Vishal Nirmiti IPO: ₹178 करोड़ का इश्यू 2 गुना भरकर बंद, अलॉटमेंट 6 अक्टूबर को; ऐसे करें चेक

सिविल इंजीनियरिंग, मैन्युफैक्चरिंग और कंस्ट्रक्शन कंपनी विशाल निर्मिती का IPO 1.79 गुना सब्सक्रिप्शन के साथ बंद हो गया है। यह ₹178 करोड़ का था। पब्लिक इश्यू में ₹145 करोड़ के 65.91 लाख नए शेयर जारी हुए। साथ ही प्रमोटर वामन प्रीस्ट्रेसिंग कंपनी प्राइवेट लिमिटेड की ओर से ₹33 करोड़ के 15 लाख शेयरों को ओएफएस रहा। IPO में क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल बायर्स के लिए रिजर्व हिस्सा 1.33 गुना, रिटेल इनवेस्टर्स के लिए रिजर्व हिस्सा 1.75 गुना और नॉन इंस्टीट्यूशनल इनवेस्टर्स के लिए रिजर्व हिस्सा 1.89 गुना भरा।

IPO बंद होने के बाद अलॉटमेंट आज, 6 अक्टूबर को फाइनल होने की उम्मीद है। जिन लोगों ने Vishal Nirmiti के IPO में पैसे लगाए हैं, वे इसकी रजिस्ट्रार MUFG Intime India Pvt.Ltd. और स्टॉक एक्सचेंज BSE की वेबसाइट के जरिए अलॉटमेंट स्टेटस चेक कर सकते हैं। इसकी प्रोसेस इस तरह है…

BSE पर कैसे करें चेक

  • https://www.bseindia.com/investors/appli_check.aspx पर जाएं।
  • इश्यू का टाइप ‘इक्विटी’ चुनें।
  • ड्रॉपडाउन मेन्यू से Vishal Nirmiti IPO चुनें।
  • एप्लीकेशन नंबर या PAN डिटेल एंटर करें।
  • ‘कैप्चा’ डालें।
  • ‘Submit’ बटन पर क्लिक करें।

MUFG Intime की वेबसाइट से कैसे करें चेक

  • https://in.mpms.mufg.com/Initial_Offer/public-issues.html पर जाएं।
  • कंपनी नेम में Vishal Nirmiti सिलेक्ट करें।
  • PAN या एप्लीकेशन नंबर या DP/क्लाइंट ID या अकाउंट नंबर/IFSC में से एक को सिलेक्ट कर डिटेल डालें।
  • Submit पर क्लिक करें।

Vishal Nirmiti IPO के लिए प्राइस बैंड ₹208-₹220 प्रति शेयर था। कंपनी के शेयर NSE और BSE पर 8 अक्टूबर को लिस्ट हो सकते हैं। विशाल निर्मिती लिमिटेड का पुराना नाम सेजल फार्म्स प्राइवेट लिमिटेड था। यह कंपनी मुख्य रूप से रेलवे के लिए प्री-स्ट्रेस्ड कॉन्क्रीट (PSC) स्लीपर, प्री-कास्ट और प्री-स्ट्रेस्ड कॉन्क्रीट प्रोडक्ट्स की मैन्युफैक्च​रिंग और डीलिंग के कारोबार में है।

साथ ही, यह पंप्ड स्टोरेज प्रोजेक्ट्स (PSPs) के लिए माइल्ड स्टील पाइप, लाइनर और पेनस्टॉक पाइप बनाने और उन्हें लगाने का काम भी करती है। कंपनी रेलवे, रिन्यूएबल पावर और इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे सेक्टर्स में रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर, सिंचाई और सिविल इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट्स के लिए इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट और कंस्ट्रक्शन (EPC) सर्विस भी देती है।

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IPO के पैसे कैसे होंगे इस्तेमाल

विशाल निर्मिती अपने पब्लिक इश्यू में नए शेयरों को जारी कर होने वाली कमाई का इस्तेमाल वर्किंग कैपिटल जरूरतों को पूरा करने के लिए, कर्ज चुकाने के लिए और आम कॉरपोरेट उद्देश्यों के लिए करेगी। कंपनी के प्रमोटर ब्रिज बी तापड़िया, अजय भगवानदास तापड़िया, पवन विट्ठलदास तापड़िया, अखिल रणछोड़ तापड़िया, नवीन तापड़िया, राजेंद्रकुमार बद्रीनारायण तापड़िया, सुयश विट्ठलदास तापड़िया, वेदांत तापड़िया और केशव तापड़िया हैं।

