PM मोदी ने कैप्टन स्मित से बात की, VIDEO:174 जानें बचाने वाले पायलट बोले- हनुमान चालीसा पढ़ रहा था, भगवान ने ही हमें बचाया

प्रधानमंत्री मोदी ने शुक्रवार को भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छर से बात की और उनकी बहादुरी की तारीफ की। मोदी ने कैप्टन स्मित से कहा, “पूरा देश आपके लिए प्रार्थना कर रहा है। आपके अच्छे स्वास्थ्य के लिए महामृत्युंजय मंत्र का जाप किया जा रहा है। आपके साहस और सूझबूझ से कई लोगों की जान बची।” मोदी ने बातचीत के दौरान कहा कि देश गर्व से कह सकता है कि भारतीय दूसरों की जान लेने वाले नहीं, बल्कि दूसरों की जान बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालने वाले लोग हैं। कैप्टन स्मित ने PM मोदी को बताया कि उस घटना के दौरान वे हनुमान चालीसा पढ़ रहे थे। पीएम मोदी ने स्मित की मां की तारीफ की प्रधानमंत्री मोदी ने बातचीत के दौरान कैप्टन स्मित की मां गीताबेन का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि स्मित की मां ने उन्हें भगवद्गीता के मूल्यों और उपदेशों के साथ बड़ा किया है। कैप्टन स्मित ने कहा कि प्रधानमंत्री का फोन आने से उन्हें बहुत गर्व महसूस हुआ। उन्होंने कहा कि उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि उनके जीवन में ऐसा पल आएगा। अस्पताल में भर्ती हैं कैप्टन स्मित कैप्टन स्मित अभी UAE के अस्पताल में भर्ती हैं। उन्हें कल सऊदी अरब से एयरलिफ्ट करके अबू धाबी ले जाया गया। UAE में भारत के राजदूत दीपक मित्तल ने अस्पताल में कैप्टन स्मित और उनके परिवार से मुलाकात की थी। उन्होंने बताया था कि पायलट की हालत स्थिर है और वे तेजी से ठीक हो रहे हैं। उनका मनोबल भी ऊंचा है। मित्तल ने कहा कि कैप्टन को अच्छा इलाज मिल रहा है और भारतीय दूतावास वहां के अधिकारियों के लगातार संपर्क में है। राजदूत ने कैप्टन स्मित को भारत का बहादुर बेटा बताया। उन्होंने कहा कि हवा में आपात स्थिति के दौरान उनकी बहादुरी से सैकड़ों लोगों की जान बची और एक बड़ी दुर्घटना टल गई। PM मोदी पहले भी कर चुके हैं तारीफ प्रधानमंत्री मोदी ने गुरुवार को कैप्टन स्मित मच्छर की बहादुरी और सूझबूझ की तारीफ की थी। उन्होंने कहा था कि गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद पायलट ने धैर्य और साहस दिखाया। उनकी बहादुरी से पूरा देश गर्व महसूस कर रहा है।

मोदी ने कहा, “इजराइल के प्रधानमंत्री ने भी कहा कि एक भारतीय ने 9/11 जैसी त्रासदी रोक दी। हमारे देश के हर नागरिक को स्मित की बहादुरी पर बहुत गर्व है।”

प्रधानमंत्री ने कैप्टन मच्छर के माता-पिता और पत्नी से भी बात की थी। उन्होंने पिता भूपेंद्रभाई, मां गीताबेन और पत्नी सोनलबेन से उनकी सेहत की जानकारी ली। साथ ही भरोसा दिलाया कि भारतीय मिशनों की ओर से पायलट और उनके परिवार को हर संभव मदद दी जाएगी। खबर अपडेट हो रही है… ——————————- ये खबर भी पढ़ें… ट्रम्प बोले- फ्लाईदुबई को-पायलट का ईरान कनेक्शन हो सकता है:ऐसा हुआ तो कड़ी कार्रवाई होगी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि इजराइल जा रहे फ्लाईदुबई विमान के को-पायलट का ईरान से संबंध हो सकता है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

Smit Machchhar: ‘हिंदुस्तानी ने 9/11 होने से बचा लिया…’; पीएम मोदी ने कैप्टन स्मित मच्छार के परिवार से की बात, पायलट की बहादुरी की जमकर की तारीफ

Smit Machchhar: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार (1 अक्टूबर) को 174 लोगों की जान बचाने वाले भारतीय कैप्टन स्मित मच्छार की पत्नी और माता-पिता से फोन पर बात की। इस दौरान उनकी बहादुरी की जमकर सराहना की। कैप्टन मच्छार ने ‘फ्लाईदुबई’ विमान को दुर्घटनाग्रस्त करने की अपने सह-पायलट की कोशिश को नाकाम कर दिया था, जिससे सैकड़ों लोगों की जान बची। पायलट की पत्नी और उनके माता-पिता के साथ फोन पर बातचीत में पीएम मोदी ने यह भी कहा कि भारतीय मिशन घायल पायलट को हर संभव मदद मुहैया करा रहे हैं। पायलट का सऊदी अरब के एक अस्पताल में इलाज किया जा रहा है।

सरकारी सूत्रों ने न्यूज एजेंसी पीटीआई को बताया कि फोन पर बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने पायलट की बहादुरी की तारीफ की, जिसकी वजह से सैकड़ों लोगों की जान बची। इससे पहले, पीएम मोदी ने भारतीय पायलट की प्रशंसा करते हुए उन्हें नायक बताया था। उन्होंने कहा था कि देश को उनकी बहादुरी पर गर्व है। पीएम मोदी ने कहा कि हिंदुस्तानी ने 9/11 होने से बचा लिया।

PM मोदी ने कैप्टन मच्छार की सराहना करते हुए कहा कि गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने सैकड़ों लोगों की जान बचाने में मदद की और बड़ी त्रासदी टाली। दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की उड़ान एफजेड1073 ने बुधवार को इमरजेंसी अलर्ट भेजे थे। इसके बाद विमान 34,000 फुट की ऊंचाई से तेजी से 17,000 फुट से अधिक नीचे आ गया। बाद में उसका रूट सऊदी अरब के तबूक शहर स्थित प्रिंस सुल्तान बिन अब्देल अजीज एयरपोर्ट की ओर मोड़ दिया गया। विमान में 27 बच्चों समेत 174 यात्री सवार थे।

‘स्मित मच्छार एक नायक हैं’

PM मोदी ने X पर एक पोस्ट में कहा, “कैप्टन स्मित मच्छार एक नायक हैं। सबसे गंभीर खतरे का सामना करते हुए और गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने दूसरों की जान बचाने के लिए अदम्य साहस और अटूट संकल्प दिखाया। उनके साहस ने सैकड़ों लोगों की जान बचाने में मदद की और बड़ी त्रासदी टाली।” प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत को कैप्टन मच्छार पर गर्व है। उन्होंने कहा, “मैं उनके जल्द स्वस्थ होने और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता हूं।”

‘भारत ने 9/11 होने से बचा लिया’

इसके अलावा प्रधानमंत्री मोदी ने गुरुवार को ‘भारत मंडपम’ में UPSC के शताब्दी समारोह के दौरान भी भारतीय पायलट की तारीफ की। पीएम मोदी ने कहा, “कल एक घटना घटी थी जिसमें भारत के कैप्टन स्मित ने धैर्य, सूझबूझ और साहस का परिचय दिया है। कल इजरायल के प्रधानमंत्री ने कहा है कि भारत ने 9/11 होने से बचा लिया है। उनका यह पराक्रम हमें गौरव से भर देता है… आज पूरी दुनिया पर गर्व कर रही है। हम सभी स्मित की दीर्घायु के लिए प्रार्थना करें और उनका अभिनंदन करें।”

