Royal Enfield Himalayan 440 vs Himalayan 411: differences explained

Royal Enfield Himalayan 440 vs Himalayan 411: differences explained
New Himalayan 440 vs Old Himalayan 411

The Royal Enfield Himalayan 411 was discontinued in late 2023, when the significantly more sophisticated Himalayan 450 took its place. However, the added technological complexity also meant that the 450 was considerably more expensive than the bike it replaced, leaving many riders longing for the 411’s simpler, more straightforward character. The new Himalayan 440 is Royal Enfield’s answer to that demand. While it retains the same DNA as the original Himalayan, it brings a number of meaningful updates nearly a decade after the first-generation bike made its debut.

New Himalayan 440 vs Old Himalayan 411: What stays the same?

The core philosophy and most of the cycle parts carry over unchanged

The Himalayan 440 retains its split-cradle frame architecture from the 411, along with the same 21-inch front and 17-inch rear spoked wheel combination. Suspension travel is also unchanged, with 200mm at the front and 180mm at the rear, as is the 220mm ground clearance and the 800mm seat height. In character and purpose, these are the same motorcycle.

New Himalayan 440 vs Old Himalayan 411: Engine and gearbox

The new Himalayan uses the same engine as the Scram 440

The most significant change on the Himalayan is to do with the powertrain, with the bike now using the same powerplant as the Scram 440. The original Himalayan was powered by a 411cc, air/oil-cooled, single-cylinder unit producing 24hp at 6,500rpm and 32Nm at 4,000rpm. The 443cc unit on the new bike makes 25.4hp at 6,250rpm and 34Nm at 4,000rpm – 1.4hp and 2Nm more.

This new engine is paired with a 6-speed gearbox, unlike the 411, which used a 5-speed unit, with revised ratios throughout. The additional gear should make highway cruising more relaxed and touring more comfortable over long distances.

New Himalayan 440 vs Old Himalayan 411: Braking

Gets improved braking hardware and dual-channel switchable ABS

On paper, the braking hardware on the Himalayan 440 seems identical to what the 411 had to offer, with a 300mm disc at the front, 240mm rear disc, and dual-channel ABS. However, Royal Enfield mentions that the hardware now comprises new two-piston Bybre floating calipers with larger pistons, delivering improved braking performance. The dual-channel ABS system is switchable, so you can disengage the rear ABS.

New Himalayan 440 vs Old Himalayan 411: Features and equipment

Gets LED headlight and Tripper navigation among other features

The 440 gets a new LED headlight, and the digital-analogue instrument cluster setup has been updated. It loses the tachometer from the original but gets the brand’s Tripper navigation pod for turn-by-turn navigation. Another notable addition includes a USB Type-C charging port. The Himalayan has always been about long-distance adventure travel and unsurprisingly, the brand is offering a long list of accessories that you can add to the bike, including protection like engine and knuckle guards, as well as luggage like a top box and official panniers.

New Himalayan 440 vs Old Himalayan 411: Price

The Himalayan 440 is priced at Rs 2.29 lakh, making it a substantial Rs 79,000 more affordable than the Himalayan 450’s starting price. In fact, when the Himalayan 411 was discontinued in 2023, it was priced between Rs 2.15 lakh and Rs 2.30 lakh. That makes the new 440’s pricing even more impressive as three years on, it costs virtually the same as its predecessor while offering a more powerful engine, better brakes and several other practical upgrades.

Physicswallah में है बहुत जान, बुल केस में दिख सकता है 82% तक उछाल; मोतीलाल ओसवाल बुलिश

एडटेक प्लेटफॉर्म फिजिक्सवाला के शेयर की कीमत आगे 82 प्रतिशत तक बढ़ने की उम्मीद है। ब्रोकरेज फर्म मोतीलाल ओसवाल ने शेयर के लिए ‘बाय’ रेटिंग के साथ कवरेज शुरू किया है। टारगेट प्राइस 200 रुपये प्रति शेयर रखा है। यह पिछली क्लोजिंग से 66 प्रतिशत ज्यादा है। बुल केस में टारगेट प्राइस 220 रुपये है, जो शेयर के पिछले बंद भाव से करीब 82.5 प्रतिशत ज्यादा है। ब्रोकरेज का व्यू सामने आने के बाद फिजिक्सवाला के शेयर में 4 सितंबर को दिन में 8.5 प्रतिशत तक की बढ़त दिखी। बीएसई पर शेयर 130.85 रुपये के हाई तक गया।

ब्रोकरेज का कहना है कि फिजिक्सवाला भारत के सबसे बड़े एजुकेशन प्लेटफॉर्म्स में से एक है। इसे भारतीय एडटेक में सबसे ज्यादा कैपिटल-एफिशिएंट (पूंजी के लिहाज से कुशल) बिजनेस मॉडल में से एक पर बनाया गया है। कंपनी ने YouTube के जरिए एक बड़ा ‘फ्री-टू-पेड’ फनल बनाया है। इससे वह कम लागत पर स्टूडेंट्स को जोड़ पाती है और ऑनलाइन, हाइब्रिड और ऑफलाइन ऑफरिंग्स के जरिए उनसे कमाई कर पाती है। मोतीलाल ओसवाल के मुताबिक, अभी कंपनी के पास भारत की सबसे बड़ी एजुकेशन कम्युनिटीज में से एक है। इसके 10 करोड़ से ज्यादा YouTube सब्सक्राइबर हैं। फिजिक्सवाला ने वित्त वर्ष 2023-2026 के दौरान रेवेन्यू में 74% की कंपाउंडेड ग्रोथ हासिल की है।

ब्रोकरेज ने कहा कि फिजिक्सवाला का ऑनलाइन बिजनेस ही इसकी वैल्यू का मुख्य आधार है। अनुमान है कि पेड-यूजर ग्रोथ, कैटेगरी के विस्तार और AI-बेस्ड मॉनेटाइजेशन की मदद से कंपनी का ऑनलाइन रेवेन्यू FY26-30 के दौरान 28% CAGR (कंपाउंडेड एनुअल ग्रोथ रेट) से बढ़ेगा। कंपनी का ऑफलाइन बिजनेस, ऑनलाइन बिजनेस के मुकाबले प्रति यूजर ज्यादा औसत रेवेन्यू (ARPU) वाली मॉनेटाइजेशन लेयर उपलब्ध कराता है। ब्रोकरेज को उम्मीद है कि FY26-30 के दौरान ऑफलाइन रेवेन्यू 20% CAGR से बढ़ेगा और मुनाफे में भी सुधार होगा।

बुल केस

बुल केस सिनेरियो में, मोतीलाल ओसवाल ने फिजिक्सवाला के शेयर के लिए टारगेट प्राइस ₹220 प्रति शेयर दिया है। इस मामले में ब्रोकरेज का मानना है कि कंपनी का ऑनलाइन रेवेन्यू FY26-37 के दौरान 22% CAGR से बढ़ सकता है। इसकी वजह है ऐसे मार्केट में लगातार मार्केट शेयर बढ़ना, जहां अभी बहुत कम पहुंच है। Physicswallah प्लेटफॉर्म 48.7 लाख स्टूडेंट्स को सर्विस देता है। ब्रोकरेज ने कहा कि ऑनलाइन ग्रोथ, वॉल्यूम और प्राइसिंग दोनों से बढ़ेगी। FY26-37 के दौरान यूनीक ट्रांजेक्शन करने वाले यूजर्स के मामले में 14% की CAGR दिखेगी। प्रति यूजर औसत लागत (ACPU) में 7% की CAGR दिखेगी। सेंटर्स के ज्यादा इस्तेमाल और नेटवर्क के लगातार विस्तार से ऑफलाइन रेवेन्यू FY26-37 के दौरान 17.5% की CAGR से बढ़ेगा।