विशाल निर्मिती का वित्त वर्ष 2025-26 में रेवेन्यू 6 प्रतिशत बढ़कर ₹344.13 करोड़ हो गया। शुद्ध मुनाफा भी 6 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ ₹24.98 करोड़ रहा। इस बीच कंपनी पर ₹87.42 करोड़ की उधारी थी। वित्त वर्ष 2025 के दौरान कंपनी का रेवेन्यू ₹324.86 करोड़ और शुद्ध मुनाफा ₹23.64 करोड़ दर्ज किया गया।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

भारत के राष्ट्र-निर्माता और इंजीनियरिंग के मसीहा: सर एम. विश्वेश्वरैया

भारत के राष्ट्र-निर्माता और इंजीनियरिंग के मसीहा: सर एम. विश्वेश्वरैया

Mokshagundam Visvesvaraya

हर साल 15 सितंबर को भारत में अभियंता दिवस यानी इंजीनियर्स डे मनाया जाता है। यह दिन महान अभियंता, राष्ट्र-निर्माता और भारत रत्न से सम्मानित सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया (सर एम.वी.) की जयंती के अवसर पर मनाया जाता है। उन्होंने अपनी दूरदर्शिता, तकनीकी दक्षता और जल प्रबंधन के क्षेत्र में किए गए उल्लेखनीय कार्यों से आधुनिक भारत के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

 

सर एम. विश्वेश्वरैया को भारतीय इंजीनियरिंग के महान स्तंभों में गिना जाता है। उन्हें आधुनिक मैसूर के विकास में उनके योगदान के लिए विशेष रूप से याद किया जाता है। उनकी सोच केवल इंजीनियरिंग परियोजनाओं तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे औद्योगिक विकास, शिक्षा, सिंचाई, जल संरक्षण और आर्थिक प्रगति को भी राष्ट्र निर्माण का आधार मानते थे।

 

15 सितंबर को ही क्यों मनाया जाता है अभियंता दिवस?

अभियंता दिवस हर वर्ष 15 सितंबर को सर एम. विश्वेश्वरैया की जयंती के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इस दिन देशभर में इंजीनियरिंग संस्थानों, शैक्षणिक संस्थाओं और विभिन्न संगठनों में कार्यक्रम आयोजित कर उनके योगदान को याद किया जाता है।

 

खासकर कर्नाटक में यह दिन विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है। उनके जीवन, कार्यों और राष्ट्र निर्माण में योगदान पर चर्चा की जाती है तथा नई पीढ़ी को उनकी उपलब्धियों से प्रेरणा लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

 

शुरुआती जीवन और शिक्षा

सर एम. विश्वेश्वरैया का जन्म 15 सितंबर 1861 को तत्कालीन मैसूर रियासत के मुद्देनहल्ली गांव में हुआ था, जो वर्तमान में कर्नाटक के चिकबल्लापुर जिले में स्थित है। उनका जन्म एक तेलुगु भाषी ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

 

उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा के बाद बेंगलुरु के सेंट्रल कॉलेज से बी.ए. की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने इंजीनियरिंग के क्षेत्र में उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए पुणे के प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थान में प्रवेश लिया। सिविल इंजीनियरिंग की शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत की और जल्द ही अपनी प्रतिभा तथा कार्यकुशलता के कारण अलग पहचान बना ली।

 

इंजीनियरिंग से राष्ट्र सेवा तक का सफर

सर एम.वी. ने अपने करियर की शुरुआत बॉम्बे प्रेसीडेंसी के लोक निर्माण विभाग (PWD) से की। इंजीनियर के रूप में उन्होंने जल संसाधन, सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण से जुड़ी कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर काम किया।

 

उनकी तकनीकी समझ और समस्या के व्यावहारिक समाधान खोजने की क्षमता ने उन्हें अपने समय के अग्रणी इंजीनियरों में शामिल कर दिया। वर्ष 1912 से 1918 तक उन्होंने मैसूर राज्य के दीवान के रूप में भी सेवाएं दीं।

 

दीवान के रूप में उन्होंने मैसूर के औद्योगिक, शैक्षणिक और आर्थिक विकास को गति देने के लिए कई महत्वपूर्ण पहल कीं। इसी कारण उन्हें आधुनिक मैसूर के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला व्यक्तित्व माना जाता है।

 

जल प्रबंधन और बाढ़ नियंत्रण में बड़ा योगदान

सर एम. विश्वेश्वरैया का सबसे महत्वपूर्ण योगदान जल प्रबंधन और सिंचाई व्यवस्था के क्षेत्र में माना जाता है। उस दौर में भारत के कई हिस्से बाढ़, सूखे और सिंचाई की समस्याओं से जूझ रहे थे। उन्होंने इन समस्याओं के समाधान के लिए वैज्ञानिक और आधुनिक इंजीनियरिंग तकनीकों को अपनाने पर जोर दिया।

 

