा लेना पड़ सकता है, जिससे डीजल, बिजली और पानी पर खर्च बढ़ेगा और खेती की लागत पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।

Bihar Flood Risk: नेपाल में आई बाढ़ से बिहार में हाई अलर्ट, जानें- क्यों रखी जा रही है बारीकी से नजर

Bihar Flood Risk: उत्तरी नेपाल के रसुवा जिले में अचानक आई जबरदस्त बाढ़ के कारण बिहार में खास सतर्कता बरती जा रही है, क्योंकि नेपाल में गंडक नदी के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में अचानक बाढ़ की स्थिति बन गई है और पानी के बहाव में अचानक तेजी आने की आशंका है। हालांकि, अभी तक बाढ़ के सटीक कारण का पता नहीं चल पाया है, लेकिन पिछले साल इसी नदी में आई ऐसी ही अचानक बाढ़ का कारण बाद में एक ग्लेशियर झील का पानी निकलना बताया गया था।

नेपाल पर्यटन बोर्ड को ताजा जानकारी के अनुसार, नेपाल के नुवाकोट और धाडिंग जिलों में भोटे कोशी नदी में अचानक आई बाढ़ के बाद कम से कम 105 भारतीय लापता हैं।

बता दें कि बुधवार को नेपाल में आई जबरदस्त बाढ़ में कम से कम 8 लोगों की मौत हो गई। वहीं, चीन के सरकारी मीडिया ने बताया कि दोनों देशों की सीमा पर चीन की तरफ तिब्बत के एक व्यापारिक केंद्र पर मडस्लाइड (कीचड़ और मलबे का बहाव) हुआ, जिसकी चपेट में आने से “काफ़ी लोग हताहत” हुए हैं।

बिहार में क्यों बढ़ाई गई निगरानी?

नेपाल में बाढ़ के हालात को देखते हुए बिहार के अधिकारियों ने गंडक नदी में पानी का स्तर बढ़ने की आशंका के चलते हाई अलर्ट जारी किया है।

बिहार प्रशासन ने पश्चिमी चंपारण के बगहा इलाके, खासकर वाल्मीकिनगर बैराज के आसपास निगरानी बढ़ा दी है। उन्हें चिंता है कि नेपाल से बहकर आने वाला अतिरिक्त पानी दो से तीन घंटे में गंडक नदी तक पहुंच सकता है।

गंडक नदी के किनारे और निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को भी सावधानी बरतने और प्रशासन के निर्देशों का पालन करने की सलाह दी गई है।

बता दें कि भोटे कोशी नदी तिब्बत से निकलती है और नेपाल की त्रिशूली नदी में मिलती है, जो आगे चलकर भारत में गंडक नदी के रूप में प्रवेश करती है।

न्यूज एजेंसी ANI ने बिहार में आपदा प्रबंधन अधिकारियों के हवाले से बताया कि गंडक नदी के किनारे बसे जिलों में बाढ़ की संभावित स्थिति से निपटने के लिए सभी जरूरी तैयारियां की जा रही हैं।

ANI ने अधिकारियों के हवाले से बताया, “नेपाल के रसुवा, नुवाकोट, धाडिंग, गोरखा, लमजुंग और तनहुं जिलों (गंडक कैचमेंट एरिया) और दोलखा और सिंधुपालचोक जिलों (कोसी कैचमेंट एरिया) में अचानक बाढ़ (फ्लैश फ्लड) का ज्यादा खतरा होने का अनुमान है।”

फरक्का बैराज क्यों एक नया विवाद का मुद्दा बन गया है?