नेतन्याहू ने भी की तारीफ

बुधवार रात इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी मच्छार की सराहना करते हुए उन्हें सच्चा नायक बताया। नेतन्याहू ने कहा, “चाकू से हमला किए जाने और गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने मुकाबला किया, हमलावर का प्रतिरोध किया तथा कॉकपिट का दरवाजा खोला, जिससे यात्री तथा चालक दल के सदस्य हमलावर को काबू में कर पाए। इससे हवा में एक भयावह दुर्घटना टल गई।”

इजरायली प्रधानमंत्री ने कहा, “उन्होंने इजराइली नागरिकों और अन्य देशों के नागरिकों समेत 174 लोगों की जान बचाई। मैं कैप्टन मच्छार के जल्द और पूरी तरह स्वस्थ होने की कामना करता हूं। वह सच्चे नायक हैं।” उन्होंने कहा, “असाधारण बहादुरी दिखाने वाले भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छार को मेरा सलाम।” सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में पायलट खून से लथपथ, ऑक्सीजन मास्क पहने और विमान की गैली में पीठ के बल लेटे हुए दिखाई दे रहे हैं।

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अपने पहले के बयान में नेतन्याहू ने कहा था कि एक इजरायली यात्री ने उन्हें बताया कि विमान तेजी से घूमने लगा और नीचे उतरने लगा। इसके बाद यात्री और चालक दल का एक सदस्य कॉकपिट में घुसने में कामयाब रहा और दोनों ने मिलकर उस पायलट पर काबू पाया, जिसने विमान की प्रणाली को नुकसान पहुंचाने की कोशिश के दौरान मच्छार पर चाकू से हमला किया था। नेतन्याहू के अनुसार, चालक दल का एक अन्य सदस्य इसके बाद कॉकपिट में पहुंचा और विमान को स्थिर करने में मदद की।

इजराइल जा रहा विमान हाईजैक करने की कोशिश

नई दिल्ली। बुधवार को भारतीय पायलट की बहादुरी और सूझबूझ साथ ही विमान के यात्रियों के साहस के कारण एक बहुत बड़ी घटना टल गई। दुबई से इजराइल जा रहे एक विमान को हवा में हाईजैक करने की कोशिश हुई। विमान के को पायलट ने ही विमान हाईजैक करने का प्रयास किया, जिसे विमान के भारतीय पायलट ने विफल कर दिया। इस दौरान दोनों पायलटों के बीच मारपीट हुई और विमान भी एक मिनट के अंदर 17 हजार फीट नीचे गिरा। इसमें कई यात्री घायल हुए। बाद में लड़ाकू विमानों के घेरे में विमान की लैंडिंग कराई गई।

हाईजैक करने का प्रयास करने वाला को पायलट ओमान का था। इजराइल की एजेंसियां इस बात की जांच कर रही हैं कि ओमान के साथ जब इजराइल के राजनयिक संबंध नहीं हैं फिर कैसे वहां का पायलट इजराइल के विमान के कॉकपिट में पहुंचा। बताया जा रहा है कि को पायलट विमान को हाईजैक करके उसे क्रैश कराना चाहता था। उसने विमान के मुख्य पायलट पर चाकू से हमला किया और विमान का कंट्रोल अपने हाथ में लेने की कोशिश की। भारतीय पायलट ने चालक दल के सदस्यों और यात्रियों की मदद से को पायलट को काबू में किया।

बताया गया है कि फ्लाई दुबई की उड़ान में बुधवार सुबह करीब नौ बजे यह घटना हुई। इस वजह से एक मिनट के अंदर विमान करीब 17 हजार फीट नीचे आ गया। इसके बाद विमान से हाईजैक का अलर्ट भेजा गया। इजराइल ने तुरंत लड़ाकू विमान रवाना किए। उनकी निगरानी में उड़ान का रास्ता बदला गया और उसे सऊदी अरब के ताबुक एयरपोर्ट पर इमरजेंसी लैंडिंग कराई गई। फ्लाइट में करीब 180 यात्री सवार थे, जिनमें लगभग 150 इजराइली नागरिक थे।

बताया जा रहा है कि विमान के कॉकपिट में पायलट और को पायलट के बीच झगड़ा हुआ था। इसी दौरान विमान से इमरजेंसी सिग्नल भेजे गए। इजराइल की  मीडिया ने चश्मदीदों के हवाले से दावा किया है कि झगड़ा तब शुरू हुआ, जब एक पायलट ने विमान को जमीन की तरफ मोड़कर क्रैश करने की कोशिश की। जब विमान नीचे गिरने लगा तो आगे बैठे कुछ इजराइली यात्री कॉकपिट की तरफ दौड़े। उन्होंने हमलावर पायलट से लड़कर उसे कॉकपिट से बाहर निकाला। यात्री के मुताबिक, विमान में सादे कपड़ों में दो और पायलट भी मौजूद थे। उनमें से एक पायलट ने विमान का कंट्रोल संभाला।

NCERT ने क्लास 9 के लिए मध्यकालीन इतिहास की किताब में बदलाव किया, नई किताब में क्या क्या लिखा गया सब जानिए

NCERT Book Row: राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की क्लास 9 की नई सोशल साइंस की किताब में कहा गया है कि भारत में देवियों की पूजा एक पुरानी परंपरा रही है। इसमें आगे कहा गया है कि सातवीं सदी से ही कई राजाओं और राजकुमारों ने लड़ाई के समय काली, दुर्गा, भवानी और शक्ति के दूसरे रूपों को रक्षक के तौर पर याद किया है। ‘अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड- पार्ट 2’ नाम की यह किताब नए एकेडमिक सेशन के शुरू होने के छह महीने बाद मंगलवार (30 सितंबर) को जारी की गई। इस किताब का पहला हिस्सा जून में जारी किया गया था।

‘रसिस्टेंस एंड रीजिलियन्स’ (प्रतिरोध और मजबूती) नाम के चैप्टर में सातवीं सदी से भारतीय उपमहाद्वीप पर हुए लगातार हमलों का जिक्र है। साथ ही युद्ध में धार्मिक परंपराओं के बारे में भी बताया गया है। किताब में लिखा है, “भारत में देवियों की पूजा एक पुरानी परंपरा रही है। काली, दुर्गा और भवानी जैसी देवियों की पूजा को एक पुरानी प्रथा बताया गया है, जिसमें शासक लड़ाई के समय शक्ति के रूपों को रक्षक के तौर पर याद करते थे।”

किताब में लिखा है, “भारत में देवियों की पूजा एक पुरानी परंपरा रही है। काली, दुर्गा और भवानी जैसी देवियों की पूजा को एक पुरानी प्रथा बताया गया है, जिसमें शासक लड़ाई के समय शक्ति के रूपों को रक्षक के तौर पर याद करते थे।”

इसमें कहा गया है, “माना जाता है कि बस्तर के शासक अन्नमराजा को उनकी तलवार माणिक्यदेवी (दंतेश्वरी) से मिली थी। जबकि विजयनगर के कुमार कंपन ने मदुरै में सल्तनत की सेनाओं के खिलाफ देवी से मिली तलवार का इस्तेमाल किया था। इसी तरह, पारंपरिक रूप से यह भी माना जाता है कि शिवाजी को देवी तुलजा भवानी से तलवार मिली थी।”

भारतीय शासकों के बारे में क्या कहा गया?

