ITR Filing 2026: आखिरी मौके पर फाइल कर रहे रिटर्न? ये चीजें जरूर चेक करें, वरना बढ़ जाएगा नोटिस और रिफंड में देरी का खतरा

ITR Filing 2026: 31 जुलाई ITR फाइल करने की आखिरी तारीख है। ऐसे में ज्यादातर लोग जल्दबाजी में रिटर्न भर रहे हैं। लेकिन सिर्फ रिटर्न फाइल करना काफी नहीं है। ‘Submit’ बटन दबाने से पहले अगर कुछ जरूरी बातें चेक कर लें, तो बाद में रिफंड अटकने, नोटिस आने या रिटर्न दोबारा भरने जैसी परेशानी से बच सकते हैं।

सही ITR फॉर्म चुना है या नहीं?

सबसे पहले देख लें कि आपने अपनी कमाई के हिसाब से सही ITR फॉर्म चुना है या नहीं। गलत फॉर्म भरने पर आपका रिटर्न डिफेक्टिव माना जा सकता है। इसके साथ ही PAN, आधार, बैंक अकाउंट, मोबाइल नंबर और ईमेल जैसी जानकारी भी एक बार जरूर मिला लें।

ClearTax की टैक्स एक्सपर्ट चांदनी आनंदन कहती हैं कि रिटर्न सबमिट करने से पहले ITR फॉर्म, PAN, बैंक अकाउंट, आय, TDS, AIS, Form 26AS, डिडक्शन और टैक्स चालान जैसी सभी जानकारियां एक बार जरूर जांच लें। इससे बाद में परेशानी नहीं होगी।

AIS, TIS और Form 26AS से मिलान करें

रिटर्न भरने से पहले AIS, TIS और Form 26AS में दर्ज जानकारी का ITR से मिलान जरूर करें।

आपकी सैलरी, बैंक का ब्याज, कैपिटल गेन, शेयरों के सौदे और TDS का रिकॉर्ड इन तीनों में सही होना चाहिए। अगर कहीं कोई फर्क दिखे, तो पहले उसे ठीक करें। उसके बाद ही रिटर्न फाइल करें।

सिर्फ प्री-फिल्ड डेटा पर भरोसा न करें

ITR में पहले से भरी जानकारी देखकर निश्चिंत न हो जाएं। AQUILAW के लीड कंसल्टेंट राकेश गोयल का कहना है कि डिडक्शन का दावा तभी करें, जब उसके दस्तावेज आपके पास हों। कैपिटल गेन की सही कैलकुलेशन करें। अगर कोई टैक्स-फ्री आय है, तो उसे भी जरूर दिखाएं। क्योंकि कानून के हिसाब से सही रिटर्न भरने की जिम्मेदारी आपकी ही होती है, सिस्टम की नहीं।

ई-वेरिफिकेशन करना बिल्कुल न भूलें

कई लोग ‘Submit’ पर क्लिक करते ही मान लेते हैं कि काम पूरा हो गया। जबकि ऐसा नहीं है। ITR तभी पूरा माना जाता है, जब तय समय के भीतर उसका ई-वेरिफिकेशन भी कर दिया जाए। राकेश गोयल के मुताबिक, अगर आपने ई-वेरिफिकेशन नहीं किया, तो आयकर विभाग आमतौर पर उसे ऐसे मानता है जैसे रिटर्न कभी फाइल ही नहीं किया गया।

इसलिए ‘Submit’ दबाने से पहले दो-तीन मिनट जरूर निकालें। सारी जानकारी एक बार फिर देख लें। इतनी सी सावधानी आपको बाद की बड़ी परेशानी से बचा सकती है।

आपके PF का पैसा EPFO कहां निवेश करता है, आपको तगड़ा ब्याज कैसे मिलता है? समझिए पूरा हिसाब

Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।

Waaree Energies Q1 Results: सोलर कंपनी को ₹850 करोड़ का मुनाफा, अमेरिका में मिली बड़ी राहत

Waaree Energies Q1 Results: रिन्यूएबल एनर्जी कंपनी वारी एनर्जीज ने जून तिमाही के मजबूत नतीजे जारी किए हैं। कंपनी का कंसोलिडेटेड शुद्ध मुनाफा 850 करोड़ रुपये रहा। पिछले साल की समान तिमाही में यह 745 करोड़ रुपये था। वहीं, मार्च तिमाही में कंपनी ने 773 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया था। इस तरह मुनाफा सालाना आधार पर 14.09% और तिमाही आधार पर 9.96% बढ़ा।

रेवेन्यू में 79% की बढ़ोतरी

जून तिमाही में वारी एनर्जीज का ऑपरेशन से रेवेन्यू 7,932 करोड़ रुपये रहा। एक साल पहले यह 4,426 करोड़ रुपये था। मार्च तिमाही में भी कंपनी का रेवेन्यू 4,426 करोड़ रुपये रहा था। इस तरह रेवेन्यू में सालाना और तिमाही, दोनों आधार पर करीब 79% की बढ़ोतरी दर्ज हुई।

जून तिमाही में कंपनी का EBITDA बढ़कर 1,440 करोड़ रुपये हो गया। पिछली तिमाही में यह 997 करोड़ रुपये था। यानी तिमाही आधार पर इसमें 44.4% की बढ़ोतरी हुई। हालांकि, EBITDA मार्जिन घटकर 18.2% रह गया। मार्च तिमाही में यह 22.5% था।

अमेरिका से मिला बड़ा फायदा

वारी एनर्जीज ने बताया कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद उसे बड़ा फायदा मिला है। कोर्ट ने एक्सपोर्टर्स पर लगाए गए रेसिप्रोकल ड्यूटी को गैरकानूनी करार दिया था।

इसके बाद अमेरिकी कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन (CBP) ने रिफंड क्लेम स्वीकार किए। इसी के आधार पर वारी एनर्जीज ने 349.18 करोड़ रुपये को अन्य ऑपरेटिंग रेवेन्यू के तौर पर दर्ज किया। इसके अलावा, कंपनी ने 25.13 करोड़ रुपये को एसेट्स और इन्वेंट्री की लागत में कमी के रूप में भी दर्ज किया।

