भारत की बेहतरीन मॉनसून सफ़ारी, जहां बारिश में भी खत्म नहीं होता वाइल्डलाइफ़ सीज़न और भी बन जाता है रोमांचक!

भारत में मॉनसून का मौसम केवल हरियाली और ठंडी फुहारों का ही नहीं, बल्कि वन्यजीवन को उसके सबसे जीवंत और प्राकृतिक रूप में देखने का भी अवसर लेकर आता है। बारिश के साथ जंगल नई ऊर्जा से भर उठते हैं, नदियां और झरने लबालब हो जाते हैं तथा वनस्पतियां अपने पूरे सौंदर्य के साथ खिल उठती हैं। कुछ नेशनल पार्क इस मौसम में संरक्षण कार्यों के कारण बंद रहते हैं, लेकिन कई ऐसे स्थान भी हैं जहां मॉनसून सफ़ारी नेचर को बेहद करीब से महसूस करने का अनूठा एक्सपीरियंस देती है। आइए जानते हैं भारत के ऐसे ही कुछ शानदार मॉनसून सफ़ारी स्थलों के बारे में:

पश्चिम बंगाल में सुंदरबन

How to Plan a Sundarban Tour | Beginner's Travel Guide by Anahita

सुंदरबन नेशनल पार्क दुनिया का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन है और यह गंगा, ब्रह्मपुत्र तथा मेघना नदियों के विशाल डेल्टा क्षेत्र में फैला हुआ है। मॉनसून के दौरान यहां की नदियां, जलमार्ग और घने मैंग्रोव जंगल एक अनोखा प्राकृतिक दृश्य प्रस्तुत करते हैं। यहां सफ़ारी जीप से नहीं बल्कि नाव के माध्यम से की जाती है, जो इसे भारत के अन्य राष्ट्रीय उद्यानों से अलग बनाती है। यह क्षेत्र Royal Bengal Tiger, Saltwater Crocodile, Fishing Cat, Water Monitor Lizard और Irrawaddy Dolphin सहित अनेक दुर्लभ जीवों का प्राकृतिक आवास है। पक्षी प्रेमियों और वन्यजीव फोटोग्राफरों के लिए भी यह एक शानदार डेस्टिनेशन माना जाता है।

उत्तराखंड का वैली ऑफ़ फ्लावर्स नेशनल पार्क

फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान: उत्तराखंड में यूनेस्को की धरोहर का एक अनमोल रत्न – रहस्यमय हिमाचल

हिमालय की गोद में बसा वैली ऑफ़ फ्लावर्स नेशनल पार्क मॉनसून के दौरान प्रकृति का सबसे मनमोहक रूप प्रस्तुत करता है। जुलाई से सितंबर के बीच पूरी घाटी 500 से ज्यादा प्रजातियों के रंग-बिरंगे जंगली फूलों से ढक जाती है, जिनमें ब्लू पॉपी, प्रिमुला, एनीमोन, कोबरा लिली और कई दुर्लभ हिमालयी वनस्पतियां शामिल हैं। UNESCO की विश्व धरोहर सूची में शामिल यह राष्ट्रीय उद्यान ट्रेकिंग, प्रकृति दर्शन और फोटोग्राफी के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है। यहां Himalayan Black Bear, Musk Deer, Blue Sheep और दुर्लभ Snow Leopard जैसे वन्यजीव भी पाए जाते हैं। बारिश के मौसम में बहते झरने, बादलों से घिरी पर्वत श्रृंखलाएँ और हरी-भरी वादियां इस स्थान को किसी स्वर्ग से कम नहीं बनातीं।

दक्षिण में केरल का पेरियार नेशनल पार्क

घूमिये केरल स्थित पेरियार नेशनल पार्क, लीजिए जीप सफारी और नौका विहार का आनंद

पेरियार नेशनल पार्कपश्चिमी घाट के सबसे समृद्ध वन क्षेत्रों में से एक है और मॉनसून के दौरान इसकी हरियाली और भी घनी हो जाती है। पार्क के बीचों-बीच स्थित Periyar Lake इसकी सबसे बड़ी पहचान है, जहां बोट सफ़ारी के दौरान हाथियों के झुंड, Gaur, Sambar Deer, Wild Boar और कभी-कभी Bengal Tiger की झलक भी मिल सकती है। यह पार्क 300 से अधिक पक्षी प्रजातियों का घर है और यहां बांस राफ्टिंग, नेचर वॉक, जंगल ट्रेक तथा इको-टूरिज़्म एक्टिविटीज पर्यटकों को प्रकृति के बेहद करीब ले जाती हैं। मॉनसून में झील के आसपास का शांत वातावरण और घने जंगल इसे यादगार एक्सपीरियंस बनाते हैं।

मध्य प्रदेश में बांधवगढ़ नेशनल पार्क

बांधवगढ़ नेशनल पार्क में अद्भुत शेष शैय्या, 65 फ़ीट लंबी शयन मुद्रा में है विष्णु मूर्ति - नियो पॉलिटिको

बेहद सुंदर हैं Madhya Pradesh के ये 2 नेशनल पार्क, दूर-दूर से इन्हें देखने आते हैं Tourist

