कांग्रेस ने शुरू की आंदोलन की तैयारी

नई दिल्ली। कांग्रेस पार्टी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की मनमानी को लेकर ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में हुए खुलासे पर बड़ा आंदोलन करने की तैयार कर रही है। पार्टी इसे छोड़ने के मूड में नहीं है। तभी अगले तीन दिन तक लगातार राजनीतिक कार्यक्रम तय किए गए हैं। सोमवार, 28 सितंबर को कांग्रेस कार्यकर्ता जिला मुख्यालयों पर विरोध प्रदर्शन करेंगे। इसके अगले दिन मंगलवार, 29 सितंबर को कांग्रेस कार्य समिति की बैठक होगी और उसके अगले दिन 30 सितंबर को विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ ब्लॉक की बैठक होगी। अगर बीजद के प्रतिनिधि इसमें हिस्सा लेते हैं तो इसे विपक्ष की बैठक कहा जाएगा।

बहरहाल, कांग्रेस पार्टी इस मसले पर अपनी रणनीति बनाने के लिए 29 सितंबर को कार्य समिति यानी सीडब्लुसी की बैठक करेगी। सोनिया व राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा इसमें शामिल होंगे। इसमें विपक्षी गठबंधन की बैठक को लेकर भी बात होगी। अगले दिन ‘इंडिया’ ब्लॉक की बैठक होगी। लगभग सभी विपक्षी पार्टियों के नेता इसमें शामिल होंगे। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव खुद बैठक में नहीं पहुंच पाएंगे लेकिन उनकी पार्टी के नेता इसमें हिस्सा लेंगे।

बताया जा रहा है कि कांग्रेस और सपा के अलावा इस बैठक की पहल करने वाली ममता बनर्जी और लेफ्ट के नेता भी शामिल होंगे। इसमें डीएमके और आम आदमी पार्टी के भी शामिल होने की संभावना है। गौरतलब है कि पिछली बैठक में इन दोनों पार्टियों ने दूरी बनाई थी। बताया जा रहा है कि बीजू जनता दल को भी इसमें शामिल होने का न्योता भेजा गया है और कहा जा रहा है कि नवीन पटनायक का कोई प्रतिनिधि बैठक में शामिल हो सकता है। अगर बीजद का कोई नेता आता है तो इस बैठक को ‘इंडिया’ ब्लॉक की बजाय विपक्ष की बैठक नाम दिया जा सकता है।

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में गड़बड़ी और चुनाव आयोग के आंतरिक मतभेद की खबरों के बाद विपक्षी पार्टियां नए सिरे से एकजुट हो रही हैं। पश्चिम बंगाल में एक दूसरे के धुर विरोधी रहे तृणमूल कांग्रेस और सीपीएम के बीच बातचीत शुरू हो गई है। असल में सीपीएम के महासचिव एमए बेबी ने ‘इंडिया’ ब्लॉक के सभी नेताओं को पत्र लिखा और चुनाव आयोग के हालात पर विचार के लिए बैठक बुलाने की अपील की।

एमए बेबी की चिट्ठी के जवाब में ममता बनर्जी ने सीपीएम महासचिव को फोन कर दिया। कोई 30 साल के बाद ममता की उनसे बात हुई। ममता बनर्जी ने एमए बेबी को कहा कि पूरे विपक्ष को मिलकर ज्ञानेश कुमार के खिलाफ एक साझा रणनीति बनाने की जरूरत है। इसके बाद ही बैठक की तारीख तय की गई।

विपक्ष के जानकार नेताओं का कहना है कि गठबंधन की ओर से 2029 का लोकसभा का चुनाव पुरानी मतदाता सूची से ही कराने की मांग की जाएगी। यानी एसआईआर को रद्द करने की मांग की जा सकती है। इस बैठक में यह सवाल भी पूछा जा सकता है कि एसआईआर के बाद कितने बांग्लादेशी नागरिक पकड़े गए और कितनों को वापस बांग्लादेश भेजा गया? इस बीच कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने चुनौती दी है कि वे सोमवार को दिल्ली आ रहे हैं और सरकार में हिम्मत है तो उनको पकड़ कर दिखाए।

Mushtaq Khan Dies: वेटरन एक्टर मुश्ताक खान का हुआ निधन, असम सीएम, अनीस बज्मी समेत इन सितारों ने दी श्रद्धांजलि

Mushtaq Khan Dies: ‘वेलकम’ जैसी फिल्मों में सपोर्टिंग के लिए मशहूर वेटरन मुश्ताक खान का कैंसर से लंबी लड़ाई के बाद 75 साल की उम्र में निधन हो गया है। उनके निधन से फिल्म इंडस्ट्री में शोक की लहर है। दिवंगत एक्टर को बॉलीवुड दिग्गजों ने सोशल मीडिया पर याद कर श्रद्धांजलि दी है।

हिमंत बिस्वा सरमा

असम के मुख्यमंत्री ने भी X पर एक्टर को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने लिखा, “अपनी बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग से हमें हंसाने के लिए आपका शुक्रिया। मुश्ताक खान आपकी आत्मा को शांति मिले! उनके पूरे परिवार और सभी फैंस के प्रति मेरी संवेदनाएं।”

मैं सदमे में हूं…

फिल्ममेकर अनीस बज्मी ने एक्टर मुश्ताक खान को भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी है। मुश्ताक खान 2007 की सुपरहिट कॉमेडी फिल्म ‘वेलकम’ में ‘बालू’ के किरदार में नजर आए थे, जिसे दर्शकों ने बहुत पसंद किया था। दिवंगत एक्टर को याद करते हुए बज्मी ने मुश्ताक खान की एक तस्वीर शेयर की और लिखा, “मुश्ताक भाई (मेरे बालू) के गुजर जाने से मैं सदमे में हूं और मेरे पास शब्द नहीं हैं। वह सच में एक बेहतरीन कलाकार और नेक इंसान थे। अल्लाह उनकी आत्मा को शांति दे और उनके परिवार व चाहने वालों को हिम्मत दे।”

एक्टर संजय मिश्रा ने किया याद

ANI से बात करते हुए संजय मिश्रा ने कहा, “मेरी जिंदगी में एक समय ऐसा था जब वे मेरे लिए गार्जियन बन गए थे… जब भी मुझे जरूरत पड़ती थी, मैं उनसे सलाह लेता था… यह दुखद खबर है… वे बहुत अच्छे कलाकार थे, लेकिन उन्हें उतना क्रेडिट नहीं मिला।” संजय ने ‘वेलकम’ फिल्म में मुश्ताक के साथ काम करने का समय याद किया। संजय ने बताया, “वे बहुत बेहतरीन एक्टर और इंसान थे। मैंने उनके साथ ‘वेलकम’ में काम किया था… उन्होंने मुझे पूरा दुबई घुमाया था।”