वारी एनर्जीज के शेयरों का हाल

वारी एनर्जीज का शेयर बुधवार को 1.59% की बढ़त के साथ 2,738 रुपये पर बंद हुआ। पिछले 6 महीने से स्टॉक लगभग फ्लैट है। वहीं, 1 साल में इसने 14.06% का रिटर्न दिया है। कंपनी का मार्केट कैप 78.71 हजार करोड़ रुपये है।

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Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।

विदेश में बसने का सपना देखने वालों की आंखें खुल जाएंगी! पेरिस में रहने वाले तनिष्क ने बताई इस सपने के पीछे की असली कीमत

विदेश जाकर अच्छी नौकरी, ज्यादा कमाई और बेहतर जीवन जीने का सपना कई भारतीय देखते हैं। वहीं सोशल मीडिया पर विदेश की चमक-दमक और शानदार लाइफस्टाइल देखकर ऐसा लगता है कि वहां सब कुछ कितना आसान है। लेकिन सच्चाई हमेशा ऐसी नहीं होती है। हाल ही में सोशल मीडिया पर पेरिस में रहने वाले एक भारतीय युवक का वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो में युवक ने बताया कि, विदेश में रहने का फैसला सोच-समझकर लेना चाहिए। सोशल मीडिया पर दिखने वाली चमक-दमक देखकर कोई बड़ा फैसला न लें, बल्कि हर पहलू को समझने के बाद ही विदेश जाने का निर्णय करें।

विदेश में बसने वाले लोगों को दी सलाह

इंस्टाग्राम पर शेयर किए गए एक वीडियो में तनिष्क लोहान ने बताया कि विदेश जाने की सोच रखने वाले कई भारतीय युवाओं को अक्सर एक जैसी सलाह दी जाती है। उन्होंने कहा, “लोग कहते हैं कि कुछ साल के लिए भारत छोड़ दो। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया या किसी भी दूसरे देश चले जाओ। वहां पार्ट-टाइम नौकरी करके हर महीने 2 से 3 हजार यूरो कमा सकते हो। फिर जब फुल-टाइम नौकरी मिल जाएगी, तो जिंदगी पूरी तरह सेट हो जाएगी।”

लोहान ने कहा कि, इस तरह की बातें सुनकर कई लोग विदेश जाने का फैसला कर लेते हैं, लेकिन उन्हें पूरी सच्चाई नहीं बताई जाती। उन्होंने आगे कहा, “अगर आप भी ऐसी बातें सुनकर प्रेरित हो रहे हैं और विदेश आने की सोच रहे हैं, तो पहले इसकी असली हकीकत भी जान लें।”

परिवार से दूर रहना पड़ता है

तनिष्क लोहान ने बताया कि विदेश में पढ़ाई करने का खर्च सिर्फ कॉलेज की फीस और हवाई टिकट तक सीमित नहीं होता। उनके अनुसार, कई छात्र पढ़ाई के लिए 50 से 60 लाख रुपये या उससे भी अधिक का एजुकेशन लोन लेते हैं। वहीं, कुछ परिवार अपने बच्चों का सपना पूरा करने के लिए अपनी जमा-पूंजी खर्च कर देते हैं या अपनी संपत्ति तक बेच देते हैं। उनके मुताबिक, विदेश जाने से पहले इन आर्थिक जिम्मेदारियों को अच्छी तरह समझना बेहद जरूरी है। लोहान ने कहा कि, विदेश में बसने की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ पैसों की नहीं, बल्कि इमोशनल भी होती है। दूसरे देश में रहने का मतलब परिवार, रिश्तेदारों और दोस्तों से दूर रहना होता है।

नए माहौल में ढलना आसान नहीं होता

इसके साथ ही नई भाषा, अलग संस्कृति और नए माहौल में खुद को ढालते हुए करियर की शुरुआत भी करनी पड़ती है। लोहान ने कहा कि, विदेश में पढ़ाई के साथ पार्ट-टाइम नौकरी करना, पढ़ाई और काम के बीच बैलेंस बनाए रखना, अच्छी फुल-टाइम नौकरी हासिल करना और नए माहौल में खुद को ढालना आसान नहीं होता। इन सबके लिए समय, धैर्य और लगातार मेहनत करनी पड़ती है। उनका कहना है कि इन चुनौतियों पर अक्सर खुलकर बात नहीं होती।

 

उन्होंने कहा, “अगर आप विदेश आते हैं, तो यहां अपने लिए एक बेहतर जिंदगी बना सकते हैं। लेकिन इसके लिए आपको धैर्य, मेहनत और लगातार कोशिश करनी होगी। हर दिन खुद को यह भरोसा दिलाना होगा कि आप कड़ी मेहनत करेंगे और अपने लक्ष्य को जरूर हासिल करेंगे।” उन्होंने ये भी कहा कि, विदेश की जिंदगी सिर्फ घूमने-फिरने और छुट्टियां मनाने तक सीमित नहीं होती। उन्होंने कहा, “अच्छे पल भी आते हैं, लेकिन उनसे पहले आपको बहुत मेहनत करनी पड़ती है।”

सोशल मीडिया पर लोगों ने दिया रिएक्शन

इस वीडियो को सोशल मीडिया पर लोगों की मिली-जुली लेकिन पॉजिटिव रिएक्शन मिले हैं। कई यूजर्स ने कहा कि यह वीडियो विदेश में रहने की सिर्फ सफलता की कहानियां नहीं, बल्कि वहां की असली चुनौतियों को भी सामने रखता है। एक यूजर ने लिखा, “बहुत शानदार बात कही दोस्त।” वहीं दूसरे ने कहा, “अक्सर लोग सिर्फ एक ही पहलू बताते हैं कि विदेश जाना चाहिए या नहीं जाना चाहिए। लेकिन इस वीडियो ने पूरी तस्वीर दिखाने की कोशिश की है।”

