अमेरिका के विस्कॉन्सिन में मंगलवार रात विमान हादसे में एक बच्चे समेत छह लोगों की मौत हो गई। हादसे से पहले पायलट ने पंखों पर बर्फ जमने की सूचना दी थी। छह सीटों वाला सिंगल-इंजन विमान केनोशा से मेनोमोनी जा रहा था। यह विमान रात करीब 10 बजे डेलोना टाउन में मिरर लेक स्टेट पार्क के पास जंगल में गिरा। हादसे के समय इलाके में बारिश हो रही थी और गरज-चमक वाला तूफान गुजर रहा था। विंग्स पर बर्फ जमना एविएशन (हवाई यात्रा) के लिए एक बड़ा खतरा है, क्योंकि बर्फ की एक पतली परत भी प्लेन को हवा में बनाए रखने में मुश्किल पैदा कर सकती है। पायलट ने 24,000 फीट ऊंचाई पर बर्फ जमने की जानकारी दी थी नेशनल ट्रांसपोर्टेशन सेफ्टी बोर्ड (NTSB) के मुताबिक, पायलट ने एयर ट्रैफिक कंट्रोलर को पंखों पर बर्फ जमने की जानकारी दी थी। उस समय पाइपर PA-46 विमान 24,000 फीट यानी 7,315 मीटर की ऊंचाई पर उड़ रहा था। पायलट ने विमान को नीचे लाने की अनुमति मांगी थी। एयर ट्रैफिक कंट्रोल ने विमान को नीचे आने की अनुमति दी। इसके बाद विमान दाईं ओर नीचे उतरने वाले मोड़ में गया। NTSB ने बताया कि यह मोड़ लगातार तेज होता गया। इसके बाद विमान से संपर्क और उसके डेटा की ट्रैकिंग बंद हो गई। अधिकारियों के मुताबिक, हादसे में जमीन पर मौजूद कोई व्यक्ति घायल नहीं हुआ। हादसे में कोई इमारत या अन्य ढांचा भी क्षतिग्रस्त नहीं हुआ। विस्कॉन्सिन डेल्स में बड़ी संख्या में पर्यटक आते है हादसा विस्कॉन्सिन डेल्स से लगभग 10 मील (16 किलोमीटर) पश्चिम में हुआ था। यह शहर बड़ी संख्या में वॉटरपार्क्स होने की वजह से ‘दुनिया की वॉटरपार्क राजधानी’ कहलाता है। राज्य के पर्यटन अधिकारियों के अनुसार, 2025 में इस इलाके में 50 लाख से ज़्यादा पर्यटक आए थे।

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) ने पहले बताया था कि 2027 वनडे विश्व कप में खेले जाने वाले भारत बनाम पाकिस्तान मुकाबले के लिए प्रशंसकों में भारी उत्साह है औऱ इस मैच की टिकटों के लिए 75 हजार से ज्यादा आवेदन आ चुके हैं। हालांकि हालिया बयान के अनुसार पूरे टूर्नामेंट को लेकर ही प्रशंसकों में भारी उत्साह दिख रहा है।
ICC के मुताबिक टिकटों के आवेदन की संख्या 1.5 करोड़ पार कर चुकी है।आईसीसी के इस 50 ओवर के शीर्ष टूर्नामेंट की मेजबानी दक्षिण अफ्रीका, जिम्बाब्वे और नामीबिया संयुक्त रूप से करेंगे और इसका आयोजन दो अक्टूबर से 21 नवंबर तक किया जाएगा।
ICC ने एक बयान में कहा, ‘‘अब तक टिकटों के लिए 1 करोड़ 50 लाख 83 हजार 752 आवेदन मिले हैं जिसके लिए 142 देशों के प्रशंसकों ने 44 लाख 23 हजार 417 पंजीकरण कराए हैं।’’टिकटों के लिए पंजीकरण 21 नवंबर 2026 तक कराया जा सकता है जिसके ठीक एक साल बाद जोहानिसबर्ग के वांडरर्स में फाइनल का आयोजन होगा।
आईसीसी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी संजोग गुप्ता ने कहा, ‘‘टिकटों की भारी मांग क्रिकेट विश्व कप की लोकप्रियता और प्रतिष्ठा, पर्यटन स्थल के रूप में अफ्रीका के आकर्षण तथा टूर्नामेंट के आगाज से पहले आईसीसी और उसके साझेदारों की प्रचार गतिविधियों से पैदा हुई उत्सुकता का प्रमाण है।’’
क्रिकेट विश्व कप 24 साल के अंतराल के बाद दक्षिण अफ्रीका लौट रहा है।गुप्ता ने कहा, ‘‘टूर्नामेंट शुरू होने में एक साल शेष है और आईसीसी ने इस दौरान व्यापक स्तर पर प्रचार गतिविधियों, विभिन्न मंचों पर अभियान और विशेष सामग्री की शृंखला की योजना बनाई है। इससे आईसीसी क्रिकेट विश्व कप 2027 को लेकर प्रशंसकों का उत्साह और बढ़ेगा।’’
Ticket demand for #CWC27 keeps soaring in the ballot More details https://t.co/HIOkrvc0EV https://t.co/hx1lRul239
— ICC (@ICC) October 13, 2026
सात नवंबर को होने वाले भारत-पाकिस्तान के सुपर-7 मुकाबले के लिए अब तक करीब 75 हजार आवेदन मिल चुके हैं। यह मांग के मामले में चौथे स्थान पर है।जोहानिसबर्ग के वांडरर्स में होने वाले विश्व कप फाइनल के लिए भी करीब 65 हजार आवेदन आ चुके हैं।
आईसीसी के अनुसार, ‘‘टिकटों की कीमत 9.62 डॉलर (लगभग 930 रुपये) से शुरू होकर सबसे महंगी श्रेणी के लिए 31.31 डॉलर (लगभग 3018 रुपये) तक है। परिवारों के लिए पैकेज, छात्रों और पेंशनभोगियों के लिए विशेष कीमत, स्थानीय लोगों के लिए शुरुआती टिकट और स्कूल-क्लब समूहों के लिए भी अलग व्यवस्था की गई है।
सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान अपने देश को तेल की कमाई से निकालकर दुनिया का बड़ा निवेश और पर्यटन केंद्र बनाना चाहते हैं। लेकिन जिस यमन युद्ध से वे पिछले 11 साल से निकलने की कोशिश कर रहे थे, उसी ने उन्हें फिर घेर लिया है। ईरान समर्थित हूती विद्रोही सऊदी शहरों, हवाई अड्डों और तेल ठिकानों को निशाना बना रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, कई गलत फैसलों के कारण सऊदी अरब की मुश्किलें बढ़ी हैं। पिछले साल यमन को लेकर सऊदी अरब और UAE के बीच पुरानी साझेदारी टूट गई। सऊदी के खिलाफ लड़ाई में ट्रम्प ने भी सलमान का साथ नहीं दिया। अब सऊदी अरब अपने सहयोगी देशों की मदद से हूतियों के खिलाफ नया अभियान चला रहा है, लेकिन युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता साफ नहीं है। UAE के हटते ही कमजोर पड़ी सऊदी की रणनीति सऊदी अरब और UAE पहले यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ साथ मिलकर लड़ रहे थे। लेकिन बाद में दोनों के हित टकराने लगे। सबसे बड़ा झगड़ा इस बात पर हुआ कि युद्ध के बाद यमन पर किसका और किस तरह का शासन होना चाहिए।
सऊदी अरब- यमन में अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार का समर्थन करता है। UAE- यमन में अलग देश की मांग करने वाले STC के साथ खड़ा है।
