चीनी महिला ने रोते हुए 4 महीने के अपने बेटे को सुनाया हनुमान चालीसा, 5 सेकंड में शांत हुआ बच्चा! वीडियो वायरल

Viral Video: बच्चे के रोने पर उसे चुप कराने के लिए अक्सर माता-पिता अलग-अलग तरीके अपनाते हैं। कोई उसे गोद में लेकर टहलाता है, तो कोई लोरी सुनाता है। लेकिन कैलिफोर्निया के सबसे बड़े शहर लॉस एंजिल्स में रहने वाली 40 वर्षीय चीनी बिजनेसवुमन सारा जेन हो ने अपने चार महीने के बेटे के साथ अपनाई जाने वाली कुछ पेरेंटिंग आदतों को इंस्टाग्राम पर शेयर किया है। इन आदतों में बच्चे को रोजाना सुबह लूप में हनुमान चालीसा सुनाना, बच्चे को कुत्तों के आसपास रहने देना, और उसके नंगे पैरों को प्राकृतिक सतहों (घास या जमीन) के संपर्क में आने देना शामिल है।

इस दौरान उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट के जरीए मां बनने के अपने अनुभव के बारे में भी बताया और दूसरे माता-पिता से अपने 4 महीने के बेटे की परवरिश को लेकर सुझाव भी मांगे। सारा ने पोस्ट में बताया कि वह अपने बेटे को Baby J कहकर बुलाती हैं।

सारा अपने बच्चे को सुनाती हैं ‘हनुमान चालीसा’

उन्होंने अपनी पोस्ट में बताया कि जब Baby J चिड़चिड़ा हो जाता है या रोने लगता है, तो वह उसे हनुमान चालीसा सुनाती हैं। हनुमान चालीसा एक हिंदू धार्मिक पाठ है। सारा के मुताबिक, जैसे ही वह हनुमान चालीसा चलाती हैं, उनका बेटा करीब 5 सेकंड में शांत हो जाता है और लगभग 2 मिनट में सो जाता है।

इंडियन दोस्त ने बताया ‘हनुमान चालीसा’ के बारे में

उन्होंने बताया कि हनुमान चालीसा के बारे में उन्हें एक इंडियन दोस्त से पता चला था, जिनसे उनकी मुलाकात Burning Man फेस्टिवल के दौरान हुई थी। जो लोग नहीं जानते उन्हें बताते चलें कि Burning Man अमेरिका के नेवादा के Black Rock Desert में होने वाला एक सालाना सांस्कृतिक फेस्टिवल है, जो करीब सात दिनों तक चलता है।

Sarah ने बताया कि अब वह हर सुबह हनुमान चालीसा को लूप पर चलाती हैं, यानी इसे बार-बार सुनाती हैं।

‘मैं उसे रोते हुए छोड़ने में यकीन नहीं रखती’

सारा ने यह भी बताया कि जब उनका बच्चा रोता है, तो वह कैसे रिएक्ट करती हैं।

उन्होंने बताया, “शुरुआती 9 महीनों में बच्चे को यह एहसास नहीं होता कि वह एक अलग इंसान है, इसलिए जब भी वह रोता है, मैं उसे तुरंत गोद में उठा लेती हूं। मैं उसे रोते-रोते सो जाने देने में यकीन नहीं रखती। अगर कुछ कोशिशों करने के बाद भी वह शांत नहीं होता, तो मैं तुरंत हनुमान चालीसा चला देती हूं, जिससे वह शांत हो जाता है।”

उनकी पोस्ट में उन दूसरे तरीकों का भी जिक्र था जिन्हें उन्होंने बेबी J की दिनचर्या में शामिल किया है।

सारा ने बताया कि वह अपने बेटे को रोजाना 8 मिनट तक ब्राह्म्स की लोरी (Brahms’ Lullaby) सुनाती हैं। उनका दावा है कि कुछ डेटा से पता चलता है कि यह म्यूजिक बच्चे के दिमाग के विकास की रफ्तार बढ़ाने में मदद कर सकता है।

