सुवेंदु सरकार को शत प्रतिशत अंक

नंदीग्राम से ज्यादा महत्वपूर्ण चुनाव नतीजा रेजिनगर विधानसभा सीट का है, जहां से भाजपा के सखारव सरकार ने आम जनता उन्नयन पार्टी यानी एजेयूपी के उम्मीदवार गुलाम नबी आजाद को 75 हजार से अधिक वोट से हराया। रेजिनगर का परिणाम पश्चिम बंगाल के साथ साथ देश की राजनीति पर गंभीर असर डालने वाला है। यह चुनाव परिणाम विपक्ष की राजनीति को भी नए सिरे से व्याख्यायित करेगा।

यदि नंदीग्राम और रेजिनगर विधानसभा सीट के उपचुनाव को पांच महीने पुरानी सुवेंदु अधिकारी सरकार की परीक्षा मानें तो कह सकते हैं कि सुवेंदु शत प्रतिशत अंक के साथ उतीर्ण हुए हैं। नंदीग्राम सीट जीतने का जो रिकॉर्ड उन्होंने खुद बनाया था वह रिकॉर्ड उनकी उम्मीदवार हसीरानी रथ ने तोड़ दिया। इस रिकॉर्ड का टूटना सुवेंदु अधिकारी की अपनी उपलब्धि में शुमार होगा। सुवेंदु ने 2016 के चुनाव में एक रिकॉड बनाया था, जब उन्होंने सीपीआई के अब्दुल कबीर शेख को 81 हजार से ज्यादा वोट से हराया था। उसके 10 साल बाद 2026 के उपचुनाव में उनकी चुनी हुई उम्मीदवार हसीरानी रथ ने कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के साझा उम्मीदवार मिलन प्रधान को एक लाख 22 हजार से ज्यादा वोट से हराया। यह निजी तौर पर सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व और उनकी सरकार के कामकाज पर सिर्फ नंदीग्राम की जनता की नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की जनता की स्वीकृति की मुहर है।

नंदीग्राम से ज्यादा महत्वपूर्ण चुनाव नतीजा रेजिनगर विधानसभा सीट का है, जहां से भाजपा के सखारव सरकार ने आम जनता उन्नयन पार्टी यानी एजेयूपी के उम्मीदवार गुलाम नबी आजाद को 75 हजार से अधिक वोट से हराया। रेजिनगर का परिणाम पश्चिम बंगाल के साथ साथ देश की राजनीति पर गंभीर असर डालने वाला है। यह चुनाव परिणाम विपक्ष की राजनीति को भी नए सिरे से व्याख्यायित करेगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह चुनाव परिणाम दशकों से स्थापित कई राजनीतिक मान्यताओं और धारणाओं को तोड़ने वाला है।

रेजिनगर विधानसभा सीट मुर्शिदाबाद जिले में आती है, जहां पूरे जिले में औसत मुस्लिम आबादी 55 से 60 फीसदी के करीब है। उसमें भी रेजिनगर विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग 70 फीसदी है। मुर्शिदाबाद जिले के ही बेलडांगा में हुमायूं कबीर ने बाबरी मस्जिद की नींव रखी है। बाबरी मस्जिद की नींव रखने के बाद उन्होंने एजेयूपी नाम से पार्टी का गठन किया और दो सीटों से चुनाव लड़े। तमाम निगेटिव प्रचार के बावजूद वे दोनों सीटों से जीते। रेजिनगर सीट पर हुमायूं कबीर 58 हजार से ज्यादा वोट से जीते थे। लेकिन उनके इस्तीफे से खाली हुई इस सीट पर उनके बेटे गुलाम नबी आजाद 75 हजार से ज्यादा वोट से हारे। हुमायूं कबीर जितने वोट से जीते थे उतना वोट भी उनके बेटे को नहीं मिला। रेजिनगर सीट के चुनाव परिणाम की एक विशेष बात यह भी रही कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की पारंपरिक प्रतिद्वंद्री पार्टियों यानी कांग्रेस, तृणमूल और वामपंथी तीनों को मिला कर सिर्फ 13 हजार वोट मिले। लगातार 15 साल पश्चिम बंगाल में राज करने वाली ममता बनर्जी की पार्टी के उम्मीदवार और पूर्व विधायक रबीउल आलम चौधरी को सिर्फ 3,797 वोट मिले।

जिस विधानसभा सीट पर 70 फीसदी मुस्लिम आबादी हो उस सीट पर भाजपा के हिंदू उम्मीदवार को 63 फीसदी से ज्यादा वोट मिले। अगर तर्क के लिए यह मान लिया जाए कि सभी 30 फीसदी हिंदुओं ने भाजपा उम्मीदवार को वोट किया तब भी कम से कम 33 फीसदी मुस्लिम वोट भाजपा को मिले हैं। हर तीन में से एक मुस्लिम मतदाता ने भाजपा को वोट किया है। यह बहुत बड़ा और पश्चिम बंगाल के साथ साथ देश की राजनीति को प्रभावित करने वाला घटनाक्रम इसलिए है क्योंकि पांच महीने पहले के चुनाव में इसी सीट पर भाजपा के हिंदू उम्मीदवार को सिर्फ 27 प्रतिशत वोट मिले थे। पांच महीने के अंदर 36 फीसदी वोट का स्विंग अभूतपूर्व है। यह मुस्लिम मतदाताओं के मतदान व्यवहार में आए एक बड़े बदलाव का संकेत है।

इस चुनाव परिणाम के अलग अलग आयामों को समझने की आवश्यकता है। सबसे पहला और स्पष्ट आय़ाम यह है कि सुवेंदु अधिकारी ने अपने पांच महीने के छोटे से कार्यकाल में जो काम किया है उससे उन्होंने समाज के सभी वर्गों का भरोसा जीता है। इसमें समान रूप से मुस्लिम भी शामिल हैं। आंकड़े इसकी कहानी खुद बता रहे हैं। रेजिनगर में भाजपा के उम्मीदवार को जितना वोट हिंदुओं का मिला है उससे ज्यादा वोट मुसलमानों का मिला है। यह किसी भय या दबाव का नतीजा नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि मुसलमानों ने सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व को स्वीकार किया है। यह उनके व्यक्तित्व का कमाल है कि उन्होंने मुस्लिमों का आह्वान किया और दोस्ती का मौका दिया तो मुस्लिम समाज ने इसे दिल खोल कर स्वीकार किया। उन्होंने भाजपा के प्रति अपने पूर्वाग्रह को छोड़ दिया। सुवेंदु अधिकारी उनको यह भरोसा दिलाने में सफल रहे हैं कि उनका हिंदुत्व किसी दूसरे धर्म को मानने वाले को नुकसान पहुंचाने या प्रताड़ित करने वाला नहीं है। उनका हिंदुत्व समावेशी है। मुसलमानों के मन में यह भरोसा इसलिए भी बना क्योंकि सुवेंदु सरकार ने सरकार की समस्त लोक कल्याणकारी योजनाओं को प्रभावी ढंग से जारी रखा, किसी के साथ भेदभाव नहीं किया।

ऐसे ही कानून व्यवस्था बहाल करने और राज्य में हिंसा, वसूली, तोलाबाजी, कट-मनी आदि की संस्कृति को समाप्त करने के लिए भी सुवेंदु अधिकारी की सरकार ने जो काम किया वह किसी जाति या धर्म को ध्यान में रख कर नहीं किया। असामाजिक तत्वों के खिलाफ कार्रवाई हुई, जिससे समाज में शांति बहाल हुई है। समाज में शांति बहाली का लाभ हर धर्म व जाति के लोगों को मिलता है। दशकों तक लेफ्ट और फिर डेढ़ दशक तक तृणमूल कांग्रेस के शासन में अराजकता, हिंसा और लूट से हर जाति व धर्म के लोग त्रस्त थे। उनको लेफ्ट व तृणमूल शासन में हुए शोषण का अहसास हुआ है। तभी उनके लिए सुवेंदु का शासन ताजा हवा के झोंके की तरह है। कह सकते हैं कि सरकार ने पांच महीने की छोटी सी अवधि में जिस तरह से शांति और सौहार्द्र स्थापित किया है उसी का परिणाम है कि भाजपा रेजिनगर जैसी सीट पर जीती और नंदीग्राम में जीत का रिकॉर्ड स्थापित किया।

