HUDCO Share: सरकारी कंपनी ने बिहार को ₹25000 करोड़ की फंडिंग का दिया ऑफर, इंडस्ट्रियल पार्क पर होगा खर्च

HUDCO Share: सरकारी कंपनी Housing and Urban Development Corporation Ltd (HUDCO) ने बिहार सरकार के साथ एक बड़ा समझौता किया है। इसके तहत HUDCO राज्य में इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए ₹25,000 करोड़ तक की फाइनेंशियल मदद देगी।

पांच साल में मिलेगी फंडिंग

यह रकम एक साथ जारी नहीं होगी। अगले पांच साल में जरूरत के हिसाब से अलग-अलग चरणों में फंड दिया जाएगा।

इस पैसे का इस्तेमाल बिहार में इंडस्ट्रियल पार्क बनाने में होगा। इसमें जमीन खरीदना और उद्योगों के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना शामिल है।

25 साल तक के लिए मिल सकता है लोन

HUDCO राज्य सरकार की ओर से तय की गई एक संस्था को ₹25,000 करोड़ तक के टर्म लोन देगी। फंडिंग अलग-अलग चरणों में होगी।

लोन की शर्तें भी लचीली होंगी। मोरेटोरियम की सुविधा मिल सकती है। लोन चुकाने के लिए 25 साल तक का समय दिया जा सकता है। समय से पहले लोन चुकाने का विकल्प भी होगा।

IDA को जिम्मेदारी मिली

बिहार सरकार ने राज्य के Infrastructure Development Authority को इन प्रोजेक्ट्स की जिम्मेदारी दी है। यह संस्था इंडस्ट्रियल पार्क के लिए जमीन खरीद और डेवलप कर सकती है।

यहां उद्योगों के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर भी तैयार किया जाएगा। हर प्रोजेक्ट के लिए अलग समझौता होगा। उसमें फंडिंग की शर्तें और प्रोजेक्ट का दायरा तय किया जाएगा।

तुरंत नहीं मिलेंगे ₹25,000 करोड़

यह MoU ₹25,000 करोड़ तुरंत जारी करने का करार नहीं है। यह सिर्फ फंडिंग के लिए एक फ्रेमवर्क है। जरूरत के हिसाब से पांच साल में फंड जारी होगा। MoU तीन साल तक वैध रहेगा। इसकी हर साल समीक्षा की जाएगी।

बुधवार को HUDCO का शेयर 0.11% की मामूली गिरावट के साथ ₹178.38 पर बंद हुआ।

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लहरों के नीचे छिपा राज, जानिए क्यों नहीं हिलते गहरे पानी में बने पुलों के पिलर?

नदी या समुद्र के बीच पुल के पिलर बनाना देखने में जितना मुश्किल लगता है, असल में इसके पीछे उतनी ही शानदार इंजीनियरिंग काम करती है। तेज बहाव और ज्यादा गहराई के बावजूद इंजीनियर खास टेक्निक की मदद से पानी के अंदर पुल की मजबूत नींव तैयार करते हैं। कॉफरडैम और कैसन इसी काम में सबसे ज्यादा मददगार होते हैं।

इन टेक्निक की मदद से पानी के बीच निर्माण के लिए एक सेफ जगह बनाई जाती है, ताकि इंजीनियर और मजदूर वहां नींव का काम कर सकें। लेकिन आखिर पानी को रोककर यह जगह कैसे बनाई जाती है और इतनी गहराई में पुल के पिलर कैसे खड़े किए जाते हैं।

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पानी रोकने वाली दीवारमान लीजिए कि किसी नदी के बीच में पुल का एक पिलर खड़ा करना है. इसमें सबसे बड़ी परेशानी यह होती है कि जिस जगह पर नींव की खुदाई होनी है, वहां हर वक्त पानी मौजूद रहता है. इस परेशानी से निपटने के लिए इंजीनियर उस खास जगह के चारों तरफ स्टील या कंक्रीट का एक वाटर-टाइट घेरा बनाते हैं. इसी अस्थायी घेरे को कॉफरडैम कहा जाता है. कॉफरडैम बनने के बाद उसके भीतर जमा पूरे पानी को पंप के जरिए बाहर निकाल दिया जाता है. पानी हटते ही नदी के बीचों-बीच एक सूखी और सेफ जगह मिल जाती है, जहां मजदूर और भारी मशीनें आसानी से खुदाई और पिलर कंस्ट्रक्शन का काम शुरू कर सकते हैं.

