बड़ी चेतावनी! अगर आप भी पीते हैं सिगरेट या शराब, तो आज ही जान लें हेल्थ इंश्योरेंस का यह नियम वरना फंस जाएगा क्लेम!

Smoking Impact Health Insurance Premium & Claims: जब भी लोग अपने लिए कोई नया हेल्थ इंश्योरेंस खरीदते हैं, तो उनका पूरा ध्यान पॉलिसी के कवरेज, प्रीमियम की लागत और कैशलेस अस्पतालों के नेटवर्क पर ही होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इंश्योरेंस कंपनियां पॉलिसी देने से पहले एक और बेहद महत्वपूर्ण चीज पर पैनी नजर रखती हैं? वह है आपका लाइफस्टाइल।

स्मोकिंग और अत्यधिक शराब पीने जैसी आदतें इंश्योरेंस कंपनियों के लिए जोखिम का आकलन करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाती हैं। अधिकांश लोगों को यह अंदाजा नहीं होता कि ये आदतें प्रीमियम की कीमतों और पॉलिसी की शर्तों को कितना प्रभावित कर सकती हैं। आइए समझते हैं कि सिगरेट और शराब की लत से आपके हेल्थ इंश्योरेंस पर क्या असर पड़ता है।

धूम्रपान करने वालों के लिए क्यों महंगा होता है इंश्योरेंस?

मेडिकल साइंस में धूम्रपान को कई गंभीर बीमारियों की मुख्य वजह माना गया है। सिगरेट पीने से दिल की बीमारी, स्ट्रोक, कैंसर और सांस से जुड़ी कई खतरनाक बीमारियां होने का खतरा काफी बढ़ जाता है।

चूंकि धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों के बीमार होने की संभावना गैर-धूम्रपान करने वालों से अधिक होती है, इसलिए इंश्योरेंस कंपनियां उनसे समान कवरेज के लिए भी ज्यादा प्रीमियम वसूलती हैं।

कई मामलों में कंपनियां पॉलिसी जारी करने से पहले मेडिकल टेस्ट कराने की मांग भी कर सकती हैं। यह एक्स्ट्रा लागत आपकी उम्र, पहले से मौजूद बीमारियों और आप कितनी मात्रा में धूम्रपान करते हैं, इस पर निर्भर करती है।

शराब पीने की आदत का पॉलिसी पर क्या असर होता है?

अल्कोहल का सेवन करने वाले हर व्यक्ति के लिए प्रीमियम हमेशा बढ़े, ऐसा जरूरी नहीं है। इंश्योरेंस कंपनियां रिस्क का आकलन करते समय आपकी ड्रिंकिंग फ्रीक्वेंसी और वॉल्यूम की जांच करती हैं। अत्यधिक शराब पीने से लिवर, दिल और शरीर के अन्य अंगों से जुड़ी गंभीर बीमारियां होने का जोखिम रहता है।

अगर मेडिकल इवैल्यूएशन में शराब की वजह से स्वास्थ्य जोखिम अधिक पाया जाता है, तो कंपनियां प्रीमियम की रकम को बढ़ा देती हैं। आप कितनी भी कम मात्रा में शराब पीते हों, इसका खुलासा फॉर्म में करना बेहद अनिवार्य है।

पॉलिसी लेते समय सच बताना क्यों है बेहद जरूरी?

हेल्थ इंश्योरेंस खरीदते समय सबसे महत्वपूर्ण नियम है पूरी ईमानदारी। प्रपोजल फॉर्म भरते समय आवेदकों को तंबाकू, धूम्रपान और शराब के सेवन से जुड़ी सभी आदतों का बिल्कुल सही-सही जानकारी देना चाहिए।

अगर कोई निवेशक अपनी इन आदतों को छुपाता है, तो भविष्य में क्लेम के समय बड़ी मुश्किल खड़ी हो सकती है। गैर-प्रकटीकरण की स्थिति में कंपनियां क्लेम को रोककर मामले की गहन जांच शुरू कर देती हैं।

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शुरुआत में ही सही और पूरी जानकारी देने से पॉलिसी सही शर्तों पर जारी होती है, जिससे भविष्य में क्लेम सेटलमेंट के दौरान किसी भी तरह के विवाद या क्लेम रिजेक्ट होने की संभावना खत्म हो जाती है।

क्या स्मोकिंग या शराब पीने वालों का क्लेम रिजेक्ट हो जाता है?

