DDA Awas Nivesh scheme: डीडीए के 2516 फ्लैटों पर 25% का बंपर डिस्काउंट, 20 अक्टूबर से बुकिंग शुरू, जानें कीमत और बाकी डिटेल्स

DDA Awas Nivesh scheme: अगर आप घर खरीदने की योजना बना रहे हैं तो आपके लिए अच्छी खबर है। दशहरे के मौके पर दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) ने आवास निवेश योजना 2026 की शुरुआत की है। इस योजना के तहत नरेला में लो इनकम ग्रुप (LIG) लोगों के लिए 2,516 फ्लैट उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इन फ्लैटों की कीमत पर 25 फीसदी की छूट दी जाएगी। इन फ्लैट की शुरुआती कीमत 14.95 लाख रुपये रखी गई है। इस योजना का मकसद लोगों को कम कीमत पर दिल्ली में अपना घर खरीदने का मौका देना है। दिल्ली के उपराज्यपाल सरदार तरनजीत सिंह संधू के मार्गदर्शन में इस योजना को शुरू किया गया है। इस योजना का मकसद लोगों को सस्ते घर उपलब्ध कराना है। आइए जानते है इस योजना के बारे में सबकुछ

कब से शुरू होगी ऑनलाइन बुकिंग

दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) की आवास निवेश योजना 2026 के तहत फ्लैट खरीदने की पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन होगी। इस योजना की शुरुआत 8 अक्टूबर 2026 को हुई थी और इसके लिए रजिस्ट्रेशन 14 अक्टूबर से शुरू हो चुका है। फ्लैटों की बुकिंग 20 अक्टूबर 2026 को दशहरे के दिन दोपहर 12 बजे से शुरू होगी। DDA की इस योजना के तहत फ्लैटों की बुकिंग ‘पहले आओ, पहले पाओ’ के आधार पर की जाएगी। इस योजना का लाभ लेने के इच्छुक लोग 31 जनवरी 2027 तक आवेदन और बुकिंग की प्रक्रिया पूरी कर सकते हैं।

नरेला में कहां मिलेंगे फ्लैट

DDA की इस योजना में सभी फ्लैट दिल्ली के नरेला इलाके के सेक्टर G2 से G6 के बीच पॉकेट 3 और पॉकेट 6 में स्थित हैं। कुल 2,516 फ्लैटों में से 1,020 पॉकेट 3 में और 1,496 पॉकेट 6 में उपलब्ध हैं। प्रत्येक फ्लैट का प्लिंथ एरिया करीब 49.90 वर्ग मीटर है, जिसमें साझा इस्तेमाल वाले हिस्से भी शामिल हैं। 25 फीसदी छूट के बाद पॉकेट 3 के फ्लैट की अनुमानित कीमत 15.01 लाख रुपये और पॉकेट 6 के फ्लैट की कीमत करीब 14.95 लाख रुपये रखी गई है।

कितना लगेगा रजिस्ट्रेशन फीस

DDA आवास निवेश योजना 2026 के लिए इच्छुक लोग डीडीए की आधिकारिक वेबसाइट https://eservices.dda.org.in पर जाकर ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन और फ्लैट बुक कर सकते हैं। इस प्रक्रिया को पूरी तरह ऑनलाइन रखा गया है, ताकि आवेदकों को आसानी हो और काम में पारदर्शिता बनी रहे। योजना के तहत एक फ्लैट बुक करने के लिए 1 लाख रुपये जमा करने होंगे। वहीं, पोर्टल पर पहली बार रजिस्ट्रेशन कराने वाले आवेदकों को 2,500 रुपये की फीस देनी होगी, जो वापस नहीं की जाएगी। जिन लोगों ने पहले ही DDA के आवास पोर्टल पर अपना रजिस्ट्रेशन करा लिया है, उन्हें दोबारा पंजीकरण करने की जरूरत नहीं है।

DDA आवास निवेश योजना 2026 के तहत फ्लैट बुक करने से पहले आवेदक DDA की वेबसाइट पर उपलब्ध ब्रोशर में जरूरी नियम और शर्तें पढ़ सकते हैं। अधिक जानकारी के लिए टोल-फ्री नंबर 1800 110 332 पर संपर्क किया जा सकता है। इस योजना का उद्देश्य लोगों को सस्ते घर उपलब्ध कराना और नरेला के विकास को बढ़ावा देना है।

इजराइल में 20 दिन बाद वोटिंग, नेतन्याहू हार सकते हैं:हमास हमले ने बदली देश की राजनीति; वामपंथ कमजोर, अरब पार्टियां अछूत बनीं