इस अध्याय में बताया गया है कि भारतीय उपमहाद्वीप ने सातवीं सदी के बाद से क्षेत्रीय विस्तार और धार्मिक उद्देश्य से प्रेरित हमलों का लगातार सामना किया। इसमें यह भी बताया गया है कि भारतीय शासकों और समुदायों ने अरब, तुर्की, मुगल और यूरोपीय सेनाओं का विरोध कैसे और कब किया।

एनसीईआरटी प्रमुख दिनेश सकलानी के अनुसार, “इस (सेकेंडरी) स्तर पर सामाजिक विज्ञान की पढ़ाई से विश्लेषणात्मक और तार्किक क्षमता विकसित होने, आलोचनात्मक पड़ताल को बढ़ावा मिलने, अलग-अलग संस्कृतियों की समझ बढ़ने और सीखने वालों को नागरिक व सामाजिक जीवन में आत्मविश्वास और जिम्मेदारी के साथ भाग लेने में सक्षम बनाने की उम्मीद की जाती है।”

उन्होंने कहा, “इसी भावना के साथ माध्यमिक स्तर के लिए किताब ‘अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड- पार्ट 2’ की रूपरेखा तैयार की गई और इसे विकसित किया गया है।”

अल्प ज्ञात महिला शासकों का उल्लेख

एनसीईआरटी की ओर से तैयार की गई कक्षा-9 की नई सामाजिक विज्ञान की किताब में चालुक्य वंश की रानी नायकी देवी से लेकर उल्लाल की रानी अब्बक्का चौटा तक भारत की अल्प ज्ञात महिला शासकों के बारे में जानकारी दी गई है। नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने के छह महीने बाद मंगलवार को ‘अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड-पार्ट 2’ नामक यह किताब जारी की गई। किताब का पहला भाग इस साल जून में जारी किया गया था।

रानी नायकी देवी को 1178 में माउंट आबू के पास कसरहड़ा में मोहम्मद गोरी को हराने का श्रेय दिया जाता है। सातवीं शताब्दी के बाद भारतीय उपमहाद्वीप पर हुए एक के बाद एक आक्रमणों का विवरण देने वाले अध्याय प्रतिरोध और दृढ़ता में तुर्क आक्रमणकारियों के खिलाफ हिंदू शाही शासकों, चंदेलों, सोलंकियों और चौहानों के प्रतिरोध का भी उल्लेख किया गया है।

वर्तमान कर्नाटक के उल्लाल की शासक रानी अब्बक्का चौटा (1525 से 1570) ने पुर्तगालियों की नौसेना का डटकर सामना किया था। काकतीय वंश की रानी रुद्रमा देवी का भी इस किताब में उल्लेख किया गया है, जिन्होंने दिल्ली सल्तनत के समक्ष प्रतिरोध किया था।

चर्चित प्रतिरोध गाथाओं में क्या है?

पाठ्यपुस्तक में बताई गईं कम चर्चित प्रतिरोध गाथाओं में मदुरै के मुथु वीरप्पा नायक की कहानी भी शामिल है। माना जाता है कि उन्होंने मुगल दरबार की ओर से भेजी गई चप्पल के सामने झुकने से इनकार कर दिया था और इसके बजाय उसमें अपना पैर रख दिया था।

किताब में यह भी बताया गया है कि तमिलनाडु के जिंजी (सेनजी) किले को 2025 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया। इसके के अनुसार किले पर विजयनगर नायकों, बीजापुर सल्तनत, मुगलों, मराठों, फ्रांसीसियों और अंग्रेजों का शासन रहा।

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रानी दुर्गावती का भी जिक्र

इस किताब में शामिल ऐतिहासिक हस्तियों में रानी दुर्गावती भी थीं, जिन्हें गढ़ा/गोंड राज्य में साहस, नेतृत्व और प्रशासनिक क्षमता वाली शासक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस किताब में ‘द माइटी मराठा वुमेन’ विषय के तहत ताराबाई और अहिल्याबाई होलकर का भी उल्लेख किया गया है।

चीनी महिला ने रोते हुए 4 महीने के अपने बेटे को सुनाया हनुमान चालीसा, 5 सेकंड में शांत हुआ बच्चा! वीडियो वायरल

Viral Video: बच्चे के रोने पर उसे चुप कराने के लिए अक्सर माता-पिता अलग-अलग तरीके अपनाते हैं। कोई उसे गोद में लेकर टहलाता है, तो कोई लोरी सुनाता है। लेकिन कैलिफोर्निया के सबसे बड़े शहर लॉस एंजिल्स में रहने वाली 40 वर्षीय चीनी बिजनेसवुमन सारा जेन हो ने अपने चार महीने के बेटे के साथ अपनाई जाने वाली कुछ पेरेंटिंग आदतों को इंस्टाग्राम पर शेयर किया है। इन आदतों में बच्चे को रोजाना सुबह लूप में हनुमान चालीसा सुनाना, बच्चे को कुत्तों के आसपास रहने देना, और उसके नंगे पैरों को प्राकृतिक सतहों (घास या जमीन) के संपर्क में आने देना शामिल है।

इस दौरान उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट के जरीए मां बनने के अपने अनुभव के बारे में भी बताया और दूसरे माता-पिता से अपने 4 महीने के बेटे की परवरिश को लेकर सुझाव भी मांगे। सारा ने पोस्ट में बताया कि वह अपने बेटे को Baby J कहकर बुलाती हैं।

सारा अपने बच्चे को सुनाती हैं ‘हनुमान चालीसा’

उन्होंने अपनी पोस्ट में बताया कि जब Baby J चिड़चिड़ा हो जाता है या रोने लगता है, तो वह उसे हनुमान चालीसा सुनाती हैं। हनुमान चालीसा एक हिंदू धार्मिक पाठ है। सारा के मुताबिक, जैसे ही वह हनुमान चालीसा चलाती हैं, उनका बेटा करीब 5 सेकंड में शांत हो जाता है और लगभग 2 मिनट में सो जाता है।

इंडियन दोस्त ने बताया ‘हनुमान चालीसा’ के बारे में

उन्होंने बताया कि हनुमान चालीसा के बारे में उन्हें एक इंडियन दोस्त से पता चला था, जिनसे उनकी मुलाकात Burning Man फेस्टिवल के दौरान हुई थी। जो लोग नहीं जानते उन्हें बताते चलें कि Burning Man अमेरिका के नेवादा के Black Rock Desert में होने वाला एक सालाना सांस्कृतिक फेस्टिवल है, जो करीब सात दिनों तक चलता है।

Sarah ने बताया कि अब वह हर सुबह हनुमान चालीसा को लूप पर चलाती हैं, यानी इसे बार-बार सुनाती हैं।

‘मैं उसे रोते हुए छोड़ने में यकीन नहीं रखती’

सारा ने यह भी बताया कि जब उनका बच्चा रोता है, तो वह कैसे रिएक्ट करती हैं।

उन्होंने बताया, “शुरुआती 9 महीनों में बच्चे को यह एहसास नहीं होता कि वह एक अलग इंसान है, इसलिए जब भी वह रोता है, मैं उसे तुरंत गोद में उठा लेती हूं। मैं उसे रोते-रोते सो जाने देने में यकीन नहीं रखती। अगर कुछ कोशिशों करने के बाद भी वह शांत नहीं होता, तो मैं तुरंत हनुमान चालीसा चला देती हूं, जिससे वह शांत हो जाता है।”

उनकी पोस्ट में उन दूसरे तरीकों का भी जिक्र था जिन्हें उन्होंने बेबी J की दिनचर्या में शामिल किया है।

सारा ने बताया कि वह अपने बेटे को रोजाना 8 मिनट तक ब्राह्म्स की लोरी (Brahms’ Lullaby) सुनाती हैं। उनका दावा है कि कुछ डेटा से पता चलता है कि यह म्यूजिक बच्चे के दिमाग के विकास की रफ्तार बढ़ाने में मदद कर सकता है।

