जल्द ही आपको अदाणी एयरपोर्ट और GMR ग्रुप की एयरलाइन में उड़ने का मौका मिल सकता है। सूत्रों के मुताबिक सरकार नई एयरलाइंस के लिए एंट्री नियम आसान करने की तैयारी कर रही है। रॉयटर के हवाले से बड़ी खबर आई है कि अदाणी ग्रुप का एयरलाइंस शुरू करने पर विचार कर रही है। नई एयरलाइंस के लिए आसान एंट्री नियम संभव है। इस से अदाणी एयरपोर्ट और GMR के लिए एयरलाइंस कारोबार में एंट्री का रास्ता खुल सकता है।
सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के मुताबिक सरकार एयरक्राफ्ट रूल्स और DGCA नियमों में बदलाव करने की तैयारी में। इससे अदाणी एयरपोर्ट और GMR ग्रुप जैसे एयरपोर्ट ऑपरेटर भी अपनी एयरलाइन शुरू कर सकेंगे। अगले एक महीने में नियमों में बदलाव संभव है। एयरलाइन बिजनेस क्रॉस-ओनरशिप नियमों की समीक्षा की जा सकती है। कम से कम 20 एयरक्राफ्ट की शर्त की भी समीक्षा होगी।
सूत्रों के मुताबिक कैपिटल रिक्वायरमेंट और पायलट हायरिंग नियमों की भी समीक्षा का जा सकती है। हायरिंग से जुड़े नियम भी समीक्षा के दायरे में हैं। इससे अदाणी एयरपोर्ट और GMR के लिए रास्ता खुल सकता है। रॉयटर्स के हवाले से आई खबर में कहा गया है कि अदाणी ग्रुप का एयरलाइंस शुरू करने पर विचार कर रही है। हालांकि कंपनी ने एयरलाइंस शुरू करने पर फिलहाल अंतिम फैसला नहीं लिया है।
गौरतलब है कि भारत का एविएशन सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है। यात्रियों की संख्या रिकॉर्ड स्तर पर है। देश में एयरपोर्ट्स का तेजी से विस्तार हो रहा है और एयरलाइंस ने सैकड़ों नए विमानों के लिए ऑर्डर दिए हैं। इस ग्रोथ के बावजूद,मार्केट पर सिर्फ़ दो कंपनियों इंडिगो और एयर इंडिया का दबदबा बढ़ता जा रहा है। ऐसे में क्या भारत को एक तीसरी मजबूत एयरलाइन की जरूरत है,इस बहस ने एक पुराने पॉलिसी से जुड़े सवाल में फिर से दिलचस्पी जगा दी है कि क्या एयरपोर्ट ऑपरेटरों को एयरलाइन चलाने की इजाज़त दी जानी चाहिए?
बताते चलें कि भारत का एयरपोर्ट प्राइवेटाइज़ेशन फ़्रेमवर्क इस तरह बनाया गया है कि एयरपोर्ट ऑपरेटरों और एयरलाइंस के बीच हितों का टकराव न हो। मौजूदा पॉलिसी के तहत,दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े एयरपोर्ट के ऑपरेटरों पर आम तौर पर किसी एयरलाइन में 10 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सेदारी रखने की अनुमति नहीं है। इस पॉलिसी का मकसद निष्पक्षता बनाए रखना और किसी के साथ खास बर्ताव किए जाने की संभावना को भी रोकना है।
इसके पीछे की वजह साफ है। एयरपोर्ट अहम इंफ़्रास्ट्रक्चर को कंट्रोल करते हैं,जिसमें लैंडिंग और टेक-ऑफ़ स्लॉट,पार्किंग बे,टर्मिनल एक्सेस,ग्राउंड-हैंडलिंग सुविधाएं और एयरपोर्ट चार्ज शामिल हैं। अगर कोई कंपनी एयरपोर्ट के साथ-साथ एयरलाइन की भी मालिक होगी तो दूसरी एयरलाइन कंपनियां यह शिकायत कर सकती हैं कि अब मुकाबला बराबरी का नहीं रहा।
दुनिया के दूसरे देशों की बात करें तो रेगुलेटर्स ने एयरपोर्ट और एयरलाइन की ओनरशिप को लेकर अलग-अलग तरीके अपनाए हैं। कुछ देशों में एयरपोर्ट ऑपरेटर एयरलाइंस में निवेश कर सकते हैं। इसके लिए कड़े गवर्नेंस रूल्स और स्वतंत्र रेगुलेटर होते हैं जो यह पक्का करते हैं कि एयरपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर तक सभी को एक बराबर पहुंच मिले। भारत में आम तौर पर हितों के टकराव को रोकने के लिए दोनों के बीच स्पष्ट अंतर रखने को प्राथमिकता दी गई है।
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा घरेलू एविएशन मार्केट और तेजी से बढ़ने वाले बाजारों में से एक है। इसे बढ़ती आय,बेहतर रीजनल कनेक्टिविटी और तेजी से हो रहे एयरपोर्ट विस्तार का सपोर्ट मिल रहा है। सरकार एविएशन इंफ्रास्ट्रक्चर में भी भारी निवेश कर रही है। देश में और बड़ी एयरलाइन्स के आने से किराए को लेकर कॉम्पिटिशन बढ़ सकता है, रूट के ऑप्शन बढ़ सकते है,सर्विस क्वालिटी बेहतर हो सकती है और दो बड़ी एयरलाइनों पर निर्भरता कम हो सकती है। इससे छोटे शहरों के साथ कनेक्टिविटी भी बेहतर हो सकती है और भारत के ग्लोबल एविएशन हब बनने के लक्ष्य को भी सपोर्ट मिल सकता है। इसके लिए अब पुरानी पॉलिसी में बदलाव की जरूरत महसूस की जा रही है।
Infosys Q1 Results: देश की दूसरी सबसे बड़ी आईटी कंपनी Infosys ने जून 2026 तिमाही (Q1FY27) के नतीजे जारी कर दिए हैं। कंपनी का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट 12% बढ़कर 7,769 करोड़ रुपये रहा। पिछले साल इसी तिमाही में यह 6,921 करोड़ रुपये था।
हालांकि कंपनी बाजार के अनुमान पर खरी नहीं उतर सकी। CNBC-TV18 ने 7,903 करोड़ रुपये के मुनाफे का अनुमान लगाया था।
रेवेन्यू में 14% की बढ़ोतरी
जून तिमाही में Infosys का ऑपरेशन से रेवेन्यू 14% बढ़कर 48,211 करोड़ रुपये हो गया। एक साल पहले इसी तिमाही में यह 42,279 करोड़ रुपये था। यानी कंपनी ने अच्छी रेवेन्यू ग्रोथ दर्ज की, लेकिन मुनाफा अनुमान से थोड़ा कम रहा।
ग्रोथ आउटलुक में हल्की कटौती
इंफोसिस ने वित्त वर्ष 2027 के लिए अपने रेवेन्यू ग्रोथ आउटलुक में हल्की कटौती की है। अब कंपनी को उम्मीद है कि पूरे साल कॉस्टेंट करेंसी आधार पर रेवेन्यू 1.5% से 3% के बीच बढ़ेगा। कॉन्सटेंट करेंसी ग्रोथ का मतलब है कि कंपनी की ग्रोथ को विदेशी मुद्रा (Forex) के उतार-चढ़ाव का असर हटाकर मापा जाता है।
इससे पहले कंपनी ने 1.5% से 3.5% ग्रोथ का अनुमान दिया था। बाजार को भी ऊपरी सीमा में 0.5% की कटौती की उम्मीद थी। हालांकि कंपनी ने EBIT मार्जिन का अनुमान 20% से 22% के बीच ही बरकरार रखा है।
जून तिमाही में कैसी रही ग्रोथ?