2025 के आखिर में STC ने दक्षिणी यमन के कई इलाकों पर कब्जा कर लिया। सऊदी अरब को लगा कि इससे उसकी सीमा की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। इसके बाद दिसंबर 2025 में सऊदी अरब ने मुकल्ला पोर्ट पर हवाई हमला किया। सऊदी का आरोप था कि वहां UAE से आए हथियार उतारे जा रहे थे। जबकि UAE का कहना था कि जहाजों में हथियार नहीं थे और सामान यमन में तैनात उसके सैनिकों के लिए था। इसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ गया। UAE ने यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ लड़ने वाले अपने सैनिक वापस बुला लिए। इसका असर यमन में हूतियों के खिलाफ लड़ रहे गुटों पर पड़ा। UAE के समर्थन से तैयार हुए हजारों लड़ाके अचानक अपनी पुरानी कमान से अलग हो गए। सऊदी अरब उनकी जगह वैसी मजबूत व्यवस्था नहीं बना पाया। इससे हूतियों को मजबूत होने का मौका मिल गया। ईरान युद्ध ने सऊदी अरब को फिर घसीटा UAE से साझेदारी टूटने के बाद सऊदी अरब अभी यमन में अपने पैर जमाने की कोशिश कर ही रहा था कि अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू कर दिया। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद जुलाई में उनका अंतिम संस्कार हुआ। इसमें शामिल होने के लिए हूती प्रतिनिधिमंडल एक विमान से तेहरान पहुंचा। जब ये लौट रहे थे तो इन्हें कहा गया कि वे यमन की राष्ट्रीय एयरलाइन से ही वापस लौटें। उन्हें ईरान की एयरलाइन में आने नहीं दिया जाएगा। वहीं, हूती अधिकारी ईरानी विमान को सीधे सना में उतारने पर अड़े रहे। इसके बाद सरकार समर्थित फोर्स ने सना एयरपोर्ट के रनवे को बम से उड़ा दिया, ताकि ईरानी विमान वहां उतर न सके। इसके बाद प्लेन को अपना रास्ता बदलकर हूदैदाह एयरपोर्ट उतरना पड़ा। इस घटना से हूती विद्रोही इतने नाराज हो गए कि उन्होंने सऊदी के साथ चल रहा 4 साल पुराना युद्ध विराम तोड़ दिया। ट्रम्प से मदद मांगी, लेकिन अमेरिका ने हाथ खींचे सऊदी अरब को उम्मीद थी कि जरूरत पड़ने पर अमेरिका उसकी सैन्य मदद करेगा। दोनों देशों ने रक्षा सहयोग भी बढ़ाया था। लेकिन हूतियों के खिलाफ कार्रवाई के मामले में यह भरोसा कमजोर पड़ता दिखा। CNN की रिपोर्ट के मुताबिक, क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने पिछले महीने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से दो बार बात की और हूतियों पर हमला करने का आग्रह किया। ट्रम्प ने सीधे सैन्य हस्तक्षेप नहीं किया। इसके बजाय अमेरिका ने ओमान में हूतियों से बातचीत की, ताकि उनके साथ अपना संघर्षविराम बनाए रखा जा सके। सऊदी अरब अब दूसरे देशों से मदद जुटा रहा है। फ्रांस ने रक्षा संसाधन और सैन्यकर्मी भेजने पर सहमति जताई है, जबकि ब्रिटेन ने सऊदी लड़ाकू विमानों में ईंधन भरने के लिए विमान भेजने की बात कही है। सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान ने भी रक्षा सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई है। जंग का सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था पर असर मोहम्मद बिन सलमान सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से बाहर निकालना चाहते हैं। इसके लिए वे देश में घूमने-फिरने की जगहें, खेल, फिल्में और मनोरंजन बढ़ा रहे हैं। बड़े-बड़े प्रोजेक्ट भी शुरू किए जा रहे हैं। लेकिन लगातार हो रहे हमलों से इन योजनाओं पर खतरा बढ़ गया है। इलाके में तनाव के कारण इस साल कई फिल्म समारोह, पुरस्कार कार्यक्रम और संगीत के बड़े आयोजन टालने पड़े हैं। अक्टूबर के आखिर में सऊदी अरब में होने वाली बड़ी निवेश बैठक पर भी असर पड़ने की आशंका है। तेल के ठिकानों पर हमले और तेल की सप्लाई रुकने से देश की कमाई घट सकती है। सऊदी अरब अब हूतियों से लड़ने के लिए यमन के अपने साथी गुटों की मदद ले रहा है। लेकिन जानकारों का कहना है कि सिर्फ हवाई हमले करने और कुछ इलाकों पर कब्जा करने से यह लड़ाई खत्म नहीं होगी। यमन में लड़ने वाले गुटों के बीच ही कई बातों पर सहमति नहीं है। वे इस बात पर भी एकमत नहीं हैं कि आगे यमन की सरकार कैसी होनी चाहिए। हूतियों को रोकना मुश्किल, तेल कारोबार पर खतरा सऊदी अरब के सामने दो बड़ी मुश्किलें हैं। पहली, हूतियों के हमलों को रोकना और अपनी सीमाओं और तेल के ठिकानों को सुरक्षित रखना। दूसरी, यमन में लड़ाई खत्म करने का ऐसा रास्ता निकालना, जिससे उसे बार-बार हमला न करना पड़े। जानकारों का कहना है कि जब तक अमेरिका और ईरान के बीच लड़ाई जारी रहेगी, ईरान हूतियों की मदद से सऊदी अरब पर दबाव बना सकता है। ऐसे में सिर्फ हथियारों और हवाई हमलों से सऊदी अरब के लिए लंबे समय तक शांति बनाए रखना मुश्किल होगा। सऊदी अरब चाहता था कि यमन की लड़ाई उसकी सीमाओं से दूर रहे, लेकिन अब यही लड़ाई उसके लिए बड़ी परेशानी बन गई है। इससे देश की सुरक्षा, तेल से होने वाली कमाई और विकास की योजनाओं पर असर पड़ रहा है। अब मोहम्मद बिन सलमान के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वे देश को फिर से विकास के रास्ते पर कैसे आगे बढ़ाएं, जबकि यमन की लड़ाई कब खत्म होगी, यह अभी साफ नहीं है।
कानपुर शहर में क्रिकेट पहचान रहे ऐतिहासिक ग्रीनपार्क स्टेडियम का अब नए दौर में प्रवेश होने जा रहा है। करीब 80 साल पुराने इस स्टेडियम के कायाकल्प पर 350 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। इसके लिए 45 करोड़ रुपये की पहली किस्त जारी हो चुकी है। ग्रीनपार्क को सिर्फ खूबसूरत बनाने की नहीं, बल्कि ऐसा आधुनिक क्रिकेट सेंटर बनाने की तैयारी है, जहां भविष्य में टेस्ट, वनडे, टी-20 और आईपीएल जैसे बड़े मुकाबले कराए जा सकें।
बारिश के बाद 15 मिनट में तैयार होगा मैदान
ग्रीनपार्क स्टेडियम में सबसे बड़ा बदलाव मैदान के ड्रेनेज सिस्टम में होगा। विश्वस्तरीय ड्रेनेज सिस्टम तैयार किया जाएगा, जिससे बारिश के बाद मैदान को करीब 15 मिनट में दोबारा मैच के लिए तैयार किया जा सके। इसके अलावा दर्शक दीर्घाओं का पुनर्निर्माण, आधुनिक मीडिया सेंटर, खिलाड़ियों के लिए पवेलियन, फ्लड लाइट, पार्किंग, वीवीआईपी सुविधाएं, फिटनेस और रिकवरी सेंटर समेत कई सुविधाएं विकसित की जाएंगी। दर्शक क्षमता को बढ़ाकर करीब 55 हजार तक करने की योजना है।
यूपी टी-20 लीग के चेयरमैन संजय कपूर के मुताबिक ग्रीनपार्क में पिचों के अलाइनमेंट में भी बदलाव प्रस्तावित है। आधुनिक सुविधाओं के साथ मैदान को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप तैयार किया जाएगा, ताकि बड़े मुकाबलों के आयोजन में मौसम या दूसरी व्यवस्थाएं बाधा न बनें।
ग्रीनपार्क का कायाकल्प शहर की क्रिकेट विरासत को नई पहचान देने की कोशिश है।
टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में खास जगह
ग्रीनपार्क सिर्फ एक क्रिकेट स्टेडियम नहीं, बल्कि कानपुर की पहचान और देश के क्रिकेट इतिहास का अहम हिस्सा है। वर्ष 1945 में अस्तित्व में आए ग्रीनपार्क को देश के पांच प्रमुख पुराने टेस्ट केंद्रों में शामिल किया जाता है। इसी मैदान पर भारत ने 1959 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ अपनी पहली घरेलू टेस्ट जीत दर्ज की थी। वर्ष 2016 में भारत का ऐतिहासिक 500वां टेस्ट मैच भी इसी मैदान पर न्यूजीलैंड के खिलाफ खेला गया था। यही वजह है कि ग्रीनपार्क का कायाकल्प सिर्फ एक स्टेडियम का निर्माण नहीं, बल्कि शहर की क्रिकेट विरासत को नई पहचान देने की कोशिश है।
बड़े मैच आए तो कारोबार को मिलेगा बड़ा फायदा