राजपाल यादव

गुरुवार को राजपाल ने इंस्टाग्राम पर मुश्ताक की एक तस्वीर शेयर की। दुख जाहिर करते हुए एक्टर ने लिखा, “आज दोपहर मैं मुश्ताक भाई से मिलने गया, उनसे बात की। उन्होंने मुझे देखा, मुझसे हाथ मिलाया और हमारी सारी बातें सुन रहे थे और उन पर प्रतिक्रिया भी दे रहे थे। मुझे अभी भी यकीन नहीं हो रहा है कि जिस व्यक्ति से मैं दो घंटे पहले मिला था, जिससे मैंने हाथ मिलाया था, वह अब हमारे बीच नहीं है। हम सब ईश्वर के फैसले के आगे सिर झुकाते हैं। मुश्ताक भाई हमेशा एक लोकप्रिय व्यक्ति और एक्टर थे, हैं और रहेंगे। भारी मन से मैं उन्हें श्रद्धांजलि देता हूं।”

राजपाल ने उनकी मुलाकात का एक वीडियो भी शेयर किया था, लेकिन बाद में उसे हटा दिया और मुश्ताक को श्रद्धांजलि देते हुए उनकी एक तस्वीर अपलोड की। हालांकि बाद में एक सोशल मीडिया यूजर ने वह वीडियो ऑनलाइन शेयर कर दिया, जिसे राजपाल ने हटा दिया था। वीडियो में राजपाल अस्पताल में मुश्ताक से मिलते हुए दिखाई दे रहे हैं। दिवंगत एक्टर बिस्तर पर लेटे हुए और राजपाल का हाथ पकड़े हुए दिख रहे हैं। राजपाल उन्हें दिलासा देते और भरोसा दिलाते हुए सुनाई दे रहे हैं कि वे जल्द ही ठीक हो जाएंगे।

एक्टर रजा मुराद ने भी एक वीडियो मैसेज के जरिए मुश्ताक खान को श्रद्धांजलि दी और उनके निधन पर शोक व्यक्त किया। कॉमेडियन सुनील पाल ने भी अपनी इंस्टाग्राम स्टोरीज के जरिए मुश्ताक खान को याद किया और दिवंगत एक्टर को श्रद्धांजलि दी।

मुश्ताक खान ने 1980 में ‘अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है’ फिल्म से सिनेमा की दुनिया में कदम रखा और तीन दशकों से ज्यादा लंबे करियर बनाया। अपनी अलग-अलग तरह की भूमिकाओं के लिए मशहूर इस एक्टर ने कई हिंदी फिल्मों में काम किया, जिनमें ‘वेलकम’, ‘गदर एक प्रेम कथा’ और ‘हम हैं राही प्यार के’ जैसी फिल्में शामिल हैं।

‘वेलकम’ फिल्म में खान का कॉमेडी रोल और खासकर उनका मशहूर डायलॉग “मेरी एक टांग नकली है, मैं हॉकी का बहुत बड़ा प्लेयर हूं”, फिल्म के सबसे यादगार पलों में से एक है। उनकी कॉमेडी टाइमिंग और सहज अभिनय ने इस किरदार को दर्शकों के लिए यादगार बना दिया। खान का अंतिम संस्कार शुक्रवार को होगा।

DDU-GKY Success: सीवान के चंदन को सीधे मिली दुबई की नौकरी! इस ग्रामीण कौशल योजना ने बदली 12.35 लाख युवाओं की किस्मत

DDU-GKY Success: गांवों में आज भी कई परिवारों की कमाई खेती और फसल पर निर्भर करती है। लेकिन अगर फसल अच्छी न हो या खेती से कमाई कम हो जाए, तो परिवार के सामने आमदनी का दूसरा जरिया तलाशने की चुनौती खड़ी हो जाती है। ऐसे में किसी युवा के पास कोई काम की स्किल होना उसके लिए कमाई के नए रास्ते खोल सकता है। इसी सोच के साथ सरकार की दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना (DDU-GKY) ग्रामीण युवाओं को स्किल ट्रेनिंग देकर रोजगार के अवसरों से जोड़ने का काम करती है।

बता दें कि इस योजना की शुरुआत 25 सितंबर 2014 को राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) के तहत की गई थी। यह योजना ग्रामीण इलाकों के गरीब और कमजोर परिवारों के युवाओं पर ध्यान देती है। इस योजना के तहत युवाओं को ऐसी स्किल की ट्रेनिंग दी जाती है, जिससे उन्हें नौकरी पाने और लंबे समय तक रोजगार से जुड़े रहने में मदद मिल सके। इसमें 15 से 35 साल की उम्र के युवाओं को ट्रेनिंग दी जाती है और उन्हें रोजगार के अवसरों से जोड़ा जाता है।

वहीं, बदलते समय और रोजगार की जरूरतों को देखते हुए DDU-GKY में भी बदलाव किए गए हैं। अब योजना के नए DDU-GKY 2.0 फ्रेमवर्क में ऐसी ट्रेनिंग पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है, जिसकी जरूरत कंपनियों और इंडस्ट्री को है। इसका मकसद युवाओं को सिर्फ ट्रेनिंग देना नहीं, बल्कि उन्हें टिकाऊ रोजगार से जोड़ना है।

इसके तहत नौकरी मिलने के बाद भी युवाओं को मदद देने, नई स्किल सीखने और पहले से सीखी स्किल को बेहतर करने पर ध्यान दिया जा रहा है। ट्रेनिंग, असेसमेंट, सर्टिफिकेट, निगरानी और रोजगार की जानकारी रखने की पूरी प्रक्रिया को भी डिजिटल सिस्टम से जोड़ा गया है।

मकसद साफ है: ट्रेनिंग से नौकरी मिलनी चाहिए, और नौकरी लंबे समय तक चलनी चाहिए। जून 2026 तक, DDU-GKY के तहत 18.45 लाख ग्रामीण युवाओं को ट्रेनिंग दी गई है, जबकि 12.35 लाख लोगों को नौकरी मिली है।

इन आंकड़ों के पीछे उन लोगों की कहानियां भी हैं, जिनकी जिंदगी तब बदल गई जब सीखने-सिखाने की प्रक्रिया ने उनके लिए नौकरी और रोजी-रोटी के रास्ते खोल दिए।

सपने को जिंदा रखना

नागालैंड की विमेथानो सखरी ने सालों तक अपनी मां को दस लोगों के परिवार का पेट पालने के लिए दिन-रात मेहनत करते देखा। हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद, विमेथानो आगे की पढ़ाई करना चाहती थीं, लेकिन पैसों की तंगी के कारण उनका यह सपना पूरा करना मुश्किल हो रहा था।