7 अक्टूबर 2023 को हमास के करीब 6 हजार लड़ाकों ने इजराइल पर हमला किया। लोगों को घरों और बंकरों में मारा गया, कई लोगों को जिंदा जला दिया गया और 250 से ज्यादा लोगों को बंधक बनाकर गाजा ले जाया गया। करीब 1,200 लोग मारे गए। इसके जवाब में इजराइल ने गाजा पर हमला शुरू कर दिया। तीन साल बाद भी 7 अक्टूबर का असर सिर्फ युद्ध तक सीमित नहीं है। इस हमले ने इजराइल की राजनीति का एजेंडा भी बदल दिया। इजराइल में 27 अक्टूबर को आम चुनाव होने हैं। पहले महंगाई, घरों की कीमत और नेतन्याहू के खिलाफ मुकदमे जैसे मुद्दे चुनावी बहस में प्रमुख थे। अब सुरक्षा, हमास, सेना और फिलिस्तीन का सवाल सबसे ऊपर है। इसका फायदा पहले से मजबूत दक्षिणपंथी राजनीति को मिला है। हालांकि पीएम नेतन्याहू के हारनेका खतरा मंडरा रहा है। वहीं लेफ्ट कमजोर हुआ है और अरब पार्टियों के लिए सरकार बनाने में पहले जैसी किंगमेकर भूमिका निभाना मुश्किल हो गया है। गाजा जंग के बाद देश में पहला चुनाव, हमास हमले के बाद यह देश का पहला राष्ट्रीय चुनाव है। इस चुनाव में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि नेतन्याहू फिर प्रधानमंत्री बनेंगे या नहीं। तीन साल पहले जिस हमले ने इजराइल की राजनीति बदल दी थी, अब उसी हमले के लिए नेतन्याहू की सरकार से जवाब भी मांगा जा रहा है। हमले के समय नेतन्याहू ही प्रधानमंत्री थे और उन पर सुरक्षा चूक की जिम्मेदारी लेने का दबाव है। उनकी मुश्किल यह है कि इस बार उन्हें पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट से सीधी चुनौती मिल रही है। आइजेनकोट की पार्टी कई हालिया सर्वे में नेतन्याहू की लिकुड के बराबर या उससे आगे दिखाई दे रही है। एक ताजा सर्वे में लिकुड को करीब 22-23 और आइजेनकोट की पार्टी को करीब 22 सीटें मिल रही हैं। दूसरी तरफ नेतन्याहू के साथ मौजूद दक्षिणपंथी दलों का पूरा गठबंधन भी बहुमत से पीछे है। हालिया सर्वे के औसत में उनके गठबंधन को करीब 52-55 सीटें मिल रही हैं, जबकि सरकार बनाने के लिए 61 सीटें चाहिए। दक्षिणपंथ पहले से मजबूत था, 7 अक्टूबर के बाद और मजबूत हुआ इजराइल में दक्षिणपंथ 7 अक्टूबर से पहले ही मजबूत था। नेतन्याहू की लिकुड पार्टी और धार्मिक-राष्ट्रवादी दल पहले से सरकार में थे। लेकिन हमास के हमले के बाद सुरक्षा का मुद्दा सबसे बड़ा हो गया। दक्षिणपंथी नेता लगातार कहने लगे कि इजराइल को हमास और फिलिस्तीनियों के खिलाफ सख्त रुख रखना चाहिए। इतमार बेन-ग्विर और बेजेलेल स्मोट्रिच जैसे नेताओं को इसी मुद्दे पर अपनी बात रखने की ज्यादा जगह मिली। फिलिस्तीनी राज्य का विरोध, वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों का समर्थन और फिलिस्तीनियों के खिलाफ सख्त नीति जैसे मुद्दे अब इजराइली राजनीति में ज्यादा खुलकर उठाए जाने लगे। लेफ्ट पहले शांति की बात करता था, अब सुरक्षा-आतंकवाद की 3 साल पहले इजराइल की लेफ्ट राजनीति में लेबर पार्टी और मेरेत्ज सबसे प्रमुख नाम थे। दोनों पार्टियां फिलिस्तीन को मान्यता देने और शांति की बात करती थीं। मेरेत्ज तो वेस्ट बैंक के कब्जे वाले इलाकों से इजराइल की वापसी की भी वकालत करती थी। लेकिन 7 अक्टूबर के हमले के बाद यह राजनीति मुश्किल में आ गई। हमास के हमले ने इजराइली समाज में सुरक्षा और आतंकवाद का मुद्दा सबसे ऊपर ला दिया। इसी बदलाव के बीच लेबर और मेरेत्ज ने 2024 में मिलकर ‘द डेमोक्रेट्स’ पार्टी बनाई। इसका नेतृत्व पूर्व सैन्य अधिकारी याइर गोलान कर रहे हैं। वामपंथी पार्टी अब भी फिलिस्तीनियों के साथ राजनीतिक समाधान और वेस्ट बैंक के विलय को रोकने की बात करती है, लेकिन साथ ही हमास के शासन को खत्म करने और इजराइल की सुरक्षा मजबूत करने पर भी जोर देती है। यही इजराइली राजनीति में आया सबसे बड़ा बदलाव है। सुरक्षा का मुद्दा सिर्फ दक्षिणपंथ की पहचान नहीं रहा; नेतन्याहू का विरोध करने वाली पार्टियां भी अब इसी सवाल का जवाब दिए बिना चुनाव नहीं लड़ सकतीं। अरब पार्टी पहले किंगमेकर हुआ करती थीं, अब अछूत बनीं इजराइल की राजनीति में अरब पार्टियों की ताकत का सबसे बड़ा उदाहरण 2021 में देखने को मिला। उस चुनाव में किसी भी खेमे को सरकार बनाने के लिए जरूरी 61 सीटें नहीं मिलीं। नेतन्याहू सबसे बड़े नेता जरूर रहे, लेकिन बहुमत नहीं जुटा पाए। इसके बाद उनके विरोध में खड़े अलग-अलग दलों ने हाथ मिला लिया। दक्षिणपंथी नेता नफ्ताली बेनेट और सेंटर के नेता याइर लैपिड ने गठबंधन बनाया। इसमें वामपंथी और दक्षिणपंथी दलों के साथ मंसूर अब्बास की अरब पार्टी राअम भी शामिल हुई। राअम की 4 सीटों के समर्थन से सरकार बनी। इस तरह करीब 12 साल से प्रधानमंत्री रहे नेतन्याहू सत्ता से बाहर हो गए। इजराइल में पहली बार कोई अरब पार्टी सरकार बनाने वाले गठबंधन का हिस्सा बनी। 2026 में तस्वीर अलग है। मौजूदा सर्वेक्षणों में अरब पार्टियों को करीब 13 सीटें मिलती दिख रही हैं। अरब पार्टी को सरकार में शामिल करना राजनीतिक रूप से कहीं ज्यादा मुश्किल हो गया है। ऐसा करने पर पार्टी को यहूदी वोटर्स के गुस्से का सामना करना पड़ सकता है। यानी 2021 में अरब पार्टियां नेतन्याहू को सत्ता से बाहर करने की ‘किंगमेकर’ बनी थीं। 2026 में उनके पास फिर सरकार बनाने के लिए जरूरी सीटें हो सकती हैं, लेकिन 7 अक्टूबर के बाद बदले राजनीतिक माहौल में उन्हें साथ लेना कहीं ज्यादा मुश्किल हो गया है। —————————– यह खबर भी पढ़ें… ममदानी की जीत से बदली यूरोप की राजनीति:वामपंथी पार्टियों ने सस्ते घर और कम किराए को मुद्दा बनाया; जर्मनी में जीत मिली जोहरान ममदानी ने पिछले साल नवंबर में न्यूयॉर्क मेयर का चुनाव जीता था। उनका मैसेज था कि न्यूयॉर्क को आम लोगों के लिए सस्ता बनाया जाए। पूरी खबर यहां पढ़ें…

ममदानी की जीत ने बदली यूरोप की राजनीति:वामपंथी पार्टियों ने सस्ते घर और कम किराए को मुद्दा बनाया; बर्लिन में जीत मिली

