शी जिनपिंग 7 साल बाद भारत आ सकते हैं:चीनी राष्ट्रपति के साथ 400 अधिकारी होंगे; BRICS समिट में शामिल होने की उम्मीद

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अगले महीने नई दिल्ली में होने वाले BRICS समिट में शामिल हो सकते हैं। यह उनका 7 साल बाद भारत का पहला दौरा होगा। भारत 12-13 सितंबर को BRICS सम्मेलन की मेजबानी करेगा। रॉयटर्स के मुताबिक, जिनपिंग के साथ करीब 400 अधिकारियों का बड़ा प्रतिनिधिमंडल आ सकता है। जिनपिंग आखिरी बार 2019 में भारत आए थे। तब उनके साथ 200 से कम अधिकारी थे। जिनपिंग से बातचीत में सीमा विवाद सबसे अहम मुद्दा जिनपिंग के भारत दौरे की तैयारियों में LAC पर शांति और सीमा विवाद सबसे अहम मुद्दों में है। दोनों देश सीमा पर ऐसी व्यवस्था बनाने पर बात कर रहे हैं, जिससे किसी सैन्य घटना या तनाव का असर द्विपक्षीय रिश्तों पर न पड़े। व्यापार और जरूरी सामान की सप्लाई भी एजेंडे में भारत और चीन के बीच सिर्फ सीमा विवाद ही नहीं, बल्कि व्यापार और आर्थिक रिश्ते भी बातचीत का हिस्सा हैं। भारत चीन के साथ अपने बड़े व्यापार घाटे को कम करना चाहता है। इसके अलावा रेयर अर्थ मैगनेट और इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट जैसे जरूरी सामान की सप्लाई को लेकर भी भारत अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है। BRICS समिट की अध्यक्षता कर रहा है भारत इस साल BRICS की कमान भारत के पास है। BRICS दुनिया की बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह है। इसमें भारत, रूस, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के साथ मिस्र, ईरान, इथियोपिया, UAE और इंडोनेशिया भी शामिल हैं। भारत की अध्यक्षता में पूरे साल अलग-अलग शहरों में बैठकें, मंत्रीस्तरीय सम्मेलन और कई स्तर की चर्चाएं हो रही हैं। भारत का फोकस ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत करने, आर्थिक सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा, डिजिटल तकनीक, आतंकवाद से निपटने और सप्लाई चेन मजबूत करने पर है। यानी BRICS को सिर्फ राजनीतिक मंच नहीं, बल्कि व्यापार, निवेश और विकास के बड़े मंच के तौर पर आगे बढ़ाने की कोशिश है। ———————— ये खबर भी पढ़ें… रूसी राष्ट्रपति पुतिन सितंबर में भारत आ सकते हैं: बोले- मोदी से मुलाकात जल्द रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले BRICS समिट में शामिल हो सकते हैं। मॉस्को में सोमवार को भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात के दौरान पुतिन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जल्द मुलाकात की उम्मीद जताई। पूरी खबर पढ़ें…

बांग्लादेश के PM तारिक रहमान ने रद्द किया दिल्ली दौरा, सामने आया चौंकाने वाला कारण

बांग्लादेश के PM तारिक रहमान ने रद्द किया दिल्ली दौरा, सामने आया चौंकाने वाला कारण

Tariq Rehman

बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान का 3 दिवसीय दिल्ली दौरा टल गया है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से ठीक पहले अगस्त के तीसरे हफ्ते की तारीखें भी तय मानी जा रही थीं। दोनों तरफ के अधिकारी कूटनीतिक मोर्चे पर पूरी तैयारी में थे और राष्ट्रपति भवन से एक प्रेस विज्ञप्ति ने इस बात पर मुहर भी लगा दी थी। रहमान के रद्द हुए दौरे से पहले उनके एक वरिष्ठ सहयोगी ने कथित तौर पर तथाकथित ‘इस्लामिक NATO’ के प्रति खुलेपन का संकेत दिया था। इसी दौरान ढाका ने भारत से पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग भी दोहराई, ताकि उनके खिलाफ मुकदमा चलाया जा सके।