जब उन्हें DDU-GKY के बारे में पता चला, तो सब कुछ बदल गया। अपने सपनों को छोड़ने से इनकार करते हुए, उन्होंने DDU-GKY के टूरिज्म और हॉस्पिटैलिटी ट्रेनिंग प्रोग्राम में दाखिला लिया। कुछ महीनों बाद, विमेथानो ने ‘द डेन बेंगलुरु’ में फूड एंड बेवरेज सर्विस में अपनी पहली नौकरी शुरू की। यह सिर्फ एक नौकरी नहीं थी। यह उनके और उनके परिवार के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत थी।

अपनी यात्रा को याद करते हुए विमेथानो कहती हैं, “मैं ग्रामीण विकास मंत्रालय और नागालैंड सरकार के NSRLM का शुक्रिया अदा करती हूं कि उन्होंने DDU-GKY को लागू किया, जिससे पूरे भारत में कई बेरोजगार युवाओं को मदद मिली है। यह मौका मेरे लिए एक वरदान था, और मुझे उम्मीद है कि और भी कई युवा इससे फायदा उठा सकेंगे, ठीक वैसे ही जैसे मैंने उठाया।”

विमेथानो के लिए, DDU-GKY ने बीच में छूटी हुई पढ़ाई को करियर के लिए एक लॉन्चपैड में बदल दिया।

लेकिन हर युवा की कहानी एक जैसी नहीं होती। चंदन शाह के लिए यह मौका उन्हें अपने घर से बहुत दूर ले गया।

छोटे-मोटे कामों से विदेश में करियर तक का सफर

एक समय ऐसा था जब चंदन शाह के परिवार के लिए बुनियादी जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल था। बिहार के सिवान जिले के तेतहली गांव में रहने के कारण, उन्हें अपनी पढ़ाई जारी रखने की बहुत कम उम्मीद थी। हाई स्कूल के बाद उन्होंने खेतों में अपने पिता की मदद करने के लिए स्कूल छोड़ दिया। आस-पास ज्यादा मौके न होने की वजह से, चंदन ने गुजारा करने के लिए छोटे-मोटे काम शुरू किए। फिर भी, उस काम से इतनी कमाई नहीं हो पाती थी कि एक अच्छा जीवन जी सकें।

उनकी मां, जो ‘गेंदा जीविका स्वयं सहायता समूह’ (Genda JEEViKA Self Help Group) की सदस्य थीं, की वजह से उनके लिए एक नया मौका सामने आया। उन्होंने चंदन को DDU-GKY के बारे में जानने और उसे आजमाने के लिए प्रोत्साहित किया। चंदन ने काउंसलिंग करवाई और असिस्टेंट इलेक्ट्रीशियन के तौर पर ट्रेनिंग लेने का फैसला किया। इस ट्रेनिंग ने उन्हें करियर की ओर पहला कदम बढ़ाने के लिए जरूरी हुनर ​​सिखाए। कोर्स पूरा करने के बाद, उन्हें बद्दी में एक डिस्टिलरी में हेल्पर की पहली नौकरी मिली, जहां वे हर महीने ₹10,500 कमाते थे। इस शुरुआती अनुभव ने उन्हें आगे पेशेवर तरक्की के लिए एक मजबूत आधार दिया। इन्हीं हुनर ​​और अनुभव के दम पर, चंदन ने बाद में विदेश में काम करने का मौका तलाशा और दुबई चले गए, जहां वे ‘अल शफा जनरल कॉन्ट्रैक्टिंग’ (Al Shafa General Contracting) में इलेक्ट्रीशियन के तौर पर शामिल हुए।

तब तक, उनकी महीने की कमाई बढ़कर ₹35,000 हो गई थी। इसका असर सिर्फ उनके करियर तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि इससे उनके परिवार को भी बेहतर आर्थिक सुरक्षा मिली। चंदन अपने परिवार का खर्च उठाने और अपने भाई-बहनों की प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाई का खर्च उठाने में सक्षम हो गए। उनके इस सफर ने उन्हें गांव के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बना दिया।

चंदन की कहानी दिखाती है कि कैसे नौकरी का पहला मौका लगातार तरक्की करने वाले करियर की नींव बन सकता है। DDU-GKY ने उन्हें वह पहला कदम उठाने के लिए जरूरी हुनर ​​सिखाया, जबकि उनके पक्के इरादे और अनुभव ने उन्हें आगे के मौकों को पाने में मदद की। इन सबके मेल से उन्हें अपने और अपने परिवार के लिए एक ज्यादा सुरक्षित भविष्य बनाने में मदद मिली।

हालांकि, DDU-GKY से जुड़ी हर कहानी घर से दूर जाने की नहीं है। कुछ युवाओं के लिए यह योजना उन्हें बेहतर अवसरों की तलाश में बाहर ले जाती है, तो कुछ के लिए यही मौका उन्हें अपने घर और गांव वापस लौटने का रास्ता देता है। ऐसी ही कहानी है रूपाली हांसदा की।

नौकरी को एक बिनेस में बदलना

आर्थिक तंगी के कारण असम के चराइदेव की रहने वाली रूपाली हासदा को 9वीं कक्षा के बाद स्कूल छोड़ना पड़ा। उनका परिवार खेती पर निर्भर था और उनके पिता ही घर में कमाने वाले अकेले व्यक्ति थे। उनकी मां, जो एक स्वयं-सहायता समूह (Self-Help Group) की सक्रिय सदस्य थीं, ने उनके सपनों को हमेशा बढ़ावा दिया। रूपाली को एक ‘जीविका सखी’ के जरिए DDU-GKY के बारे में पता चला और दिसंबर 2022 में उन्होंने ‘सिलाई मशीन ऑपरेटर’ ट्रेड में दाखिला लिया।

ट्रेनिंग पूरी करने के बाद, उन्हें तमिलनाडु के तिरुपुर में KPR अपैरल मिल्स में नौकरी मिल गई। 5 महीने तक उन्होंने एक अनजान शहर में काम किया और नए माहौल में खुद को ढाला। फिर भी, उनका मन घर पर ही लगा रहता था। नौकरी से हुई बचत के साथ वह हाथीबंधा लौट आईं और सिलाई और कटाई केंद्र (Sewing and Cutting Centre) में 50,000 रुपये का निवेश किया। जो काम शुरू में सिर्फ उनकी अपनी आजीविका का जरिया था, उसने जल्द ही किसी और के लिए भी रोजगार का मौका बना दिया। उन्होंने केंद्र में एक युवा लड़की को काम पर रखा और अपने समुदाय में एक बिजनेस खड़ा करना शुरू किया। सालाना लगभग 1.10 लाख रुपये की कमाई के साथ, रूपाली का सफर स्किलिंग (कौशल विकास) का एक अलग पहलू दिखाता है। नौकरी ने उन्हें एक शुरुआत दी, लेकिन उन्होंने उस अनुभव को अपने खुद के काम में बदलने का फैसला किया।