केवल स्मोकिंग या शराब पीने की आदत होने की वजह से ही आपका क्लेम खारिज नहीं किया जाता है। असल समस्या तब आती है जब आपने पॉलिसी लेते समय इस बात को छिपाया हो। अगर आपने आवेदन के दौरान अपनी आदतों की बिल्कुल सटीक जानकारी दी है और आप पॉलिसी के नियमों व शर्तों का पालन कर रहे हैं, तो इंश्योरेंस कंपनी बिना किसी रुकावट के आपके क्लेम को पास करेगी।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

1. क्या धूम्रपान करने वालों के लिए हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम हमेशा ज्यादा होता है?

जवाब: हां, अधिकांश मामलों में ऐसा ही होता है। धूम्रपान की वजह से होने वाले स्वास्थ्य जोखिमों के कारण कंपनियों की नजर में ऐसे लोग ‘हाई-रिस्क’ केटेगरी में आते हैं, जिससे उनका प्रीमियम बढ़ जाता है।

2. क्या कभी-कभार शराब पीने से भी प्रीमियम पर असर पड़ता है?

जवाब: इसका सीधा असर इस बात पर निर्भर करता है कि आपके शराब पीने की मात्रा से आपके बीमार होने की संभावना कितनी बढ़ रही है। हालांकि, इसकी जानकारी देना हर हाल में जरूरी है।

3. क्या क्लेम के समय धूम्रपान की आदत छिपाना भारी पड़ सकता है?

जवाब: बिल्कुल, अगर क्लेम के दौरान यह पाया गया कि आपने अपनी इस आदत को कंपनी से छिपाया था, तो आपकी क्लेम प्रक्रिया बेहद जटिल हो सकती है और क्लेम रिजेक्ट भी हो सकता है।

Direct vs Regular: एक ही म्यूचुअल फंड स्कीम, फिर भी एक को मिला ₹50 लाख ज्यादा रिटर्न! समझें एक्सपेंस रेशियो का असली खेल

Direct vs Regular Mutual Funds Comparison: म्युचुअल फंड में निवेश करने वाले हर निवेशक के सामने दो विकल्प होते हैं- डायरेक्ट प्लान और रेगुलर प्लान। हाल ही में ऑनलाइन ब्रोकिंग प्लेटफॉर्म ग्रो द्वारा रेगुलर म्यूचुअल फंड सेगमेंट में ‘MF Prime’ सर्विस लॉन्च करने के बाद यह बहस एक बार फिर तेज हो गई है। यह नई सर्विस उन निवेशकों के लिए है जो अपने पोर्टफोलियो को रीबैलेंस करने और सही फंड चुनने के लिए एक्सपर्ट्स की सलाह चाहते हैं।

वहीं, जेरोधा के को-फाउंडर नितिन कामथ का कहना है कि खुद से निवेश करने वाले निवेशकों के लिए डायरेक्ट प्लान एक ‘नो-ब्रेनर’ यानी सबसे आसान और समझदारी भरा विकल्प है, क्योंकि इसमें डिस्ट्रीब्यूटर कमीशन नहीं देना पड़ता। उन्होंने बताया कि उनके प्लेटफॉर्म ‘कॉइन’ पर निवेशकों ने कमीशन न देकर अब तक हजारों करोड़ रुपये बचाए हैं। आइए समझते हैं कि डायरेक्ट और रेगुलर फंड्स में क्या अंतर है और कैसे डायरेक्ट प्लान आपके पोर्टफोलियो में ₹50 लाख तक एक्स्ट्रा जोड़ सकता है।

डायरेक्ट और रेगुलर म्यूचुअल फंड में क्या अंतर है?

इन दोनों प्लान्स में सबसे बड़ा और मुख्य अंतर एक्सपेंस रेशियो यानी फंड मैनेजमेंट के खर्च का होता है:

डायरेक्ट प्लान: इसमें निवेशक सीधे एसेट मैनेजमेंट कंपनी (AMC) यानी म्यूचुअल फंड हाउस से यूनिट्स खरीदता है। इसमें बीच में कोई ब्रोकर, एजेंट या डिस्ट्रीब्यूटर नहीं होता, इसलिए कोई कमीशन नहीं कटता। नतीजा यह होता है कि इसका एक्सपेंस रेशियो काफी कम होता है।

रेगुलर प्लान: इसमें निवेशक किसी डिस्ट्रीब्यूटर, ब्रोकर या फाइनेंशियल एडवाइजर के माध्यम से निवेश करता है। फंड हाउस इन मध्यस्थों को कमीशन देता है, जिसे एक्सपेंस रेशियो में जोड़ दिया जाता है। इसलिए, रेगुलर प्लान का खर्च डायरेक्ट प्लान से थोड़ा ज्यादा होता है।

रिटर्न पर असर: अगर दो अलग-अलग निवेशक एक ही म्यूचुअल फंड स्कीम में एक जितनी रकम और एक जितनी अवधि के लिए निवेश करते हैं, तो डायरेक्ट प्लान वाले निवेशक को कम लागत के कारण रेगुलर प्लान की तुलना में थोड़ा अधिक रिटर्न मिलेगा।

डायरेक्ट और रेगुलर म्यूचुअल फंड में क्या अंतर है?