एक अन्य यूजर ने कमेंट किया, “मेहनत किए बिना कहीं भी सफलता नहीं मिलती। अगर कम्फर्ट जोन में रहकर ही सब कुछ पाना है, तो फिर विदेश जाने का सोचने का क्या मतलब?” कई अन्य लोगों ने भी माना कि विदेश में बेहतर अवसर जरूर मिल सकते हैं, लेकिन वहां सफल होने के लिए धैर्य और लगातार मेहनत सबसे ज़्यादा जरूरी होती है।

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आपके PF का पैसा EPFO कहां निवेश करता है, आपको तगड़ा ब्याज कैसे मिलता है? समझिए पूरा हिसाब

हर महीने आपकी सैलरी से PF कटता है। फिर EPFO उसी पैसे को अलग-अलग जगह निवेश करता है। वहीं से कमाई होती है और उसी कमाई के दम पर EPFO अपने करोड़ों सदस्यों को 8.25% जैसी आकर्षक ब्याज दर देता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि 31 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का यह विशाल फंड आखिर संभालता कौन है?

जवाब आपको चौंका सकता है। दरअसल, EPFO इस निवेश का बड़ा हिस्सा खुद मैनेज नहीं करता, बल्कि पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज (PMS) के जरिए प्रोफेशनल फंड मैनेजर को सौंपता है।

PMS आखिर क्या होते हैं?

पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज (PMS) का नाम आते ही ज्यादातर लोगों के दिमाग में अमीर निवेशकों की तस्वीर आती है। लेकिन हकीकत कुछ और है।

SEBI के जून 2026 के आंकड़े एक दिलचस्प तस्वीर दिखाते हैं। PMS इंडस्ट्री के 36.72 लाख करोड़ रुपये में से करीब 31.04 लाख करोड़ रुपये, यानी लगभग 85% पैसा EPFO और दूसरे प्रोविडेंट फंड्स का है। इससे साफ है कि PMS सिर्फ अमीर निवेशकों के लिए नहीं है। बड़े संस्थान भी अपने हजारों-लाखों करोड़ रुपये इसी के जरिए निवेश करते हैं।

EPFO PMS का इस्तेमाल क्यों करता है?

EPFO करोड़ों नौकरीपेशा लोगों की रिटायरमेंट की बचत संभालता है। उसका मकसद ज्यादा मुनाफा कमाना नहीं है। उसकी पहली जिम्मेदारी लोगों का पैसा सुरक्षित रखना है। साथ ही, लंबे समय तक स्थिर रिटर्न देना भी जरूरी है।

इसी वजह से EPFO निवेश की जिम्मेदारी SEBI-रजिस्टर्ड पोर्टफोलियो मैनेजर को देता है। हालांकि, निवेश से जुड़े बड़े फैसलों पर नजर EPFO और सेंट्रल बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज (CBT) की ही रहती है।

नियमों के मुताबिक, EPFO अपने पैसे का 45% से 65% सरकारी बॉन्ड, 35% से 45% कॉरपोरेट बॉन्ड और दूसरे डेट इंस्ट्रूमेंट में लगाता है। वहीं, 15% तक पैसा इक्विटी में लगाया जा सकता है। यह निवेश भी ज्यादातर इंडेक्स ETF के जरिए होता है।

पैसा बाहर के एक्सपर्ट क्यों संभालते हैं?

31 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का फंड संभालना आसान नहीं है। इसके लिए डेट मार्केट की गहरी समझ चाहिए। जोखिम का आकलन करना पड़ता है। हर दिन बाजार पर नजर रखनी होती है।

अगर EPFO यह पूरा काम खुद करे तो उसे बहुत बड़ा निवेश सेटअप तैयार करना पड़ेगा। इसलिए वह यह जिम्मेदारी प्रोफेशनल पोर्टफोलियो मैनेजर को देता है।

EPFO एक नहीं, कई पोर्टफोलियो मैनेजर नियुक्त करता है। उनकी नियुक्ति बोली प्रक्रिया से होती है। प्रदर्शन की लगातार समीक्षा होती है। जो बेहतर काम करता है, उसे ज्यादा फंड मिलता है। खराब प्रदर्शन करने वाले मैनेजर अपना काम भी गंवा सकते हैं।

chart epfo

आम निवेशक क्या सीख सकते हैं?

एक्सपर्ट्स का कहना है कि कि EPFO का पोर्टफोलियो कॉपी करने की जरूरत नहीं है। लेकिन उसकी निवेश करने की सोच जरूर अपनाई जा सकती है।

सबसे बड़ी सीख है अनुशासन। पहले तय करें कि कितना पैसा इक्विटी में रखना है और कितना डेट में। फिर बाजार के उतार-चढ़ाव को देखकर बार-बार फैसला न बदलें। SIP करते रहें और समय-समय पर पोर्टफोलियो को रीबैलेंस करें।

दूसरी बात, अगर निवेश की ज्यादा समझ नहीं है तो म्यूचुअल फंड या ETF जैसे प्रोफेशनल विकल्प चुनें। हर शेयर खुद खरीदना जरूरी नहीं होता।

तीसरी सीख है कि सिर्फ रिटर्न के पीछे न भागें। रिस्क पर भी बराबर ध्यान दें। पूरा पैसा एक ही शेयर, सेक्टर या कम गुणवत्ता वाले बॉन्ड में लगाना समझदारी नहीं है।

EPFO की रणनीति हर किसी के लिए सही नहीं

EPFO का पोर्टफोलियो उसकी जिम्मेदारियों को ध्यान में रखकर बनाया जाता है। आम निवेशकों की जरूरतें अलग होती हैं। खासकर युवा निवेशकों को लंबी अवधि में संपत्ति बनाने के लिए ज्यादा इक्विटी की जरूरत पड़ सकती है।