उन्होंने जल के संरक्षण, बांधों के निर्माण और अतिरिक्त पानी के प्रभावी प्रबंधन से जुड़ी तकनीकों के विकास और उपयोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी तकनीकी दक्षता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ब्रिटिश भारत सरकार ने उन्हें अदन (वर्तमान यमन) की जल आपूर्ति और जल निकासी व्यवस्था का अध्ययन करने के लिए भेजा था।

 

वे दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में विकसित हो रही तकनीकों को समझने और उन्हें भारत की परिस्थितियों के अनुरूप लागू करने में भी रुचि रखते थे। उनकी यह सोच उस समय के लिए बेहद दूरदर्शी मानी जाती थी।

 

विदेश यात्राओं से सीखने का जुनून

सर एम.वी. का मानना था कि किसी भी देश की प्रगति के लिए नई तकनीकों और वैज्ञानिक सोच को अपनाना जरूरी है। इसी उद्देश्य से उन्होंने विदेशों की तकनीकी प्रगति का अध्ययन किया।

 

उन्होंने जापान, अमेरिका, यूरोप और अफ्रीका सहित विभिन्न क्षेत्रों की यात्राएं कीं और वहां की इंजीनियरिंग तथा औद्योगिक व्यवस्थाओं का अध्ययन किया। उनका उद्देश्य केवल जानकारी हासिल करना नहीं था, बल्कि उपयोगी तकनीकों को भारत की जरूरतों के अनुरूप अपनाना था।

 

ब्रिटिश सरकार ने दिया 'सर' का सम्मान

सर एम. विश्वेश्वरैया के असाधारण योगदान को देखते हुए वर्ष 1915 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें 'नाइट कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द इंडियन एम्पायर' की उपाधि प्रदान की। इसके बाद उनके नाम के साथ 'सर' की उपाधि जुड़ गई। हालांकि उनका वास्तविक सम्मान भारत के विकास और राष्ट्र सेवा में किए गए उनके कार्यों से स्थापित हुआ।

 

भारत रत्न से हुए सम्मानित

स्वतंत्र भारत में भी उनके योगदान को सर्वोच्च सम्मान मिला। वर्ष 1955 में भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया। यह सम्मान उनके लंबे सार्वजनिक जीवन, इंजीनियरिंग के क्षेत्र में योगदान और राष्ट्र निर्माण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता की पहचान था।

 

100 वर्ष से अधिक का जीवन और अंतिम समय

सर एम. विश्वेश्वरैया ने लंबा और बेहद सक्रिय जीवन जिया। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम वर्षों तक देश के विकास, तकनीकी शिक्षा और औद्योगिक प्रगति से जुड़े विषयों पर विचार व्यक्त किए।

 

उन्होंने 14 अप्रैल 1962 को बेंगलुरु में अंतिम सांस ली। उनकी स्मृति में उनके पैतृक गांव मुद्देनहल्ली में स्मारक भी बनाया गया है, जहां आज भी लोग उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुंचते हैं।

 

नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा हैं सर एम.वी.

सर एम. विश्वेश्वरैया का जीवन इस बात का उदाहरण है कि तकनीकी ज्ञान का इस्तेमाल केवल व्यक्तिगत सफलता के लिए नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के विकास के लिए भी किया जा सकता है।

 

उन्होंने जल प्रबंधन से लेकर औद्योगिक विकास तक अनेक क्षेत्रों में दूरदर्शी सोच का परिचय दिया। उनका जीवन अनुशासन, मेहनत, तकनीकी दक्षता और राष्ट्र सेवा के समन्वय की प्रेरक मिसाल है।

 

इसलिए 15 सितंबर का अभियंता दिवस केवल इंजीनियरों के सम्मान का अवसर नहीं है, बल्कि यह उस महान अभियंता को याद करने का दिन भी है, जिसने अपने ज्ञान और दूरदृष्टि से आधुनिक भारत की विकास यात्रा को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

लहरों के नीचे छिपा राज, जानिए क्यों नहीं हिलते गहरे पानी में बने पुलों के पिलर?

