PM VBRY: पहली नौकरी पर ₹15,000 का तोहफा! जानिए EPFO की इस खास स्कीम के बारे में

PM Viksit Bharat Rozgar Yojana PM VBRY: फॉर्मल सेक्टर में पहली बार नौकरी शुरू करने वाले युवाओं के लिए केंद्र सरकार की ओर से बड़ी खुशखबरी है। प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना (PM-VBRY) के तहत पहली बार नौकरी जॉइन करने वाले योग्य कर्मचारियों को ₹15,000 तक का इंसेंटिव दिया जा रहा है। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) के माध्यम से संचालित इस योजना का मुख्य उद्देश्य देश के युवाओं को फॉर्मल रोजगार से जोड़ना और ईपीएफ (EPF) सिस्टम में उनका स्वागत करना है।

वैसे यह ₹15,000 का इंसेंटिव सभी को एकमुश्त या खुद-ब-खुद नहीं मिलेगा। इसके लिए सरकार और ईपीएफओ ने कुछ जरूरी शर्तें, सैलरी सीमा और सर्विस पीरियड तय किया है।

कब से कब तक की नौकरियों पर मिलेगा फायदा?

यह योजना 1 अगस्त 2025 से 31 जुलाई 2027 के बीच सर्जित होने वाली नई नौकरियों पर लागू होगी। अगर कर्मचारी का मासिक ईपीएफ वेतन ₹1 लाख प्रति माह तक है, तो वह इस योजना के तहत योग्य माना जाएगा। इंसेंटिव की राशि कर्मचारी के 1 महीने के ईपीएफ वेज के बराबर (अधिकतम ₹15,000 की सीमा तक) होगी।

कौन है ₹15,000 इंसेंटिव के लिए योग्य?

PM-VBRY के ‘पार्ट-ए’ के तहत इंसेंटिव पाने के लिए कर्मचारी को पहली बार ईपीएफ सदस्य बनना अनिवार्य है। पात्रता की मुख्य शर्तें नीचे टेबल में दी गई हैं:

पात्रता की शर्तइसका क्या मतलब है?
पहली बार EPF मेंबरशिपकर्मचारी 1 अगस्त 2025 से पहले कभी भी ईपीएफ का अंशदान करने वाला सदस्य (छूट प्राप्त पीएफ ट्रस्ट समेत) नहीं होना चाहिए।
जॉइनिंग की तारीख नौकरी में कार्यभार संभालने की तिथि 1 अगस्त 2025 से 31 जुलाई 2027 के बीच होनी चाहिए।
मासिक सैलरी कर्मचारी का मासिक वेतन ₹1 लाख तक होना चाहिए (योजना की परिभाषा के अनुसार)।
सर्विस की अवधिपहली किस्त के लिए 6 महीने और दूसरी किस्त के लिए 12 महीने की निरंतर सेवा आवश्यक है।
एंप्लॉयर कम्प्लायंसजिस कंपनी/संस्था में काम कर रहे हैं, उसने ईपीएफओ में जरूरी रिपोर्टिंग और कंट्रीब्यूशन (ECR) दाखिल किया हो।

 कैसे मिलेगी ₹15,000 की रकम?

यह इंसेंटिव कर्मचारियों को सीधे दो किस्तों में दिया जाएगा:

किस्तजरूरी शर्त  अधिकतम राशि
पहला किस्त निरंतर 6 महीने की योग्य सेवा पूरी होने पर ₹7,500
दूसरी किस्त 12 महीने की सेवा और फाइनेंशियल लिटरेसी प्रोग्राम पूरा करने परबाकी बची राशि (कुल ₹15,000 तक)

ध्यान दें: इंसेंटिव की राशि योग्य सैलरी के आधार पर तय होगी, इसलिए हर किसी को फ्लैट ₹15,000 नहीं मिलेंगे। इसके अलावा, दूसरी किस्त तुरंत कैश में निकालने योग्य नहीं हो सकती है; गाइडलाइंस के मुताबिक इसे किसी उपयुक्त सेविंग्स इंस्ट्रूमेंट या डिपॉजिट अकाउंट में तय समय के लिए रखा जा सकता है।

फाइनेंशियल लिटरेसी कोर्स क्यों है जरूरी?

दूसरी किस्त पाने के लिए फाइनेंशियल लिटरेसी प्रोग्राम को पूरा करना अनिवार्य बनाया गया है। 6 महीने की नौकरी पूरी होने पर पहली किस्त मिल जाएगी, लेकिन पूरे ₹15,000 पाने के लिए कर्मचारी को 12 महीने की नौकरी के साथ-साथ इस कोर्स को भी पूरा करना होगा।

इसके लिए कर्मचारी PM-VBRY के ऑफिशियल पोर्टल पर जाकर पूरी गाइडेंस ले सकते हैं। पोर्टल पर यूनिवर्सल अकाउंट नंबर (UAN) जनरेट करने और यूएएन-आधार लिंकिंग से जुड़ी जानकारियां भी उपलब्ध हैं।

पैसा बैंक खाते में कैसे आएगा?

सरकार ने साफ किया है कि पार्ट-ए के तहत इंसेंटिव का भुगतान सीधे कर्मचारी के आधार-सीडेड बैंक अकाउंट (DBT) में आधार ब्रिज पेमेंट सिस्टम के जरिए किया जाएगा। इसलिए कर्मचारियों को अपने बैंक खाते और यूएएन को आधार से लिंक रखना जरूरी है।

एंप्लॉयर्स के लिए अलग लाभ

इस योजना में कंपनियों/नियुक्तियों के लिए भी अलग प्रावधान (‘पार्ट-बी’) है, जहां एंप्लॉयर को हर नए योग्य कर्मचारी पर ₹3,000 प्रति माह तक का इंसेंटिव मिल सकता है। इसे कर्मचारियों के ₹15,000 वाले व्यक्तिगत इंसेंटिव से जोड़कर न देखें।

हेल्थ पॉलिसी के बावजूद हॉस्पिटल का 3 लाख बिल जेब से भरना है, FD तोड़े या किसी से उधार लें?

