बिना गुस्सा किये जिद्दी बच्चे को कैसे समझाएं? ये 4 आसान पेरेंटिंग ट्रिक बदल देंगी उसकी आदत

आजकल बच्चों को अपनी बात खुलकर कहना तो सिखाया जाता है, लेकिन सामने वाले की बात ध्यान से सुनना भी उतना ही जरूरी है। कई बार बच्चा बहुत अच्छा बोलता है, लेकिन किसी की बात बीच में काट देता है, जवाब देने में जल्दबाजी करता है या थोड़ी देर में ही उसका ध्यान भटक जाता है। ऐसे में सिर्फ उसकी बोलने की एबिलिटी पर ध्यान देने के बजाय लिसनिंग स्किल यानी ध्यान से सुनने की आदत विकसित करना भी जरूरी है। यह छोटी-सी आदत बच्चे की पढ़ाई, कंसंट्रेशन, बातचीत और दूसरों के साथ बिहेवियर में काफी मदद कर सकती है।

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1. ध्यान लगाने की आदत

जब बच्चा किसी की बात ध्यान से सुनता है, तो उसे कुछ देर तक अपना ध्यान एक जगह बनाए रखना पड़ता है। धीरे-धीरे इससे उसकी कंसंट्रेशन बेहतर हो सकती है। यही आदत पढ़ाई में भी काम आती है। टीचर की बात ध्यान से सुनने पर बच्चा सवाल और जवाब आसानी से समझ सकता है और काम करते समय गलतियां भी कम हो सकती हैं।

 

 

2. बेहतर कम्युनिकेशन स्किन

सुनने की अच्छी आदत बच्चे को यह समझने में मदद करती है कि बातचीत में कब बोलना है और कब सामने वाले को मौका देना है। वह हर बात के बीच में बोलने या अपनी बात थोपने के बजाय दूसरे की बात पूरी होने का इंतजार करना सीख सकता है। इससे दोस्तों, भाई-बहन और परिवार के साथ उसकी बातचीत ज्यादा अच्छी हो सकती है।

 

 

3. इमोशन समझने में मदद

किसी को ध्यान से सुनने का मतलब सिर्फ उसके शब्द सुनना नहीं होता। बच्चा धीरे-धीरे आवाज के उतार-चढ़ाव और बात करने के तरीके से सामने वाले की फीलिंग को भी समझना सीख सकता है। इससे उसमें एम्पैथी यानी दूसरों की फीलिंग को समझने की एबिलिटी डेवलप हो सकती है।

 

 

4. पढ़ाई में मिलेगा फायदा

क्लास में बच्चों को लगातार नई बातें और अलग-अलग इंस्ट्रक्शन दिए जाते हैं। यदि बच्चा ध्यान से सुनने की आदत रखता है, तो उसे पढ़ाई समझने और दिए गए काम को सही तरीके से करने में आसानी हो सकती है। सवाल पूरा सुनना, टीचर के इंस्ट्रक्शन समझना उसकी सीखने की प्रोसेस को बेहतर बनाता है।

 

 

5. धैर्य और खुद पर कंट्रोल

दूसरों की पूरी बात सुनने के लिए बच्चे को तुरंत जवाब देने और बीच में बोलने से खुद को रोकना पड़ता है। इससे धीरे-धीरे उसमें धैर्य और सेल्फ-कंट्रोल की आदत डेवलप हो सकती है। वह अपनी बारी का इंतजार करना, दूसरे की बात पूरी सुनना और फिर जवाब देना सीखता है।

 

 

बच्चे को अच्छा कम्युनिकेटर बनाने के लिए सिर्फ बोलना सिखाना ही काफी नहीं है, उसे ध्यान से सुनना भी सिखाना जरूरी है। बच्चों में सुनने की आदत बढ़ाने के लिए माता-पिता खुद भी बच्चे की बात ध्यान से सुनें और उसे बिना टोके अपनी बात पूरी करने का मौका दें। धीरे-धीरे रोज की बातचीत और छोटी-छोटी एक्टिविटीज के जरिए बच्चे में एक अच्छे लिसनर बनने की आदत डेवलप की जा सकती है।

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माता-पिता के तौर पर, अपने बच्चे के लिए हर काम करना स्वाभाविक है। चाहे उनके जूते के फीते बांधना हो, स्कूल बैग पैक करना हो या हर छोटी-मोटी समस्या को सुलझाना हो, मदद अक्सर प्यार की वजह से की जाती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बहुत ज्यादा मदद करने से असल में आपके बच्चे का विकास रुक सकता है?