रूपाली ने घर के पास ही अपनी आजीविका बनाने का फैसला किया। वहीं, हीरालाल ने एक अलग रास्ता चुना—ऐसा रास्ता जो उन्हें अपने सामने आने वाली चुनौतियों का सामना करते हुए करियर बनाने में मदद करे।

अपना खुद का करियर

झारखंड के हीरालाल पंडित ने बचपन से ही देखा था कि कैसे हर फसल यह तय करती थी कि उनके परिवार का गुजारा कितने समय तक चलेगा। चार लोगों का उनका परिवार उनके पिता की मौसमी खेती पर निर्भर था, जिससे महीने में लगभग 5,000 रुपये की कमाई होती थी।

10वीं कक्षा पूरी करने के बाद, उन्होंने हर संभव तरीके से अपने पिता की मदद करना शुरू किया। दिव्यांग होने के कारण उनके लिए नौकरी पाना आसान नहीं था, लेकिन हीरालाल ने अपनी परिस्थितियों को अपने भविष्य पर हावी नहीं होने दिया।

वे अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने में योगदान देते हुए अपना खुद का करियर बनाना चाहते थे। विकल्पों की तलाश करते समय, हीरालाल को DDU-GKY के बारे में पता चला। इस प्रोग्राम की मुफ्त ट्रेनिंग और प्लेसमेंट सहायता ने उन्हें हुनर ​​सीखने और नौकरी पाने का मौका दिया। उन्होंने झारखंड के दुमका में एक ट्रेनिंग सेंटर में ‘हेल्थकेयर मल्टीपर्पज’ ट्रेड में दाखिला लिया।

यह ट्रेनिंग हीरालाल के सफर का एक अहम मोड़ साबित हुई। उन्हें एक ऐसे माहौल में नई स्किल्स सीखने को मिलीं जहां उनके साथ सम्मान और बराबरी का व्यवहार किया गया। कोर्स पूरा करने के बाद, उन्हें नासिक के SMBT हॉस्पिटल में ‘जनरल ड्यूटी असिस्टेंट’ के तौर पर नौकरी मिल गई। इस मौके ने उन्हें अपने परिवार की भलाई में योगदान देने के साथ-साथ खुद भी पैसे कमाने में मदद की। सबसे बड़ी बात यह है कि इस अनुभव ने उनका आत्मविश्वास बढ़ाया और उन्हें अपनी काबिलियत के बारे में नई सोच दी।

आज, हीरालाल दूसरे युवाओं को भी अपनी मुश्किल हालात से आगे देखने और मिले हुए मौकों का पूरा फायदा उठाने के लिए प्रेरित करते हैं। उनके लिए, यह सफर पहला कदम उठाने की हिम्मत से शुरू हुआ था। DDU-GKY ने उन्हें उस पहले कदम को एक करियर और ज्यादा सुरक्षित भविष्य की राह में बदलने में मदद की।

जब कोई हुनर ​​आजीविका का जरिया बन जाए

कोई हुनर ​​ग्रामीण परिवार की हर मुश्किल को दूर नहीं कर सकता, लेकिन यह बेहतर संभावनाओं के दरवाजे जरूर खोल सकता है। विमेथानो के लिए, इसने रोजगार का रास्ता तब बनाया जब आर्थिक तंगी की वजह से उसकी पढ़ाई रुक गई थी। चंदन के लिए, इसने एक ऐसे करियर की शुरुआत की जो उसे दुबई तक ले गया। रूपाली ने अपने हुनर ​​और अनुभव का इस्तेमाल करके अपना खुद का कारोबार शुरू किया, जबकि हीरालाल को रोजगार का जरिया और अपने परिवार की मदद करने का मौका मिला।

उनकी राहें अलग-अलग थीं, लेकिन उनमें एक बात समान थी: हुनर ​​सीखने, उसे आजमाने और आजीविका कमाने का मौका। DDU-GKY इसी पहले कदम को मुमकिन बनाना चाहता है, ताकि ग्रामीण युवा ट्रेनिंग से रोजगार की ओर और रोजगार से ज्यादा सुरक्षित और टिकाऊ आजीविका की ओर बढ़ सकें।

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महाराष्ट्र में 1972 से भी ज्यादा गंभीर सूखे की आशंका, सोलापुर में सिर्फ 48.65% बारिश, किसानों पर कितना बड़ा संकट?

महाराष्ट्र के सोलापुर जिले पर सूखे का बड़ा संकट मंडरा रहा है। जिले में इस बार औसत बारिश का सिर्फ 50% ही बरसा है, जिससे खेतों में दरारें पड़ गई हैं। हालात का जायजा लेने खुद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस 23 सितंबर को सोलापुर पहुंचे।

मुख्यमंत्री ने दौरा करने के बाद कहा कि मौजूदा हालात 1972 के ऐतिहासिक सूखे से भी ज्यादा खतरनाक हो सकते हैं। सोलापुर इस समय राज्य का सबसे ज्यादा प्रभावित जिला बन गया है।

जिले में औसत बारिश का सिर्फ करीब 50 फीसदी पानी ही बरसा है। इसकी वजह से खरीफ की सभी फसलों को नुकसान हुआ है। बार्शी और धनोर इलाके में करीब 90 हजार हेक्टेयर में लगी सोयाबीन की फसल पूरी तरह खराब हो गई है, जबकि कई चीनी उत्पादक इलाकों में गन्ने की फसल रुक गई है।

किसानों के लिए सरकार ने की ये तैयारी

फडणवीस ने किसानों से हिम्मत बनाए रखने की अपील करते हुए कहा कि सरकार इस मुश्किल समय में उनके साथ है। सरकार की पहली प्राथमिकता पीने के पानी को बचाना है। इसके अलावा फसल नुकसान, पशुओं के चारे, फसल बीमा, आर्थिक मदद और अनाज की व्यवस्था को लेकर भी योजना बनाई जा रही है। सूखे को लेकर सरकार की ओर से जल्द नोटिफिकेशन या प्रस्ताव जारी करने की बात भी कही गई है।

सूखे से मछली पालन भी प्रभावित

बारिश की कमी का असर अब खेती के साथ मछली पालन पर भी दिखाई दे रहा है। कम पानी की वजह से तालाबों और जलाशयों में मछली पालन मुश्किल हो रहा है। इससे मछली उत्पादन के साथ मछुआरों की कमाई पर भी असर पड़ सकता है।