जून तिमाही में Infosys की कॉन्सटेंट करेंसी रेवेन्यू ग्रोथ तिमाही आधार पर 1% रही। यह Tech Mahindra (2.6%) से कम रही, लेकिन TCS (0.4%), HCLTech (-0.5%) और Wipro (-1.2%) से बेहतर प्रदर्शन रहा। एनालिस्टों ने करीब 1.8% ग्रोथ का अनुमान लगाया था।
कंपनी के CEO सलिल पारेख ने कहा कि एक बड़े क्लाइंट के फैसले का एकमुश्त असर इस ग्रोथ पर पड़ा।
डॉलर और रुपये में रेवेन्यू
जून तिमाही में Infosys का डॉलर रेवेन्यू 5.08 अरब डॉलर रहा। यह पिछले अनुमान के लगभग मुताबिक है। तिमाही आधार पर डॉलर रेवेन्यू में 0.8% की बढ़ोतरी हुई।
वहीं रुपये में कंपनी का रेवेन्यू 48,211 करोड़ रुपये रहा। यह पिछली तिमाही से 3.9% ज्यादा है, हालांकि बाजार के अनुमान 48,431 करोड़ रुपये से थोड़ा कम रहा।
मार्जिन में सुधार
इंफोसिस का EBIT 10,163 करोड़ रुपये रहा, जो पिछली तिमाही के मुकाबले 4.3% ज्यादा है। वहीं EBIT मार्जिन 21.1% रहा। इसमें पिछली तिमाही के मुकाबले 20 बेसिस प्वाइंट का सुधार हुआ। यह बाजार के अनुमान के अनुरूप रहा।
बड़े ऑर्डर और AI का बढ़ता योगदान
जून तिमाही में Infosys को 3.6 अरब डॉलर के बड़े डील मिले। इनमें 61% नए क्लाइंट या नए प्रोजेक्ट से जुड़े थे।
कंपनी ने यह भी बताया कि अब उसकी कुल आय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का योगदान 8.2% तक पहुंच गया है। यह दिखाता है कि AI से जुड़ी सेवाओं की मांग लगातार बढ़ रही है।
नए CEO की जिम्मेदारी
Infosys ने अशीष कुमार दास को CEO-Designate नियुक्त किया है। वह 1 अप्रैल 2027 से मौजूदा CEO सलिल पारेख की जगह लेंगे। दास तीन दशक से ज्यादा समय से Infosys के साथ जुड़े हैं और फिलहाल कई ग्लोबल बिजनेस वर्टिकल्स की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
कंपनी के चेयरमैन नंदन नीलेकणी ने कहा कि सलिल पारेख ऐसे समय में CEO बने थे, जब कंपनी कुछ चुनौतियों का सामना कर रही थी। उन्होंने संगठन में स्थिरता और स्पष्ट दिशा देने का काम किया। उन्होंने यह भी बताया कि अशीष कुमार दास फिलहाल अमेरिका में काम कर रहे हैं और नई जिम्मेदारी संभालने के लिए भारत लौटेंगे।
इंफोसिस के शेयरों का हाल
नतीजों से पहले Infosys का शेयर 1,052.90 रुपये पर लगभग सपाट बंद हुआ। हालांकि 2026 में अब तक यह शेयर करीब 35% टूट चुका है।
Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।
IndiGo Q1 Results: देश की सबसे बड़ी एयरलाइन IndiGo की पैरेंट कंपनी InterGlobe Aviation को जून 2026 तिमाही में 382 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है। पिछले साल इसी तिमाही में कंपनी ने 2,161 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया था। महंगा जेट फ्यूल, रुपये में कमजोरी और पश्चिम एशिया में जारी तनाव इसका बड़ा कारण रहे।
रेवेन्यू बढ़ा, लेकिन खर्च ज्यादा
जून तिमाही में इंडिगो का रेवेन्यू 20% बढ़कर 24,584 करोड़ रुपये हो गया। एक साल पहले यह 20,496 करोड़ रुपये था। लेकिन खर्च 35.1% बढ़ गया। सबसे ज्यादा असर जेट फ्यूल पर पड़ा। विमान ईंधन का खर्च 86% उछलकर 10,830 करोड़ रुपये पहुंच गया। इसी वजह से कंपनी मुनाफे से घाटे में चली गई।
ऑपरेशन में क्या रहा?
जून तिमाही में इंडिगो की क्षमता (ASK) 2.9% बढ़कर 43.5 अरब रही। यात्रियों की संख्या 0.7% बढ़कर 3.13 करोड़ हो गई। वहीं Yield 21.3% बढ़कर 6.04 रुपये रही। हालांकि Load Factor 1.3 प्रतिशत अंक घटकर 83.3% पर आ गया।
30 जून 2026 तक कंपनी के पास 52,885 करोड़ रुपये का कुल कैश था। इसमें 39,039 करोड़ रुपये फ्री कैश और 13,846 करोड़ रुपये प्रतिबंधित (Restricted) कैश शामिल था। यानी नकदी के मोर्चे पर कंपनी की स्थिति अभी भी मजबूत बनी हुई है।
मैनेजमेंट ने क्या कहा?
स्टॉक एक्सचेंज को दी जानकारी में IndiGo ने कहा कि महंगा ईंधन, रुपये की कमजोरी और पश्चिम एशिया का संघर्ष इस तिमाही में मुनाफे पर भारी पड़ा।
कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर राहुल भाटिया ने कहा कि तिमाही चुनौतीपूर्ण रही। ईंधन की कीमतें ऊंची रहीं और मध्य-पूर्व में उड़ानों पर भी असर पड़ा। इसके बावजूद यात्रियों की मांग मजबूत बनी रही। बेहतर किरायों की वजह से रेवेन्यू में अच्छी बढ़ोतरी हुई। इस दौरान IndiGo ने 3.13 करोड़ यात्रियों को सफर कराया।
उन्होंने कहा कि कंपनी फिलहाल लागत पर नियंत्रण और क्षमता का बेहतर इस्तेमाल करने पर फोकस कर रही है। हालांकि महंगे ईंधन और रुपये में कमजोरी की वजह से अकेले इस तिमाही में करीब 200 करोड़ रुपये का अतिरिक्त नुकसान हुआ।
इंडिगो के लिए आगे क्या?