यहां इस बात का जिक्र करना भी आवश्यक है कि रेजिनगर जैसी ही सामाजिक संरचना वाली असम की नगांव लोकसभा सीट पर भी भारतीय जनता पार्टी जीती है। नगांव में लगभग 60 फीसदी आबादी मुस्लिम है। इसके बावजूद इस सीट पर भाजपा के देबाशीष शर्मा डेढ़ लाख वोट से चुनाव जीते। असम में मुसलमानों के मसीहा माने जाने वाले जमात और एआईयूडीएफ के नेता बदरूद्दीन अजमल खुद उस सीट पर चुनाव लड़े थे। इसके बावजूद 40 फीसदी हिंदू आबादी वाली सीट पर भाजपा उम्मीदवार को 50 प्रतिशत वोट मिले। कांग्रेस की शिबोमणी बसु को सवा लाख से भी कम वोट मिले और वे तीसरे स्थान पर रहीं। नगांव सीट की जीत भी समावेशी और लोक कल्याण की राजनीति की जीत है। यह भी मुस्लिम मतदाताओं के बदलते व्यवहार का संकेत है। ध्यान रहे जब बदरूद्दीन अजमल ने पार्टी बनाई थी, तब राज्य के बड़े हिस्से में मुस्लिम कांग्रेस को छोड़ कर उनके साथ गए थे। पिछले दो चुनावों में दिखा कि मुस्लिम अजमल को छोड़ कर कांग्रेस की ओर लौटे। लेकिन इस साल मई में आए विधानसभा चुनाव नतीजों से सबक लेकर मुस्लिम मतदाता अब अपनी नई पोजिशनिंग करते दिख रहे हैं। कुछ मुस्लिम मतदाता कांग्रेस और एआईयूडीएफ की बाइनरी से निकल कर भाजपा को भी एक विकल्प के तौर पर देख रहे हैं। यह दोनों की राजनीति के लिए चिंता की बात होगी।

अगर रेजिनगर व नंदीग्राम विधानसभा और नगांव लोकसभा सीट के चुनाव परिणामों के व्यापक असर की बात करें तो राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी इसका एक बड़ा संदेश है। इससे यह धारणा निर्णायक रूप से टूटी है कि मुस्लिम किसी हाल में भाजपा को वोट दे ही नहीं सकता है। अगर सरकार समावेशी हो, लोक कल्याणकारी हो और कानून व्यवस्था सुनिश्चित करने वाली हो तो मुस्लिम भी उसको वोट कर सकते हैं। वैसे भी तीन तलाक समाप्त होने और उसे अवैध बनाए जाने के बाद से मुस्लिम महिलाओं का एक हिस्सा नरेंद्र मोदी के नेतृत्व का समर्थन करता है और उनकी पार्टी को वोट करता है। चुनाव बाद जुटाए गए कई राज्यों के आंकड़े इसकी गवाही देते हैं। धीरे धीरे ही सही लेकिन इस तरह का बदलाव अगर मुस्लिम मतदाताओं के व्यवहार में दिखता है तो उससे सामाजिक व राजनीतिक विभाजन कम होगा। भारत का समाज भी समावेशी बनेगा और तुष्टिकरण की राजनीति भी समाप्त होगी।

जहां तक विपक्ष की बात है तो मुख्य विपक्षी कांग्रेस और उसकी सहयोगी तृणमूल कांग्रेस के लिए इन नतीजों में दो बड़े संकेत छिपे हैं। पहला, मुसलमानों के मन में भाजपा के प्रति नफरत का भाव भरने के तमाम प्रयासों के बावजूद मुसलमान पूर्वाग्रह छोड़ कर भाजपा के साथ जा सकते हैं। दूसरा, तुष्टिकरण के तमाम प्रयासों के बावजूद कांग्रेस और तृणमूल जैसी पार्टियों से मुसलमानों का मोहभंग हो रहा है। कम से कम पश्चिम बंगाल और असम जैसी 30 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले राज्यों में मुस्लिम अब पारंपरिक सेकुलर पार्टियों की बजाय मुस्लिम नेताओं वाली पार्टियों की ओर देख रहे हैं। तभी नगांव में बदरूद्दीन अजमल और रेजिनगर में गुलाम नबी आजाद दूसरे स्थान पर रहे। दोनों सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं ने कांग्रेस को ठुकराया।  (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)

Devi Shakti Event: अंबानी फैमली ने धूम धाम से किया देवी मां का स्वागत, रणवीर सिंह-कृति सेनन से लेकर इन एक्टर्स ने इवेंट में लिया हिस्सा

Devi Shakti Event: नवरात्रि के एक दिन पहले अंबानी परिवार ने ‘देवी शक्ति’ के सम्मान में और भारत की शानदार कारीगरी की विरासत को समर्पित ‘स्वदेश’ (Swadesh) के एक साल पूरे होने का जश्न मनाने के लिए एक खास शाम का आयोजन किया।

शनिवार शाम को रिलायंस फाउंडेशन की चेयरपर्सन नीता अंबानी द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में बॉलीवुड हस्तियां और खास मेहमान भारतीय कारीगरी, सांस्कृतिक परंपराओं और त्योहारों के शुभ माहौल का जश्न मनाने के लिए एक साथ आए। इस जश्न में पूरा अंबानी परिवार शामिल हुआ, जिसमें नीता अंबानी और मुकेश अंबानी, उनके बेटे आकाश अंबानी और अनंत अंबानी, और बहुएं श्लोका मेहता और राधिका मर्चेंट शामिल थे।

नीता अंबानी शानदार कढ़ाई वाली मैजेंटा-पिंक सिल्क साड़ी में बेहद खूबसूरत लग रही थीं। इस साड़ी पर बारीक सोने की ज़री का काम और सजावटी बॉर्डर था। उन्होंने इसके साथ भारी कढ़ाई वाला ब्लाउज, शानदार ज्वेलरी, बिंदी और खूबसूरत इयररिंग्स पहने थे। वहीं मुकेश अंबानी ने क्लासिक ब्लैक बंदगला सूट पहनकर उनके लुक को पूरा किया, जिसमें गुलाबी पॉकेट स्क्वायर ने रंग का एक हल्का सा टच जोड़ा।

इस जश्न में बॉलीवुड के कई बड़े सितारे भी अंबानी परिवार के साथ शामिल हुए। इनमें रणवीर सिंह, कृति सेनन, आमिर खान, रश्मिका मंदाना, अदिति राव हैदरी, जैकलीन फर्नांडिस, जैकी श्रॉफ, शनाया कपूर, सारा अली खान, संजय दत्त, मनीष मल्होत्रा ​​और गौरी खान जैसे कई नामी चेहरे शामिल थे।

दूसरे मेहमानों ने भी त्योहार के हिसाब से कपड़े पहने थे। वे शानदार साड़ियों, बारीक कढ़ाई वाले एथनिक कपड़ों और पारंपरिक लिबास में नजर आए, जो भारतीय टेक्सटाइल, कारीगरी और सदाबहार फेस्टिव फैशन की खूबसूरती को दर्शाते थे।

शाम का मुख्य आकर्षण ‘स्वदेश इरोस’ में ‘देवी शक्ति’ कार्यक्रम था, जिसमें नवरात्रि के आध्यात्मिक महत्व और भारत की शिल्प विरासत की अद्भुत विविधता का संगम देखने को मिला। स्टोर के एक साल पूरे होने के मौके पर उन कारीगरों को सम्मानित किया गया, जिनकी लगन, हुनर ​​और रचनात्मकता ने देश की पारंपरिक कलाओं को आज भी जीवित रखा है।

मेहमानों को कालीघाट पेंटिंग, कलमकारी और आशावली बुनाई के लाइव प्रदर्शन के ज़रिए भारत की मशहूर कलाओं को बनाने की बारीक प्रक्रियाओं को करीब से देखने का मौका मिला। इन इंटरैक्टिव प्रदर्शनों में कला के इन रूपों में शामिल बारीकी, धैर्य और विशेषज्ञता को दिखाया गया, जिससे आने वाले लोग उस कारीगरी की सराहना कर सके जो पीढ़ियों से चली आ रही है।

एक खास लिमिटेड-एडिशन कलमकारी प्रदर्शन ने जश्न में चार चांद लगा दिए और इस पारंपरिक कला की खूबसूरती को सबके सामने पेश किया। इन अनुभवों के जरिए, ‘स्वदेश इरोस’ ने भारत की कलात्मक विरासत को दिखाने और देश की सांस्कृतिक पहचान को संजोने वाले कारीगरों के प्रति सम्मान और सराहना बढ़ाने के अपने संकल्प को फिर से दोहराया।