ग्रीनपार्क जब एक बार फिर बड़े क्रिकेट मुकाबलों का नियमित केंद्र बनेगा तो इसका सीधा असर कानपुर की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। मैच देखने के लिए दूसरे शहरों से आने वाले दर्शकों से होटल, रेस्टोरेंट, कैब, ऑटो, मॉल, बाजार और छोटे कारोबारियों को फायदा मिलेगा। कानपुर के सांसद रमेश अवस्थी ने कहा कि ग्रीनपार्क कानपुर की पहचान और गौरव है। इसके आधुनिक स्वरूप में तैयार होने से शहर को बड़े क्रिकेट मुकाबले मिलेंगे और इसका लाभ खेल के साथ-साथ पर्यटन और स्थानीय कारोबार को भी मिलेगा।
कानपुर के जिलाधिकारी महेंद्र सिंह तंवर ने कहा कि ग्रीनपार्क के कायाकल्प में आधुनिक सुविधाओं और दर्शकों की बेहतर व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। स्टेडियम को अंतरराष्ट्रीय स्तर के मुकाबलों के लिए तैयार करने की दिशा में सभी जरूरी कार्यों को आगे बढ़ाया जा रहा है।
नए स्वरूप में ग्रीनपार्क तैयार होने के बाद कानपुर को फिर बड़े क्रिकेट मुकाबले लगातार मिलने की उम्मीद है। इससे मैदान में चौके-छक्कों की गूंज के साथ शहर के होटल, बाजार और कारोबार में भी तेजी देखने को मिलेगी। ग्रीन पार्क के नए लुक की तस्वीर भी सामने आ गई है मॉडल को अब कानपुर के ग्रीन पार्क स्टेडियम की विजिटर गैलरी में लगाया गया है।
कानपुर से अखंड प्रताप सिंह की रिपोर्ट
Pacific Mall Jaipur Launch: जयपुर शहर क सुंदरता और चमक धमक अब सिर्फ किलो-महलों और ऐतिहासिक इमारतों, हवेलियों तक ही सीमित नहीं रह गई हैं बल्कि जयपुर देश के बड़े शहरों जैसे दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर और हैदराबाद की तरह आधुनिक चकाचौंध के इंफ्रास्ट्रक्चर की चमक भी जयपुर में बिखरे रही हैं बड़े-बड़े शाही और लग्ज़री होटलों के साथ राजधानी जयपुर के शॉपिंग मॉल्स में दुनियाभर के लग्जरी ब्रांडों, रेस्तरांओं और शॉपिंग हब के रूप में अपनी पहचान बना रहा हैं।
जयपुर के मानसरोवर इलाके में हालही में बनकर तैयार हुआ उत्तर भारत का सबसे बड़ा और राजस्थान का सबसे आधुनिक पैसिफिक मॉल जिसके उद्घाटन का इंतजार पूरा शहर कर रहा है। मानसरोवर VT रोड़ पर सालों की मेहनत से बनकर तैयार हुआ पैसिफिक मॉल का उद्घाटन 11 अक्टूबर को होगा जो जयपुर की आधुनिक चकाचौंध में चार चांद लगा देगा।

जयपुर में बनकर तैयार हुआ पैसिफिक मॉल लगभग 12 एकड़ की जमीन पर बना हैं जो राजस्थान का सबसे बड़ा शॉपिंग मॉल हैं जहां जयपुर में पहली बार IKEA, Uniqlo, Michael Kors और Armani Exchange जैसे कई बड़े अंतरराष्ट्रीय और भारतीय ब्रांड्स इस मॉल के जरिए अपनी जगह जयपुर में बनाने के लिए तैयार हैं जयपुर के पैसिफिक मॉल 450 से अधिक ब्रांड्स के आउटलेट्स के साथ खुलने वाला जयपुर का सबसे भव्य शॉपिंग मॉल होगा।
दुबई मॉल की तरह जयपुर में चमकेगा पैसिफिक मॉल
दुनियाभर में जब भी शॉपिंग मॉल्स और शॉपिंग सेंटर की बात आती हैं दुबई मॉल की सबसे ज्यादा चर्चाएं होती हैं। ऐसे जयपुर का पैसिफिक मॉल भी राजस्थान का दुबई मॉल से कम नहीं हैं। जिसे खासतौर पर ‘The Spirit of Rajasthan’ थीम पर तैयार किया गया है जो राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और आधुनिकता का एक बेहतरीन संगम हैं।

जयपुर में पैसिफिक मॉल का निमार्ण पैसिफिक ग्रुप द्वारा किया गया हैं जहां इसके खुलने के बाद जयपुर को शॉपिंग, डाइनिंग और एंटरटेनमेंट के मामले में एक वैश्विक पहचान मिलेगी। क्योंकि इस मॉल में लोगों की लिए दुनियाभर के लग्जरी ब्रांड्स के आउटलेट्स इसे खास बनाएगा।
साथ ही पैसिफिक मॉल में शॉपिंग के साथ जयपुर के सिनेमा और मनोरंजन को भी नई ऊंचाईयां मिलने जा रही हैं क्योंकि इस मॉल में शानदार 9-स्क्रीन मल्टीप्लेक्स सिनेमाघर के साथ राजस्थान का पहले IMAX आईमैक्स का अनुभव जयपुर के लोगों को मिलेगा।
मॉल में 30 से अधिक फूड कोर्ट काउंटर, 40 से अधिक कैफे व रेस्तरां से लग्ज़री फूड का स्वाद लोगों के लिए हॉट-स्पॉट बनेगा। साथ ही इस मॉल के साथ जोड़कर 135 कमरों वाला लेमन ट्री होटल भी तैयार किया जा रहा हैं जो 2027 तक तैयार होगा। जो जयपुर के तेजी से विकसित हो रहे पर्यटन और बाजार को नया आयाम देगा।
जयपुर के सबसे लग्जरी मॉल में लोगों को मिलेगी ये सुविधाएं
जयपुर में शुरू हो जा रहा पैसिफिक मॉल जयपुर के अन्य शॉपिंग मॉल्स की तरह नहीं बल्कि उससे भी बढ़कर लोगों को या सुविधाएं मिलेंगी। जहां शॉपिंग, इंटरटेनमेंट, फूड, कॉर्पोरेट बिजनेस, स्पोर्ट्स और अंतरराष्ट्रीय ब्रांड्स की चकाचौंध सबसे खास होगी।

जयपुर का यह पैसिफिक मॉल 8 मंजिला के रूप में तैयार किया गया हैं जहां अलग-अलग वेन्यू कर लोगों को खास सुविधाएं मिलेंगी। जहां 3 हजार गाड़ियों की पार्किंग से लेकर हॉस्पिटैलिटी और कमर्शियल डेस्टिनेशन का यह मॉल सबसे बड़ा हब होगा। मॉल में दुनियाभर के फैशन और लाइफस्टाइल स्टोर, प्रीमियम और लक्जरी कपड़ों के स्टोर, इलेक्ट्रानिक्स हब, आईमैक्स मल्टीप्लेक्स सिनेमा, बच्चों के लिए भव्य गेमिंग जोन और हर वो चीज जो मॉल नाम सुनते ही लोगों के मन में दिखाई देने लगता हैं।
जयपुर में फिलहाल वर्ल्ड ट्रेड पार्क, टाईटन मॉल, पिंक स्क्वायर मॉल, जयपुर मॉल जैसे कई लग्ज़री मॉल्स है जहां युवाओं का हूजूम हर समय मॉल में उमड़ा रहता हैं जो दुनियाभर के बाजारों और ब्रांड्स के पर्यटन का मुख्य केंद्र हैं।
रिपोर्ट- अंकित राजपूत
Varanasi Ropeway Project: उत्तर प्रदेश के वाराणसी में देश का पहला अर्बन रोप वे ट्रांसपोर्ट तैयार हो रहा है। कैंट से गोदौलिया तक बन रहे इस रोप वे ट्रांसपोर्ट से 4 किलोमीटर का सफर आसान होगा। अब तक रोप वे ट्रांसपोर्ट का 95 फीसदी काम करीब पूरा हो चुका है। इस रोपवे ट्रांसपोर्ट से गोदौलिया-कैंट रूट पर गाड़ियों का प्रेशर कम होगा और इससे रोजाना करीब 90 हजार लोग सफर कर पायेंगे। इस रोप वे ट्रांसपोर्ट की शुरुआत के बाद काशी में टूरिज्म को नया आयाम भी मिले गा। रोपवे इस प्राचीन शहर में पर्यटकों को बिलकुल अलग अनुभूति कराएगा। अब तक पहाड़ी इलाकों में तो लोग रोपवे का सफर करते है लेकिन शहरी इलाके में पब्लिक ट्रांसपोर्ट के तौर पर पहली बार लोग ऐसे सफर का एक्सपीरियंस उठाया जा सकेगा।
वाराणसी में बन रहें रोप वे ट्रांसपोर्ट के लिए शहर में कुल 5 स्टेशन बनाए गए है। इसमें कैंट, विद्यापीठ, रथयात्रा, गिरजाघर और गोदौलिया शामिल हैं। हर एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन के बीच सफर के लिए स्थानीय लोगों और पर्यटकों को 10 रूपये प्रति व्यक्ति किराया देना होगा। जो लोग कैंट से सीधे गोदौलिया तक का सफर करेंगे उन्हें इसके लिए 50 रूपये खर्च करने होंगे। फिलहाल सड़क मार्ग से भी कैंट से गोदौलिया तक के सफर के लिए करीब इतना ही किराया लोगों को देना होता है। रोपवे से इस सफर को सिर्फ 15 से 16 मिनट में पूरा किया जा सकेगा। फिलहाल सड़क मार्ग से इस सफर के लिए लोगों को अभी 35 से 45 मिनट का समय लगता है।
इस रोपवे को कौन बना रहा?
