Direct vs Regular: एक ही म्यूचुअल फंड स्कीम, फिर भी एक को मिला ₹50 लाख ज्यादा रिटर्न! समझें एक्सपेंस रेशियो का असली खेल

Direct vs Regular Mutual Funds Comparison: म्युचुअल फंड में निवेश करने वाले हर निवेशक के सामने दो विकल्प होते हैं- डायरेक्ट प्लान और रेगुलर प्लान। हाल ही में ऑनलाइन ब्रोकिंग प्लेटफॉर्म ग्रो द्वारा रेगुलर म्यूचुअल फंड सेगमेंट में ‘MF Prime’ सर्विस लॉन्च करने के बाद यह बहस एक बार फिर तेज हो गई है। यह नई सर्विस उन निवेशकों के लिए है जो अपने पोर्टफोलियो को रीबैलेंस करने और सही फंड चुनने के लिए एक्सपर्ट्स की सलाह चाहते हैं।

वहीं, जेरोधा के को-फाउंडर नितिन कामथ का कहना है कि खुद से निवेश करने वाले निवेशकों के लिए डायरेक्ट प्लान एक ‘नो-ब्रेनर’ यानी सबसे आसान और समझदारी भरा विकल्प है, क्योंकि इसमें डिस्ट्रीब्यूटर कमीशन नहीं देना पड़ता। उन्होंने बताया कि उनके प्लेटफॉर्म ‘कॉइन’ पर निवेशकों ने कमीशन न देकर अब तक हजारों करोड़ रुपये बचाए हैं। आइए समझते हैं कि डायरेक्ट और रेगुलर फंड्स में क्या अंतर है और कैसे डायरेक्ट प्लान आपके पोर्टफोलियो में ₹50 लाख तक एक्स्ट्रा जोड़ सकता है।

डायरेक्ट और रेगुलर म्यूचुअल फंड में क्या अंतर है?

इन दोनों प्लान्स में सबसे बड़ा और मुख्य अंतर एक्सपेंस रेशियो यानी फंड मैनेजमेंट के खर्च का होता है:

डायरेक्ट प्लान: इसमें निवेशक सीधे एसेट मैनेजमेंट कंपनी (AMC) यानी म्यूचुअल फंड हाउस से यूनिट्स खरीदता है। इसमें बीच में कोई ब्रोकर, एजेंट या डिस्ट्रीब्यूटर नहीं होता, इसलिए कोई कमीशन नहीं कटता। नतीजा यह होता है कि इसका एक्सपेंस रेशियो काफी कम होता है।

रेगुलर प्लान: इसमें निवेशक किसी डिस्ट्रीब्यूटर, ब्रोकर या फाइनेंशियल एडवाइजर के माध्यम से निवेश करता है। फंड हाउस इन मध्यस्थों को कमीशन देता है, जिसे एक्सपेंस रेशियो में जोड़ दिया जाता है। इसलिए, रेगुलर प्लान का खर्च डायरेक्ट प्लान से थोड़ा ज्यादा होता है।

रिटर्न पर असर: अगर दो अलग-अलग निवेशक एक ही म्यूचुअल फंड स्कीम में एक जितनी रकम और एक जितनी अवधि के लिए निवेश करते हैं, तो डायरेक्ट प्लान वाले निवेशक को कम लागत के कारण रेगुलर प्लान की तुलना में थोड़ा अधिक रिटर्न मिलेगा।

डायरेक्ट और रेगुलर म्यूचुअल फंड में क्या अंतर है?

लॉन्ग टर्म में कैसे जुड़ सकते हैं ₹50 लाख एक्स्ट्रा?

