बिहार के गयाजी में पितृपक्ष मेला आज से शुरू, जाने से पहले जानिए कहां ठहरना है और खाने-पीने की व्यवस्था कैसी है

गयाजी में पितृपक्ष मेला आज यानी 25 सितंबर से शुरू हो गया है। अगर आप पितृपक्ष में गयाजी जाने की तैयारी कर रहे हैं, तो रहने और खाने-पीने की व्यवस्था के बारे में जान लेना जरूरी है। पर्यटन विभाग की ओर से श्रद्धालुओं के लिए कई सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। इस मेले में देशभर से लोग अपने पितरों का पिंडदान करने के लिए आते हैं।

गयाजी रोड या ट्रेन से पहुंच सकते हैं

गयाजी रेलवे और सड़कों से अच्छी तरह से कनेक्टेड है। दूसरे राज्य से आने वाले श्रद्धालुओं को सबसे पहले गयाजी के गांधी मैदान पहुंचने की कोशिश करनी चाहिए। यहां बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम की तरफ से 2,500 क्षमता वाली टेंट सिटी का निर्माण किया गया है। यहां पीने का साफ पानी, शौचालय और बेड सहित सभी जरूरी सुविधाएं मौजूद हैं। श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों की सुरक्षा का ध्यान रखते हुए यहां पुलिस कंट्रोल रूम, सीसीटीवी, वॉच टावर, मेडिकल कैंप के इंतजाम किए ग हैं। पूरी टेंट सिटी की ड्रोन से निगरानी की जा रही है।

इन जगहों पर ठहरने की व्यापक व्यवस्था

टेंट सिटी के अलावा कई धर्मशालाओं में भी श्रद्धालुओं के रहने की व्यवस्था की गई है। इनमें बोधगया की निगमा मॉनेस्ट्री, मगध विवि का परीक्षा हॉल, राजकीय पॉलीटेक्निक, गयाजी धर्मशाला, अक्षयवट में स्थित चंद्रशेखर उच्च विद्यालय, टी मॉडल इंटर विद्यालय, गुरुनानक मध्य विद्यालय, गया आईटीआई, ब्रजभूषण संस्कृत महाविद्यालय शामिल हैं। इस बारे में पूरी जानकारी कई जगहों पर बनाए गए सूचना डेस्क से मिल जायेगी।

मेला स्थल से नजदीक होटल में भी ठहर सकते हैं

श्रद्धालु पिंडदान वाली जगह से नजदीक के होटल में भी ठहर सकते हैं। इनमें बोधगया में स्थित वेलकम होटल, हयात पैलेस, मरासा सरोवर प्रीमियर, संबोधि रिट्रीट, बुद्धा हेरिटेज होटल, द रॉयल रेसिडेंसी, बोधगया रीजेंसी होटल, द फर्न रेजिडेंसी, होटल सुजाता, होटल स्टार, होटल ताज दरबार, होटल प्रिंस, होटल ओम इंटरनेशनल, द बोधि पैलेस रिज़ॉर्ट, होटल माया हेरिटेज शामिल हैं। करीब तीन दर्जन ऐसे होटल हैं जो बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम से एप्रूव्ड हैं।

टेंट सिटी सहति इन जगहों पर खाने-पीने की सुविधा

खाने-पीने की व्यवस्था टेंट सिटी में की गई है। इसके अलावा स्टेशन रोड, सरकारी बस स्टैंड, गेवाल बीघा, बाईपास, विष्णुपद सहित आसपास के इलाकों में खाने-पीने के लिए पर्याप्त फूड स्टॉल उपलब्ध हैं। विष्णुपद और गांधी मैदान स्थित टेंट सिटी में श्रद्धालुओं के लिए मुफ्त भोजन की व्यवस्था की गई है। इसके अलावा कई बड़े कारोबारियों की ओर से भी मुफ्त भोजन के स्टॉल लगाए गए हैं। कई स्टॉल दूसरे राज्य के लोगों की खानपान को ध्यान में रखकर लगाए गए हैं।

बोधगया में बोधि वृक्ष को देख सकते हैं

गयाजी के नजदीक कई प्रमुख और ऐतिहासिक दर्शनीय स्थल हैं। इनमें बौद्ध धर्म का सबसे पवित्र तीर्थ स्थल बोधगया शामिल है। यहां बोधि वृक्ष के नीचे महात्मा बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था। यहां विश्व प्रसिद्ध महाबोधी मंदिर, 80 फीट ऊँची बुद्ध प्रतिमा के साथ-साथ जापानी और थाईलैंड के बौद्ध मंदिर देखने योग्य हैं। गयाजी से इसकी दूरी करीब 13 किमी है। लगभग 40 किमी की दूरी पर स्थित बराबर गुफाएं भारत की सबसे प्राचीन चट्टानों को काटकर बनाई गई गुफाएं हैं। इसका संबंध मौर्य काल और आजीविका संतों से है। इनकी वास्तुकला अद्भुत और रहस्यमयी है।

राजगारी सहित इन जगहों को भी देख सकते हैं

गया जी से 75 किमी दूर मगध साम्राज्य की प्राचीन राजधानी राजगीर भी एक प्रमुख आकर्षण है। यहां भगवान बुद्ध ने कई वर्ष बिताए थे। यहां गर्म पानी के कुंड, विश्व शांति स्तूप (रोपवे), ग्लास ब्रिज, जू सफारी और घोड़ाकटोरा जैसे स्थल मौजूद हैं। 85 किमी दूर स्थित पावापुरी जैन धर्म का एक पवित्र तीर्थ स्थल है। यहां भगवान महावीर को मोक्ष प्राप्त हुआ था। यहां पानी के बीचों-बीच सफेद संगमरमर से निर्मित जल मंदिर स्थित है। 95 किमी की दूरी पर यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल नालंदा स्थित है, जहां दुनिया के सबसे पुराने और प्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय का ऐतिहासिक अवशेष स्थित है। इसके नजदीक में ह्वेनसांग का म्यूजियम भी दर्शनीय है।

(पटना से सच्चिदानंद की रिपोर्ट)

छत्तीसगढ़ में रेल कनेक्टिविटी का बड़ा विस्तार, दल्लीराजहरा-रावघाट नई रेल लाइन का आखिरी 17.5 KM सेक्शन भी तैयार, जानिए क्या होगा फायदा

दक्षिण छत्तीसगढ़ के सुदूर और ग्रामीण इलाकों को देश के व्यापक रेलवे नेटवर्क से जोड़ने की दिशा में भारतीय रेलवे ने एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के रायपुर मंडल के अंतर्गत आने वाली दल्लीराजहरा-रावघाट नई रेल लाइन परियोजना के अंतिम और महत्वपूर्ण 17.5 किलोमीटर लंबे ताड़ोकी-रावघाट सेक्शन का काम सफलतापूर्वक पूरा हो गया है। सिंगल-लाइन विद्युतीकृत ब्रॉड-गेज वाले इस नए रेल खंड पर रेलवे संरक्षा आयुक्त (CRS) द्वारा निरीक्षण और स्पीड ट्रायल भी पूरा कर लिया गया है।

आपको बता दें कि ताड़ोकी-रावघाट सेक्शन के चालू होने से पहले रेलवे संरक्षा आयुक्त (CRS) द्वारा व्यापक निरीक्षण और स्पीड ट्रायल आयोजित किया गया। इस प्रक्रिया के दौरान रेलवे ट्रैक, पुल-पुलियों, विद्युतीकरण, सिग्नलिंग प्रणाली और दूसरी सेफ्टी और टेक्नोलॉजिकल व्यवस्थाओं की बारीकी से जांच की गई।

95 KM लंबी दल्लीराजहरा-रावघाट परियोजना का अहम हिस्सा

ताड़ोकी-रावघाट सेक्शन (17.5 किलोमीटर) कुल 95 किलोमीटर लंबी दल्लीराजहरा-रावघाट नई लाइन परियोजना का अंतिम हिस्सा है, जो दक्षिण छत्तीसगढ़ के सुदूर क्षेत्र में स्थित है। वर्तमान में दल्लीराजहरा से ताड़ोकी तक यात्रियों के लिए ट्रेन सेवाएं पहले से ही संचालित की जा रही हैं। ताड़ोकी-रावघाट सेक्शन में ट्रेन संचालन शुरू होने से आसपास के पूरे क्षेत्र में रेल कनेक्टिविटी मजबूत होगी और लोकल लोगों को परिवहन का एक बेहतर, सुगम और सुविधाजनक विकल्प मिलेगा।