न्यूयॉर्क में जोहरान ममदानी की जीत का असर अब यूरोप की राजनीति में दिखने लगा है। यूरोपीय नेता ममदानी की तरह महंगे किराए, बढ़ती महंगाई और आम लोगों के खर्च पर फोकस कर रहे हैं। सबसे दिलचस्प मामला जर्मनी के बर्लिन का है। वहां महंगे घरों को मुद्दा बनाकर एलिफ एराल्प ने चुनाव जीत लिया। जर्मन मीडिया ने अब एराल्प को ‘बर्लिन की ममदानी’ कह रहे हैं। वहीं, फ्रांस, स्पेन और नीदरलैंड के वामपंथी नेता भी ममदानी की राजनीति पर नजर रख रहे हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि ममदानी ने यूरोप के वामपंथ को चुनाव लड़ने का नया तरीका दे दिया है। 1. जर्मनी: सस्ते घरों का वादा किया, सबसे ज्यादा सीटें मिलीं अगर यूरोप में किसी एक नेता को ममदानी से सबसे सीधे तौर पर जोड़ा जा सकता है, तो वह एलिफ एराल्प हैं। 45 साल की एराल्प वकील हैं और तुर्की मूल के परिवार से आती हैं। उनके माता-पिता 1980 के तुर्की सैन्य तख्तापलट के बाद जर्मनी आए थे। एराल्प 2017 में द लिंक से जुड़ी थीं। पिछले महीने हुए चुनाव में उनकी पार्टी का सबसे बड़ा मुद्दा रहा- महंगा शहर और महंगा किराया। एराल्प ने बर्लिन में निजी कंपनियों के पास मौजूद करीब 2.2 लाख मकानों को सार्वजनिक नियंत्रण में लाने की मांग की। इसका फायदा द लिंक को मिला। वह चुनाव में करीब 25.7% वोट मिले और वह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। अब सरकार बनाने के लिए उसे दूसरी पार्टियों के साथ गठबंधन करना होगा। 2. ब्रिटेन: पर्यावरण के मुद्दे को महंगे घर से जोड़ा ब्रिटेन में ममदानी से सबसे ज्यादा तुलना जैक पोलांस्की की होती है। वे ग्रीन पार्टी के नेता हैं। यह पार्टी मुख्य रूप से पर्यावरण और जलवायु के मुद्दों पर राजनीति करती रही है। लेकिन पोलांस्की ने इनका दायरा बढ़ाया है। पोलांस्की महंगाई, महंगे घर, बढ़ते किराए, रोजमर्रा के खर्च और अमीरों पर ज्यादा टैक्स जैसे मुद्दों को पर्यावरण की राजनीति से जोड़ते हैं। पोलांस्की इसे ‘इको-पॉपुलिज्म’ कहते हैं। ममदानी की तरह पोलांस्की भी सोशल मीडिया को राजनीति का अहम माध्यम बना रहे हैं। पोलांस्की ने बताया कि उनकी वीडियो टीम ममदानी के वीडियो बनाने वाली टीम से टिप्स ले रही है। दिलचस्प बात यह है कि पोलांस्की इस समय लंदन की होलबॉर्न सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के सांसद पद से हटने के बाद 8 अक्टूबर को यहां उपचुनाव हो रहा है। दो साल पहले हुए चुनाव में ग्रीन पार्टी को यहां सिर्फ 10 फीसदी वोट मिले थे। कुछ सर्वे में अनुमान लगाया गया है कि इस बार ग्रीन को 40 फीसदी वोट मिल सकता है। 3. स्पेन: 87 साल की महिला को घर से निकाला, सरकार गिरी स्पेन में महंगा घर और बढ़ता किराया इस समय बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है। पिछले महीने मैड्रिड में 87 साल की मारिकर्मेन अबास्कल को 70 साल से रह रहे घर से निकाल दिया गया। इसके बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। यह मामला स्पेन के आवास संकट का प्रतीक बन गया। मामला इतना बढ़ा कि सरकार पर आवास संकट से निपटने का दबाव बढ़ गया। संसद में सरकार के आवास संबंधी प्रस्ताव खारिज होने के बाद प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने 29 नवंबर को समय से पहले आम चुनाव कराने का ऐलान कर दिया। यानी स्पेन में भी घर और किराया अब सिर्फ सामाजिक समस्या नहीं रहे। वे सीधे चुनावी राजनीति का मुद्दा बन चुके हैं। 4. फ्रांस: पेरिस में 60 हजार सस्ते घर बनाने का वादा फ्रांस की राजधानी पेरिस के मेयर इमैनुएल ग्रेगोयर समाजवादी पार्टी से जुड़े हैं। वे इसी साल मेयर चुने गए हैं। उनकी राजनीति में महंगा घर और बढ़ता किराया बड़ा मुद्दा है। ग्रेगोयर पेरिस में ज्यादा सस्ते घर बनाने, खाली पड़े मकानों को लोगों के लिए इस्तेमाल करने और किराए पर नियंत्रण बढ़ाने की बात करते हैं। उनकी सरकार का मकसद 60 हजार नए सस्ते घर बनाना है। ममदानी की जीत से पहले भी फ्रांस के कुछ वामपंथी नेता उनके अभियान से सीखने की बात कर चुके थे। ब्रिटेन की तरह यहां भी ममदानी की चुनावी शैली और सीधे मैसेज देने के तरीके पर नजर रखी गई। 5. नीदरलैंड: घर की कमी को मुद्दा बनाया, सबसे बड़ी पार्टी बनी नीदरलैंड में ममदानी की जीत से पहले ही घर और किराए का मुद्दा चुनावी राजनीति के केंद्र में आ चुका था। 2025 के राष्ट्रीय चुनाव में D66 के नेता रॉब येटन ने आवास संकट को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया। उस समय देश में करीब 4 लाख घरों की कमी थी। घर खरीदना महंगा हो चुका था और किराए लगातार बढ़ रहे थे। यानी लाखों लोगों के सामने सवाल था। सरकार महंगाई कब कम करेगी से पहले घर मिलेगा कब? येटन की पार्टी D66 ने हर साल 1 लाख नए घर बनाने और 10 नई टाउनशिप विकसित करने का प्रस्ताव रखा। चुनाव में इसका फायदा भी मिला। पार्टी 2023 की 9 सीटों से बढ़कर 2025 में 26 सीटों पर पहुंच गई और सबसे बड़ी पार्टियों में शामिल हुई। यानी नीदरलैंड में सस्ता घर और कम किराया यूरोप में ममदानी की जीत से पहले ही बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका था। ममदानी की जीत ने इस बहस को और चर्चा में ला दिया। ——————————

बुजुर्ग किराएदार को घर से निकालने पर सरकार संकट में:स्पेन में महंगे किराए से जुड़ा प्रस्ताव संसद में गिरा, 8 महीने पहले चुनाव होंगे

