IIFL Finance Q1 Results: NBFC कंपनी IIFL Finance ने जून तिमाही में शानदार नतीजे पेश किए हैं। अप्रैल-जून तिमाही में कंपनी का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट सालाना आधार पर 189.3% बढ़कर ₹675.1 करोड़ हो गया। पिछले साल इसी तिमाही में कंपनी ने ₹233.4 करोड़ का मुनाफा कमाया था। बेहतर लोन ग्रोथ, बढ़ी ब्याज आय और कम प्रावधान (Provision) की वजह से कंपनी का प्रदर्शन मजबूत रहा।
NII में तगड़ा उछाल दिखा
तिमाही के दौरान IIFL Finance की नेट इंटरेस्ट इनकम (NII) 54.8% बढ़कर ₹2,003.9 करोड़ पहुंच गई, जो पिछले साल ₹1,294.7 करोड़ थी। वहीं, प्रावधान घटकर ₹294.2 करोड़ रह गया, जो एक साल पहले ₹512.5 करोड़ था।
कंपनी की कुल आय 34% बढ़कर ₹2,202.4 करोड़ रही। वहीं, Pre-Provision Operating Profit 50% बढ़कर ₹1,252.4 करोड़ और Profit Before Tax 161% बढ़कर ₹928.6 करोड़ हो गया।
गोल्ड लोन बिजनेस में तेजी
IIFL Finance की कुल Assets Under Management (AUM) 38% बढ़कर ₹1.15 लाख करोड़ हो गई। इसमें सबसे बड़ा योगदान गोल्ड लोन कारोबार का रहा। गोल्ड लोन AUM सालाना आधार पर 114% बढ़कर ₹58,406 करोड़ पहुंच गया। इस पोर्टफोलियो का GNPA सिर्फ 0.61% रहा।
होम फाइनेंस AUM बढ़कर ₹41,540 करोड़ और MSME लोन पोर्टफोलियो ₹10,808 करोड़ हो गया। माइक्रोफाइनेंस पोर्टफोलियो भी बढ़कर ₹9,473 करोड़ पहुंच गया।
एसेट क्वालिटी भी मजबूत
IIFL Finance का GNPA 1.6% और NNPA 0.8% रहा। दोनों में पिछली तिमाही के मुकाबले 9-9 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी हुई है। हालांकि, Provision Coverage Ratio बढ़कर 94% पहुंच गया।
कंपनी का RoA 3.1%, RoE 19.5%, बुक वैल्यू ₹333.9 और CRAR 24.3% रहा। कंपनी के पास ₹7,148 करोड़ की लिक्विडिटी भी मौजूद है।
FY27 के लिए क्या है लक्ष्य?
IIFL Finance ने FY27 में करीब 25% AUM ग्रोथ का लक्ष्य रखा है। कंपनी की योजना सिक्योर्ड लेंडिंग बढ़ाने, बैंकों के साथ को-लेंडिंग साझेदारी मजबूत करने, इक्विटी जुटाने और एसेट क्वालिटी बनाए रखने की है।
IIFL Finance का शेयर बुधवार को 0.97% गिरकर ₹566.55 पर बंद हुआ। इसने एक साल में 7.12% का रिटर्न दिया है।
Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।
बहुत से लोग अपना बिजनेस शुरू करना चाहते हैं, लेकिन पैसों की कमी की वजह से ऐसा नहीं कर पाते। आमतौर पर बिजनेस शुरू करने के लिए ज्यादा निवेश की जरूरत होती है। लेकिन कुछ ऐसे कारोबार भी होते हैं जिन्हें बहुत कम निवेश से शुरू किया जा सकता है। आपको जानकर हैरानी होगी की एक शख्स ने 500 रुपये से भी कम खर्च में कारोबार शुरू किया और आज अच्छी कमाई कर रहा है। ये कहानी कर्नाटक के रहने वाले महेश हनुमंत कोलूर की है। महेश ने बेहद कम निवेश के साथ मशरूम की खेती शुरू कर एक सफल कारोबार खड़ा कर दिया।
कृषि में डिप्लोमा करने के बाद उन्होंने 2021 में अपने घर के एक छोटे से कमरे से इस काम की शुरुआत की। शुरुआत में ये सिर्फ एक छोटा प्रयास था, लेकिन लगातार सीखने और मेहनत के दम पर उन्होंने इसे बड़े बिजनेस में बदल दिया। आज उनका मशरूम कारोबार हर महीने करीब 3 लाख रुपये का टर्नओवर करता है।
कैसे शुरू की खेती
महेश ने अपने घर के 10×10 फीट के एक छोटे कमरे से मशरूम की खेती शुरू की। उन्होंने 65 रुपये में एक किलो ऑयस्टर मशरूम स्पॉन खरीदा और उससे 30 मशरूम बैग तैयार किए। महेश ने बताया, “गेहूं का भूसा, स्पॉन और पॉलीबैग मिलाकर मेरा कुल खर्च 500 रुपये से भी कम था। शुरुआत में अनुभव की कमी के कारण 10 बैग खराब हो गए, लेकिन बाकी बैगों से करीब 500 से 600 ग्राम मशरूम प्रति बैग मिला। इस तरह मुझे कुल लगभग 10 किलो मशरूम की पैदावार हुई।” महेश की पहली फसल स्थानीय बाजार में 180 से 220 रुपये प्रति किलो के भाव से बिकी, जिससे करीब दो महीने में उन्हें लगभग 2,000 रुपये की कमाई हुई।
300 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेचा मशरूम
उन्होंने कहा, “इस पहली कमाई ने मेरा आत्मविश्वास बढ़ाया और आगे काम करने की हिम्मत दी।” इसके बाद उन्होंने मुनाफे की रकम खर्च करने के बजाय कारोबार में दोबारा निवेश किया। अगले चरण में उन्होंने 200 मशरूम बैग तैयार किए और साफ-सफाई, नमी और तापमान को बेहतर तरीके से नियंत्रित करने पर ध्यान दिया। महेश ने बताया, “करीब तीन महीने बाद मैंने लगभग 250 किलो मशरूम की पैदावार ली, जिसे स्थानीय बाजार में औसतन 300 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बेचा। मशरूम की खेती मैंने ज्यादातर ट्रायल एंड एरर के जरिए सीखी।”
शुरुआत में आई परेशानियों से महेश ने हार नहीं मानी, बल्कि हर गलती से सीख लेकर अपनी खेती के तरीके बेहतर किए। हर नई फसल के साथ उनका अनुभव बढ़ता गया और इसी भरोसे के दम पर उन्होंने अपने कारोबार का विस्तार किया। साल 2022 में उन्होंने ऑयस्टर मशरूम के साथ मिल्की मशरूम की खेती भी शुरू की। उन्होंने ऐसी किस्मों को चुना जो स्थानीय मौसम के अनुकूल थीं और जिन्हें कम लागत में आसानी से उगाया जा सकता था। महेश के मुताबिक, बटन मशरूम की तुलना में ऑयस्टर और मिल्की मशरूम की बाजार में अच्छी मांग रहती है, इसलिए इनसे बेहतर कीमत मिलने की संभावना भी अधिक होती है।
बनाए मशरूम कुकीज
ताजे मशरूम जल्दी खराब होने से महेश को नुकसान का डर रहता था। इसका समाधान निकालते हुए उन्होंने मशरूम से लंबे समय तक सुरक्षित रहने वाले वैल्यू-एडेड प्रोडक्ट्स बनाना शुरू किया। सबसे पहले उन्होंने ऑर्गेनिक ऑयस्टर मशरूम, रागी और गुड़ से बनी मशरूम कुकीज तैयार कीं। महेश ने बताया, “शुरुआत में मैंने ये मशरूम कुकीज अपने दोस्तों और परिवार के लोगों को चखने के लिए दी थीं। सभी को उनका स्वाद काफी पसंद आया। इसके बाद मैंने इन्हें लैब में टेस्ट कराया। रिपोर्ट में पता चला कि इनका ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम है, जिससे ये हेल्थ का ध्यान रखने वाले लोगों और डायबिटीज़ के मरीजों के लिए भी अच्छा विकल्प बन सकती हैं।”