एक और बड़ा फर्क टैक्स का है। PMS में हर खरीद और बिक्री पर टैक्स लग सकता है। वहीं, म्यूचुअल फंड में आमतौर पर यूनिट बेचने तक टैक्स नहीं देना पड़ता। इसलिए बिना सोचे-समझे EPFO की निवेश रणनीति अपनाना हर निवेशक के लिए सही नहीं होगा।

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Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।

Bajaj Housing Q1 Results: बजाज ग्रुप की कंपनी को ₹715 करोड़ का मुनाफा, शेयरों पर रहेगी नजर

Bajaj Housing Q1 Results: बजाज ग्रुप की दिग्गज कंपनी बजाज हाउसिंग फाइनेंस ने जून तिमाही में मजबूत नतीजे पेश किए हैं। हाउसिंग फाइनेंस कंपनी का शुद्ध मुनाफा 22.6% बढ़कर 715 करोड़ रुपये हो गया। पिछले साल की समान तिमाही में यह 583 करोड़ रुपये था। बेहतर कारोबार और लोन पर कम प्रावधान का फायदा नतीजों में दिखा।

NII और रेवेन्यू दोनों बढ़े

जून तिमाही में बजाज हाउसिंग फाइनेंस की नेट इंटरेस्ट इनकम (NII) 9% बढ़कर 968 करोड़ रुपये रही। एक साल पहले यह 887 करोड़ रुपये थी।

वहीं, नेट टोटल इनकम 16% बढ़कर 1,175 करोड़ रुपये हो गई। पिछले साल यह 1,009 करोड़ रुपये थी। इस हाउसिंग फाइनेंस कंपनी का रेवेन्यू भी 17.2% बढ़कर 3,063 करोड़ रुपये पहुंच गया। एक साल पहले यह 2,613 करोड़ रुपये था।

AUM 24% बढ़ा

30 जून 2026 तक बजाज हाउसिंग फाइनेंस का एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) 24% बढ़कर 1,49,624 करोड़ रुपये हो गया। पिछले साल यह 1,20,420 करोड़ रुपये था।

तिमाही के दौरान फर्म की ऑपरेटिंग एफिशिएंसी बेहतर हुई। ऑपरेटिंग खर्च और नेट टोटल इनकम का अनुपात घटकर 19.6% रह गया। पिछले साल यह 21.2% था। वहीं, लोन लॉस और प्रावधान घटकर 16 करोड़ रुपये रह गए। एक साल पहले यह 38 करोड़ रुपये थे।

एसेट क्वालिटी मजबूत रही

बजाज हाउसिंग फाइनेंस की ग्रॉस एनपीए (GNPA) 30 जून 2026 तक 0.29% रही। पिछले साल यह 0.30% थी। वहीं, नेट एनपीए (NNPA) घटकर 0.12% रह गया। एक साल पहले यह 0.13% था। स्टेज-3 एसेट्स पर प्रोविजनिंग कवरेज रेशियो 59% रहा।

जून तिमाही के आखिर में हाउसिंग फाइनेंस कंपनी का कैपिटल एडिक्वेसी रेशियो (Tier-II पूंजी सहित) 21.59% रहा। यह मजबूत बैलेंस शीट की ओर इशारा करता है।

बजाज हाउसिंग फाइनेंस क्या करती है?

बजाज हाउसिंग फाइनेंस, बजाज फाइनेंस की सब्सिडियरी है। यह हाउसिंग लोन देने वाली नॉन-डिपॉजिट टेकिंग हाउसिंग फाइनेंस कंपनी है। इसे 2015 में नेशनल हाउसिंग बैंक (NHB) से रजिस्ट्रेशन मिला था।

इसने 2017 में कारोबार शुरू किया। बजाज हाउसिंग फाइनेंस के शेयर सितंबर 2024 से NSE और BSE पर लिस्टेड हैं। कंपनी का रेगुलेशन RBI, SEBI और IRDAI करते हैं, जबकि NHB इसकी निगरानी करता है।

बजाज हाउसिंग के शेयरों का हाल

जून तिमाही के नतीजों से पहले बजाज हाउसिंग फाइनेंस का शेयर 2.6% की बढ़त के साथ 87.89 रुपये पर बंद हुआ। हालंकि, पिछले 1 साल में स्टॉक 24.18% गिरा है। कंपनी का मार्केट कैप 72.94 हजार करोड़ रुपये है।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

पर्सनल लोन लेने से पहले इन बातों का जरूर रखें ध्यान

पर्सनल लोन एक फ्लेक्सिबल फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट है, जो लोगों को बड़े खर्चों जैसे शिक्षा, शादी, वेकेशन, घर का रेनोवेशन, मेडिकल बिल या गैजेट खरीदने में मदद करता है. यह फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट क्रेडिट कार्ड के मुकाबले एक किफायती विकल्प है और लोन अमाउंट को मासिक किस्तों (EMIs) में चुकाने की सुविधा देता है.

हालांकि, इस लोन के लिए अप्लाई करने से पहले क्रेडिट स्कोर, इंटरेस्ट रेट और एक्स्ट्रा चार्ज जैसे फैक्टर पर ध्यान देना भी जरूरी है. इससे आप कुछ आम गलतियों से बच सकते हैं, जैसे गलत लेंडर चुन लेना, गलत लोन टेन्योर लेना या जरूरत से ज्यादा लोन लेना.

किसी भी फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन से पर्सनल लोन लेने से पहले इन बातों का जरूर ध्यान रखें:  

1. अलग-अलग मार्केट इंटरेस्ट रेट की तुलना करें

अलग-अलग लेंडर के इंटरेस्ट रेट की तुलना करने से आपको सबसे कम रेट वाला लोन मिल सकता है. BankBazaar, Paisabazaar और MyLoanCare जैसे प्लेटफॉर्म इस तुलना को आसान बनाते हैं.

सस्ते इंटरेस्ट रेट और सही इंटरेस्ट टाईप (जैसे फिक्स्ड या फ्लोटिंग) चुनने से लोन रीपेमेंट आसान हो जाता है.