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बेयर केस

बेयर केस सिनेरियो में मोतीलाल ओसवाल ने ₹110 प्रति शेयर का टारगेट प्राइस दिया है। यह शेयर की पिछली क्लोजिंग से 9% कम है। ब्रोकरेज ने कहा कि इस सिनेरियो में फिजिक्सवाला का ऑनलाइन रेवेन्यू FY26-37 के दौरान 16.7% CAGR से बढ़ेगा। रेवेन्यू पर डिजिटल-फर्स्ट एडटेक प्लेयर्स, ऑफलाइन इंस्टीट्यूट्स और AI-बेस्ड पर्सनलाइज्ड लर्निंग से कॉम्पिटिशन का असर पड़ेगा। बेयर केस सिनेरियो में FY26-37 के दौरान कंपनी का ऑफलाइन रेवेन्यू 15.7% CAGR से बढ़ने की संभावना है।

Physicswallah के लिए मुख्य जोखिम

  • कॉम्पिटिशन बढ़ना
  • ऑफलाइन कामकाज और सेंटर्स के इस्तेमाल में कमजोरी
  • फैकल्टी के ज्यादा संख्या में नौकरी छोड़ने से छात्रों के नतीजों और ब्रांड की इमेज पर असर
  • कोचिंग संस्थानों, विज्ञापन या डेटा प्राइवेसी से जुड़े नियमों में प्रतिकूल बदलाव

शेयर 6 महीनों में 60 प्रतिशत मजबूत

Physicswallah के शेयर को फिलहाल 8 एनालिस्ट कवर कर रहे हैं। इनमें से 7 ने “बाय” की सलाह दी है। एक ने “होल्ड” रेटिंग दी है। कंपनी की शुरुआत 2016 में एक YouTube चैनल के तौर पर हुई थी। शेयर की फेस वैल्यू 1 रुपये है। कंपनी नवंबर 2025 में लिस्ट हुई थी। IPO 3480 करोड़ रुपये का था। शेयर 6 महीनों में 60 प्रतिशत और 3 महीनों में 20 प्रतिशत चढ़ा है। कंपनी की सालाना आम बैठक 25 सितंंबर 2026 को होने वाली है।

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Asian Games में नीरज की जगह यह भाला फेंक खिलाड़ी करेगा एथलेटिक्स दल की अगुवाई

javelin throw

राष्ट्रमंडल खेलों में कांस्य पदक जीतने वाले भाला फेंक के एथलीट यशवीर सिंह को जापान में होने वाले एशियाई खेलों के लिए चोटिल नीरज चोपड़ा की जगह गुरुवार को 77 सदस्यीय भारतीय एथलेटिक्स टीम में शामिल किया गया जबकि लंबी दूरी के धावक अभिषेक पाल को कथित डोपिंग उल्लघंन के लिए नाडा (राष्ट्रीय डोपिंग रोधी एजेंसी) से नोटिस जारी किए जाने के बाद टीम से बाहर कर दिया गया।

भारतीय एथलेटिक्स महासंघ (एएफआई) ने लुधियाना में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में 19 सितंबर से चार अक्टूबर तक आइची-नागोया में होने वाले एशियाई खेलों के लिए 77 सदस्यीय ट्रैक एवं फील्ड टीम की घोषणा की। लुधियाना अभी राष्ट्रीय युवा चैंपियनशिप की मेजबानी कर रहा है।

पुरुषों की 110 मीटर बाधा दौड़ के धावक तेजस शिरसे को भी टीम से बाहर कर दिया गया है क्योंकि वह हाल ही में ग्लास्गो में हुए राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान चोटिल हो गए थे।अभिषेक को पिछले महीने नाडा ने नोटिस भेजा था क्योंकि उनके डोपिंग नमूने में महिलाओं की प्रजनन क्षमता बढ़ाने वाली दवा पाई गई थी।

खेल मंत्रालय ने इस महीने की शुरुआत में 73 सदस्यीय एथलेटिक्स टीम की घोषणा की थी जिसमें शिरसे और अभिषेक भी शामिल थे। मंत्रालय ने बुधवार को छह नए खिलाड़ियों को टीम में शामिल किया।

इन खिलाड़ियों में 200 मीटर की धाविका हरिता भद्रा, 400 मीटर दौड़ में भाग लेने वाली किरण पहल, पोल वॉल्टर सिंधुश्री जी, त्रिकूद की एथलीट आशा इलंगो, चक्का फेंक की खिलाड़ी सान्या यादव और हैमर थ्रोअर प्रवीण कुमार शामिल हैं।

इस तरह से पहले घोषित किए गए 73 खिलाड़ियों में से दो खिलाड़ियों अभिषेक और शिरसे के बाहर होने और बुधवार को छह खिलाड़ियों के जुड़ने से अंतिम संख्या 77 हो गई है।AFI ने आयोजकों से यह भी अनुरोध किया है कि पिछले एशियाई खेलों के दोहरे पदक विजेता अविनाश साबले को 5000 मीटर दौड़ में भाग लेने की अनुमति दी जाए। साबले की पसंदीदा 3000 मीटर स्टीपलचेज़ में उनकी भागीदारी सुनिश्चित है।

पिछले साल एसीएल सर्जरी कराने के बाद साबले ने इस सत्र में केवल एक ही दौड़ में हिस्सा लिया है। उन्होंने 2023 में हांगझोऊ एशियाई खेलों में 3000 मीटर स्टीपलचेज़ में स्वर्ण और 5000 मीटर में रजत पदक जीता था।

दस सितंबर को होने वाली प्रतियोगिता में एशियाई खेलों के लिए चुने गए अधिकतर एथलीट भाग लेंगे।गुलवीर सिंह और पारुल चौधरी एशियाई खेलों में तीन-तीन स्पर्धाओं में भाग लेंगे। गुलवीर 10,000 मीटर, 5000 मीटर और 1500 मीटर में जबकि पारुल 3000 मीटर स्टीपलचेज, 5000 मीटर और 1500 मीटर में हिस्सा लेंगी।