हेल्थ पॉलिसी होने के बावजूद कई बार हॉस्पिटल के बिल का कुछ हिस्सा जेब से भरना पड़ता है। अगर हॉस्पिटल के बिल में से 3 लाख रुपये जेब से भरना हो तो फिर क्या करना चाहिए? क्या सेविंग्स के पैसा का इस्तेमाल करना चाहिए, बैंक एफडी को तोड़ देना चाहिए या पीएफ से पैसे निकालने चाहिए? मनीकंट्रोल ने यह सवाल एक्सपर्ट से पूछा।

बीमारी को ध्यान में रखकर लेने होंगे फैसले

आरोग्य फाइनेंस के को-फाउंडर और सीईओ जोस पीटर ने कहा कि इस सवाल का जवाब कई बातों पर निर्भर है। इसमें बीमारी कौन सी है, बीमारी के इलाज में कितना समय लगेगा और कितने पैसे खर्च होंगे शामिल हैं। कई बार बीमारी का इलाज एक सर्जरी से हो जाता है, जबकि कुछ बीमारी में बार-बार हॉस्पिटल में भर्ती होने की जरूरत पड़ती है।

हॉस्पिटल बिल और इंश्योरेंस सेटलमेंट स्टेंटमेंट को चेक करें

उन्होंने कहा कि अगर हॉस्पिटल का बिल 5 लाख आने पर हेल्थ पॉलिसी के बावजूद 3 लाख जेब से चुकाना हो तो बड़ी समस्या हो जाती है। खासकर तब जब परिवार को दवाइयां भी खरीदनी हो और आगे भी डॉक्टर से दिखाना हो। ऐसे में परिवार को हॉस्पिटल के बिल को ध्यान से देखना जरूरी है। इंश्योरेंस कंपनी के सेटलमेंट स्टेटमेंट को भी देखना होगा। इससे पता चलेगा कि कौन-कौन से चार्ज इंश्योरेंस में कवर नहीं हुआ है।

कई हॉस्पिटल इंटरेस्ट-फ्री मेडिकल EMI ऑफर करते हैं

सबसे पहले हॉस्पिटल से यह पूछा जा सकता है कि क्या वह इंटरेस्ट-फ्री मेडिकल EMI ऑफर करता है। इसमें इंटरेस्ट का बोझ हॉस्पिटल उठाता है। अगर हॉस्पिटल यह सुविधा ऑफर करता है तो परिवार के लिए इसका इस्तेमाल करना सबसे अच्छा रहेगा। परिवार मंथली किस्त चुकाने के लिए अपने गैरजरूरी खर्चों में कटौती कर सकता है। अगर यह सुविधा हॉस्पिटल ऑफर नहीं करता है तो ही बैंक एफडी तोड़ने या दूसरे विकल्प का इस्तेमाल करने की जरूरत पड़ेगी।

बैंक एफडी तोड़ने से पहले इन बातों को ध्यान में रखें 

अगर बैंक एफडी तोड़ना जरूरी हो तो पहले यह देखना होगा कि इंटरेस्ट के मामले में कितना लॉस होगा और तय समय से पहले एफडी तोड़ने पर कितनी पेनाल्टी चुकानी होगी। एफडी पर लोन लेना अच्छा विकल्प हो सकता है। लेकिन, अगर एफडी अगर लंबी अवधि का है तो उसे तोड़ना सस्ता पड़ेगा। परिवार दोनों विकल्पों पर विचार करने के बाद फैसला ले सकता है।

ईपीएफ में जमा पैसा निकालने का भी विकल्प

तीसरा विकल्प ईपीएफ से पैसे निकालना है। लेकिन, यह ध्यान में रखना जरूरी है कि ईपीएफ से पैसे निकालने का असर आपकी रिटायरमेंट सेविंग्स पर पड़ता है। इस प्रोसेस में समय भी लगता है। यह विकल्प तब काम नहीं करेगा, जब पेशेंट हॉस्पिटल में है और उसे हॉस्पिटल से घर लाने से पहले बिल चुकाना जरूरी हो। ऐसी स्थिति में ईपीएफ से पैसे निकलने का इंतजार नहीं किया जा सकता।

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जरूरत के हिसाब से कुछ विकल्पों का किया जा सकता है इस्तेमाल

उपर्युक्त विकल्पों पर विचार करने के बाद सबसे अच्छा यह होगा कि हॉस्पिटल का बिल चुकाने के लिए सेविंग्स के कुछ पैसे का इस्तेमाल किया जाए और बाकी पैसा का इंतजाम दूसरे स्रोतों से किया जाए। इससे अचानक हाथ खाली नहीं होगा और हॉस्पिटल से पेशेंट के डिस्चार्ज के बाद भी उसकी देखभाल के लिए पैसे बचे रहेंगे।

डिसक्लेमर: मनीकंट्रोल पर एक्सपर्ट्स की तरफ से व्यक्त विचार उनके अपने विचार होते हैं। ये वेबसाइट या इसके मैनेजमेंट के विचार नहीं होते। मनीकंट्रोल की यूजर्स को सलाह है कि उन्हें निवेश का फैसला लेने से पहले सर्टिफायड एक्सपर्ट्स की राय लेनी चाहिए।

SIP Calculator: 40 साल तक जीरो सेविंग के बाद भी 60 तक बना सकते हैं 3 करोड़ का रिटायरमेंट फंड, ये है मंथली एसआईपी कैलकुलेशन

SIP Calculator: कई लोगों को सेविंग्स और इनवेस्टमेंट का ख्याल देर से आता है। फिर उन्हें लगता है कि इसके लिए समय उनके हाथ से निकल गया है। लेकिन, यह पूरा सच नहीं है। जल्द सेविंग्स और निवेश शुरू करने के कई फायदे हैं। लेकिन, देर से निवेश शुरू करने पर भी रिटायरमेंट के लिए अच्छा फंड बन सकता है।

40 की उम्र में भी रिटायरमेंट के लिए शुरू कर सकते हैं निवेश

अगर आपकी उम्र 40 हो गई है तो भी आप रिटायरमेंट फंड के लिए निवेश शुरू कर सकते हैं। लेकिन, आपको हर महीने ज्यादा इनवेस्ट करना होगा। अगर कोई व्यक्ति 40 साल की उम्र में रिटायरमेंट फंड के लिए निवेश शुरू करता है तो उसके पास इसके लिए 20 साल बचते हैं। यह समय ज्यादा नहीं है तो बहुत कम भी नहीं है।

रिटायरमेंट फंड के कैलकुलेशन में इनफ्लेशन को ध्यान में रखना होगा

आम तौर पर यह माना जाता है कि आपका रिटायरमेंट फंड आपके सालाना खर्च का 25 से 30 गुना होना चाहिए। मान लीजिए किसी व्यक्ति के परिवार का मंथली खर्च आज 30,000 रुपये है। अगर इनफ्लेशन 6 फीसदी मान लिया जाए तो यह 20 साल बाद 96,000 रुपये हो जाएगा। इसका 25 गुना करीब 2.9 करोड़ रुपये होगा।

मंथली 15000 रुपये सिप निवेश से 1.5 करोड़ का फंड बन सकता है

अगर आप हर महीने सिप से 15,000 रुपये इनवेस्ट करते हैं तो आप 20 साल में आप 36 लाख रुपये निवेश करेंगे। अगर आपके निवेश पर सालाना 10 फीसदी रिटर्न मिलता है तो 20 साल बाद आपका पैसा बढ़कर 1.15 करोड़ हो जाएगा। अगर सालाना रिटर्न 12 फीसदी मान लिया जाए तो यह पैसा करीब 1.5 करोड़ रुपये होगा। यह सिर्फ एक उदाहरण है। इक्विटी फंड में निवेश पर रिटर्न की गारंटी नहीं होती है।