इंडिगो का कहना है कि भारत और पश्चिम एशिया के बीच यात्रा पर अभी भी असर बना हुआ है। दूसरी तिमाही में मांग भी सामान्य से कमजोर रहने की उम्मीद है। इसलिए Q2FY27 में कंपनी की क्षमता पिछले साल के मुकाबले लगभग बराबर रह सकती है।
हालांकि IndiGo को उम्मीद है कि इसके बाद हालात सुधरेंगे। जैसे-जैसे यात्रा की मांग बढ़ेगी, विमानों का इस्तेमाल भी धीरे-धीरे बढ़ने लगेगा।
इंडिगो का शेयर गुरुवार को नतीजे आने से पहले 1.70% की गिरावट के साथ 5,030 रुपये पर बंद हुआ। पिछले 1 साल में स्टॉक 14.70% टूट चुका है।
Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।
Kia Syros EV Launch: अगर आप इलेक्ट्रिक कार खरीदने की सोच रहे हैं, तो Kia आपके लिए एक नया और किफायती विकल्प लेकर आया है। दरअसल, कंपनी ने अपनी नई Syros EV को भारत में लॉन्च कर दिया है, जो न सिर्फ Kia की सबसे सस्ती इलेक्ट्रिक कार है, बल्कि इसे Battery-as-a-Service (BaaS) मॉडल के साथ भी खरीदा जा सकता है। बता दें कि इस मॉडल की शुरुआती कीमत 7.99 लाख रुपये रखी गई है, जबकि बैटरी की कीमत अलग से फाइनेंस की जाएगी, जिसके लिए ग्राहकों को 3.3 रुपये प्रति किलोमीटर की EMI देनी होगी। इसके अलावा, इस इलेक्ट्रिक SUV की डिलीवरी 30 जुलाई से शुरू होगी।
Kia Syros EV कंपनी की अब तक की सबसे किफायती इलेक्ट्रिक कार है। यह Carens Clavis EV के बाद Kia का दूसरा मास-मार्केट इलेक्ट्रिक मॉडल है। इसकी शुरुआती कीमत 13.49 लाख रुपये (एक्स-शोरूम) है, जबकि टॉप-स्पेक X-Line ER वेरिएंट की कीमत 19.99 लाख रुपये (एक्स-शोरूम) तक जाती है।
कंपनी ने Syros EV को अपने मजबूत K1 प्लेटफॉर्म पर तैयार किया है। यह इलेक्ट्रिक SUV ग्राहकों को दो बैटरी पैक विकल्पों के साथ मिलेगी—42 kWh और 51.4 kWh। इन बैटरी ऑप्शन के साथ Kia का लक्ष्य ज्यादा से ज्यादा ग्राहकों को इलेक्ट्रिक मोबिलिटी की ओर आकर्षित करना है।
छोटे बैटरी पैक वाला वेरिएंट ARAI-सर्टिफाइड MIDC फुल-साइकिल रेंज में 443 किलोमीटर तक चल सकता है। वहीं, बड़े 51.4 kWh बैटरी पैक वाले मॉडल की रेंज 526 किलोमीटर तक बताई गई है। इसके साथ ही Kia Syros EV अपने सेगमेंट की पहली ऐसी इलेक्ट्रिक SUV बन गई है, जिसने 500 किलोमीटर से ज्यादा की प्रमाणित रेंज का आंकड़ा पार किया है।
इसकी बड़ी बैटरी एक इलेक्ट्रिक मोटर को पावर देती है, जो 171 PS (लगभग 169 bhp) की पावर जेनरेट करती है, जिससे यह SUV 0 से 100 km/h की रफ्तार 8.1 सेकंड में पकड़ लेती है।
Syros EV में 100 kW DC फास्ट चार्जिंग की भी सुविधा है, जिससे बैटरी 39 मिनट में 10% से 80% तक चार्ज हो सकती है। इसमें 10.8 kW का ऑनबोर्ड AC चार्जर भी मिलता है।
फीचर लिस्ट
Syros EV का डिजाइन ICE-पावर्ड Syros जैसा ही है, लेकिन इसमें कुछ खास EV स्टाइलिंग एलिमेंट्स दिए गए हैं। इसके अलावा, इनमें Kia की क्लोज्ड-ऑफ Digital Tiger Face ग्रिल, Ice Cube LED हेडलैंप, Star Map LED DRLs और टेल लैंप, फ्लश-फिटिंग डोर हैंडल्स और 17-इंच के डुअल-टोन एयरो अलॉय व्हील शामिल हैं।
इंटीरियर की बात करें तो, इसके अंदर 30-इंच का पैनोरमिक डिस्प्ले है, जिसमें 12.3-इंच का टचस्क्रीन इंफोटेनमेंट सिस्टम, 12.3-इंच का डिजिटल इंस्ट्रूमेंट क्लस्टर और 5-इंच का क्लाइमेट कंट्रोल इंटरफेस शामिल है।
Kia Syros EV के अन्य फीचर्स में डुअल-पेन पैनोरमिक सनरूफ, एम्बिएंट लाइटिंग, फोर-वे पावर ड्राइवर सीट, स्लाइडिंग और रिक्लाइनिंग रियर सीट, वेंटिलेटेड फ्रंट और रियर सीट, आठ-स्पीकर वाला Harman Kardon ऑडियो सिस्टम, वायरलेस Android Auto और Apple CarPlay, वायरलेस फोन चार्जर, 16-लीटर का फ्रंक (फ्रंट ट्रंक), स्मार्ट डैशकैम, 360-डिग्री कैमरा और 16 ऑटोनॉमस फंक्शन वाला लेवल 2 ADAS शामिल हैं।
सेफ्टी फीचर्स
Kia Syros EV में यात्रियों की सुरक्षा का भी खास ध्यान रखा गया है। इसमें 6 एयरबैग, इलेक्ट्रॉनिक स्टेबिलिटी कंट्रोल (ESC), हिल-स्टार्ट असिस्ट, ऑटो होल्ड के साथ इलेक्ट्रॉनिक पार्किंग ब्रेक, टायर प्रेशर मॉनिटरिंग सिस्टम (TPMS), ISOFIX चाइल्ड सीट एंकर जैसे सेफ्टी फीचर्स दिए गए हैं।
इसके अलावा, इसमें ब्लाइंड व्यू मॉनिटर और आगे, पीछे व साइड पार्किंग सेंसर भी मिलते हैं, जो ड्राइविंग के दौरान सुरक्षा और सुविधा को बेहतर बनाते हैं।
Syros EV की कीमतें (एक्स-शोरूम):
Battery Pack
Variant
Price
42 kWh
HTK
₹13.49 lakh
42 kWh
HTK+
₹14.99 lakh
42 kWh
HTX
₹15.99 lakh
51.4 kWh (Extended Range)
HTK+ ER
₹16.99 lakh
51.4 kWh (Extended Range)
HTX ER
₹17.99 lakh
51.4 kWh (Extended Range)
HTX+ ER
₹19.49 lakh
51.4 kWh (Extended Range)
X-Line ER
₹19.99 lakh
ओनरशिप के फायदे
Kia ने Syros EV के साथ ग्राहकों के लिए कई खास फायदे भी पेश किए हैं। कंपनी पहले मालिक को हाई-वोल्टेज बैटरी पर 15 साल की अनलिमिटेड किलोमीटर वारंटी दे रही है। इसके अलावा, कंपनी ने अश्योर्ड बायबैक प्रोग्राम भी शुरू किया है, जिसके तहत तीन साल बाद कार की रीसेल वैल्यू 80% तक मिल सकती है।
वहीं, ग्राहकों को बेहतर चार्जिंग सुविधा देने के लिए Kia के K-Charge नेटवर्क के जरिए 20,300 से ज्यादा चार्जिंग पॉइंट्स तक पहुंच मिलेगी।
Service Charge: वीकेंड पर परिवार या दोस्तों के साथ रेस्टोरेंट में खाना खाने के बाद जब बिल आता है, तो उसमें अक्सर 5 से 10 प्रतिशत तक का ‘सर्विस चार्ज’ जुड़ा हुआ दिखाई देता है। कई बार ग्राहक इसे हटाने की मांग करते हैं। लेकिन रेस्तरां कर्मचारी इसे अनिवार्य बताकर हटाने से इनकार कर देते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या रेस्टोरेंट ग्राहकों से जबरन सर्विस चार्ज वसूल सकते हैं?