40 की उम्र में सरोगेसी से मां बनी हैं सारा

अपनी पोस्ट में सारा बताती हैं वे 40 साल की उम्र में सरोगेसी की मदद से मां बनी हैं. वे बताती हैं कि बच्चा अभी सरोगेट मदर का ही दूध पीता है, इसीलिए वे उनको मूंगफली और सोया मिल्क भेज रही हैं ताकि बच्चे को इनकी आदत जल्दी हो जाए और उसे एलर्जी न हो। सारा बताती हैं कि वे अपनी समझ से ऐसा कर रही हैं, हालांकि साइंटिफिकली यह कितना सही है, इसका अंदाजा उन्हें नहीं है।’

उन्होंने अपने सरोगेसी के अनुभव में दिलचस्पी रखने वाले फॉलोअर्स को अपने पॉडकास्ट ‘हॉट वॉटर’ (Hot Water) के एपिसोड 69 को सुनने के लिए भी कहा।

एलर्जी से बचाने के लिए ये सब कर रहीं सारा

बेबी जे को किसी की तरह से की तरह की एलर्जी से बचाने के लिए सारा अभी से उसे दोस्तों और पड़ोसियों के कुत्तों के संपर्क में ले जाती हैं। साथ ही साथ रोजाना उसे बगीचे में ग्राउंडिंग भी करवाती हैं। वे कहती हैं कि बच्चे के पैरों में 2 लाख से ज्यादा नर्व एंडिंग्स होते हैं, और ऐसे करने से उसके न्यूरोलॉजिकल और शारीरिक विकास में मदद मिलती है।

सारा ने अपनी पोस्ट के आखिर में दूसरे माता-पिता से सुझाव मांगे कि वे अपने चार महीने के बच्चे के साथ क्या-क्या कर सकती हैं। उन्होंने लिखा, “क्या आप मेरे साथ कुछ और टिप्स शेयर कर सकते हैं जिन्हें मैं बेबी J के साथ आजमा सकूं?”

हनुमान चालीसा वाली पोस्ट पर यूजर्स ने दी प्रतिक्रिया

इंस्टाग्राम पर इन तस्वीरों और फोटोज को लोग खूब पसंद कर रहे हैं और कमेंट बॉक्स मेंज जमकर प्रतिक्रियाएं भी दे रहे हैं:-

एक यूजर ने लिखा, “हनुमान चालीसा सिर्फ एक इंडियन सॉन्ग नहीं है। यह गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित एक पवित्र भक्ति ग्रंथ है, जिसे हिंदू बहुत सम्मान देते हैं। इसे भगवान हनुमान के प्रति भक्ति और प्रार्थना के रूप में पढ़ा और गाया जाता है। कृपया एक सांस्कृतिक गीत और एक ऐसे पवित्र ग्रंथ के बीच का अंतर समझें, जिसका लाखों हिंदुओं के लिए गहरा आध्यात्मिक महत्व है।”

एक अन्य यूजर ने हनुमान चालीसा को अपनी रोजाना की पूजा का हिस्सा बताया। साथ ही, उन्होंने इसके ज्योतिषीय फायदों को लेकर भी एक दावा किया। यूजर ने लिखा, “हनुमान चालीसा मेरा रोज का मंत्र है। जिन लोगों की कुंडली में 8वें भाव में केतु होता है, उनके लिए यह बहुत फायदेमंद है। यह एक तरह की प्राकृतिक दवा है।”

एक तीसरे यूजर ने सारा के मां बनने के तरीके की तारीफ की। उन्होंने लिखा, “Baby J बहुत खुशकिस्मत है कि उसे आप जैसी मां मिली हैं।”

एक अन्य यूजर ने भगवान हनुमान से जुड़े धार्मिक पाठ सुंदरकांड का जिक्र किया। उन्होंने लिखा, “सुंदरकांड नाम की एक खूबसूरत किताब है, जिसमें भगवान हनुमान की महिमा बताई गई है। मेरी मां गर्भावस्था के दौरान इसका पाठ करती थीं। इससे बच्चे में भक्ति और साहस की अच्छी भावना जागती है। यह सूर्य का ज्ञान रखने वाले एक दिव्य और निस्वार्थ प्रेम करने वाले देवता की कहानी है।”

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UNGA में डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा ऐलान, यूक्रेन युद्ध पर जल्द कुछ करूंगा, ईरान पर कड़ा रुख

UNGA में डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा ऐलान, यूक्रेन युद्ध पर जल्द कुछ करूंगा,  ईरान पर कड़ा रुख

donald trump

संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के मंच से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अपनी ट्रेडमार्क आक्रामक शैली में दुनिया को अपना कड़ा रुख दिखा दिया है। ट्रंप ने कहा कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार नहीं बना पाएगा। चुनाव के बाद ईरान से डील करेंगे। हमने यह युद्ध लगभग खत्म कर दिया है। ईरान का पूरी तरह से आर्थिक बहिष्कार करें।

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ट्रंप ने कहा कि मैंने 8 युद्ध खत्म करवाए। ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में उन देशों को चेतावनी दी जो रूस और ईरान से तेल या ऊर्जा खरीद रहे हैं। ट्रंप ने कहा कि रूस- यूक्रेन के युद्ध पर कुछ करने वाला हूं। हालांकि ट्रंप ने अपने भाषण में बड़े-बड़े दावे किए लेकिन चुनाव से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति की लोकप्रियता में बड़ी गिरावट आई है।  

यूक्रेन और मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध और तेज़ी से हो रहे AI डेवलपमेंट के खतरों जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा करने के लिए न्यूयॉर्क में UN जनरल असेंबली में दुनिया भर के लगभग 130 नेता इकट्ठा हो रहे हैं। असेंबली में अपने भाषण में, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि उन्हें लगता है कि नवंबर में होने वाले मिड-टर्म चुनावों के ठीक बाद अमेरिका ईरान के साथ कोई डील करेगा।

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस इवेंट में शामिल नहीं हो रहे हैं और इसके बजाय गुरुवार को वॉशिंगटन में ट्रंप के साथ आमने-सामने बातचीत करेंगे, जिससे दुनिया के बड़े मामलों से UN के किनारे हो जाने का डर और बढ़ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र को संबोधित करते हुए अपनी विदेश नीति और अमेरिका की सैन्य ताकत का उल्लेख किया। ट्रंप ने शांति के क्षेत्र में अपने रिकॉर्ड का जिक्र करते हुए कहा कि कई नेताओं ने शांति की बात की, लेकिन उन्होंने शांति कायम करने के लिए कदम उठाए।

 

ईरान का सीधे तौर पर जिक्र करते हुए ट्रंप ने कहा कि जब कुछ नेता खतरों को नजरअंदाज कर रहे थे, तब उन्होंने उनका सामना किया। उन्होंने कहा कि जहां दूसरे नेता साहस और ताकत की बात करते रहे, वहीं अमेरिका ने दोनों का प्रदर्शन किया। ट्रंप ने दावा किया कि उनके दृष्टिकोण ने अमेरिका को दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश बनाया है।

 

ट्रंप ने अमेरिका के ‘गोल्डन एज’ का किया दावा

 

ट्रंप ने पिछली सरकार से विरासत में मिले दौर को अमेरिका का “डार्क एज” बताते हुए कहा कि उनकी सरकार ने देश को “गोल्डन एज” की ओर बढ़ाया है। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका की संपत्ति, ताकत, ऊर्जा और गति से पूरी दुनिया को भी फायदा हो रहा है।

 

हालांकि, ईरान से जुड़े संघर्ष के मामले में व्हाइट हाउस के कई घोषित लक्ष्य अभी तक पूरी तरह हासिल नहीं हुए हैं। इस संघर्ष का आर्थिक असर भी पड़ा है, खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने के बाद वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव बढ़ा है।

 

ईरान को लेकर ट्रंप ने रखे दो विकल्प

 

