रांची में ₹4,000 करोड़ से बसाई जा रही हाई-टेक स्मार्ट सिटी! 96% काम पूरा, जानिए कब खरीद सकेंगे आशियाना

Ranchi Smart City Project: स्मार्ट सिटी मिशन के तहत रांची में स्मार्ट सिटी का निर्माण पिछले 4 सालों से हो रहा है, जहां अब पक्की सड़कें, सिग्नल, पार्क, कम्युनिटी हॉल और मंत्रियों के बंगले भी नजर आने शुरू हो गए हैं। यहां कई बड़े कॉम्प्लेक्स और फ्लैटों के निर्माण में काफी तेजी देखी जा रही है, और अब आम लोग यहां अपना घर खरीदने का सपना देख रहे हैं।

इन चीजों पर फिलहाल चल रहा है काम

रांची स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के पीआरओ अमित बताते हैं कि रांची स्मार्ट सिटी में इंटीग्रेटेड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट वर्क के तहत आठ प्रोजेक्ट्स पर काम किया जा रहा है। इनमें लैंड डेवलपमेंट, रोड, स्ट्रीट लाइट, सीवरेज एंड एसटीपी, ड्रेनेज, पावर डिस्ट्रीब्यूशन, वाटर डिस्ट्रीब्यूशन, पावर इंफ्रास्ट्रक्चर व पावर फॉर वर्क प्रोजेक्ट शामिल हैं। इस प्रोजेक्ट का 96 प्रतिशत काम पूरा कर लिया गया है।

लोगों को करना पड़ेगा इंतजार

हालांकि, आम लोगों को फ्लैट लेने के लिए अभी 1.5 साल का और इंतजार करना पड़ेगा। कई सारे प्लॉट में यहां फ्लैट और डुप्लेक्स आदि का निर्माण जारी है। बहुत लोगों ने तो बिल्डर के द्वारा एडवांस बुकिंग कर ली है, लेकिन अभी इसे पूरी तरह कंप्लीट होने में कम से कम एक से डेढ़ साल का वक्त लगेगा। चूंकि यह पूरी तरह प्लांट सिटी है, इसलिए यहां रहने का अनुभव काफी शानदार रहेगा।

Ranchi Smart City Project: आम लोगों को फ्लैट लेने के लिए अभी 1.5 साल का और इंतजार करना पड़ेगा

80 करोड़ की लागत से अर्बन हाट होगा आकर्षण का केंद्र

प्लॉट नंबर 54 में 80 करोड़ की लागत से अर्बन हाट बनाया जाएगा। पीआरओ अमित बताते हैं कि इस अर्बन हाट में हैंडीक्राफ्ट्स प्रोडक्ट्स एंड पेंटिंग्स, अस्थायी प्रदर्शनी स्टॉल, बच्चों को खेलने के लिए ओपन स्पेस, ट्रेडिशनल फूड कोर्ट, हैंडलूम स्टॉल और ओपन एयर एंफीथिएटर जैसी चीजें मुख्य आकर्षण का केंद्र रहेंगी, और यहां के स्थानीय कलाकारों को भी मंच मिलेगा।

रांची होगा फ्यूचर-रेडी स्मार्ट सिटी

अमित कुमार बताते हैं कि रांची को फ्यूचर-रेडी स्मार्ट सिटी बनाने के उद्देश्य से 37 फीसदी भूमि को ओपन और ग्रीन स्पेस के रूप में सुरक्षित किया गया है। 24×7 गैस-इंसुलेटेड पावर स्टेशन और जलापूर्ति नेटवर्क विकसित किया गया है। अंडरग्राउंड वायरिंग मॉडल, रोडसाइड यूटिलिटी डक्ट सिस्टम और कई आधुनिक मॉडल्स के जरिए यह पर्यावरण-फ्रेंडली और सस्टेनेबल डेवलपमेंट स्मार्ट सिटी बनकर तैयार होगा।