यह मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है क्योंकि केंद्रीय उपभोक्ता मामलों के मंत्री प्रह्लाद जोशी ने हाल ही में साफ कहा था कि रेस्तरां द्वारा अनिवार्य रूप से सर्विस चार्ज वसूलना नियमों के खिलाफ है। ऐसा करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
सरकार की सख्त चेतावनी
प्रह्लाद जोशी ने कहा कि उन्होंने इस मामले को गंभीरता से लिया है। संबंधित अधिकारियों को कड़ी कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि जो रेस्तरां इस अवैध प्रथा को जारी रखेंगे, उन्हें न सिर्फ भारी जुर्माना भरना पड़ेगा। बल्कि उनकी प्रतिष्ठा को भी नुकसान पहुंच सकता है।
सरकार का यह रुख ऐसे समय सामने आया है जब केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) ने देशभर के 41 रेस्तरां के खिलाफ कार्रवाई शुरू की है। इनमें Chaayos और Barbeque Nation जैसी लोकप्रिय चेन भी शामिल हैं। इन रेस्तरां पर ग्राहकों के बिल में बिना अनुमति डिफॉल्ट रूप से सर्विस चार्ज जोड़ने की शिकायतें मिली थीं।
क्या होता है सर्विस चार्ज?
सर्विस चार्ज कोई सरकारी टैक्स नहीं है। यह वह अतिरिक्त राशि होती है जिसे रेस्तरां अपने कर्मचारियों की सेवा के बदले ग्राहकों से वसूलते हैं। आमतौर पर यह कुल बिल का 5 से 10 प्रतिशत होता है। यह राशि GST से अलग होती है। जहां GST सरकार के खाते में जमा होता है। वहीं, सर्विस चार्ज रेस्तरां के पास ही रहता है। अलग-अलग रेस्तरां इसे अपने कर्मचारियों में अलग-अलग तरीके से बांटते हैं।
क्या रेस्तरां आपको सर्विस चार्ज देने के लिए मजबूर कर सकते हैं?
सरकारी गाइडलाइंस के अनुसार इसका जवाब है…नहीं। CCPA ने वर्ष 2022 में जारी दिशानिर्देशों में स्पष्ट किया था कि कोई भी रेस्तरां ग्राहकों के बिल में अपने आप सर्विस चार्ज नहीं जोड़ सकता। इसे अनिवार्य या बाध्यकारी नहीं बताया जा सकता। यदि कोई ग्राहक इसे देने से इनकार करता है तो उसे सेवा देने या रेस्तरां में एंट्री से भी मना नहीं किया जा सकता। सरकार का कहना है कि सर्विस चार्ज देना या न देना पूरी तरह ग्राहक की इच्छा पर निर्भर होना चाहिए।
फिर भी क्यों वसूला जा रहा है सर्विस चार्ज?
CCPA के गाइडलाइंस जारी होने के बाद कई रेस्तरां संगठनों ने इन्हें अदालत में चुनौती दी। उनका तर्क है कि सर्विस चार्ज उनकी मूल्य निर्धारण नीति का हिस्सा है। इसकी जानकारी पहले से मेन्यू कार्ड या रेस्तरां में नोटिस के जरिए ग्राहकों को दे दी जाती है। यदि ग्राहक यह जानकारी देखकर भी भोजन करता है तो उसने इन शर्तों को स्वीकार कर लिया है।
हालांकि, केंद्र सरकार का कहना है कि सिर्फ मेन्यू या नोटिस बोर्ड पर जानकारी लिख देने से ग्राहक पर अतिरिक्त शुल्क थोपने का अधिकार नहीं मिल जाता। फिलहाल यह मामला अदालत में लंबित है, इसलिए कई रेस्तरां अब भी सर्विस चार्ज वसूल रहे हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट ने क्या कहा?
मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि सर्विस चार्ज को अनिवार्य बनाना अनुचित व्यापारिक व्यवहार (Unfair Trade Practice) माना जा सकता है। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि क्या रेस्तरां सूचीबद्ध कीमत और लागू टैक्स के अलावा ग्राहकों से अतिरिक्त राशि देने के लिए उन्हें बाध्य कर सकते हैं। हालांकि इस मामले में अभी अंतिम फैसला नहीं आया है।
क्या मेन्यू पर ‘सर्विस चार्ज लागू है’ लिखने से भुगतान अनिवार्य हो जाता है?
इसका जवाब है नहीं। कई रेस्तरां अपने मेन्यू या परिसर में सर्विस चार्ज लागू होने का नोटिस लगाते हैं। रेस्तरां संगठनों का कहना है कि यह पहले से दी गई सूचना है। लेकिन उपभोक्ता संरक्षण अधिकारियों का मानना है कि केवल सूचना देने से ग्राहक का यह अधिकार खत्म नहीं हो जाता कि वह अनिवार्य रूप से लगाए गए सर्विस चार्ज को देने से इनकार कर सके।
क्या सर्विस चार्ज न देने पर रेस्तरां आपको रोक सकता है?
CCPA के दिशानिर्देशों के मुताबिक बिल्कुल नहीं। रेस्तरां किसी ग्राहक को रेस्टोरेंट में सिर्फ इसलिए एंट्री देने से इनकार नहीं कर सकता क्योंकि वह सर्विस चार्ज नहीं देना चाहता। इसके अलावा ग्राहक पर भुगतान के लिए दबाव बनाना, डराना-धमकाना या सर्विस चार्ज का भुगतान होने तक उसे रेस्तरां से बाहर जाने से रोकना भी नियमों के खिलाफ है।
यदि रेस्तरां सर्विस चार्ज हटाने से मना कर दे तो क्या करें?