जैसे-जैसे गंगा का जलस्तर बढ़ रहा है और राज्य में बाढ़ का खतरा गहराता जा रहा है, बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने पश्चिम बंगाल के अपने समकक्ष सुवेंदु अधिकारी से फरक्का बैराज के सभी गेट खोलने का आग्रह किया है। उनका तर्क है कि बहाव बढ़ने से पूर्वी राज्य में बाढ़ का दबाव कम करने में मदद मिल सकती है।

यह अनुरोध ऐसे समय में आया है जब 1996 की भारत-बांग्लादेश गंगा जल बंटवारा संधि—जो फरक्का में नदी के कम बहाव वाले मौसम में पानी के बंटवारे को नियंत्रित करती है—इस साल दिसंबर में अपनी 30 साल की अवधि पूरी करने के बाद समाप्त होने वाली है। पटना लगातार इस बात पर जोर दे रहा है कि बांग्लादेश के साथ भविष्य में पानी के बंटवारे की किसी भी व्यवस्था में उसके हितों का ध्यान रखा जाए।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने राज्य को आश्वासन दिया है कि नवीनीकरण प्रक्रिया के दौरान फरक्का बैराज और भारत-बांग्लादेश जल बंटवारा संधि को लेकर उसकी चिंताओं पर विचार किया जाएगा।

पटना की सबसे बड़ी चिंता क्या है?

हालांकि, अभी सबसे बड़ी चिंता गंगा नदी के जलस्तर का बढ़ना है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस साल राज्य में सामान्य से कम बारिश होने के बावजूद, पटना और बक्सर समेत बिहार के कुछ हिस्सों में नदी का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर चला गया है।

पटना के लिए अभी जरूरी है कि बैराज से और पानी छोड़ा जाए ताकि ऊपरी हिस्से (अपस्ट्रीम) का दबाव कम हो सके। हालांकि, बैराज से जुड़ा कोई भी फैसला पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के साथ पानी के बंटवारे को लेकर भारत की प्रतिबद्धताओं पर भी असर डाल सकता है।

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इंदौर क्‍यों सूखा, बचे मानसून में भी बारिश की नहीं उम्‍मीद, कमजोर सिस्‍टम ने बिगाड़ा खेल, क्‍या कहते हैं मौसम वैज्ञानिक?

इंदौर क्‍यों सूखा, बचे मानसून में भी बारिश की नहीं उम्‍मीद, कमजोर सिस्‍टम ने बिगाड़ा खेल, क्‍या कहते हैं मौसम वैज्ञानिक?

Indore rain

मानसून आधे से ज्यादा बीत चुका है, लेकिन मध्यप्रदेश में कोटे की करीब 65 प्रतिशत ही बारिश रिकॉर्ड हुई है। इनमें भोपाल, शहडोल, रीवा और जबलपुर की तस्वीर बेहतर है, लेकिन इंदौर, उज्जैन और नर्मदापुरम में पानी कम गिरा है। इनमें भी इंदौर की हालत सबसे ज्‍यादा नाजुक है।

मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि मालवा के ऊपर सिस्‍टम इतना ताकतवर बन ही नहीं पा रहा है कि बारिश हो सके। उनका अनुमान है कि इंदौर में तो शेष मानसून में भी बारिश होने की उम्‍मीद नहीं है। इस बार इंदौर सूखा ही रहेगा।

इंदौर में सिर्फ 19 इंच बारिश : मौसम विभाग के अनुसार इंदौर जिले में इस सीजन में अब तक करीब 19.7 इंच पानी गिर चुका है, जो सामान्य औसत से थोड़ा कम है। जबकि इंदौर-उज्जैन संभाग में इस बार मानसून की रफ्तार थोड़ी धीमी रही है और अन्य जिलों (जैसे धार, झाबुआ, बड़वानी) में भी 15 से 20 इंच के बीच ही बारिश दर्ज की गई है। इंदौर में अब तक कुल 19.7 इंच बारिश रिकॉर्ड की गई है, जो कोटे की 58 प्रतिशत है। पिछले सप्ताह यहां तेज बारिश नहीं हुई। इस कारण सूखे जैसे हालात बन रहे हैं। संभाग में सबसे ज्यादा बुरहानपुर में 27.2 इंच बारिश हो चुकी है। यहां कोटे की 94 प्रतिशत बारिश हो चुकी है। आलीराजपुर में सबसे कम पानी गिरा है। अगले सप्ताह तेज बारिश होने के कम आसार है।