वाराणसी में नेशनल हाईवे लॉजिस्टिक मैंनेजमेंट लिमिटेड इस काम को पूरा कर रही है। कैंट, विद्यापीठ और रथयात्रा के स्टेशन के साथ यहां रोप वे ट्राली के ट्रायल का काम भी लगभग पूरा हो चुका है। वहीं गिरजाघर और गोदौलिया स्टेशन का काम फिलहाल तेजी से जारी है। यहां तारों पर गंडोला की टेस्टिंग भी हो रही है। वाराणसी के कमिश्नर एस राजलिंगम ने बताया की रोपवे ट्रांसपोर्ट का 95 फीसदी काम पूरा हो चुका है। अगले महीने तक बाकी बचे काम को भी पूरा किया जा सकता है।
इस प्रोजेक्ट पर कितना हो रहा खर्च, ये भी जानिए
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस ड्रीम प्रोजेक्ट पर कुल 807 करोड़ रूपये खर्च हो रहे हैं। वाराणसी में बन रहा देश का पहला अर्बन रोपवे ट्रांसपोर्ट को भी वाराणसी के थीम पर ही बनाया जा रहा है। यहां के स्टेशन पर आप भगवान शिव के साथ घाटों का खूबसूरत थीम भी दिखेगी। इसके अलावा जिस ट्राली (गंडोला) से यात्री सफर करेंगे उनमें भी घाट और मंदिर की झलक पर्यटकों को दिखेगी। रोप वे ट्रांसपोर्ट के लिए वाराणसी में 29 टॉवर बनाए गए है। इन टॉवर की ऊंचाई 55 मीटर तक है। यानी पर्यटक काशी की खूबसूरत छठा को 150 फीट की ऊंचाई से निहार सकेंगे।
पर्यटन को मिलेगा बढ़ावा
हर स्टेशन पर 2 से 3 मिनट के अंतराल पर रोपवे ट्राली मिलेगी। इसमें एक बार 10 यात्री सफर कर पाएंगे। हर घंटे करीब 6 हजार लोग इससे सफर करेंगे। पुरे दिन में करीब 16 घंटे इसका संचालन होगा। यानी एक दिन में करीब 90 हजार से ज्यादा लोग इससे सफर कर पाएंगे। रोप वे ट्रांसपोर्ट तैयार होने के बाद पर्यटक आसानी से काशी विश्वनाथ धाम पहुंच सकेंगे।
टूरिज्म वेलफेयर एसोशिसन के अध्यक्ष राहुल मेहता ने बताया की रोप वे ट्रांसपोर्ट से सफर करना यहां आने वाले लाखों पर्यटकों के लिए बिलकुल नया अनुभव होगा। इसलिए इसकी शुरुआत के बाद यहां टूरिज्म इंड्रस्टी को एक बार फिर बूस्टअप मिलेगा।
(वाराणसी से अभिषेक जायसवाल की रिपोर्ट)
Badrinath Dham DJ Video Row: उत्तराखंड के बद्रीनाथ धाम में हाल में सांस्कृतिक महोत्सव के दौरान हुए शोर-शराबे के साथ तेज आवाज में म्यूजिक बजाने और नाच-गाने के कार्यक्रम को लेकर भारी विरोध शुरू हो गया है। इसके बाद चमोली जिला प्रशासन ने भारतीय सेना की स्थानीय बटालियन गढ़वाल स्काउटस को एक कारण बताओ नोटिस भेजा है। बद्रीनाथ धाम में ऐसे आयोजन की अनुमति प्रदान करने को वरिष्ठ बीजेपी नेता डॉ. मुरली मनोहर जोशी द्वारा सांस्कृतिक मर्यादाओं का उल्लंघन बताए जाने के बाद पिछले सप्ताह हुए महोत्सव को लेकर विरोध ने जोर पकड़ लिया है।
19 और 20 सितंबर को हुए कार्यक्रम में तेज आवाज में म्यूजिक और डांस के वीडियो सामने आने के बाद साधु-संतों, पुजारियों और नेताओं ने बी आपत्ति जताई। मामला इतना बढ़ा कि चमोली जिला प्रशासन ने गढ़वाल स्काउट्स के कमांडिंग ऑफिसर को कारण बताओ नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांग लिया।
कमांडिंग आफिसर को भेजा गया नोटिस
चमोली के जिलाधिकारी गौरव कुमार ने गढ़वाल स्काउट के कमांडिंग आफिसर को भेजे नोटिस में कहा है कि बद्रीनाथ धाम में इस प्रकार के सामूहिक आयोजन और उसमें ऊंची आवाज में म्यूजिक का प्रयोग करना उसकी गरिमा के विपरीत है। इससे वहां प्रतिदिन होने वाले पूजा कार्यक्रमों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। साथ ही धार्मिक विद्वानों को असप्रसन्नता होती है एवं स्थानीय प्रशासन की छवि भी प्रभावित होती है।
उन्होंने इस प्रकार के आयोजन के औचित्य पर सवाल उठाते हुए पूछा, “क्या बदरीनाथ धाम में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाने के संबंध में कोई अनुमति सक्षम स्तर से प्राप्त की गई थी। कार्यक्रम में तेज म्यूजिक का प्रयोग किन कारणों से किया गया?” जिलाधिकारी ने यह ताकीद भी की कि भविष्य में बदरीनाथ धाम में इस प्रकार की पुनरावृत्ति नहीं होने दी जाए।
DM गौरव कुमार ने न्यूज एजेंसी ANI से कहा, “मैं आपको बताना चाहता हूँ कि 19 और 20 सितंबर को भारतीय सेना ने बामनी और माणा गाँवों के इलाकों में ‘वाइब्रेंट विलेज’ स्कीम के तहत सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए। सेना के अनुरोध पर जिला प्रशासन ने इस कार्यक्रम के दौरान केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं के प्रचार के लिए स्टॉल लगाए। सांस्कृतिक कार्यक्रमों को तय करने या उनसे जुड़े भुगतान को संभालने में जिला प्रशासन या राज्य सरकार की कोई भूमिका नहीं थी।”
जिलाधिकारी ने आगे कहा, “ये सभी गतिविधियाँ भारतीय सेना द्वारा की गईं। भारतीय सेना को एक नोटिस जारी कर पूछा गया है कि बद्रीनाथ धाम इलाके में बिना पूर्व अनुमति के ऐसा कार्यक्रम क्यों आयोजित किया गया। इसके अलावा, वहां भविष्य में ऐसे किसी भी कार्यक्रम पर रोक लगा दी गई है। मंदिर की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं के अनुरूप किसी भी कार्यक्रम के लिए SDM से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य कर दिया गया है।”
#WATCH | Chamoli, Uttarakhand: DM Gaurav Kumar says, “I would like to inform you that on September 19 and 20, the Indian Army organized cultural programs under the ‘Vibrant Village’ scheme in the areas of Bamni and Mana villages. At the Army’s request, the district administration… pic.twitter.com/3gCxZ4Kpnt
— ANI (@ANI) September 26, 2026
सेना का बयान
इस बारे में भारतीय सेना ने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया है। सेना के एक प्रवक्ता ने इस संबंध में पूछे जाने पर न्यूज एजेंसी पीटीआई से कहा, “इस संबंध में आधिकारिक बयान आने पर उसे मीडिया के साथ साझा किया जाएगा।” पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. जोशी ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में बदरीनाथ में शोर-शराबे वाले म्यूजिक इवेंट के आयोजन को अनुमति दिए जाने पर सवाल उठाते हुए उसे न केवल सांस्कृतिक मर्यादाओं का उल्लंघन,बल्कि धाम की पवित्रता पर भी सीधा आघात बताया।
दिग्गज BJP नेता नाराज
डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि आदि गुरु शंकराचार्य ने इस धाम की स्थापना हिमालयी पर्यावरण में शांतिपूर्ण तरीके से भगवत भजन के लिए की थी। नाराजगी व्यक्त करते हुए BJP नेता ने कहा, “उल्लेखनीय है कि इस स्थान पर शंख बजाना भी मना है परंतु हम उसे भूलकर शोर-शराबे वाले संगीत कार्यक्रमों का आयोजन कर भारतीय आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, पर्यावरणीय मूल्यों की घोर उपेक्षा तो कर ही रहे है, साथ में इतनी ऊंचाई पर हजारों लोगो के नाचने से उनके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की भी उपेक्षा कर रहे है। यह इस बात का प्रतीक है कि अब देवभूमि को बाजारू संस्कृति के रूप में बदला जा रहा है।”
उन्होंने शंकराचार्यों तथा महात्माओं से संस्कृति के इस क्षरण को रोकने के लिए प्रभावी रूप से आवाज उठाने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि केंद्र एवं राज्य सरकारों से भी उनका आग्रह है कि वे ऐसे आयोजनों पर प्रतिबंध लगाकर देवभूमि की मर्यादा को बनाये रखें। उन्होंने कहा, “हिमालय देवात्मा है, भगवान शंकर का निवास और मां गंगा का उद्गम है, इसे नाच ग्रह बनाना करोड़ो भारतीयों की आस्था पर गहरा आघात है।”
क्या है पूरा मामला?