भिलाई स्टील प्लांट और स्टील उद्योग को मिलेगा बड़ा बढ़ावा

इस नई रेल लाइन के बन जाने का सबसे बड़ा औद्योगिक लाभ देश के इस्पात उद्योग को मिलेगा। यह नई रेलवे लाइन सीधे तौर पर भिलाई स्टील प्लांट तक आयरन ओर के परिवहन को बेहद आसान और स्पीडी बनाएगी। इससे भिलाई स्टील प्लांट को कच्चे माल की आपूर्ति निर्बाध रूप से हो सकेगी। इसके अलावा यह लाइन स्थानीय कृषि उत्पादों और वाणिज्यिक सामानों की ढुलाई में भी बड़ी भूमिका निभाएगी।

रायपुर और भिलाई से सुधरेगा संपर्क, शिक्षा और रोजगार के खुलेंगे नए द्वार

इस रेल लाइन का विस्तार सुदूर और ग्रामीण इलाकों को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर और राज्य के प्रमुख शैक्षणिक केंद्र भिलाई से सीधे जोड़ेगा। इससे क्षेत्रीय नागरिकों को कई स्तरों पर लाभ मिलेगा। राज्य के शैक्षणिक हब भिलाई तथा राजधानी रायपुर से बेहतर कनेक्टिविटी मिलने के कारण ग्रामीण और दूरदराज के युवाओं को उच्च शिक्षा के अवसर मिलेंगे। वहीं मरीजों को बड़े अस्पतालों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सकेंगी। सुगम आवाजाही से स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, व्यापारिक गतिविधियों में तेजी आएगी।

पर्यटन, निवेश और सामाजिक-आर्थिक विकास को मिलेगी गति

दक्षिण छत्तीसगढ़ में रेल परिवहन के इस अभूतपूर्व विस्तार से इस क्षेत्र में पर्यटन, औद्योगिक निवेश और अन्य आर्थिक गतिविधियों को भारी प्रोत्साहन मिलेगा। स्थानीय बाजारों में व्यापारिक गतिविधियां बढ़ने से न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, बल्कि यह परियोजना पूरे इलाके के सामाजिक और आर्थिक विकास में एक मील का पत्थर साबित होगी।

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UP-EDGE Project: योगी सरकार का पूर्वांचल पर मेगा प्लान! 28 जिलों की बदलने वाली है किस्मत, ₹2,500 करोड़ से होगा ये बदलाव

UP-EDGE Project: उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में आर्थिक गतिविधियों को रफ्तार देने के लिए राज्य सरकार ने बड़ा प्लान तैयार किया है। विश्व बैंक (World Bank) के सहयोग से ₹2,500 करोड़ की UP-EDGE प्रोजेक्ट प्रस्तावित की गई है। पांच साल तक चलने वाली इस परियोजना का मकसद पूर्वांचल के जिलों में स्थानीय क्षमता के आधार पर रोजगार, आय और निवेश के नए अवसर तैयार करना है। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने मंगलवार (22 सितंबर) को कहा कि वह पूर्वांचल क्षेत्र के 28 जिलों को समर्पित एक परियोजना शुरू करेगी।

इसका उद्देश्य स्थानीय संसाधनों को निवेश, रोजगार, उद्यमिता और निर्यात के अवसरों में बदलना है। विश्व बैंक के सहयोग से शुरू की जाने वाली उत्तर प्रदेश सक्षम जिला-आधारित आर्थिक विकास (UP-EDGE) परियोजना पूर्वांचल क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों को गति देने के साथ-साथ स्थानीय प्रशासन को भी मजबूत करेगी।

28 जिलों को मिलेगा फायदा

UP-EDGE यानी UP Enabling District-Led Economic Growth Project के तहत फिलहाल पूर्वांचल के 28 जिलों को शामिल करने का प्रस्ताव है। इसके अलावा बुंदेलखंड के सात जिलों को भी परियोजना में शामिल किए जाने की संभावना है। इस प्रोजेक्ट को विश्व बैंक के सहयोग से लागू किया जाना प्रस्तावित है।

बैठक में परियोजना की प्रारंभिक रिपोर्ट यानी PPR को भारत सरकार को भेजने समेत कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। राज्य सरकार की ओर से जारी एक बयान के अनुसार, मंगलवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और विश्व बैंक के अधिकारियों के बीच हुई बैठक में परियोजना के विभिन्न प्रस्तावित घटकों पर चर्चा की गई। इनमें प्रारंभिक परियोजना रिपोर्ट (PPR) को भारत सरकार को भेजना भी शामिल है।

बुंदेलखंड के सात जिले शामिल

विश्व बैंक के प्रैक्टिस मैनेजर हून सोह, लीड इकोनॉमिस्ट ऑरेलियन क्रॉस, सीनियर इकोनॉमिस्ट विंसेंट बेलिंगा और सीनियर स्पेशलिस्ट नेहा गुप्ता के साथ हुई बैठक में बताया गया कि यूपी-एज प्रोजेक्ट पूर्वांचल के 28 जिलों के लिए तैयार की गई है। बयान के मुताबिक, बुंदेलखंड के सात जिलों को भी इस परियोजना में शामिल किए जाने का प्रस्ताव है। करीब 2,500 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली इस परियोजना की अवधि पांच साल होगी।

पूर्वांचल में उत्तर प्रदेश की करीब 40% आबादी

बैठक में बताया गया कि पूर्वांचल में यूपी की करीब 40 प्रतिशत आबादी रहती है। लेकिन उत्तर प्रदेश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में इस क्षेत्र का योगदान लगभग 27.6 प्रतिशत है। क्षेत्र की प्रति व्यक्ति आय राज्य के औसत से करीब 45 फीसदी कम है। लगभग 80 प्रतिशत कार्यबल कृषि क्षेत्र से जुड़ा है। ऐसे में यह परियोजना जिलों की जरूरतों और स्थानीय संभावनाओं के आधार पर आर्थिक गतिविधियों का विस्तार करेगी।

कृषि के साथ मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर पर जोर

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि पूर्वांचल में विकास की काफी संभावनाएं हैं। उन्होंने जिलेवार बड़े निवेश प्रोजेक्ट के लिए स्थानीय जरूरतों और उपलब्ध संसाधनों के आधार पर योजनाएं तैयार करने पर जोर दिया। सरकार के मुताबिक, इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय के नए अवसर पैदा हो सकते हैं। इससे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को नई गति मिल सकती है। सीएम योगी ने कृषि के साथ-साथ मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर की भूमिका बढ़ाने की जरूरत बताई। उन्होंने स्थानीय उत्पादों को बेहतर डिजाइन, पैकेजिंग और वैश्विक बाजारों से जोड़ने पर भी जोर दिया।

इस प्रोजेक्ट के तहत करीब एक लाख नए उद्यम विकसित करने और महिला उद्यमियों की भागीदारी बढ़ाने का भी प्रस्ताव है। पर्यटन, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, ई-कॉमर्स, डेटा सेंटर और डिजिटल जिलों जैसे क्षेत्रों में भी नए अवसर विकसित किए जाएंगे। वाराणसी, गोरखपुर और प्रयागराज जैसे प्रमुख शैक्षणिक केंद्रों में कौशल विकास और ट्रेनिंग को बढ़ावा देने के साथ स्वास्थ्य क्षेत्र में मेडिसिटी और स्वास्थ्य पर्यटन की संभावनाओं पर भी काम किया जाएगा।

ODOP को ग्लोबल मार्केट से जोड़ने की तैयारी

मुख्यमंत्री ने ‘एक जिला, एक उत्पाद (ODOP)’ समेत अन्य स्थानीय उत्पादों को नए बाजारों से जोड़ने पर विशेष ध्यान देने की बात कही। बेहतर बाजार व्यवस्था और वैश्विक पहुंच के जरिए इन उत्पादों के निर्यात की संभावनाएं बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। UP-EDGE प्रोजेक्ट के जरिए सरकार का फोकस सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर तक सीमित रखने के बजाय जिले की स्थानीय आर्थिक क्षमता के हिसाब से विकास मॉडल तैयार करने पर है। प्रोजेक्ट के अगले चरण में प्रस्तावित PPR को केंद्र सरकार के समक्ष भेजने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।

सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा, “पूर्वांचल में विकास की अपार संभावनाएं हैं। स्थानीय जरूरतों, उपलब्ध संसाधनों और आर्थिक अवसरों को ध्यान में रखते हुए जिलेवार बड़े निवेश परियोजनाओं की कार्ययोजना तैयार की जानी चाहिए। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय के नए अवसर पैदा होंगे तथा क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को नई गति मिलेगी।”

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उन्होंने कहा कि पूर्वांचल के विकास में कृषि के साथ-साथ मैन्युफैक्चरिंग और सेवा क्षेत्र की भूमिका भी बढ़ानी होगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि स्थानीय उत्पादों को बेहतर डिजाइन, पैकेजिंग और वैश्विक बाजारों से जोड़कर निर्यात के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं। आदित्यनाथ ने एक जिला एक उत्पाद (ODOP) और अन्य स्थानीय उत्पादों को नए बाजार तंत्र से जोड़ने पर विशेष ध्यान देने को कहा।

वेबदुनिया के 27 साल: 23 सितंबर 1999 को शुरू हुआ हिंदी इंटरनेट का ऐतिहासिक सफर

वेबदुनिया के 27 साल: 23 सितंबर 1999 को शुरू हुआ हिंदी इंटरनेट का ऐतिहासिक सफर

webdunia  27th anniversary

वेबदुनिया डॉट कॉम केवल एक वेबसाइट या डिजिटल मंच भर नहीं है, बल्कि यह भारत में भाषाई डिजिटल क्रांति का वह अग्रदूत है जिसने वैश्विक पटल पर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं का परचम लहराया। 23 सितंबर 1999 का दिन हिंदी इंटरनेट के इतिहास में एक मील का पत्थर और स्वर्णिम अध्याय सिद्ध हुआ, जब दुनिया के पहले हिंदी पोर्टल ‘वेबदुनिया’ का आधिकारिक आगाज हुआ। जिस दौर में इंटरनेट का दायरा केवल अंग्रेजी भाषा तक सीमित माना जाता था और भाषाई सीमाओं के कारण बहुसंख्यक भारतवासी सूचना-प्रौद्योगिकी के इस महामार्ग से कटे हुए थे, उस समय वेबदुनिया ने आकर भारतीय भाषाई समाज के लिए डिजिटल युग के नए द्वार खोल दिए।

 

तकनीकी नवाचार और फोंट की समस्या का ऐतिहासिक समाधान

शुरुआती दौर में हिंदी इंटरनेट के समक्ष सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती फोंट की असमानता (Non-compatibility) थी। पाठक या उपयोगकर्ता तक हिंदी सामग्री तब तक नहीं पहुँच पाती थी जब तक उनके कंप्यूटर में संबंधित विशेष फोंट डाउनलोड न हो। वेबदुनिया ने इस बाधा को भांपते हुए ‘डायनैमिक फोंट’ (Dynamic Font) की क्रांतिकारी तकनीक विकसित की। इस नवाचार के माध्यम से पाठकों को बिना किसी अतिरिक्त फोंट को डाउनलोड किए सीधे हिंदी सामग्री पढ़ने की सुविधा मिली। इस एक तकनीकी छलांग ने हिंदी को सीधे वेब पेजों पर ला खड़ा किया और भारतीय भाषाई इंटरनेट के स्वप्न को पूर्ण यथार्थ में बदल दिया।

 

27 वर्षों की निर्बाध यात्रा और निरंतर विस्तार

वेबदुनिया ने 23 सितंबर 2026 को अपनी अनवरत और सफलतम यात्रा के 27 वर्ष पूरे कर लिए हैं। समय के साथ यह पोर्टल केवल हिंदी तक सीमित न रहकर तमिल, तेलुगु, मराठी, गुजराती, मलयालम, कन्नड़ और बांग्ला जैसी 8 प्रमुख भारतीय भाषाओं में अपनी सेवाएं देने लगा। भारत के सुदूर ग्रामीण इलाकों में रहने वाले आम नागरिकों से लेकर दुनिया भर में फैले अप्रवासी भारतीयों (NRIs) तक, वेबदुनिया आज भी प्रामाणिक, विश्वसनीय और तथ्यपरक सामग्री का सबसे विश्वसनीय माध्यम बनी हुई है।

 

सामग्री की विविधता और अनूठे आयाम

वेबदुनिया की लोकप्रियता का एक बड़ा आधार इसकी विषय-वस्तु की विविधता और हर वर्ग के पाठक की रुचि का ध्यान रखना है। यह पोर्टल समाचार और समसामयिक विषयों से आगे बढ़कर विभिन्न विषयों पर समृद्ध सामग्री उपलब्ध कराता है:

 

राजनीति और खेल: चुनावी हलचलों की बारीकियों से लेकर क्रिकेट के रोमांच तक, वेबदुनिया अपने विशेष कवरेज और तीव्र गति से सटीक जानकारी देने के लिए जानी जाती है।

 

धर्म, अध्यात्म और कुंभ कवरेज: आस्था और भारतीय संस्कृति को केंद्र में रखते हुए पोर्टल पर संपूर्ण ‘रामचरितमानस’, ‘श्रीमद्भगवद्गीता’, ‘रामशलाका प्रश्नावली’ और प्रयागराज/हरिद्वार कुंभ का व्यापक और सीधा कवरेज उपलब्ध कराया गया।

 

ज्योतिष और पारंपरिक विद्या: जन्म कुंडली निर्माण, गुण-मिलान (पत्रिका मिलान) से लेकर आधुनिक टैरो कार्ड रीडिंग और दैनिक राशिफल तक, ज्योतिष क्षेत्र में इसकी सामग्री बेहद लोकप्रिय है।

 

जीवनशैली और मनोरंजन: बॉलीवुड, साहित्य, पर्यटन, सेहत, महिला एवं बाल जगत, हास्य-व्यंग्य (चुटकुले) तथा संबंधों से जुड़ी ज्ञानवर्धक सामग्री इसके मुख्य आकर्षणों में से हैं।

 

अप्रवासी भारतीयों (NRIs) के लिए सांस्कृतिक सेतु

वेबदुनिया की सबसे विशिष्ट और विनम्र भूमिका विदेशों में बसे भारतीय समुदाय को अपनी जड़ों से जोड़े रखने की रही है। सात समंदर पार बैठे भारतीयों तक भारतीय कला, धर्म, व्रत-त्योहारों के सटीक मुहूर्त, परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को उनकी अपनी भाषा में पहुँचाकर इस पोर्टल ने एक डिजिटल सांस्कृतिक सेतु का कार्य किया है।

 

इंटरनेट पर सत्यता और फैक्ट-चेक का माध्यम

आज के दौर में जहाँ इंटरनेट और सोशल मीडिया पर भ्रामक व गलत जानकारियों (Misinformation) की भरमार है, वहाँ वेबदुनिया ने विशेष रूप से धर्म, अध्यात्म, ज्योतिष और ऐतिहासिक तथ्यों को लेकर एक ‘फैक्ट-चेकर’ और प्रामाणिक संदर्भ-कोश की भूमिका निभाई है। करोड़ों पाठकों का भरोसा आज भी इसकी निष्पक्षता और शुद्धता पर कायम है।

 

वेबदुनिया से जुड़े कुछ अन्य ऐतिहासिक व महत्वपूर्ण तथ्य:

स्थापना का श्रेय: वेबदुनिया की शुरुआत इंदौर (मध्य प्रदेश) स्थित ‘नई दुनिया’ समाचार समूह के दूरदर्शी उद्यमियों और इसके संस्थापक विनय छजलानी जी की अथक मेहनत एवं सपर्मण से हुई थी। 

 

माइक्रोसॉफ्ट और वैश्विक कंपनियों के साथ साझेदारी: जब माइक्रोसॉफ्ट और अन्य वैश्विक टेक दिग्गजों ने भारत में अपनी भाषाई सेवाएं शुरू करने का विचार किया, तब वेबदुनिया उनके प्रमुख तकनीकी और कंटेंट पार्टनर्स में से एक बनी। वेबदुनिया ने याहू, गुगल और तमाम वैश्विक कंपनियों के साथ काम करके भारत में इंटरनेट क्रांति और लोकलाइजेशनन को जन्म दिया।