नेपाल की बूढ़ी गंडकी नदी में बाढ़:कई पुल-घर बहे, 4 लापता; लैंडस्लाइड से स्यारी नदी का रास्ता बंद, बिहार में भी खतरा

नेपाल के गोरखा जिले में रविवार सुबह बूढ़ी गंडकी नदी में अचानक बाढ़ आने से कई गांवों को नुकसान पहुंचा है। बाढ़ में कई घर और पुल बह गए। चार लोग लापता हैं। उनकी तलाश की जा रही है। बाढ़ से 341 मेगावाट के बूढ़ी गंडकी हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट का निर्माण कैंप और कई मशीनें भी बह गईं। बाढ़ का पानी सुबह करीब 4 बजे बस्तियों में घुसा, जिसके बाद लोगों को घर छोड़कर सुरक्षित जगहों पर जाना पड़ा। शुरुआती जानकारी के मुताबिक, ऊंचे पहाड़ी इलाके में भूस्खलन के कारण चुन्चुब्री स्यारी नदी का रास्ता बंद हो गया था। इससे पानी जमा हुआ और फिर अचानक तेज बहाव के साथ नीचे आया। इससे पहले 26 अगस्त को भोटेकोशी और त्रिशूली नदी में आई बाढ़ में 1455 लोगों की मौत हुई थी। साथ ही 5,285 लोग अब भी लापता हैं। सरकार ने बताया कि लगातार हो रहे भूस्खलन के बीच लापता लोगों की तलाश जारी है। बाढ़ से जुड़ी 4 तस्वीरें… अब मैप से समझें कहां हुआ हादसा बिहार में भी बाढ़ का खतरा बूढ़ी गंडकी नदी में बाढ़ आने से बिहार में भी खतरा बढ़ सकता है। यह नदी आगे त्रिशूली से मिलती है। फिर दोनों का पानी देवघाट के पास नारायणी नदी में पहुंचता है। यही नदी भारत में गंडक के नाम से बिहार में आती है और आगे गंगा में मिल जाती है। ऐसे में अगर पानी का बहाव बढ़ता है, तो बिहार में गंडक किनारे बसे इलाकों पर असर पड़ सकता है। इनमें पश्चिम चंपारण, गोपालगंज और वैशाली जैसे जिले शामिल हैं। हालांकि, अभी यह साफ नहीं है कि नेपाल में आई बाढ़ से बिहार में जलस्तर बढ़ेगा या नहीं। SMS भेजकर लोगों को सुरक्षित जगह जाने की सलाह गोरखा जिला पुलिस कार्यालय के इंस्पेक्टर आकाश कंडेल ने बताया कि बाढ़ के खतरे को देखते हुए प्रशासन ने सिरदिबास और धारचे ग्रामीण नगरपालिका के खोर्लाबेसी, माछाखोला, सोती, अरखेत और आरुघाट में रहने वाले लोगों को सुरक्षित जगहों पर जाने की सलाह दी। नेपाल के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण और प्रबंधन प्राधिकरण (NDRRMA) के मुख्य कार्यकारी डॉ. धर्मराज उप्रेती ने बताया कि ऊपरी इलाके से बाढ़ का पानी आरुघाट पहुंचने में करीब 3 घंटे लगते हैं। इससे नदी के निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को सुरक्षित जगहों पर जाने का समय मिल सकता है। उप्रेती के मुताबिक, प्रशासन ने लोगों को SMS भेजकर अलर्ट किया है। सिरदिबास, जगत, यारी, तातोपानी, सोती और अरुखोला जैसे नदी किनारे बसे इलाकों के लोगों को खास सावधानी बरतने को कहा गया है। पहाड़ी इलाकों में बिना बारिश के भी बाढ़ का खतरा नेपाल के पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन के कारण अचानक बाढ़ आने का खतरा बना रहता है। पहाड़ से मिट्टी और पत्थर खिसककर जब नदी या नाले का रास्ता रोक देते हैं, तो पानी एक जगह जमा होने लगता है। कुछ समय बाद जब मिट्टी और पत्थरों की रुकावट टूटती है, तो जमा पानी तेजी से नीचे की ओर बहने लगता है। इससे नदी के किनारे बसे गांवों में अचानक बाढ़ आ जाती है। बाढ़ का पानी अपने साथ बड़े पत्थर, पेड़ और मलबा भी बहाकर ले जाता है। इससे घर, सड़कें और पुल टूट सकते हैं। ऐसी बाढ़ आने के लिए यह जरूरी नहीं है कि उसी इलाके में बारिश हुई हो। पहाड़ के ऊपरी हिस्से में जमा पानी अचानक नीचे आने से दूर बसे गांवों में भी तबाही मच सकती है। 45 दिन पहले आई बाढ़ से भारी तबाही नेपाल में 26 अगस्त को आई बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई थी। चीन के तिब्बत से लगी सीमा के पास शुरू हुई इस बाढ़ का असर भोटेकोशी नदी और आसपास के इलाकों में देखने को मिला। अचानक आए तेज पानी ने घरों, सड़कों, पुलों और बिजली बनाने वाली परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचाया। नेपाल के विदेश मंत्रालय के मुताबिक, शुरुआती दिनों में सैकड़ों शव बरामद किए गए थे और बड़ी संख्या में लोग लापता थे। बाद में 5 अक्टूबर को नेपाल सरकार ने बताया कि इस बाढ़ में कम से कम 1400 से ज्यादा लोगों की मौत हुई, जबकि 5000 लोग अब भी लापता हैं। करीब 13,795 लोगों को बचाया गया। बाढ़ से 12 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स भी तबाह हुए। इसके बाद राहत और बचाव अभियान के साथ प्रभावित लोगों को दोबारा बसाने की तैयारी शुरू की गई। ——————– यह खबर भी पढ़ें… अमेरिका में फ्लोरिडा के तट से टकराया इसायस तूफान अमेरिका के मेक्सिको की खाड़ी से लगे तटीय इलाकों में शुक्रवार को इसायस तूफान टकराया। फ्लोरिडा और अलबामा में 170 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चल रही हैं। पूरी खबर पढ़ें…

नौकरी छोड़ने का मन, लेकिन इस्तीफा देने से डर रहा कर्मचारी! Reddit पर बताई अपनी परेशानी

नौकरी में तनाव और बढ़ती जिम्मेदारियां कई बार कर्मचारियों को ऐसे फैसले लेने पर मजबूर कर देती हैं, जिनकी कोई कल्पना भी नहीं करता। ऐसा ही एक मामला सोशल मीडिया पर सामने आया है, जहां एक कर्मचारी ने इस्तीफा देने के बजाय बॉस से नौकरी से निकाले जाने का रास्ता तलाशने की बात कही। उसकी इस सोच के पीछे काम का दबाव, भविष्य की चिंता और आर्थिक सुरक्षा जैसे कई कारण हैं। कर्मचारी की इस परेशानी पर Reddit यूजर्स ने भी अपनी राय दी और उसे अलग-अलग सुझाव दिए।

नई जिम्मेदारी बनी परेशानी की वजह

Reddit के r/QuitCorporate फोरम पर कर्मचारी ने बताया कि वह एक बड़ी कंपनी में काम करता है, लेकिन अब अपनी नौकरी से खुश नहीं है। हाल ही में उसने एक नई जिम्मेदारी स्वीकार की थी, जो उसकी उम्मीद से कहीं ज्यादा मुश्किल साबित हुई। उसे अपने काम का दायरा खुद तय करना पड़ता है और मैनेजर की उम्मीदों पर खरा उतरना भी चुनौती बन गया है। उसे लगता है कि बॉस उससे ऐसे नतीजों की उम्मीद कर रहे हैं, जिन्हें हासिल करना आसान नहीं है।

दूसरी नौकरी नहीं मिली, इसलिए बढ़ी चिंता

कर्मचारी ने दूसरी कंपनियों में नौकरी तलाशनी शुरू कर दी है, लेकिन अभी तक कोई अच्छा अवसर नहीं मिला। वह नौकरी छोड़कर कुछ समय आराम करना चाहता है, मगर अनिश्चित जॉब मार्केट उसे ऐसा करने से रोक रहा है। उसकी योजना करीब सात साल बाद जल्दी रिटायरमेंट लेने की है। तब तक वह कम जिम्मेदारी वाली नौकरी करना चाहता है, भले ही इसके लिए कम वेतन स्वीकार करना पड़े।