रिपोर्ट- शिखा श्रेया

दिल्ली की रफ्तार होने वाली है सुपरफास्ट! आ रही हैं नई इलेक्ट्रिक बसें और चार्जिंग की शानदार सुविधा

नई दिल्ली, (ANI)। दिल्ली में बसों से सफर करने वालों के लिए 150 नई इलेक्ट्रिक बसें शुरू की जाएंगी। पांच जगहों पर गाड़ियां चार्ज करने के स्टेशन भी शुरू होंगे। जिससे लोगों को बस से सफर करने में आसानी होगी और इलेक्ट्रिक गाड़ियों को चार्ज करने की सुविधा भी बढ़ेगी।

150 नई बसें आने के बाद दिल्ली में इलेक्ट्रिक बसों की संख्या बढ़कर 5,238 हो जाएगी। अभी शहर के पास करीब 6,838 इलेक्ट्रिक बसें हैं। नई बसों के आने के बाद इनकी कुल संख्या 6,988 हो जाएगी। इनमें 1,750 CNG बसें भी हैं।

सरकार आने वाले सालों में दिल्ली में बसों की संख्या बढ़ाना चाहती है। 2028-29 तक शहर में कुल बसों की संख्या करीब 14 हजार करने का लक्ष्य है।

किन सुविधाओं से लैस होंगी नई बसें?

नई इलेक्ट्रिक बसें लो-फ्लोर और एयर-कंडीशन्ड होंगी। इन्हें इस तरह तैयार किया गया है कि पैसेंजर को सफर के दौरान आराम और सुविधा मिल सके। बसों में कई आधुनिक सुविधाएं भी दी गई हैं।

• CCTV कैमरे: बसों में सुरक्षा पर नजर रखने के लिए।

• पैनिक बटन: जरूरत पड़ने पर मदद मांगने के लिए।

• रियल-टाइम ट्रैकिंग: बस की लोकेशन की जानकारी पाने के लिए।

• दिव्यांगों के लिए सुविधा: बस में चढ़ने और सफर करने को आसान बनाने के लिए।

दिल्ली में इलेक्ट्रिक गाड़ियों की चार्जिंग सुविधा बढ़ाने के लिए पांच जगहों पर स्टेशन तैयार किए गए हैं। इनमें एक स्टेशन अंतर-राज्यीय बस अड्डे पर और चार DTC डिपो में हैं।

इन पांच जगहों पर मिलेंगे EV चार्जिंग स्टेशन:

स्वामी विवेकानंद ISBT, आनंद विहार

नंद नगरी DTC डिपो,

रोहिणी सेक्टर-37 DTC डिपो,

नांगलोई DTC डिपो,

केशवपुर DTC डिपो

आनंद विहार ISBT पर दिल्ली ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (DTIDC) ने ज्यादा कैपेसिटी वाला EV चार्जिंग स्टेशन बनाया है। इस बस अड्डे पर रोज करीब 1.25 लाख पैसेंजर आते-जाते हैं और औसतन 2,300 बसें गुजरती हैं। इनमें दिल्ली, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की बसों के साथ टूरिस्ट बसें भी शामिल हैं।

दिल्ली परिवहन निगम (DTC) दूसरे डिपो में भी EV चार्जिंग स्टेशन बना रहा है। परिवहन मंत्री पंकज कुमार सिंह के मुताबिक, नई इलेक्ट्रिक बसें शुरू करने और चार्जिंग की सुविधा बढ़ाने से लोगों को बेहतर पब्लिक ट्रांसपोर्ट मिलेगा। इससे इलेक्ट्रिक गाड़ियों का इस्तेमाल बढ़ाने और दिल्ली में प्रदूषण कम करने में मदद मिलेगी।

अब चारधाम जाना होगा बेहद आसान, दिल्ली से ऋषिकेश सिर्फ 2.5 घंटे में! इस प्रोजेक्ट का 75% काम पूरा

