अल्बानिया में प्रदर्शनकारियों ने सुप्रीम कोर्ट के साथ क्या किया? जानिए ऐसा वहां क्या हुआ कि बवाल इस हद तक पहुंच गया

Albania Supreme Court Fire: भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था की बदहाली से सुलग रहे अल्बानिया में अब गृहयुद्ध जैसे हालात हो गए है। राजधानी तिराना में पिछले कई दिनों से चल रहे सरकार विरोधी प्रदर्शन इतने हिंसक हो गए कि गुस्साई भीड़ ने सीधे देश के सुप्रीम कोर्ट के दफ्तरों को ही आग के हवाले कर दिया। आखिर क्यों भड़का है यूरोप के इस छोटे से देश में ऐसा जनसैलाब कि पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच जंग छिड़ गई है? आइए आपको बताते हैं इसकी असली वजह।

क्यों भड़का इतना बड़ा बवाल?

अल्बानिया में यह प्रदर्शन ‘फ्लेमिंगो’ नामक नागरिक और छात्र आंदोलन के बैनर तले हो रहा है। हाई स्कूल और यूनिवर्सिटी के छात्र सोशलिस्ट प्रधानमंत्री एडी रामा (Edi Rama) के इस्तीफे की मांग को लेकर लगातार सड़कों पर हैं।

यह पूरा विवाद तब और भड़क उठा जब सरकार ने एक ऐसे क्षेत्र में बड़े लक्जरी पर्यटन विकास की अनुमति दे दी, जो फ्लेमिंगो का प्राकृतिक आवास माना जाता है। इस प्रोजेक्ट के तार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जारेड कुशनर से जुड़े होने के कारण मामला और संवेदनशील हो गया।

भ्रष्टाचार, शिक्षा और महंगाई की मार

अल्बानिया के युवा देश में बढ़ती बेरोजगारी, चरम पर पहुंच चुके भ्रष्टाचार, और जर्जर होती सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था से निराश हैं। जनता का आरोप है कि सरकार आम नागरिकों की बुनियादी जरूरतों को नजरअंदाज कर रही है।

वैसे प्रधानमंत्री एडी रामा ने इन हिंसक प्रदर्शनों की कड़ी निंदा करते हुए कहा है कि प्रदर्शनकारियों को बाहरी तत्वों और वामपंथी उग्रवादी समूहों (एंटीफा) द्वारा वैचारिक रूप से कट्टर बनाया गया है।

लगातार छठे दिन भी जारी इस हिंसक संघर्ष ने अल्बानिया की सरकार के सामने गंभीर राजनीतिक संकट खड़ा कर दिया है, और सुरक्षा एजेंसियों के लिए इस जन-आक्रोश को संभालना बड़ी चुनौती बन गया है।

फ्रांस, इटली और स्पेन में भी भारी हिंसा और आगजनी

वैसे सिर्फ अल्बानिया ही नहीं है जो विरोध प्रदर्शनों की आग में झुलस रहा है। फ्रांस, इटली, स्पेन और पुर्तगाल की सड़कों पर भी जनसैलाब उमड़ पड़ा है, जिसने कई प्रमुख यूरोपीय शहरों को रणक्षेत्र में बदल दिया है।

फ्रांस में पिछले तीन हफ्तों से हाई स्कूल के छात्र शिक्षा संसाधनों की कमी के खिलाफ नाकाबंदी कर रहे थे, जो अब व्यापक महंगाई विरोधी आंदोलन बन चुका है। पेरिस, मार्सेली, ल्यों और लिमोगेस में भारी लूटपाट और हिंसा हुई। लिमोगेस में 19वीं सदी के सिटी हॉल में आग लगा दी गई।

राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने हिंसा की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि ‘जिन्होंने लूटपाट की है और गणतंत्र को गिराने की कोशिश की है, उन्हें जवाबदेह ठहराया जाएगा।’ अब तक 2,400 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस हिंसा के लिए प्रवासियों को जिम्मेदार ठहराते हुए लिखा, ‘माइग्रेंट्स ने फ्रांस पर कब्जा कर लिया है, उन्हें तुरंत सीमाएं बंद करनी चाहिए!’ वैसे फ्रांसीसी अधिकारियों ने इस हिंसा में प्रवासियों की भूमिका से इनकार किया है।

स्पेन की राजधानी मैड्रिड के ‘पुएर्ता डेल सोल’ स्क्वायर पर हफ्तों से सैकड़ों तंबू गड़े हुए हैं, जो घरों के आसमान छूते किरायों और बेदखली के खिलाफ विरोध जता रहे हैं। यह विरोध 87 वर्षीय मैरीकार्मेन की बेदखली के बाद अस्पताल में हुई मौत के बाद शुरू हुआ।