भोपाल के मौसम वैज्ञानिक जीडी मिश्रा ने बताया कि मालवा में सिस्‍टम इतना स्‍ट्रांग नहीं बन पा रहा है कि यहां बारिश हो सके। यह सिस्‍टम मालवा में असर नहीं दिखा पा रहा है। आगे भी इंदौर, मालवा के कुछ हिस्‍सों समेत अलीराजपुर और धार जैसे जिलों में बारिश की कोई उम्‍मीद नहीं है। हालांकि मध्‍यप्रदेश में बारिश सामान्‍य है। बस मालवा के जिले कमजोर रहेंगे। यह सिर्फ इसलिए हो रहा है कि सिस्‍टम इतना ताकतवर बन ही नहीं पा रहा है।

एमपी के कम ज्‍यादा बारिश वाले जिले : मध्‍यप्रदेश के पूर्वी हिस्से- जबलपुर, रीवा, सागर और शहडोल संभाग में 19% तक कम बारिश हुई है। बालाघाट, छतरपुर, छिंदवाड़ा, दमोह, जबलपुर, कटनी, मैहर, डिंडौरी, मंडला, मऊगंज, नरसिंहपुर, निवाड़ी, पांढुर्णा, पन्ना, रीवा, सागर, सिवनी, टीकमगढ़ में 1% से 51% तक कम बारिश हुई है।

आगर- मालवा की स्‍थिति : वहीं, पश्चिमी हिस्से के आगर-मालवा, आलीराजपुर, अशोकनगर, बैतूल, दतिया, देवास, धार, हरदा, इंदौर, झाबुआ, मुरैना, मंदसौर, नर्मदापुरम, नीमच, रायसेन, रतलाम, सीहोर, शाजापुर, श्योपुर, शिवपुरी, उज्जैन और विदिशा में औसत से 2% से 47% कम पानी गिरा है।

इन 15 जिलों में ज्यादा बारिश : IMD की माने तो अनूपपुर, सतना, शहडोल, सीधी, सिंगरौली, उमरिया, बड़वानी, भिंड, भोपाल, बुरहानपुर, गुना, ग्वालियर, खंडवा, खरगोन और राजगढ़ में ही औसत से ज्यादा बारिश दर्ज की गई।

सितंबर पर टिकी बारिश की आस : मौसम चक्र के अनुसार इंदौर के लिए अगस्त और सितंबर के महीने सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं, क्योंकि वर्षा का मुख्य कोटा इन्हीं दो महीनों में पूरा होता है। सामान्य परिस्थितियों में अगस्त के दौरान 10 से 11 इंच बारिश दर्ज की जाती है और इस दौरान लगभग 12 से 13 दिन वर्षा वाले होते हैं। इस आधार पर देखा जाए तो अगस्त में हुई बारिश औसत से काफी कम है। अब ऐसे में सितंबर महीने से लोग उम्‍मीद कर रहे हैं, हालांकि मौसम वैज्ञानिक जीडी मिश्रा का कहना है कि आगे भी इंदौर और मालवा के कुछ क्षेत्रों में बारिश की संभावना नहीं है। अब बचे मानसून में करीब 20 इंच से अधिक बारिश की सख्त जरूरत है। यदि आने वाले दिनों में मूसलाधार बारिश का दौर शुरू नहीं होता है, तो वर्षा के निर्धारित लक्ष्य तक पहुंचना मुश्किल साबित हो सकता है।

El Nino Impact: 2 दशकों में सबसे कमजोर मानसून का खतरा! अल नीनो ने बढ़ाई चिंता, जानिए अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर

El Nino Impact: भारत में इस साल करीब दो दशकों का सबसे कमजोर मानसून रह सकता है। मौसम विभाग के दो वरिष्ठ सूत्रों के मुताबिक, इस साल मानसून सीजन खत्म होने तक बारिश लंबी अवधि के औसत से करीब 15 फीसदी कम रहने का अनुमान है। अगर ऐसा होता है तो 2009 के बाद यह सबसे कम बारिश वाला मानसून होगा।

वहीं, कमजोर मानसून का सीधा असर देश की खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। फसलों की पैदावार घट सकती है, खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ सकते हैं और गांवों में लोगों की आमदनी पर भी दबाव पड़ सकता है। बता दें कि भारत में सालभर होने वाली कुल बारिश का करीब 70 फीसदी हिस्सा मानसून से ही मिलता है, इसलिए अच्छी बारिश खेती के लिए बेहद जरूरी है।

कपास-सोयाबीन की पैदावार पर पड़ेगा असर

अब अगर सितंबर के महत्वपूर्ण महीने में अच्छी बारिश नहीं हुई तो कपास, सोयाबीन, मक्का और दालों जैसी ग्रीष्म ऋतु में बोई जाने वाली फसलों की पैदावार कम हो सकती है, साथ ही गेहूं और रेपसीड जैसी शीतकालीन ऋतु में बोई जाने वाली फसलों के लिए आवश्यक मिट्टी की नमी भी कम हो सकती है।

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “हम मानसून की बारिश पर अल नीनो का प्रभाव देख रहे हैं। सितंबर में यह प्रभाव गंभीर होने की संभावना है और बारिश में दो अंकों की कमी देखने को मिल सकती है।”

उन्होंने कहा कि जून-सितंबर के मौसम में भारत में औसत से 15% कम, यानी सामान्य से 85% कम बारिश हो सकती है, जो 2009 के बाद सबसे कम बारिश होगी। यह मौसम विभाग के शुरुआती पूर्वानुमान में अनुमानित 8% की कमी से लगभग दोगुनी होगी।

उन्होंने आगे कहा कि कुछ पूर्वी राज्यों को छोड़कर, देश के अधिकांश हिस्सों में सितंबर में औसत से कम बारिश होने की संभावना है, जिससे मौसमी कमी और बढ़ जाएगी।

हालांकि, IMD इस महीने के अंत तक सितंबर की बारिश को लेकर अपना आधिकारिक पूर्वानुमान जारी कर सकता है।

समय से पहले लौट सकता है मानसून

मौसम विभाग के एक अन्य सूत्र ने आधिकारिक नियमों के अनुसार नाम न बताने की शर्त पर कहा कि यदि कोई नई मौसम प्रणाली विकसित नहीं होती है, तो इस साल मानसून अगले महीने देश के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों से सामान्य से कुछ दिन पहले ही लौटना शुरू कर सकता है।

गौरतलब है कि आमतौर पर मानसून जून में दस्तक देता है और 17 सितंबर के आसपास उत्तर-पश्चिमी हिस्सों से वापस लौटना शुरू करता है। इसके बाद अक्टूबर के मध्य तक पूरे देश से मानसून की विदाई हो जाती है।

उन्होंने बताया कि अल नीनो मजबूत हो रहा है और सितंबर में इसके और तीव्र होने की संभावना है, जिससे भारत में वर्षा कम हो सकती है।

अल नीनो क्या है?