यदि आपको लगता है कि सर्विस चार्ज गलत तरीके से लगाया गया है तो सबसे पहले विनम्रता से इसे हटाने की मांग करें और संशोधित बिल देने के लिए कहें। अगर रेस्तरां मना कर देता है तो बिल की प्रति अपने पास रखें और नेशनल कंज्यूमर हेल्पलाइन या संबंधित उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज करा सकते हैं। हाल ही में CCPA द्वारा की गई कार्रवाई भी उपभोक्ताओं की शिकायतों के आधार पर ही शुरू हुई है।
क्या सर्विस चार्ज और टिप एक ही चीज हैं?
जवाब है नहीं…। टिप (Tip) पूरी तरह स्वैच्छिक होती है, जिसे ग्राहक अच्छी सेवा से संतुष्ट होकर अपनी इच्छा से देता है। जबकि सर्विस चार्ज रेस्तरां द्वारा बिल में जोड़ी जाने वाली अतिरिक्त राशि है। यदि सर्विस चार्ज हट भी जाए, तब भी ग्राहक चाहे तो अपनी इच्छा से टिप दे सकता है या बिल्कुल भी नहीं दे सकता।
सऊदी अरब ने बुधवार को अमेरिका के साथ एक अहम परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इसके तहत अमेरिका, सऊदी अरब को असैन्य (बिजली बनाने के लिए) परमाणु तकनीक देगा। यह समझौता ऐसे समय में हुआ है, जब पूरे मिडिल ईस्ट में युद्ध और तनाव का माहौल है। इस समझौते को सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की बड़ी कूटनीतिक सफलता माना जा रहा है। वह पिछले पांच साल से भी ज्यादा समय से यह समझौता चाह रहे थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक इजराइल समेत अमेरिका के कई अधिकारी और न्यूक्लियर एक्सपर्ट्स इसका विरोध कर रहे थे। उनका कहना था कि यदि सऊदी अरब को यूरेनियम संवर्धन की तकनीक मिल गई, तो भविष्य में वह परमाणु हथियार बनाने की दिशा में भी बढ़ सकता है। इससे पूरे मिडिल ईस्ट में परमाणु हथियारों की नई होड़ शुरू होने का खतरा पैदा हो सकता है। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान पहले कई बार कह चुके हैं कि अगर ईरान परमाणु हथियार बना लेता है, तो सऊदी अरब भी परमाणु हथियार हासिल करने की दिशा में कदम उठाएगा। यह समझौता विवादों में क्यों है? ट्रम्प ने समझौते से इजराइल को हटाया इस समझौते की शुरुआत जो बाइडेन के राष्ट्रपति रहते हुई थी। तब अमेरिका चाहता था कि परमाणु समझौते के बदले सऊदी अरब, इजराइल को औपचारिक मान्यता दे और दोनों देश राजनयिक संबंध स्थापित करें। इस प्रस्ताव के तहत अमेरिका, सऊदी अरब को सुरक्षा की गारंटी, आधुनिक हथियार और असैन्य परमाणु कार्यक्रम में सहयोग देने को तैयार था। बदले में सऊदी अरब से उम्मीद थी कि वह इजराइल के साथ दूतावास खोलेगा, राजदूत नियुक्त करेगा और आधिकारिक संबंध शुरू करेगा। हालांकि, 7 अक्टूबर 2023 को हमास के इजराइल पर हमले और उसके बाद गाजा में शुरू हुए युद्ध की वजह से यह प्लान फेल हो गया। सऊदी कहने लगा कि जब तक एक अलग फिलिस्तीन राष्ट्र नहीं बन जाता तब तक वे इजराइल को मान्यता नहीं देंगे। बाद में ट्रम्प ने रणनीति बदली और इजराइल के साथ रिश्तों को इस समझौते से अलग कर दिया। मिडिल ईस्ट में सऊदी का प्रभाव बढ़ेगा परमाणु बिजलीघर (न्यूक्लियर रिएक्टर) बनने में 10 साल या उससे भी ज्यादा समय लग सकता है। इसलिए इस समझौते के बाद सऊदी अरब लंबे समय तक अमेरिका की परमाणु तकनीक और मदद पर निर्भर रहेगा। इससे दोनों देशों के बीच सुरक्षा, कारोबार और आपसी रिश्ते पहले से ज्यादा मजबूत होने की उम्मीद है। कोलंबिया यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑन ग्लोबल एनर्जी पॉलिसी की एक्सपर्ट कैरेन यंग के मुताबिक, सऊदी अरब सिर्फ आज के लिए नहीं, बल्कि भविष्य को ध्यान में रखकर यह कदम उठा रहा है। उनका कहना है कि यह समझौता सिर्फ परमाणु बिजली बनाने तक सीमित नहीं है। इससे सऊदी अरब की राजनीतिक ताकत बढ़ेगी और मिडिल ईस्ट में उसका प्रभाव भी पहले से ज्यादा मजबूत होगा। अमेरिका को क्या फायदा होगा? इस समझौते से अमेरिका को दो बड़े फायदे मिल सकते हैं। 1. अमेरिकी कंपनियों को सऊदी अरब में परमाणु बिजली संयंत्र बनाने के अरबों डॉलर के ठेके मिल सकते हैं। 2. अमेरिका को सऊदी अरब के परमाणु कार्यक्रम पर नजदीकी नजर रखने का मौका मिलेगा, जिससे उसे हथियारों के प्रसार को लेकर अपनी चिंताओं पर नियंत्रण रखने में मदद मिल सकती है। रूस-चीन भी मदद को तैयार थे अगर अमेरिका के साथ यह समझौता किसी वजह से नहीं हो पाता, तो सऊदी अरब के पास दूसरे विकल्प भी हैं। दरअसल, सऊदी कई बार चेतावनी दे चुका था कि अगर उसे अमेरिका इसमें मदद नहीं करेगा तो वे चीन, रूस, फ्रांस या दक्षिण कोरिया जैसे दूसरे देशों से परमाणु तकनीक ले लेंगे। चीन की सरकारी कंपनी चाइना नेशनल न्यूक्लियर कॉर्पोरेशन (CNNC) पहले ही न्यूक्लियर प्लांट बनाने में रुचि दिखा चुकी है। रूस की सरकारी परमाणु कंपनी रोसाटॉम भी सऊदी अरब के साथ शुरुआती समझौते कर चुकी है। इसके अलावा दक्षिण कोरिया और फ्रांस भी संभावित साझेदार माने जा रहे हैं। ट्रम्प का फैसला बदलना संसद के लिए मुश्किल अमेरिकी संसद (कांग्रेस) में डेमोक्रेटिक पार्टी के कई सांसदों ने इस समझौते का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है न सिर्फ इससे मिडिल ईस्ट में परमाणु हथियारों की होड़ को बढ़ावा मिलेगा बल्कि ईरान के लिए भी अपने परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगाने की संभावना कम कर देगा। हालांकि इन विरोधों के बावजूद संसद के लिए इस समझौते को रोकना आसान नहीं होगा। आने वाले दिनों में इस समझौते को मंजूरी के लिए संसद में पेश किया जाएगा। लेकिन यदि संसद इसे रोकना चाहती है, तो उसे इस संबंध में संयुक्त प्रस्ताव (जॉइंट रिजोल्यूशन) पारित करना होगा। यदि राष्ट्रपति उस प्रस्ताव पर वीटो लगा देते हैं, तो संसद को उस वीटो को पलटने के लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत जुटाना होगा। यही वजह है कि राजनीतिक विरोध के बावजूद इस समझौते के लागू होने की संभावना अधिक मानी जा रही है।
For our first drive of the all-new Tekton, Nissan organized an elaborate 700km plus test drive from Chandigarh to Leh, tackling everything from crowded city traffic and fast highways to mountain passes and broken roads. The aim was to find out whether Nissan’s new midsize SUV has what it takes to take on the Hyundai Creta, Kia Seltos and Maruti Victoris in the real world.