रिपोर्टों के मुताबिक तारिक रहमान आगामी BRICS Summit में शामिल होने को लेकर भी अनिच्छुक हैं, जबकि भारत ने उन्हें आमंत्रित किया है और चीन तथा रूस के नेता भी इसमें शामिल होने की पुष्टि कर चुके हैं।  ठीक आखिरी वक्त पर, ढाका और कूटनीतिक हलकों के सूत्रों के मुताबिक यह पूरा दौरा अचानक खटाई में पड़ गया। इस पूरे घटनाक्रम के अचानक रुक जाने के पीछे कोई आधिकारिक घोषणा तो नहीं हुई, बल्कि कूटनीतिक गलियारों में असमंजस की स्थिति बन गई।

पर्दे के पीछे बातचीत अभी भी जारी है, लेकिन दौरा फिलहाल अधर में लटक गया है। इसकी सबसे बड़ी वजह ढाका के अंदर चल रही राजनीतिक उथल-पुथल है। सबसे बड़ा और तुरंत उभरने वाला कारण  बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना हैं। बांग्लादेश सरकार चाहती है कि उन्हें वापस भारत से प्रत्यर्पित किया जाए।

रविवार को बांग्लादेशी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता एकेएम शाहिदुल करीम ने एक बयान में साफ कर दिया कि तारिक रहमान के दौरे के लिए यह प्रत्यर्पण एक मुख्य शर्त है। खबरों के मुताबिक बांग्लादेशी विपक्षी दल और छात्र आंदोलन से जुड़े नेता भारत के साथ तब तक सामान्य कूटनीतिक संबंधों के पक्ष में नहीं हैं जब तक शेख हसीना के प्रत्यर्पण का मुद्दा हल नहीं हो जाता।

Sugar Price: अगले 7 दिनों में चीनी की बढ़ती कीमतें क्या करवट लेंगी? ISMA ने पैनिक बाइंग को लेकर ये जानकारी दी

Sugar Price in India: देश में चीनी की बढ़ती कीमतें लोगों की जेब पर भारी पड़ रही हैं। त्योहारों का मौसम होने की वजह से लोग पहले ही खर्चों से घिरे हैं और ऊपर से ये कीमतें उन्हें और परेशान कर रही हैं। इस बीच चीनी उद्योग की सर्वोच्च संस्था इंडियन शुगर एंड बायो एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) का बड़ा बयान सामने आया है। इसमा ने स्पष्ट किया है कि भारत में चीनी की कोई कमी नहीं है और घरेलू बाजार में इसकी उपलब्धता सामान्य है। संस्था का अनुमान है कि सरकार द्वारा बिना शुल्क आयात की अनुमति देने और व्यापारियों व थोक उपभोक्ताओं पर स्टॉक होल्डिंग लिमिट लागू करने के फैसलों के बाद अगले कुछ दिनों में चीनी के खुदरा दामों में गिरावट देखने को मिलेगी।

खुदरा कीमतों का मौजूदा गणित और बाजार का हाल

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश भर में चीनी की औसत खुदरा कीमत 63.05 रुपये प्रति किलोग्राम दर्ज की गई। ये एक महीने पहले 48.73 रुपये किलोग्राम थी। यानी एक महीने में चीनी की कीमतों में करीब 29 फीसदी इजाफा देखा गया है। सोमवार को चीनी का अधिकतम खुदरा मूल्य 75 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गया जबकि इसका मॉडल प्राइस 65 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास बना हुआ है।

पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक इसमा अध्यक्ष नीरज शिरगावकर ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कहा कि कीमतों में आई यह तेजी किसी एक वजह से नहीं, बल्कि कई कारणों के एक साथ आने से हुई है। इसमें व्यापारियों और थोक खरीदारों द्वारा की गई सट्टा खरीदारी (पैनिक बाइंग) और अनुमान से कम उत्पादन मुख्य वजहें हैं। उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि भारत के पास चीनी की कोई कमी नहीं है और देश में उत्पादन और स्टॉक की स्थिति बुनियादी रूप से बेहद मजबूत है।