बद्रीनाथ धाम में 19 और 20 सितंबर को ‘देवभूमि सांस्कृतिक महोत्सव-2026’ का आयोजन किया गया था। इसका उद्देश्य उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत, लोक परंपरा और सीमांत क्षेत्र के स्थानीय उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराने के साथ ही महिलाओं और युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उद्यमिता और पर्यटन को बढ़ावा देना बताया गया था। महोत्सव के समापन समारोह में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी बतौर चीफ गेस्ट शामिल हुए थे ।
हालांकि, उत्तराखंड चार धाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत ने आरोप लगाया कि आयोजकों ने बताए गए उद्देश्यों की बजाय धाम की धार्मिक परपंराओं और मान्यताओं के विपरीत नाच गाने और शोर-शराबे वाले कार्यक्रम किए। धाम में स्थित अराइवल प्लाजा में हुए कार्यक्रमों की निंदा करते हुए महापंचायत के महासचिव डॉ. बृजेश सती ने कहा, “हमारा विरोध सांस्कृतिक महोत्सव के आयोजन को लेकर नहीं बल्कि उसके स्वरूप और प्रस्तुति को लेकर है। यहां बद्रीनाथ की धार्मिक और पौराणिक मर्यादाओं के अनुरूप कार्यक्रम होने चाहिए।”
उन्होंने कहा कि बद्रीनाथ धाम में शंख की ध्वनि की भी मनाही है। वहां तेज ध्वनि और संगीत का शोर उत्पन्न करना धाम की धार्मिक गरिमा के अनुरूप नहीं है। आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित ज्योतिर्मठ बदरिकाश्रम के शंकराचार्य मठ ने भी इस आयोजन को परंपरा-विरुद्ध, सांस्कृतिक फूहड़ता एवं धार्मिक मर्यादा का उल्लंघन बताते हुए इस पर घोर आपत्ति जताई।
संतों ने किया कड़ा विरोध
शंकराचार्य स्वामी अवधेशानंद के शिष्य और मठ के प्रभारी स्वामी प्रत्यक्चैतन्यमुकुन्दानन्द गिरि ने कहा कि बदरिकाश्रम वह पावन क्षेत्र है जहां ऋषियों-मुनियों ने अत्यंत शांति और संयम के नियम तय किये है। उन्होंने कहा, “इस क्षेत्र में शंख बजाना तक वर्जित है, ताकि तपस्यारत भगवान नर-नारायण एवं साधकों की एकाग्रता में कोई विघ्न न पड़े । लेकिन इस तरह के कार्यक्रमों के माध्यम से यहां का धार्मिक वातावरण बिगाड़ा जा रहा है।”
उन्होंने कहा कि जहां ब्रह्मकमल जैसे अति संवेदनशील पुष्प को भी विशेष नियमों, पवित्रता और श्रद्धा के साथ प्रभु चरणों में अर्पित किया जाता है, वहां संगीत की तेज ध्वनि में नाच-गाने और फूहड़ता का सांस्कृतिक प्रदूषण कहां तक उचित है? स्वामी प्रत्यक्चैतन्यमुकुन्दानन्द गिरि ने मुख्यमंत्री से इस मामले में हस्तक्षेप करने का आग्रह करते हुए परंपराओं के उल्लंघन, मर्यादाहीन कृत्यों और फूहड़ आयोजनों के जिम्मेदार आयोजकों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की मांग की है।
विवाद के बीच, उत्तराखंड DIPR की तरफ से X पर एक पोस्ट में बड़ा ऐलान किया गया है। DIPR ने कहा, “श्री बद्रीनाथ धाम सहित जनपद चमोली के सभी धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्थलों की गरिमा बनाए रखने के उद्देश्य से जिलाधिकारी श्री गौरव कुमार द्वारा धार्मिक स्थलों के आस-पास उच्च आवृत्ति (हाई फ्रीक्वेंसी) वाले साउंड सिस्टम का प्रयोग कर धार्मिक स्थलों की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले कार्यक्रमों को तत्काल प्रभाव से प्रतिबंधित कर दिया गया है।”
दुनिया के सबसे महंगे शहरों में गिने जाने वाले दुबई में बिना नौकरी और बचत के कदम रखना किसी चुनौती से कम नहीं था। Aaliya Lala के लिए भी शुरुआत आसान नहीं रही। अबू धाबी से दुबई पहुंचीं लाला के सामने करियर बनाने के साथ-साथ रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने की भी चुनौती थी। हालात ऐसे थे कि खाने के लिए भी पैसे जुटाना मुश्किल हो गया था, लेकिन उन्होंने परिवार से मदद मांगने के बजाय खुद रास्ता निकालने का फैसला किया। छोटी-छोटी कमाई से शुरुआत करने वाली लाला ने धीरे-धीरे अपनी पहचान बनाई और कंटेंट क्रिएशन की दुनिया में कदम रखा।
मॉडलिंग और फोटोग्राफी से होते हुए उनका सफर ट्रैवल और लाइफस्टाइल कंटेंट तक पहुंचा। आज वह इंटरनेशनल ब्रांड्स, लग्जरी होटल्स और टूरिज्म बोर्ड्स के साथ काम करती हैं। उनकी कहानी बताती है कि मुश्किल शुरुआत के बावजूद लगातार मेहनत और नए अवसर तलाशने की कोशिश किस तरह करियर की दिशा बदल सकती है।
एक शॉवरमा के लिए करना पड़ा छोटा काम
अब लाखों रुपये की सालाना कमाई करने वाली लाला के लिए शुरुआत बेहद साधारण थी। अबू धाबी से दुबई आने के बाद उनके पास खाने तक के पैसे नहीं थे। पिता से आर्थिक मदद मांगना उन्हें मंजूर नहीं था। ऐसे में उन्होंने अपनी रूममेट के लिए पानी लाने का काम शुरू किया और टिप के तौर पर रोज करीब Dh5-6 मिलने लगे। इसी पैसे से वह दिन में एक शॉवरमा खरीदकर गुजारा करती थीं। करीब एक महीने बाद उन्हें नौकरी मिली और जिंदगी धीरे-धीरे पटरी पर आने लगी।
मॉडलिंग से शुरू हुआ सफर, कैमरे के दोनों तरफ किया काम
लाला ने अपने करियर की शुरुआत मॉडलिंग से की और बाद में फोटोग्राफी भी की। इससे उन्हें कैमरे के सामने और पीछे, दोनों तरह के काम का अनुभव मिला। पिछले 14 से ज्यादा वर्षों में उन्होंने कंटेंट क्रिएशन की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई। हालांकि यह सफर भी आसान नहीं रहा। वह दो बार अपने सोशल मीडिया पेज खो चुकी हैं और हर बार उन्हें फिर से शुरुआत करनी पड़ी।
आठ साल यात्रा नहीं की, फिर दुनिया देखने की ठानी
लाला बताती हैं कि करीब आठ साल तक उन्होंने यात्रा नहीं की। इसके बाद उनके भीतर दुनिया को देखने और अलग-अलग संस्कृतियों को करीब से समझने की इच्छा पैदा हुई। लोगों, संस्कृति, खान-पान और नए अनुभवों से जुड़ने के जुनून ने उन्हें ट्रैवल कंटेंट की ओर मोड़ दिया। इसके बाद उन्होंने पर्यटन बोर्डों, इंटरनेशनल ब्रांड्स और लग्जरी होटलों के साथ काम करना शुरू किया।
एक कमाई नहीं, कई इनकम सोर्स बनाए
समय के साथ लाला ने सिर्फ कंटेंट क्रिएशन पर निर्भर रहने के बजाय अपनी कमाई के कई रास्ते तैयार किए। वह एक मीडिया हाउस भी चलाती हैं, जहां इंफ्लुएंसर्स, ब्रांड्स और ट्रैवल एजेंसियों के बीच काम कराया जाता है। इसके अलावा वह UAE के रियल एस्टेट और वित्तीय बाजारों में भी निवेश करती हैं।