Nissan Tekton Exterior Design and Engineering – 9/10
The Tekton is, in essence, a badge-engineered Renault Duster. It is built at the same plant, on the same assembly line, and shares its platform, powertrains and several components with its French sibling. Nissan, however, has worked hard to give it a distinct identity, drawing inspiration from its flagship Patrol SUV.
1.3 turbo variants can be identified by the red strip on the grille and T280 badge.
The front end is undoubtedly the highlight. The grille, connected light bar and red accents on the 1.3-litre turbo variants lend it a bold and distinctive look. It even gets functional bumper air scoops and fog lamps, the latter being an increasingly rare feature in this segment. The sculpted bonnet adds plenty of visual muscle, while the side profile is enhanced by attractive 18-inch alloy wheels wrapped in chunky, high-profile tyres.
Practicality extends beyond appearances. Ground clearance stands at an impressive 212mm, making the Tekton well suited to rough terrain. The T280 badge on the front fender denotes the 280Nm produced by the 1.3-litre turbo-petrol engine, while a unique applique depicting the Himalayas adds a touch of character. Its pillar-mounted rear door handles link ties to Nissan SUVs of yore like the Pathfinder and X-Terra.
The execution of its tail-lamp design is spot on, looking most similar to the Patrol.
At the rear, the tail-lamp design bears the strongest resemblance to the Patrol and is executed rather well. While the Tekton isn’t the largest SUV in its class, it strikes a pleasing balance between road presence and urban friendliness. We suspect its styling is likely to be one of its biggest selling points.
Nissan Tekton Interior Space and Comfort – 8/10
Inside, Nissan has done a commendable job differentiating the cabin from the Renault Duster. The layout remains familiar, but the padded leatherette on the dash and doorpads look classy and along with the burgundy, gold and light cream colour scheme lends the interior a more premium ambience. There are also subtle Nissan-specific touches on the dash fascia, including an Easter egg inspired by Japanese numerals represented by 2 vertical lines (Ni) and three horizontal lines (san).
Neatly dressed-up interior look and feel quite upmarket.
The driving position is excellent. Visibility is strong, the bonnet is clearly visible from the driver’s seat, and most controls fall easily to hand. Ergonomics are largely spot-on, though taller drivers who prefer a high seating position may find the large plastic panel near the A-pillar slightly intrusive.
Burgandy, gold and light cream colour scheme, along with the soft leatherette paddings enhance the cabin’s premium feel.
One area where the Tekton needs improvement is air conditioning performance. Even at the lowest temperature setting, the cabin takes time to cool down. Thankfully, the ventilated front seats are highly effective and help offset this weakness. The seats themselves deserve praise for their excellent support and long-distance comfort. The digital instrument cluster is clear and easy to read, offering multiple display layouts, including a full-map view. Unlike the Duster’s less intuitive tachometer display, the Nissan gets a more conventional and user-friendly setup. Physical controls for climate functions, audio settings and ADAS shortcuts are particularly welcome in an era increasingly dominated by fiddly touch panels.
Powered front seats are supportive and have a very effective ventilation function.
Storage solutions are generally well thought out. The cooled wireless charging pad prevents phones from overheating, while USB-C ports and a 12V socket are provided. However, 1-litre bottles cannot be stored vertically in the front door bins; although they can be placed vertically in the rear door bins. Useful storage spaces include deep cupholders and a large central armrest console. The glovebox is generous, though part of it is compromised by the fuse box, just as in the older-gen Duster.
Cabin space is adequate for four adults; seats are very comfy.
Accessing the rear seat requires a bit of effort due to the high step-in and narrow opening, but once seated, comfort levels are impressive. The seat backrest is well angled, under-thigh support is good, and there’s plenty of room beneath the front seats to stretch out. The rear bench is best suited to two adults rather than three, although all occupants get individual headrests and three point seatbelts.
Rear-seat amenities include seatback pockets, rear AC vents, two USB charging ports, a centre armrest and a phone holder. The panoramic sunroof adds a real sense of occasion, especially on scenic drives through the mountains. That said a boss mode for the electrically adjustable front passenger seat and rear sunshades aren’t available.
Cavernous 518-litre boot is ideal for road trips; gets a spare wheel too.
Open the electrically operated tailgate and you’re greeted by a massive 518-litre boot. It comfortably swallows luggage and is the largest in its class, making it ideal for long-distance touring. There’s a full-size spare tyre too.
Nissan Tekton Features and Safety – 9/10
The Tekton is otherwise generously equipped with kit like panoramic sunroof, powered and ventilated front seats, 10.25-inch instrument cluster, 10.1-inch touchscreen which not only gets wireless Android Auto and Apple CarPlay, but it also gets native Google integration including Gemini voice assistant, among other notable features. The only real disappointment is the below par quality of the 360-degree camera system.
With in-built Google, screen works well; 360-degree camera quality is below par.
Safety credentials are strong. Along with a comprehensive ADAS suite, the Tekton has secured a five-star Bharat NCAP rating, just like its Renault sibling. The lane-keep assist didn’t seem to keep the vehicle properly centred within the lane, and it tended to weave between the lane markings.
The adaptive cruise control system also performed well, maintaining safe distances and slowing progressively with traffic. Its acceleration back to the set speed, however, feels somewhat slow regardless of drive mode.
10.25-inch instrument cluster is well executed; gets a full map view too.
Nissan Tekton Performance and Refinement – 7/10
The entry-level powertrain is a 1.0-litre turbo-petrol shared with the Magnite. With some updates though that has taken torque higher to 166Nm – up from 160Nm, while power remains the same at 100hp. It is paired exclusively with a six-speed manual gearbox.
To compensate for the Tekton’s weight and performance demands, Nissan has equipped this version with shorter gearing than the 1.3-litre variants. Around town, it feels perfectly adequate, but the small-capacity turbo engine suffers from noticeable turbo lag. Steep inclines often require clutch slip to get moving, and enthusiastic driving demands frequent gear changes to keep the engine in its power band. Peak boost arrives beyond 3,000rpm, while the gearbox itself lacks the slickness of some Korean and Japanese rivals.
If you love to drive, this is one of those cars that you’re surely going to like.