बांधवगढ़ नेशनल पार्क भारत के सबसे प्रसिद्ध टाइगर रिज़र्वों में से एक है और यहां बाघों की अच्छी-खासी आबादी पाई जाती है। घने साल के जंगल, बांस के वन, घास के मैदान और प्राचीन Bandhavgarh Fort इस पार्क की ऐतिहासिक और प्राकृतिक पहचान हैं। यहां Bengal Tiger के अलावा Leopard, Sloth Bear, Jackal, Chital और Sambar Deer जैसे वन्यजीव बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। मॉनसून के दौरान पर्यटन क्षेत्र सामान्यतः कुछ समय के लिए बंद रहते हैं, लेकिन बारिश के बाद जंगल की ताज़गी, हरियाली और प्राकृतिक सुंदरता देखते ही बनती है।

कर्नाटक का अगुम्बे रेनफ़ॉरेस्ट

दक्षिण का चेरापूंजी कहलाता है कर्नाटक का यह गांव, बारिश, झरनों और हरियाली का ऐसा नजारा मानसून में स्वर्ग जैसा लगता है - News18 हिंदी

अगुम्बे रेनफ़ॉरेस्ट को “दक्षिण भारत का चेरापूंजी” कहा जाता है क्योंकि यहाँ देश में सबसे ज्यादा वर्षा वाले क्षेत्रों में से एक है। Western Ghats का हिस्सा होने के कारण यह जैव विविधता से भरपूर वर्षावन है। मॉनसून के दौरान यहां ऊंचे-ऊंचे झरने, घने जंगल, बादलों से ढकी पहाड़ियां और हरियाली मन मोह लेती है। यह क्षेत्र King Cobra के संरक्षण और अध्ययन के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। इसके अलावा Lion-tailed Macaque, Malabar Giant Squirrel, Malabar Pit Viper तथा अनेक दुर्लभ पक्षी, मेंढक और तितलियों की प्रजातियां भी यहां पाई जाती हैं। ट्रेकिंग, बर्ड वॉचिंग, प्रकृति अध्ययन और वाइल्डलाइफ़ फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए अगुम्बे मॉनसून के दौरान एक आइडियल डेस्टिनेशन माना जाता है।

महाराष्ट्र का संजय गांधी नेशनल पार्क

610+ Sanjay Gandhi National Park Stock Photos, Pictures & Royalty-Free Images - iStock | Mumbai, Delhi india, Jaipur

देश के सबसे अनोखे नेशनल पार्क में गिना जाने वाला यह पार्क महानगर मुंबई के बीचों-बीच स्थित है। लगभग 104 वर्ग किलोमीटर में फैला यह नेशनल पार्क मॉनसून के दौरान घने जंगलों, हरे-भरे पहाड़ी रास्तों, झरनों और समृद्ध जैव विविधता के कारण प्रकृति प्रेमियों का पसंदीदा टूरिस्ट डेस्टिनेशन बन जाता है। यहाँ Leopard, Spotted Deer, Sambar Deer, Rhesus Macaque और अनेक पक्षियों एवं तितलियों की प्रजातियां पाई जाती हैं। पार्क के भीतर स्थित लगभग 2,000 वर्ष पुरानी Kanheri Caves इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को और भी खास बनाती हैं। मॉनसून में यहां की हरियाली, छोटी-छोटी जलधाराएं, नेचर ट्रेल, साइक्लिंग मार्ग और वन्यजीवों की एक्टिविटीज टूरिस्ट को शहर की भागदौड़ से दूर प्रकृति के बीच सुकून का एक्सपीरियंस कराती हैं।

मॉनसून सफ़ारी यह साबित करती है कि बारिश का मौसम वन्यजीवन के रोमांच को कम नहीं करता, बल्कि प्रकृति को और भी जीवंत बना देता है। हरे-भरे जंगल, कल-कल बहते झरने, धुंध से ढकी पहाड़ियां और वन्यजीवों की अनोखी एक्टिविटीज इस मौसम को खास बनाती हैं। यदि आप प्रकृति की असली खूबसूरती और जैव विविधता को करीब से महसूस करना चाहते हैं, तो मॉनसून में इन राष्ट्रीय उद्यानों की यात्रा एक यादगार अनुभव साबित हो सकती है। बस यात्रा से पहले पार्क के नियमों और मौसम की जानकारी जरूर ले, ताकि आपका सफर सेफ रहे।

UN हेडक्वार्टर के बाहर शख्स ने खुद को आग लगाई:अस्पताल में मौत; तिब्बती झंडे के साथ पहुंचा था, पुलिस ने जांच शुरू की