सालाना कमाई 1 करोड़ रुपये तक
लाला के मुताबिक, ब्रांड्स और पर्यटन बोर्डों से मिलने वाले काम के आधार पर उनकी औसत सालाना कमाई करीब Dh300,000 से Dh400,000 है, जो भारतीय मुद्रा में लगभग ₹78 लाख से ₹1.04 करोड़ के बराबर बैठती है। इसके अलावा उनकी मीडिया कंपनी, रियल एस्टेट और निवेश से भी आय होती है।
अब लक्ष्य सिर्फ कमाना नहीं, संपत्ति बनाना है
लाला की कहानी में सबसे बड़ा बदलाव सिर्फ कमाई का आंकड़ा नहीं, बल्कि उनकी सोच में आया बदलाव है। कभी एक शॉवरमा के लिए टिप पर निर्भर रहने वाली लाला अब कई आय स्रोतों के जरिए लंबे समय की वित्तीय सुरक्षा बनाने पर ध्यान दे रही हैं।
उनका लक्ष्य अपने कारोबार का विस्तार करना, मजबूत एसेट्स तैयार करना, समझदारी से निवेश करना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने काम को बढ़ाना है। साथ ही वह ऐसी आर्थिक आजादी चाहती हैं, जिसमें वह यात्रा कर सकें, नए अवसर तलाश सकें और अपने परिवार के भविष्य को सुरक्षित बना सकें।
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समाजवाद को सकारात्मक नजरिए देखने वाले नौजवान अमेरिकियों की संख्या बढ़ती जा रही है। सोशल मीडिया पर पूंजीवाद बनाम समाजवाद की बहस व्यापक चर्चा का विषय बनी हुई है। यह संकेत है कि कम्युनिस्ट और समाजवादी विचारधाराएं, जिन्हें कभी अमेरिका में कलंकित और वर्जित माना जाता था, अब हाशिये से निकलकर मुख्यधारा की चेतना में प्रवेश करती दिख रही हैं- विशेषकर युवा पीढ़ी के बीच।
यूरोपीय राजनीति की खिसक रही भू-गर्भीय परतों (Tectonic Plates) से उठते भूकंपीय झटकों का सितंबर में जर्मनी शिकार बना। पहले हफ्ते में सैक्सनी-अनहाल्ट पहला जर्मन प्रांत बना, जहां नव-नाजीवादी ऑल्टरनेटिव्स फॉर ड्यूशलैंड (एएफडी) पार्टी प्रादेशिक चुनाव जीतने में कामयाब रही (वहां वह लगभग 44 फीसदी वोट पाकर सबसे बड़ी पार्टी बनी)। यह किसी आम स्थिति में अचानक पैदा हुई विसंगति नहीं थी। बल्कि यह एक दशक से अधिक समय से उभरते रूझान का ठोस रूप ग्रहण कर लेना भर था। इस बात की पुष्टि 20 सितंबर को जर्मनी के मेक्लेनबर्ग– वेस्टर्न पोमेरेनिया प्रांत में एएफडी की जीत से हुई। वहां वह 38 प्रतिशत से अधिक वोटों के साथ पहले स्थान पर रही।
उसी रोज जर्मनी की राजधानी बर्लिन में एक दूसरे किस्म का सियासी भूकंप आया। वहां डाई लिंके (द लेफ्ट) पार्टी सबसे आगे रही, जिसे पश्चिमी मीडिया धुर-वामपंथी बताता है। इन तीन नतीजों ने यह साफ कर दिया है कि जर्मनी की राजनीति तेजी से दक्षिण एवं वाम की ‘चरम’ (extreme) धुरियों के बीच बंटती जा रही है। इस तरह सेंटर राइट- क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक पार्टी (सीडीयू) और सेंटर लेफ्ट- सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एसपीडी) के बीच सत्ता की अदला-बदली का जारी लगभग आठ दशक से जारी खेल अब खत्म हो रहा है। उचित ही इसे जर्मन राजनीति में मध्य मार्ग के विलोप के रूप में देखा गया है।
और यह सिर्फ जर्मनी का रुझान नहीं है। वैसे तो यह ट्रेंड चुनावी लोकतंत्र वाले तमाम देशों में उभरा है, लेकिन पश्चिमी देशों में इस नई राजनीतिक परिघटना की खास झलक देखी जा सकती है। कुछ महीनों के बाद इस रुझान की पुष्टि संभवतः फ्रांस में भी होगी, जहां अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में मुख्य गोलबंदी “धुर वामपंथी” नेता ज्यां ल्यूक मेलेन्शॉ और धुर दक्षिणपंथी नेता मेरी ली पेन के बीच हो रही है।
यह घटनाक्रम आने वाले वक्त में संभावित राजनीतिक टकराव का संकेत है। डाई लिंके की जीत और मेलेन्शॉ को मिल रही लोकप्रियता दुनिया में नए तेवर वाले वामपंथ के उदय की मिसाल हैं। और ऐसे संकेत सिर्फ यूरोप तक सीमित नहीं हैं। डाई लिंके की जीत के सिलसिले में यह बात सामने आई कि इस पार्टी ने बर्लिन में अपने चुनावी अभियान को न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी से सीख लेते हुए डिजाइन किया। बर्लिन में डाई लिंके का चेहरा तुर्किश मूल की सोशलिस्ट एलीफ एराल्प हैं। उनकी टीम ममदानी के प्रचार अभियान का अध्ययन करने न्यूयॉर्क गई। वहां से वह ये सबक लेकर लौटी कि बिखरे हुए अनगिनत मुद्दों को उठाने के बजाय दो या तीन ऐसे मुद्दे लिए जाएं, जिनकी वजह ‘लोगों की रात की नींद उड़ी रहती है’।
न्यूयॉर्क की तरह ही बर्लिन में भी नवोदित लेफ्ट ने मकान किराये को अपना केंद्रीय मुद्दा बनाया। साथ में रोजमर्रा की चीजों की महंगाई और परिवहन पर ध्यान केंद्रित किया गया। उसके साथ हज़ारों स्वयंसेवकों को संगठित किया गया, ताकि वे घर घर जाकर चर्चा कर सकें। और उसका असर हुआ- ठीक न्यूयॉर्क की तरह। अब एराल्प बर्लिन की मेयर कार्यालय के दरवाजे तक पहुंच चुकी हैं।
एक जर्मन विश्लेषक ने लिखा है- यह तथ्य कि पूंजीवादी विरोधी वामपंथ ने बर्लिन में जीत हासिल की है, पुष्टि करता है कि उदारवादी (लिबरल) और मध्यमार्गी (सेंटरिस्ट) विकल्पों का पतन और “बाज़ार लोकतंत्र” का ढहना जारी है। वह पार्टी सिस्टम ढह रहा है, जो नव-उदारवाद के दौरान एक ही केंद्र- पूंजी से नियंत्रित रहा, भले दिखावटी तौर पर कई पार्टियों के रूप में उसके अनेक चेहरे सामने रहे हों।
गुजरे डेढ़ दशक में दुनिया के बहुत बड़े हिस्से में धुर-दक्षिणपंथ का बढ़ना सबसे मजबूत राजनीतिक परिघटना रही है। ऐसा उन विशाल निराश समूहों की प्रतिक्रिया से संभव हुआ, जिन्होंने नव-उदारवादी भूमंडलीकरण के विनाशकारी परिणामों को झेला और एक मुकाम आकर उसे ठुकराना शुरू किया। अर्थव्यवस्था का उत्तरोत्तर वित्तीयकरण, वेतन की अस्थिरता, बेरोजगारी, आवास का दुर्लभ होना, स्वास्थ्य सेवाओं की महंगाई, शिक्षा का व्यापारीकरण, आम इन्फ्रास्ट्रक्चर का क्षय- आदि के कारणों से उपजे जन असंतोष का लाभ धुर दक्षिणपंथी दलों ने उठाया। किसी ‘आंतरिक शत्रु’ के खिलाफ नफरत भरे अभियान चलाना, काल्पनिक प्रभु वर्ग (मोटे तौर पर पहले सत्ता से लाभान्वित रहे समूहों) को तमाम समस्याओं के लिए जिम्मेदार ठहराना, अयथार्थ समाधान पेश करना- आदि ऐसा तरीका रहा है, जिसे लगभग हर देश में उन दलों ने अपनाया है। इनकी बदौलत धुर-दक्षिणपंथियों को कामयाबी मिली है।