सूखे की स्थिति को लेकर कैबिनेट सब-कमेटी की बैठक भी हुई। इसमें अधिकारियों से फसल नुकसान का सर्वे जल्द पूरा करने को कहा गया है, ताकि प्रभावित किसानों की स्थिति का सही पता चल सके। इसके अलावा जल संरक्षण के कामों में भी तेजी लाने के निर्देश दिए गए हैं।

ट्रम्प से विवाद के बीच मेलोनी UN महासभा नहीं जाएंगी:कहा- बिजी हूं; 15 साल में पहली बार इटली के PM नहीं पहुंचेंगे

इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी इस साल संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) की हाई लेवल बैठक में शामिल नहीं होंगी। उन्होंने इसकी वजह बिजी शेड्यूल बताई है। करीब 15 साल बाद पहली बार इटली का प्रधानमंत्री UNGA की सालाना हाई लेवल बैठक में शामिल नहीं होगा। मेलोनी की जगह विदेश मंत्री एंटोनियो ताजानी UNGA में इटली का प्रतिनिधित्व करेंगे। मेलोनी के न्यूयॉर्क नहीं जाने से उनकी अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प से आमने-सामने मुलाकात भी नहीं होगी। इस साल जून में G7 समिट में दोनों के बीच विवाद बढ़ गया था। ट्रम्प ने कहा था कि मेलोनी उनके साथ फोटो के लिए बेताब थीं। इस पर मेलोनी ने जवाब दिया था, ‘ मुझे इसके लिए गिड़गिड़ाने की जरूरत नहीं हैं।’ ईरान युद्ध में मेलोनी ने ट्रम्प का साथ नहीं दिया ईरान के मुद्दे पर भी ट्रम्प और मेलोनी के रुख में अंतर रहा। मेलोनी ने ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का खुलकर समर्थन नहीं किया था। इसके बाद ट्रम्प ने सार्वजनिक तौर पर उनके रुख की आलोचना की थी। हालांकि, इटली और अमेरिका के बीच सुरक्षा सहयोग जारी है। इटली NATO का सदस्य है और वहां करीब 13 हजार अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। एवियानो, नेपल्स, विसेंजा और सिसिली में अमेरिका के अहम सैन्य ठिकाने भी हैं। ट्रम्प और मेलोनी आखिरी बार G7 में साथ दिखे थे 15-17 जून 2026 को हुए G7 समिट में ट्रम्प और मेलोनी के रिश्तों में सुधार के संकेत दिखे थे। फ्रांस में हुई इस बैठक के दौरान दोनों कई बार साथ नजर आए। एक मौके पर दोनों सोफे पर बैठकर काफी देर तक बातचीत करते भी दिखे। उनकी तस्वीरें भी चर्चा में रहीं। उस वक्त माना जा रहा था कि मतभेदों के बावजूद दोनों नेताओं के रिश्ते फिर सामान्य हो रहे हैं। हालांकि, ट्रम्प के बयान के बाद दोनों के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया था। ट्रम्प पर यूरोप-अमेरिका के रिश्ते बिगाड़ने का आरोप मेलोनी के करीबी सहयोगी और प्रधानमंत्री कार्यालय में अंडरसेक्रेटरी जियोवानबातिस्ता फज्जोलारी ने G7 के बाद ट्रम्प के बयान पर नाराजगी जताई थी। उन्होंने कहा था कि ट्रम्प जानबूझकर या अनजाने में अमेरिका और यूरोप के पुराने रिश्तों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। फज्जोलारी के मुताबिक, ट्रम्प के ऐसे बयानों से पूरे यूरोप में अमेरिका की छवि खराब हुई है। इसका नुकसान आखिरकार अमेरिका को ही उठाना पड़ेगा। ट्रम्प की बड़ी समर्थक रही हैं मेलोनी BBC के मुताबिक ट्रम्प और मेलोनी के रिश्ते पहले काफी करीबी माने जाते थे। 2025 में ट्रम्प के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने वाली वह एकमात्र यूरोपीय नेता थीं। उन्हें यूरोपीय संघ और अमेरिका के बीच ब्रिज के तौर पर भी देखा जाता था। अप्रैल में ईरान पर अमेरिकी हमले के दौरान ट्रम्प और मेलोनी के बीच मतभेद हो गया था। अमेरिका को इटली के हवाईअड्डों और सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल की जरूरत थी, लेकिन इटली ने इससे इनकार कर दिया था। इसके बाद पोप लियो को लेकर भी ट्रम्प और मेलोनी के बीच मतभेद सामने आए। पोप ने ईरान युद्ध रोकने की अपील की थी। ट्रम्प ने उनकी अपील पर नाराजगी जताई, जबकि मेलोनी ने ट्रम्प की बात का विरोध किया। इसके बाद ट्रम्प ने कहा था कि उन्हें लगता था कि मेलोनी में हिम्मत है, लेकिन अब उन्हें ऐसा नहीं लगता। मोदी, पुतिन और जिनपिंग भी नहीं पहुंचे इस साल मेलोनी अकेली बड़ी नेता नहीं हैं जो UN महासभा से दूर हैं। प्रधानमंत्री मोदी, रूसी राष्ट्रपति पुतिन, चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग, जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज भी न्यूयॉर्क नहीं पहुंचे। करीब 130 देशों के राष्ट्राध्यक्ष और सरकार प्रमुख इस बार UNGA की हाई लेवल बैठक में शामिल हो रहे हैं। PM मोदी ने इस साल UNGA में शामिल नहीं होने का फैसला किया है। मोदी आखिरी बार सितंबर 2024 में UNGA की बैठक में शामिल हुए थे। इसके बाद 2025 में भारत की ओर से विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने महासभा को संबोधित किया था। वहीं रूस की ओर से विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव महासभा को संबोधित करेंगे। चीन की ओर से उपराष्ट्रपति प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। हालांकि, जिनपिंग इस हफ्ते वॉशिंगटन में ट्रम्प से अलग मुलाकात करने वाले हैं। ———————- यह खबर भी पढ़ें… जिनपिंग 11 साल बाद अमेरिका रवाना:ट्रम्प एयरपोर्ट पर रिसीव करेंगे, व्हाइट हाउस में स्टेट डिनर मिलेगा; ट्रेड, AI और ताइवान पर बातचीत चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग बुधवार दोपहर अमेरिका रवाना हो गए हैं। वे 11 साल वहां जा रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प जॉइंट बेस एंड्रयूज एयरपोर्ट पर उनका स्वागत करने पहुंचेंगे। पूरी खबर पढ़ें…