मनीकंट्रोल (Moneycontrol) ऐप और वेबसाइट पर आप 10+ लेंडर के पर्सनल लोन ऑफर की तुलना कर सकते हैं. यहां इंटरेस्ट रेट सिर्फ 9.99% सालाना से शुरू होते हैं, और आप 50 लाख रुपए तक का लोन पूरी तरह डिजिटल प्रोसेस के जरिए ले सकते हैं.

2. लोन अमाउंट, टेन्योर और रीपेमेंट

लोन अमाउंट, टेन्योर और पेमेंट सीधे तौर पर EMI को प्रभावित करते हैं. सही अमाउंट, फ्लेक्सिबल टेन्योर और मैनेज करने योग्य EMI चुनने से आप अपनी जरूरत और बजट के हिसाब से सही लोन चुन सकते हैं.

3. हेल्दी क्रेडिट हिस्ट्री बनाए रखें

आपकी क्रेडिटवर्थिनेस आपकी क्रेडिट हिस्ट्री से तय होती है, जिसे CIBIL स्कोर कहा जाता है. आपका स्कोर कम-से-कम 700 या इससे ज्यादा होना चाहिए.

कोई भी बकाया समय पर चुकाने से क्रेडिट स्कोर अच्छा बना रहता है. अगर आपका स्कोर कम है तो लोन एप्लिकेशन रिजेक्ट हो सकती है या आपको ऊंचे इंटरेस्ट रेट पर लोन मिल सकता है.

4. लोन से जुड़े हर खर्च का आकलन करें

लोन लेने से पहले उससे जुड़े सभी खर्च जैसे प्रोसेसिंग फीस, प्रीपेमेंट चार्ज और लेट पेमेंट पेनल्टी पर गौर करें. इससे आपको कुल खर्च का सही आकलन मिलेगा और आप बेहतर फाइनेंशियल प्लानिंग कर पाएंगे.

5. सही लोन अमाउंट चुनें

लोन अमाउंट अपनी जरूरत और खर्चों के हिसाब से तय करें. अगर आपकी जरूरतें और खर्च अनिश्चित हैं, तो फ्लेक्सी पर्सनल लोन एक अच्छा विकल्प हो सकता है.

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6. रीपेमेंट की क्षमता जांचें

लोन अप्लाई करने से पहले यह जरूर देख लें कि आपकी इनकम लोन को समय पर चुकाने के लिए काफी है या नहीं. पर्सनल लोन EMI कैलकुलेटर जैसे टूल का इस्तेमाल करके आप मासिक किस्तों का अंदाजा लगा सकते हैं. ऐसा करने से, बाकी फाइनेंशियल लायबिलिटी से समझौता किए बिना EMI प्लान करना आसान हो जाता है.

7. धोखाधड़ी वाले ऑफर और सर्विस से बचें

ऐसे ऑफर जो बहुत ज्यादा किफायती या आकर्षक लग रहे हैं, उनसे सावधान रहें. ऑफर का फाइन प्रिंट जरूर पढ़ें ताकि हिडन चार्ज या अचानक आने वाले खर्चों से बचा जा सके. साथ ही यह भी सुनिश्चित करें कि लोन की शर्तें साफ और समझने योग्य हैं.

कुछ लेंडर सस्ते इंटरेस्ट रेट का दावा करते हैं लेकिन बाद में एक्स्ट्रा फीस जोड़ देते हैं. इसलिए हमेशा ऐसे लेंडर को चुनें जो पारदर्शी और ईमानदार हो.

8. लेंडर की रेप्यूटेशन और कस्टमर सर्विस चेक करें

लोन लेने से पहले लेंडर की मार्केट रेप्यूटेशन और उनकी कस्टमर सर्विस की क्वालिटी पर रिसर्च करें. इसके लिए आप RBI की वेबसाइट, Trustpilot या Google Reviews पर कस्टमर रिव्यू और रेटिंग देख सकते हैं.

एक भरोसेमंद लेंडर का चुनाव आपके लोन एक्सपीरियंस को आसान और सुरक्षित बनाता है.

कुल मिलाकर, पर्सनल लोन लेते समय इंटरेस्ट रेट, टेन्योर, रीपेमेंट क्षमता, हिडन फीस और लेंडर की रेप्यूटेशन जैसे फैक्टर का ध्यान रखना बेहद जरूरी है. अलग-अलग ऑफर की तुलना कर, अच्छा क्रेडिट स्कोर बनाए रखकर और लोन की शर्तें समझकर आप अपनी फाइनेंशियल जरूरत के लिए सबसे बेहतर फैसला ले सकते हैं.

मनीकंट्रोल के ऑनलाइन लेंडिंग प्लेटफॉर्म पर आप 10+ लेंडर से 50 लाख रुपए तक का पर्सनल लोन ले सकते हैं. इन पर इंटरेस्ट रेट सिर्फ 9.99% सालाना से शुरू होते हैं. यह प्रोसेस 100% पेपरलेस है.

Renting vs Buying: घर खरीदें या किराये पर रहें? जानिए EMI, रेंट रेश्यो और रिटर्न का पूरा गणित

Buying vs Renting Real Estate Guide: बड़े शहरों जैसे मुंबई, दिल्ली-एनसीआर, बेंगलुरु या पुणे में घर खरीदना लोगों का सपना होता है। कई लोग इसे ‘इमोशनल ओनरशिप’ से जोड़कर देखते हैं, तो कुछ लोग इसे केवल ‘फाइनेंशियल रिटर्न’ के नजरिए से देखते हैं।

लेकिन क्या मेट्रो शहरों में आज की तारीख में घर खरीदना फायदे का सौदा है, या फिर किराये पर रहकर पैसों को शेयर बाजार या अन्य ऑप्शन में निवेश करना ज्यादा समझदारी है? आइए इसे EMI-to-Rent Ratio, रेंटल यील्ड और रियल-लाइफ कैलकुलेशन से समझते हैं।

किराए पर रहना vs घर खरीदना: गणित क्या कहता है?