ईरान के साथ संभावित समझौते को लेकर ट्रंप ने कहा कि उनके सामने एक बड़ा फैसला है। उन्होंने कहा कि सवाल यह है कि क्या ऐसा समझौता हो सकता है, जिससे ईरान दोबारा निर्माण कर सके और पहले से कहीं अधिक मजबूत देश बन सके।

 

ट्रंप ने इसके साथ ही इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान को सैन्य कार्रवाई के जरिए पूरी तरह खत्म करने की संभावना का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ऐसा करने से ईरान के पास भविष्य में लोगों और देशों को नुकसान पहुंचाने का अवसर नहीं रहेगा।

 

हालांकि, ट्रंप ने कहा कि उन्हें विश्वास है कि अमेरिका के मध्यावधि चुनावों के बाद ईरान के साथ जल्द समझौता हो सकता है। उन्होंने दावा किया कि ईरान यह देखना चाहता है कि अमेरिका के मध्यावधि चुनावों में उनका प्रदर्शन कैसा रहता है। ट्रंप ने यह भी कहा कि वह इस चुनाव में उम्मीदवार नहीं होंगे और पहले ही चुनाव लड़कर भारी जीत हासिल कर चुके हैं।

 

पुतिन से बोले ट्रंप- यूक्रेन युद्ध खत्म करें

 

संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय पहुंचने पर ट्रंप ने अमेरिका की प्रगति का जिक्र किया। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के लिए संदेश पूछे जाने पर ट्रंप ने संक्षेप में कहा कि उन्हें “युद्ध खत्म करना चाहिए”।

 

ट्रंप के निशाने पर फिर संयुक्त राष्ट्र

राष्ट्रपति बनने के बाद से ट्रंप संयुक्त राष्ट्र और महासचिव एंटोनियो गुटेरेस की कार्यप्रणाली की आलोचना करते रहे हैं। पिछले वर्ष संयुक्त राष्ट्र में उनके संबोधन के दौरान भी कई शिकायतें सामने आई थीं। इनमें संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय की एस्केलेटर के कुछ समय के लिए बंद होने और टेलीप्रॉम्प्टर में आई तकनीकी समस्या को लेकर की गई टिप्पणियां शामिल थीं।

 

संयुक्त राष्ट्र की आलोचना के बावजूद, अमेरिका ने पिछले सप्ताह संयुक्त राष्ट्र के बजट में करीब 72.5 करोड़ डॉलर का भुगतान किया। इससे संगठन को कुछ वित्तीय दबाव से राहत मिली और उसके मतदान अधिकारों पर संभावित असर का जोखिम टला।

 

ट्रंप के इस वर्ष के संबोधन में संयुक्त राष्ट्र की आलोचना के साथ-साथ उनकी सरकार की विदेश नीति की उपलब्धियों को सामने रखने पर भी जोर रहा। इसमें ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियान और मध्य पूर्व में कूटनीतिक पहलों का विशेष उल्लेख शामिल है।

तो प्रदूषण के पैसे देने पड़ते हैं 

ट्रम्प ने कहा कि अमेरिका ने दुनिया के जहाजों पर कार्बन टैक्स लगाने की योजना को रोकने के लिए दखल दिया। यह योजना संयुक्त राष्ट्र की संस्था इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन (IMO) ला रही थी। इसके तहत दुनियाभर की शिपिंग कंपनियों को अपने जहाजों से होने वाले प्रदूषण के लिए टैक्स देना पड़ता। ट्रम्प ने कहा कि यह बहुत महंगा टैक्स होता, इसलिए अमेरिका को इसे रोकने के लिए आगे आना पड़ा। अगर यह योजना लागू हो जाती तो यह पहली बार होता जब पूरे शिपिंग उद्योग को अपने प्रदूषण के लिए पैसे देने पड़ते।

सेवारत सैनिक बेटे के पिता ने किया लिवर और किडनी दान, एयरफोर्स सफलतापूर्वक पूरा किया मिशन

एक सेवारत सैनिक के 62 साल के पिता ने बेहद साहसिक फैसला किया। उन्होंने लिवर और एक किडनी दान कर मानवीय मूल्यों का सर्वोच्च प्रदर्शन किया। अंगदान के बाद इन महत्वपूर्ण अंगों को तय समयसीमा के भीतर जरूरतमंद मरीजों तक पहुंचाना बेहद जरूरी था। इस चुनौतीपूर्ण काम में भारतीय वायुसेना ने अहम भूमिका निभाई।

दिल्ली के अलग-अलग अस्पतालों में पहुंचाए गए अंग

भारतीय वायुसेना ने मेडिकल टीमों के साथ सहयोग करते हुए चंडीगढ़ से दिल्ली तक अंगों को एयरलिफ्ट किया। एयरलिफ्ट किए गए दोनों अंगों को दिल्ली के अलग-अलग अस्पतालों में पहुंचाया गया। लिवर को आर्मी हॉस्पिटल (रिसर्च एंड रेफरल) में ट्रांसप्लांट के लिए भेजा गया, जबकि किडनी को सफदरजंग अस्पताल पहुंचाया गया।

वायुसेना ने तेजी से पूरी की प्रक्रिया

इस पूरे मिशन की खास बात यह रही कि अंगदान करने वाले 62 वर्षीय व्यक्ति ने अपने बेटे, जो भारतीय सेना में सेवारत है, के माध्यम से देशसेवा की भावना को एक अलग स्तर पर पहुंचाया। उन्होंने अपने अंग दान कर जरूरतमंद मरीजों को नया जीवन मिलने की उम्मीद जगाई। मिशन के दौरान समय की गंभीरता को देखते हुए पूरी प्रक्रिया तेजी से पूरी की गई, ताकि अंगों को सुरक्षित और जल्द से जल्द संबंधित अस्पतालों तक पहुंचाया जा सके।

पहले भी ऐसे मिशन का हिस्सा रही है वायुसेना

भारतीय वायुसेना पहले भी ऐसे मिशन का हिस्सा रह चुकी है। समय-समय पर आपात स्थितियों में मेडिकल इवैक्यूएशन और महत्वपूर्ण अंगों को समय पर पहुंचाने जैसे मिशनों में सहयोग करती रही है। इस मिशन में भी तेज प्रतिक्रिया और सटीक समन्वय के जरिए चंडीगढ़ से दिल्ली तक जीवन बचाने की इस महत्वपूर्ण कड़ी को पूरा किया गया।

बिहार की चार हस्तियों को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार

बिहार की चार फिल्मी हस्तियों को वर्ष 2024 के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। बिहार के लिए 72वां राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह खास होने जा रहा है। बिहार से जुड़ी चार फिल्मी हस्तियों अभिनेता संजय मिश्रा, निर्देशक कमलेश के. मिश्र, निर्माता मिंटी मिश्रा और फिल्म समीक्षक संजीव श्रीवास्तव को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 22 सितंबर को गुजरात के एकता नगर (केवाड़िया) में आयोजित समारोह में पुरस्कार प्रदान करेंगी। दरभंगा निवासी अभिनेता संजय मिश्रा को फिल्म ‘भक्षक’ में बेहतरीन अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का रजत कमल प्रदान किया जाएगा। ‘भक्षक’ की कहानी चर्चित मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड से प्रेरित है। गोपालगंज निवासी निर्देशक कमलेश के. मिश्र और निर्माता मिंटी मिश्रा को फिल्म ‘काकोरी’ के लिए सर्वश्रेष्ठ जीवनीपरक/ऐतिहासिक पुनर्निर्माण/संकलन फिल्म का रजत कमल प्रदान किया जाएगा। देशभक्ति पर आधारित यह फिल्म 1925 के ऐतिहासिक ‘काकोरी ट्रेन एक्शन’ के शताब्दी वर्ष पर काकोरी के अमर बलिदानियों को श्रद्धांजलि स्वरूप समर्पित है। फिल्म में काकोरी की ऐतिहासिक घटना और उससे जुड़े स्वतंत्रता सेनानियों के शौर्य, संकल्प और उनके अमिट योगदान को रेखांकित किया गया है।