एशियाई खेल 2026 के लिए भारतीय एथलेटिक्स टीम इस प्रकार है:-

पुरुषों:-गुरिंदरवीर सिंह (100मी), अनिमेष कुजूर (100 मीटर, 200 मीटर, मिश्रित 4×100 मीटर रिले), राजेश रमेश (400 मीटर, 4×400 मीटर रिले), विशाल थेनारासु कयालविझी (400 मीटर, 4×400 मीटर रिले), कृष्ण कुमार (800 मी), मोहम्मद अफसल पुलिककलाकथ (800मी), यूनुस शाह (1500 मी), अभिषेक पाल (5000 मी, 10000 मी), गुलवीर सिंह (1500 मीटर, 5000 मीटर, 10000 मीटर)। सावन बरवाल (मैराथन), कार्तिक कारकेरा (मैराथन), तेजस शिरसे (110 मीटर बाधा दौड़), यशस पलाक्ष (400 मीटर बाधा दौड़), संतोष कुमार तमिलारासन (400 मीटर बाधा दौड़), अविनाश साबले (3000 मीटर स्टीपलचेज), प्रणव प्रमोद गुरव (मिश्रित 4×100 मीटर रिले), मोहम्मद अशफाक (4×400 मीटर रिले), धर्मवीर चौधरी (4×400 मीटर रिले), जय कुमार (4×400 मीटर रिले, मिश्रित 4×400 मीटर रिले), मनु थेक्किनालिल साजी (4×400 मीटर रिले, मिश्रित 4×400 मीटर रिले), आदर्श राम ज्योति शंकर (ऊंची कूद), सर्वेश कुशारे (ऊंची कूद) , कुलदीप कुमार (पोल वॉल्ट), देव मीना (पोल वॉल्ट), मुरली श्रीशंकर (लंबी कूद), शाहनवाज खान (लंबी कूद), प्रवीण चित्रवेल (ट्रिपल जंप) कार्तिक उन्नीकृष्णन (ट्रिपल जंप), करणवीर सिंह (गोला फेंक), तजिंदरपाल सिंह तूर (गोला फेंक), दमनीत सिंह (हथौड़ा फेंक), नीरज चोपड़ा (भाला फेंक), रोहित यादव (भाला फेंकने का खेल), तौफीक नौशाद (डेकाथलॉन), तेजस्विन शंकर (डेकाथलॉन)

महिला:– प्राची चौधरी (400 मी), गौतमी जयारमन (800 मी), पूजा (800मी, 1500मी), पारुल चौधरी (1500 मीटर, 5000 मीटर, 3000 मीटर स्टीपलचेज़), सीमा (5000 मी, 10000 मी), प्रियंका गोस्वामी (मैराथन रेस वॉक), मंजू रानी (मैराथन रेस वॉक), ज्योति याराजी (100 मीटर बाधा दौड़), नंदिनी कोंगन (100 मीटर बाधा दौड़), उन्नति अयप्पा बोलैंड (200मी), अनु राघवन (400 मीटर बाधा दौड़), विथ्या रामराज (400 मीटर बाधा दौड़), अंकिता ध्यानी (3000 मीटर स्टीपलचेज), तमन्ना (4×100 मीटर रिले, मिश्रित 4×100 मीटर रिले), नित्या गंधे (4×100 मीटर रिले), सरबानी नंदा (4×100 मीटर रिले), अबिनया राजराजन (4×100 मीटर रिले) स्नेहा सत्यनारायण (4×100 मीटर रिले, मिश्रित 4×100 मीटर रिले), सुदेशना शिवंकर (4×100 मीटर रिले), रशदीप कौर (4×400 मीटर रिले, मिश्रित 4×400 मीटर रिले), अनसा बाबू (4×400 मीटर रिले, मिश्रित 4×400 मीटर रिले),

ट्रेन बदली, स्टेशन बदले और बन गया रिकॉर्ड! दिल्ली मेट्रो एम्प्लॉई की अनोखी कहानी

दिल्ली मेट्रो के एम्प्लॉई ने सभी मेट्रो स्टेशनों का सफर सबसे कम समय में पूरा करके नया गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया है। उन्होंने बहुत ही कम टाइम में पूरी जर्नी कर पिछला रिकॉर्ड तोड़ दिया। इससे पहले भी वह 2022 में यह कोशिश कर चुके थे, लेकिन इस बार सही रूट और बेहतर प्लानिंग के साथ उन्होंने अपना ही परफॉरमेंस काफी बेहतर किया। दिल्ली मेट्रो के कामकाज और रूट की अच्छी जानकारी ने भी इस रिकॉर्ड को बनाने में उनकी काफी मदद की।

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सिर्फ 15 घंटे में रचा इतिहास

दिल्ली मेट्रो के एम्प्लॉई ने सभी मेट्रो स्टेशनों का सफर सबसे कम समय में पूरा करके नया गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया है। उन्होंने यह पूरी जर्नी 14 घंटे, 54 मिनट और 36 सेकंड में पूरी की। सिंह ने 23 मई को सुबह करीब 6 बजे वायलेट लाइन के राजा नाहर सिंह मेट्रो स्टेशन से अपनी जर्नी शुरू की थी। इसके बाद उन्होंने अलग-अलग मेट्रो लाइनों और इंटरचेंज का इस्तेमाल करते हुए सफर जारी रखा और रात करीब 9 बजे गुरुग्राम के मिलेनियम सिटी सेंटर मेट्रो स्टेशन पर पहुंचकर इसे पूरा किया। इतने बड़े नेटवर्क में इतने कम समय में सफर पूरा करना आसान नहीं था।

सही रूट ने बचाया समय

प्रफुल्ल सिंह ने इस बार जून 2023 में बनाए गए पुराने गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया। इससे पहले सुजॉय कुमार मित्रा और शिप्रा गुप्ता ने 15 घंटे, 21 मिनट और 4 सेकंड में दिल्ली मेट्रो के सभी स्टेशनों का सफर पूरा किया था। सिंह ने इस समय से करीब 26 मिनट कम में अपना सफर पूरा किया। भले ही यह अंतर ज्यादा बड़ा न लगे, लेकिन मेट्रो के इतने बड़े नेटवर्क में कुछ मिनट बचाना भी काफी मुश्किल होता है। एक लाइन से दूसरी लाइन पर जाने में थोड़ा सा भी समय ज्यादा लग जाए, तो पूरी प्लानिंग बिगड़ सकती है।

पुरानी गलती से मिली सीख

इस रिकॉर्ड को बनाने की कोशिश सिंह ने पहली बार नहीं की थी। वह 2022 में भी दिल्ली मेट्रो के 254 स्टेशनों का सफर कर चुके हैं। उस समय उन्होंने यह जर्नी 16 घंटे, 2 मिनट और 17 सेकंड में पूरी की थी। पहली कोशिश के दौरान गलत रूट लेने की वजह से उनका काफी समय खराब हो गया था। इस एक्सपीरियंस से सीखते हुए उन्होंने इस बार पहले से ज्यादा तैयारी की। ‘द प्रिंट’ की रिपोर्ट के मुताबिक, सिंह ने बताया कि पिछली बार उन्हें गलत रूट की वजह से करीब डेढ़ घंटे की देरी हुई थी, लेकिन इस बार उन्हें भरोसा था कि वह अच्छा परफॉर्म करेंगे।