कॉफरडैम बनाने का तरीका

कॉफरडैम को तैयार करने के लिए काम की जगह के हिसाब से स्टील शीट पाइल, भारी कंक्रीट, लकड़ी या मिट्टी का उपयोग किया जाता है. कंस्ट्रक्शन प्रोसेस में सबसे पहले पानी के नीचे की ढीली मिट्टी को साफ किया जाता है. इसके बाद सपोर्ट देने वाले पाइल्स लगाए जाते हैं और फिर स्टील की भारी शीटों को जमीन के अंदर तक धंसा दिया जाता है ताकि पानी अंदर न आ सके. जब अंदर का पानी पूरी तरह बाहर निकाल लिया जाता है, तो नींव का काम शुरू होता है. कॉफरडैम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह केवल एक टेम्पररी स्ट्रक्चर होती है. जैसे ही पिलर का कंस्ट्रक्शन पूरा हो जाता है, इस पूरे ढांचे को वहां से हटा लिया जाता है. इसलिए इसका इस्तेमाल 12 से 18 मीटर तक के कम गहरे पानी वाले एरिया में ही किया जाता है.

कैसन टेक्नोलॉजी

पानी बहुत गहरा हो या फिर समुद्र जैसी कंडीशन हो, जहां पानी का प्रेशर बहुत ज्यादा होता है और पुल को भारी वजन संभालना पड़ता है, तो वहां कॉफरडैम काम नहीं आता है. ऐसे बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए कैसन टेक्निक का इस्तेमाल किया जाता है. कैसन असल में एक बहुत बड़ा, खोखला और मजबूत ढांचा होता है, जो पूरी तरह से वाटरप्रूफ होता है. इसे पहले से बाहर तैयार किया जाता है और फिर क्रेन या जहाजों की मदद से तय की गई जगह पर पानी के नीचे उतारा जाता है. कैसन को धीरे-धीरे पानी के तल तक पहुंचाया जाता है और मिट्टी खोदकर इसे गहराई में धंसाया जाता है.

परमानेंट फाउंडेशन

कैसन और कॉफरडैम में सबसे बड़ा फर्क यही है कि कैसन को काम पूरा होने के बाद बाहर नहीं निकाला जाता है. जब कैसन अपनी सही गहराई पर पहुंच जाता है, तो इसके अंदर कंक्रीट और सरिया भरकर इसे पूरी तरह से ठोस बना दिया जाता है. इस तरह यह ढांचा हमेशा के लिए पुल का परमानेंट पार्ट बन जाता है. बंदरगाहों, गहरे समुद्र और नरम मिट्टी वाले इलाकों में जहां भारी कंस्ट्रक्शन बनानी होती हैं, वहां कैसन ही सबसे सेफ ऑप्शन माना जाता है.

कैसन के प्रकार

इंजीनियरिंग में जरूरतों के हिसाब से अलग-अलग तरह के कैसन इस्तेमाल किए जाते हैं. इनमें ओपन कैसन, बॉक्स कैसन और न्यूमैटिक कैसन सबसे मेन हैं. इन्हें बनाने में कंक्रीट, स्टील, मजबूत लकड़ी और चिनाई का इस्तेमाल होता है. सीधे शब्दों में कहें तो कॉफरडैम पानी को रोककर काम करने के लिए बनाई गई एक टेम्पररी प्रोटेक्टिव बैरियर है, जिसे काम खत्म होते ही हटा दिया जाता है. वहीं दूसरी ओर, कैसन एक परमानेंट स्ट्रक्चर है जो कंक्रीट से भरकर खुद पुल का मेन फाउंडेशन बन जाता है.

दिल्ली मास्टर प्लान 2027 के तहत राजधानी का बदलेगा पूरा नक्शा, 40 लाख नए फ्लैट और मेट्रो नेटवर्क का होगा विस्तार

Delhi Master Plan 2047: केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने गुरुवार, 20 अगस्त को ‘दिल्ली मास्टर प्लान 2047’ (MPD-2047) जारी किया। इस प्लान में लगभग 40 लाख नए घर बनाने, दिल्ली के मेट्रो नेटवर्क को 695 किलोमीटर तक बढ़ाने और लगभग 383 किलोमीटर का RRTS नेटवर्क बनाने का प्रस्ताव है।

खट्टर ने इसे दिल्ली के लिए एक “ऐतिहासिक दिन” बताया और कहा कि यह प्लान ‘विकसित भारत’ के विजन के अनुरूप है। इसका मकसद दिल्ली को एक वर्ल्ड-क्लास शहर बनाना और साथ ही इसके विकास को ज्यादा टिकाऊ बनाना है।