अमेरिका के न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र (UN) मुख्यालय के बाहर गुरुवार को एक 52 वर्षीय व्यक्ति ने खुद को आग लगा ली। उसके हाथ में तिब्बती झंडा था। सूचना मिलने पर पुलिस और इमरजेंसी टीम मौके पर पहुंची। गंभीर रूप से झुलसे व्यक्ति को अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। न्यूयॉर्क पुलिस विभाग (NYPD) ने बताया कि फिलहाल यह साफ नहीं है कि व्यक्ति ने यह कदम क्यों उठाया। मामले की जांच की जा रही है। मृतक की पहचान अभी सार्वजनिक नहीं की गई है, क्योंकि उसके परिजनों को पहले सूचना दी जानी है। संयुक्त राष्ट्र के प्रवक्ता ने बताया कि घटना के वक्त सभी आधिकारिक बैठकें खत्म हो चुकी थीं। इसलिए UN के नियमित कामकाज पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। घटना का पूरा वीडियो…. 20 साल से अमेरिका में रह रहा था शख्स कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मृतक की पहचान उसके एक दोस्त ने लोबगा रांगजेन के रूप में की है। बताया गया है कि वह करीब 20 साल से अमेरिका में रह रहा था। हालांकि, इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। मौके पर सामने आए वीडियो में व्यक्ति पारंपरिक बौद्ध भिक्षु जैसे वस्त्र पहने दिखाई देता है। उसने पहले फुटपाथ पर तिब्बती झंडा रखा और फिर खुद को आग लगा ली। आग लगने के बाद एक मिनट से भी कम समय में वह सड़क पर गिर पड़ा। घटना के बाद पुलिस ने पूरे इलाके को घेर लिया। मौके से ‘चाइना आउट ऑफ तिब्बत’ लिखे पर्चे भी बरामद किए गए। 2009 से अब तक 150 से ज्यादा तिब्बतियों ने आत्मदाह किया चीन के तिब्बत पर नियंत्रण के विरोध में 2009 से अब तक 150 से ज्यादा तिब्बती खुद को आग लगाकर जान दे चुके हैं। इनमें बौद्ध भिक्षु, साध्वियां, छात्र, किसान और आम लोग शामिल हैं। पहला चर्चित मामला फरवरी 2009 में सामने आया, जब युवा भिक्षु तपे ने खुद को आग लगा ली थी। इसके बाद 2012 और 2013 में ऐसी घटनाएं सबसे ज्यादा हुईं। तिब्बती संगठनों का कहना है कि लोग चीन के शासन का विरोध जताने, दलाई लामा की तिब्बत वापसी, धार्मिक और सांस्कृतिक आजादी, तिब्बती भाषा और पहचान बचाने की मांग को लेकर यह कदम उठाते हैं। कई लोगों ने खुद को आग लगाने से पहले ‘तिब्बत को आजाद करो’, ‘दलाई लामा को वापस आने दो’ और ‘चीन तिब्बत छोड़ो’ जैसे संदेश भी छोड़े। चीन का कहना है कि इन घटनाओं के पीछे निर्वासित तिब्बती नेतृत्व लोगों को भड़काता है। वहीं, निर्वासित तिब्बती प्रशासन इस आरोप को खारिज करता है। उसका कहना है कि लोग चीन की नीतियों और लगातार बढ़ते दबाव से परेशान होकर अपनी जान दे रहे हैं। चीन ने 1951 में तिब्बत पर कब्जा किया था तिब्बत का मुद्दा दुनिया के सबसे पुराने राजनीतिक और क्षेत्रीय विवादों में से एक है। 1950 में चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) तिब्बत में दाखिल हुई। इसके बाद 1951 में ’17-पॉइंट एग्रीमेंट’ पर हस्ताक्षर हुए और चीन ने तिब्बत पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। चीन इसे ‘शांतिपूर्ण मुक्ति’ कहता है। हालांकि, तिब्बती समुदाय और निर्वासित सरकार का कहना है कि यह समझौता दबाव में कराया गया था और चीन ने तिब्बत पर सैन्य कब्जा किया। चीन का कहना है कि तिब्बत 13वीं सदी के मध्य से उसका हिस्सा है। वहीं कई तिब्बती मानते हैं कि वे लंबे समय तक प्रभावी रूप से स्वतंत्र रहे और चीन उनकी सांस्कृतिक पहचान को खत्म करने के साथ-साथ संसाधनों से समृद्ध इस क्षेत्र का दोहन करना चाहता है।

Venus in magha nakshatra 2026: प्रेम और वैभव के कारक शुक्र करेंगे केतु के नक्षत्र में प्रवेश और इन राशियों की बढ़ाएंगे मुश्किल, जानें बचने के उपाय

Venus in magha nakshatra 2026: ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों के राशि परिवर्तन के साथ ही एक नक्षत्र से दूसरे नक्षत्र में गोचर को भी बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। ज्योतिष में 27 नक्षत्र माने गए हैं और इनके स्वामी सभी नौ ग्रह हैं। इन्ही में से एक है मघा नक्षत्र। इस नक्षत्र का स्वामी रहस्य और आकस्मिक घटनाओं का कारक ग्रह केतु है। केतु के मघा नक्षत्र में प्रेम, सौंदर्य और विलासिता के स्वामी शुक्र ग्रह 4 जुलाई को प्रवेश करने जा रहे हैं। ग्रहों के राशि परिवर्तन की तरह ही नक्षत्र परिवर्तन का प्रभाव भी सभी 12 राशियों पर पड़ता है। केतु के नक्षत्र में शुक्र का गोचर अहम ज्योतिषीय घटना मानी जा रही है। शुक्र के मघा नक्षत्र में गोचर से 5 राशियों पर अशुभ प्रभाव पड़ सकता है और इनकी परेशानियां बढ़ सकती हैं।

5 राशियों की बढ़ेंगी परेशानियां 

मेष राशि : मेष राशि के लिए शुक्र गोचर प्रतिकूल प्रभावों वाला साबित हो सकता है। इस समय आपको धन संबंधी मामलों में सतर्कता बरतने की आवश्यकता है। भूमि, भवन और वाहन की खरीदारी में अड़चनें आ सकती हैं। भौतिक सुखों में कमी का अनुभव कर सकते हैं। खर्च की अधिकता मन को परेशान कर सकती है।

कर्क राशि : कर्क राशि के लिए यह समय अशुभ प्रभावों वाला सिद्ध हो सकता है। इस समय आपको व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन में बैलेंस बनाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। परिवार से जुड़ी परेशानियां हो सकती हैं। अपनों के साथ रिश्तों में दरार आ सकती है।