जानकारों का कहना है कि हर समय मदद करने से अनजाने में बच्चों में आत्मविश्वास, मुश्किलों का सामना करने की क्षमता और जरूरी जीवन कौशल विकसित नहीं हो पाते। इसका मकसद मदद को पूरी तरह बंद करना नहीं है, बल्कि यह जानना है कि कब पीछे हटकर उन्हें खुद सीखने दिया जाए।

क्या आप ऐसी परेशानियां हल कर रहे हैं, जिन्हें आपका बच्चा खुद हल कर सकता है?

अगर आप हर मुश्किल को तुरंत सुलझाने की कोशिश करते हैं, तो खुद से पूछें- क्या मेरा बच्चा थोड़ी सी मदद से यह काम कर सकता है? बच्चों को उनकी उम्र के हिसाब से फ़ैसले लेने, नई चीज़ें आज़माने और यहां तक कि गलतियां करने का मौका देने से वे ज़्यादा आत्मनिर्भर बनते हैं। समस्या को सुलझाना एक ऐसा हुनर ​​है जो अभ्यास से आता है, न कि किसी और के उसे आपके लिए कर देने से।

बच्चों के लिए मुश्किलों का सामना करना हमेशा बुरी बात क्यों नहीं होती?

अपने बच्चे को संघर्ष करते देखना मुश्किल हो सकता है, लेकिन अक्सर यहीं से सबसे बड़ी सीख मिलती है। चाहे होमवर्क पूरा करना हो, किसी दोस्त के साथ अनबन सुलझाना हो या कोई नया हुनर ​​सीखना हो—चुनौतियों का सामना करने से डटे रहने की हिम्मत, सोच-समझकर फ़ैसला लेने की क्षमता और मुश्किल हालात में भी मज़बूत बने रहने का गुण आता है। अगर आप बहुत जल्दी मदद के लिए आगे आ जाते हैं, तो हो सकता है कि बच्चा कुछ ज़रूरी बातें सीखने का मौका गँवा दे।

क्या हर समय मदद करने से आपके बच्चे का आत्मविश्वास कम हो सकता है?

जब माता-पिता हर काम की ज़िम्मेदारी खुद ले लेते हैं, तो बच्चे अपनी काबिलियत पर शक करने लग सकते हैं। उन्हें अपने काम खुद पूरे करने देने से- भले ही वे उन्हें एकदम सही तरीके से न कर पाएं-एक बहुत अच्छा संदेश मिलता है- “मुझे भरोसा है कि तुम इसे खुद समझकर कर लोगे।” समय के साथ, इससे उनमें आत्मविश्वास और ज़िम्मेदारी की मज़बूत भावना पैदा होती है।

माता-पिता बच्चों में आत्मनिर्भरता को कैसे बढ़ावा दे सकते हैं?

छोटे-छोटे बदलाव बड़ा फ़र्क ला सकते हैं। तुरंत जवाब देने के बजाय, ऐसे सवाल पूछें जिनसे बच्चा स्थिति को समझकर सोच सके। मदद करने से पहले उन्हें खुद कोशिश करने के लिए प्रोत्साहित करें। सिर्फ़ नतीजे पर ध्यान देने के बजाय उनकी कोशिश की तारीफ़ करें और जैसे-जैसे वे बड़े हों, उन्हें धीरे-धीरे ज़्यादा ज़िम्मेदारियां सौंपें। इसका मकसद बच्चों को उनके हाल पर छोड़ देना नहीं है, बल्कि उन्हें सीखने और आगे बढ़ने के लिए ज़रूरी आज़ादी देते हुए सहारा देना है।

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पेरेंटिंग का मतलब यह नहीं है कि आप अपने बच्चे के लिए सब कुछ करें। इसका मतलब है उन्हें ऐसे भविष्य के लिए तैयार करना जहां वे अपने काम खुद कर सकें। बच्चों को आज़ादी से काम करने का मौका देते हुए, उन्हें सही रास्ता दिखाना, हिम्मत बढ़ाना और इमोशनल सपोर्ट देना उन्हें काबिल और कॉन्फिडेंट इंसान बनने में मदद कर सकता है। कभी-कभी, अपने बच्चे की मदद करने का सबसे अच्छा तरीका यह नहीं होता कि आप हर काम में दखल दें, बल्कि थोड़ा पीछे हटकर उन्हें यह पता लगाने का मौका दें कि वे क्या-क्या कर सकते हैं।