सट्टा खरीदारी और पैनिक बाइंग ने बनाई आर्टिफिशियल कमी

इसमा अध्यक्ष ने बताया कि कीमत बढ़ने की सबसे बड़ी वजह सट्टा खरीदारी रही। कारोबारियों के एक वर्ग ने बाजार में चीनी की सप्लाई की किल्लत का भ्रामक माहौल पैदा किया। इसके जवाब में बड़े थोक खरीदारों ने डेढ़ दो महीने का अडवांस स्टॉक जमा करना शुरू कर दिया।

नीरज शिरगावकर ने कहा कि इस सट्टा खरीदारी की वजह से चीनी बाजार में सर्कुलेशन से बाहर होकर गोदामों में बंद हो गई। इसी वजह से बाजार में एक आर्टिफिशियल तंगी की स्थिति पैदा हो गई। उन्होंने यह भी कहा कि उद्योग पर ex-mill कीमतें बढ़ाने या कृत्रिम किल्लत पैदा करने का आरोप लगाना गलत है। हालांकि कुछ मिलों द्वारा स्टॉक रोके जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इसकी जांच सरकार कर रही है।

देश में उत्पादन, खपत और ओपनिंग स्टॉक का आंकड़ा भी जानिए

मार्केटिंग वर्ष 2025-26 (अक्टूबर-सितंबर) में एथेनॉल के लिए इस्तेमाल की गई चीनी को घटाने के बाद देश का शुद्ध चीनी उत्पादन करीब 279 लाख टन रहने का अनुमान है। इस सीजन की शुरुआत में 50 लाख टन का ओपनिंग स्टॉक मौजूद था। देश में चीनी की वार्षिक घरेलू मांग लगभग 280 से 285 लाख टन है। ये भी जानना जरूरी है कि सरकार द्वारा निर्यात पर प्रतिबंध लगाने से पहले देश से 8 लाख टन चीनी का निर्यात किया जा चुका था।

इसमा का अनुमान है कि सितंबर के अंत में देश के पास लगभग 35 लाख टन का क्लोजिंग स्टॉक बचेगा। एथेनॉल में डाइवर्ट की गई चीनी का हिसाब लगाने के बाद भी यह क्लोजिंग स्टॉक सामान्य घरेलू मांग को पूरा करने के लिए एक काफी सेफ बफर है। मौसम के असर, कम पैदावार और महाराष्ट्र में पेराई दर और उत्तर प्रदेश में रेड-रॉट की समस्या की वजह से इस सीजन में ग्रॉस चीनी उत्पादन (एथेनॉल डाइवर्जन से पहले) प्रारंभिक अनुमान 345 लाख टन से घटकर 309 लाख टन रह गया।

कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने 10 लाख टन कच्चे चीनी (रॉ शुगर) के बिना शुल्क आयात की अनुमति दी है और डीलरों तथा थोक उपभोक्ताओं पर स्टॉक सीमा तय की है। इसमा अध्यक्ष ने कहा कि सरकार का यह कदम बाजार में घबराहट को रोकने और सेंटिमेंट को स्टेबल करने के लिए उठाया गया एक एहतियाती कदम है। इससे ये नहीं समझा जाना चाहिए कि चीनी की किल्लत है। संस्था ने मांग की है कि व्यापारियों के लिए मौजूदा 400 टन की स्टॉक सीमा को घटाकर 200 टन किया जाना चाहिए।

रिपोर्ट के मुताबिक ये फैसले लेने के बाद पिछले कुछ दिनों में चीनी की एक्स मिल कीमतों में गिरावट आई है। दो प्रमुख चीनी उत्पादक राज्यों महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में एक्स मिल कीमतें फिलहाल 55 से 56 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास आ गई हैं। आने वाले दिनों में खुदरा दामों में भी और नरमी आने की पूरी उम्मीद है।