कमलेश के. मिश्र की फ़िल्म को पहले भी राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त हो चुका हैं। उनकी फ़िल्म ‘मधुबनी: द स्टेशन ऑफ कलर्स’ के लिए गैर-फीचर फिल्म श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ कथन का राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिला था। फिल्मकार कमलेश मिश्र की पहली निर्देशित फीचर फिल्म ‘आज़मगढ़’ है, जिसमें पंकज त्रिपाठी ने मुख्य नेगेटिव भूमिका निभाई है। यह फिल्म आतंकवाद के विषय पर आधारित है। अपनी फिल्मों में विशेष दृष्टिकोण से इतिहास और रिसर्च को प्रमुख स्थान देते हैं। हाल ही में उन्होंने 2020 के दिल्ली दंगों पर ‘दिल्ली दंगे…जलने और दोषारोपण की कहानी’ ( दिल्ली राइट्स- अ टेल ऑफ बर्न एंड ब्लेम) डॉक्यूमेंट्री बनाई थी, जो तब काफ़ी चर्चित हुई थी। उनकी पहली शोर्ट फ़िल्म “किताब” ने वैश्विक ख्याति अर्जित की। काकोरी के निर्माता जसविंदर सिंह दिल्ली से और मिंटी मिश्रा बिहार के गोपालगंज की हैं। यह फ़िल्म उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग के सहयोग से बनी है। बिहार के दरभंगा के रहने वाले संजय मिश्रा देश के प्रसिद्ध अभिनेता हैं।

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तीन दशक से भी ज्यादा समय से अभिनय के क्षेत्र में सक्रिय हैं। प्रभावशाली अभिनय उनकी पहचान है। 1995 में फिल्म ओह डार्लिंग! ये है इंडिया! से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की थी। ‘आंखों देखी ‘ (2015) और ‘वध’ (2022) में उन्हें उम्दा अभिनय के लिए दो बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवार्ड मिल चुका है। सीतामढ़ी निवासी पत्रकार, लेखक और फिल्म समीक्षक संजीव श्रीवास्तव को हिंदी में सर्वश्रेष्ठ फिल्म समीक्षक के लिए स्वर्ण कमल प्रदान किया जाएगा। वह करीब ढाई दशक से दिल्ली में पत्रकारिता और फिल्मों पर लेखन कर रहे हैं। वह मुंबई में भी फिल्मों की रिपोर्टिंग कर चुके हैं। श्री श्रीवास्तव की सिनेमा पर कई पुस्तकें प्रकाशित हैं, जिनमें ‘समय सिनेमा और इतिहास’, ‘सिनेमा की समानांतर दुनिया’ और ‘आपातकाल का सिनेमा’ प्रमुख हैं।

उन्होंने ‘माधुरी’ पत्रिका के संस्थापक संपादक अरविंद कुमार से स्वर्णिम दौर के सिनेमा पर लंबी बातचीत भी की है, जिसे वह सिनेमाई अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं। फिल्मकार कमलेश के मिश्र ने ‘काकोरी’ को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिलने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि यह सम्मान उनके लिए अत्यंत गौरव और खुशी की बात है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार केवल किसी फिल्म या फिल्मकार का सम्मान नहीं, बल्कि इतिहास, समाज और संवेदनाओं को ईमानदारी से सामने रखने वाले रचनात्मक प्रयास की राष्ट्रीय स्वीकृति है। श्री मिश्र ने कहा कि वह इस सम्मान को व्यक्तिगत उपलब्धि से अधिक काकोरी के अमर बलिदानियों को श्रद्धांजलि के रूप में देखते हैं। काकोरी रेल एक्शन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण पड़ाव था और फिल्म के माध्यम से इस ऐतिहासिक घटना को उचित महत्व के साथ आज की पीढ़ी तक पहुंचाना उनका उद्देश्य था।

उन्होंने कहा कि फिल्म का निर्माण पूरी निष्ठा के साथ किया गया है। उन्होंने निर्माता जसविंदर सिंह, मिंटी मिश्रा, उत्तर प्रदेश सरकार तथा फिल्म से जुड़े सभी कलाकारों और तकनीशियनों का आभार व्यक्त किया और कहा कि यह पुरस्कार सामूहिक प्रयास और समर्पण की सफलता है। कमलेश के मिश्र ने कहा कि उन्हें सबसे अधिक खुशी इस बात की है कि राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के माध्यम से काकोरी के वीर क्रांतिकारियों की स्मृति और उनके बलिदान को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान के साथ याद किया जा रहा है। उन्होंने यह सम्मान सभी अमर शहीदों को समर्पित किया। मिंटी मिश्रा ने कहा कि काकोरी जैसी ऐतिहासिक घटना पर फिल्म का हिस्सा बनना मेरे लिए बेहद महत्वपूर्ण और सुखद अनुभव रहा। अब इस फिल्म को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिलना इस पूरी यात्रा को और विशेष बना देता है।

मिंटी मिश्रा ने कहा कि काकोरी रेल एक्शन स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण अध्याय है और काकोरी के अमर क्रांतिकारियों के साहस, त्याग और बलिदान को आज की पीढ़ी तक पहुंचाना हम सभी की जिम्मेदारी थी। उन्होंने कहा कि काकोरी के माध्यम से इतिहास की महत्वपूर्ण लेकिन कम चर्चित घटना को प्रमुखता से सामने लाने का छोटा-सा प्रयास किया गया। उन्होंने उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग के सहयोग से निर्मित फिल्म के मुख्य निर्माता जसविंदर सिंह के प्रति आभार जताते हुए कहा कि लेखक-निर्देशक कमलेश के मिश्र और पूरी टीम के समर्पण ने इस प्रयास को सार्थक बनाया। उन्होंने कहा कि यह सम्मान पूरी टीम के लिए गर्व का क्षण है। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिलने पर श्री श्रीवास्तव ने कहा कि सर्वश्रेष्ठ फिल्म समीक्षक का राष्ट्रीय पुरस्कार मिलना उनके लिए गौरव की बात है। उन्होंने कहा कि इस वर्ष बिहार की चार हस्तियों को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिलना भी बड़ी बात है।

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आस्था का कारोबार, सिनेमा की जीत: ‘हनुमान अंश’

कभी-कभी कोई फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर नहीं चलती, वह समाज के भीतर चलती है। ‘हनुमान अंश’ के साथ कुछ ऐसा ही होता हुआ दिखाई देता है। लगभग दो करोड़ की लागत से बनी यह फ़िल्म तीन सौ करोड़ से ज़्यादा का वैश्विक कारोबार कर चुकी है। लेकिन इस वाक्य में सबसे महत्वपूर्ण शब्द दो करोड़ या तीन सौ करोड़ नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण शब्द है, दर्शक।

‘हनुमान अंश’ की तीन सौ करोड़ से ज़्यादा की यात्रा को सिर्फ़ एक फ़िल्म की सफलता की तरह देखना शायद उसके साथ नाइंसाफ़ी होगी। यह उस दर्शक की कहानी भी है जो तेज़ी से बदलती दुनिया में किसी स्थिर, भरोसेमंद और आत्मीय चीज़ की तलाश में है। लेकिन क्या सिनेमा उसे सिर्फ़ विश्वास दे या विश्वास के भीतर सवाल करने की जगह भी?