स्पेन में 87 साल की एक महिला को घर से निकालना बहुत बड़ा मुद्दा बन गया। महंगे किराए और लोगों को घर से निकाले जाने के खिलाफ हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। मामला इतना बढ़ा कि सरकार को किराएदारों को राहत देने के लिए संसद में इमरजेंसी बिल लाने पड़े। लेकिन सरकार इन्हें पास नहीं करा सकी। इसके बाद प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज ने तय समय से करीब 8 महीने पहले आम चुनाव कराने का ऐलान कर दिया। स्पेन में 29 नवंबर 2026 को वोटिंग होगी। 70 साल से घर में रह रही थी बुजुर्ग मामले की शुरुआत 23 सितंबर को हुई। मैड्रिड में 87 साल की मारिया डेल कार्मेन अबास्कल को उस घर से निकाल दिया गया, जहां वह करीब 70 साल से रह रही थीं। यह घर अबास्कल परिवार के पास कई दशकों से किराए पर था। 2018 में घर के मूल मालिक ने पूरी इमारत एक रियल एस्टेट कंपनी को बेच दी। इसके बाद कंपनी और अबास्कल में किराए को लेकर विवाद शुरू हो गया। कंपनी ने किराया 500 यूरो से बढ़ाकर 2650 यूरो कर दिया। अबास्कल की मासिक पेंशन ही करीब 1,350 यूरो थी। यानी मांगा गया किराया उनकी पूरी मासिक आय से भी काफी ज्यादा था। इसी वजह से वह नया किराया देने की स्थिति में नहीं थीं। इसके बाद मामला कोर्ट में चला गया था। घटना के बाद पूरे देश में विरोध शुरू हुआ अबास्कल को घर से निकाले जाने की तस्वीरें और वीडियो सामने आने के बाद मामला तेजी से फैल गया। लोगों का कहना था कि अगर 87 साल की बुजुर्ग महिला अपनी पूरी पेंशन देने के बाद भी घर का किराया नहीं चुका सकतीं, तो यह सिर्फ एक परिवार की समस्या नहीं है। मैड्रिड समेत कई शहरों में लोगों ने महंगे किराए और बेदखली के खिलाफ प्रदर्शन किए। अबास्कल का मामला धीरे-धीरे स्पेन के बढ़ते आवास संकट का प्रतीक बन गया। सरकार पर भी दबाव बढ़ने लगा। प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज की सरकार ने कहा कि बुजुर्गों और दूसरे कमजोर किराएदारों को घर से निकालने से रोकने के लिए तुरंत कदम उठाने की जरूरत है। सरकार ने दो इमरजेंसी बिल पेश किए, दोनों खारिज 29 सितंबर को सरकार ने किराएदारों को राहत देने के लिए संसद में दो इमरजेंसी बिल पेश किए। पहला बिल: इसमें कमजोर किराएदारों को 2030 तक घर से निकालने से रोकने की योजना थी। साथ ही किराए बढ़ाने पर कुछ पाबंदियां लगाने और बड़े निवेशकों के घर खरीदने पर रोक लगाने की बात थी। छोटे मकान मालिकों और किराएदारों को टैक्स में राहत देने का भी प्रावधान था। दूसरा बिल: इसमें किराएदारों के मौजूदा किराए के समझौते को आगे बढ़ाने की बात थी। यानी समझौता खत्म होने के बाद उन्हें तुरंत घर खाली नहीं करना पड़ता और उन्हें कुछ और समय तक उसी घर में रहने का मौका मिलता। PM पेद्रो सांचेज की सरकार के पास संसद में बहुमत नहीं है। इसलिए उसे हर बड़े फैसले के लिए दूसरी पार्टियों के समर्थन की जरूरत पड़ती है। सरकार को उम्मीद थी कि आवास संकट को देखते हुए दूसरी पार्टियां इन उपायों का समर्थन करेंगी। लेकिन उसे जरूरी समर्थन नहीं मिला। 2 अक्टूबर को हुए वोटिंग में दोनों प्रस्ताव पास नहीं हो सके। बिलों को समर्थन नहीं मिलने की 4 वजहें वजह 1: दूसरी पार्टियों को लगा कि इससे किराए के घर कम हो सकते हैं: विरोध करने वाली पार्टियों का कहना था कि अगर मकान मालिकों पर ज्यादा नियम लगाए गए तो वे अपने घर किराए पर देने से बच सकते हैं। इससे बाजार में किराए के लिए घर कम पड़ सकते हैं। वजह 2: किराया और बढ़ने का खतरा: जब किराए के लिए घर कम होंगे, तो बचे हुए घरों का किराया बढ़ सकता है। यानी किराएदारों को राहत देने के बजाय समस्या और बड़ी हो सकती है। वजह 3: छोटे मकान मालिकों को लेकर भी आपत्ति थी: जुंत्स का कहना था कि सरकार की योजना में छोटे मकान मालिकों के हितों का पर्याप्त ध्यान नहीं रखा गया। पार्टी चाहती थी कि उनके लिए भी ज्यादा राहत और सुरक्षा हो। वजह 4: सरकार के राजनीतिक विरोधी भी साथ नहीं आए: विपक्षी पार्टियां PP और वॉक्स पहले से ही सांचेज सरकार की आवास नीति का विरोध कर रही थीं। उन्होंने दोनों बिलों का समर्थन नहीं किया। सांचेज ने समय से पहले चुनाव का फैसला क्यों लिया? स्पेन में किराए का संकट कितना बड़ा है? 1. सस्ते घरों की संख्या बेहद कम है: स्पेन में कम आय वाले लोगों के लिए सस्ते सरकारी घर बहुत कम हैं। कुल घरों में ऐसे घरों की हिस्सेदारी सिर्फ 1.5 % है। 2. महीनेभर की कमाई के करीब पहुंचा किराया: रॉयटर्स के मुताबिक कुछ मामलों में किराए की कीमत एक युवा व्यक्ति की औसत मासिक कमाई के करीब 99% तक पहुंच गई है। 3. 2028 तक 10 लाख से ज्यादा घरों की कमी का खतरा: केंद्रीय बैंक ने चेतावनी दी है कि अगर घरों की कमी दूर नहीं हुई तो 2028 तक 10 लाख से ज्यादा घरों की कमी हो सकती है।

Delhi Master Plan 2047: दिल्ली के इन इलाकों में बदल जाएगी तस्वीर, 200 वर्ग किमी में नया शहर बसाने की तैयारी

दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) मास्टर प्लान दिल्ली-2047 (MPD-2047) के तहत राजधानी के बाहरी इलाकों के विकास को लेकर बड़ा प्लान तैयार किया गया है। MPD-2047 के तहत दिल्ली के बाहरी इलाकों में करीब 200 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को विकसित करने की योजना है। लैंड पूलिंग के जरिए यहां व्यवस्थित तरीके से विकास किया जाएगा। इस इलाके में करीब 600 किलोमीटर लंबी नई सड़कें बनाने की योजना है। 30 मीटर या उससे ज्यादा चौड़ी सड़कों को दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) विकसित करेगा। यह योजना विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई है।

जानें इस विकास मॉडल के बारे में

अर्बन एक्सटेंशन रोड-2 (UER-II) के आसपास घने और मिश्रित तरीके से विकास को बढ़ावा देने की योजना है। यहां सस्ते घरों के साथ दुकानों, दफ्तरों, संस्थानों, लॉजिस्टिक्स और गोदामों जैसी सुविधाओं को विकसित किया जा सकेगा। MPD-2047 में अलग-अलग विकास मॉडल रखे गए हैं, जिससे जरूरत के अनुसार इलाकों को विकसित किया जा सकेगा।