फिलहाल, अभी दिल्ली की आबादी करीब 2.4 करोड़ है। यहां पर करीब 520 वर्ग किलोमीटर कृषि भूमि और 180 वर्ग किलोमीटर रिज व वन क्षेत्र भी हैं। मनोहर लाल ने कहा कि दिल्ली के विकास के साथ इन प्राकृतिक इलाकों को बचाना भी बेहद जरूरी है।

2047 तक बनेंगे करीब 40 लाख नए घर

MPD-2047 में दिल्ली में करीब 40 लाख नए घर बनाने का लक्ष्य रखा गया है। इसमें किफायती घरों (Affordable Housing) पर खास फोकस रहेगा। आबादी बढ़ने और परिवारों के आकार में बदलाव को देखते हुए अनुमान है कि 2047 तक दिल्ली को करीब 40 लाख अतिरिक्त घरों की जरूरत होगी।

इस प्लान में दिल्ली के मौजूदा इलाकों को फिर से विकसित (री-डेवलप) करने और ज्यादा घनी आबादी वाले विकास की अनुमति देने का प्रस्ताव है। इससे ज्यादा लोगों के लिए घर उपलब्ध हो सकेंगे और शहर की बुनियादी सुविधाओं को भी बेहतर बनाया जा सकेगा।

‘जहां झुग्गी, वहां मकान’ के सिद्धांत के तहत झुग्गी बस्तियों और JJ क्लस्टर्स को उसी इलाके में दोबारा बसाया जाएगा। वहीं, अनधिकृत कॉलोनियों के विकास, नियमितीकरण और पुनर्विकास के लिए भी एक अलग व्यवस्था तैयार की जाएगी।

दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि रिहायशी इलाकों में 30 मीटर चौड़ी सड़कों के किनारे बनी इमारतों की ग्राउंड फ्लोर पर कमर्शियल गतिविधियों की इजाजत होगी।

695 किमी तक फैलेगा दिल्ली का मेट्रो नेटवर्क

फिलहाल, दिल्ली का मेट्रो नेटवर्क करीब 416 किलोमीटर लंबा है। MPD-2047 के तहत इसमें 279 किलोमीटर का और विस्तार करने की योजना है। इसके बाद दिल्ली का मेट्रो नेटवर्क बढ़कर करीब 695 किलोमीटर हो जाएगा।

इस प्लान में दिल्ली को गाजियाबाद, मेरठ, पानीपत, करनाल और अलवर से जोड़ने वाले लगभग 383 किलोमीटर लंबे RRTS नेटवर्क का भी प्रस्ताव है।

इसके अलावा, दिल्ली के आनंद विहार में मल्टी-मॉडल ट्रांजिट हब भी बनाए जाएंगे, जो ट्रांसपोर्ट के अलग-अलग साधनों को एक ही जगह पर जोड़ेंगे।

कुल मिलाकर, मास्टर प्लान में बताया गया है कि दिल्ली 2047 तक अपनी हाउसिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरतों को कैसे पूरा करेगी, साथ ही शहर की खेती की जमीन, रिज और जंगल वाले इलाकों को भी बचाकर रखेगी।

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शानदार-दमदार एक्सप्रेसवे का देश बनता जा रहा भारत और वहीं देखिए कंगाल पाकिस्तान के एक्सप्रेसवे प्रोजेक्ट का ऐसा हाल!

जहां एक तरफ भारत आज आधुनिक और शानदार-दमदार एक्सप्रेसवे का देश बनता जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ पड़ोसी देश पाकिस्तान अपनी कंगाली और बदहाली के आंसू रो रहा है। भारत में जहां रिकॉर्ड समय में बड़े-बड़े हाईवे और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पूरे किए जा रहे हैं वहीं पाकिस्तान के आर्थिक संकट ने उसके सबसे प्रमुख शहरों के विकास को पूरी तरह से ठप कर दिया है। न्यूज एजेंसी एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक गंभीर वित्तीय संकट से जूझ रहे पाकिस्तान को अब रावलपिंडी डिवीजन में अपने विकास खर्चों में भारी कटौती करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। इसके चलते लंबे समय से वादे किए गए कई महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट्स अधर में लटक गए हैं। इसने वहां के गवर्नेंस और अर्बन प्लानिंग के पैरालिसिस को पूरी तरह उजागर कर दिया है।