3 करोड़ रुपये के फंड के लिए बढ़ाना होगा मंथली सिप अमाउंट 

अगर आप 2.9 करोड़ रुपये का रिटायरमेंट फंड चाहते हैं तो आपको हर महीने करीब 29,000 रुपये इनवेस्ट करना होगा। इस कैलकुलेशन में सालाना रिटर्न 12 फीसदी माना गया है। यह अमाउंट आपको ज्यादा लग सकता है। इसकी वजह यह है कि 40 साल के व्यक्ति पर परिवार सहित कई तरह की जिम्मेदारियां होती हैं। लेकिन, इसका एक दूसरा तरीका है।

हर साल सिप 10 फीसदी बढ़ाने से मिल सकती है काफी मदद  

अगर आप मंथली 15,000 रुपये के सिप को हर साल 10 फीसदी बढ़ाते हैं तो निवेश पर 12 फीसदी रिटर्न से आपके लिए करीब 3 करोड़ रुपये का फंड तैयार हो जाएगा। आपको हर साल इनकम बढ़ने के साथ सिप का अमाउंट बढ़ाना होगा। आपको गैरजरूरी खर्चों में कटौती करनी होगी। जरूरत पड़ने पर आप रिटायरमेंट की उम्र 62 या 63 साल मान सकते हैं।

पीपीएफ में भी निवेश करने से रिटायरमें फंड बनाना होगा आसान

अगर आप नौकरी करते हैं तो ईपीएफ में रेगुलर कंट्रिब्यूशन से भी बड़ा फंड बनेगा। सबसे पहले आपको यह चेक कर लेना चाहिए कि इससे कितना बड़ा फंड बनेगा। दूसरा, आप पीपीएफ यानी पब्लिक प्रोविडेंट फंड में भी निवेश शुरू कर सकते हैं। पीपीएफ 15 साल में मैच्योर हो जाता है। दिसंबर तिमाही में पीपीएफ का इंटरेस्ट रेट 7.1 फीसदी है। सरकार हर तिमाही पीपीएफ सहित स्मॉल सेविंग्स स्कीम के इंटरेस्ट रेट की समीक्षा करती है।

NPS भी हालिया बदलाव के बाद सब्सक्राइबर्स के लिए काफी अट्रैक्टिव

NPS यानी नेशनल पेंशन सिस्टम भी अब काफी अट्रैक्टिव हो गया है। हाल में पीएफआरडीए ने इसमें कई बदलाव किए हैं। अगर आपके एनपीएस में 12 लाख या इससे ज्यादा हैं तो आप 60 साल की उम्र में एकमुश्त 80 फीसदी पैसे निकाल सकते हैं। सिर्फ 20 फीसदी पैसे का इस्तेमाल एन्युटी के लिए होगा। दूसरा, सब्सक्राइबर्स 85 साल की उम्र तक इनवेस्टमेंट बनाए रख सकते हैं।

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हर महीने निवेश करने में इन बातों का रखना होगा खास ख्याल 

40 की उम्र में निवेश शुरू करने पर आपको ज्यादातर पैसा इंडेक्स या फ्लेक्सीकैप फंड जैसे डायवर्सिफायड इक्विटी फंड में लगाना होगा। आपको निवेश सिप के जरिए करना होगा। रिटायरमेंट नजदीक आने पर कई एक्सपर्ट्स पैसा इक्विटी फंड से निकालकर धीरे-धीरे हाइब्रिड या डेट फंड्स में लगाने की सलाह देते हैं। इससे अचानक बाजार में गिरावट आने पर आपके रिटायरमेंट फंड पर खराब असर नहीं पड़ेगा।

डिसक्लेमर: मनीकंट्रोल पर एक्सपर्ट्स की तरफ से व्यक्त विचार उनके अपने विचार होते हैं। ये वेबसाइट या इसके मैनेजमेंट के विचार नहीं होते। मनीकंट्रोल की यूजर्स को सलाह है कि उन्हें निवेश का फैसला लेने से पहले सर्टिफायड एक्सपर्ट्स की राय लेनी चाहिए।

अब मिलेगी ₹12,500 मंथली पेंशन! वेज सीलिंग हाइक के बाद EPS नियमों पर EPFO ने दिया ये बड़ा अपडेट

EPFO Pension Rules: कर्मचारी भविष्य निधि संगठन ने अनिवार्य कवरेज के लिए मासिक वेतन सीमा को ₹15,000 से बढ़ाकर ₹25,000 कर दिया है। इस फैसले से कर्मचारियों को रिटायरमेंट के बाद ₹12,500 तक की मंथली पेंशन का लाभ मिलने का रास्ता साफ हो गया है। श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के अनुसार, इस कदम से देश के 51 लाख से अधिक अतिरिक्त कर्मचारियों को पेंशन और सामाजिक सुरक्षा का फायदा मिलेगा।

इसी बीच पेंशन पात्रता को लेकर उठ रहे सवालों के बीच EPFO ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट जारी कर कर्मचारी पेंशन योजना (EPS) की सदस्यता के नए नियमों को पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया है।

EPFO ने EPS सदस्यता के लिए क्या नियम तय किए हैं?

EPFO के अनुसार, पेंशन योजना (EPS) में शामिल होने के लिए दो मुख्य शर्तें और नियम तय किए गए हैं:

सैलरी ₹25,000 या उससे कम होने पर: अगर किसी कर्मचारी का मूल वेतन और महंगाई भत्ता (DA) मिलाकर ₹25,000 या उससे कम है, तो उसके लिए EPS की सदस्यता अनिवार्य है और उसकी सैलरी से पेंशन अंशदान काटा जाएगा।

सैलरी ₹25,000 से अधिक होने पर: अगर किसी नए कर्मचारी का मासिक वेतन ₹25,000 से अधिक है और वह पहले कभी EPS का सदस्य नहीं रहा है, तो वह EPS का पात्र नहीं होगा और उसके वेतन से EPS के लिए कोई कटौती नहीं की जाएगी।

(नोट: इसका मतलब यह है कि केवल सैलरी का आंकड़ा ही पात्रता तय नहीं करता, बल्कि कर्मचारी का पुराना EPS रिकॉर्ड भी यह तय करने में अहम भूमिका निभाता है कि वह पेंशन पाने का हकदार है या नहीं।)

EPF और EPS में कैसे बंटता है एंप्लॉयर का योगदान?

नौकरीपेशा कर्मचारियों के लिए PF और पेंशन दो अलग-अलग घटक हैं। नियम के मुताबिक कंपनी कर्मचारी के वेतन का कुल 12% हिस्सा ईपीएफ फंड में योगदान करती है। इस 12% योगदान को दो भागों में बांटा जाता है:

8.33% हिस्सा: कर्मचारी पेंशन योजना (EPS) में जमा होता है।

शेष 3.67% हिस्सा: कर्मचारी के भविष्य निधि (EPF) खाते में जमा किया जाता है।

कैलकुलेशन का गणित: अगर किसी कर्मचारी की पेंशन योग्य सैलरी ₹25,000 प्रति माह है, तो कंपनी का कुल 12% योगदान ₹3,000 बनता है। इसमें से:

EPS (पेंशन फंड): 8.33% के हिसाब से ₹2,082.50 जाएंगे।

EPF (फंड खाता): बचा हुआ ₹917.50 ईपीएफ खाते में जमा होगा।

EPS अंशदान न कटने या गलत कटने पर क्या करें?