Delhi To Rishikesh Namo Bharat: दिल्ली-एनसीआर से उत्तराखंड और चारधाम जाने वाले पर्यटकों के लिए एक बड़ा अपडेट आया है। आने वाले समय में दिल्ली से ऋषिकेश का सफर सिर्फ 2.5 घंटे में पूरा हो सकेगा, जबकि कर्णप्रयाग तक का सफर जो सड़क मार्ग से 12-13 घंटे लेता है, वह महज 5 से 6 घंटे में पूरा हो जाएगा।

यह मुमकिन होने जा रहा है सरकार के दो बड़े रेल प्रोजेक्ट्स के कारण। पहला, प्रस्तावित मेरठ-ऋषिकेश नमो भारत कॉरिडोर और दूसरा, निर्माणाधीन ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन। आइए आपको बताते हैं कि यह पूरा प्रोजेक्ट क्या है, इसका काम कहां तक पहुंचा है और इससे श्रद्धालुओं को क्या-क्या सहूलियतें मिलेंगी।

सिर्फ 2.5 घंटे में दिल्ली से ऋषिकेश

दिल्ली से मेरठ तक नमो भारत (RRTS) ट्रेन की कनेक्टिविटी पहले से ही चालू है। अब सरकार इस कॉरिडोर को मेरठ से आगे हरिद्वार और ऋषिकेश तक बढ़ाने के प्रस्ताव पर काम कर रही है। अगर यह प्रोजेक्ट तय योजना के तहत पूरा होता है, तो दिल्ली-एनसीआर के लोग महज 2 से 2.5 घंटे में ऋषिकेश पहुंच जाएंगे। वीकेंड पर दिल्ली-देहरादून-हरिद्वार हाईवे पर लगने वाले घंटों के ट्रैफिक जाम से यात्रियों को बड़ी राहत मिलेगी।

ऋषिकेश से कर्णप्रयाग का 6 घंटे का सफर अब मात्र 2 घंटे में!

गढ़वाल के दुर्गम पहाड़ी रास्तों पर सफर को आसान बनाने के लिए 127 किलोमीटर लंबी ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन का निर्माण तेजी से चल रहा है। इस प्रोजेक्ट का लगभग 75% सिविल वर्क पूरा हो चुका है। हाल ही में 11 सितंबर को 10 किमी लंबी ‘एस्केप टनल-1’ का ब्रेकथ्रू सफलता पूर्वक हासिल किया गया। हिमालय के कठिन और संवेदनशील इलाकों से गुजरने के कारण 127 किमी लंबे इस रूट का 105 किलोमीटर हिस्सा सुरंगों के भीतर से गुजरेगा।

कब चालू होगी ट्रेन?

एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, शिवपुरी-ब्यासी तक का सेक्शन 2028 तक चालू होने की उम्मीद है, जबकि कर्णप्रयाग तक की पूरी रेल लाइन 2029 तक शुरू हो जाएगी। बता दें कि वर्तमान में ऋषिकेश से कर्णप्रयाग जाने में सड़क मार्ग से 6 से 7 घंटे लगते हैं, लेकिन ट्रेन शुरू होने के बाद यह दूरी सिर्फ 2 से 2.5 घंटे में तय हो जाएगी।

केदारनाथ और बद्रीनाथ के श्रद्धालुओं को कैसे मिलेगा फायदा?

यह रेलवे लाइन सीधे केदारनाथ या बद्रीनाथ मंदिर तक तो नहीं पहुंचेगी, लेकिन यह श्रद्धालुओं को मुख्य बेस कैंप के बहुत करीब पहुंचा देगी:

बद्रीनाथ जाने वालों के लिए: यात्री ट्रेन से सीधे कर्णप्रयाग उतरेंगे और वहां से सड़क मार्ग (बस या टैक्सी) के जरिए जोशीमठ होते हुए बेहद कम समय में बद्रीनाथ पहुंच सकेंगे।