उन्हें यह सफलता इसलिए भी मिली, क्योंकि पारंपरिक वामपंथ ने नव-उदारवाद के हाथों अपनी हार को स्वीकार कर लिया। वे दल बाजार, बड़ी कंपनियों, और अंतरराष्ट्रीय पूंजी के समन्वित हमलों के आगे झुक गए। उन्होंने बिना आलोचनात्मक रुख अपनाए उस एजेंडे को स्वीकार कर लिया, जो शासक वर्ग उनके लिए तैयार किया था। मसलन, पहचान आधारित मुद्दों और woke culture के समर्थन में उन्होंने अपना सारा जोर लगाया, जबकि आम जन के रोजमर्रा के सवालों से उन्होंने नेता तोड़ लिया।
ट्रेड यूनियनों का बदलाव के बड़े सपनों को छोड़ देना, वर्ग-आधारित पार्टियों का विघटन और वर्ग चेतना को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी से उनका मुंह मोड़ लेना- ये सब इसी दौर की कहानियां हैं। इस दौर में पूंजी बनाम श्रम की बहस को हाशिये में चले जाने दिया गया और यह शिक्षा नजरअंदाज दी गई कि पूंजी का बेलगाम संकेंद्रण धन उत्पन्न करने के अन्य दो स्रोतों- प्रकृति और श्रम- को नष्ट कर देता है।
इसी दौर में धुर-दक्षिणपंथ “समाधान” बनकर उभरा। उसने मुसीबत के असली स्रोतों से ध्यान हटा कर अल्पसंख्यकों, प्रवासियों, या कम्युनिस्ट प्रतीकों को निशाने पर लिया। पश्चिमी देशों में पारंपरिक वामपंथ और मध्यमार्गी दलों ने इनमें से कुछ सवालों पर धुर-दक्षिणपंथ को अपनी मौन सहमति दी, जबकि कुछ मुद्दों पर उसे सीधे चुनौती देने से वे बचते रहे। उसी का नतीजा अब उनका खुद हाशिये पर चले जाना और उससे पैदा हुए खालीपन को भरने के लिए नए तेवर वाले वामपंथ का उभरना है।
इस प्रक्रिया को फिलहाल अमेरिका भी साफ देखा जा सकता है। वहां नए वामपंथी तेवर की नुमाइंदगी Democratic Socialists of America (डीएसए) कर रहा है। हालांकि यह स्वायत्त राजनीतिक समूह है, लेकिन चुनावी सिस्टम की मजबूरियों के कारण वह डेमोक्रेटिक पार्टी के अंदर अपने को संगठित किए हुए है। इस समय जोहरान ममदानी डीएसए का सबसे प्रखर चेहरा हैं। लेकिन उसके अनेक चेहरे इस वर्ष डेमोक्रेटिक प्राइमरी (उम्मीदवार चुनने की प्रक्रिया) में कामयाब रहे, और तीन नवंबर को होने वाले मध्य-अवधि चुनावों में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार के तौर पर मैदान में हैं। उनके नतीजों पर सबका ध्यान टिका हुआ है।
यह घटनाक्रम अमेरिका में आए एक बड़े बदलाव को जाहिर करता है। इस सिलसिले में ब्रिटिश अर्थशास्त्री जॉन रॉस की यह टिप्पणी काबिल-ए-गौर हैः
“पिछली बार जब किसी सोशलिस्ट उम्मीदवार को अमेरिकी चुनाव में गंभीरता से लिया गया, तो वह 1912 में था, जब यूजीन डेब्स को राष्ट्रपति पद के लिए 6 फीसदी वोट मिले। यह बहुत कम था, लेकिन नगण्य नहीं था। उसके बाद पहली बार हो रहा है, जब डीएसए चुनाव जीत रहा है। उनके सदस्य कांग्रेस में हैं। उन्होंने दो सीटें जीतीं। उन्होंने सीनेट के लिए डेमोक्रेटिक उम्मीदवारी हासिल की है। न्यूयॉर्क के मेयर ममदानी डीएसए के सदस्य हैं। यह पहली बार है कि जब उम्मीदवार खुले तौर पर समाजवादी के रूप में खड़े हो रहे हैं। इसका अपवाद सिर्फ बर्नी सैंडर्स हैं, जो डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट हैं, लेकिन वे निर्दलीय के रूप में ही चुनाव लड़ते रहे।।।।।
अमेरिकी अखबार पढ़ें, तो मुझे लगता है वॉल स्ट्रीट जर्नल लगभग हर दिन डीएसए की निंदा करने वाला लेख छापता है, और न्यूयॉर्क टाइम्स आदि भी। और यह चौंकाने वाला है। यह तो शायद संवैधानिक भी न हो कि अमेरिकी कांग्रेस किसी विशिष्ट संगठन की निंदा करने के लिए मतदान करे, क्योंकि यह कहा जा सकता है कि यह अमेरिकी संविधान के प्रथम संशोधन के खिलाफ है, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार सुनिश्चित करता है। लेकिन ऐसा इसीलिए हुआ, क्योंकि अब मामला गंभीर है।।।।
इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिका समाजवादी बनने जा रहा है। दुर्भाग्य से मेरे जीवन काल में ऐसा नहीं होगा। यहां मेरा मतलब वास्तविक समाजवाद से है- यानी उस अर्थ में, जिसमें अर्थव्यवस्था का अधिकांश हिस्सा राजकीय स्वामित्व में आ जाता है, आपके सामने औपचारिक समाजवादी समाज होता है, और श्रमिक वर्ग समाज में अग्रणी शक्ति होता है।”
यहां जॉन रॉस ने कांग्रेस (अमेरिकी संसद) के जिस प्रस्ताव का जिक्र किया, वह निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव ने पिछले एक सितंबर को पारित किया। 192 के मुकाबले 220 मतों के बहुत से पारित इस प्रस्ताव में “समाजवाद” की निंदा की गई। डीएसए का इसमें नाम लेकर जिक्र किया गया। इसके अलावा हाल में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी के नेता बार बार कम्युनिस्ट खतरे का जिक्र करते रहे हैं। उन्होंने डीएसए उम्मीदवारों का उल्लेख कर कहा है कि “कम्युनिज़्म हमारा दुश्मन है”। बीते चार जुलाई को अमेरिकी स्वतंत्रता की 250वीं सालगिरह के मौके पर राष्ट्र के नाम संबोधन में ट्रंप ने एक चौथाई से ज्यादा समय कम्युनिस्ट खतरे के उल्लेख और कम्युनिज्म के कथित अत्याचारों की चर्चा में लगाया।
इसके बावजूद हकीकत यह है कि समाजवाद को सकारात्मक नजरिए देखने वाले नौजवान अमेरिकियों की संख्या बढ़ती जा रही है। सोशल मीडिया पर पूंजीवाद बनाम समाजवाद की बहस व्यापक चर्चा का विषय बनी हुई है। यह संकेत है कि कम्युनिस्ट और समाजवादी विचारधाराएं, जिन्हें कभी अमेरिका में कलंकित और वर्जित माना जाता था, अब हाशिये से निकलकर मुख्यधारा की चेतना में प्रवेश करती दिख रही हैं- विशेषकर युवा पीढ़ी के बीच। और अब बात चर्चा से आगे निकल कर यहां पहुंच गई है कि खुद को सोशलिस्ट बताने वाले उम्मीदवार चुनाव जीतने लगे हैं।