 

यूनिकोड (Unicode) दौर में सुगम परिवर्तन: डायनैमिक फोंट के दौर से निकलकर जब दुनिया ‘यूनिकोड’ मानक पर आई, तब भी वेबदुनिया ने सबसे पहले इस बदलाव को अपनाकर अपनी संपूर्ण सामग्री को यूनिकोड में स्थानांतरित किया, जिससे यह मोबाइल और आधुनिक सर्च इंजनों पर अधिक सुलभ हो गई।

 

सॉफ्टवेयर व सर्च इंजन विकास: वेबदुनिया ने शुरुआती दौर में हिंदी में सर्च इंजन, हिंदी ईमेल सेवा (‘पत्र’) और हिंदी चैट रूम जैसी सुविधाएं भी विकसित की थीं, जो उस समय के भारतीय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं के लिए एकदम नया अनुभव थीं।

 

वेबदुनिया डॉट कॉम केवल भारतीय भाषाओं का पहला इंटरनेट पोर्टल ही नहीं है, बल्कि यह भारत के डिजिटल पुनर्जागरण और भाषाई सशक्तिकरण की एक ऐतिहासिक गाथा है। 1999 से शुरू हुई इसकी 27 वर्षों की यह अनवरत यात्रा इस बात का प्रमाण है कि तकनीक जब अपनी संस्कृति, भाषा और जड़ों से जुड़ती है, तो वह कितनी व्यापक और सर्वस्पर्शी बन जाती है। ‘डायनैमिक फोंट’ जैसी क्रांतिकारी शुरुआत से लेकर 8 भारतीय भाषाओं में विस्तार करने और डिजिटल दौर में प्रामाणिक सामग्री के ‘फैक्ट-चेकर’ के रूप में उभरने तक, वेबदुनिया ने हर कदम पर भाषाई इंटरनेट को नई दिशा दी है।

 

सुदूर गाँवों के आम पाठकों से लेकर विदेश में बसे अप्रवासी भारतीयों तक को एक सांस्कृतिक और सूचनात्मक सूत्र में पिरोने का जो कार्य वेबदुनिया ने किया है, वह अविस्मरणीय है। आने वाले समय में भी जब-जब भारत में डिजिटल क्रांति और हिंदी इंटरनेट के इतिहास का मूल्यांकन होगा, वेबदुनिया को भाषाई तकनीक की बुनियाद रखने वाले एक युगांतरकारी पथप्रदर्शक (Pioneer) के रूप में सदैव याद रखा जाएगा।

 

बिहार की चार हस्तियों को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार

बिहार की चार फिल्मी हस्तियों को वर्ष 2024 के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। बिहार के लिए 72वां राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह खास होने जा रहा है। बिहार से जुड़ी चार फिल्मी हस्तियों अभिनेता संजय मिश्रा, निर्देशक कमलेश के. मिश्र, निर्माता मिंटी मिश्रा और फिल्म समीक्षक संजीव श्रीवास्तव को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 22 सितंबर को गुजरात के एकता नगर (केवाड़िया) में आयोजित समारोह में पुरस्कार प्रदान करेंगी। दरभंगा निवासी अभिनेता संजय मिश्रा को फिल्म ‘भक्षक’ में बेहतरीन अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का रजत कमल प्रदान किया जाएगा। ‘भक्षक’ की कहानी चर्चित मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड से प्रेरित है। गोपालगंज निवासी निर्देशक कमलेश के. मिश्र और निर्माता मिंटी मिश्रा को फिल्म ‘काकोरी’ के लिए सर्वश्रेष्ठ जीवनीपरक/ऐतिहासिक पुनर्निर्माण/संकलन फिल्म का रजत कमल प्रदान किया जाएगा। देशभक्ति पर आधारित यह फिल्म 1925 के ऐतिहासिक ‘काकोरी ट्रेन एक्शन’ के शताब्दी वर्ष पर काकोरी के अमर बलिदानियों को श्रद्धांजलि स्वरूप समर्पित है। फिल्म में काकोरी की ऐतिहासिक घटना और उससे जुड़े स्वतंत्रता सेनानियों के शौर्य, संकल्प और उनके अमिट योगदान को रेखांकित किया गया है।

कमलेश के. मिश्र की फ़िल्म को पहले भी राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त हो चुका हैं। उनकी फ़िल्म ‘मधुबनी: द स्टेशन ऑफ कलर्स’ के लिए गैर-फीचर फिल्म श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ कथन का राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिला था। फिल्मकार कमलेश मिश्र की पहली निर्देशित फीचर फिल्म ‘आज़मगढ़’ है, जिसमें पंकज त्रिपाठी ने मुख्य नेगेटिव भूमिका निभाई है। यह फिल्म आतंकवाद के विषय पर आधारित है। अपनी फिल्मों में विशेष दृष्टिकोण से इतिहास और रिसर्च को प्रमुख स्थान देते हैं। हाल ही में उन्होंने 2020 के दिल्ली दंगों पर ‘दिल्ली दंगे…जलने और दोषारोपण की कहानी’ ( दिल्ली राइट्स- अ टेल ऑफ बर्न एंड ब्लेम) डॉक्यूमेंट्री बनाई थी, जो तब काफ़ी चर्चित हुई थी। उनकी पहली शोर्ट फ़िल्म “किताब” ने वैश्विक ख्याति अर्जित की। काकोरी के निर्माता जसविंदर सिंह दिल्ली से और मिंटी मिश्रा बिहार के गोपालगंज की हैं। यह फ़िल्म उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग के सहयोग से बनी है। बिहार के दरभंगा के रहने वाले संजय मिश्रा देश के प्रसिद्ध अभिनेता हैं।

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तीन दशक से भी ज्यादा समय से अभिनय के क्षेत्र में सक्रिय हैं। प्रभावशाली अभिनय उनकी पहचान है। 1995 में फिल्म ओह डार्लिंग! ये है इंडिया! से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की थी। ‘आंखों देखी ‘ (2015) और ‘वध’ (2022) में उन्हें उम्दा अभिनय के लिए दो बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवार्ड मिल चुका है। सीतामढ़ी निवासी पत्रकार, लेखक और फिल्म समीक्षक संजीव श्रीवास्तव को हिंदी में सर्वश्रेष्ठ फिल्म समीक्षक के लिए स्वर्ण कमल प्रदान किया जाएगा। वह करीब ढाई दशक से दिल्ली में पत्रकारिता और फिल्मों पर लेखन कर रहे हैं। वह मुंबई में भी फिल्मों की रिपोर्टिंग कर चुके हैं। श्री श्रीवास्तव की सिनेमा पर कई पुस्तकें प्रकाशित हैं, जिनमें ‘समय सिनेमा और इतिहास’, ‘सिनेमा की समानांतर दुनिया’ और ‘आपातकाल का सिनेमा’ प्रमुख हैं।

उन्होंने ‘माधुरी’ पत्रिका के संस्थापक संपादक अरविंद कुमार से स्वर्णिम दौर के सिनेमा पर लंबी बातचीत भी की है, जिसे वह सिनेमाई अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं। फिल्मकार कमलेश के मिश्र ने ‘काकोरी’ को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिलने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि यह सम्मान उनके लिए अत्यंत गौरव और खुशी की बात है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार केवल किसी फिल्म या फिल्मकार का सम्मान नहीं, बल्कि इतिहास, समाज और संवेदनाओं को ईमानदारी से सामने रखने वाले रचनात्मक प्रयास की राष्ट्रीय स्वीकृति है। श्री मिश्र ने कहा कि वह इस सम्मान को व्यक्तिगत उपलब्धि से अधिक काकोरी के अमर बलिदानियों को श्रद्धांजलि के रूप में देखते हैं। काकोरी रेल एक्शन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण पड़ाव था और फिल्म के माध्यम से इस ऐतिहासिक घटना को उचित महत्व के साथ आज की पीढ़ी तक पहुंचाना उनका उद्देश्य था।