स्पेन में न्यूनतम वेतन 1,221 यूरो (~$1,370) है, जबकि 80 वर्ग मीटर के अपार्टमेंट का औसत किराया 1,130 यूरो (~$1,270) है। यानी युवा अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा केवल रहने पर खर्च कर रहे हैं। जनता के दबाव के कारण संसद में हाउसिंग बिल पास न होने पर प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने नवंबर में मध्यावधि चुनाव कराने की घोषणा की है।

इटली में महंगाई दर बढ़कर 4.2% पर पहुंच गई है। मिलान, ट्यूरिन और बोलोग्ना में हिंसक झड़पें हुईं। मिलान में पुलिस गाड़ियों पर वॉटर कैनन चलाए गए और 271 लोगों को गिरफ्तार किया गया जिनमें अधिकांश नाबालिग है। अब ’17 अक्टूबर आंदोलन’ ने हर शनिवार स्थायी प्रदर्शन का आह्वान किया है।

वहीं बाल्कन देश सर्बिया में पिछले दो सालों से भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन चला रहे छात्र आगामी चुनावों में पूर्व सत्तावादी नेता अलेक्जेंडर वुसिक की वापसी को चुनौती दे रहे हैं।

यूरोप के 6 देशों में शिक्षा-महंगाई पर प्रदर्शन:फ्रांस में 1800 लोग गिरफ्तार, स्पेन में घर खरीदना मुश्किल, ग्रीस में 10 साल में किराया 3 गुना