इसे समझने के लिए ₹1 करोड़ की कीमत वाले 2BHK फ्लैट का उदाहरण लेते हैं:

सिनेरियो A: अगर आप घर खरीदते हैं

प्रॉपर्टी की कीमत: ₹1 करोड़

डाउन पेमेंट (20%): ₹20 लाख (अपनी बचत से)

होम लोन (80%): ₹80 लाख (8.5% ब्याज दर पर 20 साल के लिए)

मासिक EMI: लगभग ₹69,400 प्रति महीना

अन्य खर्च: मेंटेनेंस, प्रॉपर्टी टैक्स, स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन कॉस्ट (₹6-8 लाख एक्स्ट्रा)।

20 साल में कुल भुगतान: ₹80 लाख के लोन पर आप 20 साल में लगभग ₹86.5 लाख केवल ब्याज देंगे। यानी कुल भुगतान ₹1.66 करोड़ होगा (प्रिंसिपल + इंटरेस्ट)।

सिनेरियो B: अगर आप किराये पर रहते हैं और बाकी पैसा इन्वेस्ट करते हैं

मासिक किराया: भारत के मेट्रो शहरों में औसतन रेंटल यील्ड 2.5% से 3% होती है। यानी ₹1 करोड़ के मकान का मासिक किराया लगभग ₹22,000 से ₹25,000 होगा।

बचत (EMI vs Rent Diff): EMI (₹69,400) और Rent (₹25,000) के बीच का अंतर = ₹44,400 प्रति महीना।

डाउन पेमेंट की बचत: डाउन पेमेंट के ₹20 लाख भी आपके पास निवेश के लिए बचते हैं।

कंपाउंडिंग का जादू: अगर आप ₹20 लाख जो डाउन पेमेंट की बचत से हुआ है उसे म्यूचुअल फंड में 12% सालाना रिटर्न पर 20 साल के लिए इन्वेस्ट करते हैं, तो यह रकम बढ़कर लगभग ₹1.93 करोड़ हो जाती है।

साथ ही अगर आप हर महीने बची हुई ₹44,400 की SIP (12% रिटर्न के साथ) 20 साल तक करते हैं, तो इससे लगभग ₹4.43 करोड़ का फंड तैयार होता है। 20 साल बाद आपकी कुल वेल्थ ₹6.36 करोड़ होगी जो टैक्स और सालाना रेंट हाइक एडजस्ट करने के बाद भी एक बड़ा कॉर्पस आपके पास होगा।

EMI-to-Rent Ratio: क्या कहता है यह फॉर्मूला?

EMI-to-Rent Ratio यह तय करने का एक आसान तरीका है कि आपको घर खरीदना चाहिए या किराये पर रहना चाहिए:

EMI-to-Rent Ratio= मंथली Rent/ मंथली EMI

अनुपात 1 से 1.5 के बीच: अगर आपकी EMI और रेंट लगभग बराबर हैं, तो घर खरीदना ज्यादा बेहतर विकल्प है।

अनुपात 2.5 से अधिक: बड़े शहरों में अक्सर EMI (₹70,000) किराए (₹25,000) से 2.8 गुना अधिक होती है। जब अनुपात इतना ज्यादा हो, तो वित्तीय दृष्टि से किराये पर रहना और सरप्लस पैसे को इन्वेस्ट करना ज्यादा फायदेमंद माना जाता है।

Renting vs Buying: घर खरीदें या किराये पर रहें?

Renting vs Buying: घर खरीदें या किराये पर रहें? जानिए EMI, रेंट रेश्यो और रिटर्न का पूरा गणित

इमोशनल ओनरशिप बनाम फाइनेंशियल प्रैक्टिकैलिटी

भारत में घर सिर्फ एक एसेट नहीं है, बल्कि एक सामाजिक प्रतिष्ठा और मानसिक सुरक्षा से जुड़ा विषय है। ये रहे खुद के घर के फायदे:

  • सुरक्षा का अहसास: आपको कोई मकान मालिक खाली करने को नहीं कह सकता।
  • अपने हिसाब से बदलाव: आप इंटीरियर, रेनोवेशन या बदलाव अपनी पसंद से कर सकते हैं।
  • रिटायरमेंट एसेट: बुढ़ापे में रहने के लिए सिर पर पक्की छत रहती है।

किराये के घर के फायदे

  • जॉब फ्लेक्सिबिलिटी: अगर आपकी नौकरी बेंगलुरु से गुड़गांव शिफ्ट होती है, तो आप बिना किसी परेशानी के मूव कर सकते हैं।
  • बेहतर लोकेशन: जितने किराए में आप किसी प्रीमियम लोकेशन पर रह सकते हैं, उतना महंगा घर खरीदना आपकी क्षमता से बाहर हो सकता है।

आपके लिए क्या सही है?

आपको घर तब खरीदना चाहिए जब आपके पास इनकम का परमानेंट सोर्स हो, आप अगले 10-15 साल उसी शहर में बसना चाहते हैं, आपके पास डाउन पेमेंट का पर्याप्त फंड है, और आपके लिए मानसिक शांति वित्तीय रिटर्न से ज्यादा मायने रखती है।

वहीं आपको किराये पर तब रहना चाहिए जब आपकी उम्र 20-35 साल के बीच है, करियर में ग्रोथ और सिटी चेंज की संभावना है, और आप बचे हुए पैसों (EMI और रेंट के अंतर) को अनुशासित तरीके से शेयर बाजार या म्यूचुअल फंड में इन्वेस्ट कर सकते हैं।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

L&T Q1 Results: इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी को ₹4123 करोड़ मुनाफा, ऑर्डर बुक ₹7.79 लाख करोड़ तक पहुंची