अल नीनो एक जलवायु पैटर्न है जिसमें मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान असामान्य रूप से गर्म रहता है। यह वैश्विक मौसम पैटर्न को बाधित करता है और दक्षिण-पूर्व एशिया और अन्य क्षेत्रों में शुष्क परिस्थितियां ला सकता है।

पिछले वर्षों में भारत में अल नीनो वाले ज्यादातर सालों में सामान्य से कम बारिश हुई है। कई बार स्थिति इतनी गंभीर रही कि सूखे की वजह से फसलें बर्बाद हो गईं और सरकार को कुछ अनाज के निर्यात पर रोक या प्रतिबंध लगाने जैसे कदम उठाने पड़े।

इस साल भी मानसून की शुरुआत से अब तक भारत में सामान्य से 13 फीसदी कम बारिश हुई है। 1 जून से शुरू हुए मानसून सीजन में जून में बारिश 35.4 फीसदी कम रही। इसके बाद जुलाई में बारिश सामान्य से 1 फीसदी ज्यादा हुई, जिससे थोड़ी राहत मिली। हालांकि अगस्त में मानसून एक बार फिर कमजोर पड़ गया और अब तक इस महीने में सामान्य से 15 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है।

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Monsoon 2026: भारत में मानसून पड़ा सुस्त और कर गया ड्राई फेज में एंटर! समझिए महंगाई से लेकर कहां-कहां पड़ेगा इसका असर

Monsoon 2026: देश में मानसून सीजन के दौरान अब बारिश की रफ्तार सुस्त पड़ती नजर आ रही है। इस वजह से भारत अब सामान्य से अधिक सूखे दौर का सामना कर रहा है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के पूर्वानुमान के मुताबिक कम से कम 2 सितंबर तक देश भर में औसतन सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है। हमारी सहयोगी वेबसाइट News18 की एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले शनिवार तक पूरे भारत में मानसूनी बारिश का घाटा लंबी अवधि के औसत (LPA) से 14 फीसदी नीचे दर्ज किया गया है। मानसूनी ट्रफ के मध्य भारत की ओर दक्षिण में जाने के बजाय हिमालय की तलहटी के करीब बने रहने की वजह से यह घाटा और अधिक बढ़ सकता है।

क्या होता है मानसूनी ट्रफ और क्यों बढ़ रही है चिंता?

मानसूनी ट्रफ कम दबाव का एक लंबा वायुमंडलीय क्षेत्र होता है जहां उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध की हवाएं आपस में मिलती हैं। यह नमी से भरी हवाओं को खींचता है और भारत के गंगा के मैदानी इलाकों में बारिश लाता है। इस साल यह ट्रफ पूरे उत्तर भारत में ठीक से फैलने की बजाय हिमालय के करीब ही बना हुआ है।

आईएमडी द्वारा 20 अगस्त को जारी एक्सटेंडेंट रेंज के पूर्वानुमान के मुताबिक हाल के हफ्तों में बोई गई फसलों को लेकर चिंता बढ़ गई है। मौसम कार्यालय ने कहा है कि नए मौसमी सिस्टम बनने के बावजूद पूर्वानुमान के दोनों हफ्तों के दौरान पूरे भारत में बारिश सामान्य से कम ही रहेगी।

देश के अलग-अलग हिस्सों में बारिश का गणित

हिमालयी क्षेत्र के साथ-साथ पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों में भारी से बहुत भारी बारिश होने की संभावना है। हालांकि आने वाले सप्ताह में प्रायद्वीपीय भारत में मानसूनी गतिविधियां कमजोर बनी रह सकती हैं। पश्चिम बंगाल-बांग्लादेश तट के पास उत्तर बंगाल की खाड़ी के ऊपर 24 घंटे के भीतर एक कम दबाव का क्षेत्र बनने की उम्मीद है। इससे 26 अगस्त तक ओडिशा और छत्तीसगढ़ में भारी से बहुत भारी बारिश हो सकती है। आमतौर पर जब ट्रफ दक्षिण की ओर बढ़ता है तो मध्य भारत में अगस्त की सबसे महत्वपूर्ण बारिश होती है, लेकिन इसके ऐसा न करने से प्रमुख कृषि क्षेत्रों में पानी की कमी हो सकती है।