उन्होंने कहा कि फिल्म का निर्माण पूरी निष्ठा के साथ किया गया है। उन्होंने निर्माता जसविंदर सिंह, मिंटी मिश्रा, उत्तर प्रदेश सरकार तथा फिल्म से जुड़े सभी कलाकारों और तकनीशियनों का आभार व्यक्त किया और कहा कि यह पुरस्कार सामूहिक प्रयास और समर्पण की सफलता है। कमलेश के मिश्र ने कहा कि उन्हें सबसे अधिक खुशी इस बात की है कि राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के माध्यम से काकोरी के वीर क्रांतिकारियों की स्मृति और उनके बलिदान को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान के साथ याद किया जा रहा है। उन्होंने यह सम्मान सभी अमर शहीदों को समर्पित किया। मिंटी मिश्रा ने कहा कि काकोरी जैसी ऐतिहासिक घटना पर फिल्म का हिस्सा बनना मेरे लिए बेहद महत्वपूर्ण और सुखद अनुभव रहा। अब इस फिल्म को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिलना इस पूरी यात्रा को और विशेष बना देता है।

मिंटी मिश्रा ने कहा कि काकोरी रेल एक्शन स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण अध्याय है और काकोरी के अमर क्रांतिकारियों के साहस, त्याग और बलिदान को आज की पीढ़ी तक पहुंचाना हम सभी की जिम्मेदारी थी। उन्होंने कहा कि काकोरी के माध्यम से इतिहास की महत्वपूर्ण लेकिन कम चर्चित घटना को प्रमुखता से सामने लाने का छोटा-सा प्रयास किया गया। उन्होंने उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग के सहयोग से निर्मित फिल्म के मुख्य निर्माता जसविंदर सिंह के प्रति आभार जताते हुए कहा कि लेखक-निर्देशक कमलेश के मिश्र और पूरी टीम के समर्पण ने इस प्रयास को सार्थक बनाया। उन्होंने कहा कि यह सम्मान पूरी टीम के लिए गर्व का क्षण है। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिलने पर श्री श्रीवास्तव ने कहा कि सर्वश्रेष्ठ फिल्म समीक्षक का राष्ट्रीय पुरस्कार मिलना उनके लिए गौरव की बात है। उन्होंने कहा कि इस वर्ष बिहार की चार हस्तियों को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिलना भी बड़ी बात है।

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अब यूपी में गूंजेगा बाबा का नाम! कैंची धाम के बाद अब जन्मभूमि से समाधि तक बदलेगा पूरा नक्शा

नीम करौली बाबा को लेकर लोगों की बढ़ती दिलचस्पी भी देखने को मिल रही है और उनके जीवन पर आधारित फिल्म ‘हनुमान अंश’ की रिलीज के बाद उनका नाम एक बार फिर चर्चा में आया है। खबरों के मुताबिक, करीब 2 करोड़ रुपये के बजट में बनी इस फिल्म ने भी बाबा के जीवन और उनकी आध्यात्मिक विरासत से जुड़े विषय को लोगों के बीच पहुंचाया है।

नीम करौली बाबा का जन्म उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद में हुआ था और उन्होंने अपने जीवन का काफी समय इसी क्षेत्र में साधना और तपस्या करते हुए बिताया। बाबा की समाधि भी उत्तर प्रदेश में ही स्थित है, इसलिए उनके भक्तों के लिए राज्य में मौजूद ये जगहें खास महत्व रखती हैं। अब उत्तर प्रदेश सरकार इन स्थानों को धार्मिक पर्यटन के लिहाज से विकसित करने की योजना बना रही है। फिरोजाबाद स्थित उनकी जन्मस्थली को एक बड़े धार्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की तैयारी है।

जन्म स्थान पर बनेगा भव्य कॉरिडोर

फिरोजाबाद में नीम करौली बाबा की जन्मस्थली को बड़े धार्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना है। इस परियोजना के लिए करीब 87.5 बीघा जमीन तय की गई है। यहां भव्य प्रवेश द्वार, डिजिटल म्यूजियम और इंटरप्रिटेशन सेंटर बनाया जाएगा, जहां लोग बाबा के जीवन और उनकी आध्यात्मिक यात्रा से जुड़ी जानकारी हासिल कर सकेंगे। इसके अलावा मीटिंग हॉल, मल्टी लेवल पार्किंग, कम्युनिटी किचन, फूड कोर्ट, मेडिटेशन सेंटर और वेलनेस सेंटर जैसी सुविधाएं भी प्रस्तावित हैं।

जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया जारी

इस प्रोजेक्ट के लिए जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। जमीन मालिकों को सरकारी नियमों के अनुसार मुआवजा दिया जाएगा और यह राशि जमीन की मौजूदा कीमत से चार गुना होने की बात कही गई है। बाबा के परिवार के सदस्यों समेत कुछ ग्रामीणों ने कथित तौर पर अनापत्ति प्रमाण पत्र भी दिया है, जिसे मंजूरी के लिए सरकार के पास भेजा गया है। सरकार की मंजूरी के बाद जमीन अधिग्रहण पूरा होने पर निर्माण का काम शुरू किया जा सकेगा।

तपस्या स्थल पर भी बढ़ेंगी सुविधाएं

सरकार की योजना जन्म स्थान के साथ फर्रुखाबाद के नीब करौरी गांव में भी विकास कार्य किए जाने की तैयारी है। माना जाता है कि नीम करौली बाबा ने इस इलाके में करीब 12 साल तक तपस्या की थी और इसी गांव के नाम से बाद में वे नीम करौली बाबा के नाम से प्रसिद्ध हुए। यहां करीब 5 एकड़ जमीन को विकसित करने की योजना है। प्रस्तावित कामों में पानी की टंकी, सड़कों को चौड़ा करना, अतिक्रमण हटाना और व्यवस्थित पार्किंग जैसी सुविधाएं शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, फिल्म ‘हनुमान अंश’ की रिलीज के बाद यहां श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ी है और रोजाना करीब 60 से 70 हजार लोगों के पहुंचने की बात कही गई है।

वृंदावन के समाधि स्थल का भी होगा विकास

नीम करौली बाबा से जुड़ी धार्मिक पर्यटन योजना में वृंदावन स्थित उनके समाधि स्थल को भी शामिल किया गया है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने के साथ आसपास के इलाके में सड़क संपर्क और दूसरी जरूरी सुविधाओं को मजबूत करने की योजना है। इसका मकसद समाधि स्थल तक पहुंच को आसान बनाना और वहां आने वाले भक्तों के लिए बेहतर माहौल तैयार करना है।

हनुमान सेतु से शुरू होगा प्रस्तावित बाबा सर्किट

लखनऊ का गोमती नदी के किनारे स्थित हनुमान सेतु मंदिर भी प्रस्तावित ‘नीम करौली बाबा सर्किट’ का अहम हिस्सा होगा। यह मंदिर बाबा की प्रेरणा से बनाया गया था और इसे सर्किट के शुरुआती केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना है। उम्मीद है कि उत्तर प्रदेश राज्य पर्यटन विकास निगम लिमिटेड की ओर से यहां से गाइडेड टूर भी शुरू किए जा सकते हैं। मंदिर परिसर में फिलहाल नीम करौली बाबा की दो मूर्तियां और भगवान हनुमान की एक बड़ी मूर्ति मौजूद है।

नीम करौली बाबा से जुड़ा कैंची धाम भले ही बाबा से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध जगहों में शामिल हो, लेकिन उत्तर प्रदेश में मौजूद इन स्थानों की अपनी अलग कहानी और महत्व है। प्रोजेस्ट में कैंची धाम की तरह श्रद्धालुओं के अनुभव और सुविधाओं को बेहतर बनाने की कोशिश की जाएगी, फिरोजाबाद की भौगोलिक स्थिति को ध्यान में रखकर विकास किया जाएगा। इस विकास के बाद इन जगहों पर सुविधाएं बेहतर होने के साथ बाबा के जीवन, उनकी साधना और आध्यात्मिक विरासत को करीब से समझने का मौका भी मिल सकता है।