लॉन्ग टर्म में कैसे जुड़ सकते हैं ₹50 लाख एक्स्ट्रा?

दिखने में डायरेक्ट और रेगुलर प्लान के एक्सपेंस रेशियो में महज 0.50% से 1% तक का ही अंतर नजर आता है, लेकिन लॉन्ग टर्म में कंपाउंडिंग यानी ब्याज पर ब्याज के कारण यह मामूली अंतर एक विशाल रकम में बदल जाता है।

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मान लीजिए कि आप 30 साल के लिए एक बड़ी रकम निवेश करते हैं। रेगुलर प्लान में जहां आपका डिस्ट्रीब्यूटर कमीशन कटता रहेगा, वहीं डायरेक्ट प्लान में वह बचा हुआ 1% कमीशन हर साल आपके पोर्टफोलियो में दोबारा निवेश होता रहेगा। 30 साल की लंबी अवधि में यही बची हुई रकम कंपाउंड होकर आपके कुल फंड में ₹30 लाख से ₹50 लाख तक का अतिरिक्त मुनाफा जोड़ सकती है।

क्या कम खर्च का मतलब हमेशा बेहतर रिटर्न है?

फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स का कहना है कि सिर्फ कम एक्सपेंस रेशियो देखकर डायरेक्ट प्लान चुन लेना ही समझदारी नहीं है, क्योंकि निवेश में सबसे बड़ा रोल इन्वेस्टर बिहेवियर का होता है।

म्युचुअल फंड रिसर्च फर्म फंड्सइंडिया के रिसर्च सीनियर मैनेजर जीरल मेहता के मुताबिक, ‘आंकड़े बताते हैं कि कई बार फंड्स जितना रिटर्न कमा कर देते हैं, आम निवेशकों को उतना रिटर्न नहीं मिल पाता। इसकी वजह यह है कि निवेशक बाजार में गिरावट आने पर डरकर अपने पैसे निकाल लेते हैं या फिर बाजार के बहुत ऊंचे होने पर निवेश करते हैं।’

इसे ‘बिहेवियर गैप’ कहा जाता है। यह गैप डायरेक्ट और रेगुलर प्लान के खर्चों के अंतर से कहीं ज्यादा बड़ा होता है। एक डायरेक्ट प्लान का निवेशक अगर 30 साल के सफर में सिर्फ दो बार भी गलत समय पर बाजार से बाहर निकलता है, तो वह डायरेक्ट प्लान से मिलने वाले सारे कॉस्ट-बेनिफिट को पूरी तरह बर्बाद कर देता है।

फाइनेंशियल एडवाइजर की भूमिका और सही चुनाव

यहीं पर एक रेगुलर प्लान और फाइनेंशियल एडवाइजर की भूमिका अहम हो जाती है:

रेगुलर प्लान किसके लिए सही है? – ऐसे निवेशक जिन्हें मार्केट की गहरी समझ नहीं है, जो उतार-उढ़ाव देखकर घबरा जाते हैं और जिन्हें समय-समय पर पोर्टफोलियो की समीक्षा और रीबैलेंसिंग के लिए किसी गाइड की जरूरत होती है, उनके लिए रेगुलर प्लान बेहतर है। यहां थोड़ा ज्यादा एक्सपेंस रेशियो देना अंततः फायदेमंद साबित होता है क्योंकि एडवाइजर आपको गलत फैसले लेने से रोकता है।

डायरेक्ट प्लान किसके लिए सही है? – अगर आप एक ‘डू-इट-योरसेल्फ’ (DIY) इन्वेस्टर हैं, जो खुद रिसर्च कर सकते हैं, बाजार की गिरावट में शांत रह सकते हैं और बिना किसी बाहरी मदद के अनुशासित रहकर निवेश जारी रख सकते हैं, तो डायरेक्ट प्लान आपके लिए सबसे ज्यादा कॉस्ट-इफेक्टिव और मुनाफेमंद साबित होगा।

डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल पर विशेषज्ञों द्वारा व्यक्त किए गए विचार और निवेश टिप्स उनके अपने हैं, वेबसाइट या उसके प्रबंधन के नहीं। मनीकंट्रोल यूजर्स को सलाह देता है कि वे कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सर्टिफाइड एक्सपर्ट्स से जांच कर लें।

EPF Scheme 2026: बीमारी समेत 6 कारणों से कर सकेंगे आंशिक निकासी, जानिए कितना मिलेगा पैसा