स्काईमेट ने जताया सूखे का अंदेशा

निजी मौसम पूर्वानुमान एजेंसी स्काईमेट वेदर ने पिछले सोमवार को अपने मानसूनी पूर्वानुमान को काफी घटा दिया है। स्काईमेट ने अब मौसमी बारिश के एलपीए का 85 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है, जबकि अप्रैल में उसने इसे 94 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया था। स्काईमेट का कहना है कि देश में सूखे की 70 प्रतिशत अधिक संभावना दिख रही है।

एजेंसी ने चेतावनी दी है कि अगस्त के बाकी बचे दिनों में भारत के चार समरूप क्षेत्रों में बारिश का वितरण असमान रहेगा। इसके अलावा मजबूत होते अल नीनो और कमजोर इंडियन ओशन डिपोल की वजह से सितंबर में स्थिति और बिगड़ सकती है। आमतौर पर एक सकारात्मक इंडियन ओशन डिपोल अल नीनो के निगेटिव असर को कुछ हद तक बेअसर कर देता है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियां वैसा सपोर्ट नहीं दे रही हैं।

कहां कितना पहुंचा बारिश का घाटा?

बारिश की कमी का सबसे बड़ा असर पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत में देखने को मिल रहा है, जहां बारिश एलपीए से 26 प्रतिशत कम है। दक्षिण प्रायद्वीप में सामान्य से 23 प्रतिशत कम बारिश हुई है, जबकि उत्तर-पश्चिम भारत में यह घाटा 11 प्रतिशत दर्ज किया गया है। पूर्व में बने कम दबाव के सिस्टम्स की वजह से सुधार देखने के बाद सिर्फ मध्य भारत ही सामान्य स्तर के सबसे करीब है, जहां बारिश एलपीए से केवल 3 प्रतिशत कम है।

फसलों के नुकसान और महंगाई का खतरा

स्काईमेट द्वारा अपने अप्रैल के अनुमान में 9 प्रतिशत अंकों की कटौती हाल के वर्षों में मध्य-सीजन के दौरान की गई सबसे बड़ी कटौतियों में से एक है। आईएमडी ने भी अपने मौसमी अनुमान को घटाया है, हालांकि उसकी कटौती का दायरा छोटा है। आईएमडी ने अप्रैल में बारिश के एलपीए का 92 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया था जिसे जून में घटाकर 90 प्रतिशत कर दिया गया था।

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IMD ने उसके बाद से अपने पूर्वानुमान में संशोधन नहीं किया है। लेकिन वर्तमान में मौजूद 14 प्रतिशत का घाटा और सितंबर की शुरुआत तक कमजोर बारिश का जारी रहना इस अनुमान पर दबाव बना सकता है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि बारिश में और गिरावट आने से फूड इंफ्लेशन बढ़ सकती है, खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक आपूर्ति में रुकावटें पहले से ही कमोडिटी पर भारी असर डाल रही हैं।

weather update : कमजोर पड़ा मानसून, अगले 2 हफ्ते बारिश को तरसेंगे कई इलाके, IMD ने जताई बड़ी चिंता, बढ़ सकता है फसलों पर संकट

weather update : कमजोर पड़ा मानसून, अगले 2 हफ्ते बारिश को तरसेंगे कई इलाके, IMD ने जताई बड़ी चिंता, बढ़ सकता है फसलों पर संकट

भारत में मानसून अब उस समय कमजोर पड़ता नजर आ रहा है, जब इस मौसम में बारिश अपने चरम पर होनी चाहिए। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने अगले कम से कम दो सप्ताह यानी 2 सितंबर तक देशभर में सामान्य से कम बारिश होने का अनुमान जताया है। शनिवार तक देश में कुल बारिश लंबी अवधि के औसत से 14 फीसदी कम दर्ज की गई थी और आने वाले दिनों में यह कमी और बढ़ सकती है।

 

IMD के 20 अगस्त के विस्तारित अवधि पूर्वानुमान (Extended Range Forecast) के मुताबिक, मानसून ट्रफ के मध्य भारत की ओर बढ़ने के बजाय लगातार हिमालय की तलहटी के पास बने रहने की संभावना है। इसका सीधा असर देश के उन हिस्सों पर पड़ सकता है, जहां अगस्त में कृषि के लिए महत्वपूर्ण बारिश की जरूरत होती है।