यूरोप के 6 देशों में पढ़ाई का बढ़ता खर्च, महंगाई, बेरोजगारी और महंगे घरों के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं। फ्रांस में स्कूलों की खराब हालत और शिक्षकों की कमी के हिंसक विरोध में अब तक 1800 लोग गिरफ्तार हुए हैं। स्पेन में घर खरीदना तो दूर, किराया चुकाना भी मुश्किल हो गया है। वहीं, ग्रीस में 10 साल में किराया 3 गुना बढ़ चुका है। बेल्जियम, इटली और अल्बानिया में भी छात्र शिक्षा पर खर्च बढ़ाने, रोजगार और बेहतर सुविधाओं की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे हैं। फ्रांस: 140 शहरों में 8 लाख लोग सड़कों पर उतरे फ्रांस में स्कूलों की खराब हालत, शिक्षकों की कमी और बढ़ती महंगाई के विरोध में 17 अक्टूबर को 140 शहरों में प्रदर्शन हुए। करीब 8 लाख लोग सड़कों पर उतरे। इसमें छात्र संगठनों के साथ ट्रेड यूनियन और कर्मचारी भी शामिल थे। पेरिस, मार्सेई और बोर्डो समेत कई शहरों में तोड़फोड़ और लूटपाट हुई। लीमोज में 143 साल पुराने ऐतिहासिक सिटी हॉल में आग लगा दी गई और कई गाड़ियों को जला दिया गया। 18 अक्टूबर तक करीब 1800 लोगों को गिरफ्तार किया गया। वहीं, 500 से ज्यादा पुलिसकर्मियों, सुरक्षाकर्मियों और दमकलकर्मियों के घायल होने की खबर है। प्रधानमंत्री सेबास्टियन लेकोर्नू और राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने हिंसा की निंदा की है। सरकार का कहना है कि कुछ हिंसक समूहों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन का फायदा उठाया। इटली: स्कूलों की हालत पर 30 अक्टूबर को हड़ताल का ऐलान इटली में छात्र शिक्षा पर कम सरकारी खर्च, जर्जर स्कूलों और पढ़ाई के बढ़ते खर्च के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। रोम और ट्यूरिन समेत कई शहरों में छात्रों ने स्कूलों पर कब्जा कर लिया। 16 अक्टूबर को रोम में हजारों छात्र शिक्षा मंत्रालय की ओर मार्च करते हुए पहुंचे। उन्होंने शिक्षा मंत्री ग्यूसेपे वाल्दितारा के फैसलों का विरोध किया। इससे पहले हुए प्रदर्शनों में पुलिस के साथ झड़प और पथराव की घटनाएं भी हुई थीं। अब छात्र संगठन इस आंदोलन से कर्मचारियों को भी जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने 30 अक्टूबर को देशव्यापी हड़ताल का ऐलान किया है। छात्रों की मांग है कि शिक्षा पर सरकारी खर्च बढ़ाया जाए, स्कूलों की हालत सुधारी जाए और सस्ते हॉस्टल उपलब्ध कराए जाएं। स्पेन: बढ़ते किराए के खिलाफ प्रदर्शन स्पेन में महंगे घरों और बढ़ते किराए के खिलाफ आंदोलन कई शहरों में फैल गया है। राजधानी मैड्रिड के सोल चौक पर प्रदर्शनकारी कई दिनों से टेंट लगाकर बैठे हैं। सितंबर के आखिर में 87 साल की एक बुजुर्ग महिला को किराया बढ़ने के कारण घर से निकाल दिया गया था। इसके बाद आंदोलन तेज हो गया। प्रदर्शनकारी किराए पर नियंत्रण लगाने, लोगों को घरों से निकालने पर रोक लगाने और सस्ते सरकारी मकान बनाने की मांग कर रहे हैं। किराएदारों के संगठन और आवास अधिकारों के लिए काम करने वाले समूह आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं। मैड्रिड के अलावा दूसरे शहरों में भी रैलियां निकाली गई