बढ़ाई मशरूम की खेती
मशरूम कुकीज को अच्छा रिस्पॉन्स मिलने के बाद महेश ने अपने उत्पाद दूसरे शहरों में भी बेचना शुरू किया। वह हर सप्ताहांत बेंगलुरु के ऑर्गेनिक किसान बाजारों में जाते थे, जहां ग्राहकों से मिले फीडबैक के आधार पर उन्होंने अपने प्रोडक्ट्स को और बेहतर बनाया। जैसे-जैसे महेश के कारोबार का विस्तार हुआ, उनके घर का छोटा सेटअप पर्याप्त नहीं रहा। बढ़ती मांग को देखते हुए उन्होंने 2023 में 30×20 फीट की एक नई मशरूम उत्पादन यूनिट शुरू की। इस यूनिट में एक समय में अलग-अलग चरणों में करीब 1,000 मशरूम बैग तैयार किए जा सकते हैं। आज उनकी यह यूनिट रोजाना लगभग 50 किलो ऑयस्टर और मिल्की मशरूम का उत्पादन कर रही है।
महेश ने कहा, “ताजे मशरूम ज्यादा दिनों तक सुरक्षित नहीं रहते और उनकी बाजार कीमत भी सीमित होती है। इसलिए हम रोज़ाना करीब 45 किलो मशरूम से वैल्यू-एडेड उत्पाद तैयार करते हैं। हमारा लक्ष्य सिर्फ मशरूम बेचना नहीं, बल्कि लोगों तक हेल्दी और ऑर्गेनिक फूड प्रोडक्ट्स पहुंचाने वाला एक मजबूत ब्रांड बनाना है।”
मशरूम पाउडर बनाया
महेश ने बताया कि उनकी यूनिट में हर दिन करीब 45 किलो मशरूम से कुकीज, चकली, अचार, मशरूम पाउडर और सूखे मशरूम जैसे उत्पाद तैयार किए जाते हैं। उन्होंने कहा, “सूखे मशरूम की बिरयानी और सूप बनाने में अच्छी मांग है, जबकि हेल्थ का ध्यान रखने वाले ग्राहकों के बीच मशरूम पाउडर तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।” उन्होंने बताया कि ताजे मशरूम करीब 400 रुपये प्रति किलो बिकते हैं, जबकि प्रोसेस्ड प्रोडक्ट्स से अधिक कमाई होती है। 200 ग्राम मशरूम अचार की कीमत 150 रुपये और 200 ग्राम मशरूम पाउडर की कीमत 500 रुपये रखी गई है।
महेश के अनुसार, मशरूम की प्रोसेसिंग शुरू करने के बाद उनके कारोबार में बड़ा बदलाव आया। उन्होंने कहा, “इससे सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि अगर ताजे मशरूम तुरंत नहीं बिकते, तो वे खराब नहीं होते। दूसरी बात, कई लोग सीधे मशरूम खाना पसंद नहीं करते, लेकिन मशरूम से बनी कुकीज, सूप और स्नैक्स आसानी से खा लेते हैं। वहीं प्रोसेस्ड प्रोडक्ट्स की कीमत भी ताजे मशरूम के मुकाबले कई गुना अधिक मिलती है।”
महेश ने अब अपने मशरूम कारोबार को सिर्फ थोक खरीदारों तक सीमित नहीं रखा है। वह अपने उत्पाद किसान बाजारों, स्थानीय किराना दुकानों, चाय की दुकानों और होटलों तक भी पहुंचा रहे हैं। फिलहाल वह हुबली की एक लैब से मशरूम स्पॉन मंगवाते हैं और आने वाले समय में उत्पादन बढ़ाने की तैयारी कर रहे हैं। इसके साथ ही वह मशरूम की खेती शुरू करने के इच्छुक लोगों को प्रशिक्षण भी देते हैं और अपने अनुभव के आधार पर कारोबार से जुड़ी जरूरी और व्यावहारिक जानकारी साझा करते हैं।
दिल्ली सर्राफा बाजार में 22 जुलाई को सोने और चांदी में तेजी देखने को मिली। सोने का भाव 1,900 रुपये के उछाल के साथ दो हफ्ते की ऊंचाई यानी 1,49,600 रुपये प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया। ग्लोबल मार्केट से पॉजिटिव संकेतों और स्ट्रॉन्ग डिमांड की वजह से कीमतों को सपोर्ट मिला। चांदी में भी जबर्दस्त तेजी दिखी।
चांदी एक दिन में 8500 रुपये चढ़ी
दिल्ली सर्राफा बाजार में 22 जुलाई को चांदी 8,500 रुपये की तेजी के साथ 2,30,000 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गई। चांदी में यह तेजी का लगातार छठा सत्र था। ट्रेडर्स ने कहा कि सोने में भी यह तेजी का लगातार तीसरा सत्र था। उनका मानना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार के पॉजिटिव संकेतों के साथ ही स्ट्रॉन्ग लोकल डिमांड और पिछले हफ्ते कीमतों में गिरावट के बाद अच्छी खरीदारी का असर कीमतों पर पड़ा।
फिजिकल सोने की डिमांड में रिकवरी
एचडीएफसी सिक्योरिटीज में सीनियर कमोडिटीज एनालिस्ट सौमिल गांधी ने कहा, “बुधवार को सोने में तेजी रही। इससे कीमतें दो हफ्ते की ऊंचाई पर पहुंच गई। इसमें फिजिकल सोने की डिमांड में रिकवरी का भी हाथ है।” उन्होंने कहा कि गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ETF) में भी निवेश बढ़ा है। इससे यह संकेत मिलता है कि हालिया गिरावट के बाद सोने को लेकर सेंटिमेंट बदल रहा है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सोने में तेजी
अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सोने में तेजी दिखी। स्पॉट गोल्ड 1.16 फीसदी यानी 47 डॉलर के उछाल के साथ 4,125 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गया। चांदी में भी करीब 1 फीसदी की तेजी रही, जिससे यह 59.32 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गई। बीते कुछ हफ्तों में सोने और चांदी पर काफी दबाव देखने को मिला था।
क्रूड ऑयल 5 हफ्ते की ऊंचाई पर पहुंचा
कोटक सिक्योरिटीज में कमोडिटी रिसर्च के एवीपी कायनात चेनवाला ने कहा कि पश्चिम एशिया में टेंशन और क्रूड ऑयल की कीमतें पांच हफ्ते की ऊंचाई पर पहुंच जाने के बावजूद सोने और चांदी में तेजी है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने कूटनीति से मामले के समाधान के संकेत दिए हैं। उन्होंने बताया कि अमेरिका बातचीत शुरू करना चाहता है लेकिन चीन इसके लिए तैयार नहीं है। इससे इनवेस्टर्स ‘इंतजार करो और देखो’ की पॉलिसी अपना रहे हैं।