40 की उम्र में सरोगेसी से मां बनी हैं सारा

अपनी पोस्ट में सारा बताती हैं वे 40 साल की उम्र में सरोगेसी की मदद से मां बनी हैं. वे बताती हैं कि बच्चा अभी सरोगेट मदर का ही दूध पीता है, इसीलिए वे उनको मूंगफली और सोया मिल्क भेज रही हैं ताकि बच्चे को इनकी आदत जल्दी हो जाए और उसे एलर्जी न हो। सारा बताती हैं कि वे अपनी समझ से ऐसा कर रही हैं, हालांकि साइंटिफिकली यह कितना सही है, इसका अंदाजा उन्हें नहीं है।’

उन्होंने अपने सरोगेसी के अनुभव में दिलचस्पी रखने वाले फॉलोअर्स को अपने पॉडकास्ट ‘हॉट वॉटर’ (Hot Water) के एपिसोड 69 को सुनने के लिए भी कहा।

एलर्जी से बचाने के लिए ये सब कर रहीं सारा

बेबी जे को किसी की तरह से की तरह की एलर्जी से बचाने के लिए सारा अभी से उसे दोस्तों और पड़ोसियों के कुत्तों के संपर्क में ले जाती हैं। साथ ही साथ रोजाना उसे बगीचे में ग्राउंडिंग भी करवाती हैं। वे कहती हैं कि बच्चे के पैरों में 2 लाख से ज्यादा नर्व एंडिंग्स होते हैं, और ऐसे करने से उसके न्यूरोलॉजिकल और शारीरिक विकास में मदद मिलती है।

सारा ने अपनी पोस्ट के आखिर में दूसरे माता-पिता से सुझाव मांगे कि वे अपने चार महीने के बच्चे के साथ क्या-क्या कर सकती हैं। उन्होंने लिखा, “क्या आप मेरे साथ कुछ और टिप्स शेयर कर सकते हैं जिन्हें मैं बेबी J के साथ आजमा सकूं?”

हनुमान चालीसा वाली पोस्ट पर यूजर्स ने दी प्रतिक्रिया

इंस्टाग्राम पर इन तस्वीरों और फोटोज को लोग खूब पसंद कर रहे हैं और कमेंट बॉक्स मेंज जमकर प्रतिक्रियाएं भी दे रहे हैं:-

एक यूजर ने लिखा, “हनुमान चालीसा सिर्फ एक इंडियन सॉन्ग नहीं है। यह गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित एक पवित्र भक्ति ग्रंथ है, जिसे हिंदू बहुत सम्मान देते हैं। इसे भगवान हनुमान के प्रति भक्ति और प्रार्थना के रूप में पढ़ा और गाया जाता है। कृपया एक सांस्कृतिक गीत और एक ऐसे पवित्र ग्रंथ के बीच का अंतर समझें, जिसका लाखों हिंदुओं के लिए गहरा आध्यात्मिक महत्व है।”

एक अन्य यूजर ने हनुमान चालीसा को अपनी रोजाना की पूजा का हिस्सा बताया। साथ ही, उन्होंने इसके ज्योतिषीय फायदों को लेकर भी एक दावा किया। यूजर ने लिखा, “हनुमान चालीसा मेरा रोज का मंत्र है। जिन लोगों की कुंडली में 8वें भाव में केतु होता है, उनके लिए यह बहुत फायदेमंद है। यह एक तरह की प्राकृतिक दवा है।”

एक तीसरे यूजर ने सारा के मां बनने के तरीके की तारीफ की। उन्होंने लिखा, “Baby J बहुत खुशकिस्मत है कि उसे आप जैसी मां मिली हैं।”

एक अन्य यूजर ने भगवान हनुमान से जुड़े धार्मिक पाठ सुंदरकांड का जिक्र किया। उन्होंने लिखा, “सुंदरकांड नाम की एक खूबसूरत किताब है, जिसमें भगवान हनुमान की महिमा बताई गई है। मेरी मां गर्भावस्था के दौरान इसका पाठ करती थीं। इससे बच्चे में भक्ति और साहस की अच्छी भावना जागती है। यह सूर्य का ज्ञान रखने वाले एक दिव्य और निस्वार्थ प्रेम करने वाले देवता की कहानी है।”

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बच्चे की जिद को डील करने के पेरेंटिंग टिप्स, पहले वजह समझें, फिर बदलें व्यवहार!