EPFO ने कर्मचारियों को सलाह दी है कि अगर ₹25,000 या उससे कम सैलरी होने के बावजूद उनका EPS अंशदान नहीं काटा जा रहा है, या अपात्र होने के बाद भी कटौती की जा रही है, तो वे ये कदम उठाएं:

पहले नियोक्ता से संपर्क करें: अपने HR या सैलरी विभाग से संपर्क करके अपनी पिछली EPS सदस्यता हिस्ट्री और पात्रता की जांच करवाएं।

EPFiGMS पोर्टल पर शिकायत दर्ज करें: अगर नियोक्ता स्तर पर समस्या का समाधान नहीं होता है, तो कर्मचारी ईपीएफओ के आधिकारिक EPFiGMS पोर्टल पर जाकर अपनी ऑनलाइन शिकायत दर्ज करा सकते हैं।

Retiring at 45: जल्द रिटायरमेंट की तैयारी! नौकरी छोड़ने से पहले कर लें ये कैलकुलेशन

Retiring at 45: जल्दी रिटायर होना काफी आकर्षक लग सकता है लेकिन ऐसा फंड तैयार करना जो 30-40 वर्षों तक या उससे अधिक समय तक खर्चों को पूरा कर सके, इसके लिए सावधानीपूर्वक प्लानिंग की जरूरत होती है। मान लीजिए कि 34 साल की उम्र में आपकी हर महीने की सैलरी ₹1.5 लाख है और आप 45 साल की उम्र तक रिटायर होना चाहते हैं। ऐसे में आपके सामने पहली बड़ी चुनौती यह अनुमान लगाने की है कि भविष्य में आपके खर्च कितने होंगे, रिटायरमेंट के लिए कितने बड़े फंड की जरूरत पड़ेगी और इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए हर महीने कितना निवेश करना होगा।

Retiring at 45: ये है पूरा कैलकुलेशन

बजाज कैपिटल के ज्वाइंट चेयरमैन और एमडी संजीव बजाज का का कहना है कि 45 साल की उम्र में रिटायर होना एक बड़ा लक्ष्य है, लेकिन इसकी शुरुआत निवेश के विकल्प चुनने से नहीं, बल्कि यह समझने से होनी चाहिए कि 45 साल की उम्र में आपका खर्च कितना होगा। चूंकि आपकी उम्र 34 साल है तो आपके पास 11 साल हैं इस प्लानिंग के लिए और इन्हीं 11 साल में जिंदगी भर के लिए खर्चों का इंतजाम करना है। संजीव के मुताबिक इसमें दो चीजों का हल खोजना है- एक तो कम समय में पर्याप्त बड़ा रिटायरमेंट फंड तैयार करना और दूसरा यह सुनिश्चित करना कि वह फंड लंबे समय तक आपके खर्चों को पूरा कर सके।

एक आसान उदाहरण से समझिए इसे। मान लीजिए कि आपका हर महीने का खर्च अभी ₹60 हजार है और अगर महंगाई सालाना 6% की रफ्तार से बढ़े तो जब आप 45 साल के होंगे, तब यही खर्च बढ़कर लगभग ₹1.14 लाख प्रति माह हो सकता है। अब अगर आप रिटायरमेंट के दौरान हर साल अपने फंड का 3.5% निकालने का टारगेट रखते हैं, और महंगाई के हिसाब से निकाली जाने वाले पैसे को हर साल बढ़ाते हैं, तो 40 साल से अधिक के रिटायरमेंट के लिए आपको लगभग ₹3.9 करोड़ के फंड की जरूरत हो सकती है।

अब आता है असली गणित। 11 साल में इस ₹3.9 करोड़ के फंड को तैयार करने के लिए अगर मान लेते हैं कि निवेश की गई पूंजी पर सालाना 10% की रफ्तार से रिटर्न मिल रहा है तो आपको हर महीने लगभग ₹1.7 लाख निवेश करना होगा जोकि ₹1.5 लाख की मौजूदा इनकम से कम है। ऐसे में मौजूदा जीवनशैली और इनकम के हिसाब से 45 साल की उम्र में पूरी तरह रिटायर होना मुश्किल होगा। हालांकि इस कैलकुलेशन से आपको पता चल गया कि कहां क्या बदलाव करना है।

अगर अर्ली-रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाकर 45 साल से 50 वर्ष कर दी जाए तो हर महीने ₹1.15 लाख के निवेश में काम हो जाएगा। इसके अलावा कुछ और तरीके भी अपना सकते हैं जैसे कि रिटायरमेंट के बाद अनुमानित खर्चों को कम करना, सैलरी बढ़ने पर निवेश की रकम बढ़ाना और 45 साल की उम्र के बाद पूरी तरह काम छोड़ने के बजाय पार्ट-टाइम काम या कंसल्टिंग से कुछ कमाई जारी रखना।

कुछ सावधानी और रिस्क समझना भी जरूरी

जल्दी रिटायरमेंट की योजना बनाते समय स्वास्थ्य से जुड़े खर्चों पर खास ध्यान देना चाहिए क्योंकि आमतौर पर नौकरी छोड़ने के बाद कंपनी की तरफ से मिलने वाला हेल्थ इंश्योरेंस भी समाप्त हो जाता है। ऐसे में आपको अपनी हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी और भविष्य में मेडिकल खर्चों के लिए अलग से योजना बनानी होगी।

एक और अहम रिस्क मार्केट में बिकवाली का दबाव है। अगर रिटायरमेंट के तुरंत बाद शेयर बाजार में बड़ी गिरावट आ जाती है और आपको अपने खर्चों के लिए गिरते हुए निवेश से पैसा निकालना पड़ता है, तो आपके रिटायरमेंट फंड पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए कुछ वर्षों के खर्च के बराबर पैसे कम रिस्क वाले एसेट्स में रखने चाहिए। इससे जब शेयर मार्केट में हाहाकार मचा हो, तब जल्दबाजी में पैसे निकालने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

तीन काम करें सबसे पहले

अर्ली-रिटायरमेंट के लिए तीन काम सबसे पहले करना चाहिए-

तीन महीने तक के अपने वास्तविक खर्चों का रिकॉर्ड रखें। इससे आपको पता चलेगा कि हर महीने आपकी जरूरतों पर वास्तव में कितना पैसा खर्च होता है।

म्यूचुअल फंड, शेयर, पीपीएफ और ईपीएफ समेत अपने सभी मौजूदा निवेशों की पूरी लिस्ट बनाएं।

अपने मौजूदा फंड और लक्ष्य के बीच का अंतर निकालें। इससे पता चलेगा कि आपको कितना अतिरिक्त निवेश करना होगा और अपने लक्ष्य के लिए क्या बदलाव जरूरी हैं।

एक लाख रुपये सैलरी तो दिल्ली-NCR में किराए पर रहें या होम लोन लेकर खरीदें घर? एक्सपर्ट से जानें फॉर्मूला और EMI का पूरा कैलकुलेशन

डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Retirement Planning: ₹50000 मंथली सिप से बन जाएगा 8 करोड़ रुपये का रिटायरमेंट फंड, जानिए कैसे

रिटायरमेंट प्लानिंग के बारे में लोगों के मन में कई तरह के सवाल चलते रहते हैं। इसमें से एक सवाल है कि 35 साल का एक व्यक्ति जिसकी मंथली सैलरी 2 लाख रुपये है क्या वह मंथली 50,000 रुपये के निवेश से 5-8 करोड़ रुपये का रिटायरमेंट फंड तैयार कर सकता है?