22 जुलाई को ब्रेंट क्रूड की कीमतें 94 डॉलर प्रति बैरल को पार गई। अगर क्रूड में तेजी जारी रहती है या लंबे समय तक कीमतें इस लेवल पर बनी रहती हैं तो दुनियाभर में महंगाई बढ़ने का खतरा होगा। अमेरिका में फेडरल रिजर्व उम्मीद से पहले इंटरेस्ट रेट बढ़ा सकता है। इसका निगेटिव असर सोने की कीमतों पर पड़ेगा। इंटरेस्ट रेट बढ़ने पर सोने की चमक घट जाती है।
गाजियाबाद के लाल कुआं और दादरी के बीच जीटी रोड पर रोजाना सफर करने वालों को लंबे समय से भारी ट्रैफिक जाम का सामना करना पड़ रहा है, खासकर हफ्ते के दिनों में पीक आवर्स के दौरान। ऐसे में चौधरी मोड़, न्यू बस स्टैंड और रेलवे क्रॉसिंग वाले हिस्से पर अक्सर जाम लगने की वजह से यात्रियों, कमर्शियल गाड़ियों और स्थानीय निवासियों को लंबे समय तक फंसे रहना पड़ता है।
News18 के अनुसार, अब लाल कुआं और दादरी के बीच कनेक्टिविटी बेहतर करने का लंबे समय से लंबित प्रस्ताव एक कदम और आगे बढ़ गया है; अधिकारियों ने इस रूट पर 12 किलोमीटर लंबे एलिवेटेड रोड कॉरिडोर का प्रस्ताव रखा है, जिससे जाम कम होने और यात्रा का समय काफी कम होने की उम्मीद है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रस्तावित एलिवेटेड रोड GT रोड के उस बड़े रीडेवलपमेंट प्लान का हिस्सा है जिसका मकसद गाजियाबाद और ग्रेटर नोएडा के बीच कनेक्टिविटी को बेहतर बनाना है। सेतु निगम ने इस कॉरिडोर के लिए डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) और सर्वे का काम पूरा कर लिया है।
करोड़ों की नई परियोजनाओं को मिलेगी मंजूरी
लगभग 650 करोड़ रुपये की लागत वाले इस प्रस्ताव को गाजियाबाद के सांसद अतुल गर्ग ने आगे बढ़ाया था और अब इसे मंजूरी के लिए उत्तर प्रदेश सरकार के पास भेजा गया है। मंजूरी मिलने के बाद, यह एलिवेटेड कॉरिडोर दादरी की ओर जाने वाले वाहनों को कई व्यस्त चौराहों और लोकल ट्रैफिक पॉइंट्स से बचाकर निकलने में मदद करेगा, जिसकी वजह से जाम की समस्या कम होने की उम्मीद है।
फिलहाल अभी, GT रोड पर भारी ट्रैफिक के कारण लाल कुआं और दादरी के बीच सफर में 45 मिनट से लेकर एक घंटे तक का समय लग सकता है। जबकि चौधरी मोड़, न्यू बस स्टैंड और रेलवे क्रॉसिंग के पास जाम की वजह से लोगों को लंबे समय तक रुकना पड़ता है।
ट्रैफिक होगा कम
अधिकारियों का मानना है कि एलिवेटेड रोड से गुजरने वाले ट्रैफिक के लिए एक अलग रास्ता मिलने से सफर का समय घटकर लगभग 15 से 20 मिनट हो सकता है। News18 की रिपोर्ट के मुताबिक, रोजाना सफर करने वालों का कहना है कि यह प्रोजेक्ट दोनों तरफ सफर का समय कम करके उनके रोजाना लगभग एक घंटे बचा सकता है।
प्रस्तावित कॉरिडोर सीधे लाल कुआं से दादरी तक जाएगा और रास्ते में पड़ने वाले बड़े चौराहों से होकर नहीं गुजरेगा। दूर जाने वाला ट्रैफिक एलिवेटेड हिस्से से गुजरेगा, जबकि लोकल गाड़ियां नीचे वाली सड़क का इस्तेमाल करती रहेंगी।
अधिकारियों को उम्मीद है कि लोकल और लंबी दूरी के ट्रैफिक के अलग-अलग होने से आवागमन बेहतर होगा, चार प्रमुख सिग्नलों पर लगने वाला जाम कम होगा और इस रास्ते की सबसे बड़ी समस्या भी दूर होगी। दरअसल, अभी एक ही सड़क पर भारी कमर्शियल वाहन, औद्योगिक क्षेत्र का ट्रैफिक और स्थानीय यात्रियों की आवाजाही होती है, जिससे अक्सर जाम की स्थिति बनती है।
बता दें कि GT रोड उन सबसे व्यस्त सड़क कॉरिडोर में से एक है जो दिल्ली को गाजियाबाद और आस-पास के इलाकों से जोड़ता है। दिल्ली, सीलमपुर, साहिबाबाद, मोहन नगर और घंटा घर से आने वाला ट्रैफिक लाल कुआं की तरफ आता है, जिससे मौजूदा सड़क नेटवर्क पर काफी दबाव पड़ता है।
गौरतलब है कि लाल कुआं पर दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे से आने वाली गाड़ियां, अलीगढ़ की ओर जाने वाली गाड़ियां और दादरी व सूरजपुर की ओर जाने वाले भारी इंडस्ट्रियल ट्रैफिक की वजह से जाम की समस्या बढ़ जाती है। News18 की रिपोर्ट के मुताबिक, यहां पहले से मौजूद फ्लाईओवर ने कुछ हद तक राहत जरूर दी है, लेकिन नीचे वाली सड़क पर अभी भी भारी ट्रैफिक रहता है, खासकर दादरी NTPC, कोट और आस-पास के इंडस्ट्रियल इलाकों में जाने वाले ट्रकों की वजह से।
उम्मीद है कि एलिवेटेड रोड से गाजियाबाद, क्रॉसिंग्स रिपब्लिक, ग्रेटर नोएडा वेस्ट और दादरी रोड के बीच कनेक्टिविटी बेहतर होगी। साथ ही, इससे सूरजपुर, कोट और दादरी के इंडस्ट्रियल हब को भी फायदा होगा, क्योंकि माल की ढुलाई आसान हो जाएगी।
अधिकारियों को यह भी उम्मीद है कि यह प्रोजेक्ट गाजियाबाद और ग्रेटर नोएडा के बीच सफर करने वाले लोगों के लिए एक वैकल्पिक रास्ता उपलब्ध कराएगा, जिससे दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे की सर्विस लेन पर ट्रैफिक का दबाव होगा।
इस प्रोजेक्ट का असर रियल एस्टेट सेक्टर पर भी पड़ने की उम्मीद है। NCR में पहले भी देखा गया है कि जब किसी इलाके में कनेक्टिविटी और इंफ्रास्ट्रक्चर बेहतर होता है, तो वहां घरों की मांग बढ़ने लगती है। माना जा रहा है कि प्रस्तावित एलिवेटेड रोड का भी ऐसा ही असर देखने को मिल सकता है।
लाल कुआं, जिसे पहले मुख्य रूप से एक ट्रांजिट पॉइंट माना जाता था, धीरे-धीरे एक रिहायशी इलाके के तौर पर उभरा है क्योंकि यह वेव सिटी, क्रॉसिंग्स रिपब्लिक और राज नगर एक्सटेंशन से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।
वहीं, नोएडा में प्रॉपर्टी की कीमतें लगातार बढ़ने के कारण, कई घर खरीदार गाजियाबाद और आस-पास के इलाकों में तुलनात्मक रूप से सस्ते घरों के विकल्प तलाशने लगे हैं।
एलिवेटेड रोड बनने के बाद दादरी, कोट गांव और रोजा-याकूबपुर क्षेत्र जैसे इलाकों की लोकप्रियता बढ़ सकती है, क्योंकि यहां से गाजियाबाद पहुंचना आसान हो जाएगा।