इस्तीफा नहीं, लेऑफ चाहता है कर्मचारी

इस मामले की सबसे दिलचस्प बात यह है कि कर्मचारी खुद इस्तीफा देने के बजाय कंपनी की छंटनी प्रक्रिया का हिस्सा बनना चाहता है। उसे उम्मीद है कि नौकरी से निकाले जाने पर सेवरेंस पैकेज मिल सकता है, जिससे उसे नई नौकरी तलाशने और मानसिक तनाव से उबरने के लिए कुछ समय मिल जाएगा।

उसने बताया कि कंपनी में छंटनी हो रही है, लेकिन उसके विभाग में इस साल की प्रस्तावित छंटनी पूरी हो चुकी है। ऐसे में उसे इंतजार है कि अगली बार मौका कब मिलेगा।

delhi traffic (1)बॉस से मीटिंग करने में भी लगता है डर

लगातार तनाव का असर कर्मचारी की मानसिक स्थिति पर भी पड़ा है। उसने बताया कि अब उसे बॉस के साथ मीटिंग करने से घबराहट होती है। उसे डर है कि कहीं उसे परफॉर्मेंस इम्प्रूवमेंट प्लान (PIP) पर न डाल दिया जाए। यह ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें कर्मचारी को प्रदर्शन सुधारने के लिए लक्ष्य और समयसीमा दी जाती है।

उसे अपनी पेशेवर छवि खराब होने की भी चिंता है। वह सहकर्मियों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखते हुए सम्मानजनक तरीके से कंपनी छोड़ना चाहता है।

Reddit यूजर्स ने क्या सलाह दी?

पोस्ट पर कुछ यूजर्स ने सुझाव दिया कि कर्मचारी मैनेजमेंट को अगली छंटनी में स्वेच्छा से शामिल होने की इच्छा बता सकता है। वहीं, कुछ लोगों ने नौकरी छोड़ने से पहले मेडिकल लीव जैसे विकल्पों पर विचार करने की सलाह दी।

हालांकि, सेवरेंस पैकेज और बेरोजगारी भत्ते की पात्रता कंपनी की नीतियों और स्थानीय कानूनों पर निर्भर करती है। यह कहानी बताती है कि लगातार काम का दबाव कभी-कभी कर्मचारियों को इस्तीफे के बजाय नौकरी से निकाले जाने को बेहतर विकल्प मानने पर मजबूर कर सकता है।

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अनगिनत विद्रोह और वो बुनियादी सवाल!

शुरुआत के तीन दिन के अंदर ‘सत्याग्रह’ वेबसाइट पर संघर्ष (या समस्याओं) की 30 हजार से अधिक कहानियां दर्ज कराई गईं। उनमें सबसे ज्यादा संख्या शिक्षा, भ्रष्टाचार, जातीय भेदभाव, स्वास्थ्य सेवाओं, श्रम अधिकारों, और किसान से जुड़े मुद्दों की रहीं। इनसे संबंधित प्रवृष्टियां हजारों की संख्या में आईं।… वोट चोरी बड़ा मुद्दा है, जिसने भारत के राजनीतिक रूप से जागरूक तबकों को उद्वेलित किया है। इनके साथ जमीनी संघर्षों  को भी जोड़ कर देखें, तो बेशक इस समय देश में मौजूद बेचैनी के आलम का अंदाजा लगता है।

सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने हाल में अपने एक सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा- “जून में हुए CJP प्रदर्शनों ने देश में असंख्य छोटे‑बड़े विद्रोहों को जन्म दिया है। (मुख्य निर्वाचन आयुक्त) ज्ञानेश कुमार द्वारा की गई ‘वोट चोरी’ अब स्वतंत्रता के बाद भारत का सबसे बड़ा मुद्दा बन गई है। यह हमारे लोकतंत्र की जड़ पर चोट करती है। सरकार की अपने ‘तोते’ ज्ञानेश को बचाने के लिए प्रदर्शनों को दबाने की कोशिशें उलटी पड़ रही हैं। इससे जनता का गुस्सा और बढ़ रहा है, जो अब उबाल पर है।”

दरअसल, भूषण ने अंग्रेजी में लिखे इस पोस्ट में ‘million mutinies in the country’ लिखा, जिसका अनुवाद हमने ‘असंख्य छोटे-बड़े विद्रोहों’ के रूप में किया है। यह उपमा संभवतः उन्होंने मशहूर लेखक वी.एस. नॉयपॉल की पुस्तक A Million Mutinies Now से ली है। यह किताब नॉयपॉल की भारत संबंधी त्रि-कथा (Trilogy) की आखिरी रचना है, जो 1990 में प्रकाशित हुई थी।

नॉयपॉल की A Million Mutinies Now का सार है कि भारत की सतह पर दिखने वाली हलचल और उथल-पुथल किसी आने वाले विनाश का संकेत नहीं, बल्कि एक “बौद्धिक और सामाजिक जागरण” का परिणाम है। यह छोटे-छोटे विद्रोहों का ऐसा महा-समुद्र है, जो अंततः भारत को अपनी वास्तविक पहचान और स्वतंत्रता की ओर ले जा रहा है।

नायपॉल ने यह किताब 1980 के दशक में भारत यात्रा पर आने के बाद लिखी थी। यहां घूमते हुए उन्हें अहसास हुआ कि स्वतंत्रता के बाद का भारत अब ऐसे दौर में पहुंच गया है, जहां समाज के हर हिस्से में छोटे‑छोटे विद्रोह और असंतोष दिखाई देते हैं। लेकिन ये विद्रोह किसी बड़े क्रांतिकारी आंदोलन की तरह नहीं हैं, बल्कि जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र, राजनीति और व्यक्तिगत आकांक्षाओं से जुड़े संघर्ष हैं। नायपॉल ने इसे भारत के बदलते समाज का प्रतीक माना- जहां लोग अब चुप नहीं रहते, बल्कि अपनी पहचान और अधिकारों के लिए आवाज़ उठाते हैं।

संदर्भ के लिए यह उल्लेख कर लेना उचित होगा कि नॉयपॉल दरअसल संप्रदाय, जाति, क्षेत्र एवं भाषा की पहचान जता रही गतिविधियों से प्रभावित थे, जिन्हें भारतीय नवजागरण के दौर में संकीर्ण एवं भारत की राष्ट्रीय एकता के लिए चुनौती समझा जाता था। नेहरूवादी नीतियों एवं भारतीय धर्मनिरपेक्षता के वे कड़े आलोचक थे। उनका मानना था कि भारत में धर्मनिरपेक्षता का उपयोग अक्सर ऐतिहासिक सच्चाइयों और मध्यकालीन (यानी मुस्लिम) आक्रमणों के घावों को छिपाने के राजनीतिक हथकंडे के रूप में किया गया। अपनी इसी सोच के आधार पर नॉयपॉल ने बाबरी मस्जिद को तोड़ने के लिए हुए राम जन्मभूमि आंदोलन को भारत में एक ऐतिहासिक सांस्कृतिक जागरण के रूप में देखा।

इस रूप में समझा जाएगा कि नरेंद्र मोदी का शासन उस कथित “ऐतिहासिक सांस्कृतिक जागरण” का ठोस परिणाम है। यानी आज देश जहां है, वह 1980-90 के दशकों की ‘Million Mutinies’ का परिणाम है। मगर अब बात जिन ‘Million Mutinies’ की हो रही है, वो दरअसल, उन परिणामों से बनी जकड़न से निकलने की जद्दोजहद की मिसाल हैं।