हैं। प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज की सरकार ने आवास संकट दूर करने के लिए कदम उठाने की बात कही है, लेकिन प्रस्तावित उपायों पर राजनीतिक सहमति नहीं बन पाई है। इस बीच, 29 नवंबर को समय से पहले चुनाव कराने का ऐलान भी किया गया है। ग्रीस: हॉस्टल की कमी के खिलाफ टेंट लगाकर प्रदर्शन ग्रीस की राजधानी एथेंस में छात्रों ने संसद के सामने टेंट लगाकर प्रदर्शन किया। छात्र हॉस्टल की कमी, महंगे किराए और पढ़ाई के बढ़ते खर्च से परेशान हैं। छात्र संगठनों के मुताबिक, देश में बहुत कम छात्रों को हॉस्टल मिल पाते हैं। करीब 96% छात्रों को हॉस्टल की सुविधा नहीं मिलती, जबकि पिछले 10 साल में कमरों का किराया तीन गुना हो गया है। कुछ छोटे कमरों का मासिक किराया 600 यूरो तक पहुंच गया है। प्रदर्शनकारी किराए की सीमा तय करने, सरकारी हॉस्टल बनाने, स्कॉलरशिप बढ़ाने और यूनिवर्सिटीज का बजट बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। आंदोलन का नेतृत्व छात्र संगठन कर रहे हैं। बेल्जियम: शिक्षा बजट में कटौती के खिलाफ गुस्सा बेल्जियम की राजधानी ब्रुसेल्स में शिक्षा बजट में कटौती और सुधारों के विरोध में छात्रों ने मार्च निकाला। इस दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों ने तोड़फोड़ की और पुलिस पर चीजें फेंकीं। जवाब में पुलिस ने आंसू गैस छोड़ी और पानी की बौछारों का इस्तेमाल किया। 18 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदर्शन के दौरान 150 लोगों को गिरफ्तार किया गया। पांच पुलिसकर्मियों को मामूली चोटें आईं। प्रदर्शन का नेतृत्व छात्र संगठन कर रहे हैं। सरकार ने हिंसा की निंदा की है और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की बात कही है। अल्बानिया: प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग अल्बानिया की राजधानी तिराना में महंगी पढ़ाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और यूनिवर्सिटीज की खराब हालत के खिलाफ छात्रों का आंदोलन तेज हो गया है। हजारों युवा 15 अक्टूबर को शिक्षा मंत्रालय के बाहर जुटे और प्रधानमंत्री एदी रामा के इस्तीफे की मांग की। प्रदर्शन के दौरान कुछ लोगों ने पुलिस पर पथराव किया। सरकारी इमारतों और बैंकों में भी आग लगा दी गई। पांच दिन से चल रहे आंदोलन में 167 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इस दौरान कई पुलिसकर्मी और प्रदर्शनकारी घायल हुए है। आंदोलन में छात्र संगठनों के अलावा सरकार से नाराज दूसरे लोग भी शामिल हैं। प्रधानमंत्री रामा ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया है। उन्होंने छात्रों से बातचीत की पेशकश की, लेकिन तोड़फोड़ करने वालों पर कार्रवाई की बात भी कही। उनका कहना है कि हिंसा से अल्बानिया के यूरोपीय संघ में शामिल होने की कोशिश को नुकसान पहुंच सकता है। ———————— यह खबर भी पढ़ें… फ्रांस में बार-बार क्यों भड़कते हैं प्रदर्शन: पेंशन से लेकर महंगाई तक, सरकार के फैसलों पर सड़कों पर उतर आते हैं लोग फ्रांस में स्कूलों की खराब हालत को लेकर शुरू हुआ छात्र आंदोलन अब महंगाई और ईंधन की बढ़ती कीमतों के खिलाफ बड़े विरोध में बदल गया है। पूरी खबर पढ़ें…