रिटायरमेंट फंड का टारगेट और मंथली इनवेस्टमेंट की जानकारी अहम

मनीकंट्रोल ने बजाज कैपिटल के ज्वाइंट चेयरमैन एवं एमडी संजीव बजाज से इस सवाल का जवाब पूछा। उन्होंने कहा कि इस मामले में दो चीजें बिल्कुल साफ हैं। पहला, व्यक्ति कितना बड़ा रिटायरमेंट फंड जुटाना चाहता है। दूसरा, वह मंथली कितना इनवेस्ट कर सकता है। अब यह देखना है कि क्या इन दोनों इनपुट्स से टारगेट हासिल किया जा सकता है।

35 साल की उम्र में निवेश शुरू करने पर मिलेगा 25 साल का वक्त

मान लीजिए आप हर महीने 50,000 रुपये का निवेश तब तक करते हैं, जब तक आपकी उम्र 60 साल की नहीं हो जाती। इसका मतलब है कि अगर 35 साल की उम्र में आप निवेश शुरू करते हैं तो आपके पास निवेश के लिए करीब 25 साल का समय होगा। रिटायरमेंट फंड मार्केट के रिटर्न पर निर्भर करेगा।

सालाना रिटर्न के हिसाब से रिटायरमेंट फंड का आकार बदल जाएगा

अब हम तीन तरह की स्थितियों को लेकर चलते हैं। पहले में हम सालाना रिटर्न अगर 8 फीसदी मानते हैं तो इसका मतलब है कि रिटायरमेंट फंड करीब 4.6 करोड़ रुपये का होगा। अगर हम सालाना रिटर्न 10 फीसदी मानते हैं तो इसका मतलब है कि रिटायरमेंट फंड 6.2 करोड़ रुपये का होगा। 12 फीसदी रिटर्न पर यह करीब 8.5 करोड़ रुपये होगा।

रिटायरमेंट फंड पर इनफ्लेशन के पड़ने वाले असर का ध्यान रखना होगा

इसका मतलब है कि कैलकुलेशन के आधार पर अलग-अलग रिटर्न के हिसाब से 5-8 करोड़ रुपये का रिटायरमेंट फंड तैयार हो सकता है। लेकिन, अब एक बड़ा सवाल है कि आज से 25 साल बाद 5-8 करोड़ रुपये की असल वैल्यू कितनी रह जाएगी? अगर हम 6 फीसदी इनफ्लेशन मान लें तो 25 साल बाद 5 करोड़ रुपये की परचेंजिंग पावर करीब 1.2 करोड़ रुपये रह जाएगी।

इनफ्लेशन की वजह से लंबी अवधि में धीरे-धीरे घटती जाती है पैसे की वैल्यू

8 करोड़ रुपये की परचेंजिंग पावर 1.9 करोड़ रुपये रह जाएगी। इसका मतलब है कि 25 साल बाद हम 8 करोड़ रुपये से उतनी चीजें खरीद पाएंगे जितनी आज हम 1.9 करोड़ रुपये से खरीद सकते हैं। इसलिए रिटायरमेंट प्लानिंग करने में अपने लाइफ स्टाइल को ध्यान में रखना बहुत जरूरी है।

धीरे-धीरे सिप के अमाउंट को बढ़ाने पर लंबी अवधि में बड़ा फर्क पड़ता है

रिटायरमेंट प्लानिंग में धीरे-धीरे सिप के अमाउंट को बढ़ाने से बड़ा फर्क पड़ता है। अगर आप आज 35 साल की उम्र में हर महीने 50,000 रुपये से निवेश शुरू करते हैं तो पूरे करियर के दौरान आपका मंथली निवेश सिर्फ 50,000 नहीं रहेगा। इनकम बढ़ने के साथ आप अपना मंथली इनवेस्टमेंट बढा सकते हैं। अगर हर साल आप इसे 10 फीसदी बढ़ाते हैं तो काफी ज्यादा फर्क देखने को मिलेगा।

इनवेस्टमेंट में डायवर्सिफिकेशन का भी ध्यान रखना सबसे जरूरी

जब आप लंबी अवधि का निवेश करते हैं तो आप शेयरों से जुड़े इनवेस्टमेंट ऑप्शंस में निवेश के बारे में सोच सकते हैं। लेकिन, इसमें डायवर्सिफिकेशन का ध्यान रखना जरूरी है। आपकी रिटायरमेंट प्लानिंग में ईपीएफ या एनपीएस का कंट्रिब्यूशन शामिल हो सकता है। जैसे-जैसे आप रिटायरमेंट की तरफ बढ़ते हैं आपका फोकस वेल्थ क्रिएशन की जगह वेल्थ प्रोटेक्शन पर होना चाहिए।

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निवेश के दौरान इन तीन चीजों का भी जरूर रखें ध्यान 

इस दौरान आपको हेल्थ इंश्योरेंस, टर्म इंश्योरेंस और इमर्जेंसी फंड को भी बनाए रखना होगा। इसका फायदा यह है कि किसी अनहोनी की स्थिति में आपके इनवेस्टमेंट पर खराब असर नहीं पड़ेगा। साथ ही आपको अपने इनवेस्टमेंट प्लान को साल में एक बार रिव्यू करना होगा। जरूरत पड़ने पर आप इस प्लान में बदलाव कर सकते है। इस तरह से आप अपने लिए एक बड़ा रिटायरमेंट फंड तैयार कर सकते हैं।

डिसक्लेमर: मनीकंट्रोल पर एक्सपर्ट्स की तरफ से व्यक्त विचार उनके अपने विचार होते हैं। ये वेबसाइट या इसके मैनेजमेंट के विचार नहीं होते। मनीकंट्रोल की यूजर्स को सलाह है कि उन्हें निवेश का फैसला लेने से पहले सर्टिफायड एक्सपर्ट्स की राय लेनी चाहिए।

EPF Contribution: अक्टूबर से PF के लिए सैलरी कितना ज्यादा पैसा कटेगा? समझिए पूरा कैलकुलेशन

EPF Contribution: EPFO ने PF की सैलरी लिमिट15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये कर दी है। नया नियम 17 सितंबर 2026 से लागू हो गया है। सितंबर में पुराने और नए नियम के हिसाब से अलग-अलग कैलकुलेशन होगी। अक्टूबर से नई व्यवस्था का पूरा असर दिखेगा।

इस बदलाव का असर खास तौर पर उन कर्मचारियों पर पड़ेगा, जिनका PF के लिए माना जाना वाली बेसिक सैलरी 15,000 से 25,000 रुपये के बीच है। ऐसे कर्मचारियों का PF योगदान बढ़ सकता है। यानी हाथ में आने वाली सैलरी थोड़ी कम हो सकती है।

20,000 रुपये के PF वेतन पर कितना PF कटेगा?

