विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस: यदि दयालुता हमारा स्वभाव है, तो हिंसा कहाँ से आती है?

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस: यदि दयालुता हमारा स्वभाव है, तो हिंसा कहाँ से आती है?

shri shri ravishankar

– – गुरुदेव श्री श्री रविशंकर

हर व्यक्ति का स्वाभाविक स्वरूप दयालु, प्रेमपूर्ण, करुणामय और आनंदमय होता है। कोई भी बच्चा बिना किसी कारण के नहीं रोता। वह तभी रोता है जब उसे भूख लगी हो, नींद आ रही हो या वह भयभीत हो। इसी प्रकार, यदि कोई व्यक्ति हिंसक है तो उसके पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है। यदि किसी में करुणा का अभाव है तो उसके पीछे भी कोई कारण छिपा होता है। और यदि हम वास्तव में उसकी जड़ तक जाएँ, तो हमें वहाँ अकेलापन, भय, अस्वीकृति की भावना और अपनेपन का अभाव ही देखने को मिलेगा।

 

जब कोई व्यक्ति शारीरिक रूप से बीमार होता है तो हम उसे अस्पताल भेजते हैं; वहीं जब उसके व्यवहार में विकृति आ जाती है तो हम उसे जेल भेज देते हैं। लेकिन जेल भेजने के बाद भी हम उसे ऐसे साधन और तकनीकें उपलब्ध नहीं कराते, जिनसे वह अपने व्यवहार में सुधार ला सके और अपनी भावनाओं को समझकर उन्हें बदल सके।

 

आज दुनिया में होने वाली आधी से अधिक हिंसा के पीछे मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियाँ हैं। मानसिक स्वास्थ्य आज पूरे विश्व के सामने खड़ी सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। चाहे देश विकासशील हो या विकसित, क्षेत्र युद्धग्रस्त हो या शांतिपूर्ण समाज—यह संकट हम सभी को प्रभावित करता है। यह अत्यंत चिंताजनक विषय है कि विश्व में हर 42 सेकंड में एक व्यक्ति अपना जीवन समाप्त कर रहा है। असंख्य युवा या तो आक्रामक और हिंसक होते जा रहे हैं या फिर अवसाद (डिप्रेशन) का शिकार हो रहे हैं। भारत अपनी समृद्ध आध्यात्मिक परंपरा के माध्यम से इस वैश्विक मानसिक स्वास्थ्य संकट से निपटने में दुनिया का मार्गदर्शन कर रहा है।

 

सामान्यतः न तो घर पर और न ही विद्यालय में हमें अपनी भावनाओं को संभालना सिखाया जाता है। कभी-कभी अकेलापन महसूस होना स्वाभाविक है; पर्याप्त धन, परिवार और मित्र होने पर भी व्यक्ति भीतर से उदास या अकेला अनुभव कर सकता है। आज मानसिक स्वास्थ्य के एक बड़े संकट के रूप में उभर रहा यह अकेलापन इसलिए है, क्योंकि हमने स्वयं के साथ समय बिताना और अपने भीतर शांत रहना सीखा ही नहीं है। यदि हम यह कला सीख लें, तो हमारे भीतर का आनंद हमारे आसपास के प्रत्येक व्यक्ति तक स्वतः पहुँचने लगेगा।

 

यहाँ हमारी ‘श्वास’ (साँस) एक स्वस्थ मन की कुंजी बनती है। एक स्वस्थ मन के लक्षण क्या हैं? आपके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान जिसे कोई आपसे छीन न सके, और अपने भीतर एक ऐसा आत्मविश्वास कि आप किसी भी चुनौती का निर्भीकता से सामना कर सकें। स्वस्थ मन वह है जो रचनात्मक आलोचना को स्वीकार कर सके और स्वयं भी स्वस्थ व सकारात्मक आलोचना करने का साहस रखे। यह निर्भय होने के साथ-साथ विनम्र बने रहने की अद्भुत क्षमता है।

 

प्रत्येक भावना शरीर के किसी न किसी विशेष हिस्से में विशिष्ट संवेदनाएँ उत्पन्न करती है, और इसका सीधा संबंध हमारी श्वास से होता है। जब हम उदास होते हैं तब हमारी श्वास की गति व ढंग अलग होता है, और जब हम प्रसन्न होते हैं तब वह भिन्न होता है।

 


जब आप क्रोधित, निराश या ईर्ष्यालु होते हैं, तो प्रायः यह समझ नहीं आता कि उन नकारात्मक भावनाओं का क्या करें, और हम उन्हें अपने भीतर ही दबाकर रखते हैं। लेकिन आपकी श्वास मानो आपसे कह रही होती है— “मैं दिन-रात तुम्हारे भीतर प्रवाहित होती रहती हूँ। यदि तुम मुझ पर थोड़ा-सा ध्यान दे दो, तो मैं तुम्हें प्रसन्न रखूँगी, तुम्हारी आत्मा को ऊर्जावान व प्रफुल्लित रखूँगी और तुम्हारी जीवन-ऊर्जा को जीवंत बनाए रखूँगी।”

 

आज दुनिया भर में करोड़ों लोगों ने सरल श्वास तकनीकों और ध्यान (Meditation) को अपनाया है, जिससे उनके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आया है। उदाहरण के लिए, ‘सुदर्शन क्रिया’ ने अनेक लोगों को निराशा और चिंता से उबरने में सहायता की है। ये तकनीकें हमें अपने मन का स्वामी बनना सिखाती हैं, न कि अपने ही मन का शिकार बने रहना।