उड़ानों को तरसते नए हवाई अड्डे

भारत को अधिक हवाई अड्डों की नहीं, काम करने वाले हवाई अड्डों की जरूरत है। खाली रनवे पर खर्च होते रहना विकास नहीं, बर्बादी है। जब रखरखाव का बिल ही कमाई से बड़ा हो जाए, तब नीति को गर्व नहीं, सुधार चाहिए। सरकार को इसे गंभीरता से लेना चाहिए, यदि यही हाल रहा तो अगले दस साल में और सौ हवाई अड्डे बनेंगे और उनमें से कई फिर वीरान रहेंगे।

भारत में पिछले एक दशक में क्षेत्रीय हवाई संपर्क का नारा जितना जोर से लगाया गया, उतनी ही तेजी से छोटे शहरों में टर्मिनल बने, रिबन कटे और उद्घाटन की तस्वीरें छपी। ‘उड़े देश का आम नागरिक’ उड़ान योजना का वादा था कि टियर-2 और टियर-3 शहर भी हवाई नक्शे पर आ जाएंगे। आंकड़ों में सफलता दिखती है कि दर्जनों एयरपोर्ट चालू हुए, सैकड़ों रूट आवंटित हुए। लेकिन मैदान पर तस्वीर इससे उलट है। कई नए हवाई अड्डे और पुरानी पट्टियां आज वीरान पड़ी हैं। रनवे साफ है, सीआईएसएफ खड़ा है, बिजली जल रही है, लेकिन विमान नहीं आते। क्या यह महज ‘अस्थायी रुकावट’ है या नीतिगत असफलता का प्रमाण?

संसद में दिए गए जवाब के अनुसार, उड़ान के तहत विकसित करीब पंद्रह हवाई अड्डे इस समय अनुसूचित उड़ानों से रहित हैं। इनमें पठानकोट, लुधियाना, शिमला, पाकयोंग, कुशीनगर, अलीगढ़, आजमगढ़, चित्रकूट, श्रावस्ती, मुरादाबाद, भावनगर, अंबिकापुर, राउरकेला, दतिया और कलबुर्गी शामिल हैं। इस सब से उत्तर प्रदेश सबसे ज्यादा प्रभावित है। 2021 के बाद राज्य में शुरू हुए सात नए एयरपोर्ट में से छह पर नियमित व्यावसायिक उड़ानें बंद हो चुकी हैं। केवल अयोध्या ही अपवाद है। कुशीनगर बौद्ध सर्किट के लिए खोला गया, मुरादाबाद पीतल उद्योग के लिए, आजमगढ़ और चित्रकूट पर्यटन व धार्मिक यात्रा के नाम पर। लेकिन कुछ ही महीनों में यहाँ उड़ानें थम गईं।

असफलता का सबसे ठोस सबूत खर्च बनाम कमाई है। सरकार इन पंद्रह गैर-संचालित केंद्रों के रखरखाव पर करीब 879 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है, जबकि वहां नियमित यात्री सेवा नहीं है। पाकयोंग का निर्माण ही करीब 605 करोड़ में हुआ; रखरखाव पर अब तक लगभग 179 करोड़ चुक चुके हैं। शिमला पर रखरखाव खर्च 116 करोड़ से ऊपर बताया गया। मुरादाबाद पर करीब 30 करोड़। भावनगर का हाल और स्पष्ट है, एक रिपोर्ट के अनुसार एक वर्ष में संचालन-रखरखाव पर करीब 18 करोड़ खर्च हुए, वहीं कमाई महज 4 करोड़ ही रही। यानी लागत राजस्व से कई गुना अधिक। गौरतलब है कि जब विमान नहीं उतरते, तब भी रनवे, फायर स्टेशन, सुरक्षा, एटीसी और बिजली का खर्च तो चलता ही रहता है। एयरपोर्ट अथॉरिटी के व्यापक नुकसान का एक हिस्सा इन्हीं सुनसान हवाई अड्डों से आता है।

सवाल उठता है कि ऐसा क्यों हुआ? पहला कारण मांग का गलत आकलन। हवाई अड्डा बनाने से मांग अपने आप नहीं पैदा होती। छोटे शहर में रेल और सड़क पहले से सस्ती व भरोसेमंद हैं। तीन घंटे की दूरी पर अगर ट्रेन है, तो सीमित आय वाला यात्री महंगा टिकट कभी नहीं खरीदेगा, खासकर जब सब्सिडी खत्म होने के बाद किराया दोगुना हो जाए। उड़ान में तीन साल का व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (वीजीएफ) मिलता है। अवधि खत्म होते ही कई रूट ढह जाते हैं। सीएजी की पुरानी समीक्षा पहले ही कह चुकी थी कि शुरुआती चरणों के आधे से अधिक आवंटित रूट कभी शुरू ही नहीं हुए या जल्दी बंद हो गए।

दूसरा, विमान और ऑपरेटर की कमी। क्षेत्रीय उड़ानों के लिए छोटे विमान चाहिए। फ्लाईबिग जैसे ऑपरेटर बंद हुए या उनकी सेवाएं रोक दीं गईं। विमान पट्टे, रखरखाव और पायलट की कमी ने कई रूट को अधर में छोड़ दिया। तीसरा, तकनीकी सीमा। कई छोटे हवाई अड्डे केवल विजुअल फ्लाइट रूल्स पर चलते हैं। उत्तर भारत की सर्दियों में कोहरा आते ही उड़ानें रुक जाती हैं। इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम न होने से विश्वसनीयता खत्म हो जाती है। चौथा, अंतिम छोर की कनेक्टिविटी। शहर से एयरपोर्ट तक सड़क खराब हो, टैक्सी महंगी हो, तो यात्री दोबारा नहीं आता।

इसे विफलता इसलिए कहना चाहिए क्योंकि पैसा करदाता का है और वादा विकास का था। उद्घाटन राजनीतिक पूंजी बन जाता है, लेकिन तीन साल बाद भी खाली टर्मिनल जनता का नुकसान बन जाता है। भूमि अधिग्रहण के बाद गांव वाले विकास की उम्मीद लगाते हैं, लेकिन जब उड़ान नहीं आती, तो अविश्वास बढ़ता है। क्षेत्रीय विमानन तभी सार्थक है जब वह व्यापार, पर्यटन, चिकित्सा आपात और रोजगार से जुड़कर स्थायी यातायात पैदा करे। महज रनवे बिछाना बुनियादी ढांचे का भ्रम है, अर्थव्यवस्था नहीं।

ऐसे में सरकार को क्या करना चाहिए? सबसे पहले, नए हवाई अड्डे खोलने से पहले कठोर अध्ययन अनिवार्य हो। यात्री क्षमता, आसपास के उद्योग, तीर्थ-पर्यटन चक्र और वैकल्पिक परिवहन की तुलना के बिना निर्माण न हो। संशोधित उड़ान में यही सबक शामिल होना चाहिए। दूसरा, सब्सिडी की अवधि तीन से बढ़ाकर पांच-सात वर्ष की जा सकती है, लेकिन भार कारक और स्थानीय राजस्व लक्ष्य पूरे होने पर ही। तीसरा, छोटे हवाई अड्डों को केवल यात्री पर निर्भर न रखा जाए। कार्गो, पायलट प्रशिक्षण, चार्टर, मेडिकल फ्लाइट और राज्य सरकार की आधिकारिक यात्राओं से न्यूनतम उपयोग सुनिश्चित हो। चौथा, मौसम-संवेदनशील अड्डों पर आईएलएस और बेहतर नेविगेशन लगाया जाए, वरना सर्दी या ख़राब मौसम में पूरा नेटवर्क ठप रहेगा।

पांचवां, राज्य सरकारों की जिम्मेदारी बढ़ाई जाए। भूमि, सड़क, पर्यटन पैकेज और स्थानीय कर रियायत राज्य दें, केंद्र केवल विमानन ढांचा। छठा, किराया नीति लचीली हो। सब्सिडी खत्म होते ही अचानक महंगा टिकट हवाई यात्रा की मांग को मार देता है। चरणबद्ध वृद्धि और ऑफ-पीक छूट से हवाई यात्रा आदत बन सकती है। सातवां, असफल रूट को बिना शर्म के बंद करने और सफल मॉडल, जैसे बेहतर कनेक्टिविटी वाले कुछ औद्योगिक या तीर्थ केंद्र को दोहराने का साहस हो। हर जिले में एयरपोर्ट का नारा राजनीतिक रूप से आकर्षक है, परंतु आर्थिक रूप से घातक।