मान लीजिए आपका PF वेतन 20,000 रुपये है। अक्टूबर से कर्मचारी का योगदान 12% के हिसाब से 2,400 रुपये होगा। पहले 15,000 रुपये की सीमा के कारण यही योगदान 1,800 रुपये था। यानी अब हर महीने 600 रुपये ज्यादा PF में जाएंगे।

नियोक्ता भी 2,400 रुपये का योगदान करेगा। लेकिन पूरा पैसा EPF में नहीं जाएगा। इसमें से 1,666 रुपये EPS यानी पेंशन स्कीम में जाएंगे। बाकी 734 रुपये EPF खाते में जमा होंगे।

योगदानपुरानी व्यवस्थाअक्टूबर 2026 से
कर्मचारी का EPF योगदान₹1,800₹2,400
नियोक्ता का EPS योगदान₹1,250₹1,666
नियोक्ता का EPF योगदान₹550₹734
नियोक्ता का कुल योगदान₹1,800₹2,400
कुल कर्मचारी + नियोक्ता योगदान₹3,600₹4,800

इस तरह 20,000 रुपये के PF वेतन वाले कर्मचारी के मामले में PF में हर महीने कुल 4,800 रुपये जाएंगे। पहले यह रकम 3,600 रुपये थी।

क्या मौजूदा कर्मचारियों पर भी असर होगा?

हां, कुछ मौजूदा EPF सदस्यों पर भी इसका असर पड़ेगा। खासकर उन कर्मचारियों पर, जो पहले EPF में थे लेकिन 15,000 रुपये की पुरानी सीमा से ज्यादा PF वेतन होने के कारण EPS में शामिल नहीं थे।

EPFO के मुताबिक, 20,000 रुपये PF वेतन वाला ऐसा कर्मचारी नई व्यवस्था में EPS का सदस्य बन सकता है। इसके बाद नियोक्ता का योगदान EPF और EPS के बीच बांटा जाएगा।

हर कर्मचारी का PF 25,000 रुपये पर नहीं कटेगा

यहां एक बात समझना जरूरी है। 25,000 रुपये नई वेतन सीमा है। इसका मतलब यह नहीं है कि हर कर्मचारी का PF 25,000 रुपये के आधार पर ही कटेगा। अगर किसी कर्मचारी का PF वेतन 25,000 रुपये से कम है, तो योगदान उसी वेतन के आधार पर होगा। PF वेतन और ग्रॉस सैलरी भी हमेशा एक जैसी नहीं होती।

EPFO के अक्टूबर के उदाहरण के मुताबिक, 10,000 रुपये के PF वेतन पर कर्मचारी का योगदान 1,200 रुपये होगा। 20,000 रुपये पर 2,400 रुपये और 25,000 रुपये पर 3,000 रुपये।

टेक होम सैलरी पर कितना असर?

20,000 रुपये के PF वेतन वाले कर्मचारी का योगदान 1,800 रुपये से बढ़कर 2,400 रुपये हो जाएगा। यानी हर महीने 600 रुपये ज्यादा PF में जमा होंगे। इसका सीधा असर टेक होम सैलरी पर पड़ सकता है। हालांकि, वास्तविक असर आपकी सैलरी स्ट्रक्चर और मौजूदा PF व्यवस्था पर निर्भर करेगा।

इस बदलाव का दूसरा पहलू यह है कि कर्मचारी का PF में ज्यादा पैसा जमा होगा। लंबे समय में इससे रिटायरमेंट के लिए जमा होने वाली रकम भी बढ़ सकती है।

कंपनी का पैसा कर्मचारी की सैलरी से नहीं कटेगा

EPFO ने यह भी साफ किया है कि कर्मचारी और नियोक्ता यानी कंपनी का योगदान अलग-अलग होता है। नियोक्ता का योगदान कर्मचारी की सैलरी से काटकर नहीं लिया जा सकता।

यानी 2,400 रुपये कर्मचारी के हिस्से से जाएंगे। इसके अलावा नियोक्ता अपनी तरफ से 2,400 रुपये का योगदान करेगा। इस तरह अक्टूबर से 20,000 रुपये के PF वेतन पर कुल 4,800 रुपये EPF और EPS में जाएंगे।

EPF Investment: रिटायरमेंट के बाद रेगुलर इनकम के लिए EPF का पैसा कहां लगाएं? समझिए पूरा हिसाब

EPF Investment: रिटायरमेंट के बाद रेगुलर इनकम के लिए EPF का पैसा कहां लगाएं? समझिए पूरा हिसाब

EPF Investment: रिटायरमेंट के समय EPF में 50 लाख रुपये जमा हैं तो सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पैसा कहां रखा जाए। असली सवाल यह है कि इस रकम से हर महीने खर्च कैसे चले और पैसा जल्दी खत्म भी न हो।

रिटायरमेंट के बाद सैलरी बंद हो जाती है। इसलिए EPF की रकम को अलग-अलग निवेश में बांटकर नियमित इनकम और लंबी अवधि की ग्रोथ का संतुलन बनाया जा सकता है।

50 लाख रुपये को कैसे बांटें?

Master Capital Services की वेल्थ मैनेजमेंट AVP आकांक्षा शुक्ला के मुताबिक, रिटायरमेंट पोर्टफोलियो में फिक्स्ड इनकम, डेट, इक्विटी और इमरजेंसी फंड का संतुलन रखा जा सकता है।

50 लाख रुपये के कॉर्पस का एक उदाहरण लें तो करीब 45% रकम यानी 22.50 लाख रुपये फिक्स्ड इनकम वाले विकल्पों में रखी जा सकती है। 32.5% यानी 16.25 लाख रुपये डेट में और 17.5% यानी 8.75 लाख रुपये इक्विटी में रखे जा सकते हैं। बाकी 2.50 लाख रुपये इमरजेंसी फंड के तौर पर रखे जा सकते हैं।

निवेशहिस्सारकम
फिक्स्ड इनकम45%₹22.50 लाख
डेट निवेश32.50%₹16.25 लाख
इक्विटी17.50%₹8.75 लाख
इमरजेंसी फंड5%₹2.50 लाख
कुल100%₹50 लाख

यह सिर्फ उदाहरण है। आप अपनी उम्र, मासिक खर्च, पेंशन और जोखिम क्षमता के हिसाब से इसमें बदलाव कर सकते हैं।

फिक्स्ड इनकम से कितनी कमाई?