MPD-2047 के जरिए होगा विकास

दिल्ली-2047 मास्टर प्लान के तहत राजधानी के बाहरी इलाकों में विकास को गति देने की तैयारी है। इसके लिए करीब 200 वर्ग किलोमीटर के अर्बन एक्सटेंशन क्षेत्र में लैंड पूलिंग व्यवस्था को मजबूत किया गया है। योजना का उद्देश्य इन क्षेत्रों में सड़क और दूसरी जरूरी सुविधाओं के साथ व्यवस्थित विकास करना है। इसके तहत करीब 600 किलोमीटर का नया सड़क नेटवर्क तैयार करने की योजना है, जिससे लैंड पूलिंग वाले इलाकों में बेहतर कनेक्टिविटी मिल सकेगी। MPD-2047 में जमीन मालिकों की सुविधा के लिए अलग-अलग विकास मॉडल हैं। इससे जमीन के मालिक अपनी सुविधा के अनुसार योजना में शामिल हो सकेंगे और इलाकों में जरूरी सुविधाएं समय पर तैयार करने में मदद मिलेगी। वहीं, DDA सड़क, परिवहन और अन्य जरूरी सुविधाएं विकसित करेगा।

बेहतर आवास के साथ मिलेगी अच्छी सुविधा

MPD-2047 में शहर के विकास को पहले से ज्यादा व्यवस्थित और सुविधाओं पर आधारित बनाने पर जोर दिया गया है। 30 मीटर या उससे ज्यादा चौड़ी सड़कों को DDA की ओर से विकसित किया जाएगा। नए शहरी क्षेत्रों में सिर्फ घर ही नहीं बनाए जाएंगे, बल्कि स्कूल, अस्पताल, पार्क, हरित क्षेत्र, बाजार और दूसरी जरूरी सार्वजनिक सुविधाएं भी विकसित की जाएंगी। इसका उद्देश्य लोगों को बेहतर आवास के साथ अच्छी और सुविधाजनक जीवनशैली देना है।

20 हेक्टेयर जमीन की जरूरत

दिल्ली के बाहरी इलाकों में निजी जमीन को योजनाबद्ध तरीके से विकसित करने के लिए 2018 में लैंड पूलिंग पॉलिसी शुरू की गई थी। इसमें जमीन मालिक अपनी इच्छा से योजना में शामिल हो सकते हैं और DDA की भूमिका एक मददगार संस्था के तौर पर रहती है। अब MPD-2047 के तहत इस व्यवस्था को और आसान बनाने की तैयारी है। जमीन मालिक कंसोर्टियम के जरिए जमीन को एक साथ लाकर विकास कर सकते हैं। इसके अलावा टाउन प्लानिंग जैसे विकल्प भी दिए गए हैं, जिसमें कम से कम 20 हेक्टेयर जमीन की जरूरत होगी।

नए इलाकों में घरों को किया जाएगा विकसित

MPD-2047 के तहत नए इलाकों में घरों के साथ लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने वाली सुविधाएं भी विकसित की जाएंगी। सड़क की चौड़ाई के अनुसार रिहायशी क्षेत्रों में दुकान, छोटे कारोबार और दूसरी सेवाओं की अनुमति दी जा सकेगी। वहीं, UER-II के आसपास सस्ते घरों के साथ बाजार, संस्थान, लॉजिस्टिक्स और गोदाम बनाने की योजना है। इससे इन क्षेत्रों में रोजगार और कारोबार के नए अवसर मिलने की उम्मीद है।

जुलाई 2026 तक मिले इतने आवेदन

लैंड पूलिंग पॉलिसी को तेजी से लागू करने के लिए दिल्ली डेवलपमेंट एक्ट, 1957 में जरूरी बदलाव किए जाएंगे। यह योजना छह प्लानिंग जोन K-I, L, N, P-II, P-I का हिस्सा और J के 105 गांवों में लागू है, जिन्हें 138 सेक्टर में बांटा गया है। जुलाई 2026 तक इस योजना के तहत 7,615 से ज्यादा आवेदन मिल चुके थे और 7,885 हेक्टेयर से अधिक जमीन पूल की जा चुकी थी। 16 सेक्टर में तय लक्ष्य के 70 फीसदी से ज्यादा जमीन इकट्ठा हो चुकी है, जिसके बाद DDA ने वहां कंसोर्टियम बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

प्लानिंग जोन P-II का सेक्टर 8B लैंड पूलिंग योजना में आगे बढ़ने वाला पहला सेक्टर बन गया है। गाड़ी खसरो और इब्राहिम पुर गांवों में आने वाले इस सेक्टर में 70 फीसदी से ज्यादा जमीन एक साथ पूल हो चुकी है, इसलिए अब यहां विकास कार्य शुरू किए जा सकते हैं। इसके अलावा आठ अन्य सेक्टरों के जमीन मालिकों ने भी DDA को कंसोर्टियम बनाने की जानकारी दी है, जिससे योजना को जमीन पर लागू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है।

MPD-2047 के तहत लैंड पूलिंग के जरिए दिल्ली के बाहरी इलाकों को बेहतर तरीके से विकसित करने की योजना है। इन क्षेत्रों में सड़क और दूसरी जरूरी सुविधाओं के साथ घर, रोजगार के अवसर, सार्वजनिक सुविधाएं और हरित क्षेत्र भी तैयार किए जाएंगे।

650 करोड़ की एलिवेटेड रोड से बदलेगा NCR का सफर! लाल कुआं-दादरी का 1 घंटे का रास्ता सिर्फ 20 मिनट में

गाजियाबाद के लाल कुआं और दादरी के बीच जीटी रोड पर रोजाना सफर करने वालों को लंबे समय से भारी ट्रैफिक जाम का सामना करना पड़ रहा है, खासकर हफ्ते के दिनों में पीक आवर्स के दौरान। ऐसे में चौधरी मोड़, न्यू बस स्टैंड और रेलवे क्रॉसिंग वाले हिस्से पर अक्सर जाम लगने की वजह से यात्रियों, कमर्शियल गाड़ियों और स्थानीय निवासियों को लंबे समय तक फंसे रहना पड़ता है।

News18 के अनुसार, अब लाल कुआं और दादरी के बीच कनेक्टिविटी बेहतर करने का लंबे समय से लंबित प्रस्ताव एक कदम और आगे बढ़ गया है; अधिकारियों ने इस रूट पर 12 किलोमीटर लंबे एलिवेटेड रोड कॉरिडोर का प्रस्ताव रखा है, जिससे जाम कम होने और यात्रा का समय काफी कम होने की उम्मीद है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रस्तावित एलिवेटेड रोड GT रोड के उस बड़े रीडेवलपमेंट प्लान का हिस्सा है जिसका मकसद गाजियाबाद और ग्रेटर नोएडा के बीच कनेक्टिविटी को बेहतर बनाना है। सेतु निगम ने इस कॉरिडोर के लिए डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) और सर्वे का काम पूरा कर लिया है।

करोड़ों की नई परियोजनाओं को मिलेगी मंजूरी

लगभग 650 करोड़ रुपये की लागत वाले इस प्रस्ताव को गाजियाबाद के सांसद अतुल गर्ग ने आगे बढ़ाया था और अब इसे मंजूरी के लिए उत्तर प्रदेश सरकार के पास भेजा गया है। मंजूरी मिलने के बाद, यह एलिवेटेड कॉरिडोर दादरी की ओर जाने वाले वाहनों को कई व्यस्त चौराहों और लोकल ट्रैफिक पॉइंट्स से बचाकर निकलने में मदद करेगा, जिसकी वजह से जाम की समस्या कम होने की उम्मीद है।