भारत को अधिक हवाई अड्डों की नहीं, काम करने वाले हवाई अड्डों की जरूरत है। खाली रनवे पर खर्च होते रहना विकास नहीं, बर्बादी है। उड़ान का मकसद आम नागरिक को आसमान देना था, कंक्रीट के स्मारक खड़े करना नहीं। जब रखरखाव का बिल कमाई से बड़ा हो जाए, तब नीति को गर्व नहीं, सुधार चाहिए। सरकार को इसे गंभीरता से लेना चाहिए, यदि यही हाल रहा तो अगले दस साल में और सौ हवाई अड्डे बनेंगे और उनमें से कई फिर वीरान रहेंगे।

DDA World Tourism Day celebration: बांसेरा पार्क में 26-27 सितंबर को डीडीए मनाएगा विश्व पर्यटन दिवस, जानें क्या कुछ होगा खास

DDA World Tourism Day celebration: दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी (DDA) 26 और 27 सितंबर को दिल्ली के सराय काले खां स्थित बांसेरा पार्क में वर्ल्ड टूरिज्म डे उत्सव का आयोजन करेगी। इस पर्यटन मेले का आयोजन दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर सरदार तरनजीत सिंह संधू के निर्देशों के तहत शहर को एक टिकाऊ पर्यटन और सोशियो-कल्चरल हब के तौर पर प्रोत्साहित करने के लिए किया जा रहा है। इसमें भारत के पर्यटन, कला, क्राफ्ट, खाने, संगीत और सांस्कृति की विविधता की झलक पेश की जाएगी।

बांसेरा पार्क को छह थीम वाले जोन में बांटा जाएगा। इसमें पहला हुनर गली होगा, जहां आर्टिस्ट परंपरागत कला और शिल्प पेश करेंगे। यहां पॉटरी, ब्लॉक प्रिंटिंग, चूड़ी बनाना, मेहंदी और मंडला आर्ट दिखेगी। इस जोन का मकसद आने वालों को इंटरैक्टिव गतिविधियों के जरिए पारंपरिक शिलप देखने का मौका देना है। इस मेले में दूसरा जोन यादों की गली का होगा, जो विजिटर्स को विंटेज-थीम वाले अनुभव के जरिए पुरानी यादों में ले जाएगा, जिसमें एक फोटो बूथ, पपेट शो और बायोस्कोप होगा। तीसरा जोन होगा बचपन की दुकान, जो बचपन की यादों पर फोकस करेगा।

विश्व पर्यटन मेले का एक और आकर्षण चिट्ठी घर होगा। इसमें विजिटर्स को पोस्टकार्ड लिखने और पोस्ट करने का अनुभव कराया जाएगा। इससे पोस्टकार्ड लिखने और भेजने का पारंपरिक तरीका वापस आएगा। एक अधिकारी ने कहा, “जहां बड़े लोग पुरानी यादें ताजा करेंगे, वहीं छोटे विजिटर्स को पारंपरिक कला और क्राफ्ट के बारे में पता चलेगा जो अब नहीं होते।”

विश्व पर्यटन मेला भारत के खानपान के लिए पूरा नहीं हो सकता है। खाना इस सेलिब्रेशन का एक बड़ा हिस्सा होगा। भारत के जायके नाम का एक सेक्शन कम से कम 10-12 राज्यों या इलाकों के खाने दिखाएगा। एक अधिकारी ने कहा, “यह जोन देश की अलग-अलग तरह की खाने की चीजों को दिखाएगा और विजिटर्स को अलग-अलग पारंपरिक खाने का स्वाद चखने का मौका देगा।”

बच्चों के लिए, मस्ती का अड्डा में राइड्स और दूसरी मजेदार एक्टिविटीज होंगी। एक अधिकारी ने कहा, “ये छह जोन विजिटर के अनुभव का एक जरूरी हिस्सा हैं।” एजेंसियों को शामिल करने के लिए टेंडरिंग प्रोसेस शुरू हो गया है।

कल का मौसम: 18 सितंबर को बिहार, राजस्थान से तमिलनाडु तक भारी बारिश, 50 kmph तक तेज हवाओं की चेतावनी, इन राज्यों में अलर्ट जारी

UP Home Guard vacancies: यूपी में होने वाली है नौकरियों की बारिश, योगी सरकार अगले 6 महीने में बांटेगी एक लाख नौकरियां

UP Home Guard vacancies: उत्तर प्रदेश निवासियों के लिए यह खबर खुश करने वाली है। राज्य में अगले 6 महीनों में न सिर्फ सरकारी नौकरी की बारिश होने वाली है, बल्कि सरकार राज्य में पेंशन के तहत दी जाने वाली धनराशि और लाभार्थियों की संख्या बढ़ाने पर भी विचार कर रही है। राज्य की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुवाई वाली सरकार ने अगले छह माह में एक लाख युवाओं को सरकारी नौकरी देने की घोषणा की है। इनमें 77 हजार भर्तियां सिर्फ पुलिस व होमगार्ड विभाग में होंगी। इसकी शुरुआत 19 सितंबर से होने जा रही है।

इतना ही नहीं सीएम ने वृद्धजन, निराश्रित महिलाओं और दिव्यांगजन के लिए आर्थिक सहूलियत बढ़ाने की भी घोषणा की है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में 1 करोड़ 10 लाख वृद्धजन, निराश्रित महिलाओं व दिव्यांगजन को 12 हजार रुपये सालाना पेंशन दी जाती है। जल्द ही पेंशन की धनराशि और लाभार्थियों की संख्या भी बढ़ेगी। विकास व जनोपयोगी सुविधाओं के लिए कानून का राज और सुरक्षा का बेहतरीन वातावरण होना जरूरी है।

सीएम योगी बुधवार को गोरखपुर के वार्ड नंबर-53 उर्वरक नगर के अंतर्गत जंगल नकहा नंबर-2 में नवनिर्मित कल्याण मंडपम सहित गोरखपुर विकास प्राधिकरण, ग्रामीण अभियंत्रण विभाग और नगर निगम की करीब 40 करोड़ रुपये की लागत वाली 119 विकास परियोजनाओं का लोकार्पण व शिलान्यास करने के बाद उपस्थित जनसमूह को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि किसी भी गांव या शहर में नागरिकों के जीवन स्तर का पता विकास और वहां उपलब्ध जनोपयोगी सुविधाओं से चलता है। इसके लिए कानून का राज और सुरक्षा का बेहतरीन वातावरण होना जरूरी है। 2017 के बाद गोरखपुर और उत्तर प्रदेश में कानून का राज सुनिश्चित कर विकास एवं सुविधाओं की नई श्रृंखला खड़ी की गई है।

बीमारू राज्य से देश की अर्थव्यवस्था का ग्रोथ इंजन बना यूपी

मुख्यमंत्री ने सुदृढ़ कानून व्यवस्था के चलते हुए विकास और इससे आए बदलाव का उल्लेख करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश अब बीमारू राज्य नहीं है। बल्कि अब यह देश की अर्थव्यवस्था का ग्रोथ इंजन है। उत्तर प्रदेश अब देश की सबसे तेज अर्थव्यवस्था में एक है। आज यहां आने को हर कोई लालायित है। यह मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर, कल-कारखानों की नई श्रृंखला और सुदृढ़ कनेक्टिविटी के लिए जाना जा रहा है।

समाज की एकजुटता का परिणाम है विकास

सीएम योगी ने कहा कि उत्तर प्रदेश में विकास और जन कल्याण से सकारात्मक माहौल बना है। ऐसे में समाज को बांटने वालों से सावधान रहना होगा। विकास समाज की एकजुटता का परिणाम है। शानदार वर्तमान और बेहतरीन भविष्य के लिए डबल इंजन सरकार जरूरी है।

गोरखपुर में बदलाव ने ले ली मच्छर और माफिया की जगह

मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि यूपी और गोरखपुर में 2017 के बाद से दिख रहे हैं। उन्होंने कहा कि क्षेत्र को इंसेफेलाइटिस, मच्छर व माफिया से निजता मिली है। इंफ्रास्ट्रक्चर ने गोरखपुर और उत्तर प्रदेश को नई पहचान दिलाई गई है। पिछली सरकारों के निकम्मेपन से 2017 के पहले तक हर साल इंसेफेलाइटिस से सैकड़ों मौतें होती थी।