ममदानी की जीत ने बदली यूरोप की राजनीति:वामपंथी पार्टियों ने सस्ते घर और कम किराए को मुद्दा बनाया; बर्लिन में जीत मिली

न्यूयॉर्क में जोहरान ममदानी की जीत का असर अब यूरोप की राजनीति में दिखने लगा है। यूरोपीय नेता ममदानी की तरह महंगे किराए, बढ़ती महंगाई और आम लोगों के खर्च पर फोकस कर रहे हैं। सबसे दिलचस्प मामला जर्मनी के बर्लिन का है। वहां महंगे घरों को मुद्दा बनाकर एलिफ एराल्प ने चुनाव जीत लिया। जर्मन मीडिया ने अब एराल्प को ‘बर्लिन की ममदानी’ कह रहे हैं। वहीं, फ्रांस, स्पेन और नीदरलैंड के वामपंथी नेता भी ममदानी की राजनीति पर नजर रख रहे हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि ममदानी ने यूरोप के वामपंथ को चुनाव लड़ने का नया तरीका दे दिया है। 1. जर्मनी: सस्ते घरों का वादा किया, सबसे ज्यादा सीटें मिलीं अगर यूरोप में किसी एक नेता को ममदानी से सबसे सीधे तौर पर जोड़ा जा सकता है, तो वह एलिफ एराल्प हैं। 45 साल की एराल्प वकील हैं और तुर्की मूल के परिवार से आती हैं। उनके माता-पिता 1980 के तुर्की सैन्य तख्तापलट के बाद जर्मनी आए थे। एराल्प 2017 में द लिंक से जुड़ी थीं। पिछले महीने हुए चुनाव में उनकी पार्टी का सबसे बड़ा मुद्दा रहा- महंगा शहर और महंगा किराया। एराल्प ने बर्लिन में निजी कंपनियों के पास मौजूद करीब 2.2 लाख मकानों को सार्वजनिक नियंत्रण में लाने की मांग की। इसका फायदा द लिंक को मिला। वह चुनाव में करीब 25.7% वोट मिले और वह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। अब सरकार बनाने के लिए उसे दूसरी पार्टियों के साथ गठबंधन करना होगा। 2. ब्रिटेन: पर्यावरण के मुद्दे को महंगे घर से जोड़ा ब्रिटेन में ममदानी से सबसे ज्यादा तुलना जैक पोलांस्की की होती है। वे ग्रीन पार्टी के नेता हैं। यह पार्टी मुख्य रूप से पर्यावरण और जलवायु के मुद्दों पर राजनीति करती रही है। लेकिन पोलांस्की ने इनका दायरा बढ़ाया है। पोलांस्की महंगाई, महंगे घर, बढ़ते किराए, रोजमर्रा के खर्च और अमीरों पर ज्यादा टैक्स जैसे मुद्दों को पर्यावरण की राजनीति से जोड़ते हैं। पोलांस्की इसे ‘इको-पॉपुलिज्म’ कहते हैं। ममदानी की तरह पोलांस्की भी सोशल मीडिया को राजनीति का अहम माध्यम बना रहे हैं। पोलांस्की ने बताया कि उनकी वीडियो टीम ममदानी के वीडियो बनाने वाली टीम से टिप्स ले रही है। दिलचस्प बात यह है कि पोलांस्की इस समय लंदन की होलबॉर्न सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के सांसद पद से हटने के बाद 8 अक्टूबर को यहां उपचुनाव हो रहा है। दो साल पहले हुए चुनाव में ग्रीन पार्टी को यहां सिर्फ 10 फीसदी वोट मिले थे। कुछ सर्वे में अनुमान लगाया गया है कि इस बार ग्रीन को 40 फीसदी वोट मिल सकता है। 3. स्पेन: 87 साल की महिला को घर से निकाला, सरकार गिरी स्पेन में महंगा घर और बढ़ता किराया इस समय बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है। पिछले महीने मैड्रिड में 87 साल की मारिकर्मेन अबास्कल को 70 साल से रह रहे घर से निकाल दिया गया। इसके बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। यह मामला स्पेन के आवास संकट का प्रतीक बन गया। मामला इतना बढ़ा कि सरकार पर आवास संकट से निपटने का दबाव बढ़ गया। संसद में सरकार के आवास संबंधी प्रस्ताव खारिज होने के बाद प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने 29 नवंबर को समय से पहले आम चुनाव कराने का ऐलान कर दिया। यानी स्पेन में भी घर और किराया अब सिर्फ सामाजिक समस्या नहीं रहे। वे सीधे चुनावी राजनीति का मुद्दा बन चुके हैं। 4. फ्रांस: पेरिस में 60 हजार सस्ते घर बनाने का वादा फ्रांस की राजधानी पेरिस के मेयर इमैनुएल ग्रेगोयर समाजवादी पार्टी से जुड़े हैं। वे इसी साल मेयर चुने गए हैं। उनकी राजनीति में महंगा घर और बढ़ता किराया बड़ा मुद्दा है। ग्रेगोयर पेरिस में ज्यादा सस्ते घर बनाने, खाली पड़े मकानों को लोगों के लिए इस्तेमाल करने और किराए पर नियंत्रण बढ़ाने की बात करते हैं। उनकी सरकार का मकसद 60 हजार नए सस्ते घर बनाना है। ममदानी की जीत से पहले भी फ्रांस के कुछ वामपंथी नेता उनके अभियान से सीखने की बात कर चुके थे। ब्रिटेन की तरह यहां भी ममदानी की चुनावी शैली और सीधे मैसेज देने के तरीके पर नजर रखी गई। 5. नीदरलैंड: घर की कमी को मुद्दा बनाया, सबसे बड़ी पार्टी बनी नीदरलैंड में ममदानी की जीत से पहले ही घर और किराए का मुद्दा चुनावी राजनीति के केंद्र में आ चुका था। 2025 के राष्ट्रीय चुनाव में D66 के नेता रॉब येटन ने आवास संकट को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया। उस समय देश में करीब 4 लाख घरों की कमी थी। घर खरीदना महंगा हो चुका था और किराए लगातार बढ़ रहे थे। यानी लाखों लोगों के सामने सवाल था। सरकार महंगाई कब कम करेगी से पहले घर मिलेगा कब? येटन की पार्टी D66 ने हर साल 1 लाख नए घर बनाने और 10 नई टाउनशिप विकसित करने का प्रस्ताव रखा। चुनाव में इसका फायदा भी मिला। पार्टी 2023 की 9 सीटों से बढ़कर 2025 में 26 सीटों पर पहुंच गई और सबसे बड़ी पार्टियों में शामिल हुई। यानी नीदरलैंड में सस्ता घर और कम किराया यूरोप में ममदानी की जीत से पहले ही बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका था। ममदानी की जीत ने इस बहस को और चर्चा में ला दिया। ——————————