कभी-कभी कोई फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर नहीं चलती, वह समाज के भीतर चलती है। ‘हनुमान अंश’ के साथ कुछ ऐसा ही होता हुआ दिखाई देता है। लगभग दो करोड़ की लागत से बनी यह फ़िल्म तीन सौ करोड़ से ज़्यादा का वैश्विक कारोबार कर चुकी है। लेकिन इस वाक्य में सबसे महत्वपूर्ण शब्द दो करोड़ या तीन सौ करोड़ नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण शब्द है, दर्शक। वह दर्शक, जिसने शुरुआत में इस फ़िल्म को शायद कोई बड़ी सिनेमाई घटना नहीं माना। जिसने फिर किसी दोस्त से इसके बारे में सुना। किसी परिवार के सदस्य ने कहा, “एक बार देखना”। किसी सोशल मीडिया पोस्ट ने उत्सुकता जगाई। किसी ने फ़िल्म देख कर अपनी अनुभूति साझा की। और धीरे-धीरे एक फ़िल्म, फ़िल्म से बढ़ कर एक अनुभव बन गई।

यही सिनेमा की सबसे पुरानी और सबसे ताक़तवर मार्केटिंग है, किसी दूसरे इंसान का विश्वास। और इसलिए ‘हनुमान अंश’ को समझने के लिए हमें आज से नहीं, 1975 से शुरुआत करनी चाहिए। ‘जय संतोषी मां’। एक ऐसी फ़िल्म, जिसने उस दौर में धार्मिक सिनेमा को सिर्फ़ एक जॉनर नहीं रहने दिया, बल्कि उसे सामूहिक आस्था के अनुभव में बदल दिया। कई जगह दर्शक सिनेमाघर में फ़िल्म देखने नहीं, मानो दर्शन करने जाते थे। फूल चढ़ते थे, आरती होती थी, और फ़िल्म का पर्दा कुछ समय के लिए पूजा और सिनेमा के बीच की सीमा को धुंधला कर देता था।

सोचिए, 1975 का भारत। न सोशल मीडिया था, न इंस्टाग्राम, न यूट्यूब, न डिजिटल मार्केटिंग। लेकिन वर्ड ऑफ़ माउथ था। मोहल्ला था। परिवार था। भरोसा था। आज 51 साल बाद तकनीक बदल गई है। दर्शक की जेब में पूरा मीडिया संसार आ गया है। लेकिन मनुष्य की कुछ ज़रूरतें शायद उतनी नहीं बदलीं। उसे अभी भी उम्मीद चाहिए। उसे अभी भी किसी ऐसी कहानी की ज़रूरत है जो कहे कि अंधेरे के बाद उजाला होता है। उसे अभी भी किसी ऐसे पात्र की तलाश होती है जिसके सामने वह अपने निजी दुःख, अपनी असुरक्षा और अपनी असमर्थता रख सके। और शायद यही वह जगह है जहां आस्था सिनेमा से मिलती है।

हम अक्सर पूछते हैं कि लोग धार्मिक फ़िल्में क्यों देख रहे हैं? मुझे लगता है, हमें इसके उलट सवाल पूछना चाहिए। आज के समय में लोगों को ऐसी फ़िल्मों की ज़रूरत क्यों महसूस हो रही है? हम एक ऐसे समय में हैं जहां जानकारी की कोई कमी नहीं है, लेकिन निश्चितता की बहुत कमी है। हमारे पास हर सवाल का उत्तर खोजने के लिए गूगल है, लेकिन हर बेचैनी का उत्तर नहीं है। हमारे पास दुनिया से जुड़े रहने के लिए सोशल मीडिया है, लेकिन अपने भीतर टिके रहने का हुनर कम होता जा रहा है। हमारे पास विकल्प बहुत हैं, लेकिन शांति कम है। ऐसे समय में आस्था एक भावनात्मक आश्रय बन सकती है। इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है।

मनुष्य जब अनिश्चितता से घिरता है, तो वह अर्थ खोजता है। कभी दर्शन में। कभी प्रेम में। कभी कला में। कभी राजनीति में। और कभी ईश्वर में। इसलिए किसी धार्मिक फ़िल्म के दर्शक को पिछड़ा हुआ, अंधविश्वासी या अविवेकी मान लेना शायद सबसे आसान और सबसे ग़लत रास्ता होगा। वह दर्शक भी हमारी तरह ही जटिल है। वह मंदिर भी जाता है और अस्पताल भी। वह भगवान से प्रार्थना भी करता है और डॉक्टर की रिपोर्ट भी देखता है। वह अपने बच्चे को विज्ञान पढ़ाता है और घर में पूजा भी करता है। भारत की असली कहानी शायद इसी सह अस्तित्व में है। और इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि आस्था हो या तर्क। सवाल यह है कि क्या आस्था और तर्क साथ रह सकते हैं? मेरे लिए जवाब होना चाहिए, हां।

भारतीय परंपरा की एक बड़ी खूबी यही रही है कि यहां प्रश्न पूछने की परंपरा भी उतनी ही पुरानी है जितनी प्रार्थना की। उपनिषदों में संवाद हैं। बुद्ध के सामने प्रश्न हैं। कबीर के यहां सवाल हैं। नानक की वाणी में जिज्ञासा है। हमारी आध्यात्मिक परंपरा ने हमेशा मनुष्य को सिर्फ़ सिर झुकाना नहीं सिखाया; कई बार उसने सिर उठाकर देखने को भी कहा है। फिर सिनेमा क्यों न पूछे? यहीं ‘हनुमान अंश’ मेरे लिए एक दिलचस्प फ़िल्म बन जाती है। एक संत की कहानी को पर्दे पर उतारना अपने आप में मुश्किल काम है। क्योंकि संत के जीवन में चमत्कार दिखाना आसान है, लेकिन उनकी मनुष्यता दिखाना मुश्किल। चमत्कार आंखों को आकर्षित करता है। मनुष्यता दिल में ठहरती है।

अगर किसी संत की पूरी सिनेमाई यात्रा सिर्फ़ इस बात पर टिकी हो कि उन्होंने कितने चमत्कार किए, तो हम शायद उनके सबसे बड़े चमत्कार को ही भूल जाएंगे कि उन्होंने लोगों के जीवन को कैसे छुआ? किसी डरे हुए आदमी को साहस देना क्या चमत्कार नहीं है? किसी टूटे हुए इंसान को अपने पैरों पर खड़ा कर देना क्या चमत्कार नहीं है? किसी भूखे को खाना देना? किसी अकेले के पास बैठना?

किसी के दुःख को बिना जज किए सुन लेना?

शायद सिनेमा का सबसे सुंदर आध्यात्मिक क्षण वह नहीं होता जब आसमान से कोई चमत्कार उतरता है। वह होता है जब एक इंसान दूसरे इंसान के लिए खड़ा होता है। और यहीं से धार्मिक सिनेमा की अगली यात्रा शुरू हो सकती है। हमें संतों की कहानियां चाहिए। लेकिन हमें उनके भीतर के इंसान की कहानियां भी चाहिए। हमें आस्था चाहिए। लेकिन उसके साथ सवाल भी चाहिए। हमें चमत्कार चाहिए। लेकिन उसके साथ चरित्र भी चाहिए। हमें भगवान चाहिए। लेकिन उसके साथ इंसान भी चाहिए। क्योंकि अगर भगवान को बड़ा करने के लिए इंसान को छोटा करना पड़े, तो शायद हमने भगवान को समझा ही नहीं।

‘हनुमान अंश’ जैसी फ़िल्मों के बहाने एक और सामाजिक सवाल उठता है, जिस पर हमारी फ़िल्में बहुत कम बात करती हैं। जब कोई व्यक्ति भौतिक संसार छोड़कर आध्यात्मिक यात्रा पर निकलता है, तो पीछे कौन रह जाता है? उसकी पत्नी? उसके बच्चे? उसके माता-पिता? उसकी रोज़मर्रा की ज़िम्मेदारियां? हम अक्सर त्याग की कहानी सिर्फ़ उस व्यक्ति की नज़र से देखते हैं, जिसने घर छोड़ा। लेकिन जिसने घर में रहकर जीवन सम्भाला, उसका त्याग किस कहानी में है? यह सवाल किसी संत की महानता को कम नहीं करता, बल्कि त्याग की परिभाषा को और मानवीय बनाता है। और शायद यही वह जगह है, जहां भविष्य का आध्यात्मिक सिनेमा हमारे समय से संवाद कर सकता है।