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने हाल में इन ‘छोटे-मोटे विद्रोहों’ को साझा मंच प्रदान करने की एक सराहनीय पहल की। सत्याग्रह (http://rahulgandhi।in/satyagraha वेबसाइट की शुरुआत करते हुए उन्होंने लिखाः “देशभर में लोग अपने हक़ के लिए लड़ रहे हैं- और अक्सर अकेले लड़ रहे हैं। Gen Z, छात्र, किसान, आदिवासी, दलित, महिलाएं- हर संघर्ष की अपनी कहानी है। पर जो आवाज़ अकेली उठती है, वो अक्सर दब जाती है। ‘सत्याग्रह’ इन्हीं आवाज़ों को एक नक्शे पर साथ लाने की पहल है। बापू ने यही सिखाया था- सच सबसे बड़ा हथियार है। पर उससे भी बड़ा हथियार है, एकता में सच के साथ खड़े होना। अगर आप भी किसी अन्याय से लड़ रहे हैं- अपनी कहानी भेजिए। दो मिनट लगेंगे। आपकी कहानी नक्शे पर आएगी। आप देखेंगे कि आपकी तरह और कौन-कौन लड़ रहा है। और मैं जो कर सकता हूं, करुंगा- संसद में, सड़क पर, खत लिखकर, जहां भी मेरी ज़रूरत हो वहां आपके साथ खड़े होकर- नेता विपक्ष के रूप में ये मेरी ज़िम्मेदारी है। अपने सत्याग्रह की कहानी मुझे यहां बताएं।”

इस पहल की शुरुआत के तीन के अंदर ‘सत्याग्रह’ वेबसाइट पर संघर्ष (या समस्याओं) की 30 हजार से अधिक कहानियां दर्ज कराई गईं। उनमें सबसे ज्यादा संख्या शिक्षा, भ्रष्टाचार, जातीय भेदभाव, स्वास्थ्य सेवाओं, श्रम अधिकारों, और किसान से जुड़े मुद्दों की रहीं। इनसे संबंधित प्रवृष्टियां हजारों की संख्या में आईं। जबकि “वोट चोरी” से संबंधित जिस संघर्ष को प्रशांत भूषण ने “स्वतंत्रता के बाद भारत का सबसे बड़ा मुद्दा” बताया है, उससे संबंधित सिर्फ 559 (सात अक्टूबर को दिन में एक बजे तक) शिकायतें दर्ज हुईं।

फिर भी यह निर्विवाद है कि वोट चोरी बड़ा मुद्दा है, जिसने भारत के राजनीतिक रूप से जागरूक तबकों को उद्वेलित किया है। कॉकरोच जनता पार्टी के इस आंदोलन में उतरने और उसे मिले भारी समर्थन से जाहिर है कि अभिजात्य वर्ग के एक बड़े हिस्से में भी “चुनावों को नियंत्रित” कर लिए जाने के आरोप को गंभीरता से लिया गया है। इस कारण मीडिया, सोशल मीडिया, और आम चर्चाओं में यह सवाल सर्वोपरि बना हुआ है।

इनके साथ जमीनी संघर्षों (जिनमें से कई ने राहुल गांधी की वेबसाइट पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है) को भी जोड़ कर देखें, तो बेशक इस समय देश में मौजूद बेचैनी के आलम का अंदाजा लगता है। इनके परिणामस्वरूप कई क्षेत्रों में सामाजिक अस्थिरता की स्थिति है। आर्थिक दबाव और उस कारण जन्में संघर्षों की कहानी तो लगभग पूरे देश में साकार होती दिखती है। लेकिन उनका कोई सकल एवं राष्ट्र-व्यापी प्रभाव उभरता अभी तक नजर नहीं आया है।

इस सिलसिले में व्लादीमीर इलिच लेनिन का वो कथन अक्सर याद आता है, जिसमें उन्होंने कहा था- There are no people– yet there is a mass of people। इस पूरे कथन का सार था- “जनता बहुत है, असंतोष भी बहुत है, लेकिन नेतृत्व नहीं है। कामगार वर्ग और समाज के अलग‑अलग हिस्सों से हर साल असंतुष्ट लोग सामने आते हैं, जो विरोध करना चाहते हैं और निरंकुश शासन के खिलाफ संघर्ष में मदद देने को तैयार हैं। पर समस्या यह है कि उन्हें दिशा देने वाले नेता और संगठनकर्ता नहीं हैं, जो सबकी ताकत को एकजुट करके संगठित और सामंजस्यपूर्ण आंदोलन बना सकें।” (On Organization)

इस कथन का आशय यह भी था कि संगठित करने वाले सक्षम नेतृत्व और रणनीतिकारों के अभाव के कारण क्रांतिकारी आंदोलन की ऊर्जा बिखर जाती है और उसका प्रभाव सीमित हो जाता है। इस बात की पुष्टि वैसे तो आधुनिक इतिहास के हर दौर में हुई है, लेकिन खासकर 21वीं सदी में इसके उदाहरण भरे-पड़े हैं। 2010 का दशक दुनिया भर में विशाल जन आंदोलनों के उभार का रहा। 2011 तो ऐसा वर्ष था, जब अमेरिकी पत्रिका टाइम ने अपनी सालाना रवायत के तहत “The Protester” को Person of the Year घोषित किया। उसका संदर्भ अरब स्प्रिंग (ट्यूनिशिया, मिस्र, लीबिया, सीरिया, बहरीन आदि में जन विद्रोह, अमेरिका में Occupy Wall Street आंदोलन, यूरोप (खास कर ग्रीस और स्पेन) में आर्थिक संकट के खिलाफ प्रदर्शनों, भारत में अन्ना आंदोलन, और मेक्सिको तथा अन्य कई देशों में अलग-अलग मुद्दों पर जन आंदोलनों से बना था।

मशहूर लेखक और पत्रकार विन्सेंट बोविन ने उन आंदोलन का लगभग एक दशक तक अध्ययन करने के बाद “If We Burn: The Mass Protest Decade and the Missing Revolution” नाम की किताब लिखी, जिसका प्रकाशन 2023 में हुआ। उसमें उन्होंने यही समझने की कोशिश की है कि 2010–20 के वैश्विक जन आंदोलन संरचनात्मक बदलाव में क्यों नहीं बदल पाए? उन्होंने लिखा कि ऐसे संघर्षों से अधिक से अधिक संबंधित देश में राजनीतिक शून्यता पैदा होती है, लेकिन यह क्षणिक या अस्थायी घटना बन कर रह जाती है। बेविन्स ने लिखा है:

“जन आंदोलन के दशक में, सड़कों पर (जन आक्रोश के) हुए अचानक विस्फोटों ने कई बार क्रांतिकारी हालात पैदा किए। लेकिन साधारण विरोध प्रदर्शन ऐसे हालात का लाभ उठाने के लिए बहुत कमजोर साबित होते हैं, और इस तरह के विरोध प्रदर्शन इस मोर्चे पर नाकाम रह जाते हैं। अगर आप मानते हैं कि आप एक बेहतर समाज बना सकते हैं… तो आपको खुद उस राजनीतिक खालीपन में प्रवेश करना चाहिए। लेकिन अलग‑अलग कारणों से सड़क पर उतरे बिखरे हुए व्यक्तियों के समूह सीधे सत्ता अपने हाथ में नहीं ले सकते, कम-से-कम पूरे समूह के रूप में तो नहीं ही। अगर कोई व्यक्ति समूह उस राजनीतिक खालीपन में जाकर जनता के नाम पर सत्ता लेता है, तो वह एक प्रकार के अग्रिम दस्ते (vanguard) की भूमिका निभाता है, जो एक विशेष वैचारिक परियोजना से प्रेरित होता है। कुछ आदर्शवादी, सत्ता‑विरोधी विचारधाराओं में मान लिया गया कि उथल-पुथल से ही नया समाज बन जाएगा, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हो पाया है।”

अर्थ यह कि सिर्फ सड़क पर हुआ विरोध क्रांति को दिशा नहीं दे सकता। सत्ता हाथ में लेने के लिए संगठित नेतृत्व और वैचारिक परियोजना की ज़रूरत होती है। मार्क्सवादी क्रांति के संदर्भ में ऐसी एक चर्चित टिप्पणी लेनिन की भी है। उन्होंने कहा था- “अक्सर कहा जाता है कि श्रमिक वर्ग स्वाभाविक रूप से समाजवाद की ओर आकर्षित होता है। यह बिल्कुल सही है, क्योंकि समाजवादी सिद्धांत श्रमिक वर्ग की दुर्दशा के कारणों को अन्य किसी भी अन्य सिद्धांत से अधिक गहराई से और सही ढंग से उजागर करता है। इसी वजह से मजदूर इसे आसानी से अपना लेते हैं- बशर्ते कि यह सिद्धांत खुद ‘स्वतःस्फूर्तता’ के आगे न झुक जाए और उस ‘स्वतःस्फूर्त’ बनी स्थिति को अपने अधीन कर ले। कामगार वर्ग स्वाभाविक रूप से समाजवाद की ओर बढ़ता है; फिर भी, सबसे व्यापक और लगातार नए रूपों में उभरती हुई पूंजीवादी विचारधारा भी स्वाभाविक रूप से कामगार वर्ग पर हावी रहती है।”