बुजुर्ग किराएदार को घर से निकालने पर सरकार संकट में:स्पेन में महंगे किराए से जुड़ा प्रस्ताव संसद में गिरा, 8 महीने पहले चुनाव होंगे

स्पेन में 87 साल की एक महिला को घर से निकालना बहुत बड़ा मुद्दा बन गया। महंगे किराए और लोगों को घर से निकाले जाने के खिलाफ हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। मामला इतना बढ़ा कि सरकार को किराएदारों को राहत देने के लिए संसद में इमरजेंसी बिल लाने पड़े। लेकिन सरकार इन्हें पास नहीं करा सकी। इसके बाद प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज ने तय समय से करीब 8 महीने पहले आम चुनाव कराने का ऐलान कर दिया। स्पेन में 29 नवंबर 2026 को वोटिंग होगी। 70 साल से घर में रह रही थी बुजुर्ग मामले की शुरुआत 23 सितंबर को हुई। मैड्रिड में 87 साल की मारिया डेल कार्मेन अबास्कल को उस घर से निकाल दिया गया, जहां वह करीब 70 साल से रह रही थीं। यह घर अबास्कल परिवार के पास कई दशकों से किराए पर था। 2018 में घर के मूल मालिक ने पूरी इमारत एक रियल एस्टेट कंपनी को बेच दी। इसके बाद कंपनी और अबास्कल में किराए को लेकर विवाद शुरू हो गया। कंपनी ने किराया 500 यूरो से बढ़ाकर 2650 यूरो कर दिया। अबास्कल की मासिक पेंशन ही करीब 1,350 यूरो थी। यानी मांगा गया किराया उनकी पूरी मासिक आय से भी काफी ज्यादा था। इसी वजह से वह नया किराया देने की स्थिति में नहीं थीं। इसके बाद मामला कोर्ट में चला गया था। घटना के बाद पूरे देश में विरोध शुरू हुआ अबास्कल को घर से निकाले जाने की तस्वीरें और वीडियो सामने आने के बाद मामला तेजी से फैल गया। लोगों का कहना था कि अगर 87 साल की बुजुर्ग महिला अपनी पूरी पेंशन देने के बाद भी घर का किराया नहीं चुका सकतीं, तो यह सिर्फ एक परिवार की समस्या नहीं है। मैड्रिड समेत कई शहरों में लोगों ने महंगे किराए और बेदखली के खिलाफ प्रदर्शन किए। अबास्कल का मामला धीरे-धीरे स्पेन के बढ़ते आवास संकट का प्रतीक बन गया। सरकार पर भी दबाव बढ़ने लगा। प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज की सरकार ने कहा कि बुजुर्गों और दूसरे कमजोर किराएदारों को घर से निकालने से रोकने के लिए तुरंत कदम उठाने की जरूरत है। सरकार ने दो इमरजेंसी बिल पेश किए, दोनों खारिज 29 सितंबर को सरकार ने किराएदारों को राहत देने के लिए संसद में दो इमरजेंसी बिल पेश किए। पहला बिल: इसमें कमजोर किराएदारों को 2030 तक घर से निकालने से रोकने की योजना थी। साथ ही किराए बढ़ाने पर कुछ पाबंदियां लगाने और बड़े निवेशकों के घर खरीदने पर रोक लगाने की बात थी। छोटे मकान मालिकों और किराएदारों को टैक्स में राहत देने का भी प्रावधान था। दूसरा बिल: इसमें किराएदारों के मौजूदा किराए के समझौते को आगे बढ़ाने की बात थी। यानी समझौता खत्म होने के बाद उन्हें तुरंत घर खाली नहीं करना पड़ता और उन्हें कुछ और समय तक उसी घर में रहने का मौका मिलता। PM पेद्रो सांचेज की सरकार के पास संसद में बहुमत नहीं है। इसलिए उसे हर बड़े फैसले के लिए दूसरी पार्टियों के समर्थन की जरूरत पड़ती है। सरकार को उम्मीद थी कि आवास संकट को देखते हुए दूसरी पार्टियां इन उपायों का समर्थन करेंगी। लेकिन उसे जरूरी समर्थन नहीं मिला। 2 अक्टूबर को हुए वोटिंग में दोनों प्रस्ताव पास नहीं हो सके। बिलों को समर्थन नहीं मिलने की 4 वजहें वजह 1: दूसरी पार्टियों को लगा कि इससे किराए के घर कम हो सकते हैं: विरोध करने वाली पार्टियों का कहना था कि अगर मकान मालिकों पर ज्यादा नियम लगाए गए तो वे अपने घर किराए पर देने से बच सकते हैं। इससे बाजार में किराए के लिए घर कम पड़ सकते हैं। वजह 2: किराया और बढ़ने का खतरा: जब किराए के लिए घर कम होंगे, तो बचे हुए घरों का किराया बढ़ सकता है। यानी किराएदारों को राहत देने के बजाय समस्या और बड़ी हो सकती है। वजह 3: छोटे मकान मालिकों को लेकर भी आपत्ति थी: जुंत्स का कहना था कि सरकार की योजना में छोटे मकान मालिकों के हितों का पर्याप्त ध्यान नहीं रखा गया। पार्टी चाहती थी कि उनके लिए भी ज्यादा राहत और सुरक्षा हो। वजह 4: सरकार के राजनीतिक विरोधी भी साथ नहीं आए: विपक्षी पार्टियां PP और वॉक्स पहले से ही सांचेज सरकार की आवास नीति का विरोध कर रही थीं। उन्होंने दोनों बिलों का समर्थन नहीं किया। सांचेज ने समय से पहले चुनाव का फैसला क्यों लिया? स्पेन में किराए का संकट कितना बड़ा है? 1. सस्ते घरों की संख्या बेहद कम है: स्पेन में कम आय वाले लोगों के लिए सस्ते सरकारी घर बहुत कम हैं। कुल घरों में ऐसे घरों की हिस्सेदारी सिर्फ 1.5 % है। 2. महीनेभर की कमाई के करीब पहुंचा किराया: रॉयटर्स के मुताबिक कुछ मामलों में किराए की कीमत एक युवा व्यक्ति की औसत मासिक कमाई के करीब 99% तक पहुंच गई है। 3. 2028 तक 10 लाख से ज्यादा घरों की कमी का खतरा: केंद्रीय बैंक ने चेतावनी दी है कि अगर घरों की कमी दूर नहीं हुई तो 2028 तक 10 लाख से ज्यादा घरों की कमी हो सकती है।

4 गोलों से ब्राजील ने भारत को फुटबॉल मैच में हराया

भारत ने शुरुआती 25 मिनट तक डटकर मुकाबला किया, लेकिन पांच बार की विश्व चैंपियन ब्राजील ने शनिवार को खेले गए फीफा अंतरराष्ट्रीय मैत्री मुकाबले में मेहमान टीम को 4-0 की करारी जीत दर्ज की।दोनों टीमों के बीच के स्तर का बड़ा अंतर बिलकुल साफ दिखा।