4 KM तक बहता रहा 4 दिन का नन्हा हाथी, मछुआरों ने जान जोखिम में डालकर मां से मिलाया; दिल छू लेगा ये VIDEO, देखें

4 KM तक बहता रहा 4 दिन का नन्हा हाथी, मछुआरों ने जान जोखिम में डालकर मां से मिलाया; दिल छू लेगा ये VIDEO, देखें

Wholesome Elephant Rescue : पश्चिम बंगाल की तीस्ता नदी में बह रहे हाथी के महज चार दिन के बच्चे को स्थानीय मछुआरों ने अपनी जान की परवाह किए बिना बचा लिया। तेज बहाव के बीच करीब चार किलोमीटर तक बह चुके इस नन्हे हाथी को मछुआरों ने नाव से पीछा कर सुरक्षित बाहर निकाला। इसके बाद वन विभाग की मदद से उसे उसकी मां से मिलाया गया। मां ने बच्चे को अपनाया और उसे दूध पिलाया तो वहां मौजूद लोगों के लिए यह पल बेहद भावुक कर देने वाला बन गया।

 

तेज बहाव में बह गया था हाथी का बच्चा

 

जानकारी के मुताबिक, हाथियों का एक झुंड शुक्रवार सुबह करीब 8:30 बजे गजोल्डोबा बैराज के पास तीस्ता नदी पार करने की कोशिश कर रहा था। इसी दौरान तेज बहाव में हाथी का बच्चा अपनी मां से अलग हो गया और पानी के साथ करीब चार किलोमीटर दूर बह गया।

 

बच्चे को तीस्ता नदी के 12वें स्पर के पास संघर्ष करते देख स्थानीय मछुआरों ने तुरंत अपनी नाव उसकी ओर मोड़ दी। नॉर्थ बंगाल फिशरमेन फोरम से जुड़े पांच मछुआरे—मिठू दास, विश्वनाथ दास, राजेश दास, गोपाल दास और बबलू दास बच्चे के पीछे करीब चार किलोमीटर तक गए।

 

बच्चा लगातार तेज लहरों में बह रहा था और सांस लेने के लिए संघर्ष कर रहा था। उसकी छोटी-सी सूंड पानी के ऊपर दिखाई दे रही थी। हालात बेहद मुश्किल थे, लेकिन मछुआरों ने हिम्मत नहीं छोड़ी। तीन मछुआरे पानी में उतर गए और किसी तरह बच्चे को खींचकर नाव तक लाने में कामयाब रहे।

 

 मां से मिलते ही बदल गया पूरा मंजर

 

बचाए जाने के बाद हाथी के बच्चे को वन विभाग के कर्मचारियों को सौंप दिया गया। उसे काठांबारी रेंज कार्यालय ले जाकर पशु चिकित्सकों ने उसकी जांच की। राहत की बात रही कि बच्चे को कोई गंभीर चोट नहीं आई थी।

 

इसके बाद बैकुंठपुर वन प्रभाग की टीम ने उसकी मां को तलाशने का अभियान शुरू किया। वनकर्मियों, स्थानीय लोगों और मछुआरों के करीब दो घंटे के संयुक्त प्रयास के बाद आखिरकार बच्चे को उसकी मां तक पहुंचाया गया।

 

मां हाथी अपने बच्चे के पास आई और उसे स्वीकार कर लिया। इसके बाद उसे बच्चे को दूध पिलाते हुए भी देखा गया। यह पल पूरे बचाव अभियान का सबसे खूबसूरत हिस्सा रहा। 

 

बैकुंठपुर के DFO मुदित कुमार ने मछुआरों की समय पर की गई कार्रवाई की सराहना की। उन्होंने बताया कि बच्चे को जल्द से जल्द मां से मिलाना बेहद जरूरी था, क्योंकि लंबे समय तक इंसानों के संपर्क में रहने पर कई बार हाथियों का झुंड बच्चों को दोबारा स्वीकार नहीं करता।

 

इस पूरे रेस्क्यू ने एक बार फिर दिखाया कि मुश्किल वक्त में इंसान और वन्यजीवों के बीच की संवेदनशीलता कितनी खूबसूरत हो सकती है। नन्हे हाथी की जिंदगी बचाने से लेकर उसे उसकी मां की गोद तक पहुंचाने तक, मछुआरों और वन विभाग की यह कोशिश दिल जीत लेने वाली है।

जीएसटी की तरह यूसीसी

जिस तरह जीएसटी के बावजूद अनेक किस्म के कर लोगों को चुकाने होते हैं क्या वैसे ही यूसीसी के बावजूद कई तरह के निजी कानून चलते रहेंगे? एसटी के अलावा दूसरी जातियों को भी यूसीसी के दायरे से बाहर रखने की तैयारी चल रही है। गौरतलब है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने वस्तु व सेवा कर यानी जीएसटी को ‘एक देश, एक कर’ के रूप में प्रचारित किया और इसे आजाद भारत का सबसे बड़ा क्षण बनाने के लिए आधी रात को संसद का सत्र बुला कर सेंट्रल हॉल में साझा सत्र में इसे कानून बनाया। लेकिन क्या यह सचमुच ‘एक देश, एक कर’ का प्रतीक है? यह सवाल इसलिए है क्योंकि अब भी आयकर और जीएसटी के अलावा दस तरह के कर लोगों को देने पड़ रहे हैं। हाल ही में सरकार ने यूपीआई पर भी एक कर लगाया है। टोल टैक्स अलग है और पेट्रोल व शराब पर लगने वाला कर अलग है। सीमा शुल्क भी लगता ही है। करों और शुल्कों के अलावा कई उपकर और दूसरी चीजें भी हैं। खुद जीएसटी के इतने स्लैब हैं कि लोग उसी में कंफ्यूज हुए रहते हैं। इसी तरह से ‘एक देश, एक कानून’ के तौर पर यूसीसी यानी समान नागरिक संहिता को प्रचारित किया जा रहा है। हालांकि ऐस लग रहा है कि इसका भी हस्र जीएसटी वाला ही होगा।

सबसे पहले उत्तराखंड में यह कानून बना और लागू हुआ। जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की कमेटी की सिफारिशों के आधार पर कानून बना। अब उत्तराखंड का कानून पूरे देश में टेम्पलेट के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। उत्तराखंड में कानून बना तो अनुसूचित जनजाति यानी एसटी को इससे बाहर रखा गया। इसके बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ऐलान किया कि कहीं भी अनुसूचित जनजाति को इस कानून के दायरे में नहीं लाया जाएगा। यानी देश के नागरिकों के एक बड़े समूह पर यूसीसी लागू होगा, जबकि करीब आठ फीसदी आबादी वाले एसटी समुदाय पर अलग कानून लागू होगा। अभी तक यूसीसी में एसटी को छूट दिया गया था लेकिन अब छूट देने का दायरा बढ़ रहा है। दूसरी जातियों को भी कानून के दायरे से बाहर रखने की घोषणाएं हो रही हैं।