The 1.3-litre turbo-petrol is significantly more appealing. Refinement levels are better, performance is considerably stronger, and overtaking requires much less planning. Turbo lag is reduced compared to the 1.0-litre, though it hasn’t been eliminated entirely. On steep gradients and under stop-start conditions, the engine occasionally struggles to build revs quickly enough, exposing a weak bottom-end response.
Once past 2,500rpm, however, the turbo wakes up and the Tekton gathers speed with enthusiasm. The engine also produces an appealing turbo whoosh at higher revs, though some may find it intrusive.
Enthusiasts are likely to yearn for a bit more responsiveness from both the engines.
This engine comes with a manual as well as a six-speed wet-clutch dual-clutch automatic transmission, which is the one we drove. Shifts are impressively smooth and seamless, but responses are slower than expected. The gearbox’s tendency to upshift early can make the Tekton feel less responsive than it actually is, often prompting the use of the paddle shifters for quick overtakes.
There are two drive modes – Comfort and Eco – though enthusiasts will miss the absence of a Sport mode. Fortunately, manual mode allows greater control over the transmission and proved particularly enjoyable on mountain roads. In city traffic, however, the combination works well, with smooth low-speed behaviour and a well-calibrated creep function.
Even though we didn’t get a chance to test the Tekton for outright performance and fuel efficiency, we have extensively tested its Renault sibling, and the numbers aren’t particularly impressive. Expectedly, the Duster’s performance testing revealed that the 1.3-litre manual is the quickest variant to 100kph (10.32 sec), , while the 1.3 DCT’s reluctance to allow aggressive launches affects its outright acceleration times (11.33 sec). The 1.0-litre (13.26 sec) delivers acceleration comparable to the naturally aspirated 1.5-litre engines found in the Creta and Seltos.
Nissan Tekton Mileage and Efficiency – 6/10
Once again, taking the Duster’s figures for refence, average real-world fuel efficiency is quite weak too with the 1.0 version (10.98kpl) faring only slightly better than the 1.3 versions (10.47kpl for DCT, 10.64kpl for MT). Like the Duster, all variants of the Tekton get an Eco mode as well as an auto engine stop-start function to keep a check on fuel consumption.
Nissan Tekton Ride Comfort and Handling – 9/10
As with the Renault Duster, Nissan has absolutely nailed the ride-and-handling balance. Unlike many European cars, the Tekton does not feel overly firm at low speeds. Instead, it delivers a supple, absorbent ride that shrugs off poor road surfaces with ease. Even sharp potholes generate more noise than impact inside the cabin.
Unlike some rivals, its low speed ride doesn’t have the typical underlying firmness.
Handling is equally impressive. The Tekton changes direction eagerly and inspires confidence, making it genuinely enjoyable to drive. Its electronic power steering offers Light and Heavy modes, though the lighter setting strikes the better balance between ease and precision. The steering feel is among the best in the segment.
Braking performance is another strong point. Throughout our drive to Leh, the brakes consistently inspired confidence, delivering strong stopping power and natural pedal feel.
Nissan Tekton Value for Money – 8/10
Priced between Rs 10.50 lakh and Rs 18.5 lakh, the Tekton commands a premium of Rs 10,000-50,000 over an equivalent Renault Duster. The range consists of 12 variants: six powered by the 1.0-litre turbo petrol, two by the 1.3-litre manual and four by the 1.3-litre auto, indicating Nissan’s focus on the smaller engine.
The biggest drawbacks of the powertrains though are the lack of outright punch and responsiveness, as well as fuel efficiency that may not satisfy high-mileage users. Neither Renault nor Nissan offers a diesel option, and while the Duster is expected to receive a hybrid powertrain, Nissan has ruled out one for now.
However after 700km behind the wheel, the Nissan Tekton leaves an overall positive impression. It is handsome, well equipped and comfortable, with a premium-feeling cabin and class leading 518-litre boot. The rear seat may not be the most spacious in the segment, but it comfortably accommodates four adults, while its ride-and-handling balance ranks among the very best in class. The Tekton then is a thoroughly competent midsize SUV. And in a segment packed with strong contenders, this one too deserves serious consideration.
Vishal Mega Mart stock crash : गुरुवार को विशाल मेगा मार्ट लिमिटेड के शेयरों में 4 प्रतिशत तक की गिरावट आई है। वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही के नतीजे जारी किए जाने के बाद शेयर में यह गिरावट आई है। पहली तिमाही में कंपनी ने मुनाफे और रेवेन्यू में डबल डिजिट ग्रोथ देखने को मिली है। फिर भी दोपहर के कारोबार में यह शेयर 4 प्रतिशत नीचे 107.5 रुपये पर ट्रेड कर रहा था। यह शेयर आज BSE मिडकैप इंडेक्स में सबसे ज़्यादा गिरने वाले शेयरों में शामिल है।
साल 2026 में अब तक विशाल मेगा मार्ट के शेयर में 20.5 प्रतिशत की गिरावट आई है,जबकि निफ्टी में इसी अवधि में 8.5 प्रतिशत की गिरावट देखने को मिली है। कंपनी का मार्केट कैप लगभग 50,500 करोड़ रुपये है। कंपनी ने यह भी कहा है कि जून तिमाही के दौरान ज्यादा महंगाई का असर डिमांड पर पड़ा है