इस घटनाक्रम ने डीएसए की नीतियों और कार्यक्रम को चर्चा के केंद्र में लाया है। आम धारणा यही है कि डीएसए नॉर्डिक सोशल डेमोक्रेसी का अमेरिकी संस्करण है। नॉर्डिक मॉडल निजी स्वामित्व, प्रतिस्पर्धी बाज़ार, और बड़े निजी कॉरपोरेट्स को चुनौती नहीं देता। वह महज सामूहिक सौदेबाजी (यानी यूनियन अधिकारों) को मजबूत करने और उदार कल्याणकारी राज्य की धारणा पर आधारित है। नॉर्डिक मॉडल के तहत राज्य अधिक कर लगाता है, अधिक विनियमन करता है, और अधिक सार्वजनिक सेवाएं प्रदान करता है, लेकिन अर्थव्यवस्था का स्वामित्व और संचालन मुख्य रूप से निजी पूंजी ही करती है।
व्यवहार में डीएसए की राजनीति चाहे जो हो, अपने प्रोग्राम में वह इससे कहीं आगे गया है। उसका कार्यक्रम पूंजीवादी स्वामित्व को केंद्रीय समस्या मानता है। वह कंपनी संचालन, निवेश, संसाधन आवंटन आदि का दायित्व सार्वजनिक संस्थानों, श्रमिक संगठनों और लोकतांत्रिक निकायों की ओर ट्रांसफर करना चाहता है। संघीय स्तर पर रोजगार गारंटी, 32 घंटे का कार्य सप्ताह, पूर्ण वेतन के साथ पर्यटन अवकाश, व्यक्तिगत शुल्क के बिना सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा, प्री-स्कूल से विश्वविद्यालय तक मुफ्त शिक्षा, छात्र ऋण की समाप्ति, किराया नियंत्रण, बड़े पैमाने पर सामाजिक आवास का निर्माण आदि उसके कार्यक्रम का हिस्सा हैं। संसाधन जुटाने के लिए वह वेल्थ टैक्स, कॉरपोरेट टैक्स की ऊंची दरों तथा उत्तराधिकार कर लगाने की मांग करता है।
डीएसए का राजनीतिक सुधार कार्यक्रम भी उतना ही व्यापक है। यह अमेरिकी सीनेट और इलेक्टॉरल कॉलेज को समाप्त करने, आनुपातिक प्रतिनिधित्व लागू करने, बहुदलीय लोकतंत्र लागू करने, राष्ट्रपति पद और सुप्रीम कोर्ट का ढांचा फिर से तय करने, और कार्यपालिका तथा न्यायपालिका को कहीं अधिक कड़े विधायी नियंत्रण के अधीन लाने आदि जैसी बात करता है।
अमेरिकी सिस्टम के भीतर से ऐसे सुधारों को लागू करवा पाना असंभव समझा जाता है। जबकि बाहरी जन हस्तक्षेप से सिस्टम को पलटना डीएसए की रणनीति का हिस्सा नहीं है। इसीलिए उसके कार्यक्रमों को अक्सर हवाई बताया जाता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उनका कोई महत्त्व नहीं है। डीएसए को इस बात का श्रेय दिया जाएगा कि उसने अमेरिका में उन मुद्दों को लोकप्रियता दिलाई, जिनसे वहां का शासक वर्ग ना सिर्फ नफरत करता है, बल्कि भयभीत भी होता है।
बीसवीं सदी वयस्क मताधिकार आधारित लोकतांत्रिक प्रणाली की स्थापना के लिए हुए आंदोलनों के कारण जनता के राजनीतिक अधिकारों का विस्तार हुआ था। बोल्शेविक क्रांति ने उसमें आर्थिक एवं सामाजिक पक्ष जोड़े। लेकिन एक मुकाम के बाद शासक वर्ग उस चेतना को भटकाने और सिस्टम पर फिर से अपना पूरा शिकंजा कसने में कामयाब हो गया। मौजूदा दौर में धुर-दक्षिणपंथ को उसने अपना राजनीतिक औजार बनाया है। उसके प्रतिवाद के रूप में अब नए तेवर वाला वामपंथ सामने आया है। हालांकि इसकी सीमाएं हर जगह स्पष्ट हैं, फिर भी इसका उदय स्वागतयोग्य है, क्योंकि इनसे नई संभावनाएं खुलती हैं।
भारत के राजनीतिक क्षितिज पर अभी ऐसी किसी संभावना के संकेत नजर नहीं आते, तो उसकी वजह यहां शासक वर्ग के चलाए उस वैचारिक एजेंडे का अभी भी प्रभावशाली बने रहना है, जिसके जरिए आम जन की रोजमर्रा की समस्याओं को विमर्श से बाहर धकेला गया है। बहरहाल, यहां की नई पीढ़ी अगर सीखना चाहे, तो वह पश्चिम में उभरी संभावनाओं और उनकी सीमाओं का अध्ययन कर सकती है। हालांकि अपनी राजनीति विकसित करने के लिए शिक्षा का असल स्रोत तो अपनी वस्तुगत परिस्थितियां और आवाम हो ही सकते हैं। खैर, यह एक बिल्कुल अलग मुद्दा है।

उत्तराखंड में भारी बारिश के बीच मौसम विभाग के ‘रेड’ और ‘ऑरेंज अलर्ट’ को देखते हुए शनिवार को चारधाम यात्रा 27 सितंबर तक के लिए स्थगित कर दी गई जबकि एहतियातन पांच जिलों में स्कूल भी बंद कर दिये गये।
राज्य के अधिकतर हिस्सों में सुबह से भारी बारिश हो रही है, जबकि ऊंचाई वाले इलाकों में रुक-रुककर बर्फबारी भी हुई। फिलहाल राज्य में किसी जनहानि या बड़े नुकसान की सूचना नहीं है।
गढ़वाल आयुक्त आनन्द स्वरूप की ओर से जारी आदेश के अनुसार, यात्रियों की सुरक्षा को देखते हुए 26 सितंबर की दोपहर से 27 सितंबर तक चारधाम यात्रा स्थगित रहेगी। इस संबंध में सभी जिलाधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई के लिए पत्र जारी कर दिया गया है।
मौसम विभाग ने शनिवार के लिए बागेश्वर, पिथौरागढ़, चंपावत, नैनीताल और ऊधमसिंह नगर के लिए ‘रेड अलर्ट’ जारी किया है। देहरादून, पौड़ी, रुद्रप्रयाग, चमोली और अल्मोड़ा के लिए ‘ऑरेंज अलर्ट’ तथा हरिद्वार, उत्तरकाशी और टिहरी के लिए ‘येलो अलर्ट’ जारी किया गया है।
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एहतियात के तौर पर बागेश्वर, पिथौरागढ़, चंपावत, नैनीताल और रुद्रप्रयाग में कक्षा 12 तक के सभी स्कूल बंद कर दिये गये हैं।
रविवार को देहरादून, टिहरी, पौड़ी और हरिद्वार के लिए ‘रेड अलर्ट’ जारी किया गया है। उत्तरकाशी, चमोली, नैनीताल और रुद्रप्रयाग के लिए ‘ऑरेंज’, बागेश्वर, अल्मोड़ा, चंपावत, ऊधमसिंह नगर और पिथौरागढ़ के लिए ‘येलो अलर्ट’ जारी किया गया है।
मौसम विभाग ने इस दौरान कई स्थानों पर भारी से बहुत भारी बारिश तथा कुछ स्थानों पर अत्यंत भारी बारिश का पूर्वानुमान व्यक्त किया है जिससे पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन और सड़कें बाधित होने, नदियों में जलस्तर बढ़ने तथा मैदानी इलाकों में जलभराव का खतरा है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने लोगों और पर्यटकों से सतर्क रहने की अपील करते हुए ‘रेड अलर्ट’ के दौरान अनावश्यक यात्रा से बचने को कहा है। उन्होंने नदियों, नालों और जलभराव वाले क्षेत्रों के पास न जाने तथा तेज बहाव को पार करने का प्रयास नहीं करने की सलाह दी।
उन्होंने अधिकारियों को 24 घंटे अलर्ट रहने और नदियों-नालों के जलस्तर, भूस्खलन संभावित क्षेत्रों, पहाड़ी सड़कों, चारधाम मार्गों और प्रमुख पर्यटन स्थलों की लगातार निगरानी के निर्देश दिए हैं। उन्होंने राहत एवं बचाव के लिए टीम, जेसीबी, आवश्यक उपकरण और अन्य मशीनरी रणनीतिक स्थानों पर तैयार रखने को कहा है, ताकि जरूरत पड़ने पर तत्काल राहत एवं बचाव अभियान शुरू किया जा सके।
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