रावलपिंडी डिवीजन के बजट में 60 फीसदी की भारी कटौती

द एक्सप्रेस ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक नए वित्तीय वर्ष में रावलपिंडी डिवीजन में काम करने वाले सभी प्राधिकरणों के विकास आवंटन में भारी कटौती की गई है। इस फंड संकट के कारण छह बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को पूरी तरह से रोक दिया गया है। रावलपिंडी, अटॉक, झेलम, चकवाल, तलगंग और मरी को कवर करने वाले वार्षिक जिला विकास कार्यक्रमों के बजट में करीब 60 प्रतिशत की कटौती की गई है। इस बड़ी कटौती के कारण अब नए सार्वजनिक निवेश के लिए कोई गुंजाइश नहीं बची है। फंड की इस भारी किल्लत का मतलब यह है कि 30 जून 2027 से पहले किसी भी बड़े विकास कार्य या प्रोजेक्ट की शुरुआत होने की कोई उम्मीद नहीं है।

अधर में लटका ‘लेह एक्सप्रेसवे’ और मियावाकी फॉरेस्ट

प्रशासनिक अधिकारियों ने इसके साथ ही पूरे डिवीजन में मियावाकी जंगलों के विस्तार पर भी पूरी तरह से रोक लगा दी है। जिला प्रशासन के सूत्रों का कहना है कि पिछले तीन वर्षों के दौरान रावलपिंडी या उसके पड़ोसी जिलों में एक भी ऐसा अर्बन फॉरेस्ट विकसित नहीं किया गया है। सबसे बड़ी बात यह है कि जिन प्रोजेक्ट्स को अनिश्चित काल के लिए रोका गया है उनमें लेह एक्सप्रेसवे और मदर एंड चाइल्ड हॉस्पिटल शामिल हैं। ये दोनों ही प्रोजेक्ट्स पूर्व आंतरिक मंत्री शेख रशीद अहमद के राजनीतिक निर्वाचन क्षेत्र से जुड़े हुए हैं और अब पूरी तरह से ठप हो चुके हैं।

ये मेगा प्रोजेक्ट्स भी हुए डिले या पूरी तरह से ड्रॉप

फंड की कमी और आर्थिक तंगी की मार केवल एक्सप्रेसवे तक ही सीमित नहीं है बल्कि कई अन्य महत्वपूर्ण नागरिक सुविधाओं वाले प्रोजेक्ट्स पर भी पड़ी है। मरी रोड सिग्नल-फ्री कॉरिडोर प्रोजेक्ट को अब कम से कम दिसंबर 2027 तक के लिए टाल दिया गया है। रावलपिंडी में बार-बार आने वाली शहरी बाढ़ की समस्या से निपटने के लिए डिजाइन की गई प्रस्तावित भूमिगत सीवरेज टनल योजना को अब पूरी तरह से छोड़ दिया गया है। रावलपिंडी और इस्लामाबाद के लिए दीर्घकालिक जल सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से तैयार किए गए गाजी बरोथा वॉटर प्रोजेक्ट को भी बंद कर दिया गया है। इसकी मुख्य वजह यह रही कि इस प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत 17 अरब रुपये से बढ़कर लगभग 110 अरब रुपये तक पहुंच गई। इसे वहन करना कंगाल पाकिस्तान के बस के बाहर था।

अब सिर्फ अंतरराष्ट्रीय कर्जदाताओं का ही सहारा!

रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तानी अधिकारियों ने विकास एजेंसियों को साफ तौर पर सूचित कर दिया है कि ये सभी प्रोजेक्ट्स अब केवल एक ही शर्त पर आगे बढ़ सकते हैं। अगर इनके लिए विश्व बैंक या एशियाई विकास बैंक जैसे अंतरराष्ट्रीय कर्जदाताओं से वित्तीय सहायता या लोन सुरक्षित किया जा सके। इसके बिना पाकिस्तान सरकार के पास इन्हें पूरा करने का कोई पैसा नहीं है। रावलपिंडी विकास प्राधिकरण (RDA) के पूर्व अध्यक्ष तारिक मुर्तजा ने इस बदहाली पर बात करते हुए बताया कि लेह एक्सप्रेसवे, सीवरेज टनल और वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट को उनके कार्यकाल के दौरान सभी आवश्यक मंजूरियां और फंडिंग मिल चुकी थी। लेकिन देश में हुए सरकार परिवर्तन के बाद इन सभी जनहित के प्रोजेक्ट्स को बंद कर दिया गया।