बच्चों का हर बात पर तुरंत जवाब न देना या माता-पिता की बात को अनसुना करना अक्सर चिंता की वजह बन जाता है। ऐसे समय में कई पैरेंट्स बार-बार समझाने, डांटने या आवाज ऊंची करने लगते हैं। लेकिन हर बार बच्चे का बात न मानना जानबूझकर किया गया व्यवहार नहीं होता।

कई बार बच्चा खेल में इतना व्यस्त होता है कि उसे आसपास की बात सुनाई ही नहीं देती, तो कभी थकान, तनाव या भावनाओं की वजह से वह ठीक से प्रतिक्रिया नहीं दे पाता। इसलिए बच्चे को डांटने से पहले यह समझना जरूरी है कि वह आपकी बात क्यों नहीं सुन रहा।

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1. बच्चे का ध्यान अपनी ओर करें

कोई बात कहने से पहले बच्चे के पास जाएं, उसका नाम लें और उसकी तरफ देखकर बात करें। दूर से बार-बार आवाज लगाने के बजाय उसके पास जाकर बोलें, ताकि वह आपकी बात अच्छे से सुन सके। बात करते समय टीवी, मोबाइल या दूसरे शोर को कम रखें। इससे बच्चे का ध्यान आपकी बात पर रहेगा और वह धीरे-धीरे ध्यान से सुनना भी सीखेगा।

 

2. बात छोटी और आसान रखें

एक साथ बहुत सारी बातें कहने के बजाय बच्चे को एक-एक काम बताएं। जैसे पहले खिलौने रखने को कहें और उसके बाद दांत साफ करने के लिए बोलें। इससे बच्चे को आपकी बात समझने में आसानी होगी बच्चे की उम्र के हिसाब से आसान शब्दों में बात करें। जरूरत हो तो उससे पूछें कि उसने क्या समझा, ताकि वह काम सही तरीके से कर सके।

 

3. बच्चे के इमोशन समझें

कई बार बच्चा गुस्से, थकान या किसी परेशानी के कारण आपकी बात नहीं सुन पाता। ऐसे समय में तुरंत डांटने के बजाय उसे थोड़ा शांत होने का समय दें। उससे प्यार से पूछें कि वह परेशान क्यों है या उसे किस बात पर गुस्सा आ रहा है। उसकी बात सुनने से बच्चा अपनी फीलिंग बताना सीखता है।

 

4. रोज का रूटीन बनाएं

बच्चों के लिए रोज का एक तय रूटीन बनाना अच्छा रहता है। जैसे रात में खिलौने रखना, नहाना, दांत साफ करना और फिर सोने जाना। इससे बच्चे को पहले से पता रहता है कि उसे क्या करना है। रूटीन बच्चे की उम्र के हिसाब से रखें और जब वह कोई काम सही समय पर करे, तो उसकी तारीफ करें। इससे वह अच्छी आदतें अपनाने के लिए तैयार होगा।

 

5. खुद भी शांत रहें

बच्चे माता-पिता को देखकर बहुत कुछ सीखते हैं। इसलिए बच्चे के बात न मानने पर चिल्लाने या गुस्सा करने के बजाय शांत रहने की कोशिश करें। अगर बच्चा तुरंत बात नहीं मानता, तो उसे थोड़ा समय दें और जरूरत हो तो प्यार से दोबारा समझाएं। इससे बच्चा धीरे-धीरे आपकी बात सुनना और सहयोग करना सीखेगा।

 

बच्चों का हर बात पर जवाब न देना या माता-पिता की बात न सुनना हमेशा उनकी जिद नहीं होती। कई बार बच्चा खेल में व्यस्त, थका हुआ या किसी बात से परेशान हो सकता है। माता-पिता का धैर्य और अच्छा व्यवहार बच्चे को धीरे-धीरे अपनी बात सुनने, समझने और सही तरीके से अपनी भावनाएं बताने में मदद कर सकता है।