22.50 लाख रुपये का हिस्सा SCSS, बैंक FD जैसे फिक्स्ड इनकम विकल्पों में रखा जा सकता है। अगर इस हिस्से पर करीब 7% सालाना ब्याज मिलता है, तो साल भर में लगभग 1.57 लाख रुपये की ब्याज आय बनती है।

यानी इस हिस्से से करीब 13,000 रुपये महीने की इनकम मिल सकती है।

डेट निवेश क्यों जरूरी है?

16.25 लाख रुपये डेट निवेश में रखने का मकसद पोर्टफोलियो को स्थिर रखना और जरूरत के समय पैसा उपलब्ध कराना है। डेट म्यूचुअल फंड जैसे विकल्प इसमें मदद कर सकते हैं।

अगर इस हिस्से से लंबे समय में करीब 6.5% सालाना रिटर्न मिलता है, तो सालाना लगभग 1.06 लाख रुपये की ग्रोथ बन सकती है।

इक्विटी में भी रखें कुछ पैसा

रिटायरमेंट के बाद पूरा पैसा सुरक्षित निवेश में रखने से महंगाई का असर बढ़ सकता है। इसलिए 50 लाख रुपये के इस उदाहरण में 8.75 लाख रुपये इक्विटी के लिए रखे गए हैं।

इस रकम को लार्ज-कैप, इंडेक्स या हाइब्रिड फंड जैसे विकल्पों में लगाया जा सकता है। यहां मकसद हर साल ज्यादा रिटर्न कमाना नहीं है। मकसद यह है कि लंबे समय में कॉर्पस पर महंगाई का असर कम हो। मान लीजिए इस हिस्से से लंबे समय में औसतन 10% रिटर्न मिलता है। तब साल भर में करीब 87,500 रुपये की ग्रोथ हो सकती है।

हर महीने कितनी रकम निकाल सकते हैं?

रिटायरमेंट में एक अहम सवाल यह है कि 50 लाख रुपये में से हर साल कितनी रकम निकाली जाए। स्वाति जैन के मुताबिक, 4 से 5% सालाना निकासी की रणनीति अपनाई जा सकती है।

50 लाख रुपये पर 4% की दर से सालाना करीब 2 लाख रुपये निकाले जा सकते हैं। यानी हर महीने लगभग 16,700 रुपये। अगर निकासी की दर 5% रखी जाए तो सालाना करीब 2.50 लाख रुपये निकलेंगे। इस हिसाब से मासिक रकम लगभग 20,800 रुपये होगी। इस तरह 50 लाख रुपये के कॉर्पस से करीब 16,700 से 20,800 रुपये महीने का शुरुआती कैश फ्लो बनाया जा सकता है।

1-2 साल का खर्च अलग रखें

रिटायरमेंट के बाद बाजार गिरने पर इक्विटी बेचकर खर्च निकालना नुकसानदायक हो सकता है। इससे बचने के लिए कुछ रकम अलग रखना जरूरी है। मान लीजिए आपका मासिक खर्च 20,000 रुपये है। ऐसे में एक साल का खर्च 2.40 लाख रुपये होगा। दो साल के खर्च के लिए करीब 4.80 लाख रुपये अलग रखे जा सकते हैं।

इस रकम को ऐसे विकल्प में रखा जा सकता है जहां पैसा आसानी से उपलब्ध हो। बाजार में बड़ी गिरावट आने पर रोजमर्रा के खर्च के लिए इक्विटी बेचने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

EPF पर ही निर्भर क्यों न रहें?

EPF रिटायरमेंट के लिए बड़ा कॉर्पस बनाने में मदद करता है। लेकिन रिटायरमेंट के बाद जरूरत बदल जाती है। हर महीने सैलरी की जगह अब निवेश से कैश फ्लो चाहिए।

Kustodian Life के फाउंडर कुणाल काबरा के मुताबिक, 58 साल की उम्र के बाद EPF में नया योगदान बंद हो जाता है और बैलेंस पर ब्याज मिलने की भी तय सीमा है। इसलिए रिटायरमेंट के बाद सिर्फ EPF पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग निवेशों से इनकम का इंतजाम करना जरूरी है।

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Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।

बिचौलियों का खेल खत्म! आउटसोर्स कर्मचारियों के लिए योगी सरकार का नया प्लान, जानिए कैसे 20 लाख लोगों की बदलेगी जिंदगी

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार बहुत जल्द बिचौलियों का खेल खत्म करने की तैयारी की रही है। राज्य सरकार आउटसोर्स कर्मचारियों के लिए सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाने पर तेजी से काम कर रही है। उत्तर प्रदेश कॉरपोरेशन फॉर आउटसोर्सिंग सर्विसेज (UPCOS) के लॉन्च से करीब 3.5 लाख आउटसोर्स कर्मचारी और उनके परिवार एक नए कल्याणकारी ढांचे के केंद्र में आ गए हैं। सरकार का कहना है कि परिवार के सदस्यों को शामिल करने पर इस पहल से 17 से 20 लाख लोग लाभांवित हो सकते हैं।

सरकार की व्यवस्था से दूर होंगी आउटसोस वर्करों की चिंताएं

बीजेपी के लिए यह प्रशासनिक सुधार से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। आउटसोर्स कर्मचारी सरकारी विभागों, हॉस्पिटल, लोकल बॉडी और दूसरे सार्वजनिक संस्थानों में काम करते हैं। इससे वे एक बड़ा कार्यबल बन जाते हैं जिनका सीधा लिंक सरकारी मशीनरी से होता है। नए सिस्टम का मकसद उनकी कुछ पुरानी चिंताओं को दूर करना है, जिसमें वेतन में देरी, एजेंसियों द्वारा कटौती, सामाजिक सुरक्षा की कमी और नौकरी को लेकर अनिश्चितता शामिल है।

आउटसोर्स कर्मियों के बैंक खाते में जाएगी सैलरी

यूपीसीओएस के तहत, सैलरी सीधे वर्कर के बैंक अकाउंट में भेजी जाएगी, जबकि ईपीएफ और ईएसआई योगदान नियमित जमा किए जाएंगे। सरकार ने कहा है कि आउटसोर्सिंग एजेंसियों को वर्कर की सैलरी से सर्विस चार्ज काटने की इजाजत नहीं होगी। कैटेगरी के आधार पर 20 लाख रुपये से 40 लाख रुपये के एक्सीडेंट इंश्योरेंस की भी घोषणा की गई है।