2026 विश्व कप के प्री-क्वार्टर फाइनल से बाहर होने के बाद नए सिरे से टीम तैयार कर रहे कार्लो एंसेलोटी की ‘नयी लुक’ वाली ब्राजील की टीम ने इस ऐतिहासिक मैत्री मुकाबले में ज्यादातर समय अपनी सहज गति से खेलते हुए मैच पर नियंत्रण बनाए रखा और उसे बहुत ज्यादा तेजी दिखाने की जरूरत नहीं पड़ी।

भारत को 51,402 दर्शकों की का समर्थन मिला लेकिन इसके बावजूद टीम शुरूआती 25 मिनट में मिले कुछ अच्छे मौकों को पर गोल नहीं कर सकी।

ब्राजील के लिए एस्तेवाओ ने 28वें मिनट, पेड्रो ने 42वें मिनट और सैमुअल लिनो ने 58वें और 90+5वें मिनट में गोल किए।

ब्राजील अपनी पूरी ताकत से नहीं खेला लेकिन फिर भी मुकाबले पर अपना नियंत्रण बनाए रखा।

44वीं रैंकिंग वाली पनामा के खिलाफ 1-1 की जुझारू बराबरी के बाद मैदान पर उतरी भारतीय टीम को इस बार कहीं अधिक मजबूत प्रतिद्वंद्वी का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद खालिद जमील के मार्गदर्शन वाली टीम ने ब्राजील को कड़ी टक्कर दी।

जमील ने पनामा के खिलाफ मैच की टीम में दो बदलाव किए। उन्होंने अपुइया और रिकी शाबोंग की जगह अनुभवी मिडफील्डर अनिरुद्ध थापा और सहल अब्दुल समद को टीम में शामिल किया।

शुरुआती चरणों में भारतीय टीम ब्राजील को परेशान करती रही। रियाल मैड्रिड के स्टार विनिसियस ने दो बार गुरप्रीत सिंह संधू की परीक्षा ली जिसमें अभिषेक सिंह को छकाने के बाद लगाया गया शॉट भी शामिल था। लेकिन भारतीय गोलकीपर डटा रहे।

एंसेलोटी ने टीम में कई बदलाव किए थे जिसमें पेड्रो मोरिस्को ने नियमित गोलकीपर और माउरो जूनियर की जगह ली जबकि गैब्रियल बोंटेम्पो, आंद्रेई सैंटोस और माथेउजिन्हो को भी मौका दिया गया।

ब्राजील ने 28वें मिनट में एस्तेवाओ के गोल से बढ़त बना ली। फिर पेड्रो और लिनो ने दक्षिण अमेरिकी टीम के लिए गोल दागे। 

दुनिया के सबसे जगमग नाइट व्यू वाले शहर, जहां शाम के बाद बढ़ जाती है रौनक!

आजकल ट्रैवलर सिर्फ दिन में नहीं घूमना चाहते, बल्कि रात को भी अपनी खास ट्रिप कर रहे हैं। जिसे नाइट टूरिज्म कहते है इसमें लोग लोकल फूड, नाइट मार्केट, लाइव म्यूजिक, थिएटर, स्पोर्ट्स और शहर की नाइट लाइफ का मजा लेते हैं। कई शहर है जो इस ट्रेंड के लिए दुनिया भर में मशहूर हो रहे हैं। आप भी ऐसे ही नाईट ट्रिप को मजेदार बनाना चाहते हैं, तो इन शहरों की नाइट लाइफ का एक्सपीरियंस जरूर करें।

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मैड्रिड – देर रात तक रहती है चहल-पहल

यहां देर रात तक चहल-पहल रहती है जो बाकी शहरों से काफी अलग है। यहां लोग देर से डिनर करते हैं और देर रात तक दोस्तों और परिवार के साथ घूमते हैं। शाम के समय प्लाजा में टहलना, तपस बार में लोकल डिश खाना और फ्लेमेंको डांस शो देखना यहां की पहचान है। रात में शहर की गलियां, कैफे और टेरेस लोगों से भर जाती हैं। आप स्पेन कल्चर को देखना चाहते हैं, तो मैड्रिड में रात में में जरूर घूमने निकले।

न्यू ऑरलियन्स – संगीत से भरी रातें

न्यू ऑरलियन्स अपनी म्यूजिक कल्चर के लिए दुनिया भर में पॉपुलर है। यहां पर जब शाम होती है तो रोड पर लाइव जैज म्यूजिक की धुनें सुनाई देने लगती हैं। फ्रेंचमेन स्ट्रीट और फ्रेंच क्वार्टर जैसी जगहों में कई छोटे-बड़े म्यूजिक क्लब और बार हैं, जहां हर रात शानदार परफॉर्मेंस होती है। यहां घूमते समय ऐसा लगता है जैसे शहर में कोई म्यूजिक फेस्टिवल हो। इसके साथ ही खाने का टेस्ट और पुराने बाजारों की शॉपिंग इस शहर की रात को और भी शानदार बना देती है।