नदी या समुद्र के बीच पुल के पिलर बनाना देखने में जितना मुश्किल लगता है, असल में इसके पीछे उतनी ही शानदार इंजीनियरिंग काम करती है। तेज बहाव और ज्यादा गहराई के बावजूद इंजीनियर खास टेक्निक की मदद से पानी के अंदर पुल की मजबूत नींव तैयार करते हैं। कॉफरडैम और कैसन इसी काम में सबसे ज्यादा मददगार होते हैं।

इन टेक्निक की मदद से पानी के बीच निर्माण के लिए एक सेफ जगह बनाई जाती है, ताकि इंजीनियर और मजदूर वहां नींव का काम कर सकें। लेकिन आखिर पानी को रोककर यह जगह कैसे बनाई जाती है और इतनी गहराई में पुल के पिलर कैसे खड़े किए जाते हैं।

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पानी रोकने वाली दीवारमान लीजिए कि किसी नदी के बीच में पुल का एक पिलर खड़ा करना है. इसमें सबसे बड़ी परेशानी यह होती है कि जिस जगह पर नींव की खुदाई होनी है, वहां हर वक्त पानी मौजूद रहता है. इस परेशानी से निपटने के लिए इंजीनियर उस खास जगह के चारों तरफ स्टील या कंक्रीट का एक वाटर-टाइट घेरा बनाते हैं. इसी अस्थायी घेरे को कॉफरडैम कहा जाता है. कॉफरडैम बनने के बाद उसके भीतर जमा पूरे पानी को पंप के जरिए बाहर निकाल दिया जाता है. पानी हटते ही नदी के बीचों-बीच एक सूखी और सेफ जगह मिल जाती है, जहां मजदूर और भारी मशीनें आसानी से खुदाई और पिलर कंस्ट्रक्शन का काम शुरू कर सकते हैं.

कॉफरडैम बनाने का तरीका

कॉफरडैम को तैयार करने के लिए काम की जगह के हिसाब से स्टील शीट पाइल, भारी कंक्रीट, लकड़ी या मिट्टी का उपयोग किया जाता है. कंस्ट्रक्शन प्रोसेस में सबसे पहले पानी के नीचे की ढीली मिट्टी को साफ किया जाता है. इसके बाद सपोर्ट देने वाले पाइल्स लगाए जाते हैं और फिर स्टील की भारी शीटों को जमीन के अंदर तक धंसा दिया जाता है ताकि पानी अंदर न आ सके. जब अंदर का पानी पूरी तरह बाहर निकाल लिया जाता है, तो नींव का काम शुरू होता है. कॉफरडैम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह केवल एक टेम्पररी स्ट्रक्चर होती है. जैसे ही पिलर का कंस्ट्रक्शन पूरा हो जाता है, इस पूरे ढांचे को वहां से हटा लिया जाता है. इसलिए इसका इस्तेमाल 12 से 18 मीटर तक के कम गहरे पानी वाले एरिया में ही किया जाता है.

कैसन टेक्नोलॉजी

पानी बहुत गहरा हो या फिर समुद्र जैसी कंडीशन हो, जहां पानी का प्रेशर बहुत ज्यादा होता है और पुल को भारी वजन संभालना पड़ता है, तो वहां कॉफरडैम काम नहीं आता है. ऐसे बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए कैसन टेक्निक का इस्तेमाल किया जाता है. कैसन असल में एक बहुत बड़ा, खोखला और मजबूत ढांचा होता है, जो पूरी तरह से वाटरप्रूफ होता है. इसे पहले से बाहर तैयार किया जाता है और फिर क्रेन या जहाजों की मदद से तय की गई जगह पर पानी के नीचे उतारा जाता है. कैसन को धीरे-धीरे पानी के तल तक पहुंचाया जाता है और मिट्टी खोदकर इसे गहराई में धंसाया जाता है.

परमानेंट फाउंडेशन

कैसन और कॉफरडैम में सबसे बड़ा फर्क यही है कि कैसन को काम पूरा होने के बाद बाहर नहीं निकाला जाता है. जब कैसन अपनी सही गहराई पर पहुंच जाता है, तो इसके अंदर कंक्रीट और सरिया भरकर इसे पूरी तरह से ठोस बना दिया जाता है. इस तरह यह ढांचा हमेशा के लिए पुल का परमानेंट पार्ट बन जाता है. बंदरगाहों, गहरे समुद्र और नरम मिट्टी वाले इलाकों में जहां भारी कंस्ट्रक्शन बनानी होती हैं, वहां कैसन ही सबसे सेफ ऑप्शन माना जाता है.

कैसन के प्रकार

इंजीनियरिंग में जरूरतों के हिसाब से अलग-अलग तरह के कैसन इस्तेमाल किए जाते हैं. इनमें ओपन कैसन, बॉक्स कैसन और न्यूमैटिक कैसन सबसे मेन हैं. इन्हें बनाने में कंक्रीट, स्टील, मजबूत लकड़ी और चिनाई का इस्तेमाल होता है. सीधे शब्दों में कहें तो कॉफरडैम पानी को रोककर काम करने के लिए बनाई गई एक टेम्पररी प्रोटेक्टिव बैरियर है, जिसे काम खत्म होते ही हटा दिया जाता है. वहीं दूसरी ओर, कैसन एक परमानेंट स्ट्रक्चर है जो कंक्रीट से भरकर खुद पुल का मेन फाउंडेशन बन जाता है.