फिलहाल अभी, GT रोड पर भारी ट्रैफिक के कारण लाल कुआं और दादरी के बीच सफर में 45 मिनट से लेकर एक घंटे तक का समय लग सकता है। जबकि चौधरी मोड़, न्यू बस स्टैंड और रेलवे क्रॉसिंग के पास जाम की वजह से लोगों को लंबे समय तक रुकना पड़ता है।

ट्रैफिक होगा कम

अधिकारियों का मानना ​​है कि एलिवेटेड रोड से गुजरने वाले ट्रैफिक के लिए एक अलग रास्ता मिलने से सफर का समय घटकर लगभग 15 से 20 मिनट हो सकता है। News18 की रिपोर्ट के मुताबिक, रोजाना सफर करने वालों का कहना है कि यह प्रोजेक्ट दोनों तरफ सफर का समय कम करके उनके रोजाना लगभग एक घंटे बचा सकता है।

प्रस्तावित कॉरिडोर सीधे लाल कुआं से दादरी तक जाएगा और रास्ते में पड़ने वाले बड़े चौराहों से होकर नहीं गुजरेगा। दूर जाने वाला ट्रैफिक एलिवेटेड हिस्से से गुजरेगा, जबकि लोकल गाड़ियां नीचे वाली सड़क का इस्तेमाल करती रहेंगी।

अधिकारियों को उम्मीद है कि लोकल और लंबी दूरी के ट्रैफिक के अलग-अलग होने से आवागमन बेहतर होगा, चार प्रमुख सिग्नलों पर लगने वाला जाम कम होगा और इस रास्ते की सबसे बड़ी समस्या भी दूर होगी। दरअसल, अभी एक ही सड़क पर भारी कमर्शियल वाहन, औद्योगिक क्षेत्र का ट्रैफिक और स्थानीय यात्रियों की आवाजाही होती है, जिससे अक्सर जाम की स्थिति बनती है।

बता दें कि GT रोड उन सबसे व्यस्त सड़क कॉरिडोर में से एक है जो दिल्ली को गाजियाबाद और आस-पास के इलाकों से जोड़ता है। दिल्ली, सीलमपुर, साहिबाबाद, मोहन नगर और घंटा घर से आने वाला ट्रैफिक लाल कुआं की तरफ आता है, जिससे मौजूदा सड़क नेटवर्क पर काफी दबाव पड़ता है।

गौरतलब है कि लाल कुआं पर दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे से आने वाली गाड़ियां, अलीगढ़ की ओर जाने वाली गाड़ियां और दादरी व सूरजपुर की ओर जाने वाले भारी इंडस्ट्रियल ट्रैफिक की वजह से जाम की समस्या बढ़ जाती है। News18 की रिपोर्ट के मुताबिक, यहां पहले से मौजूद फ्लाईओवर ने कुछ हद तक राहत जरूर दी है, लेकिन नीचे वाली सड़क पर अभी भी भारी ट्रैफिक रहता है, खासकर दादरी NTPC, कोट और आस-पास के इंडस्ट्रियल इलाकों में जाने वाले ट्रकों की वजह से।

उम्मीद है कि एलिवेटेड रोड से गाजियाबाद, क्रॉसिंग्स रिपब्लिक, ग्रेटर नोएडा वेस्ट और दादरी रोड के बीच कनेक्टिविटी बेहतर होगी। साथ ही, इससे सूरजपुर, कोट और दादरी के इंडस्ट्रियल हब को भी फायदा होगा, क्योंकि माल की ढुलाई आसान हो जाएगी।

अधिकारियों को यह भी उम्मीद है कि यह प्रोजेक्ट गाजियाबाद और ग्रेटर नोएडा के बीच सफर करने वाले लोगों के लिए एक वैकल्पिक रास्ता उपलब्ध कराएगा, जिससे दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे की सर्विस लेन पर ट्रैफिक का दबाव होगा।

इस प्रोजेक्ट का असर रियल एस्टेट सेक्टर पर भी पड़ने की उम्मीद है। NCR में पहले भी देखा गया है कि जब किसी इलाके में कनेक्टिविटी और इंफ्रास्ट्रक्चर बेहतर होता है, तो वहां घरों की मांग बढ़ने लगती है। माना जा रहा है कि प्रस्तावित एलिवेटेड रोड का भी ऐसा ही असर देखने को मिल सकता है।

लाल कुआं, जिसे पहले मुख्य रूप से एक ट्रांजिट पॉइंट माना जाता था, धीरे-धीरे एक रिहायशी इलाके के तौर पर उभरा है क्योंकि यह वेव सिटी, क्रॉसिंग्स रिपब्लिक और राज नगर एक्सटेंशन से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।

वहीं, नोएडा में प्रॉपर्टी की कीमतें लगातार बढ़ने के कारण, कई घर खरीदार गाजियाबाद और आस-पास के इलाकों में तुलनात्मक रूप से सस्ते घरों के विकल्प तलाशने लगे हैं।

एलिवेटेड रोड बनने के बाद दादरी, कोट गांव और रोजा-याकूबपुर क्षेत्र जैसे इलाकों की लोकप्रियता बढ़ सकती है, क्योंकि यहां से गाजियाबाद पहुंचना आसान हो जाएगा।

रिपोर्टों से पता चलता है कि इस इलाके में अभी दादरी की तरफ 45 लाख रुपये से कम कीमत वाले 2BHK घरों की मांग है, जबकि लाल कुआं और क्रॉसिंग्स रिपब्लिक में खरीदार 65 लाख रुपये से कम कीमत वाले 2BHK और 3BHK अपार्टमेंट देख रहे हैं।

फिलहाल यह प्रस्ताव उत्तर प्रदेश सरकार की मंजूरी का इंतजार कर रहा है। जैसे ही इसे हरी झंडी मिलेगी, अधिकारी जमीन से जुड़े काम, अतिक्रमण हटाने और बिजली-पानी जैसी सार्वजनिक सुविधाओं (यूटिलिटी) को शिफ्ट करने की प्रक्रिया शुरू करेंगे। आमतौर पर इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में यही चरण सबसे ज्यादा समय लेते हैं।

News18 की रिपोर्ट के मुताबिक, लाल कुआं से न्यू बस स्टैंड तक के एलिवेटेड सेक्शन की लागत लगभग 650 करोड़ रुपये आंकी गई है, जबकि दादरी की ओर जाने वाले पूरे 12 किलोमीटर के कॉरिडोर को चरणों में विकसित किए जाने की उम्मीद है। अगर मंजूरी और शुरुआती काम योजना के अनुसार आगे बढ़ते हैं, तो अगले साल तक निर्माण कार्य शुरू हो सकता है, जिससे NCR के सबसे व्यस्त कॉरिडोर में से एक पर यात्रा करने वाले लोगों को लंबे समय से जाम की समस्या से राहत मिलेगी।