बैंकॉक – रात में खाने का असली स्वाद

बैंकॉक में घूमने का असली मजा सूरज ढलने के बाद ही आता है। यहां के नाइट मार्केट रंग-बिरंगी दुकानों और स्वादिष्ट स्ट्रीट फूड से भरे रहते हैं। आप यहां थाई खाने का स्वाद ले सकते है। कपड़े, हैंडीक्राफ्ट और कई यादगार चीजों की खरीदारी कर सकते हैं। चाओ फ्राया नदी के किनारे बैठकर डिनर करना और रूफटॉप बार से पूरे शहर की चमक देखना एक बहुत ही यादगार पल होता है। आपको खाने पीने और घूमने का शौक है, तो बैंकॉक की रातें आपको जरूर पसंद आएंगी।

टोक्यो – रात में भी रहती है रौनक

टोक्यो को उन शहरों में गिना जाता है, जो रात में भी पूरी रफ्तार से चलते हैं। यहां शिंजुकु और शिबुया जैसे इलाके रंग-बिरंगी नियॉन लाइट्स से जगमगा उठते हैं। देर रात तक खुले रहने वाले रामेन रेस्टोरेंट, जापानी पब, कराओके और गेमिंग सेंटर लोगों को खूब पसंद आते हैं। अगर आपको शॉपिंग का शौक है, तो कई मार्केट और स्टोर देर रात तक खुले रहते हैं। यहां के रूफटॉप कैफे और बार से रात में चमकते शहर का नजारा देखने का अपना अलग ही मजा है। टोक्यो की रातें हर उम्र के ट्रैवलर के लिए कुछ न कुछ खास जरूर लेकर आती हैं।

फिलाडेल्फिया – खेल और मस्ती से भरी शाम

फिलाडेल्फिया उन शहरों में से है, जहां शाम होते ही माहौल पूरी तरह बदल जाता है। अगर आपको खेल पसंद हैं, तो यहां प्रोफेशनल स्पोर्ट्स मैच का रोमांच देखने को मिलेगा। मैच का टिकट न होने पर भी आप स्पोर्ट्स बार में बैठकर टीवी पर इसे लाइव देख सकते हैं। इसके अलावा यहां लाइव म्यूजिक, थिएटर शो, बॉलिंग, गेमिंग और मिनी गोल्फ जैसी कई एक्टिविटीज रात को और मजेदार बना देती हैं। खाने-पीने के शौकीनों के लिए भी यह शहर किसी जन्नत से कम नहीं है। यहां के लोकल कैफे, फूड टूर और खास रेस्टोरेंट आपको शहर के असली स्वाद चखाते हैं। आपको एक ही शाम में मनोरंजन, स्वाद और लोकल कल्चर का एक्सपीरियंस लेना हैं, तो फिलाडेल्फिया परफेक्ट जगह है।

सियोल – कैफे और नाइट मार्केट का मजा

सियोल की रातें काफी शांत, खूबसूरत और रंगीन होती हैं। यहां के नाइट मार्केट में घूमने के साथ आप लोकल स्ट्रीट फूड का स्वाद ले सकते हैं और आसपास की दुकानों से खरीदारी भी कर सकते हैं। हान नदी के किनारे शाम बिताना और शहर की रोशनी देखना यहां आने वाले टूरिस्ट का पसंदीदा एक्सपीरियंस होता है। इसके अलावा थीम कैफे, देर रात तक खुले शॉपिंग एरिया और खूबसूरत गलियां इस शहर को खास बनाती हैं। यहां घूमने के लिए बिकुल भी जल्दबाजी न करें आपम से समय निकालकर सियोल नाईट के मजे ले।

बढ़ रहा है नाइट टूरिज्म

आज के समय में लोग सिर्फ फोटो खींचने के लिए ट्रैवल नहीं करते, बल्कि उन शहरों की असली जिंदगी को भी जीना चाहते हैं। यही कारण है कि नाइट टूरिज्म तेजी से पॉपुलर हो रहा है। रात के समय लोग लोकल फूड का मजा लेते हैं, लाइव म्यूजिक सुनते हैं, नाइट मार्केट में शॉपिंग करते हैं और शहर कल्चर को जानते हैं। इससे ट्रैवलर को एक अलग एक्सपीरियंस मिलता है और दुकानों, रेस्टोरेंट, होटल और मनोरंजन से जुड़े कारोबार को भी फायदा होता है। आप भी इन शहरो को अपनी ट्रैवल लिस्ट में जोड़कर ट्रिप को यादगार बना सकते हैं।