L&T Q1 Results: देश की प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर और इंजीनियरिंग कंपनी लार्सन एंड टुब्रो (L&T) ने जून 2026 तिमाही में मजबूत नतीजे पेश किए हैं। कंपनी का कंसोलिडेटेड नेट प्रॉफिट सालाना आधार पर 14% बढ़कर 4,123 करोड़ रुपये हो गया। पिछले साल की समान तिमाही में यह 3,617 करोड़ रुपये था। यह बाजार के अनुमान से भी बेहतर रहा। वहीं, कंपनी की कंसोलिडेटेड रेवेन्यू 6.7% बढ़कर 67,942 करोड़ रुपये पहुंच गई।

L&T की ऑर्डर बुक

इंफ्रास्ट्रक्चर और इंजीनियरिंग कंपनी L&T को जून तिमाही में 1,08,014 करोड़ रुपये के नए ऑर्डर मिले। यह पिछले साल के मुकाबले 14% ज्यादा है। कंपनी को रिहायशी और कमर्शियल बिल्डिंग, ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर, ऑफशोर विंड, हेवी इंजीनियरिंग और मेटल सेक्टर से बड़े ऑर्डर मिले।

कंपनी की कुल ऑर्डर बुक बढ़कर 7,78,954 करोड़ रुपये हो गई। इसमें अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर की हिस्सेदारी 52% है। तिमाही के दौरान कंपनी की कुल रेवेन्यू में 51% योगदान विदेशी कारोबार का रहा।

मार्जिन पर दबाव

तिमाही में L&T का EBITDA 3.2% घटकर 6,116 करोड़ रुपये रहा। वहीं, EBITDA मार्जिन पिछले साल के 9.9% से घटकर 9% पर आ गया। इसके बावजूद कंपनी का मुनाफा बेहतर रहा।

ग्रीन एनर्जी और मैन्युफैक्चरिंग से मजबूती

L&T के ग्रीन एनर्जी बिजनेस को तिमाही में 33,042 करोड़ रुपये के ऑर्डर मिले। यह पिछले साल से 58% ज्यादा है। इसकी बड़ी वजह ऑफशोर विंड प्रोजेक्ट रहे। हालांकि, सप्लाई चेन की दिक्कतों के चलते इस सेगमेंट की रेवेन्यू 11% घट गई।

वहीं, मैन्युफैक्चरिंग एंड प्रोडक्ट्स कारोबार में ऑर्डर इनफ्लो 74% बढ़कर 5,535 करोड़ रुपये पहुंच गया। रिफाइनरी इक्विपमेंट से जुड़े बड़े ऑर्डर मिलने का फायदा कंपनी को मिला।

टेक और फाइनेंस ने भी दिखाया दम

L&T के टेक्नोलॉजी, प्लेटफॉर्म्स एंड सर्विसेज कारोबार की रेवेन्यू 15% बढ़कर 14,627 करोड़ रुपये हो गई। दूसरी ओर, फाइनेंशियल सर्विसेज बिजनेस की ऑपरेशनल इनकम 27% बढ़कर 5,042 करोड़ रुपये रही। इस दौरान कंपनी का कुल लोन बुक 1,29,634 करोड़ रुपये तक पहुंच गया।

रियल्टी कारोबार में भी तेजी

L&T के रियल्टी बिजनेस में नए प्रोजेक्ट्स की अच्छी बुकिंग हुई। ऑर्डर इनफ्लो 32% बढ़कर 1,299 करोड़ रुपये हो गया। वहीं, रेवेन्यू दोगुने से ज्यादा बढ़कर 1,009 करोड़ रुपये पहुंच गई।

चेयरमैन ने क्या कहा?

L&T के चेयरमैन और MD एस. एन. सुब्रह्मण्यन ने कहा कि वैश्विक भू-राजनीतिक चुनौतियों के बावजूद कंपनी ने अलग-अलग सेक्टर और बाजारों पर फोकस बनाए रखा। उन्होंने कहा कि कंपनी ने इस तिमाही में Nabha Power की हिस्सेदारी बेचने का काम पूरा किया है। साथ ही, Hyderabad Metro में अपनी 100% हिस्सेदारी बेचने के लिए भी समझौता किया है। इससे कंपनी अपने पोर्टफोलियो को और मजबूत बनाने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है।

L&T के शेयर

L&T के शेयर मंगलवार को 0.63% की बढ़त के साथ 3,830 रुपये पर बंद हुए। पिछले 1 साल में स्टॉक ने 11.92% का रिटर्न दिया है। वहीं, 5 साल में इससे निवेशकों को 139.16% का मुनाफा हुआ है। कंपनी का मार्केट कैप 5.27 लाख करोड़ रुपये है।

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Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Sell-off in chip stocks : चिप शेयरों में उधार लेकर की गई खरीदारी दक्षिण कोरिया पर पड़ रही भारी, जानिए भारत के लिए है कितना बड़ा खतरा

Sell-off in chip stocks : अमेरिका में चिप शेयरों में बिकवाली दक्षिण कोरिया पर भारी पड़ रही है। कॉस्पी में आज करीब 11% की भारी गिरावट दिख रही है। इस बिकवाली का एक बड़ा कारण कोस्पी में बढ़ती मार्जिन पोजिशन भी है। जब बाजार में बिकवाली बढ़ती है तो मार्जिन ट्रिगर होते हैं और ब्रोकर्स सौदे काट देते हैं। मार्जिन ट्रेडिंग की समस्या सिर्फ कोस्पी की नहीं,पूरी दुनिया में है। अमेरिका,चीन के साथ साथ भारत में भी मार्जिन पोजिशन रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई है। ये भारत और दुनिया भर के बाजारों के लिए कितनी बड़ी चुनौती है,इस पर खास चर्चा के लिए हमारे साथ हैं स्टॉकएज (Stockedge) के को-फाउंडर विवेक बजाज। लेकिन इसके पहले जान लेते हैं कि दुनिया के बड़े बाजारों में क्या है मार्जिन पोजिशन (लेवरेज पोजिशन) की स्थिति।