रिपोर्टों से पता चलता है कि इस इलाके में अभी दादरी की तरफ 45 लाख रुपये से कम कीमत वाले 2BHK घरों की मांग है, जबकि लाल कुआं और क्रॉसिंग्स रिपब्लिक में खरीदार 65 लाख रुपये से कम कीमत वाले 2BHK और 3BHK अपार्टमेंट देख रहे हैं।
फिलहाल यह प्रस्ताव उत्तर प्रदेश सरकार की मंजूरी का इंतजार कर रहा है। जैसे ही इसे हरी झंडी मिलेगी, अधिकारी जमीन से जुड़े काम, अतिक्रमण हटाने और बिजली-पानी जैसी सार्वजनिक सुविधाओं (यूटिलिटी) को शिफ्ट करने की प्रक्रिया शुरू करेंगे। आमतौर पर इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में यही चरण सबसे ज्यादा समय लेते हैं।
News18 की रिपोर्ट के मुताबिक, लाल कुआं से न्यू बस स्टैंड तक के एलिवेटेड सेक्शन की लागत लगभग 650 करोड़ रुपये आंकी गई है, जबकि दादरी की ओर जाने वाले पूरे 12 किलोमीटर के कॉरिडोर को चरणों में विकसित किए जाने की उम्मीद है। अगर मंजूरी और शुरुआती काम योजना के अनुसार आगे बढ़ते हैं, तो अगले साल तक निर्माण कार्य शुरू हो सकता है, जिससे NCR के सबसे व्यस्त कॉरिडोर में से एक पर यात्रा करने वाले लोगों को लंबे समय से जाम की समस्या से राहत मिलेगी।
Gold Silver Price Today: सोने और चांदी की कीमतों में बुधवार को जोरदार तेजी देखने को मिली। मजबूत वैश्विक संकेतों और घरेलू बाजार में बढ़ी खरीदारी की वजह से सोना ₹1,900 चढ़कर ₹1,49,600 प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया। यह करीब दो हफ्ते का सबसे ऊंचा स्तर है।
ऑल इंडिया सर्राफा एसोसिएशन के मुताबिक, मंगलवार को सोना ₹1,47,700 प्रति 10 ग्राम पर बंद हुआ था। इससे पहले 7 जुलाई को इसकी कीमत ₹1,49,250 प्रति 10 ग्राम थी।
चांदी ने भी लगाई लंबी छलांग
चांदी ने लगातार छह दिन की गिरावट पर ब्रेक लगा दिया। इसकी कीमत ₹8,500 बढ़कर ₹2,30,000 प्रति किलो हो गई। एक दिन पहले यह ₹2,21,500 प्रति किलो पर बंद हुई थी।
सोना-चांदी में तेजी क्यों आई?
बाजार के जानकारों का कहना है कि सोने में लगातार तीसरे दिन तेजी आई है। इसकी वजह सिर्फ एक नहीं है। विदेशी बाजार में मजबूती रही। घरेलू बाजार में खरीदारी बढ़ी। हाल की गिरावट के बाद निवेशकों ने भी खरीदारी का मौका देखा।
HDFC Securities के सीनियर कमोडिटी एनालिस्ट सौमिल गांधी ने कहा कि वैश्विक बाजार से मिले मजबूत संकेत और फिजिकल डिमांड बढ़ने से सोना दो हफ्ते के ऊंचे स्तर पर पहुंच गया। उन्होंने कहा कि गोल्ड ETF में दोबारा निवेश बढ़ने से भी बाजार को सहारा मिला है।
ग्लोबल मार्केट में क्या हो रहा है?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्पॉट गोल्ड 1.16% बढ़कर 4,125.24 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार कर रहा था। वहीं, स्पॉट सिल्वर करीब 1% चढ़कर 59.32 डॉलर प्रति औंस पहुंच गई।
Kotak Securities की AVP कमोडिटी रिसर्च कायनात चैनवाला ने बताया कि कारोबार के दौरान स्पॉट गोल्ड 4,140 डॉलर प्रति औंस के दो हफ्ते के उच्च स्तर तक पहुंच गया। वहीं, चांदी भी 60 डॉलर प्रति औंस के करीब पहुंच गई। पश्चिम एशिया में तनाव और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के बावजूद दोनों कीमती धातुओं में मजबूती बनी हुई है।
आगे किन बातों पर रहेगी नजर?
कायनात चैनवाला के मुताबिक, अमेरिका-ईरान बातचीत को लेकर अभी तस्वीर साफ नहीं है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा है कि बातचीत की गुंजाइश तो है, लेकिन फिलहाल ईरान गंभीर नहीं दिख रहा। इसलिए निवेशक इंतजार की रणनीति अपना रहे हैं।
वहीं, Mirae Asset ShareKhan के हेड ऑफ कमोडिटीज प्रवीण सिंह का कहना है कि सोने को तीन चीजों से सहारा मिल रहा है। पहली, अमेरिका-ईरान के बीच बातचीत दोबारा शुरू होने की उम्मीद। दूसरी, ट्रंप प्रशासन की ओर से फिर टैरिफ लगाने की शुरुआत। तीसरी, सोने का 4,000 डॉलर प्रति औंस के ऊपर टिके रहना।
अब बाजार की नजर अगले हफ्ते होने वाली अमेरिकी फेडरल रिजर्व की बैठक पर रहेगी। ब्याज दरों को लेकर जो संकेत मिलेंगे, वही आगे सोना और चांदी की चाल तय करेंगे।
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India completed the nationwide rollout of E20 petrol in April last year, making it the standard grade of petrol sold at fuel stations across the country. E20 contains 20 percent ethanol and 80 percent petrol, replacing the lower ethanol blends that were sold previously.
The transition has raised several questions among vehicle owners about compatibility, fuel efficiency, maintenance, warranties and long-term reliability. We separate the facts from the misconceptions and answer the key questions around E20.
1. What is E20 petrol and why has India switched to it?
E20 is fuel blended with 20 percent ethanol and 80 percent petrol. Ethanol is a biofuel produced from agricultural feedstocks such as sugarcane, maize and surplus food grains. India introduced the Ethanol Blended Petrol (EBP) Programme in 2003 with E5 petrol, and while the blended percentage kept varying for a while, it was eventually increased to E10 before completing the nationwide rollout of E20 in 2025, five years ahead of the planned implementation. According to the government, the programme aims to reduce dependence on imported crude oil, improve energy security, lower emissions and create an additional market for agricultural produce.