मेट्रो की जानकारी बनी ताकत

प्रफुल्ल सिंह के लिए उनकी नौकरी का एक्सपीरियंस भी इस चुनौती में काफी फायदेमंद रहा। दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन यानी DMRC के ऑपरेशन्स सेक्टर में काम करने की वजह से उन्हें मेट्रो के रूट, ट्रेन के शेड्यूल, इंटरचेंज स्टेशन और अलग-अलग लाइनों की कनेक्टिविटी की अच्छी जानकारी थी। इसी वजह से वह जर्नी में सही रास्ता चुनने और समय बचाने में कामयाब रहे। पूरे मेट्रो नेटवर्क को कम से कम समय में कवर करना एक तरह की स्पीड चैलेंज जैसा है, जिसमें हर मिनट मायने रखता है। एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक पहुंचने के साथ-साथ सही समय पर ट्रेन बदलना भी जरूरी होता है।

प्रफुल्ल सिंह को मिला यह अचीवमेंट बताता है कि सही तैयारी, हिम्मत और लगन के साथ मुश्किल से मुश्किल चुनौती भी पूरी की जा सकती है। उनका रिकॉर्ड न सिर्फ उनकी मेहनत को दिखाता है, बल्कि यह भी बताता है कि अपने काम की अच्छी समझ किसी भी लक्ष्य को हासिल करने में कितनी मददगार हो सकती है।

नेपाल की आपदा ने नए सिरे से बढ़ाई भारत की चिंता

नेपाल की आपदा ने नए सिरे से बढ़ाई भारत की चिंता

threat after nepal disaster in india

प्रभाकर मणि तिवारी

भारत में खासकर पूर्वी हिमालय क्षेत्र में बड़े पैमाने पर बनने वाली पनबिजली परियोजनाएं, इनके तहत बनने वाले बांध और सुरंगों से पैदा होने वाले खतरे अक्सर सुर्खियां बटोरते रहे हैं। लेकिन अब नेपाल के भयावह हादसे में बड़े पैमाने पर जान-माल के नुकसान ने विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। उनको आशंका है कि जम्मू-कश्मीर के अलावा उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में कभी भी नेपाल जैसे हादसे का खतरा मंडरा रहा है। ALSO READ: जलवायु न्याय की मांग कर रहा है आपदा प्रभावित नेपाल

 

हाल के वर्षों में इन राज्यों में भूस्खलन और सुरंग धंसने की अलग-अलग घटनाओं में कई लोग मारे जा चुके हैं। लेकिन इसके बावजूद पहाड़ों की कटाई करके ऐसी परियोजनाएं बनाने का काम जारी है। इनमें खासकर सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश की स्थिति सबसे चिंताजनक है।

 

अरुणाचल का संकट

चीन सरकार अरुणाचल प्रदेश से सटे इलाके में एक विशालकाय बांध बना रही है। बीते साल इसका निर्माण कार्य शुरू हुआ था। करीब डेढ़ सौ अरब अमेरिकी डॉलर की लागत वाली इस परियोजना के वर्ष 2033 तक पूरा होने का लक्ष्य है। विशेषज्ञ इसे वाटर बम बताते हैं। लेकिन भूवैज्ञानिकों की असली चिंता इस परियोजना का आकार नहीं बल्कि इसकी लोकेशन है। यह मेडॉग परियोजना उस फॉल्ट जोन के पास स्थित है, जहां भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटें मिलती हैं। इसकी वजह से यह इलाका भूकंप के प्रति बेहद संवेदनशील है। बीते साल भी तिब्बत के शिगात्से इलाके में रिक्टर स्केल पर 7.1 की तीव्रता वाले एक भूकंप के कारण वहां 120  से ज्यादा लोगों की मौत के अलावा कुछ बांधों को नुकसान पहुंचने की खबरें आई थी।

 

विशेषज्ञों का कहना है कि चीनी परियोजना के तहत बनने वाले बांध को भूकंपरोधी तकनीक से बनाने के बावजूद किसी बड़े भूकंप की स्थिति में जमीन धंसने और चट्टानों के टूटने का खतरा पैदा हो सकता है। इससे बांध पर तो खास असर नहीं होगा। लेकिन नदी के निचले हिस्से में स्थित भारतीय इलाकों को नेपाल जैसी आपदा झेलनी पड़ सकती है। इससे नदी का बहाव बदल सकता है। इससे पहले भी ऐसी कुछ घटनाएं हो चुकी हैं। वर्ष 2000 में तिब्बत में एक बांध टूटने से पूर्वोत्तर के कुछ हिस्सों में बाढ़ आ गई थी। इससे पहले वर्ष 2017 में अरुणाचल प्रदेश की सियांग नदी का पानी अचानक काला पड़ गया था। तब इसके लिए तिब्बत में खनन गतिविधियों को जिम्मेदार ठहराया गया था। यही सियांग नदी असम में प्रवेश करने के बाद ब्रह्मपुत्र कहलाती है।

 

विशेषज्ञों ने चेताया है कि चीनी परियोजना के तहत बनने वाला विशालकाय बांध पूर्वोत्तर भारत में बड़े पैमाने पर तबाही ला सकता है। ALSO READ: मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों पर जलवायु के गंभीर खतरे का डर

 

भारत की जवाबी रणनीति

इसके असर की काट के लिए भारत सरकार ने भी राज्य के अपर सियांग में 11 हजार मेगावाट क्षमता वाली एक बहुउद्देशीय परियोजना बनाने का फैसला किया है। लेकिन स्थानीय लोग और संगठन इसका विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि इससे डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों के सामने विस्थापन का खतरा पैदा हो जाएगा। अरुणाचल प्रदेश में आधा दर्जन पनबिजली परियोजनाएं चल रही हैं जबकि करीब तीन दर्जन छोटी-बड़ी परियोजनाओं का काम चल रहा है। इनमें दिबांग, अपर सियांग, लोअर सुबनसिरी और इटालीन जैसी बड़ी परियोजनाएं शामिल हैं। राज्य सरकार ने 2025-35 को 'पनबिजली का दशक' घोषित किया है।

 

भूवैज्ञानिकों का कहना है कि अरुणाचल प्रदेश में हिमालय की संरचना भी उस नेपाल-तिब्बत सीमा जैसी है जो हाल में प्राकृतिक हादसे का शिकार हुआ है। खासकर इटालीन परियोजना तो भूकंप के प्रति बेहद संवेदनशील इलाके में है। वहां ग्लेशियल झीलों के फटने का खतरा भी बना हुआ है।

 

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने देश भर में ऐसे 195 ग्लेशियल झीलों की पहचान की है जिनके फटने से बाढ़ आने का खतरा है। किसी ग्लेशियर के पिघलने से बनी झील को रोकने वाली बर्फ, चट्टान या मलबे जैसी प्राकृतिक दीवार के अचानक टूटने के बाद आने वाली बाढ़ को 'ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड' या 'ग्लोफ' कहा जाता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इनमें से 32 झीलें अकेले अरुणाचल में ही हैं।

 

क्या है विशेषज्ञों का आकलन?