मकर राशि : मकर राशि के लिए शुक्र नक्षत्र गोचर का प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इस समय आपको वैवाहिक जीवन में परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। पार्टनर के साथ अनबन या गलतफहमी का शिकार हो सकते हैं। धन की स्थिति उतार-चढ़ाव वाली साबित हो सकती है।

धनु राशि : धनु राशि वालों के लिए शुक्र नक्षत्र गोचर थोड़ा कष्टदायक हो सकता है। इस समय आपके अनाप-शनाप खर्च हो सकते हैं, जिससे वित्तीय स्थिति बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। परिवार में अशांति हो सकती है। भ्रामक या मन को परेशान करना वाला समाचार मिल सकता है।

कुंभ राशि : कुंभ राशि वालों के लिए करियर में उतार-चढ़ाव आ सकते हैं। भाग्य का साथ नहीं मिलने से कार्यों में बाधाएं बनी रह सकती हैं। धन का आवक कमजोर पड़ सकता है। बचत करना कठिन होगा, जिससे आर्थिक स्थिति प्रभावित होगी। परिवार के सदस्यों के बीच मनमुटाव बना रहेगा। यात्रा करने से बचें।

नक्षत्र गोचर के अशुभ प्रभाव कम करने के उपाय

  • शुक्र कृपा पाने के लिए शुक्रवार का व्रत करें और इस दिन मां लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा करें।
  • मां लक्ष्मी को खीर का भोग लगाएं।
  • शु्क्रवार के दिन सफेद वस्तुएं जैसे चीनी, दही, दूध, वस्त्र और मिठाई आदि का दान करें।
  • प्रतिदिन या शुक्रवार के दिन शुक्र ग्रह के मंत्र ॐ शुं शुक्राय नमः का कम से कम 108 बार जाप करें।
  • कमजोर शुक्र को मजबूत करने के लिए गाय को हरा चारा खिलाना चाहिए।

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BAT-BMS ऐप से ब्लूटूथ के जरिए बंद किए जा रहे ई-रिक्शा! वायरल प्रैंक ने बढ़ाई ड्राइवरों की परेशानी, जानिए क्या है पूरा मामला

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सोशल मीडिया पर इन दिनों एक वायरल ट्रेंड ने ई-रिक्शा चालकों और इलेक्ट्रिक वाहनों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर दी है। दावा किया जा रहा है कि कुछ शरारती लोग BAT-BMS नाम के एक चीनी ऐप का इस्तेमाल कर ब्लूटूथ के जरिए चलते हुए ई-रिक्शा की बिजली सप्लाई बंद कर रहे हैं। इससे बीच सड़क पर ई-रिक्शा अचानक रुक जाते हैं और चालक असमंजस में पड़ जाते हैं।

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वायरल वीडियो में कुछ युवक ई-रिक्शा का पीछा करते हुए दिखाई देते हैं। इसके बाद वे अपने मोबाइल में BAT-BMS ऐप खोलकर कथित तौर पर 'डिस्चार्ज स्विच' का इस्तेमाल करते हैं, जिससे ई-रिक्शा अचानक बंद हो जाता है। इसके बाद वे ड्राइवर के पास जाकर अनजान बनने का नाटक करते हुए मदद की पेशकश करते हैं।

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एक अन्य वायरल वीडियो में एक बुजुर्ग ई-रिक्शा चालक को वाहन बंद होने के बाद करीब 3 किलोमीटर तक रिक्शा धक्का लगाकर ले जाते हुए देखा गया। एक अन्य वीडियो में कथित तौर पर ऐसे ही हरकत करने वाले युवक को लोगों ने पकड़ लिया और पुलिस के हवाले करने की चेतावनी दी।

 

 कई जगह मारपीट खबरें भी हैं। हालांकि इन वायरल वीडियो और उनमें किए जा रहे दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि सभी घटनाएं वास्तविक हैं या सोशल मीडिया कंटेंट बनाने के उद्देश्य से रिकॉर्ड की गई हैं।

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क्या है BAT-BMS ऐप?

 

BAT-BMS एक बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम (Battery Management System) ऐप है, जिसे चीन की कंपनी Shenzhen Grenergy Technology ने डेवलप किया है। यह ऐप ब्लूटूथ के माध्यम से बैटरी से कनेक्ट होकर अधिकृत यूजर्स को बैटरी की स्थिति देखने और आवश्यकता पड़ने पर बैटरी के डिस्चार्ज सर्किट को ऑन या ऑफ करने की सुविधा देता है। खबरों के मुताबिक भारत में कुछ कम कीमत वाले ई-रिक्शा की बैटरियों में ब्लूटूथ सुरक्षा या पासवर्ड प्रोटेक्शन नहीं होता। ऐसे में यदि बैटरी का ब्लूटूथ सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रहता है, तो 10 से 15 मीटर की दूरी के भीतर मौजूद कोई भी व्यक्ति बैटरी से कनेक्ट होने की कोशिश कर सकता है।

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ई-वाहनों की सुरक्षा पर उठे सवाल

इस वायरल ट्रेंड के बाद ई-रिक्शा और अन्य इलेक्ट्रिक वाहनों की साइबर सुरक्षा तथा बैटरी प्रबंधन प्रणाली की सुरक्षा को लेकर बहस तेज हो गई है। एक्सपर्ट्‍स के मुताबिक  बैटरी निर्माताओं को मजबूत पासवर्ड, एन्क्रिप्शन और सुरक्षित ब्लूटूथ पेयरिंग जैसी सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिए ताकि अनधिकृत लोग बैटरी तक पहुंच न बना सकें।