2. Can I use E20 fuel in my car or bike?
New petrol cars and two-wheelers sold in India today are compatible with E20 petrol. Under the government’s roadmap, vehicle manufacturers were required to make new petrol models manufactured from April 2023 compatible with E20.
Vehicles manufactured before April 2023 were designed for lower ethanol blends, so compatibility may vary depending on the model and year of manufacturing. However, some brands state that they had E20 material compliance before 2023, for a list click here.
3. How do I know if my car is E20 compatible?
The easiest way is to check your vehicle’s fuel flap or the owner’s manual or contact the manufacturer’s authorised dealership. As part of the government’s E20 roadmap, manufacturers progressively introduced E20-compatible petrol vehicles from 2023 onwards. However, compatibility can vary depending on the model and year of manufacture, so owners should not assume that every petrol vehicle is fully E20-compatible.
4. Can E20 damage older engines or fuel-system components?
Concerns about E20 mainly relate to older vehicles that were not originally designed for higher ethanol blends. While ethanol has not been found to significantly directly affect metal fuel-system components, prolonged exposure to E20 can accelerate wear in some older rubber and plastic parts such as fuel hoses, seals, O-rings, gaskets and certain fuel pipes if they are made from materials that are not ethanol compatible.
Before approving E20, ARAI tested metals, elastomers and plastics commonly used in fuel systems. The study found no significant corrosion of metal components, but certain rubber compounds and plastics used in older vehicles showed greater deterioration than with E10 fuel. These findings prompted manufacturers to use ethanol-compatible materials in newer vehicles. Thus, owners of older vehicles should keep up with regular servicing and follow the manufacturer’s recommended maintenance schedule, increasing the inspection frequency if damage is suspected.
5. Does E20 reduce fuel efficiency?
Yes. E20 fuel generally returns lower fuel efficiency than petrol with a lower ethanol content because ethanol contains less energy than petrol. The exact reduction varies depending on the vehicle, engine and calibration.
E20 vs E10 mileage test results
Creta N Line
Dzire (BS 6)
Polo GT TSI
Dzire (BS 4)
Registration year
2024
2024
2017
2016
Average speed
17.8kph
20.25kph
18.0
19.3
Kpl on E20
10.59
14.24
9.13
9.8
Kpl on E10
12.12
14.81
9.63
11.19
Kpl variance
1.53
0.57
0.50
1.39
% variance
-12.62
-3.84
-5.19
-12.42
ARAI estimates a fuel efficiency drop of 1-6 percent with E20, while some manufacturers put it closer to 7-8 percent. In Autocar India’s real-world testing, both newer E20-compatible cars and older pre-E20 vehicles recorded a measurable drop in mileage when compared with an equivalent E10 blend. Among the newer cars, the Maruti Suzuki Dzire recorded a 3.8 percent drop, while the Hyundai Creta N Line saw a 12.6 percent decline.
Among older BS4-era cars, the Volkswagen Polo GT TSI posted a 5.2 percent drop, while the older Maruti Suzuki Dzire recorded a mileage drop of 12.4 percent.
The results also showed that there is no single figure applicable to every vehicle. Factors such as engine calibration and compression ratio all influence fuel efficiency, meaning some vehicles adapt better to E20 than others.
6. Does E20 improve performance or reduce emissions?
Octane rating test results
Fuel type
RON result
Regular E20 petrol
98.2 RON
XP95
98.8 RON
Yes, but not in a way that most motorists are likely to notice. E20 has a higher-octane rating than regular petrol, which improves resistance to engine knocking and can benefit engines designed to take advantage of higher-octane fuel.
The government says E20 aims to lower emissions by replacing a portion of petrol with domestically produced ethanol which is a renewable fuel. For most motorists, however, the most noticeable effect of switching to E20 is likely to be a small drop in mileage rather than a change in vehicle performance.
7. Is E20’s water contamination issue a real problem?
Image credit – Rushlane
Ethanol is hygroscopic, meaning it has the capability to absorb moisture. As a result, E20 is more susceptible to water contamination if excess moisture enters the fuel during storage or handling. In severe cases, this can lead to phase separation, where the ethanol and water separate from the petrol, affecting fuel quality.
Some petrol pump operators have raised concerns that existing underground storage tanks, particularly during the monsoon or in coastal areas, could be more prone to moisture ingress, increasing the risk of phase separation. However, the government and the Federation of Automobile Dealers Associations (FADA) says that there is no evidence linking E20 itself to widespread fuel contamination or vehicle failures.
8. Will using E20 affect my vehicle’s warranty?
For most owners, no. Vehicle manufacturers have said that using E20 petrol will not affect the warranty of their vehicles, and valid warranties will continue to be honoured. The government, SIAM and several manufacturers have stated that vehicles continue to be covered under their standard warranty terms when fuelled with E20, for a full list click here. SIAM has also said that OEMs will honour the warranty committed to customers for E20 usage, and that insurance claims will remain unaffected.
9. Why isn’t E20 petrol cheaper than regular petrol?
Although E20 contains 20 percent ethanol, it is not cheaper than regular petrol because ethanol currently costs more to procure and blend than petrol under prevailing market conditions. The cost of ethanol procurement, tax, transportation, blending and distribution offsets any potential saving from replacing a portion of petrol with domestically produced ethanol.
Any savings from lower crude oil imports are realised at the national level rather than by consumers through lower pump prices.
10. Why can’t I still buy E10 or pure petrol?
Because by policy E20 is now India’s standard petrol. Following the nationwide rollout of the Ethanol Blending Programme, oil companies have standardised regular petrol and premium 95-octane petrol to an E20 blend. Maintaining parallel supplies of E10 and E20 would require separate storage, transportation and dispensing infrastructure, making nationwide distribution significantly more complex.
As a result, motorists can no longer choose between E10 and E20 at regular fuel stations. The only exception is 100-octane petrol, such as IndianOil XP100 and HP Power100, which remains effectively ethanol-free because it is a niche fuel sold in limited volumes. For most vehicle owners, however, E20 is now the only petrol available.
11. Is the government planning to increase ethanol blending beyond E20?
Not yet, but the groundwork has begun. While the government has said no decision has been taken to mandate petrol with more than 20 percent ethanol, it has begun preparing the regulatory framework for higher blends.
In May 2026, the Bureau of Indian Standards (BIS) notified fuel quality standards for E22, E25, E27 and E30 petrol, indicating that the government is laying the groundwork for future adoption. It has also proposed recognising E85 and E100 fuels under the Central Motor Vehicles Rules.
Separately, the government has tasked the Automotive Research Association of India (ARAI) with studying the impact of E25 petrol on existing E10- and E20-compatible vehicles, including its effect on fuel efficiency, durability, emissions and engine performance under long-term use.
However, any move beyond E20 will require extensive testing and consultation with vehicle manufacturers, fuel companies and research agencies to assess engine durability, emissions and fuel-system compatibility before it is introduced.
12. What should owners of older cars do now?
If your vehicle is not certified as E20-compatible, it does not necessarily mean it will experience immediate problems. However, owners should follow the manufacturer’s guidance, keep up with regular servicing and replace worn fuel-system components as required. It would also be prudent to increase the frequency of inspection of your vehicles fuel system to ensure there is no corrosive damage and catch it before it gets acute.