पूर्वोत्तर के मशहूर भूवैज्ञानिक डा. प्रमोद चंद्र सरमा डीडब्ल्यू से कहते हैं, “हिमालय प्राकृतिक रूप से एक नाजुक पर्वतीय प्रणाली है।इसका पूर्वी क्षेत्र अभी युवा है। इस इलाके में हमेशा भूकंप, भूस्खलन, हिमस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा बना रहता है। जलवायु परिवर्तन इस खतरे को और बढ़ा रहा है। इसके साथ ही पनबिजली परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर बनने वाले बांधों ने इस जोखिम को कई गुना बढ़ा दिया है।”

 

पर्यावरणविद डीके अपांग डीडब्ल्यू से कहते हैं, “राज्य में प्रस्तावित तमाम बड़ी परियोजनाएं भूकंप के लिहाज बेहद संवेदनशील इलाकों में स्थित हैं। चीनी बांध परियोजना ने प्राकृतिक विपदा के खतरे को काफी बढ़ा दिया है।”

 

सियांग बहुउद्देशीय परियोजना का लंबे समय से विरोध कर रहे सियांग इंडीजीनस फार्म्स फोरम (एसआईएफएफ)  के प्रमुख जेजांग डीडब्ल्यू से कहते हैं, “अपर सियांग इलाका चीनी सीमा से सटा है। इसका निर्माण पूरा होने पर यहां भी नेपाल जैसा हादसा होने का खतरा बढ़ जाएगा।” ALSO READ: हिमालय क्षेत्र में भविष्य में भी ग्लेशियर फ्लड आने का गंभीर खतरा

 

क्या हैं बचाव के उपाय?

विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को अर्ली-वार्निंग सिस्टम पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए ताकि ऐसे हादसे के बारे में समय रहते जानकारी मिल सके। इसके साथ ही इलाके में मौसम और हिमालय की ऊंचाई पर बने ग्लेशियरों और झीलों की स्थिति पर चौबीसों घंटे निगरानी का तंत्र विकसित करना होगा।

 

केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी नाम नहीं छापने की शर्त पर डीडब्ल्यू को बताते हैं, “सरकार अर्ली वार्निंग सिस्टम पर काम कर रही है। पहले चरण में 46 बेहद संवेदनशील बांधों में से 40 में यह प्रणाली लागू की जा चुकी है। चरणबद्ध तरीके से दूसरी परियोजनाओं में भी इसे लागू किया जाएगा।

 

संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2023 में कहा था कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से बीते करीब तीन दशकों के दौरान कार्बन का सबसे ज्यादा उत्सर्जन करने वाले दो देशों, भारत और चीन के बीच स्थित नेपाल के ग्लेशियरों में जमा बर्फ की मात्रा एक-तिहाई कम हो गई है।

 

विशेषज्ञों का कहना है कि इसे ध्यान में रखते हुए इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना जरूरी है कि भौगोलिक रूप से अस्थिर हिमालयी क्षेत्र में सियांग और उसके जैसे बड़े बांधों का निर्माण उचित है या नहीं?

नेपाल की तबाही में भारत बना सबसे बड़ा सहारा:5 खेप में 74 टन राहत भेजी; डॉक्टर, रेस्क्यू एक्सपर्ट और फोरेंसिक टीम भी पहुंचाई

नेपाल में ग्लेशियर टूटने के बाद आई भीषण बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई है। नेपाल और चीन के तिब्बत क्षेत्र में इस आपदा से 1200 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। शहरों, सड़कों, पुलों और कई हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स को भारी नुकसान पहुंचा है। बाढ़ के कुछ घंटों के भीतर ही भारत ने राहत सामग्री भेजनी शुरू कर दी थी। 3 सितंबर तक भारत पांच खेप में कुल 74 टन राहत सामग्री भेज चुका है, जिसमें करीब 5 टन जरूरी दवाइयां शामिल हैं। भारत की मदद सिर्फ राहत सामग्री तक सीमित नहीं रही। डॉक्टर, पैरामेडिक्स, बचाव दल, सुरंग विशेषज्ञ, बेली ब्रिज और फोरेंसिक एक्सपर्ट भी नेपाल भेजे गए हैं। यानी सुरंगों में फंसे लोगों की तलाश से लेकर शवों की DNA जांच और पुनर्निर्माण तक भारत कई मोर्चों पर नेपाल की मदद कर रहा है। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने भी संसद में भारत की सहायता के लिए धन्यवाद दिया है। भारत की मदद से बना अस्पताल बाढ़ पीड़ितों के लिए बना सहारा नेपाल के नुवाकोट में नेपाल-भारत मैत्री भवन बाढ़ के बाद लोगों के लिए बड़ी राहत बनकर सामने आया है। इस इमारत में आयुर्वेद और वैकल्पिक अस्पताल भी है। भारत सरकार ने 2015 के भूकंप के बाद इस अस्पताल का पुनर्निर्माण कराया था। ऊंचाई पर स्थित होने की वजह से भोटेकोशी बाढ़ में घर छोड़ने को मजबूर सैकड़ों लोगों ने यहां शरण ली है। अस्पताल में 11 डॉक्टर बाढ़ प्रभावित लोगों का इलाज कर रहे हैं। यहां से जिले के अलग-अलग राहत केंद्रों में पहुंचाए गए लोगों को भी मेडिकल मदद दी जा रही है। जहां पुल बह गए, वहां बेली ब्रिज से फिर जुड़ेंगे रास्ते बाढ़ में कई सड़कें और पुल बहने से दूरदराज के इलाकों का संपर्क टूट गया है। इसे बहाल करने के लिए भारत नेपाल को बेली ब्रिज भेज रहा है। बेली ब्रिज लोहे के हिस्सों से तैयार होने वाला अस्थायी पुल होता है। इसके हिस्सों को प्रभावित इलाके तक ले जाकर मौके पर जोड़ा जा सकता है। इससे स्थायी पुल बनने का इंतजार किए बिना सड़क संपर्क जल्दी बहाल किया जा सकता है। भारतीय दूतावास के मुताबिक, 230 फीट लंबे सिंगल-लेन मॉड्यूलर स्टील ब्रिज के उपकरण लेकर 16 ट्रक नेपाल पहुंच चुके हैं। सात और बेली ब्रिज लगाने के लिए उपकरण भी जल्द भेजे जाएंगे। इन्हें लगाने के लिए तकनीकी टीमें भी नेपाल पहुंचेंगी। हाइड्रोपावर सुरंगों में फंसे लोगों की तलाश में भारतीय एक्सपर्ट बाढ़ के बाद नेपाल के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक हाइड्रोपावर सुरंगों में फंसे मजदूरों को ढूंढना है। नेपाल सरकार के मुताबिक कई सुरंगों में करीब 900 से ज्यादा कर्मचारियों के फंसे होने की आशंका है। 30 अगस्त को भारतीय सुरंग बचाव विशेषज्ञों की टीम नेपाल पहुंची। टीम नेपाली सेना के साथ मिलकर चिलिमे और लांगटांग के बाढ़ प्रभावित इलाकों में हाइड्रोपावर सुरंगों में कर्मचारियों की तलाश कर रही है। दिल्ली-एनसीआर के ‘रैट माइनर्स’ की टीम ने भी नेपाल के बचाव अभियान में शामिल होने की पेशकश की है। इसी टीम ने 2023 में उत्तराखंड की सिलक्यारा सुरंग में फंसे 41 मजदूरों को बाहर निकालने में अहम भूमिका निभाई थी। शवों के पहचान के लिए DNA जांच में भारत की मदद बाढ़ का पानी घटने के बाद अब नेपाल के सामने एक और बड़ी चुनौती बरामद शवों और लापता लोगों की पहचान करना है। इसके लिए भारत ने 19 सदस्यीय फोरेंसिक टीम नेपाल भेजी है। भारतीय विशेषज्ञ नेपाली टीम के साथ मिलकर DNA सैंपल की जांच कर रहे हैं। काठमांडू घाटी की दो लैब में यह काम किया जा रहा है। इनमें नेपाल पुलिस सेंट्रल फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी और खुमलटार की नेशनल फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी शामिल हैं। नेपाल पुलिस के मुताबिक मंगलवार शाम तक 1,068 शव बरामद किए जा चुके थे। इनमें करीब 400 मामलों में सिर्फ शरीर के कुछ हिस्से मिले हैं। ऐसे मामलों में DNA जांच के जरिए मृतकों की पहचान करना बेहद जरूरी हो गया है। बाढ़ में तबाह स्कूल को भी दोबारा बनाएगा भारत भारत की मदद राहत और बचाव अभियान तक सीमित नहीं है। भारत ने नुवाकोट के बिदुर में बाढ़ से क्षतिग्रस्त त्रिभुवन त्रिशूली सेकेंडरी स्कूल को दोबारा बनाने का फैसला भी किया है। यह स्कूल भारत-नेपाल सहयोग के लिहाज से भी अहम है। इसके पुराने भवन का संबंध भारत की विकास सहायता से रहा है। अब नई इमारत भी भारत के हाई इम्पैक्ट कम्युनिटी डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत बनाई जाएगी। आपदा के समय पड़ोसी देशों के साथ खड़ा रहा है भारत नेपाल में मौजूदा राहत अभियान आपदा के समय दूसरे देशों की मदद करने की भारत की नीति की एक और मिसाल है। नेपाल में इस बार भी भारत की भूमिका सिर्फ शुरुआती राहत तक सीमित नहीं है। इलाज से लेकर बचाव, सुरंगों में तलाश, टूटे रास्तों को जोड़ने, शवों की पहचान और पुनर्निर्माण तक भारत नेपाल की मदद में हर स्तर पर जुटा है। —————— नेपाल बाढ़ से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… नेपाल बाढ़ में कैसे बचा 40 साल पुराना ‘हरा घर’: मालिक बोला- नींव मजबूत बनाई, नदी किनारे घर था इसलिए ज्यादा ध्यान दिया था नेपाल में 26 अगस्त को त्रिशूली नदी की बाढ़ ने भारी तबाही मचाई। तेज बहाव में गाड़ियां, इमारतें और लोगों के सामान बह गए, लेकिन नुवाकोट जिले में नदी किनारे बना 40 साल पुराना हरा घर लगभग सुरक्षित बच गया। पूरी खबर पढ़ें…