जापानी कंपनियों को भारत के गांवों तक लेकर आएंगे श्रीधर वेम्बु! इसके लिए वो पहुंच रहे जापान और उनका ये है प्लान

Sridhar Vembu: जोहो (Zoho) के सह-संस्थापक और सीईओ श्रीधर वेम्बु ने एक बड़ी योजना का ऐलान किया है। इस योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए वेम्बु जापान की यात्रा पर जा रहे हैं। उनका मकसद जापान की छोटी और मध्यम आकार की कंपनियों के साथ साझेदारी तलाशना है। इस अनूठी पहल का उद्देश्य जापान की इन कंपनियों को भारत के ग्रामीण इलाकों और छोटे कस्बों से जोड़ना है ताकि देश के गांवों में कारीगरी व शिल्प कौशल की संस्कृति को फिर से जीवित किया जा सके।

गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट शेयर करते हुए श्रीधर वेम्बु ने अपने इस पूरे एजेंडे की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वह जापान के छोटे शहरों में स्थित व्यवसायों के साथ काम करना चाहते हैं और उनकी विशेषज्ञता को भारत के छोटे शहरों और गांवों तक पहुंचाना चाहते हैं। वेम्बु ने लिखा कि मैं कल जापान जा रहा हूं। एजेंडा जापान के छोटे शहरों की छोटी से मध्यम आकार की कंपनियों के साथ साझेदारी करना और उन्हें भारत के छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में लाना है।

शिल्प कौशल और कारीगरी को पुनर्जीवित करने पर फोकस

श्रीधर वेम्बु की मुताबिक इस पहल की जड़ें पारंपरिक शिल्प कौशल को फिर से बहाल करने की इच्छा से जुड़ी हैं। इसे उन्होंने तमिल शब्द आसारी (Aasaari) और संस्कृत शब्द विश्वकर्मा (Vishwakarma) के जरिए भी अपने विजन को समझाने की कोशिश की है।

उन्होंने कहा कि जापान की कई छोटी कंपनियां आज भी इन मूल्यों को संजोए हुए हैं। इन कंपनियों ने प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग और अन्य अत्यधिक विशिष्ट कौशल वाले क्षेत्रों में विश्व स्तरीय क्षमताएं विकसित की हैं। वेम्बु ने कहा कि जापानी लोग उन क्षेत्रों में वैश्विक लीडर हैं जिनमें जटिल और बारीक शिल्प कौशल की आवश्यकता होती है।

पुराने दोस्त ब्रिट्टो-सान से मिली इस मिशन की प्रेरणा

वेम्बु ने बताया कि इस पूरे मिशन में उन्हें उनके एक पुराने मित्र ब्रिट्टो से मार्गदर्शन मिल रहा है। मूल रूप से मदुरै के रहने वाले ब्रिट्टो ने जापान में कई दशक बिताए हैं और वहां की व्यावसायिक संस्कृति की उन्हें गहरी समझ है। ब्रिट्टो ने बाद में ताकुमी मोशन कंट्रोल्स की स्थापना की थी। जोहो के संस्थापक ने रेखांकित किया कि जापानी शब्द ताकुमी का अर्थ शिल्पकार होता है। ये जो जापानी विनिर्माण परंपराओं के प्रति उनके साझा सम्मान को दर्शाता है। वेम्बु ने लिखा कि जापानी शिल्प कौशल के प्रति हमारे आदर और प्रशंसा ने ब्रिट्टो-सान और मुझे एक साथ जोड़ा। अब यह हमारे लिए एक मिशन बन गया है।

वेम्बु के रूरल-फर्स्ट विजन से मेल खाती है यह पहल

यह घोषणा ग्रामीण विकास और विकेंद्रीकरण पर वेम्बु के लंबे समय से चले आ रहे फोकस के बिल्कुल अनुकूल है। वे पिछले कई वर्षों से लगातार यह तर्क देते रहे हैं कि विश्व स्तरीय तकनीक और नवाचार का निर्माण बड़े महानगरों से बाहर भी किया जा सकता है। इसी सोच के तहत जोहो छोटे शहरों और गांवों में अपने परिचालन और प्रशिक्षण पहलों का विस्तार कर रही है।

यह जापान यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब कुछ ही दिन पहले वेम्बु ने बताया था कि जोहो के रेवेन्यू का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा भारत के बाहर से आता है। भारतीय सरकार से उन्हें सिर्फ 2 प्रतिशत रेवेन्यू मिलता है। जोहो की वैश्विक स्तर पर बड़ी मौजूदगी है। इसके कार्यालय जापान, अमेरिका, नीदरलैंड, चीन, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और दक्षिण अफ्रीका सहित कई देशों में हैं।

ग्रामीण भारत के विकास के लिए पहले भी किए हैं बड़े प्रयास

जोहो प्रमुख का यह ताजा जापान मिशन उनके उस ग्रामीण-विकास दर्शन का हिस्सा है जिसकी वे एक दशक से अधिक समय से वकालत कर रहे हैं। उनका मानना है कि भारत के गांवों और छोटे शहरों में अपार प्रतिभा छिपी है, और यदि उन्हें अवसर व इंफ्रास्ट्रक्चर मिले तो वे नवाचार, तकनीक और मैन्युफैक्चरिंग के बड़े केंद्र बन सकते हैं।