रिकॉर्ड स्तर पर लेवरेज पोजिशन

अमेरिका में लेवरेज पोजिशन 1.53 लाख करोड़ डॉलर पर है। वहीं, चीन में यह 3 लाख करोड़ यूआन, दक्षिण कोरिया में 39 अरब डॉलर और भारत में 1.38 लाख करोड़ रुपए पर है। भारत में MTF पोजिशन की बात करें तो यह FY23 में 0.25 लाख करोड़ रुपए,FY24 में 0.47 लाख करोड़ रुपए, FY 25 में 0.72 लाख करोड़ रुपए। सितंबर 2025 में 1 लाख करोड़ रुपए, दिसंबर 2025 में 1.16 लाख करोड़ रुपए और जुलाई 2026 में 1.38 लाख करोड़ रुपए थी।

मार्केट कैप में MTF पोजिशन का हिस्सा

मार्केट कैप में MTF पोजिशन के हिस्से की बात करें तो चीन में यह कुल मार्केट कैप का 2.4%, अमेरिका में कुल मार्केट कैप का 2%, दक्षिण कोरिया में कुल मार्केट कैप का 0.8% और भारत में कुल मार्केट कैप का 0.34% है।

कोस्पी की गिरावट का लेवरेज कनेक्शन

27 मई को कोरिया में सिंगल स्टॉक लेवरेज ETF लॉन्च किया गया। इस ETF में सिर्फ सैमसंग और SK Hynix शामिल हैं। AI चिप रैली में रिटेल ने अंधाधुंध पैसा लगाया। इसमें कुछ ही हफ्तों में 9.48 अरब डॉलर की खरीदारी हुई। इस ETF के 92 फीसदी होल्डर रिटेल निवेशक हैं। मई के अंत तक रिटेल मार्जिन लोन 39 अरब डॉलर तक पहुंच गया।

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कोस्पी: मार्जिन कॉल और फोर्स सेलिंग

कोस्पी में सैमसंग और SK Hynix की हिस्सेदारी 50% से ज्यादा है। सैमसंग और SK Hynix में सबसे ज्यादा लेवरेज पोजिशन है। चिप शेयरों में बिकवाली से सैमसंग और SK Hynix में तेज बिकवाली आई। एक महीने में सैमसंग 38% और SK Hynix 42% टूट गया। तेज बिकवाली से ब्रोकर्स ने मार्जिन पोजिशन काटी।

मार्जिन ट्रेडिंग भारत के लिए चुनौती?

भारत में भी मार्जिन ट्रेडिंग या MTF तेजी से बढ़ रही है। 27 जुलाई को MTF 1.38 लाख करोड़ रुपए के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए। हालांकि कुल मार्केट कैप में MTF का हिस्सा 0.34% ही है।

एक्सपर्ट की राय

स्टॉकएज (Stockedge) के को-फाउंडर विवेक बजाज ने कहा कि सालों से मार्जिन ट्रेडिंग चलती आ रही है। यह अमेरिका की उपज है। अमेरिकी लीवरेज पसंद करते है। वे हर तरह के इंस्ट्रूमेंट में लीवरेज क्रिएट करते हैं। वहां पर भी यह काफी बड़ा होता जा रहा है। टिपिकली जब भी किसी एसेट में बबल बनता है तो वह पूरे बाजार में बबल बनाने में अहम भूमिका निभाता है। उदाहरण के लिए जैसे 2008 में रियल एस्टेट बबल बना उसमें रियल एस्टेट लीवरेज बाजार में बबल बनने का कारण बना। जब बबल फटता है तो जहां भी लीवरेज होता है वहां असर पड़ता है।

हम सभी जानते हैं कि इस समय दुनिया में एआई ड्रिवेन बबल बन चुका है। लेकिन ये कब फटेगा हमें नहीं पता है। इस नजरिए से कोस्पी इस समय बहुत बड़ा केस स्टडी बन गया है। कोरियन मार्केट अपने हाई से 33 फीसदी टूट चुका है। लेकिन लीवरेज बबल फटने पर इसमें और बड़ी गिरावट देखने को मिल सकती है।

विवेक बजाज ने आगे कहा कि भारत में मार्जिन ट्रेडिंग या MTF 2000 शेयरों में हैं। वहीं, कोरिया में सिर्फ 20 शेयरों में भारत से कई गुना बड़ा लीवरेज्ड पोजीशन है। भारत में फ्री फ्लोट बेसिस पर MTF पोजीशन मार्केट कैप का 0.74 फीसदी है। ऐसे में भारत में मार्जिन ट्रेंडिंग का बड़ा रिस्क नहीं है।

उन्होंने आगे कहा कि कोरिया का बाजार एक ट्रिगर का काम करेगा। अगर वहां,लीवरेज्ड शेयरों में गिरावट आती है तो इसका असर भारत सहित पूरे ग्लोबल मार्केट पर देखने को मिलेगा। ऐसे में जहां भी लीवरेज ज्यादा होगा वहां दबाव दिखेगा।

MTF क्या है?

मार्जिन ट्रेडिंग फैसिलिटी ‘आज खरीदें,बाद में भुगतान करें’के मॉडल की तरह काम करता है। इसमें निवेशकों को ट्रेडिंग के लिए जरूरी पैसों का कुछ हिस्सा ही चुकाना पड़ता है और बाकी पैसा ब्रोकर लोन की तरह देता है। जैसे कि मान लें कि 100 रुपये के भाव वाले 1 हजार शेयरों की ट्रेडिंग करनी है तो 1 लाख रुपये की जरूरत पड़ेगी। अब या तो आप पूरे एक लाख रुपये अपने पास से लगाएं या 30 फीसदी यानी 30 हजार रुपये खुद का लगाएं और बाकी 70 फीसदी यानी 70 हजार रुपये ब्रोकर से लोन के रूप में मिल जाएगा।

मार्जिन ट्रेडिंग का फायदा ट्रेडर्स और ब्रोकर्स दोनों को मिलता है। ट्रेडर्स ज्यादा पैसा लगाने के लिए लोन ले सकते हैं और बड़ा मुनाफा कमाने की कोशिश कर सकते हैं, वहीं ब्रोकर्स दिए गए लोन पर ब्याज कमाते हैं।

 

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