दिखने में डायरेक्ट और रेगुलर प्लान के एक्सपेंस रेशियो में महज 0.50% से 1% तक का ही अंतर नजर आता है, लेकिन लॉन्ग टर्म में कंपाउंडिंग यानी ब्याज पर ब्याज के कारण यह मामूली अंतर एक विशाल रकम में बदल जाता है।

EPF New Rules: बदल गए पीएफ के नियम! ₹1 लाख का एक्स्ट्रा फायदा, विड्रॉल लिमिट और क्लेम पर बड़ा अपडेट; 10 पॉइंट्स में समझें

मान लीजिए कि आप 30 साल के लिए एक बड़ी रकम निवेश करते हैं। रेगुलर प्लान में जहां आपका डिस्ट्रीब्यूटर कमीशन कटता रहेगा, वहीं डायरेक्ट प्लान में वह बचा हुआ 1% कमीशन हर साल आपके पोर्टफोलियो में दोबारा निवेश होता रहेगा। 30 साल की लंबी अवधि में यही बची हुई रकम कंपाउंड होकर आपके कुल फंड में ₹30 लाख से ₹50 लाख तक का अतिरिक्त मुनाफा जोड़ सकती है।

क्या कम खर्च का मतलब हमेशा बेहतर रिटर्न है?

फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स का कहना है कि सिर्फ कम एक्सपेंस रेशियो देखकर डायरेक्ट प्लान चुन लेना ही समझदारी नहीं है, क्योंकि निवेश में सबसे बड़ा रोल इन्वेस्टर बिहेवियर का होता है।

म्युचुअल फंड रिसर्च फर्म फंड्सइंडिया के रिसर्च सीनियर मैनेजर जीरल मेहता के मुताबिक, ‘आंकड़े बताते हैं कि कई बार फंड्स जितना रिटर्न कमा कर देते हैं, आम निवेशकों को उतना रिटर्न नहीं मिल पाता। इसकी वजह यह है कि निवेशक बाजार में गिरावट आने पर डरकर अपने पैसे निकाल लेते हैं या फिर बाजार के बहुत ऊंचे होने पर निवेश करते हैं।’

इसे ‘बिहेवियर गैप’ कहा जाता है। यह गैप डायरेक्ट और रेगुलर प्लान के खर्चों के अंतर से कहीं ज्यादा बड़ा होता है। एक डायरेक्ट प्लान का निवेशक अगर 30 साल के सफर में सिर्फ दो बार भी गलत समय पर बाजार से बाहर निकलता है, तो वह डायरेक्ट प्लान से मिलने वाले सारे कॉस्ट-बेनिफिट को पूरी तरह बर्बाद कर देता है।

फाइनेंशियल एडवाइजर की भूमिका और सही चुनाव

यहीं पर एक रेगुलर प्लान और फाइनेंशियल एडवाइजर की भूमिका अहम हो जाती है:

रेगुलर प्लान किसके लिए सही है? – ऐसे निवेशक जिन्हें मार्केट की गहरी समझ नहीं है, जो उतार-उढ़ाव देखकर घबरा जाते हैं और जिन्हें समय-समय पर पोर्टफोलियो की समीक्षा और रीबैलेंसिंग के लिए किसी गाइड की जरूरत होती है, उनके लिए रेगुलर प्लान बेहतर है। यहां थोड़ा ज्यादा एक्सपेंस रेशियो देना अंततः फायदेमंद साबित होता है क्योंकि एडवाइजर आपको गलत फैसले लेने से रोकता है।

डायरेक्ट प्लान किसके लिए सही है? – अगर आप एक ‘डू-इट-योरसेल्फ’ (DIY) इन्वेस्टर हैं, जो खुद रिसर्च कर सकते हैं, बाजार की गिरावट में शांत रह सकते हैं और बिना किसी बाहरी मदद के अनुशासित रहकर निवेश जारी रख सकते हैं, तो डायरेक्ट प्लान आपके लिए सबसे ज्यादा कॉस्ट-इफेक्टिव और मुनाफेमंद साबित होगा।

डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल पर विशेषज्ञों द्वारा व्यक्त किए गए विचार और निवेश टिप्स उनके अपने हैं, वेबसाइट या उसके प्रबंधन के नहीं। मनीकंट्रोल यूजर्स को सलाह देता है कि वे कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सर्टिफाइड एक्सपर्ट्स से जांच कर लें।

Zerodha के नितिन कामत ने Groww पर कसा तंज, फिर सोशल मीडिया पर शुरू हो गई डायरेक्ट वर्सेज रेगुलर फंड पर बहस

इनवेस्टर्स के निवेश के तरीके को लेकर अगर देश के दो सबसे बड़े इनवेस्टमेंट प्लेटफॉर्म्स के बीच बहस छिड़ जाए तो क्या होगा? हाल में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर ऐसा ही हुआ। डायरेक्ट और रेगुलेटर फंड्स से जुड़ी यह बहस काफी दिलचस्प हो गई। इसमें इनवेस्टर्स ने भी अपनी-अपनी राय व्यक्त की। आइए जानते हैं यह पूरा मामला क्या है।

नितिन कामत ने एक्स पर 9 जुलाई को पोस्ट शेयर किया

Zerodha के फाउंडर और सीईओ नितिन कामत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर डायरेक्ट म्यूचुअल फंड के बारे में अपनी राय बताई। उन्होंने अपने ग्राहकों को फ्री-ऑफ कॉस्ट डायरेक्ट फंड ऑफर करने की पॉलिसी के बारे में बताया। उनके इस पोस्ट ने कई इनवेस्टर्स का ध्यान खींचा। कई इनवेस्टर्स और यूजर्स ने इसे Groww की हाल में लॉन्च प्राइम सर्विस पर तंज के रूप में लिया।

ग्रो के जवाब देते ही सोशल मीडिया पर नई बहस शुरू हो गई

Groww ने बाद में इसका जवाब दिया। उसने साफ किया कि उसकी नई सर्विस के बारे में गलतफहमी है। हालांकि, इससे डायरेक्ट और रेगुलर फंड्स के फायदे और नुकसान को लेकर सोशल मीडिया पर नई बहस शुरू हो गई। पहले यह जान लेना जरूरी है कि डायरेक्ट फंड और रेगुलर फंड में क्या फर्क है। म्यूचुअल फंड की स्कीम में इनवेस्टर्स दो तरह से निवेश कर सकते हैं-डायरेक्ट और रेगुलर। डायरेक्ट फंड में आप सीधे फंड हाउस के जरिए उसकी स्कीम में निवेश करते हैं। इसमें कोई ब्रोकर या डिस्ट्रिब्यूटर शामिल नहीं होता है।

डायरेक्ट और रेगुलर फंड्स के बीच के फर्क को समझें

म्यूचुअल फंड की किसी स्कीम में अगर आप डिस्ट्रिब्यूटर या ब्रोकर के जरिए निवेश करते हैं तो उसे रेगुलर फंड कहा जाता है। चूंकि रेगुलर फंड में निवेश डिस्ट्रिब्यूटर या ब्रोकर के जरिए होता है, जिससे इसमें उसका कमीशन शामिल होता है। आपके निवेश का कुछ हिस्सा उसके कमीशन पर खर्च होता है। डायरेक्ट फंड में आप सीधे फंड हाउस की स्कीम में निवेश करते हैं, जिससे इसमें किसी तरह का कमीशन नहीं होता है। आपके निवेश का पूरा पैसा फंड हाउस के पास जाता है, जिसे वह निवेश करता है।

कामत ने कस्टमर्स को किफायती सर्विस देने की पॉलिसी पर दिया जोर

कामत ने एक्स पर अपने पोस्ट में कहा कि जीरोधा का फोकस शुरू से ही निवेश को आसान और किफायती रखने पर रहा है। उन्होंने बताया कि 2010 में जब हमने डिस्काउंट ब्रोकरेज मॉडल शुरू किया था तब हमने छोटे-बड़े सभी ट्रेड के लिए एक समान फीस रखने का फैसला किया था। उन्होंने बताया कि जीरोधा अपने इनवेस्टमेंट प्लेटफॉर्म Coin के जरिए म्यूचुअल फंड के मामले में भी यही पॉलिसी अपनाती है।