फिलहाल, भारत में बात मजदूर तबकों की लड़ाई की नहीं हो रही है। अभी संदर्भ पूंजीवादी ढांचे के तहत मिली सीमित आजादियों और अधिकारों की रक्षा का है। यह गौरतलब है कि इन आजादियों और अधिकारों को अधिक बड़े जन समूहों के साथ साझा करने पर एक दौर में राजी हुए शासक वर्ग इस युग में आकर ऐसी “रियायत” को माकूल और मुनासिब नहीं मान रहे हैं। यह एक वैश्विक परिघटना है। दुनिया भर में आम जन से ऐसी “रियायतों” को छीन लेने की परियोजना इस दौर की हकीकत है। इसके लिए लगभग हर जगह (जहां चुनावी लोकतंत्र है) धुर दक्षिणपंथी ताकतों को शासक समूहों ने अपना औजार बनाया है, जिन्होंने नफरत और विभेद की रणनीति से आम जन को भटकाने की अपनी क्षमता साबित की है।

लाजिम है कि ऐसी कोशिशों के खिलाफ प्रभावित जन समूहों ने प्रतिरोध का रास्ता अख्तियार किया है। जिस समय भारत में ‘Million Mutinies’ की बात हो रही है, उसी समय फ्रांस, स्पेन, जर्मनी और यहां तक कि पाकिस्तान में भी हो रहे बड़े जन प्रदर्शनों ने दुनिया का ध्यान खींच रखा है। कहा जा सकता है कि एक बार फिर “The Protester” अग्रिम कतार में आ खड़ा हुआ है। इससे संभव है कि कुछ जगह राजनीतिक शून्य पैदा हो। लेकिन उससे वो पृष्ठभूमि कितनी बदलेगी, जिसकी वजह से आवाम के हासिल अधिकारों पर तलवारें चली हैं और जिनसे आहत होकर लोग प्रतिरोध जताने के लिए प्रेरित हुए हैं?

जैसाकि ऊपर चर्चा हुई, भारत में ‘वोट चोरी’ एक बड़ा मसला है, लेकिन मुद्दे और भी हैं, जैसी झलक राहुल गांधी की पहल ‘सत्याग्रह’ पर देखने को मिली है। बल्कि एक तर्क यह हो सकता है कि उन समस्याओं (शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, रोजगार, रोजमर्रा की जिंदगी से संबंधित अन्य मसलों) से परेशान लोग अपनी वोट की ताकत से मौजूदा शासन तंत्र में कोई अस्थिरता पैदा ना करें, इसलिए उनके वोट के प्रभाव को कमजोर करना शासक वर्गों की फिलहाल सर्वोच्च प्राथमिकता बन गई है। इसलिए- एक व्यक्ति एक वोट, समान मूल्य- के सिद्धांत को व्यवहार में बचाना इस समय की भले सबसे बड़ी जरूरत हो, लेकिन इस सवाल को सिर्फ इससे ही बांध कर नहीं रखा जा सकता। यह कहना और बार-बार दोहराना जरूरी है कि वोट का अधिकार अपने-आप में अंतिम लक्ष्य नहीं है, बल्कि यह आम जिंदगी को बेहतर बनाने का एक माध्यम भर है और इसीलिए महत्त्वपूर्ण है।

इस लिहाज से अधिक दूरगामी महत्त्व का प्रश्न यह है कि दशकों तक वोट का अधिकार मिले रहने के बावजूद बहुसंख्यक जनता की जिंदगी में उसका असर सीमित क्यों बना रहा और क्या गारंटी है कि आगे ऐसा नहीं होगा? इस नजरिए से वह बदलाव जरूरी हो जाता है, जैसा 2010-20 के दशक में ना हो पाने का जिक्र और उसके कारणों की पड़ताल विन्सेंट बोविन ने अपनी पुस्तक If We Burn में की है। इसलिए मौजूदा ‘Million Mutinies’ को mass of people के बीच no people की हकीकत से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए। बोविन ने दशक भर पुराने आंदोलनों से टिकाऊ बदलाव ना होने के लिए जिस vanguard की कमी को जिम्मेदार माना, आज असल सवाल वही है कि भारत में उस शर्त को पूरा करने बारे में क्या चर्चा हो रही है? इसकी जरूरत पर कितना जोर दिया जा रहा है, और इस विकल्प की तैयारी के लिए क्या प्रयास हो रहे हैं?

मेट्रो मामले में आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन करके दिल्ली में मेट्रो सेवाएं बंद करने के मामले में एक अवमानना याचिका दायर की गई है, जिस पर रविवार को सुनवाई होगी। सुप्रीम कोर्ट छुट्टी के दिन इस मामले में विशेष सुनवाई के लिए राजी हो गई है। जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच इस मामले की सुनवाई करेगी। याचिका में आरोप लगाया गया है कि नौ अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिए गए आदेश का उल्लंघन किया गया है।

असल में सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि 10 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ होने वाले विरोध, प्रदर्शनों के कारण सार्वजनिक परिवहन सेवाओं पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई जानी चाहिए। इस आदेश के बावजूद सरकार ने दिल्ली में 45 मेट्रो स्टेशन बंद रखे और ढाई सौ ट्रेनें रद्द कीं। इसे अदालत की अवमानना बताते हुए वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने एक याचिका दायर की है।

याचिका में केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार और दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन यानी डीएमआरसी की अध्यक्ष डी थारा के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि संबंधित अधिकारियों ने जान बूझकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अवहेलना की। मेट्रो स्टेशनों को बंद रखा गया और ट्रेन सेवाओं को प्रभावित किया गया। इस बीच, वरिष्ठ वकील और राज्यसभा सांसद मेनका गुरुस्वामी ने भी इसी मुद्दे पर एक अलग अवमानना याचिका दायर की है।

Saudi-Houthi War: सऊदी अरब पर हूती विद्रोहियों का बड़ा हमला! रियाद एयरपोर्ट पर मिसाइल हमले में 12 लोगों की मौत, 300 से ज्यादा घायल

Saudi-Houthi War: हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब की राजधानी रियाद के किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर अब तक का सबसे बड़ा हमला किया है। ताजा हमले में 12 लोगों की मौत हो गई है। जबकि 300 से अधिक लोग घायल हुए हैं। सऊदी अरब के नागरिक उड्डयन अधिकारियों ने रविवार (11 अक्टूबर) तड़के यह जानकारी दी। घायलों में कई की हालत गंभीर बताई गई है। सऊदी अरब ने इस हमले के लिए पड़ोसी देश यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों को जिम्मेदार ठहराया है। इस हमले के बाद सऊदी और हूती के बीच जारी जंग के खतरनाक रूप लेने के संकते है।

इस हमले को खाड़ी के अरब देशों में ईरान युद्ध शुरू होने के बाद की सबसे घातक घटनाओं में से एक बताया गया है। क्षेत्र में पहले से जारी तनाव के बीच हूती विद्रोहियों और सऊदी समर्थित यमनी सरकारी बलों के बीच लड़ाई तेज होने से संघर्ष का दायरा भी बढ़ा है। एक दशक से भी ज्यादा समय में सऊदी अरब में हुए इन सबसे घातक हमलों ने खाड़ी देश को हिलाकर रख दिया है। सीमा-पार तनाव बढ़ने के बीच देश हफ्ते से मिलिटेंट्स के हमलों को रोकने के लिए संघर्ष कर रहा है।

एयरपोर्ट के घरेलू टर्मिनल परिसर को बनाया निशाना

क्षेत्रीय अधिकारी के मुताबिक, एक मिसाइल किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट के उस परिसर से टकराई, जहां घरेलू उड़ानों के लिए इस्तेमाल होने वाले टर्मिनल 3 और 4 स्थित हैं। अधिकारी ने पहचान गोपनीय रखने की शर्त पर जानकारी दी, क्योंकि उन्हें मीडिया से बात करने की आधिकारिक अनुमति नहीं थी। हमले के बाद सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो फुटेज में एयरपोर्ट के बाहर आपातकालीन गाडि़यां दिखाई दिए। इन वीडियो का न्यूज एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस (AP) ने विश्लेषण किया है। सऊदी अधिकारियों के अनुसार, घायलों को इलाज के लिए कई अस्पतालों में भर्ती कराया गया है।