EPF Scheme 2026: कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) ने EPF से जुड़े नियमों में बड़ा बदलाव किया है। अब सदस्य कम से कम छह अलग-अलग कारणों से अपने EPF खाते से आंशिक निकासी (Partial Withdrawal) कर सकते हैं।

EPF Scheme 2026 29 जून 2026 से लागू हो गई है। इसके साथ ही इसने EPF Scheme 1952 की जगह ले ली है। इसके पैरा 46 के मुताबिक, भविष्य निधि आयुक्त (Provident Fund Commissioner) सदस्य को EPF खाते से कम से कम 1,000 रुपये की आंशिक निकासी की अनुमति दे सकते हैं।

हालांकि, एक शर्त भी है। नए नियमों के तहत EPF खाते में हमेशा कम से कम 25% बैलेंस बनाए रखना होगा। इस न्यूनतम बैलेंस में कर्मचारी और कंपनी (Employer) दोनों के योगदान शामिल होंगे। आप बाकी 75% रकम निकाल सकते हैं, जो Eligible Member Balance रहेगा। आइए जानते हैं किन-किन वजहों से EPF से पैसा निकाला जा सकता है।

बीमारी के इलाज के लिए

अगर आपको या आपके परिवार के किसी सदस्य को इलाज के लिए पैसों की जरूरत है, तो 12 महीने की सदस्यता पूरी होने के बाद आप एलिजबल मेंबर बैलेंस का 100% तक निकाल सकते हैं।

मान लीजिए आपके EPF खाते में कुल 1 लाख रुपये हैं। ऐसे में 25 हजार रुपये खाते में न्यूनतम बैलेंस के तौर पर बने रहेंगे और आप अधिकतम 75 हजार रुपये तक निकाल सकेंगे।

घर खरीदने के लिए

EPF Scheme 2026 के तहत घर से जुड़े कई कामों के लिए भी पैसे निकाले जा सकते हैं। इसमें फ्लैट या मकान खरीदना शामिल है। घर बनाने के लिए प्लॉट खरीदने पर भी पैसा निकाला जा सकता है। मकान बनाने के लिए भी यह सुविधा मिलेगी। अगर आपने घर खरीदने या बनाने के लिए होम लोन लिया है, तो उसकी रकम चुकाने के लिए भी EPF से पैसा निकाल सकते हैं। इसके अलावा, पुराने घर की मरम्मत, विस्तार या रेनोवेशन के लिए भी आंशिक निकासी की अनुमति है।

इन सभी उद्देश्यों के लिए 12 महीने की सदस्यता पूरी होने के बाद एलिजबल मेंबर बैलेंस का 100% तक निकाला जा सकता है। हालांकि, इस सुविधा का फायदा पूरे मेंबरशिप पीरियड में अधिकतम 5 बार ही उठाया जा सकेगा।

पढ़ाई के लिए

अगर आपको या परिवार के किसी सदस्य की पढ़ाई के लिए पैसों की जरूरत है, तो 12 महीने की सदस्यता पूरी होने के बाद एलिजबल मेंबर बैलेंस का 100% तक निकासी की जा सकती है। इस वजह से अधिकतम 10 बार पैसे निकाले जा सकते हैं।

शादी के लिए

अपने या परिवार के किसी सदस्य की शादी के खर्च के लिए भी EPF से पैसा निकाला जा सकता है। इसके लिए भी 12 महीने की सदस्यता पूरी होना जरूरी है। इस श्रेणी में एलिजबल मेंबर बैलेंस का 100% तक निकाला जा सकता है। हालांकि, इस सुविधा का इस्तेमाल पूरे सदस्यता काल में 5 बार से ज्यादा नहीं किया जा सकेगा।

खास हालात में

नई योजना में कुछ विशेष हालात के लिए भी EPF से आंशिक निकासी की अनुमति दी गई है। ऐसे मामलों में 12 महीने की सदस्यता पूरी होने के बाद एलिजबल मेंबर बैलेंस का 100% तक निकाला जा सकता है।

नियमों के मुताबिक, इस श्रेणी में आंशिक निकासी की अनुमत संख्या की गणना प्रत्येक सदस्य के लिए 29 जून 2025 से नए सिरे से की जाएगी। इसे EPF Scheme 2026 की शुरुआत की तारीख के रूप में बताया गया है।

नौकरी छोड़ने पर

अगर कोई कर्मचारी 12 महीने की सदस्यता पूरी होने से पहले ही नौकरी छोड़ देता है, तब भी वह EPF से पैसा निकाल सकता है।

ऐसे मामलों में सदस्य एलिजबल मेंबर बैलेंस का 100% तक निकाल सकता है। हालांकि, इस आधार पर एक वित्त वर्ष में दो बार से ज्यादा निकासी की अनुमति नहीं होगी।

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Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।