तेनकासी का सफल मॉडल

इस विजन को हकीकत में बदलने के लिए जोहो ने 2011 में ग्रामीण तमिलनाडु के तेनकासी जिले के एक गांव मथलमपराई में एक टेक्नोलॉजी सेंटर शुरू किया था। उद्योग की इस धारणा को तोड़ते हुए कि हाई-एंड सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट केवल बड़े शहरों में हो सकता है, यह सेंटर आज एक बड़े रूरल टेक इकोसिस्टम में बदल चुका है। यहां सैकड़ों स्थानीय पेशेवर काम करते हैं। चेन्नई जैसे बड़े शहरों में नौकरियों के अत्यधिक संकेंद्रण को रोकने के लिए वेम्बु ने जानबूझकर ग्रामीण क्षेत्रों का रुख किया। इसके तहत तिरुनेलवेली, मदुरै और कुंभकोणम क्षेत्रों सहित पूरे तमिलनाडु में अतिरिक्त ग्रामीण परिसर और सैटेलाइट कार्यालय स्थापित किए गए हैं।

स्थानीय स्टार्टअप्स में निवेश

महानगरों से बाहर आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने ड्रोन स्टार्टअप याली एयरोस्पेस और पावर-टूल्स वेंचर करुवी जैसे स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग और टेक्नोलॉजी उपक्रमों में भी निवेश किया है।

गांवों की तरफ रिवर्स माइग्रेशन की अपील

श्रीधर वेम्बु ने हाल ही में गांवों की ओर रिवर्स माइग्रेशन का आह्वान किया है। उनका तर्क है कि दशकों से बड़े शहरों की ओर हो रहे पलायन ने ग्रामीण समुदायों से प्रतिभाओं को पूरी तरह निचोड़ लिया है। वेम्बु के मुताबिक, ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं को दोबारा खड़ा करने के लिए लोगों के निवास स्थान के करीब ही रोजगार, उद्यमिता और दीर्घकालिक निवेश लाने की सख्त जरूरत है।

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मसाज चेयर्स और सोने की नक्काशी… कतर ने डोनाल्ड ट्रंप को गिफ्ट किया बेहद आलीशान विमान, देखें अंदर की तस्वीरें

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को एक नए बोइंग 747-8 एयरोप्लेन में अपनी पहली यात्रा पूरी की। ये विमान कतर ने डोनाल्ड ट्रंप को गिफ्ट किया है। फिलहाल ये बेहद आलीशान जहाज अस्थायी रूप से एयर फोर्स वन के रूप में अपनी सेवाएं देगा। इसे उड़ता हुआ महल या पैलेस इन द व्हील्स भी कहा जा रहा है। खास बात ये है कि इसे ट्रंप की जरूरतों और पसंद के मुताबिक कस्टमाइज भी किया गया है।

इसमें हैं इन-बिल्ट मसाज चेयर्स और सोने की कलाकृति

न्यूयॉर्क पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक इस 400 मिलियन डॉलर (40 करोड़ डॉलर) के बोइंग 747-8 विमान के अंदर लग्जरी और मॉडर्न टेक्नोलॉजी का अद्भुत तालमेल है। इस जहाज के अंदर रीक्लाइनिंग सीटें लगाई गई हैं। ये सीटें इन-बिल्ट मसाज फंक्शन से लैस हैं। विमान के इंटीरियर में जगह-जगह सोने की नक्काशी और सुनहरे रंग का इस्तेमाल किया गया है। इसके साथ ही लाइट फिक्सचर्स भी सुनहरे रंग के हैं। जहाज के अंदर का हिस्सा बेज, क्रीम और भूरे रंगों से सजाया गया है। इसमें लेगरूम को काफी बड़ा किया गया है और हर सीट के लिए पर्सनल एंटरटेनमेंट स्क्रीन के साथ चार्जिंग पोर्ट दिए गए हैं। वाइट हाउस के स्टाफ द्वारा साझा की गई तस्वीरों में विमान के भीतर एक कॉन्फ्रेंस रूम, सोफा सीटिंग और अमेरिकी स्मारकों की तस्वीरों से सजी दीवारें दिखाई दी हैं।

36 साल पुराने विमानों से काफी बड़ा और आधुनिक

यह नया विमान उन पुराने बोइंग विमानों की तुलना में एक बहुत बड़ा अपग्रेड है जो पिछले 36 वर्षों से एयर फोर्स वन के रूप में सेवाएं दे रहे थे। नया बोइंग 747-8 विमान पिछले 747 विमान की तुलना में लगभग 20 फीट अधिक लंबा है और इसका विंगस्पैन भी करीब 30 फीट अधिक चौड़ा है। इस विमान के बाहरी हिस्से पर नीले, लाल, सुनहरे और सफेद रंग का पेंट स्कीम किया गया है। रिपोर्ट का दावा है कि इस कलर कंबिनेशन का चयन खुद डोनाल्ड ट्रंप ने किया था।

नॉर्थ डकोटा के लिए भरी पहली उड़ान, परिवार भी रहा साथ

इस नए जहाज ने डोनाल्ड ट्रंप को व्हाइट हाउस से नॉर्थ डकोटा पहुंचाया। ट्रंप यहां थियोडोर रूजवेल्ट प्रेसिडेंशियल लाइब्रेरी के उद्घाटन के लिए गए थे। अपनी इस पहली यात्रा पर निकलने से पहले ट्रंप ने विमान की जमकर तारीफ की और इसे अब तक का सबसे शानदार कमर्शियल प्लेन तक बता दिया। ट्रंप ने कहा कि देश को इस पर बहुत गर्व होना चाहिए, यह बेहद खूबसूरत है। इस यात्रा में ट्रंप के साथ उनके बेटे एरिक और डोनाल्ड ट्रंप जूनियर के साथ-साथ उनकी बहू बेटिना भी मौजूद थीं।