जीरोधा के कामत ने लो-कॉस्ट सर्विसेज पर उठाए सवाल

उन्होंने कहा कि अगर कोई प्लेटफॉर्म निवेश के अमाउंट पर कोई फीस चार्ज करता है तो उसे खुद की सर्विस को लो-कॉस्ट या डिस्काउंट सर्विसेज नहीं बताना चाहिए। उन्होंने कहा कि बहरहाल CoinByZerodha इंडिया में डायरेक्ट म्यूचुअल फंड्स का सबसे बड़ा प्लेटफॉर्म है। इसका डायरेक्ट म्यूचुअल फंड का एसेट अंडर मैनेजमेंट 1.6 लाख करोड़ रुपये है। हमारे सभी कस्टमर्स ने कमीशन के रूप में हजारों करोड़ रुपये की सेविंग्स की है।

कामत ने डायरेक्ट फंड के फायदों के बारे में बताया

कामत ने यह भी कहा कि कई प्लेटफॉर्म्स ने तो शुरुआत डायरेक्ट म्यूचुअल फंड्स के साथ की थी, लेकिन बाद में उन्होंने अपनी पॉलिसी बदल दी। उन्होंने यह भी कहा कि जीरोधा ऐसा नहीं करेगी। हम कस्टमर्स को डायरेक्ट म्यूचुअल फंड्स फ्री ऑफर करते रहेंगे। उन्होंने डायरेक्ट फंड के फायदों के बारे में भी बताया। उन्होंने इसे एक उदाहरण के जरिए समझाने की कोशिश की।

डायरेक्ट और रेगुलर फंड के रिटर्न में आता है फर्क

उन्होंने कहा कि लंबी अवधि में कॉस्ट काफी मायने रखता है। उन्होंने डीएसपी लार्जकैप फंड में मंथली 5000 रुपये के सिप का उदाहरण दिया। इस स्कीम में एक समान अवधि में डायरेक्ट प्लान और रेगुलर प्लान में एक समान अमाउंट निवेश करने पर रिटर्न अलग-अलग आता है। डायरेक्ट प्लान में पैसा बढ़कर करीब 19.5 लाख रुपये हो जाता है, जबकि रेगुलर प्लान में यह 18.3 लाख रुपये रहता है। इस फर्क की वजह कमीशन है।

ग्रो ने कहा कि डायरेक्ट फंड में निवेश की फ्री सर्विस जारी रहेगी

ग्रो ने उनके इस पोस्ट पर अपनी सफाई पेश की। उसने कहा कि म्यूचुअल फंड्स में निवेश को लेकर उसकी पॉलिसी नहीं बदली है। कंपनी ने कहा कि डायरेक्ट फंड अभी ग्रो के लिए सबसे अहम है और आगे भी रहेगा। 1 करोड़ से ज्यादा इनवेस्टर्स ने हमारे प्लेटफॉर्म के जरिए 1.9 लाख करोड़ रुपये का निवेश म्यूचुअल फंड्स में किए हैं। इससे ग्रो देश का सबसे बड़ा म्यूचुअल फंड प्लेटफॉर्म है। उसने साफ किया कि उसका MF Prime एक ऑप्शनल सर्विस है। इसे उन निवेशकों के लिए शुरू किया गया है जो अपने निवेश के प्रबंधन में अतिरिक्त सहायता चाहते हैं। इसका मतलब है कि उसकी बेसिक सर्विस फ्री बनी रहेगी।

यह भी पढ़ें: विदेशी निवेशकों के खरीदारी शुरू करने से बाजार में लौटी रौनक, जुलाई में 1968 करोड़ रुपये की खरीदारी की