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आजकल बच्चों को अपनी बात खुलकर कहना तो सिखाया जाता है, लेकिन सामने वाले की बात ध्यान से सुनना भी उतना ही जरूरी है। कई बार बच्चा बहुत अच्छा बोलता है, लेकिन किसी की बात बीच में काट देता है, जवाब देने में जल्दबाजी करता है या थोड़ी देर में ही उसका ध्यान भटक जाता है। ऐसे में सिर्फ उसकी बोलने की एबिलिटी पर ध्यान देने के बजाय लिसनिंग स्किल यानी ध्यान से सुनने की आदत विकसित करना भी जरूरी है। यह छोटी-सी आदत बच्चे की पढ़ाई, कंसंट्रेशन, बातचीत और दूसरों के साथ बिहेवियर में काफी मदद कर सकती है।

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1. ध्यान लगाने की आदत

जब बच्चा किसी की बात ध्यान से सुनता है, तो उसे कुछ देर तक अपना ध्यान एक जगह बनाए रखना पड़ता है। धीरे-धीरे इससे उसकी कंसंट्रेशन बेहतर हो सकती है। यही आदत पढ़ाई में भी काम आती है। टीचर की बात ध्यान से सुनने पर बच्चा सवाल और जवाब आसानी से समझ सकता है और काम करते समय गलतियां भी कम हो सकती हैं।

 

 

2. बेहतर कम्युनिकेशन स्किन

सुनने की अच्छी आदत बच्चे को यह समझने में मदद करती है कि बातचीत में कब बोलना है और कब सामने वाले को मौका देना है। वह हर बात के बीच में बोलने या अपनी बात थोपने के बजाय दूसरे की बात पूरी होने का इंतजार करना सीख सकता है। इससे दोस्तों, भाई-बहन और परिवार के साथ उसकी बातचीत ज्यादा अच्छी हो सकती है।

 

 

3. इमोशन समझने में मदद

किसी को ध्यान से सुनने का मतलब सिर्फ उसके शब्द सुनना नहीं होता। बच्चा धीरे-धीरे आवाज के उतार-चढ़ाव और बात करने के तरीके से सामने वाले की फीलिंग को भी समझना सीख सकता है। इससे उसमें एम्पैथी यानी दूसरों की फीलिंग को समझने की एबिलिटी डेवलप हो सकती है।

 

 

4. पढ़ाई में मिलेगा फायदा

क्लास में बच्चों को लगातार नई बातें और अलग-अलग इंस्ट्रक्शन दिए जाते हैं। यदि बच्चा ध्यान से सुनने की आदत रखता है, तो उसे पढ़ाई समझने और दिए गए काम को सही तरीके से करने में आसानी हो सकती है। सवाल पूरा सुनना, टीचर के इंस्ट्रक्शन समझना उसकी सीखने की प्रोसेस को बेहतर बनाता है।

 

 

5. धैर्य और खुद पर कंट्रोल

दूसरों की पूरी बात सुनने के लिए बच्चे को तुरंत जवाब देने और बीच में बोलने से खुद को रोकना पड़ता है। इससे धीरे-धीरे उसमें धैर्य और सेल्फ-कंट्रोल की आदत डेवलप हो सकती है। वह अपनी बारी का इंतजार करना, दूसरे की बात पूरी सुनना और फिर जवाब देना सीखता है।

 

 

बच्चे को अच्छा कम्युनिकेटर बनाने के लिए सिर्फ बोलना सिखाना ही काफी नहीं है, उसे ध्यान से सुनना भी सिखाना जरूरी है। बच्चों में सुनने की आदत बढ़ाने के लिए माता-पिता खुद भी बच्चे की बात ध्यान से सुनें और उसे बिना टोके अपनी बात पूरी करने का मौका दें। धीरे-धीरे रोज की बातचीत और छोटी-छोटी एक्टिविटीज के जरिए बच्चे में एक अच्छे लिसनर बनने की आदत डेवलप की जा सकती है।

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माता-पिता के तौर पर, अपने बच्चे के लिए हर काम करना स्वाभाविक है। चाहे उनके जूते के फीते बांधना हो, स्कूल बैग पैक करना हो या हर छोटी-मोटी समस्या को सुलझाना हो, मदद अक्सर प्यार की वजह से की जाती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बहुत ज्यादा मदद करने से असल में आपके बच्चे का विकास रुक सकता है?