कतर के गिफ्ट पर उठे सवाल, ट्रंप ने दिया जवाब

डोनाल्ड ट्रंप द्वारा कतर से इस विमान को उपहार के रूप में स्वीकार किए जाने के बाद से ही यह विमान लगातार जांच और विवादों के घेरे में है। आलोचकों ने इस पूरे समझौते की नैतिकता और विमान की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। यात्रा पर रवाना होने से पहले डोनाल्ड ट्रंप ने इन सभी चिंताओं को खारिज कर दिया। ट्रंप ने आलोचकों को जवाब देते हुए कहा कि यह विमान एक ऐसे देश (कतर) से आया है जिसने हमारे साथ बहुत अच्छा व्यवहार किया है।

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चीन ने पाकिस्तान के बाद अब बांग्लादेश में चली बड़ी चाल, बंगाल की खाड़ी को लेकर उसकी ये योजना कान खड़े कर देगी

भारत के पूर्वी सीमा के आसपास पकड़ बनाने के लिए चीन पूरे दक्षिण एशिया में अपनी कनेक्टिविटी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। पहले चीन ने पाकिस्तान में चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) में बड़ा निवेश किया था। अब उसने एक नया प्रस्ताव दिया है, जिसके तहत वह म्यांमार के रास्ते बांग्लादेश तक एक नया आर्थिक कॉरिडोर बनाना चाहता है।

हालांकि, यह प्रस्ताव सिर्फ एक सामान्य इंफ्रास्ट्रक्चर प्लान नहीं लगता है, बल्कि इसके पीछे रणनीतिक सोच भी है। इसका मकसद चीन के लिए समुद्री रास्तों तक आसान पहुंच बनाना है, खासकर बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal) तक। फिलहाल, भारत के लिए इस संदेश को नजरअंदाज करना मुश्किल है। लेकिन यह कॉरिडोर अभी हकीकत से बहुत दूर है, और यह हिंद महासागर के आस-पास अपनी रणनीतिक मौजूदगी बढ़ाने की बीजिंग की लगातार कोशिशों को दिखाता है।

बीजिंग ने भारत को छोड़कर एक पुराने विचार को फिर से शुरू किया

यह प्रस्ताव बांग्लादेशी प्रधानमंत्री तारिक रहमान की हालिया बीजिंग यात्रा के दौरान सामने आया। जहां चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इस विचार का समर्थन किया और इसे दोनों देशों के बीच व्यापक सहयोग का हिस्सा बताया।

तारिक रहमान के प्रवक्ता महदी अमीन के अनुसार, इस कॉरिडोर को आर्थिक विकास और लॉजिस्टिक्स (logistics) को बेहतर बनाने के एक साधन के रूप में पेश किया जा रहा है।

अमीन ने कहा, “बैठक के दौरान एक प्रस्ताव आया कि म्यांमार के रास्ते बांग्लादेश से चीन तक एक आर्थिक कॉरिडोर कैसे बनाया जा सकता है।” प्रवक्ता ने आगे कहा कि इस प्रस्ताव का मकसद “बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था का विस्तार करना, आर्थिक लेन-देन बढ़ाना और मल्टीमॉडल ट्रांसपोर्टेशन को और बेहतर बनाना” है।

असल में, यह प्रोजेक्ट लंबे समय से चर्चा में रहे बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार  (BCIM) कॉरिडोर को फिर से शुरू करता है, लेकिन इसमें एक बड़ा बदलाव है: भारत अब इसका हिस्सा नहीं है।

बता दें कि शुरुआती BCIM कॉरिडोर में चारों देशों को जोड़ने वाली सड़क और रेल कनेक्टिविटी की योजना थी। हालांकि, भारत ने सावधानी बरती और चीन के ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ में कभी शामिल नहीं हुआ; इसकी कुछ वजहें संप्रभुता से जुड़ी चिंताएं और बीजिंग की बढ़ती भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं थीं।

अरब सागर से बंगाल की खाड़ी तक

CPEC के नजरिए से देखने पर चीन की बड़ी रणनीति और साफ हो जाती है। दरअसल, बीजिंग ने पाकिस्तान के जरिए, ग्वादर पोर्ट के माध्यम से अरब सागर तक पहुंच हासिल की। हालांकि ​​इस प्रोजेक्ट की भारत लंबे समय से आलोचना करता रहा है क्योंकि यह गिलगित-बाल्टिस्तान से होकर गुजरता है, जिसे भारत पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाला इलाका मानता है।

वहीं, अब,बांग्लादेश-म्यांमार रूट से चीन को एक और रणनीतिक पहुंच मिल सकती है, जो इस बार भारत के पूर्वी समुद्री पड़ोस के ज्यादा करीब होगी। इससे बीजिंग को मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) पर निर्भरता कम करने में भी मदद मिल सकती है, जो दुनिया के सबसे अहम और संवेदनशील शिपिंग चोकपॉइंट्स में से एक है।

बांग्लादेश की नजर बंदरगाह, व्यापार और चीनी निवेश पर

ढाका ने इस प्रस्ताव को सार्वजनिक रूप से एक आर्थिक अवसर के तौर पर पेश किया है। खबरों के मुताबिक, बातचीत मुख्य रूप से चट्टोग्राम बंदरगाह और मोंगला बंदरगाह के आस-पास बुनियादी ढांचे पर केंद्रित रही।