 

हिमालय और पूर्वोत्तर में भारी बारिश, मध्य भारत में संकट

 

मौसम विभाग के अनुसार, अगले दोनों सप्ताह देशभर में बारिश सामान्य से कम रहने की संभावना है। हालांकि, हिमालयी क्षेत्र तथा पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों में भारी से बहुत भारी बारिश हो सकती है। वहीं, प्रायद्वीपीय भारत में अगले सप्ताह भी बारिश की स्थिति कमजोर रहने का अनुमान है।

 

अगले 24 घंटे में पश्चिम बंगाल-बांग्लादेश तट के पास उत्तरी बंगाल की खाड़ी में कम दबाव का क्षेत्र बनने की संभावना है। इसके प्रभाव से ओडिशा और छत्तीसगढ़ में 26 अगस्त तक भारी से बहुत भारी बारिश हो सकती है।

 

स्वतंत्र मौसम विशेषज्ञ नवदीप दहिया के मुताबिक, मानसून ट्रफ का हिमालयी क्षेत्र में केंद्रित रहना देश के बाकी हिस्सों में बारिश को प्रभावित करेगा। उनके अनुसार, ट्रफ के कम से कम एक सप्ताह तक हिमालय की तलहटी में बने रहने की संभावना है।

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मध्य भारत में बारिश की कमी बढ़ा सकती है कृषि की चिंता

 

मानसून ट्रफ का दक्षिण की ओर मध्य भारत में नहीं आना बड़ी चिंता का कारण है। अगस्त के दौरान मध्य भारत में यही ट्रफ आमतौर पर सबसे अधिक और कृषि के लिहाज से महत्वपूर्ण बारिश कराता है। ऐसे में जिन क्षेत्रों को बारिश की सबसे ज्यादा जरूरत है, वहां आने वाले दिनों में पर्याप्त बारिश नहीं होने का खतरा बढ़ गया है।

 

एक्सपर्ट्‍स के अनुसार मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान और गुजरात के वर्षा आधारित इलाकों में 2026 का मानसून अनियमित रहा है। वर्तमान में बारिश की कमी करीब 14 फीसदी है और अगस्त के बाकी दिनों में कमजोर बारिश के साथ यह घाटा 15 फीसदी से अधिक हो सकता है। अरहर (तूर), सोयाबीन और मक्का जैसी फसलों पर निगरानी और उपज के आकलन की जरूरत बताई है।  मानसून में आगे भी कमी रहने से आने वाले दिनों में खाद्य महंगाई बढ़ने का दबाव बन सकता है।

 

वैश्विक सप्लाई चेन की चुनौतियां भी स्थिति को और जटिल बना सकती हैं। रूस-यूक्रेन क्षेत्र से कार्गो आपूर्ति में बाधा के कारण लॉजिस्टिक्स संबंधी समस्याएं पहले से बनी हुई हैं। ऐसे में कमजोर मानसून के बीच सरकार के लिए मजबूत सप्लाई चेन बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा।

 

अल नीनो भी बढ़ा रहा चिंता

 

इस साल मानसून के कमजोर प्रदर्शन से जुड़ा अल नीनोभी लगातार मजबूत हो रहा है। ब्रिटेन के Met Office ने शुक्रवार को कहा कि यह घटना एक सदी से अधिक समय में सबसे शक्तिशाली अल नीनो बनने की दिशा में बढ़ रही है। प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 3 डिग्री सेल्सियस से अधिक ऊपर जाने का अनुमान है। इसका वैश्विक मौसम पर व्यापक असर पड़ सकता है और 2027 के दुनिया के सबसे गर्म वर्ष बनने की संभावना भी बढ़ सकती है।