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने ऐलान किया है कि उनके राज्य में एसटी समुदाय के अलावा कुड़मी जाति को भी यूसीसी के दायरे से बाहर रखा जाएगा। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल के दक्षिणी हिस्से में और खास कर झारखंड से सटे पुरुलिया आदि के इलाके में बड़ी कुड़मी आबादी है, जो अपने को एसटी समुदाय में शामिल करने की मांग करती रहती है। कोई भी सरकार कुड़मी या कुर्मी को एसटी में शामिल करने की हिम्मत नहीं कर पा रही है। लेकिन शुभेंदु अधिकारी की सरकार ने कुड़मी को एसटी की ही तरह यूसीसी से बाहर रखने का ऐलान कर दिया है। यह उनको एसटी का दर्जा देने की दिशा में उठा पहला कदम है। उसका अपना अलग असर होगा। लेकिन एक बार कुड़मी को यूसीसी से बाहर रखने का नियम बना तो फिर हर राज्य में इस तरह से किसी न किसी जाति को अलग करने की मांग उठेगी। झारखंड में भी कुड़मी बरसों से एसटी का दर्जा मांग रहे हैं। अगर कभी झारखंड में भाजपा की सरकार बनी तो वहां भी कुड़मी को अलग रखना होगा। पश्चिम बंगाल सरकार के फैसले से पंडोरा बॉक्स खुल जाएगा। कई राज्यों में कई अति पिछड़ी जातियां एससी या एसटी में शामिल होने की नांग कर रही हैं। वे भी इस तरह की छूट मांगेंगी। अगर हर राज्य में 10 फीसदी या उससे ज्यादा आबादी यूसीसी से बाहर हो गई तो फिर ‘एक देश, एक कानून’ के सिद्धांत का क्या मतलब रह जाएगा?

BB Ki Vines से Revolutionaries Show तक | Bhuvan Bam की 11 साल की Journey | Prime Video

BB Ki Vines से Revolutionaries Show तक | Bhuvan Bam की 11 साल की Journey | Prime Video

11 साल पहले एक Phone Camera के सामने खड़े होकर कई किरदार बनाए।
और Revolutionaries Show को लीड करते Bhuvan Bam.
इस 11 साल के सफर के बीच में सिर्फ सफलता नहीं थी, Struggle, Self-doubt, Loss और बार-बार खुद को फिर से शुरू करने की हिम्मत थी।
Bhuvan Bam की कहानी शायद इसलिए खास है क्योंकि जब उन्होंने शुरुआत की थी, उन्हें भी नहीं पता था कि ये सफर उन्हें कहां ले जाएगा।
शायद आपकी शुरुआत भी अभी छोटी हो।
लेकिन कभी-कभी जवाब कोशिश करने के बाद ही मिलता है।
मेहनत करते रहिए।
Risk लेने से मत डरिए।
हो सकता है आज की छोटी शुरुआत ही कल आपकी पूरी कहानी बन जाए।

@bhuvan.bam22

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Project Cheetah के चार साल पूरे होने पर मिला अनोखा तोहफा, मादा चीता ने दिया 4 शावकों को जन्म

Project Cheetah: भारत में चीतों का नामोनिशान 1952 में पूरी तरह से समाप्त होने की घोषणा के बाद आज एक ऐसी खबर आई है, जिससे प्रोजेक्ट चीता से जुड़ा हर एक शख्स बेहद खुश है। मध्य प्रदेश के कुनो नेशनल पार्क में भारत में जन्मी एक मादा चीता ने चार बच्चों को जन्म दिया है। यह खबर प्रोजेक्ट चीता के चार पूरा होने के ठीक एक दिन बाद मिली है। इससे भारत में चीतों की आबादी फिर से शुरू करने के प्रयासों को प्रोत्साहन मिला है।

केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने सोशल मीडिया पर एक तस्वीर और वीडियो के साथ इस उपलब्धि की जानकारी साझा की। उन्होंने इसे प्रोजेक्ट चीता के लिए “सच में ऐतिहासिक और खुशी का पल” बताया। यादव ने कुनो नेशनल पार्क और प्रोजेक्ट चीता टीमों को बधाई देते हुए कहा, “चार साल, चार नई जिंदगी — उम्मीद, हिम्मत और भारत में चीता संरक्षण की बढ़ती सफलता का एक सुंदर प्रतीक।”

चार शावकों को जन्म देने वाली मादा चीता का नाम KGP12 बताया जा रहा है। यह कुनो में पैदा हुए उन भारतीय चीतों में से एक है, जो इस प्रजाति को देश में फिर से लाए जाने के बाद पैदा हुए थे। बता दें, प्रोजेक्ट चीता को भारत में चीतों की आबादी फिर से शुरू करने के मकसद से 17 सितंबर 2022 को लॉन्च किया गया था। इसके लिए नामीबिया से आठ अफ्रीकी चीतों को कुनो नेशनल पार्क लाया गया था। बाद में दक्षिण अफ्रीका से और चीतों के आने के साथ प्रोग्राम को और विस्तार मिला।

1952 में भारत में चीता की प्रजाति के खत्म होने की घोषणा की गई थी। इसके बाद जंगली चीतों की नस्ल को बनाने की भारत की कोशिशों में यह जन्म एक और अहम पड़ाव है। इसके बाद भारत स्थानीय तौर पर खत्म होने के बाद चीतों को जंगल में फिर से लाने वाला एकमात्र देश बन गया। चार स्वस्थ शावकों का जन्म खास तौर पर अहम है क्योंकि दूसरी पीढ़ी का जन्म इस बात का संकेत देते हैं कि फिर से लाई गई आबादी भारतीय हालात के हिसाब से ढलने लगी है।

वाइल्डलाइफ बायोलॉजिस्ट जंगल में सफल ब्रीडिंग को एक कामयाब कंजर्वेशन प्रोग्राम के सबसे मजबूत संकेतों में से एक मानते हैं। इससे पहले सीएनबीसी नेटवर्क 18 की रिपोर्ट में बताया गया था कि देश में प्रोजेक्ट चीता के चार साल पूरे होने पर देश में चीतों की आबादी बढ़कर 52 हो गई है, जिसमें 32 देश में पैदा हुए हैं। पिछले चार सालों में, प्रोजेक्ट चीता को कामयाबी और नाकामी दोनों का सामना करना पड़ा है, जिसमें बीमारी, चोट और पर्यावरण की चुनौतियों के कारण कई बड़े चीतों और शावकों की मौत शामिल है।