बांग्लादेशी प्रधानमंत्री के प्रवक्ता मेहदी अमीन ने कहा, “हम इस बात पर काम करना चाहते हैं कि इस बंदरगाह [मोंगला बंदरगाह] को एक क्षेत्रीय केंद्र के रूप में कैसे विकसित किया जाए, जो न केवल बांग्लादेश बल्कि अन्य देशों के लिए भी काम आए।”

बांग्लादेश ने हाल के समय में चीनी समर्थित इंफ्रास्ट्रक्चर फंडिंग की ओर भी रुख किया है। मोंगला के आसपास की जमीन, जिसे पहले 2015 के एक द्विपक्षीय समझौते के तहत भारत समर्थित आर्थिक परियोजना के लिए रखा गया था, उसे 2025 में मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने हटा दिया।

रहमान की यात्रा के दौरान, ढाका ने उस आर्थिक क्षेत्र को विकसित करने के लिए चीन की सरकारी कंपनी के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए।

‘द डेली स्टार’ के अनुसार, यह प्रस्तावित रूट चीन के कुनमिंग से शुरू होकर म्यांमार के मांडले तक जाएगा, फिर यह दो हिस्सों में बंटकर यांगून और क्याउकफ्यू पोर्ट तक पहुंचेगा, और आगे चलकर बांग्लादेश के चट्टोग्राम और कॉक्स बाजार से जुड़ेगा।

म्यांमार सबसे कमजोर कड़ी बना

इस प्रस्ताव को लेकर जितनी भी उम्मीदें हैं, उनमें सबसे बड़ी चुनौती म्यांमार है। यह प्रस्तावित कॉरिडोर ऐसे इलाकों से होकर गुजरेगा जो लंबे समय से गृहयुद्ध और अस्थिरता से प्रभावित हैं।

रखाइन राज्य (Rakhine State), जहां रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्याउकफ्यू (Kyaukphyu) डीप-सी पोर्ट स्थित है, वहां सेना और सशस्त्र समूहों के बीच भारी संघर्ष चल रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, वहां की कई जगहों पर सेना का नियंत्रण भी कमजोर पड़ चुका है। इस वजह से किसी बड़े ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर को पूरी तरह लागू करना बेहद मुश्किल माना जा रहा है।

The Daily Star की रिपोर्ट के मुताबिक, म्यांमार में पहले से मौजूद चीनी निवेश भी गंभीर सुरक्षा जोखिमों का सामना कर रहा है, जिनमें इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में रुकावट और संपत्तियों को सुरक्षित जगहों पर ले जाने जैसी समस्याएं शामिल हैं।

सीधे शब्दों में कहें तो, जब तक म्यांमार के रास्ते एक सुरक्षित और स्थिर मार्ग नहीं बनता, यह पूरा कॉरिडोर फिलहाल सिर्फ एक सैद्धांतिक योजना ही बना रहेगा।

भारत इस प्रस्ताव को क्यों नजरअंदाज नहीं कर सकता

भारत के नजरिए से देखें तो इस योजना से तुरंत कोई बड़ा खतरा न भी हो, लेकिन लंबे समय में इसके रणनीतिक असर काफी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

अगर चीन-म्यांमार-बांग्लादेश कॉरिडोर पूरी तरह काम करने लगता है, तो इससे चीन की मौजूदगी बंगाल की खाड़ी के आसपास और मजबूत हो जाएगी। वह बंदरगाहों, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क और औद्योगिक ढांचे के जरिए इस पूरे क्षेत्र में अपनी पकड़ बढ़ा सकता है। इससे चीन का प्रभाव भारत के पड़ोसी क्षेत्र में और गहरा होगा और उसे हिंद महासागर (Indian Ocean) तक अधिक पहुंच मिल सकती है।

वरिष्ठ पत्रकार सुबीर भौमिक ने Rediff में लिखा कि युन्नान स्थित थिंक टैंक से जुड़े चीनी विशेषज्ञों ने उन्हें बताया कि बीजिंग अपनी व्यापक समुद्री रणनीति के तहत चीन-म्यांमार आर्थिक कॉरिडोर को बांग्लादेश तक विस्तारित करना चाहता है।

उन्होंने कहा कि इस तरह के कदम पर “दिल्ली और वाशिंगटन की नजर रहेगी और वे इससे खुश नहीं होंगे”।

अभी के लिए यह प्रोजेक्ट से ज्यादा एक संकेत है

फिलहाल चीन-म्यांमार-बांग्लादेश कॉरिडोर सिर्फ एक प्रस्ताव है, कोई पूरी तरह मंजूर किया गया प्रोजेक्ट नहीं। लेकिन इस स्तर पर भी, यह एक साफ संकेत देता है।

भारत के बेल्ट एंड रोड पहल से बाहर रहने और BCIM कॉरिडोर के लगभग खत्म हो जाने के बावजूद, चीन लगातार ऐसे वैकल्पिक रास्ते तलाश रहा है, जिनसे वह दक्षिण एशिया में अपना आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव बढ़ा सके।

चाहे यह कॉरिडोर आगे जाकर बने या न बने, बीजिंग की मंशा अब साफ होती जा रही है—हिंद महासागर तक पहुंच के लिए कई रास्ते तैयार करना और भारत के आसपास के क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करना।

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