जून तिमाही में विशाल मेगा मार्ट के कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट में सालाना आधार पर 26 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखने को मिली है। कंपनी का नेट प्रॉफिट पिछले साल के 206 करोड़ रुपये से बढ़कर 259 करोड़ रुपये हो गया है। इस अवधि में कंपनी की कामकाजी आय सालाना आधार पर 18.7 प्रतिशत बढ़कर 3,727 करोड़ रुपये रही है। जबकि पिछले साल की इसी तिमाही में यह 3,140 करोड़ रुपये पर रही था। पहली तिमाही में इसका ग्रॉस प्रॉफ़िट 19.9 प्रतिशत बढ़कर 1,068.8 करोड़ रुपये रहा है। वहीं ग्रॉस मार्जिन सालाना आधार पर मामूली सुधार के साथ 28.4 प्रतिशत से बढ़ कर 28.7 प्रतिशत पर रहा है।
EBITDA भी सालाना आधार पर 18.7 प्रतिशत बढ़कर 545 करोड़ रुपये हो गया,जो पिछले साल की समान अवधि में 459.5 करोड़ रुपये रहा था, जबकि EBITDA मार्जिन 14.6 प्रतिशत पर फ्लैट रहा है। टैक्स के बाद का प्रॉफ़िट मार्जिन पिछले साल की इसी तिमाही के 6.6 प्रतिशत से बढ़कर 6.9 प्रतिशत हो गया है।
इस तिमाही के दौरान कंपनी की ‘सेम-स्टोर सेल्स ग्रोथ’10 प्रतिशत रही है। इस अवधि में कंपनी ने 27 नए स्टोर खोले और 24 नेट स्टोर जोड़े हैं। जिससे 559 शहरों में इसके कुल स्टोरों की संख्या 819 हो गई है और इसका रिटेल फ़ुटप्रिंट लगभग 1.38 करोड़ वर्ग फ़ीट तक पहुंच गया है।
इस तिमाही में रेवेन्यू में अपैरल (Apparel) का हिस्सा 47.4 प्रतिशत रहा, इसके बाद जनरल मर्चेंडाइज़ का हिस्सा 27.3 प्रतिशत और FMCG का 25.2 प्रतिशत हिस्सा रहा। रेवेन्यू में कंपनी के अपने ब्रांड्स का हिस्सा 75.2 प्रतिशत रहा। जबकि जून के आखिर तक कंपनी का क्विक कॉमर्स कारोबार 520 शहरों में 767 स्टोर्स तक पहुंच गया।
आगे के आउटलुक पर बात करते हुए कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर और CEO गुनेन्दर कपूर ने कहा कि जून तिमाही में महंगाई ज्यादा होने का असर मांग पर पड़ा,लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि कंपनी को उम्मीद है कि आने वाली तिमाहियों में यह असर कम हो जाएगा।
त्योहारों के मौके पर मेहंदी लगाए बिना महिलाओं का श्रृंगार अधूरा माना जाता है। गोरिंटाकू (Gorintaku) मेहंदी डिजाइन रक्षाबंधन और तीज जैसे खास अवसरों पर अगर आप कम समय में यूनिक और खूबसूरत मेहंदी डिजाइन चाहती हैं, तो यह पारंपरिक (traditional) तरीका आपके लिए बेहतरीन ऑप्शन हो सकता है। इसमें मेहंदी कोन या बारीक डिजाइन बनाने की जरूरत नहीं पड़ती, फिर भी हाथों पर नेचुरल, अट्रेक्टिव और सबसे अलग पैटर्न उभरकर आता है:
त्योहारों पर अपनाएं गोरिंटाकू स्टाइल मेहंदी
रक्षाबंधन (Raksha Bandhan) और तीज (Teej) पर मेहंदी लगाना शुभ माना जाता है। अगर इस बार आप मेहंदी कोन और अरेबिक (Arabic) डिजाइन से हटकर कुछ अलग ट्राई करना चाहती हैं, तो गोरिंटाकू स्टाइल एक बेहतरीन ऑप्शन हो सकता है। यह ट्रेडिशनल तरीका अपनी सादगी, नेचुरल लुक और जल्दी तैयार होने की वजह से फिर से पसंद किया जा रहा है।
ताजी मेहंदी, फूल और पत्ती से बनता है डिजाइन
इस ट्रेडिशनल टेक्निक (traditional technique) में बारीक डिजाइन बनाने की जरूरत नहीं होती। हथेली के बीच में कोई ताजा फूल या सुंदर पत्ती रखी जाती है। इसके बाद उसके ऊपर और चारों तरफ ताजी पिसी हुई मेहंदी (Mehndi) का गाढ़ा पेस्ट गोल आकार में लगाया जाता है। चाहें तो उंगलियों के पोरों पर भी मेहंदी लगाई जाती है।
सूखने के बाद उभरता है खूबसूरत नेचुरल पैटर्न
मेहंदी पूरी तरह सूखने के बाद फूल या पत्ती को हटा दिया जाता है। जिस जगह फूल या पत्ती रखी गई होती है, वहां रंग नहीं चढ़ता और गहरे लाल-भूरे रंग की मेहंदी के बीच उसकी साफ और सुंदर शेप उभरकर दिखाई देती है। यही इस टेक्निक की सबसे खास पहचान है।
सिर्फ 10 मिनट में तैयार हो जाता है फेस्टिव लुक
आजकल जहां ब्राइडल (bridal) और अरेबिक मेहंदी (Arabic Mehndi) डिजाइन बनाने में काफी समय लगता है, वहीं इस पारंपरिक तरीके (traditional method) में करीब 10 मिनट में मेहंदी लग जाती है। इसलिए अगर रक्षाबंधन या तीज की तैयारियों के बीच समय कम हो, तो भी आप आसानी से खूबसूरत मेहंदी लुक पा सकती हैं।
केमिकल वाले कोन से बेहतर नेचुरल ऑप्शन
इस टेक्निक में ताजी पिसी हुई मेहंदी की पत्तियों का इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए यह केमिकल वाले मेहंदी कोन (Mehndi cone) की तुलना में ज्यादा नेचुरल ऑप्शन माना जाता है। कई लोगों का मानना है कि ताजी मेहंदी हाथों को ठंडक भी देती है, जिससे इसे लगाना और भी कम्फर्टेबल महसूस होता है।
हर बार मिलेगा अलग और यूनिक डिजाइन
इस ट्रडिशनल मेहंदी स्टाइल (mehndi style) की सबसे बड़ी खासियत यह है कि हर बार इस्तेमाल होने वाला फूल या पत्ती अलग होती है। इसलिए हर डिजाइन भी अलग और यूनिक बनता है।
किसी भी ओलंपिक की एकल प्रतियोगिता में भारत के पहले स्वर्ण पदक विजेता और निशानेबाज अभिनव बिंद्रा ने छात्र आंदोलन का समर्थन करते हुए ट्वीट किया है। उनका मानना है कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो छात्रों में आत्मविश्वास पैदा करे।
उन्होंने एक्स पर पोस्ट किया, ‘‘मैंने कभी खुद को राजनीतिक व्यक्ति नहीं माना। लेकिन मेरा मानना है कि चाहे फिर हम किसी भी पक्ष के हों, कुछ मुद्दे हम सभी से जुड़े हुए हैं। शिक्षा उनमें से एक है।’’बिंद्रा ने कहा, ‘‘किसी राष्ट्र का आकलन केवल उसकी अर्थव्यवस्था या उसकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि इससे होती है कि उसने अपने युवाओं के लिए कितने अवसर सृजित किए। एक ऐसी शिक्षा प्रणाली किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत में से एक है, जो आत्मविश्वास जगाती है, योग्यता को सम्मानित करती है और जिज्ञासा को बढ़ाती है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘उम्मीद है कि हम सभी एकजुट होकर अपनी शिक्षा प्रणाली को लगातार मजबूत करने के लिए मिलकर काम करेंगे, ताकि वह भावी पीढ़ियों के लिए अवसर, नवाचार और आशा का स्रोत बनी रहे।’’
I have never considered myself a political person. But I do believe that some issues belong to all of us, regardless of where we stand. Education is one of them.
The measure of a nation is found not only in its economy or its achievements, but in the opportunities it creates for…
— Abhinav A. Bindra OLY (@Abhinav_Bindra) July 23, 2026
अब 43 साल के हो चुके बिंद्रा ने 2008 बीजिंग ओलंपिक में 10 मीटर एयर राइफल में स्वर्ण पदक जीता था। वह ओलिंपिक खेलों में व्यक्तिगत स्वर्ण पदक जीतने वाले भारत के पहले खिलाड़ी हैं।
वह 2010 से 2020 तक अंतरराष्ट्रीय निशानेबाजी खेल महासंघ (International Shooting Sport Federation ISSF) की एथलीट समिति के सदस्य थे जिसमें वह 2014 से इसके अध्यक्ष रहे। वह 2018 से आईओसी एथलीट आयोग के सदस्य हैं।