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मुजफ्फरनगर से ई-रिक्शा लेकर स्पीति वैली पहुंचा लड़का, 12,500 फीट पर पहुंचते ही वायरल हुआ वीडियो

मुजफ्फरनगर के रहने वाले सुमित कुमार प्रजापति इन दिनों अपने अनोखे सफर की वजह से सोशल मीडिया पर चर्चा में हैं। जहां लोग स्पीति वैली जाने के लिए कार, बाइक या एसयूवी का सहारा लेते हैं, वहीं सुमित अपनी ई-रिक्शा लेकर पहाड़ों की ओर निकल पड़े। उनका यह सफर सिर्फ घूमने-फिरने तक सीमित नहीं है, बल्कि हर मोड़ पर एक नई चुनौती और नया अनुभव सामने आ रहा है। सुमित ने इस यात्रा की शुरुआत 15 अगस्त को की थी। सफर शुरू करते समय उन्होंने इंस्टाग्राम पर बताया था कि वह रोजाना वीडियो के जरिए लोगों को अपनी यात्रा की जानकारी देंगे।

रास्ते में उन्हें किन परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है, लोग उनकी ई-रिक्शा को देखकर कैसी प्रतिक्रिया दे रहे हैं और यात्रा किस तरह आगे बढ़ रही है इन सभी चीजों को वह कैमरे में कैद करते रहे। अब तक उन्होंने कुल 27 वीडियो के जरिए अपनी यात्रा की कहानी साझा की है।

मनाली तक पहुंचने का तरीका भी था खास

सुमित के इंस्टाग्राम पेज के मुताबिक, वह अपने दोस्तों के साथ गाड़ी से मनाली पहुंचे। उनकी ई-रिक्शा को ट्रक में लादकर मनाली तक पहुंचाया गया। इसके बाद यात्रा का सबसे दिलचस्प हिस्सा शुरू हुआ। 19 अगस्त को सुमित मनाली से ई-रिक्शा पर सवार होकर अकेले स्पीति वैली की ओर निकल पड़े। पहाड़ों के मुश्किल रास्तों पर तीन पहियों वाली इलेक्ट्रिक सवारी को आगे बढ़ते देखकर लोग भी हैरान रह गए। उनके एक वीडियो पर यूट्यूब इंडिया ने भी प्रतिक्रिया दी और मजेदार अंदाज में लिखा, “मॉडर्न प्रॉब्लम्स को देसी सॉल्यूशन चाहिए।”

‘बैटरी कहां चार्ज होगी?’ लोगों ने पूछा सवाल

जैसे ही सुमित के वीडियो सोशल मीडिया पर आने लगे, लोगों के मन में सबसे पहला सवाल ई-रिक्शा की बैटरी को लेकर उठा। यूजर्स पूछने लगे कि पहाड़ों के बीच आखिर ई-रिक्शा को चार्ज कहां किया जाएगा। सुमित ने बताया कि वह जिस जगह रुकते हैं, वहीं अपनी ई-रिक्शा को चार्ज करते हैं। इतना ही नहीं, किसी आपात स्थिति में काम आने के लिए उन्होंने जेनरेटर भी अपने साथ रखा है।

फैंस की एक बात मानकर बदल दिया सफर का अंदाज

सुमित की पहली वीडियो देखने के बाद एक सोशल मीडिया यूजर ने उनसे कहा कि अगर ई-रिक्शा इतनी दूर जा रही है तो इसमें सवारियां क्यों नहीं बैठाते। सुमित ने इस सुझाव को मान लिया। इसके बाद उन्होंने ई-रिक्शा में सवारियां बैठाकर स्पीति की ओर सफर जारी रखा। इससे उनकी यात्रा का अनुभव और भी अलग हो गया। अब वह सिर्फ अपनी मंजिल की ओर बढ़ने वाले यात्री नहीं थे, बल्कि रास्ते में मिलने वाले लोगों के साथ भी इस अनोखे सफर को साझा कर रहे थे।

12,500 फीट की ऊंचाई पर ई-रिक्शा ने सबको रोका

जैसे-जैसे सुमित ऊंचाई की ओर बढ़े, उनकी ई-रिक्शा लोगों के लिए कौतूहल का विषय बन गई। करीब 12,500 फीट की ऊंचाई वाले पथरीले रास्तों पर तीन पहियों वाली इस सवारी को चलते देखकर कई लोग रुक गए। कुछ लोगों ने सुमित के वीडियो बनाए, कुछ ने उनकी हिम्मत की तारीफ की और कई लोग तालियां बजाते नजर आए। वहीं, कुछ लोगों के लिए यह समझना ही मुश्किल था कि आखिर ई-रिक्शा इतनी खड़ी चढ़ाई और खराब रास्तों को पार कैसे कर रही है।

कुंजुम पहुंचकर बनाया रिकॉर्ड

26 अगस्त को सुमित अपनी ई-रिक्शा लेकर कुंजुम पहुंचे। उन्होंने इसे अपनी यात्रा की बड़ी उपलब्धि बताया और दावा किया कि ई-रिक्शा से वहां तक पहुंचने वाला यह पहला ऐसा सफर है। इस उपलब्धि ने उनकी यात्रा को और खास बना दिया। सोशल मीडिया पर पहले जहां लोग उनकी ई-रिक्शा को लेकर सवाल पूछ रहे थे, वहीं अब उनके सफर की चर्चा उपलब्धि के तौर पर होने लगी।

‘कार नहीं थी, लेकिन सपना तो था’

1 सितंबर को शेयर किए गए वीडियो में सुमित ने अपने सफर के पीछे की कहानी बताई। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति का सपना होता है कि वह कभी शहर से दूर पहाड़ों के किसी गांव में जाकर सुकून के कुछ पल बिताए। उनका भी ऐसा ही सपना था, लेकिन उनके पास कार नहीं थी। इसके बावजूद उन्होंने रुकने के बजाय अपनी ई-रिक्शा को ही सफर का साथी बना लिया। सुमित का कहना है कि जहां लोग मुश्किल पहाड़ी रास्तों पर 4×4 गाड़ियों का इस्तेमाल करते हैं, वहीं वह बैटरी से चलने वाले तीन पहियों के वाहन के साथ आगे बढ़ रहे हैं। उनकी कहानी अब सोशल मीडिया पर सिर्फ एक अनोखी यात्रा नहीं, बल्कि इस बात की मिसाल बन गई है कि सपने देखने के साथ उन्हें पूरा करने का हौसला भी जरूरी है।

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