बड़े वेलफेयर मॉडल पर काम कर रही सरकार

प्रदेश सरकार के हाल के फैसले बताते हैं कि वह एक बड़े वेलफेयर मॉडल पर आगे बढ़ रही है। इसके तहत नकद लाभ को एक बड़े वेलफेयर मॉडल का केंद्र बिंदु माना जा रहा है। इसमें स्वास्थ्य, बीमा और रोजगार सुरक्षा भी शामिल है। हाल ही में पंचायत असिस्टेंट का मानदेय बढ़ाने पर सहमती के साथ ही सरकार ने रोजगार और सामाजिक आर्थिक सुरक्षा से जुड़े कई सहूलियतें प्रदान करने की घोषणा की। इसी तरह अगस्त में 3.5 लाख से अधिक मिड-डे मील कुक का मानदेय बढ़ाने का फैसला किया था। सरकार ने उन्हें कैशलेस हेल्थ कवर सहित कई अन्य सुविधाओं की घोषणा की थी। आंगनवाड़ी वर्कर्स को भी बढ़ते वेलफेयर नेट में लाया गया है। 8 सितंबर को, योगी ने हेल्पर्स और हेल्थ इंश्योरेंस के लिए उनके महीने के मानदेय को 8,000 रुपये से बढ़ाकर 12,000 रुपये करने की घोषणा की। बड़ी वेलफेयर स्कीमों की तुलना में अलग-अलग रकम कम लग सकती है, लेकिन राजनीतिक महत्व कवर किए जा रहे ग्रुप्स की संख्या और नेचर में है।

कल्याणकारी योजनाओं की सोच में बदलाव

लखनऊ में गिरी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज में एसोसिएट प्रोफेसर नोमिता पी कुमार ने कहा कि इन उपायों से सरकार की कल्याकारी योजनाओं की सोच में बदलाव का संकेत मिलता है। उन्होंने कहा, “पंचायत असिस्टेंट के मानदेय में 50% की बढ़ोतरी से लेकर आंगनवाड़ी वर्कर, मिड-डे मील कुक और आउटसोर्स कर्मचारियों के लिए बढ़ी हुई आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा तक, उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले वेलफेयर पॉलिटिक्स का एक नया पैटर्न उभर रहा है।”

EPF New Rules: अगर आपकी बेसिक सैलरी ₹40,000 या ₹50,000 है तो ईपीएफ के नए नियमों का असर किस तरह पड़ेगा?

EPF New Rules: सरकार ने ईपीएफओ के नियम में हाल में बड़ा बदलाव किया है। अब ईपीएफओ कवरेज के लिए बेसिक सैलरी (प्लस डीए) की लिमिट बढ़ाकर 25,000 रुपये कर दी गई है। अब तक यह सीमा 15,000 रुपये थी। सरकार का अनुमान है कि इस बदलाव से प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाले और 51 लाख लोग ईपीएफओ के दायरे में आ जाएंगे।

सबसे पहले यह समझ लेना जरूरी है कि ईपीएफओ के तहत प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाले लोग आते हैं। यह रिटायरमेंट बेनेफिट्स स्कीम है। इस स्कीम के मुख्य रूप से तीन बेनेफिट्स हैं। पहला एंप्लॉयीज के रिटायर करने पर उसके ईपीएफ में जमा पैसा उसे एकमुश्त मिल जाता है। दूसरा, रिटायरमेंट के बाद व्यक्ति को हर महीने पेंशन मिलती है। यह ईपीएफओ के एंप्लॉयीज पेंशन स्कीम के तहत मिलती है। हालांकि, इसके लिए कुछ शर्तें हैं। तीसरा फायदा एंप्लाॉयीज डिपॉजिट-लिंक्ड इंश्योरेंस (EDLI) स्कीम के तहत मिलता है।

ईपीएफओ के तहत एंप्लॉयीज की बेसिक सैलरी (प्लस डीए) से हर महीने 12 फीसदी पैसा कटता है। यह पैसा उसके ईपीएफ अकाउंट में जमा होता है। एंप्लॉयर भी एंप्लॉयीज के लिए हर महीने 12 फीसदी (बेसिक सैलरी प्लस डीए) का कंट्रिब्यूशन करता है। लेकिन, इस 12 फीसदी में से 8.33 फीसदी एंप्लॉयीज के पेंशन फंड में जाता है और 3.67 फीसदी ईपीएफ अकाउंट में जाता है। रिटायरमेंट के बाद एंप्लॉयीज को जो हर महीने पेंशन मिलती है, वह एंप्लॉयीज के पेंशन फंड में जमा पैसे से ही मिलती है।

नए नियम के मुताबिक, अब ऐसे एंप्लॉयीज भी अनिवार्य रूप से ईपीएफओ के तहत आएंगे, जिनकी बेसिक सैलरी 25,000 रुपये तक होगी। अगर किसी व्यक्ति की बेसिक सैलरी 25,000 रुपये है तो इसका 12 फीसदी कंट्रिब्यूशन एंप्लॉयीज की सैलरी से जाएगा। यह अमाउंट 3000 रुपये होगा। 3000 रुपये का ही कंट्रिब्यूशन एंप्लॉयर भी करेगा। एंप्लॉयर को अनिवार्य रूप से इस नियम का पालन करना होगा। इससे एंप्लॉयीज को रिटायरमेंट पर फायदा होगा।

सवाल है कि अगर किसी एंप्लॉयीज की बेसिक सैलरी 40,000 है या 50,000 रुपये है तो क्या होगा? एक्सपर्ट्स का कहना है कि कई कंपनियों में पहले से एंप्लॉयीज की बेसिक सैलरी के आधार पर ईपीएफ में कंट्रिब्यूशन होता है। ऐसी कंपनियों के एंप्लॉयीज पर किसी तरह का असर नहीं पड़ेगा। इसे एक उदाहरण की मदद से समझा जा सकता है। मान लीजिए आपकी बेसिक सैलरी 40,000 रुपये है और पहले से आपकी बेसिक सैलरी पर 12-12 फीसदी कंट्रिब्यूशन का नियम लागू है तो आपकी नेट सैलरी पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

ऐसी स्थिति में पहले की तरह आपकी 40,000 की बेसिक सैलरी का 12 फीसदी यानी 6 हजार रुपये ईपीएफ अकाउंट में जमा होगे। 6,0000 रुपये का कंट्रिब्यूशन एंप्लॉयर भी करेगा, जिसका 8.33 फीसदी एंप्लॉयी के पेंश फंड में जाएगा और बाकी 3.67 फीसदी ईपीएफ अकाउंट में जाएगा। इसका मतलब है कि आपके रिटायरमेंट बेनेफिट भी पहले की तरह बने रहेंगे।

अगर आपका एंप्लॉयर कहता है कि वह सिर्फ 25,000 रुपये की नई वेज सीलिंग का पालन करेगा तो आपकी सैलरी से सिर्फ 3000 रुपये कटेंगे। इतना ही कंट्रिब्यूशन एंप्लॉयर भी करेगा। ऐसी स्थिति में आपकी नेट सैलरी घट जाएगी, क्योंकि पहले के नियम के तहत एंप्लॉयर 15,000 रुपये की बेसिक सैलरी (प्लस डीए) पर आपका पैसा काटता था और खुद भी उतना कंट्रिब्यूशन करता था। यह बात 50,000 की बेसिक सैलरी पर भी लागू होगी। बेसिक सैलरी 50,000 होने के बावजूद एंप्लॉयर कंट्रिब्यूशन के लिए सिर्फ 25,000 बेसिक सैलरी की सीमा का इस्तेमाल करेगा।