केदारनाथ जाने वालों के लिए: ट्रेन से रुद्रप्रयाग या तिलणी स्टेशन उतरकर यात्री सीधे सोनप्रयाग/गौरीकुंड के लिए सड़क मार्ग ले सकेंगे, जो केदारनाथ पैदल यात्रा का मुख्य पड़ाव है।

बुजुर्गों के लिए वरदान: पहाड़ों के संकरे और घुमावदार रास्तों पर घंटों बस या कार में सफर करना बुजुर्ग श्रद्धालुओं के लिए काफी तकलीफदेह होता था। ट्रेन चलने से उनका सफर बेहद आरामदायक और सुरक्षित हो जाएगा।

गढ़वाल के 5 जिलों की बदलेगी तस्वीर

यह रेल लाइन उत्तराखंड के 5 प्रमुख पहाड़ी जिलों से होकर गुजरेगी: देहरादून, टिहरी गढ़वाल, पौड़ी गढ़वाल, रुद्रप्रयाग और चमोली।

12 नए रेलवे स्टेशन: इस रूट पर 12 स्टेशन बनाए जा रहे हैं जिनमें ऋषिकेश, मुनि की रेती, शिवपुरी, ब्यासी, देवप्रयाग, मलेथा, श्रीनगर गढ़वाल, तिलणी, गौचर और कर्णप्रयाग शामिल हैं।

स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा: यात्रा और पर्यटन के अलावा, इस रेल नेटवर्क से स्थानीय निवासियों, किसानों, व्यापारियों और सेब-फल उत्पादकों को अपनी उपज बड़े शहरों के बाजारों तक आसानी से पहुंचाने में मदद मिलेगी।

Namo Bharat: 3 घंटे नहीं अब 90 मिनट में पूरा होगा दिल्ली-करनाल का सफर! नमो भारत के नए रूट पर बड़ा अपडेट

चारधाम यात्रा के लिए रेलवे का यह इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट उत्तराखंड के पर्यटन इतिहास में एक नया अध्याय लिखेगा। जब दिल्ली से कर्णप्रयाग का पूरा सफर 12 घंटे से घटकर महज 5-6 घंटे रह जाएगा, तो इससे न सिर्फ श्रद्धालुओं का समय और पैसा बचेगा, बल्कि मानसून और भूस्खलन के समय होने वाली दुर्घटनाओं में भी काफी कमी आएगी।

लहरों के नीचे छिपा राज, जानिए क्यों नहीं हिलते गहरे पानी में बने पुलों के पिलर?

नदी या समुद्र के बीच पुल के पिलर बनाना देखने में जितना मुश्किल लगता है, असल में इसके पीछे उतनी ही शानदार इंजीनियरिंग काम करती है। तेज बहाव और ज्यादा गहराई के बावजूद इंजीनियर खास टेक्निक की मदद से पानी के अंदर पुल की मजबूत नींव तैयार करते हैं। कॉफरडैम और कैसन इसी काम में सबसे ज्यादा मददगार होते हैं।

इन टेक्निक की मदद से पानी के बीच निर्माण के लिए एक सेफ जगह बनाई जाती है, ताकि इंजीनियर और मजदूर वहां नींव का काम कर सकें। लेकिन आखिर पानी को रोककर यह जगह कैसे बनाई जाती है और इतनी गहराई में पुल के पिलर कैसे खड़े किए जाते हैं।

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पानी रोकने वाली दीवारमान लीजिए कि किसी नदी के बीच में पुल का एक पिलर खड़ा करना है. इसमें सबसे बड़ी परेशानी यह होती है कि जिस जगह पर नींव की खुदाई होनी है, वहां हर वक्त पानी मौजूद रहता है. इस परेशानी से निपटने के लिए इंजीनियर उस खास जगह के चारों तरफ स्टील या कंक्रीट का एक वाटर-टाइट घेरा बनाते हैं. इसी अस्थायी घेरे को कॉफरडैम कहा जाता है. कॉफरडैम बनने के बाद उसके भीतर जमा पूरे पानी को पंप के जरिए बाहर निकाल दिया जाता है. पानी हटते ही नदी के बीचों-बीच एक सूखी और सेफ जगह मिल जाती है, जहां मजदूर और भारी मशीनें आसानी से खुदाई और पिलर कंस्ट्रक्शन का काम शुरू कर सकते हैं.