मृतकों में कई देशों के नागरिक शामिल

सऊदी अधिकारियों की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, मृतकों में चार सऊदी नागरिकों के अलावा बांग्लादेश के दो नागरिक और अमेरिका, फिलिस्तीन, मिस्र, जॉर्डन, सीरिया तथा सूडान का एक-एक नागरिक शामिल है। इस तरह अलग-अलग देशों के नागरिक इस हमले की चपेट में आए हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी हमले में एक अमेरिकी नागरिक की मौत की पुष्टि की है। उन्होंने सोशल मीडिया पर हमले की निंदा करते हुए कहा कि इस तरह के हमले निर्दोष नागरिकों की जिंदगी के प्रति घोर उपेक्षा दर्शाते हैं और इन्हें तत्काल रोका जाना चाहिए।

सऊदी गठबंधन ने हूतियों को ठहराया जिम्मेदार

हूतियों के खिलाफ लड़ रहे सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने हमले की कड़ी निंदा की है। गठबंधन ने इसे ‘पूरी तरह युद्ध अपराध’ करार देते हुए कड़ी जवाबी कार्रवाई करने की चेतावनी दी है। उसका कहना है कि एयरपो्ट पर कोई अमेरिकी सैन्य ठिकाने नहीं है। पिछले एक सप्ताह के दौरान एयरपोर्ट पर हुए कई हमलों में यह ताजा घटना है। इससे सऊदी अरब पर अपने सहयोगी देशों, खासकर अमेरिका से सैन्य सहायता मांगने का दबाव बढ़ने की आशंका है। सऊदी अरब अब तक हूती विद्रोहियों के साथ व्यापक युद्ध से बचने की कोशिश करता रहा है।

ट्रंप ने सऊदी अरब के समर्थन में हमले करने के दिए संकेत

रियाद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर हमले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया कि अमेरिका हूती विद्रोहियों के खिलाफ सऊदी अरब के हमलों में शामिल होने पर विचार कर सकता है। शनिवार को पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि प्रशासन इस पर विचार कर रहा है और फैसला तेजी से लिया जाएगा।

ट्रंप ने बाद में कहा कि वह सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) से बात करने की योजना बना रहे हैं। उन्होंने सऊदी अरब में हुई घटना को अस्वीकार्य बताया। जब उनसे पूछा गया कि क्या अमेरिका सैन्य कार्रवाई में शामिल हो सकता है, तो उन्होंने कहा कि इस पर आगे फैसला किया जाएगा।

मध्य पूर्व में बढ़ सकता है तनाव

रियाद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर बड़ी संख्या में लोगों के हताहत होने के बाद क्षेत्रीय संघर्ष और व्यापक होने की आशंका बढ़ गई है। अमेरिका की संभावित सैन्य भागीदारी, सऊदी अरब की जवाबी कार्रवाई और यमन में तेज होती लड़ाई आने वाले दिनों में हालात को प्रभावित कर सकती है। हालांकि, अमेरिकी प्रशासन ने अभी तक हूतियों के खिलाफ सऊदी हमलों में शामिल होने का आखिरी फैसला घोषित नहीं किया है। ट्रंप के बयान के मुताबिक, इस संबंध में आगे विचार-विमर्श और निर्णय होना बाकी है।

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Russia-Ukraine War Update: ‘यूक्रेन को अब नए राष्ट्रपति की जरूरत’: पुतिन को लेकर नरम पड़े ट्रंप के तेवर, जेलेंस्की पर भड़के

Russia-Ukraine War Update: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की पर निशाना साधते हुए कहा है कि युद्धग्रस्त देश को ऐसे नए नेतृत्व की जरूरत है, जो समझौता करने में सक्षम हो। ट्रंप ने यूक्रेन की ओर से रूस की तेल रिफाइनरियों पर किए जा रहे हमलों को रोकने की अपील भी की है। उनके इस बयान से वॉशिंगटन और कीव के बीच तनाव बढ़ने के संकेत मिले हैं। ट्रंप ने कहा है कि यूक्रेन को एक नया राष्ट्रपति चुनने का समय आ गया है क्योंकि वर्तमान राष्ट्रपति जेलेंस्की ने रूस के साथ अपने देश के युद्ध को समाप्त करने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए हैं।

ट्रंप ने शनिवार को व्हाइट हाउस में कहा, “मेरा सुझाव है कि वे (यूक्रेन के लोग) एक ऐसा नया नेता चुनें जो कोई समझौता कर सके। कुछ कारणों से वह (जेलेंस्की) ऐसा कभी नहीं करते।” ट्रंप ने यह दावा भी किया कि यदि वह 2022 में अमेरिका के राष्ट्रपति होते, तो यह युद्ध कभी शुरू ही नहीं होता। उन्होंने कहा, “यूक्रेन और रूस के बीच यह युद्ध शुरू होने का कोई कारण नहीं था। यह अक्षमता के कारण शुरू हुआ।”

जेलेंस्की पर निशाना साधते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि उन्होंने (जेलेंस्की ने) अपने देश का 30 प्रतिशत हिस्सा गंवा दिया है और दोनों पक्षों को मिलाकर 10 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं तथा लाखों लोग मारे गए हैं। ट्रंप ने कहा, “यह एक ऐसा युद्ध है जो कभी शुरू ही नहीं होना चाहिए था। और मुझे लगता है कि अब समय आ गया है जब यूक्रेन को एक नया राष्ट्रपति चुनना चाहिए।”

रूसी तेल रिफाइनरियों पर हमलों से नाराज ट्रंप

रूस की तेल रिफाइनरियों और ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर यूक्रेन के हमले ट्रंप और जेलेंसी के संबंधों में एक नया तनाव पैदा कर रहे हैं। ट्रंप ने इन हमलों को रोकने की जरूरत पर जोर देते हुए यूक्रेनी नेतृत्व को समझौते की राह अपनाने का संदेश दिया है। ट्रंप की टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब रूस से डीजल की वैश्विक बाजारों में आपूर्ति की अनुमति देने वाली एक व्यवस्था पर अमेरिका आगे बढ़ रहा है। ऐसे में रूस के ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े फैसले और यूक्रेन की सैन्य रणनीति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गए हैं।

जेलेंस्की के नेतृत्व पर उठाए सवाल

ट्रंप ने अपने बयान में केवल रूसी ऊर्जा ठिकानों पर हमलों का विरोध नहीं किया। बल्कि जेलेंस्की के नेतृत्व को लेकर भी टिप्पणी की। उन्होंने सुझाव दिया कि यूक्रेन को नया राष्ट्रपति चाहिए, जो किसी समझौते तक पहुंच सके। इस बयान को अमेरिका और यूक्रेन के बीच युद्ध को लेकर रणनीतिक मतभेदों के संदर्भ में देखा जा रहा है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में ट्रंप की टिप्पणी के बाद यूक्रेन सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया का डिटेल्स नहीं दिया गया है।

अमेरिका-यूक्रेन संबंधों पर क्या होगा असर?