If you own a classic car, an older imported vehicle or a high-performance model designed for lower ethanol blends, using ethanol-free 100-octane petrol may be worth considering.
13. Can I convert my vehicle to run on E20 fuel?
Yes, but official upgrade programmes are currently limited and while a few manufacturers, like Royal Enfield and Maruti Suzuki, had mentioned a plan for these earlier, they don’t have much to say for now. In a recent government press conference that aimed to quell the E20 backlash, Maruti stated that the kits are for R&D purpose only.
Theoretically, it’s possible to replace critical components susceptible to E20 damage with those designed to handle the fuel – especially if your vehicle is still in production – and if you feel the need to, you can go ahead and have parts like fuel lines, fuel pump and gaskets replaced but by your authorised workshops only.
So, should you be worried about E20 petrol?
Not worried, but alert. Modern petrol cars and bikes designed or updated for E20 are engineered to run on the fuel without major issues, and extensive testing by the government, research agencies and manufacturers found no evidence of widespread reliability concerns.That said, E20 is not without trade-offs. Most motorists should expect a small reduction in fuel efficiency.
For owners of older vehicles, it would be wise to pay closer attention to fuel-system maintenance.
PM Awas Yojana: केंद्र सरकार ने संसद में प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) की ताजा प्रगति रिपोर्ट दी है। इसमें गांव और शहर, दोनों योजनाओं की स्थिति बताई गई है। सरकार के मुताबिक, जुलाई 2026 तक PMAY-Gramin (PMAY-G) के तहत 3.10 करोड़ से ज्यादा और PMAY-Urban (PMAY-U) के तहत 99.07 लाख से ज्यादा घर बनकर लाभार्थियों को दिए जा चुके हैं।
गांवों में कितने घर बने?
21 जुलाई को लोकसभा में सरकार ने बताया कि 4.18 करोड़ घरों के लक्ष्य के मुकाबले अब तक 3.92 करोड़ घरों को मंजूरी दी जा चुकी है। इनमें से 3.10 करोड़ घर बनकर तैयार हो चुके हैं। वहीं, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को दिए गए लक्ष्य के मुकाबले करीब 1.08 करोड़ घर अभी बनने बाकी हैं।
ग्रामीण विकास मंत्रालय के मुताबिक, FY22 से FY26 के बीच केंद्र सरकार ने PMAY-G के लिए ₹1,34,242.45 करोड़ जारी किए। वहीं, FY27 के लिए शुरुआती तौर पर ₹41,924.60 करोड़ का प्रावधान किया गया है। राज्यों को दिए जाने वाले लक्ष्य के हिसाब से इस रकम में बदलाव भी हो सकता है।
घर के साथ और क्या मिलता है?
PMAY-G में सिर्फ पक्का घर नहीं दिया जाता। दूसरी सरकारी योजनाओं का फायदा भी साथ में जोड़ा जाता है।
16 जुलाई तक 3.08 करोड़ घरों में शौचालय बनाए जा चुके हैं। 2.43 करोड़ घरों को पानी का कनेक्शन मिला है। 3.07 करोड़ घरों में बिजली पहुंच चुकी है। वहीं, 2.90 करोड़ परिवारों को LPG कनेक्शन भी दिया गया है। इसके अलावा 1.35 करोड़ परिवारों को स्वयं सहायता समूह (SHG) से जोड़ा गया है।
शहरों में भी सिर्फ घर बनाकर नहीं दिया जाता। घर के साथ पानी, बिजली, सड़क और स्वच्छता जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया जाता है।
लाभार्थियों का चयन कैसे होता है?
दोनों योजनाओं में पहले इच्छुक को घर के लिए आवेदन करना पड़ता है। फिर सरकार यह जांचती है कि आवेदक योजना की सभी शर्तें पूरी करता है या नहीं।
PMAY-G में गांव के जरूरतमंद परिवारों की पहचान सरकारी सर्वे के आधार पर की जाती है। देखा जाता है कि परिवार के पास पक्का घर है या नहीं और वह योजना की पात्रता में आता है या नहीं। पात्र पाए जाने पर उसका नाम लाभार्थी सूची में शामिल किया जाता है।
वहीं, PMAY-U में राज्य सरकारें और केंद्र शासित प्रदेश पहले अपने इलाके में घरों की जरूरत का आकलन करते हैं। इसके बाद परियोजनाएं बनाकर केंद्र सरकार को भेजी जाती हैं। आवेदन करने वाले लोगों के दस्तावेज और पात्रता की जांच होती है। जो लोग सभी शर्तें पूरी करते हैं, उन्हें योजना का लाभ दिया जाता है।
PM Awas Yojana के लिए आवेदन कैसे करें?
अगर गांव में रहते हैं (PMAY-G)
सबसे पहले ग्राम पंचायत या ब्लॉक कार्यालय में संपर्क करें।
अगर आपके इलाके में Awaas+ सर्वे चल रहा है, तो उसमें अपना नाम दर्ज कराएं।
आधार कार्ड, बैंक खाते और दूसरे जरूरी दस्तावेज जमा करें।
पात्रता की जांच के बाद आपका नाम लाभार्थी सूची में जोड़ा जाएगा।
मंजूरी मिलने पर घर बनाने के लिए किस्तों में पैसा सीधे बैंक खाते में भेजा जाएगा।
अगर शहर में रहते हैं (PMAY-U 2.0)
PMAY-U 2.0 की वेबसाइट या नजदीकी कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) पर आवेदन करें।
पहले अपनी पात्रता जांचें।
इसके बाद आवेदन फॉर्म भरें।
आधार, आय प्रमाण पत्र, बैंक खाते और दूसरे जरूरी दस्तावेज जमा करें।
आवेदन जमा होने के बाद उसकी जांच होगी।
पात्र पाए जाने पर योजना का लाभ मिलेगा और आवेदन की स्थिति ऑनलाइन भी देख सकेंगे।
घर बनने में कितना समय लगता है?
आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय के मुताबिक, शहरों में एक आवास परियोजना पूरी होने में आमतौर पर 12 से 36 महीने लगते हैं। यह जमीन की उपलब्धता, जरूरी मंजूरियों, फंडिंग और परियोजना के आकार पर निर्भर करता है।
सरकार का कहना है कि मंजूर घर तय समय पर पूरे हों, इसके लिए लगातार निगरानी की जाती है। नियमित समीक्षा बैठकें होती हैं। वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए प्रगति देखी जाती है। जरूरत पड़ने पर अधिकारियों की फील्ड विजिट भी कराई जाती है।
असम से पिछले 10 वर्षों में कितने अवैध विदेशी नागरिकों को उनके देशों में वापस भेजा गया है, इसका आधिकारिक आंकड़ा अब सामने आ गया है। समाचार एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक असम विधानसभा में सरकार ने जानकारी दी है कि पिछले 10 सालों में राज्य से करीब 2100 अवैध विदेशी नागरिकों को निर्वासित, निष्कासित या वापस भेजा गया है। बाहर निकाले गए इन अवैध विदेशियों में सबसे बड़ी संख्या बांग्लादेशी नागरिकों की है। ये संख्या 2023 है।
असम समझौता क्रियान्वयन मंत्री अतुल बोरा ने विधानसभा में एक सवाल के जवाब में यह जानकारी साझा की। कांग्रेस विधायक अब्दुल रहीम अहमद के प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने बताया कि 2016 से लेकर 30 जून 2026 तक कुल 2089 अवैध विदेशी नागरिकों को राज्य से बाहर निकाला गया है। इनमें बांग्लादेश के 2023 नागरिकों के अलावा म्यांमार के 39 और नाइजीरिया के 18 नागरिक शामिल हैं। इसके अलावा अफगानिस्तान, यूक्रेन और रूस से 2-2 नागरिकों को जबकि पाकिस्तान, केन्या और युगांडा से 1-1 नागरिक को उनके देश वापस भेजा गया है।
सबसे ज्यादा कार्रवाई साल 2025 में हुई
अगर साल-दर-साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो इस 10 साल के समय में सबसे ज्यादा कार्रवाई वर्ष 2025 में हुई। पिछले साल 1811 लोगों को वापस भेजा गया। इनमें नाइजीरिया के एक नागरिक को छोड़कर सभी अवैध विदेशी बांग्लादेश से थे। वहीं चालू वर्ष में 30 जून 2026 तक 263 घुसपैठियों को वापस भेजा जा चुका है। ये पिछले एक दशक में दूसरी सबसे बड़ी संख्या है। इनमें से 261 बांग्लादेश के और 2 रूस के नागरिक हैं।
इसी दौरान राइजर दल के विधायक अखिल गोगोई के एक प्रश्न का उत्तर देते हुए मंत्री ने धार्मिक आंकड़ों का भी ब्योरा दिया। उन्होंने बताया कि उपलब्ध जानकारी के मुताबिक 31 मई 2026 तक राज्य में कुल 172673 अवैध विदेशी चिह्नित किए गए हैं। इन चिह्नित विदेशियों में 111414 मुस्लिम, 61189 हिंदू और बाकी ईसाई या दूसरे धर्मों के अनुयायी शामिल हैं।
कार्रवाई के कानूनी आधार पर बात करते हुए अतुल बोरा ने स्पष्ट किया कि अवैध बांग्लादेशियों को वापस भेजने का काम गृह मंत्रालय के 2 मई 2025 के पत्र में तय दिशा-निर्देशों के अनुसार किया जा रहा है। वहीं सीमावर्ती देश में घुसपैठियों का निष्कासन ‘इमिग्रेंट्स (एक्सपल्शन फ्रॉम असम) एक्ट, 1950’ के प्रावधानों के तहत किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि निष्कासन और वापस भेजने की यह पूरी प्रक्रिया देश के मौजूदा कानूनों के तहत ही पूरी की जा रही है।
असमिया व्यक्ति की परिभाषा क्या है?
इसके अलावा विधानसभा में जब मंत्री से यह पूछा गया कि असमिया व्यक्ति की परिभाषा क्या है, तो उन्होंने इसे बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषय बताया। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर विभिन्न राष्ट्रवादी संगठनों और हितधारकों के साथ चर्चा जारी है। सरकार सभी वर्गों की राय, सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति बिप्लब कुमार शर्मा समिति की रिपोर्ट की सिफारिशों और कानूनी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए सही समय पर निर्णय लेगी।
आपको बता दें कि यह समिति 1985 के असम समझौते की धारा 6 को लागू करने की सिफारिशों के लिए 2019 में गृह मंत्रालय द्वारा गठित की गई थी। इसका उद्देश्य मूल असमिया आबादी की सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषाई पहचान को सुरक्षा देना है। मंत्री ने बताया कि सेवानिवृत्त जज की इस रिपोर्ट की सिफारिशों को लागू करने के लिए सरकार ने आवश्यक कदम उठाने शुरू कर दिए हैं।
EV Charging Stations in UP: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने और हरित परिवहन व्यवस्था विकसित करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया जा रहा है। प्रस्ताव के अनुसार, केंद्र सरकार की पीएम ई-ड्राइव स्कीम और उत्तर प्रदेश की ईवी मैन्युफैक्चरिंग और मोबिलिटी पॉलिसी-2022 के तहत प्रदेश में 238 सार्वजनिक ईवी चार्जिंग स्टेशन स्थापित करने की योजना पर काम तेज किया जा रहा है। यह पहल राज्य में चार्जिंग नेटवर्क को मजबूत करने और निवेश आकर्षित करने की रणनीति का हिस्सा है।
10 साल का मॉडल, 714 चार्जर होंगे स्थापित
प्रस्ताव के अनुसार, पहले चरण में 238 पब्लिक ईवी चार्जिंग स्टेशन विकसित किए जाएंगे, जिन पर 714 चार्जर लगाए जाएंगे। इन स्टेशनों के संचालन के लिए 10 वर्ष का अनुबंध प्रस्तावित है। सरकारी भूमि पर स्थापित होने वाले इन चार्जिंग स्टेशनों का उपयोग केवल ईवी चार्जिंग गतिविधियों के लिए होगा तथा संबंधित विभागों से ₹1 प्रति किलोवाट की दर से भूमि उपयोग शुल्क लिया जाएगा।
पीएम ई-ड्राइव के तहत मिलेगा विशेष प्रोत्साहन
प्रस्ताव के अनुसार चार्जिंग स्टेशनों को चार श्रेणियों में बांटा गया है। सरकारी कार्यालयों में स्थापित होने वाले स्टेशनों को अपस्ट्रीम इंफ्रास्ट्रक्चर और ईवीएसई (चार्जिंग उपकरण) पर 100 प्रतिशत तक सहायता का प्रावधान है, जबकि रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट, मेट्रो स्टेशन, पेट्रोल पंप, टोल प्लाजा तथा अन्य सार्वजनिक स्थानों पर भी अलग-अलग स्तर पर सब्सिडी का प्रस्ताव है। योजना का उद्देश्य शहरों के साथ-साथ प्रमुख हाईवे पर भी चार्जिंग नेटवर्क तैयार करना है।
योगी सरकार की ईवी नीति को मिलेगा नया बल
प्रस्ताव में उत्तर प्रदेश ईवी मैन्युफैक्चरिंग और मोबिलिटी पॉलिसी-2022 का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि सरकार का लक्ष्य उत्तर प्रदेश को इलेक्ट्रिक वाहन निर्माण और विकास का वैश्विक केंद्र बनाना है। इसके साथ ही व्यापक चार्जिंग एवं बैटरी स्वैपिंग नेटवर्क विकसित करना, स्वच्छ परिवहन को बढ़ावा देना तथा ईवी क्षेत्र में अनुसंधान और नवाचार को प्रोत्साहित करना भी प्रमुख उद्देश्य हैं। राज्य सरकार की नीति में चार्जिंग स्टेशन स्थापित करने वाले सेवा प्रदाताओं के लिए पूंजीगत प्रोत्साहन और सरकारी भूमि उपलब्ध कराने जैसे प्रावधान पहले से मौजूद हैं।
इन शहरों में सबसे अधिक चार्जिंग स्टेशन