जानकारों का कहना है कि हर समय मदद करने से अनजाने में बच्चों में आत्मविश्वास, मुश्किलों का सामना करने की क्षमता और जरूरी जीवन कौशल विकसित नहीं हो पाते। इसका मकसद मदद को पूरी तरह बंद करना नहीं है, बल्कि यह जानना है कि कब पीछे हटकर उन्हें खुद सीखने दिया जाए।

क्या आप ऐसी परेशानियां हल कर रहे हैं, जिन्हें आपका बच्चा खुद हल कर सकता है?

अगर आप हर मुश्किल को तुरंत सुलझाने की कोशिश करते हैं, तो खुद से पूछें- क्या मेरा बच्चा थोड़ी सी मदद से यह काम कर सकता है? बच्चों को उनकी उम्र के हिसाब से फ़ैसले लेने, नई चीज़ें आज़माने और यहां तक कि गलतियां करने का मौका देने से वे ज़्यादा आत्मनिर्भर बनते हैं। समस्या को सुलझाना एक ऐसा हुनर ​​है जो अभ्यास से आता है, न कि किसी और के उसे आपके लिए कर देने से।

बच्चों के लिए मुश्किलों का सामना करना हमेशा बुरी बात क्यों नहीं होती?

अपने बच्चे को संघर्ष करते देखना मुश्किल हो सकता है, लेकिन अक्सर यहीं से सबसे बड़ी सीख मिलती है। चाहे होमवर्क पूरा करना हो, किसी दोस्त के साथ अनबन सुलझाना हो या कोई नया हुनर ​​सीखना हो—चुनौतियों का सामना करने से डटे रहने की हिम्मत, सोच-समझकर फ़ैसला लेने की क्षमता और मुश्किल हालात में भी मज़बूत बने रहने का गुण आता है। अगर आप बहुत जल्दी मदद के लिए आगे आ जाते हैं, तो हो सकता है कि बच्चा कुछ ज़रूरी बातें सीखने का मौका गँवा दे।

क्या हर समय मदद करने से आपके बच्चे का आत्मविश्वास कम हो सकता है?

जब माता-पिता हर काम की ज़िम्मेदारी खुद ले लेते हैं, तो बच्चे अपनी काबिलियत पर शक करने लग सकते हैं। उन्हें अपने काम खुद पूरे करने देने से- भले ही वे उन्हें एकदम सही तरीके से न कर पाएं-एक बहुत अच्छा संदेश मिलता है- “मुझे भरोसा है कि तुम इसे खुद समझकर कर लोगे।” समय के साथ, इससे उनमें आत्मविश्वास और ज़िम्मेदारी की मज़बूत भावना पैदा होती है।

माता-पिता बच्चों में आत्मनिर्भरता को कैसे बढ़ावा दे सकते हैं?

छोटे-छोटे बदलाव बड़ा फ़र्क ला सकते हैं। तुरंत जवाब देने के बजाय, ऐसे सवाल पूछें जिनसे बच्चा स्थिति को समझकर सोच सके। मदद करने से पहले उन्हें खुद कोशिश करने के लिए प्रोत्साहित करें। सिर्फ़ नतीजे पर ध्यान देने के बजाय उनकी कोशिश की तारीफ़ करें और जैसे-जैसे वे बड़े हों, उन्हें धीरे-धीरे ज़्यादा ज़िम्मेदारियां सौंपें। इसका मकसद बच्चों को उनके हाल पर छोड़ देना नहीं है, बल्कि उन्हें सीखने और आगे बढ़ने के लिए ज़रूरी आज़ादी देते हुए सहारा देना है।

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पेरेंटिंग का मतलब यह नहीं है कि आप अपने बच्चे के लिए सब कुछ करें। इसका मतलब है उन्हें ऐसे भविष्य के लिए तैयार करना जहां वे अपने काम खुद कर सकें। बच्चों को आज़ादी से काम करने का मौका देते हुए, उन्हें सही रास्ता दिखाना, हिम्मत बढ़ाना और इमोशनल सपोर्ट देना उन्हें काबिल और कॉन्फिडेंट इंसान बनने में मदद कर सकता है। कभी-कभी, अपने बच्चे की मदद करने का सबसे अच्छा तरीका यह नहीं होता कि आप हर काम में दखल दें, बल्कि थोड़ा पीछे हटकर उन्हें यह पता लगाने का मौका दें कि वे क्या-क्या कर सकते हैं।