कॉफरडैम बनाने का तरीका

कॉफरडैम को तैयार करने के लिए काम की जगह के हिसाब से स्टील शीट पाइल, भारी कंक्रीट, लकड़ी या मिट्टी का उपयोग किया जाता है. कंस्ट्रक्शन प्रोसेस में सबसे पहले पानी के नीचे की ढीली मिट्टी को साफ किया जाता है. इसके बाद सपोर्ट देने वाले पाइल्स लगाए जाते हैं और फिर स्टील की भारी शीटों को जमीन के अंदर तक धंसा दिया जाता है ताकि पानी अंदर न आ सके. जब अंदर का पानी पूरी तरह बाहर निकाल लिया जाता है, तो नींव का काम शुरू होता है. कॉफरडैम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह केवल एक टेम्पररी स्ट्रक्चर होती है. जैसे ही पिलर का कंस्ट्रक्शन पूरा हो जाता है, इस पूरे ढांचे को वहां से हटा लिया जाता है. इसलिए इसका इस्तेमाल 12 से 18 मीटर तक के कम गहरे पानी वाले एरिया में ही किया जाता है.

कैसन टेक्नोलॉजी

पानी बहुत गहरा हो या फिर समुद्र जैसी कंडीशन हो, जहां पानी का प्रेशर बहुत ज्यादा होता है और पुल को भारी वजन संभालना पड़ता है, तो वहां कॉफरडैम काम नहीं आता है. ऐसे बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए कैसन टेक्निक का इस्तेमाल किया जाता है. कैसन असल में एक बहुत बड़ा, खोखला और मजबूत ढांचा होता है, जो पूरी तरह से वाटरप्रूफ होता है. इसे पहले से बाहर तैयार किया जाता है और फिर क्रेन या जहाजों की मदद से तय की गई जगह पर पानी के नीचे उतारा जाता है. कैसन को धीरे-धीरे पानी के तल तक पहुंचाया जाता है और मिट्टी खोदकर इसे गहराई में धंसाया जाता है.

परमानेंट फाउंडेशन

कैसन और कॉफरडैम में सबसे बड़ा फर्क यही है कि कैसन को काम पूरा होने के बाद बाहर नहीं निकाला जाता है. जब कैसन अपनी सही गहराई पर पहुंच जाता है, तो इसके अंदर कंक्रीट और सरिया भरकर इसे पूरी तरह से ठोस बना दिया जाता है. इस तरह यह ढांचा हमेशा के लिए पुल का परमानेंट पार्ट बन जाता है. बंदरगाहों, गहरे समुद्र और नरम मिट्टी वाले इलाकों में जहां भारी कंस्ट्रक्शन बनानी होती हैं, वहां कैसन ही सबसे सेफ ऑप्शन माना जाता है.

कैसन के प्रकार

इंजीनियरिंग में जरूरतों के हिसाब से अलग-अलग तरह के कैसन इस्तेमाल किए जाते हैं. इनमें ओपन कैसन, बॉक्स कैसन और न्यूमैटिक कैसन सबसे मेन हैं. इन्हें बनाने में कंक्रीट, स्टील, मजबूत लकड़ी और चिनाई का इस्तेमाल होता है. सीधे शब्दों में कहें तो कॉफरडैम पानी को रोककर काम करने के लिए बनाई गई एक टेम्पररी प्रोटेक्टिव बैरियर है, जिसे काम खत्म होते ही हटा दिया जाता है. वहीं दूसरी ओर, कैसन एक परमानेंट स्ट्रक्चर है जो कंक्रीट से भरकर खुद पुल का मेन फाउंडेशन बन जाता है.