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Lucknow Housing Scheme: लखनऊ समेत UP के 6 जिलों में बनेंगे 13.36 लाख सस्ते घर, जानिए LDA का पूरा प्लान

UP SCR Affordable Housing Plan: उत्तर प्रदेश के राज्य राजधानी क्षेत्र (SCR) में रहने वाले और घर खरीदने का सपना देखने वाले लोगों के लिए बड़ी खबर है। लखनऊ सहित एससीआर के 6 प्रमुख जिलों में बड़े स्तर पर आवासीय योजनाएं आकार लेने जा रही हैं। इस योजना के तहत कुल 48.75 लाख आवास बनाने का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें आम और गरीब लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए 13.36 लाख किफायती यानी सस्ते मकान शामिल होंगे।

रिपोर्ट्स के अनुसार, इस महा-परियोजना से लगभग 33.40 लाख लोगों को सीधा लाभ मिलेगा। आइए जानते हैं कि किस जिले में कितने घर बनेंगे, जमीन की क्या तैयारी है और किस एजेंसी को इसका जिम्मा दिया गया है।

वर्ष 2051 की जरूरतों को ध्यान में रखकर खींचा गया खांचा

SCR के गठन के बाद लखनऊ और इसके आसपास के क्षेत्र रोजगार और व्यापार के बड़े केंद्र के रूप में विकसित हो रहे हैं। बाहरी जिलों से आने वाले लोगों के लिए किफायती आवास उपलब्ध कराने के मकसद से 10 जुलाई को हुई विभिन्न विभागों की समीक्षा बैठक में इस मेगा प्लान को मंजूरी दी गई।

2051 तक कुल जरूरत: 48.75 लाख घर।

सस्ते घर (EWS & LIG): 13.36 लाख घर।

योजना का क्षेत्रफल: कुल 70 हजार एकड़ में आवासीय योजनाएं विकसित होंगी।

पहला चरण: शुरुआती चरण में 9,940 एकड़ जमीन पर आवासीय परियोजनाएं धरातल पर उतारी जाएंगी।

जिला-वार डेटा: किस जिले में कितने बनेंगे सस्ते आवास?

एससीआर में शामिल लखनऊ, बाराबंकी, सीतापुर, उन्नाव, हरदोई और रायबरेली में घरों की जरूरत और सस्ते मकानों का आंकड़ा कुछ इस प्रकार है:

एससीआर में शामिल लखनऊ, बाराबंकी, सीतापुर, उन्नाव, हरदोई और रायबरेली में घरों की जरूरत और सस्ते मकानों का आंकड़ा कुछ इस प्रकार है:

किस जिले में कितनी भूमि की होगी जरूरत?

लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) के उपाध्यक्ष प्रथमेश कुमार के अनुसार, इन योजनाओं को आकार देने के लिए कुल 70,000 एकड़ जमीन की जरूरत होगी।

लखनऊ: 35,600 एकड़

उन्नाव: 7,500 एकड़

रायबरेली: 7,400 एकड़

सीतापुर: 7,300 एकड़

बाराबंकी: 6,900 एकड़

हरदोई: 4,200 एकड़

किन-किन लोकेशनों पर आएंगी आवासीय योजनाएं?

इस पूरे प्रोजेक्ट को धरातल पर उतारने की मुख्य जिम्मेदारी लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA), सूडा (SUDA) और उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद को सौंपी गई है। सीतापुर रोड पर नैमिष नगर, आगरा एक्सप्रेसवे के पास वरुण विहार, सुलतानपुर रोड किसान पथ के पास आईटी सिटी और वेलनेस सिटी।  सीतापुर के नैमिषारण्य, हरदोई के संडीला इंडस्ट्रियल एरिया, बाराबंकी में सूडा, उन्नाव के नवाबगंज और रायबरेली के बछरावां में हाउसिंग बोर्ड की योजनाएं आएंगी।

मकान का साइज, स्टाइल और संभावित कीमत

एरिया साइज: इन सस्ते आवासों का क्षेत्रफल औसतन 83.5 वर्ग मीटर (लगभग 898.78 वर्ग फीट) रखा जाएगा।

ग्रुप हाउसिंग बनाम प्लॉट: रायबरेली में प्लॉट्स और ग्रुप हाउसिंग का अनुपात 50-50 प्रतिशत रहेगा। जबकि बाकी जिलों में ग्रुप हाउसिंग (फ्लैट्स) की संख्या अधिक होगी और प्लॉट्स अपेक्षाकृत कम रहेंगे।

कीमत: राजधानी लखनऊ में फिलहाल 15 से 20 लाख रुपये में सस्ते फ्लैट मिल जाते हैं। हालांकि, एससीआर भविष्य की दीर्घकालिक योजना है, इसलिए इन नए मकानों की अंतिम दरें आने वाले समय में तय की जाएंगी।

Home Loan: सिर्फ सस्ते घर नहीं, आसान होम लोन भी जरूरी; एक्सपर्ट बोले- तभी बढ़ेगा हाउसिंग सेक्टर

Home Loan: भारत में घरों की मांग लगातार बढ़ रही है। अफोर्डेबल हाउसिंग, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और तेज मंजूरियों पर अक्सर चर्चा होती है। लेकिन इन सबसे पहले एक सवाल आता है। क्या आम परिवार के पास घर खरीदने के लिए आसान और समय पर लोन उपलब्ध है? एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत के हाउसिंग सेक्टर की अगली बड़ी ग्रोथ इसी सवाल के जवाब पर निर्भर करेगी।

होम लोन सिर्फ फाइनेंशियल प्रोडक्ट भर नहीं है। ज्यादातर परिवारों के लिए यह जिंदगी का सबसे बड़ा निवेश होता है। यह आर्थिक सुरक्षा, स्थिरता और बेहतर भविष्य का भरोसा देता है। लेकिन यह सपना तभी पूरा होता है, जब सही समय पर लोन मिल सके। इसलिए हाउसिंग सेक्टर की असली ताकत सिर्फ मकानों की संख्या नहीं, बल्कि लोगों तक क्रेडिट की पहुंच है।

तेजी से बढ़ सकता है होम लोन बाजार

CareEdge Ratings के मुताबिक, भारत का होम लोन बाजार फिलहाल करीब ₹33 लाख करोड़ का है। FY25 से FY30 के बीच इसके 15-16% CAGR से बढ़ने का अनुमान है। इस रफ्तार से बाजार का आकार ₹77 लाख करोड़ से ₹81 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है।

हालांकि, यह ग्रोथ सिर्फ बड़े शहरों या कॉर्पोरेट कर्मचारियों से नहीं आएगी। अगली बड़ी मांग छोटे शहरों, स्वरोजगार करने वालों, छोटे कारोबारियों और उन परिवारों से आने की उम्मीद है, जो अपना पहला घर खरीदना चाहते हैं।