हिमालय के ग्लेशियर सिर्फ बढ़ते तापमान से नहीं जूझ रहे:बर्फ पर जमी कालिख सूरज की गर्मी सोख रही, नेपाल जैसी तबाही का खतरा बढ़ा

हिमालय के ग्लेशियरों पर अब सिर्फ बढ़ते तापमान का खतरा नहीं है। हवा में मौजूद कालिख और धूल भी बर्फ के पिघलने की रफ्तार बढ़ा रही है। गाड़ियों, कोयला बिजलीघरों, फैक्ट्रियों, ईंट भट्ठों, घरों के चूल्हों और जंगलों व खेतों में लगने वाली आग से निकलने वाले कण हवा के साथ ऊंचे पहाड़ों तक पहुंचते हैं और ग्लेशियरों की सफेद सतह पर जम जाते हैं। बर्फ पर जमी कालिख सूरज की गर्मी ज्यादा सोखती है। इससे बर्फ जल्दी पिघलने लगती है। इससे ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार बढ़ सकती है। वैज्ञानिकों की चिंता इसलिए बढ़ रही है क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग के साथ प्रदूषण का यह असर ग्लेशियरों को कमजोर और अस्थिर कर सकता है। नेपाल इसका चिंताजनक उदाहरण है। यहां हाल में ग्लेशियर टूटने के बाद अचानक बाढ़ आई और भारी नुकसान हुआ। इस घटना की सटीक वजह अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ता तापमान और ग्लेशियरों पर जमा प्रदूषण ऐसे हादसों का जोखिम बढ़ा सकते हैं। सफेद बर्फ पर कालिख पड़ते ही पिघलना क्यों बढ़ जाता है? साफ बर्फ सूरज की करीब 90% रोशनी वापस अंतरिक्ष में भेज देती है। इसलिए वह सूरज की गर्मी का बड़ा हिस्सा सोखने से बच जाती है। जब बर्फ पर कालिख यानी ब्लैक कार्बन जमती है तो उसकी सफेदी कम हो जाती है। सतह सूरज की ज्यादा ऊर्जा सोखने लगती है और तेजी से गर्म होती है। इससे बर्फ के पिघलने की रफ्तार भी बढ़ जाती है। एक मॉडलिंग स्टडी के मुताबिक, 2007 से 2016 के बीच हिमालय में ग्लेशियरों के कुल बर्फ नुकसान में दक्षिण एशिया से आया ब्लैक कार्बन एक-तिहाई तक जिम्मेदार हो सकता है। यानी ग्लेशियरों पर असर सिर्फ बढ़ते तापमान का नहीं है। बर्फ पर जम रही कालिख भी उसके गर्म होने और पिघलने में भूमिका निभा रही है। पाकिस्तान से उठी कालिख भी हिमालय तक पहुंच रही सैटेलाइट डेटा के अध्ययन से पता चला है कि पाकिस्तान के औद्योगिक मैदानी इलाकों से निकलने वाला ब्लैक कार्बन और खनिज धूल हवा के साथ ऊंचे हिमालयी ग्लेशियरों तक पहुंच सकता है। ये महीन कण ग्लेशियर की सतह पर जमते हैं और बर्फ को गहरा कर देते हैं। इससे सूरज की ज्यादा ऊर्जा सोखी जाती है और पिघलने की प्रक्रिया तेज हो सकती है। तेजी से पिघलने वाला पानी ग्लेशियर की दरारों के रास्ते अंदर भी जा सकता है। इससे बर्फ के भीतर पानी के रास्ते बन सकते हैं और ग्लेशियर की स्थिरता प्रभावित हो सकती है। अगर कमजोर ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा अचानक टूटकर नीचे आता है तो फ्लैश फ्लड यानी अचानक तेज बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। प्रदूषण सिर्फ बर्फ को काला नहीं करता ब्लैक कार्बन का असर ग्लेशियर की सतह तक सीमित नहीं है। हवा में मौजूद कालिख सूरज की गर्मी सोखकर पहाड़ों के ऊपर के वातावरण को गर्म कर सकती है और बादलों के बनने के तरीके को भी प्रभावित कर सकती है। इससे कुछ इलाकों में बर्फबारी कम होने की स्थिति बन सकती है। ऐसे में ग्लेशियर पर दोहरा दबाव पड़ता है। एक तरफ पुरानी बर्फ तेजी से पिघलती है और दूसरी तरफ उसकी भरपाई के लिए नई बर्फ कम मिल सकती है। कालिख के बड़े स्रोत कौन से हैं? दक्षिण एशिया में ब्लैक कार्बन के प्रमुख स्रोतों में पेट्रोल-डीजल वाहन, कोयला आधारित बिजलीघर और उद्योग, ईंट भट्ठे, लकड़ी और ठोस ईंधन से चलने वाले पारंपरिक चूल्हे, जंगलों की आग और फसल जलाना शामिल हैं। इनसे निकले महीन कण हवाओं के साथ लंबी दूरी तय कर सकते हैं। यानी ग्लेशियर से हजारों किलोमीटर दूर पैदा हुआ प्रदूषण भी हिमालय की बर्फ तक पहुंच सकता है। अच्छी खबर: कालिख कम करने का असर जल्दी दिखता है ब्लैक कार्बन के मामले में राहत की एक वजह भी है। कार्बन डाइऑक्साइड के मुकाबले यह वातावरण में बहुत कम समय तक रहता है। आमतौर पर कुछ दिनों से कुछ हफ्तों तक। इसलिए इसके उत्सर्जन में कमी लाने पर असर जल्दी दिखाई दे सकता है। इसका एक उदाहरण 2020 का कोविड लॉकडाउन है। 2023 में प्रकाशित एक स्टडी में वैज्ञानिकों ने उस दौरान हुए प्रदूषण में कमी का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि प्रदूषण घटने से हिमालय की बर्फ ज्यादा चमकीली हुई और उसके पिघलने की दर 40% तक कम हो गई। इससे पता चलता है कि वाहनों, उद्योगों और दूसरे स्रोतों से निकलने वाली कालिख को कम करके ग्लेशियरों पर पड़ने वाला दबाव कुछ हद तक जल्दी घटाया जा सकता है। हिमालय का संकट सिर्फ पहाड़ों तक सीमित नहीं हिमालय के ग्लेशियर भारत समेत पूरे दक्षिण एशिया के लिए बेहद अहम हैं। इनसे निकलने वाला पानी कई बड़ी नदियों के प्रवाह में योगदान देता है। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से कुछ समय के लिए नदियों में पानी बढ़ सकता है, लेकिन लंबे समय तक यही रफ्तार बनी रही तो ग्लेशियरों में जमा बर्फ घटती जाएगी। इससे भविष्य में पानी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा ग्लेशियरों के पास बनी झीलों के फटने से ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF का खतरा भी बढ़ सकता है। ऐसी बाढ़ कुछ ही समय में निचले इलाकों में भारी तबाही ला सकती है। —————— यह खबर भी पढ़ें… हिमालय में 7 मिनट में तबाही, चीन की तैयारी नाकाम:पिछली बार झील फटी थी, इस बार ग्लेशियर ही टूट गया 26 अगस्त को चीन-नेपाल सीमा पर हिमालय की एक घाटी में ऐसी तबाही आई, जिसमें 1200 से ज्यादा लोगों की जान चली गई। हैरानी की बात ये थी कि चीन इस इलाके में ऐसी आपदा से निपटने की तैयारी पहले ही कर चुका था। पूरी खबर पढ़ें…

