
कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि देश में आम लोगों और चुनिंदा अरबपतियों के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं। राहुल गांधी ने किसानों, नौकरीपेशा लोगों और गरीब छात्रों की आर्थिक परेशानियों का जिक्र करते हुए सरकार पर चुनिंदा उद्योगपतियों के प्रति अलग रवैया अपनाने का आरोप लगाया।
राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि यदि कोई किसान 50 हजार रुपये नहीं चुका पाता है तो उसकी जमीन नीलाम कर दी जाती है। वहीं, कोई वेतनभोगी व्यक्ति एक भी ईएमआई चूक जाए तो बैंक उसके घर पहुंच जाता है। उन्होंने कहा कि गरीब छात्रों के लिए शिक्षा ऋण हासिल करना भी मुश्किल है।
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि इसके विपरीत चुनिंदा ‘दोस्तों’ के लिए बैंक का पैसा निजी संपत्ति की तरह है और वे जितना चाहें पैसा निकाल सकते हैं तथा अपनी सुविधा के अनुसार उसे वापस कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने देश में दो व्यवस्थाएं बना दी हैं—एक मुट्ठीभर अरबपतियों के लिए और दूसरी बाकी सभी लोगों के लिए।
सुभाष चंद्रा के मामले में NCLT का बड़ा फैसला
राहुल गांधी के बयान के बीच मीडिया कारोबारी और जी समूह के संस्थापक सुभाष चंद्रा से जुड़ा व्यक्तिगत दिवाला मामला भी चर्चा में है। राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) ने सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत दिवाला समाधान प्रक्रिया में करीब ₹22,006.57 करोड़ के स्वीकृत कर्ज दावों के मुकाबले ₹6.5 करोड़ के भुगतान वाली पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी दी है। इसका मतलब है कि स्वीकृत दावों की तुलना में कर्जदाताओं को करीब 0.03 प्रतिशत की वसूली होगी।
हालांकि, इस मामले में यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ये दावे सुभाष चंद्रा द्वारा व्यक्तिगत रूप से लिए गए कर्ज नहीं थे। चंद्रा के अनुसार, उन्होंने विभिन्न कंपनियों के कर्ज के लिए पर्सनल गारंटर के तौर पर गारंटी दी थी। उनके मुताबिक, जिन संस्थाओं के कर्ज की उन्होंने व्यक्तिगत गारंटी दी थी, वे करीब ₹45,000 करोड़ की बकाया राशि में से लगभग ₹43,000 करोड़ का भुगतान कर चुकी हैं।
80.81 प्रतिशत वोट से पास हुआ था प्लान
NCLT के सामने पेश की गई पुनर्भुगतान योजना को नवंबर 2024 में हुई लेनदारों की बैठक में 80.814 प्रतिशत वोटिंग शेयर का समर्थन मिला था। यह IBC के तहत जरूरी तीन-चौथाई सीमा से अधिक था। कुछ प्रमुख कर्जदाताओं ने योजना का विरोध किया था, जिनमें LIC Housing Finance, HDFC Bank, Axis Bank, Canara Bank, RBL Bank और Union Bank शामिल थे।
मामले में मूल दो सदस्यीय NCLT पीठ के बीच मतभेद के बाद तीसरे सदस्य के रूप में Nilesh Sharma को शामिल किया गया। उन्होंने योजना को मंजूरी देने के पक्ष में फैसला दिया। NCLT ने कहा कि विरोध करने वाले कर्जदाताओं के पास 20 प्रतिशत से कम वोटिंग शेयर था और व्यक्तिगत संपत्ति के मूल्यांकन को देखते हुए योजना को खारिज करने पर बेहतर वसूली की संभावना नहीं दिखती थी।
NCLT – “नेता-कंपनी लूट ट्रिब्यूनल”
किसान 50 हज़ार न चुकाए तो ज़मीन नीलाम हो जाती है। Salaried एक EMI न भर पाएं तो घर पर बैंक के गुंडे पहुंच जाते हैं। गरीब छात्रों को तो शिक्षा तक के लिए लोन नहीं मिलता।
मगर, चुनिंदा “मित्रों” के लिए बैंक का पैसा निजी संपत्ति है – कितना भी… https://t.co/hFjtqdUimv
— Rahul Gandhi (@RahulGandhi) August 27, 2026
22 हजार करोड़ के दावे पर सिर्फ 6.5 करोड़ का भुगतान
NCLT के फैसले के अनुसार, स्वीकृत योजना में ₹22,006.57 करोड़ के दावों के मुकाबले ₹6.5 करोड़ का भुगतान होगा। इस आधार पर कर्जदाताओं को करीब 99.97 प्रतिशत का ‘हेयरकट’ स्वीकार करना पड़ेगा। आसान भाषा में कहें तो प्रत्येक ₹100 के दावे पर करीब तीन पैसे की वसूली होगी।
ट्रिब्यूनल ने यह भी कहा कि योजना मंजूर होने के बाद वह IBC की धारा 115 के तहत सभी संबंधित कर्जदाताओं पर बाध्यकारी होगी, चाहे उन्होंने योजना के पक्ष में मतदान किया हो या विरोध में।
राहुल गांधी के बयान से फिर गरम हुई बहस
सुभाष चंद्रा मामले में NCLT के फैसले और राहुल गांधी के बयान के बाद बैंक कर्ज, कॉरपोरेट देनदारी, व्यक्तिगत गारंटी और दिवाला समाधान प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो सकती है। हालांकि, सुभाष चंद्रा का मामला एक व्यक्तिगत गारंटर की दिवाला समाधान प्रक्रिया से जुड़ा है और इसे सीधे तौर पर उनके द्वारा स्वयं लिए गए ₹22,006 करोड़ के कर्ज के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं होगा।