प्रस्ताव के अनुसार सबसे अधिक चार्जिंग स्टेशन निम्न शहरों में प्रस्तावित हैं। गौतमबुद्ध नगर में 39, लखनऊ में 36, मेरठ में 35, गोरखपुर में 32, वाराणसी में 28, आगरा में 21, मथुरा में 14, प्रयागराज में 13, कानपुर नगर में 12, गाजियाबाद में 6, कानपुर देहात में 2 समेत कुल मिलाकर 238 स्थानों की पहचान की गई है। कई विभागों की जमीन होगी उपयोग में प्रस्ताव के अनुसार चार्जिंग स्टेशन नगर निगमों, विकास प्राधिकरणों, विद्युत वितरण कंपनियों, यूपीएसआरटीसी, जिला प्रशासन तथा अन्य सरकारी विभागों की उपलब्ध भूमि पर स्थापित किए जाएंगे। इसमें नोएडा, लखनऊ नगर निगम, वाराणसी नगर निगम, मेरठ नगर निगम, गोरखपुर नगर निगम सहित अनेक सरकारी संस्थाओं की भूमि शामिल है।
शहर के अंदर और हाईवे पर योगी सरकार का बराबर फोकस
प्रस्ताव में शहर के अंदर और हाईवे पर चार्जिंग स्टेशनों के लिए अलग-अलग मानक तय किए गए हैं। शहरों में लगभग 40–60 वर्गमीटर और हाईवे पर बड़े चार्जिंग हब के लिए 250–300 वर्गमीटर तक भूमि की आवश्यकता बताई गई है। हाईवे स्टेशनों पर बसों और ट्रकों के लिए उच्च क्षमता वाले डीसी फास्ट चार्जर लगाने का प्रस्ताव है।
मुख्य सचिव स्तर पर मॉनिटरिंग
हाल के दिनों में मुख्य सचिव स्तर पर विभिन्न विभागों से उपलब्ध सरकारी भूमि का ब्योरा मांगा गया है ताकि चार्जिंग स्टेशन स्थापित करने की प्रक्रिया में तेजी लाई जा सके। इसका उद्देश्य राज्य में ईवी उपयोगकर्ताओं के लिए मजबूत सार्वजनिक चार्जिंग नेटवर्क तैयार करना और ग्रीन मोबिलिटी को बढ़ावा देना है।
The Mahindra XEV 9S and the Kia Carens Clavis EV are two of the most affordable 3-row electric offerings in India. Priced under Rs 30 lakh, the XEV 9S and the Carens Clavis cater to similar buyers despite having different body types. But which EV offers the better performance, range and battery regeneration in the real world? Let us compare the top-spec variants of both EVs to find out.
Mahindra XEV 9S vs Kia Carens Clavis EV: Specifications, price
The XEV 9S is pricier, and its larger battery facilitates a higher claimed range
XEV 9S vs Carens Clavis EV: Regenerative braking test
XEV 9S Pack Three Above
Carens Clavis EV HTX+ ER
Battery size (kWh)
79
51.4
eMotor setup
Single motor, rear
Single motor, front
Power (hp)
286
171
Torque (Nm)
380
255
Claimed range (km)
679
490
Kerb weight (kg)
Over 2,200
1,725
Power-to-weight*
N/A
99.13
Torque-to-weight^
N/A
147.83
Price (Rs, lakh)
29.43
24.49
*Power-to-weight is hp per tonne
^Torque-to-weight is Nm per tonne
We tested the larger 79kWh battery variant of the Mahindra XEV 9S and the 51kWh battery version of the Kia Carens Clavis EV. Both 3-row EVs get a single-motor setup, but with a different configuration – the XEV 9S’ motor is mounted on the rear axle (RWD), while the Carens Clavis EV’s motor sits on the front axle (FWD). The XEV 9S is also the more powerful EV here, producing 115hp and 125Nm more than the Kia Carens Clavis EV, but it is also heavier. The XEV 9S’ larger battery also allows for a higher claimed range, 189km more than the Carens Clavis EV.
The tested Pack Three Above variant of the Mahindra XEV 9S asks for a premium of Rs 4.94 lakh over the Carens Clavis EV HTX+ ER variant.
Mahindra XEV 9S vs Kia Carens Clavis EV: Performance tests
The more powerful XEV 9S is also quicker despite its heavier mass
Mahindra XEV 9S vs Kia Carens Clavis EV: Performance tests
XEV 9S Pack Three Above
Carens Clavis EV HTX+ ER
Winner
0-100kph (sec)
7.54
8.44
XEV 9S
20-80kph (sec)
4.11
4.62
XEV 9S
40-80kph (sec)
4.74
5.6
XEV 9S
Quarter mile (sec)
15.67
16.36
XEV 9S
As mentioned earlier, the Mahindra XEV 9S is the more powerful 3-row car, and in the real world, it completes a 0-100kph run 0.9 seconds quicker than the Carens Clavis EV. 20-80kph and 40-80kph runs are 0.51 seconds and 0.86 seconds quicker on the XEV 9S.
Mahindra XEV 9S vs Kia Carens Clavis EV: Range, regen tests
Higher regen setting allows Carens Clavis EV to be more efficient than the XEV 9S
Mahindra XEV 9S vs Kia Carens Clavis EV: Regenerative braking tests (80-20 kph)
Regen mode
XEV 9S Pack Three Above
Carens Clavis EV HTX+ ER
Winner
One-pedal
120.82m / 8.5s
114.74m / 8.34s
Carens Clavis EV
High
162.46m / 11.79s
147.47m / 10.67s
Carens Clavis EV
Medium
215.8m / 15.59s
232.64m / 17.01s
XEV 9S
Low
341.03m / 24.52s
395.32m / 29.15s
XEV 9S
In our real-world tests, the Kia Carens Clavis EV showed stronger battery regeneration in the higher settings. The gap was most noticeable in the High (Level 3) mode, though it narrowed slightly in one-pedal driving. Combined with its lower kerb weight, this helped the Carens Clavis EV deliver better efficiency of 7.45 km/kWh in the city versus 6.05 km/kWh for the XEV 9S.
However, the XEV 9S has a much larger battery (about 54 percent), which gives it a clear range advantage. In city driving, it travelled 95 km further on a single charge.
The XEV 9S offered stronger deceleration in the medium and low regen settings. It stood out especially in the lowest setting (Level 1). On the highway, the XEV 9S maintained its efficiency at 6.05 km/kWh, while the Carens Clavis EV dropped to 6.71 km/kWh. This widened the real-world range gap even more, with the XEV 9S going about 113 km further than the Carens Clavis EV.
Mahindra XEV 9S vs Kia Carens Clavis EV: Verdict
The XEV 9S offers a holistic package that does not compensate performance for range
The XEV 9S, with a larger battery pack and a more powerful motor, offers a comprehensive package that does not lose out on range while offering great performance. On the other hand, the Kia Carens Clavis EV offers better efficiency, especially in the higher regen settings, helping it compensate for its smaller battery. This makes the Kia Carens Clavis EV a better choice for buyers looking for an urban EV, while for highway driving, the more balanced XEV 9S is recommended.
Autocar India’s regenerative testing standards
To test regenerative braking, we pre-select a level of regen braking and then completely lift off the throttle pedal and allow the car to decelerate till under 20kph. This procedure is then repeated for as many levels of regenerative braking the EV packs in. The deceleration rate, the distance covered and the time taken to go from 80-20kph are recorded on a GPS-based VBOX system.