BS7 draft likely in couple of months: MoRTH

BS7 draft likely in couple of months: MoRTH
BS7 draft likely in couple of months: MoRTH

“We are ready with the next level of Bharat Stage [emission] standards and the final consultations are underway. We hopefully should be in a position to bring out the draft in a couple of months’ time for the BS 7 introduction,” Ministry of Road Transport and Highways (MoRTH) Secretary V Umashankar said at the 2026 SIAM Annual Convention in Delhi. 

Bharat Stage norms limit the emissions of pollutants like hydrocarbons, sulphur and oxides of nitrogen from vehicles. India currently follows BS6 Phase 2 (or BS6.2) norms, which came into effect on April 1, 2023. “I think the industry is also preparing itself for it. The key challenge there would be the timelines,” Umashankar added.

What changes with BS7?

BS7 will put a greater focus on pollution levels from vehicles in real-world driving conditions rather than laboratory testing. Unlike the dramatic transition from BS4 to BS6, the move to BS7 is a natural progression from BS6. This should put relatively less pressure on manufacturers to upgrade their vehicles. Prices may also go up slightly due to the upgrades. Some models could even be discontinued if upgrading them to meet BS7 norms is not financially viable, something that we saw during the move from BS4 to BS6 in 2020.

Bharat Stage emission norms so far

Bharat Stage emission norms were introduced in India in the year 2000 with the implementation of BS1 standards, while also rolling out BS2 across major cities in a phased manner. BS2 was based on European emission regulations, with the main difference being the test cycle’s top speed – 90kph versus 120kph in Europe.

India remained one stage behind Europe until 2010, after which the oil industry could not supply the low-sulphur fuel needed to progress to BS5 before eventually leapfrogging from BS4 to BS6 in 2020.

How are CAFE norms different from BS standards?

Corporate Average Fuel Economy (CAFE) norms deal with overall fuel consumption, specifically the quantity of fuel consumed. Imposed on a carmaker’s entire fleet, and not on an individual model, it’s a limit set on the total emission of carbon dioxide produced. These norms force manufacturers to make more fuel efficient cars, which impacts many other things. Whereas, Bharat Stage norms measure emissions at a vehicular level.

पुतिन बोले- रूसी जहाजों को जब्त करना आतंकवाद है:इससे यूक्रेन जंग कभी खत्म नहीं होगी; नॉर्वे के जहाज जब्त करने पर नाराजगी जताई

रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच समुद्र में रूसी जहाजों को लेकर तनाव बढ़ गया है। रूस के नागरिक और कारोबारी जहाजों पर हमलों को लेकर राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने चेतावनी दी है। उन्होंने इसे आतंकवाद करार दिया और कहा कि इससे रूस और यूक्रेन के बीच शांति वार्ता की संभावना और मुश्किल हो रही है। पुतिन ने नॉर्वे की ओर से रूसी रिसर्च जहाज प्रोफेसर मोलचानोव को हिरासत में लिए जाने पर भी नाराजगी जताई। नॉर्वे ने यूक्रेन के कहने पर जहाज जब्त किया नॉर्वे ने यूक्रेन की सरकारी कंपनी नाफ्टोगाज की मांग पर इस जहाज को हिरासत में लिया। उस वक्त ‘प्रोफेसर मोलचानोव’ स्वालबार्ड के बारेंट्सबर्ग इलाके में खड़ा था। यह रूस का सरकारी रिसर्च जहाज है। इस पर वैज्ञानिकों और रिसर्च से जुड़े कर्मचारियों के अलावा उनके परिवार और पर्यटक भी सफर करते हैं। यह स्वालबार्ड की रूसी बस्तियों के लिए जरूरी सामान भी पहुंचाता है। नॉर्वे ने यह जहाज किसी समुद्री प्रतिबंध के उल्लंघन के आरोप में नहीं, बल्कि एक पुराने मुआवजे के मामले में जब्त किया। 2014 में रूस ने क्रीमिया पर कब्जा करने के बाद वहां नाफ्टोगाज की संपत्तियों पर नियंत्रण कर लिया था। इसके बाद नाफ्टोगाज ने रूस से मुआवजा मांगा। 2023 में हेग की एक अंतरराष्ट्रीय अदालत ने रूस को नाफ्टोगाज को करीब 4.22 अरब डॉलर देने का आदेश दिया। रूस ने अब तक यह रकम नहीं दी है। पुतिन बोले- यूक्रेन ने 100 रूसी जहाजों पर हमले किए पुतिन ने कहा कि उनकी नाराजगी सिर्फ नॉर्वे द्वारा जहाज जब्त किए जाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यूक्रेन अब समुद्र में रूसी नागरिक जहाजों को सीधे निशाना बना रहा है। उन्होंने दावा किया कि पिछले 40 दिनों के भीतर लगभग 100 रूसी व्यापारिक जहाजों पर हमले किए गए, जिनमें कई रूसी व विदेशी नाविकों की जान गई है। पुतिन ने चेतावनी दी कि रूस दुनिया के किसी भी कोने में इसका करारा जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार है। अमेरिका से बातचीत का रास्ता अभी बंद नहीं हुआ यूक्रेन के साथ शांति वार्ता को लेकर भले ही मुश्किलें बढ़ रही हों, लेकिन पुतिन ने अमेरिका के साथ बातचीत का रास्ता खुला होने के संकेत दिए हैं। उन्होंने कहा कि रूस और अमेरिका के बीच संपर्क लगातार बना हुआ है और मॉस्को, वॉशिंगटन के साथ रिश्ते फिर सामान्य करना चाहता है। पुतिन ने यह भी साफ किया कि इसके लिए सिर्फ रूस की इच्छा काफी नहीं है। अमेरिका को भी इसके लिए तैयार होना होगा। पुतिन ने ट्रम्प के रुख को लेकर कहा कि उनकी समझ के मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति सकारात्मक बातचीत के पक्ष में हैं। उन्होंने बताया कि दोनों देशों की खुफिया एजेंसियों के बीच संपर्क जारी है। ट्रम्प के दूत भी रूस के संपर्क में हैं। इसी बीच पिछले हफ्ते CIA प्रमुख जॉन रैटक्लिफ ने मॉस्को में रूस के खुफिया अधिकारियों से मुलाकात की थी। इस मुलाकात में क्या बात हुई, यह दोनों देशों ने सार्वजनिक नहीं किया है। पुतिन ने नई सैन्य लामबंदी की खबरों को खारिज किया राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने रूस में नई अनिवार्य सैन्य भर्ती या लामबंदी की खबरों को खारिज किया है। उन्होंने कहा कि फिलहाल रूस को नए सैनिकों की लामबंदी की जरूरत नहीं है। व्लादिवोस्तोक में ईस्टर्न इकोनॉमिक फोरम में पुतिन ने कहा, “आज ऐसी कोई स्थिति नहीं है, जिसके लिए लामबंदी की जरूरत हो।” उन्होंने इन खबरों को दुष्प्रचार अभियान बताया। पुतिन के मुताबिक, इस महीने होने वाले रूस के निचले सदन स्टेट ड्यूमा के चुनाव से पहले यह अभियान चलाया जा रहा है, ताकि चुनाव के नतीजों को प्रभावित किया जा सके। उन्होंने कहा कि लोग अपनी इच्छा से सेना में शामिल हो रहे हैं और सैन्य सेवा के लिए कॉन्ट्रैक्ट साइन कर रहे हैं। 2022 में 3 लाख लोगों की हुई थी लामबंदी रूस में आखिरी बार सितंबर 2022 में आंशिक लामबंदी हुई थी। क्रेमलिन के मुताबिक, तब करीब 3 लाख रिजर्व सैनिकों को सेना में बुलाया गया था। इस फैसले के बाद रूस में काफी विरोध हुआ था और बड़ी संख्या में सैन्य सेवा की उम्र वाले पुरुष देश छोड़कर चले गए थे। इसके बाद से क्रेमलिन कई बार कह चुका है कि रूस में दोबारा ऐसी लामबंदी की कोई योजना नहीं है।

बिना किसी बड़े स्टार और PR के नीम करोली बाबा पर मूवी बना 60 करोड़ पार! जानिए कौन हैं हनुमान अंश के डायरेक्टर विशाल चतुर्वेदी

राइटर-डायरेक्टर विशाल चतुर्वेदी की फ़िल्म ‘हनुमान अंश’ 2026 की सबसे बड़ी बॉक्स ऑफ़िस सरप्राइज़ फ़िल्मों में से एक बनकर उभरी है। 7 अगस्त को सिर्फ़ 10 लाख रुपये की ओपनिंग के बावजूद, यह स्पिरिचुअल ड्रामा फ़िल्म – जिसे लगभग 2 करोड़ रुपये के बजट में बनाया गया था – भारत में 50 करोड़ रुपये से ज़्यादा की कमाई करने में सफल रही।

इस फ़िल्म ने 41,245 शो में कुल मिलाकर 72.97 करोड़ रुपये और नेट कलेक्शन के तौर पर 61.88 करोड़ रुपये कमाए हैं। अपने 26वें दिन, ‘हनुमान अंश’ ने 8.50 करोड़ रुपये (नेट) कमाए, जिससे इसने यश की फ़िल्म ‘टॉक्सिक’ की 8.20 करोड़ रुपये की कमाई का रिकॉर्ड तोड़ दिया।

फ़िल्म की लगातार अच्छी रफ़्तार को देखते हुए अब यह सवाल तेज़ी से उठ रहा है कि क्या ‘हनुमान अंश’ 100 करोड़ रुपये के आंकड़े तक पहुंच पाएगी। इस बड़ी हिट के बाद, फ़ैंस यह जानना चाहते हैं कि विशाल चतुर्वेदी कौन हैं। उनके लिंक्डइन प्रोफ़ाइल के अनुसार, विशाल चतुर्वेदी एक फ़िल्ममेकर और ‘स्वंभू मीडिया नेटवर्क’ के फ़ाउंडर हैं।

उन्हें कंटेंट प्रोडक्शन, फ़िल्ममेकिंग और पाक कला (culinary arts) में 14 साल से ज़्यादा का अनुभव है। उन्होंने ‘सेतु’ (2023) और ‘रब करे तू भी’ (2021) में राइटर के तौर पर काम किया है। ‘हनुमान अंश’ की कहानी नीम करौली बाबा के जीवन और उनकी शिक्षाओं पर आधारित है, जिसे चतुर्वेदी ने लिखा और डायरेक्ट किया है।

लोगों के बीच फ़िल्म की तारीफ़ (word-of-mouth) ने 10 लाख रुपये की ओपनिंग वाली इस फ़िल्म की किस्मत बदल दी और आख़िरी हफ़्तों में इसकी कमाई में ज़बरदस्त उछाल आया। यह फ़िल्म इस साल की सबसे चौंकाने वाली थिएटर सक्सेस स्टोरीज़ में से एक है और चौथे हफ़्ते में इसका प्रदर्शन चर्चा का विषय बन गया है। ताज़ा जानकारी के मुताबिक, अब ‘हनुमान अंश’ को ‘होम्बले फ़िल्म्स’ द्वारा दुनिया भर में रिलीज़ किया जा रहा है। यह फ़िल्म अब 11 सितंबर को दुनिया भर में रिलीज़ होगी।