सीएम ने गोरखपुर में बंद पड़े खाद कारखाने के दोबारा चलने, फोरलेन कनेक्टिविटी, फ्लाईओवर, ओवरब्रिज के निर्माण, रामगढ़ताल के पर्यटन स्थल बनने, बीआरडी मेडिकल कॉलेज की स्थिति शानदार बनाने के साथ एम्स की सौगात मिलने का भी जिक्र किया।

अब तक साढ़े नौ लाख युवाओं को सरकारी नौकरी

सीएम योगी ने कहा कि सरकार ने अब तक साढ़े नौ लाख युवाओं को सरकारी नौकरी दी है। चुनाव की घोषणा से पहले, सरकार अगले 6 माह में एक लाख और युवाओं को सरकारी नौकरी देने जा रही है। अब गोरखपुर के गीडा में 500 कारखाने लगे, जिससे अकेले गीडा में 50 हजार नौजवानों को रोजगार मिला और इस क्षेत्र को पलायन से मुक्ति मिली।

7 अक्टूबर से विशेष शिविर, मिलेगा योजनाओं का लाभ

मुख्यमंत्री ने कहा कि 7 अक्टूबर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के शासन प्रमुख के रूप में 25 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में ‘सेवा संकल्प अभियान’ शिविर लगने जा रहा है। यह एक सप्ताह का विशेष शिविर होगा। इसमें सरकारी योजनाओं का लाभ पाने से वंचित नागरिकों को उनमें शामिल करने की पहल चलाई जाएगी।

Soil Carbon Payment: अब जमीन की सेहत सुधारने के भी मिल रहे पैसे! 2500 से अधिक किसानों को ट्रांसफर हुए ₹2.9 करोड़

अब चारधाम जाना होगा बेहद आसान, दिल्ली से ऋषिकेश सिर्फ 2.5 घंटे में! इस प्रोजेक्ट का 75% काम पूरा

Delhi To Rishikesh Namo Bharat: दिल्ली-एनसीआर से उत्तराखंड और चारधाम जाने वाले पर्यटकों के लिए एक बड़ा अपडेट आया है। आने वाले समय में दिल्ली से ऋषिकेश का सफर सिर्फ 2.5 घंटे में पूरा हो सकेगा, जबकि कर्णप्रयाग तक का सफर जो सड़क मार्ग से 12-13 घंटे लेता है, वह महज 5 से 6 घंटे में पूरा हो जाएगा।

यह मुमकिन होने जा रहा है सरकार के दो बड़े रेल प्रोजेक्ट्स के कारण। पहला, प्रस्तावित मेरठ-ऋषिकेश नमो भारत कॉरिडोर और दूसरा, निर्माणाधीन ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन। आइए आपको बताते हैं कि यह पूरा प्रोजेक्ट क्या है, इसका काम कहां तक पहुंचा है और इससे श्रद्धालुओं को क्या-क्या सहूलियतें मिलेंगी।

सिर्फ 2.5 घंटे में दिल्ली से ऋषिकेश

दिल्ली से मेरठ तक नमो भारत (RRTS) ट्रेन की कनेक्टिविटी पहले से ही चालू है। अब सरकार इस कॉरिडोर को मेरठ से आगे हरिद्वार और ऋषिकेश तक बढ़ाने के प्रस्ताव पर काम कर रही है। अगर यह प्रोजेक्ट तय योजना के तहत पूरा होता है, तो दिल्ली-एनसीआर के लोग महज 2 से 2.5 घंटे में ऋषिकेश पहुंच जाएंगे। वीकेंड पर दिल्ली-देहरादून-हरिद्वार हाईवे पर लगने वाले घंटों के ट्रैफिक जाम से यात्रियों को बड़ी राहत मिलेगी।

ऋषिकेश से कर्णप्रयाग का 6 घंटे का सफर अब मात्र 2 घंटे में!

गढ़वाल के दुर्गम पहाड़ी रास्तों पर सफर को आसान बनाने के लिए 127 किलोमीटर लंबी ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन का निर्माण तेजी से चल रहा है। इस प्रोजेक्ट का लगभग 75% सिविल वर्क पूरा हो चुका है। हाल ही में 11 सितंबर को 10 किमी लंबी ‘एस्केप टनल-1’ का ब्रेकथ्रू सफलता पूर्वक हासिल किया गया। हिमालय के कठिन और संवेदनशील इलाकों से गुजरने के कारण 127 किमी लंबे इस रूट का 105 किलोमीटर हिस्सा सुरंगों के भीतर से गुजरेगा।

कब चालू होगी ट्रेन?

एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, शिवपुरी-ब्यासी तक का सेक्शन 2028 तक चालू होने की उम्मीद है, जबकि कर्णप्रयाग तक की पूरी रेल लाइन 2029 तक शुरू हो जाएगी। बता दें कि वर्तमान में ऋषिकेश से कर्णप्रयाग जाने में सड़क मार्ग से 6 से 7 घंटे लगते हैं, लेकिन ट्रेन शुरू होने के बाद यह दूरी सिर्फ 2 से 2.5 घंटे में तय हो जाएगी।

केदारनाथ और बद्रीनाथ के श्रद्धालुओं को कैसे मिलेगा फायदा?

यह रेलवे लाइन सीधे केदारनाथ या बद्रीनाथ मंदिर तक तो नहीं पहुंचेगी, लेकिन यह श्रद्धालुओं को मुख्य बेस कैंप के बहुत करीब पहुंचा देगी:

बद्रीनाथ जाने वालों के लिए: यात्री ट्रेन से सीधे कर्णप्रयाग उतरेंगे और वहां से सड़क मार्ग (बस या टैक्सी) के जरिए जोशीमठ होते हुए बेहद कम समय में बद्रीनाथ पहुंच सकेंगे।

केदारनाथ जाने वालों के लिए: ट्रेन से रुद्रप्रयाग या तिलणी स्टेशन उतरकर यात्री सीधे सोनप्रयाग/गौरीकुंड के लिए सड़क मार्ग ले सकेंगे, जो केदारनाथ पैदल यात्रा का मुख्य पड़ाव है।

बुजुर्गों के लिए वरदान: पहाड़ों के संकरे और घुमावदार रास्तों पर घंटों बस या कार में सफर करना बुजुर्ग श्रद्धालुओं के लिए काफी तकलीफदेह होता था। ट्रेन चलने से उनका सफर बेहद आरामदायक और सुरक्षित हो जाएगा।

गढ़वाल के 5 जिलों की बदलेगी तस्वीर

यह रेल लाइन उत्तराखंड के 5 प्रमुख पहाड़ी जिलों से होकर गुजरेगी: देहरादून, टिहरी गढ़वाल, पौड़ी गढ़वाल, रुद्रप्रयाग और चमोली।

12 नए रेलवे स्टेशन: इस रूट पर 12 स्टेशन बनाए जा रहे हैं जिनमें ऋषिकेश, मुनि की रेती, शिवपुरी, ब्यासी, देवप्रयाग, मलेथा, श्रीनगर गढ़वाल, तिलणी, गौचर और कर्णप्रयाग शामिल हैं।

स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा: यात्रा और पर्यटन के अलावा, इस रेल नेटवर्क से स्थानीय निवासियों, किसानों, व्यापारियों और सेब-फल उत्पादकों को अपनी उपज बड़े शहरों के बाजारों तक आसानी से पहुंचाने में मदद मिलेगी।

Namo Bharat: 3 घंटे नहीं अब 90 मिनट में पूरा होगा दिल्ली-करनाल का सफर! नमो भारत के नए रूट पर बड़ा अपडेट

चारधाम यात्रा के लिए रेलवे का यह इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट उत्तराखंड के पर्यटन इतिहास में एक नया अध्याय लिखेगा। जब दिल्ली से कर्णप्रयाग का पूरा सफर 12 घंटे से घटकर महज 5-6 घंटे रह जाएगा, तो इससे न सिर्फ श्रद्धालुओं का समय और पैसा बचेगा, बल्कि मानसून और भूस्खलन के समय होने वाली दुर्घटनाओं में भी काफी कमी आएगी।