आज की महिला अपने पति की आध्यात्मिक यात्रा की सिर्फ़ दर्शक नहीं है। वह उस यात्रा की सामाजिक कीमत को भी समझती है। आज का परिवार भी बदल चुका है। आज का दर्शक भी। इसलिए आने वाली धार्मिक फ़िल्में अगर सिर्फ़ पुराने सांचे दोहराएंगी, तो वे शायद उस दर्शक से आधा ही संवाद कर पाएंगी, जिसके लिए वे बनाई जा रही हैं। ‘जय संतोषी मां’ के समय आस्था का सिनेमाई अनुभव सामूहिक था। ‘हनुमान अंश’ के समय वह सामूहिक होने के साथ-साथ डिजिटल भी है। लेकिन दोनों के बीच एक अदृश्य धागा वही है- कहानी पर विश्वास।

और शायद सिनेमा का भविष्य भी यहीं छिपा है। अगर निर्माता इस सफलता से सिर्फ़ यह सीखेंगे कि “धार्मिक फ़िल्म बनाओ, कम बजट रखो और तीन सौ करोड़ कमाओ”, तो वे सबसे ज़रूरी बात नहीं समझेंगे। दर्शक फ़ॉर्मूला नहीं खरीदता। दर्शक विश्वास खरीदता है। और विश्वास की नकल नहीं की जा सकती।

एक और संत की कहानी बना देने से वही परिणाम नहीं आएगा। एक और चमत्कार दिखा देने से वही भाव पैदा नहीं होगा। एक और भक्ति गीत डाल देने से वही सामूहिक अनुभव नहीं बनेगा। क्योंकि दर्शक को कहानी में कुछ अपना मिलना चाहिए। यही वजह है कि ‘हनुमान अंश’ की सफलता को केवल धार्मिक फ़िल्मों की सफलता कह देना भी अधूरा होगा। यह उस भारतीय दर्शक की वापसी है जो शायद बहुत समय से अपने सिनेमा में अपने सांस्कृतिक अनुभव की कोई सच्ची प्रतिध्वनि खोज रहा था।

लेकिन यहां सिनेमा की ज़िम्मेदारी भी शुरू होती है। आस्था को बेचने और आस्था को समझने में फ़र्क़ है। पहले रास्ते में फ़ॉर्मूला बनता है। दूसरे में सिनेमा। और मुझे उम्मीद है कि इस नई लहर में दूसरा रास्ता चुना जाएगा। ऐसी फ़िल्में बनेंगी जो धार्मिक हों, लेकिन प्रचारात्मक नहीं। जो आध्यात्मिक हों, लेकिन उपदेशात्मक नहीं। जो चमत्कार दिखाएं, लेकिन सवाल से न डरें। जो परंपरा का सम्मान करें, लेकिन इंसान की स्वतंत्र सोच का भी। क्योंकि हमारा संविधान भी नागरिकों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और जिज्ञासा की भावना विकसित करने की बात करता है।

इसका मतलब यह नहीं कि भारत को अपनी आस्था छोड़ देनी चाहिए। इसका मतलब शायद यह है कि भारत अपनी आस्था को इतना मज़बूत बनाए कि वह सवाल सह सके। मुझे लगता है, यही हमारे समय की सबसे सुंदर सिनेमाई संभावना है। एक ऐसी फ़िल्म जहां कोई बच्चा मंदिर में हाथ जोड़कर खड़ा हो और उसी शाम अपने पिता से पूछे- “भगवान होते कहां हैं”? और पिता उसके सवाल से डरने के बजाय मुस्कुराकर कहे- “शायद यह सवाल पूछना भी भगवान को खोजने का एक रास्ता है”। अगर हमारा सिनेमा वहां तक पहुंच गया, तो उसने सिर्फ़ फ़िल्म नहीं बनाई। उसने समाज के भीतर एक संवाद शुरू किया। और शायद ‘हनुमान अंश’ की असली उपलब्धि यही है कि उसने यह संवाद फिर से शुरू कर दिया है।

तीन सौ करोड़ की संख्या कल किसी और फ़िल्म की हो सकती है। लेकिन जिस समय का कोई सवाल सिनेमा के ज़रिए हमारे भीतर उतर जाता है, वह संख्या से कहीं ज़्यादा देर तक रहता है। आस्था रहे। ज़रूर रहे। क्योंकि आस्था मनुष्य को संभाल सकती है। लेकिन उसके साथ विवेक भी रहे। क्योंकि विवेक मनुष्य को गिरने से बचा सकता है। और सवाल? सवाल तो रहने ही चाहिए। क्योंकि जिस आस्था को एक सवाल से डर लगने लगे, वह शायद आस्था से ज़्यादा भय बन जाती है। और जिस आस्था के भीतर सवाल के लिए जगह हो, वह शायद इंसान को ईश्वर के थोड़ा और क़रीब ले जाती है। सिनेमा का काम हमारी आस्था छीनना नहीं है। उसका काम शायद इतना भर है कि वह हमें अपनी आस्था को थोड़ा और गहराई से देखने का मौक़ा दे। फ़िल्म ख़त्म होती है। लेकिन सवाल वहीं से शुरू होता है।

‘हनुमान अंश’ के तीन सौ करोड़ सिर्फ़ एक फ़िल्म की कमाई नहीं, उस दर्शक की तलाश भी हैं जो बदलती दुनिया में भरोसा, अर्थ और शायद अपने भीतर का कोई जवाब खोज रहा है।

बहरहाल, आपके नज़दीकी सिनेमाघरों में है। देख लीजिएगा। (पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़”के होस्ट हैं।)

LIVE: डूसू चुनाव के लिए वोटिंग जारी, 1.5 लाख छात्र करेंगे 20 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला

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DUSU election

Latest News Today Live Updates in Hindi : दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) चुनाव के लिए मतदान जारी। मतदान दोपहर 1 बजे तक चलेगा जबकि सांध्य कॉलेजों में मतदान दोपहर 3 बजे से शाम 7:30 बजे तक किया जाएगा। मतगणना के बाद परिणाम शनिवार दोपहर तक चुनाव परिणाम घोषित कर दिए जाएंगे। पल पल की जानकारी…

 

एपल ने शुक्रवार से देश में iPhone 18 Pro और iPhone 18 Pro Max की आधिकारिक बिक्री शुरू कर दी है। आईफोन के लेटेस्ट फोन की पहली सेल के लिए युवाओं में खासा उत्साह दिखाई दे रहा है। दिल्ली और मुंबई में अपना पसंदीदा फोन पाने के लिए लोग रातभर कतारों में दिखाए दिए।

-दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) चुनाव के लिए मतगणना जारी। डेढ़ लाख छात्र करेंगे 20 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला।

-DUSU चुनावों के कारण दिल्ली यूनिवर्सिटी के नॉर्थ कैंपस में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है।

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने एक्स पर अपनी पोस्ट में कहा, अमृतसर ज़िले में ड्यूटी के दौरान अपनी जान गंवाने वाले ASI हरजीत सिंह को सलाम। हम उनके अदम्य साहस और कर्तव्य के प्रति समर्पण को हमेशा याद रखेंगे। पंजाब सरकार उनके परिवार को 1 करोड़ रुपये की अनुग्रह राशि और 1 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बीमा देने की घोषणा करती है।