असली चुनौती लोन तक पहुंच

देश में ऐसे लाखों लोग हैं, जिनके पास लोन चुकाने की क्षमता है। लेकिन पारंपरिक बैंकिंग व्यवस्था में उन्हें अक्सर मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। वजह साफ है। बैंक लंबे समय तक सैलरी स्लिप, इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) और स्थायी नौकरी को ही सबसे बड़ा आधार मानते रहे हैं।

इस कारण छोटे दुकानदार, फ्रीलांसर, स्वरोजगार करने वाले और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले कई लोग लोन से वंचित रह जाते हैं। जबकि उनकी आय और भुगतान क्षमता मजबूत हो सकती है।

AI और डिजिटल डेटा बदल रहे हैं तस्वीर

अब लोन देने का तरीका तेजी से बदल रहा है। फाइनेंस कंपनियां और बैंक डिजिटल डेटा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और आधुनिक एनालिटिक्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे ग्राहक की वास्तविक वित्तीय स्थिति और भुगतान क्षमता को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है।

अब सिर्फ कागजी दस्तावेज ही नहीं, बल्कि ग्राहक के फाइनेंशियल व्यवहार और लेनदेन का भी आकलन किया जा रहा है। इससे पहले जिन लोगों के लिए लोन लेना मुश्किल था, उनके लिए भी नए अवसर बन रहे हैं।

टेक्नोलॉजी के साथ भरोसा भी जरूरी

डिजिटल प्रक्रिया ने लोन लेना आसान बनाया है। फिर भी पहली बार घर खरीदने वाले लोगों के लिए यह फैसला आसान नहीं होता। दस्तावेज, नियम, EMI और दूसरी शर्तें कई बार लोगों को उलझन में डाल देती हैं।

ऐसे में एक्सपर्ट्स का मानना है कि टेक्नोलॉजी के साथ भरोसेमंद सलाहकारों की भूमिका भी अहम बनी रहेगी। सही सलाह मिलने से ग्राहक बेहतर फैसला ले पाते हैं और पूरे लोन प्रोसेस को आसानी से समझते हैं।

सफलता का असली पैमाना क्या?

हाउसिंग फाइनेंस सेक्टर में सफलता सिर्फ इस बात से तय नहीं होगी कि कितना लोन बांटा गया। असली सफलता इस बात में होगी कि कितने नए परिवार अपने घर का सपना पूरा कर पाए।

जब ज्यादा लोगों तक आसान होम लोन पहुंचेगा, तो इसका फायदा सिर्फ एक परिवार तक सीमित नहीं रहेगा। इससे रियल एस्टेट, निर्माण, रोजगार और पूरी अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। यही वजह है कि आसान और समावेशी क्रेडिट एक्सेस को भारत की अगली हाउसिंग ग्रोथ स्टोरी का सबसे बड़ा आधार माना जा रहा है।

(यह आर्टिकल मनीकंट्रोल हिंदी के लिए अतुल मोंगा ने लिखा है, जो बेसिक होम लोन के को-फाउंडर और सीईओ हैं)

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Housing Scheme: दिल्ली के पास अपना घर होने का सपना होगा सच! सिर्फ 2 लाख रुपये में मिल रहा है शानदार फ्लैट

गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (जीडीए) ने प्रधानमंत्री आवास योजना (पीएमएवाई) के तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लोगों के लिए डासना गांव में किफायती फ्लैटों की योजना शुरू की है। इसके लिए रजिट्रेशन प्रक्रिया भी शुरू हो गई है। दिल्ली-एनसीआर में लगातार बढ़ती प्रॉपर्टी की कीमतों के बीच यह योजना उन लोगों के लिए बड़ी राहत है, जो कम खर्च में अपना घर खरीदना चाहते हैं।

जीडीए की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक, इस योजना के तहत एक घर की अनुमानित कीमत 4.49 लाख रुपये रखी गई है। पात्र लाभार्थियों को केंद्र सरकार की ओर से 1.50 लाख रुपये और उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से 1 लाख रुपये की सब्सिडी मिलेगी। यानी कुल 2.50 लाख रुपये की सहायता के बाद लाभार्थी को अपनी जेब से सिर्फ करीब 1.99 लाख रुपये ही चुकाने होंगे। योजना के तहत घरों का आवंटन लॉटरी के जरिए किया जाएगा। लॉटरी की तारीख और अन्य जानकारी समय-समय पर जीडीए की आधिकारिक वेबसाइट पर जारी की जाएगी।

फ्लैट की कीमत कितनी है?

  • इस योजना के तहत एक फ्लैट की अनुमानित कीमत करीब 4.50 लाख रुपये रखी गई है। खास बात यह है कि केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से मिलने वाली सब्सिडी के बाद लाभार्थी को काफी कम रकम चुकानी पड़ेगी।
  • केंद्र सरकार की ओर से पात्र आवेदकों को 1.50 लाख रुपये की सब्सिडी मिलेगी।

    उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से 1 लाख रुपये की अतिरिक्त सहायता दी जाएगी।

  • इस तरह कुल 2.50 लाख रुपये की सब्सिडी मिलने के बाद आवेदक को अपनी जेब से करीब 1.99 लाख रुपये यानी लगभग 2 लाख रुपये ही देने होंगे।

आवेदन से पहले जान लें जरूरी बातें

अगर आप इस योजना का लाभ लेना चाहते हैं, तो आवेदन की अंतिम तिथि और पात्रता की शर्तों का ध्यान रखना जरूरी है।

कौन कर सकता है आवेदन?

इस योजना का लाभ केवल उन्हीं लोगों को मिलेगा, जो सरकार द्वारा तय की गई सभी शर्तों को पूरा करते हों।

  • आवेदक भारतीय नागरिक होना चाहिए।
  • आवेदक उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले का निवासी होना चाहिए।
  • 20 जुलाई तक आवेदन किया जा सकता है।
  • आवेदक की उम्र 18 वर्ष या उससे अधिक होनी चाहिए।
  • आवेदक या उसके परिवार के किसी सदस्य के नाम पर देश में कहीं भी पक्का मकान नहीं होना चाहिए।
  • परिवार की आय आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) की निर्धारित सीमा के भीतर होनी चाहिए।
  • अगर कोई व्यक्ति इन शर्तों को पूरा किए बिना आवेदन करता है, तो उसका आवेदन रद्द किया जा सकता है।

आवेदन के लिए जरूरी दस्तावेज

आवेदन करते समय सभी जरूरी दस्तावेज सही होने चाहिए, ताकि प्रक्रिया में कोई परेशानी न आए।

  • आधार कार्ड
  • पैन कार्ड
  • तहसीलदार या सक्षम अधिकारी द्वारा जारी नया आय प्रमाण पत्र
  • गाजियाबाद का निवास प्रमाण पत्र
  • नोटरी से सत्यापित शपथ पत्र, जिसमें यह घोषणा हो कि आवेदक या उसके परिवार के नाम पर देश में कहीं भी कोई पक्का मकान नहीं है।