ट्रंप का यह बयान रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर अमेरिकी प्रशासन के रुख और यूक्रेन की सैन्य कार्रवाई के बीच तनाव को उजागर करता है। एक ओर ट्रंप यूक्रेन से हमले रोककर समझौते की दिशा में बढ़ने की अपील कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर रूस से डीजल की वैश्विक आपूर्ति से जुड़ी व्यवस्था भी चर्चा में है। फिलहाल, इस बयान के बाद अमेरिका और यूक्रेन के संबंधों में आगे क्या बदलाव आएगा, यह दोनों देशों की आधिकारिक प्रतिक्रियाओं और आने वाले फैसलों पर निर्भर करेगा।

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Petrol Diesel Price Today: 11 अक्टूबर को पेट्रोल-डीजल के नए रेट जारी, जानें अपने शहर में आज के दाम

Petrol Diesel Price Today: हर दिन की शुरुआत सिर्फ सूरज की किरणों से नहीं होती, बल्कि पेट्रोल और डीजल की नई कीमतों से भी होती है, जो आम आदमी की जेब पर सीधा असर डालती हैं। सुबह 6 बजे देश की तेल विपणन कंपनियां (OMCs) ताजा दरें जारी करती हैं, जो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों और डॉलर-रुपए की विनिमय दर में आए बदलावों पर आधारित होती हैं। ये बदलाव रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करते हैं, चाहे वो ऑफिस जाने वाला व्यक्ति हो या फल-सब्जी बेचने वाला व्यापारी।

ऐसे में हर दिन की कीमतों की जानकारी रखना सिर्फ जरूरी ही नहीं, बल्कि समझदारी भी है। सरकार की यह प्रणाली पारदर्शिता सुनिश्चित करती है ताकि उपभोक्ताओं को किसी तरह की भ्रमित जानकारी न मिले।

आपके शहर में आज का पेट्रोल-डीजल का भाव

ये रहे 11 अक्टूबर 2026 के प्रमुख शहरों के पेट्रोल-डीजल के ताजा रेट

नई दिल्ली: पेट्रोल ₹102.12 प्रति लीटर और डीजल ₹95.20 प्रति लीटर।

मुंबई: पेट्रोल ₹111.18 और डीजल ₹97.83 प्रति लीटर।

कोलकाता: पेट्रोल ₹113.47 जबकि डीजल ₹99.82 प्रति लीटर।

चेन्नई: पेट्रोल ₹107.77 और डीजल ₹99.55 प्रति लीटर।

गुरुग्राम: पेट्रोल ₹102.77 तथा डीजल ₹95.44 प्रति लीटर।

नोएडा: पेट्रोल ₹102.12 और डीजल ₹95.56 प्रति लीटर।

बेंगलुरु: पेट्रोल ₹110.93 जबकि डीजल ₹98.80 प्रति लीटर।

भुवनेश्वर: पेट्रोल ₹109.92 और डीजल ₹100.92 प्रति लीटर।

चंडीगढ़: पेट्रोल ₹98.10 तथा डीजल ₹86.09 प्रति लीटर।

हैदराबाद: पेट्रोल ₹115.69 और डीजल ₹103.82 प्रति लीटर।

जयपुर: पेट्रोल ₹112.66 जबकि डीजल ₹97.78 प्रति लीटर।

लखनऊ: पेट्रोल ₹102.05 और डीजल ₹95.55 प्रति लीटर।

पटना: पेट्रोल ₹113.35 तथा डीजल ₹99.36 प्रति लीटर।

तिरुवनंतपुरम: पेट्रोल ₹115.49 और डीजल ₹104.40 प्रति लीटर।

पिछले दो साल से स्थिर क्यों हैं कीमतें?

मई 2022 के बाद से केंद्र और कई राज्यों द्वारा टैक्स में कटौती की गई, जिसके बाद पेट्रोल-डीजल की कीमतों में स्थिरता देखी जा रही है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव होता रहता है, फिर भी भारतीय उपभोक्ताओं के लिए कीमतें तुलनात्मक रूप से स्थिर बनी हुई हैं।

किन कारणों से तय होती हैं ईंधन की कीमतें?

  1. कच्चे तेल की कीमतें:

पेट्रोल और डीजल का उत्पादन मुख्य रूप से कच्चे तेल से होता है। जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो इसका असर सीधे भारतीय बाजार पर पड़ता है।

  1. डॉलर के मुकाबले रुपया:

भारत अधिकतर कच्चा तेल आयात करता है, और यह डॉलर में खरीदा जाता है। यदि रुपया कमजोर होता है, तो ईंधन महंगा हो जाता है।

  1. सरकारी टैक्स और शुल्क:

केंद्र और राज्य सरकारें पेट्रोल-डीजल पर भारी टैक्स लगाती हैं, जो खुदरा मूल्य का बड़ा हिस्सा होते हैं। यही कारण है कि राज्यों में कीमतों में अंतर होता है।

  1. रिफाइनिंग की लागत:

कच्चे तेल को इस्तेमाल लायक बनाने की प्रक्रिया (रिफाइनिंग) में भी खर्च होता है। ये लागत कच्चे तेल की गुणवत्ता और रिफाइनरी की क्षमता पर निर्भर करती है।

  1. मांग और आपूर्ति का संतुलन:

बाजार में ईंधन की मांग अगर बढ़ जाती है, तो कीमतें भी ऊपर जाने लगती हैं। खासकर त्योहारों, गर्मी या सर्दी के मौसम में ईंधन की खपत ज्यादा होती है।

कैसे करें अपने शहर की कीमतें SMS से चेक?

अगर आप मोबाइल से ईंधन की कीमत जानना चाहते हैं, तो ये प्रक्रिया आसान है:

Indian Oil ग्राहक: अपने शहर का कोड टाइप करें और उसे “RSP” के साथ 9224992249 पर भेजें।

BPCL ग्राहक: “RSP” लिखकर 9223112222 पर भेजें।

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Gold Price Today: एक हफ्ते में ₹2240 ऊपर चढ़ा गोल्ड, दिल्ली से चेन्नई तक 10 शहरों में सबसे सस्ता बिक रहा यहां

Gold Rate Today in India: आज रविवार को सोने-चांदी के भाव में कोई बदलाव नहीं हुआ। इससे पहले सोने की चमक लगातार दो दिनों बढ़ी थी और इन दो दिनों में 24 कैरट की शुद्धता वाला 10 ग्राम गोल्ड ₹1850 और 22 कैरट वाला ₹1700 महंगा हआ था। एक हफ्ते में 24 कैरट गोल्ड के भाव ₹2240 और 22 कैरट के ₹2050 ऊपर चढ़े हैं। अब चांदी की बात करें तो एक दिन उछलने के बाद आज इसके भाव में कोई बदलाव नहीं हुआ है।

सिटीवाइज गोल्ड के भाव

देश के 10 बड़े शहरों में 18 कैरट, 22 कैरट और 24 कैरट शुद्धता वाले 10 ग्राम सोने की कीमत क्या है, आइए जानते हैं…

शहर  24 कैरट 10 ग्राम गोल्ड भाव  22 कैरट 10 ग्राम गोल्ड भाव 18 कैरट 10 ग्राम गोल्ड भाव 
दिल्ली ₹1,51,570 ₹1,38,950 ₹1,13,720
मुंबई  ₹1,51,420 ₹1,38,800 ₹1,13,570
कोलकाता  ₹1,51,420 ₹1,38,800 ₹1,13,570
चेन्नई ₹1,51,420 ₹1,38,800 ₹1,11,400
बेंगलुरू  ₹1,51,420 ₹1,38,800 ₹1,13,570
हैदराबाद₹1,51,420 ₹1,38,800 ₹1,13,570
लखनऊ ₹1,51,570 ₹1,38,950 ₹1,13,720
पटना₹1,51,470 ₹1,38,850 ₹1,13,620
जयपुर ₹1,51,570 ₹1,38,950 ₹1,13,720
अहमदाबाद  ₹1,51,470  ₹1,38,850 ₹1,13,620

एक दिन उछलने के बाद फिर ठहरी चांदी

चांदी की बात करें तो 1 अक्टूबर को एक किलो चांदी के भाव ₹5 हजार गिरने के बाद से लगातार आठ दिनों तक इसके भाव स्थिर रहे और फिर 10 अक्टूबर को यह ₹5 हजार चढ़ा। फिर उसके बाद आज 11 अक्टूबर को दिल्ली में एक किलो चांदी की चमक में कोई बदलाव नहीं हुआ और यह ₹2,40,000 के भाव में बिक रही है। बाकी अहम महानगरों की बात करें तो मुंबई और कोलकाता में भी यह इसी भाव पर बिक रही है। हालांकि चेन्नई में एक किलो चांदी का भाव ₹2,45,000 है यानी कि चारों बड़े महानगरों में सबसे महंगी चांदी चेन्नई में बिक रही है।

क्या कहना है एक्सपर्ट का

सोने और चांदी की देश के अंदर कीमतें डोमेस्टिक फैक्टर्स के साथ-साथ ग्लोबल फैक्टर्स से भी प्रभावित होती हैं। मिरे एसेट शेयरखान में कमोडिटी मामलों के प्रमुख प्रवीण सिंह का मानना है कि आने वाले समय में सोने की कीमत सीमित दायरे में रह सकती है और इनमें मामूली तेजी बनी रह सकती है। हालांकि उन्होंने सतर्क भी किया है कि तेल की कीमतों में अचानक तेजी आने से सोने की कीमतों पर दबाव पड़ सकता है।

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