एथेनॉल डाइवर्जन और नए पेराई सीजन की तैयारी

इसमा अध्यक्ष ने उन दावों को सिरे से खारिज कर दिया कि एथेनॉल बनाने के लिए चीनी का उपयोग किए जाने की वजह से कीमतें बढ़ी हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम खाने योग्य चीनी के साथ कंपीटिशन नहीं कर रहा है और न ही यह कीमत बढ़ने के लिए जिम्मेदार है। इस वर्ष तीसरी तिमाही तक लगभग 29 लाख टन चीनी एथेनॉल के लिए डाइवर्ट की गई है और पूरे सीजन में यह आंकड़ा 30 लाख टन रहने की उम्मीद है। ये ऐतिहासिक रूप से 20 से 40 लाख टन के दायरे में ही है। इसके अलावा 2025-26 में एथेनॉल आपूर्ति में चीनी क्षेत्र की हिस्सेदारी घटकर 25 प्रतिशत रह गई है। इसका बड़ा हिस्सा अनाज क्षेत्र से आ रहा है।

अक्टूबर से शुरू होने वाले अगले मार्केटिंग वर्ष 2026-27 के बारे में जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि ISMA और NFCSF पेराई सत्र की शुरुआत को 10 से 15 दिन पहले करने पर काम कर रहे हैं। तमिलनाडु और कर्नाटक में विशेष पेराई पहले से ही जारी है। नए सीजन की जल्दी शुरुआत और आयातित चीनी के आने से अक्टूबर में चीनी का उत्पादन बढ़कर लगभग 10 लाख टन होने की उम्मीद है (जो सामान्यतः 4 लाख टन रहता है)। इससे त्योहारों के सीजन में मांग के पीक पर रहने के दौरान बाजार में नई आपूर्ति उपलब्ध हो जाएगी। आयातित रॉ शुगर अक्टूबर तक भारत पहुंचने की संभावना है।

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Tukaram Mundhe: मुंबई में ‘एक रेड रोज’ से बदल रहे हैं खाने के नियम! महाराष्ट्र के FDA चीफ तुकाराम मुंढे का एक्शन वायरल

Tukaram Mundhe News मुंबई समेत पूरे महाराष्ट्र में इन दिनों खाने-पीने की दुकानों और रेस्टोरेंट संचालकों के बीच एक नाम चर्चा में है तुकाराम मुंढे…। महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) कमिश्नर के तौर पर 51 वर्षीय मुंढे ने देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में खाद्य सुरक्षा और साफ-सफाई को लेकर ऐसा अभियान शुरू किया है, जिसकी तस्वीरें और कार्रवाई सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं।

कमिश्नर का पद संभालने के बाद से FDA खाद्य सुरक्षा और अन्य नियमों का उल्लंघन करने वाले कई चर्चित प्रतिष्ठानों के खिलाफ अभियान चला रहा है। हाल ही में चलाए गए एक विशेष अभियान के तहत FDA ने राज्य भर में सैकड़ों होटलों, रेस्तरां और ढाबों एक्शन लिया था।

मुंढे के नेतृत्व में खाद्य सुरक्षा विभाग ने पिछले कुछ हफ्तों में Domino’s के चार और Pizza Hut के एक आउटलेट के फूड परमिट निलंबित किए हैं। मई में महाराष्ट्र के खाद्य सुरक्षा प्रमुख का पद संभालने के बाद से उनकी टीम 3,000 से ज्यादा छापे और निरीक्षण कर चुकी है।

इन कार्रवाइयों में बड़े ब्रांडों के साथ-साथ क्रिकेट क्लब, होटल, मशहूर रेस्टोरेंट, छोटे ढाबों और सड़क किनारे खाने की दुकानों को भी जांच के दायरे में रखा गया है। मुंढे का साफ संदेश है कि जो भी खाद्य कारोबारी नियमों का पालन नहीं करेगा, उसके खिलाफ नियामक कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि यहां मामला सिर्फ नियमों का नहीं, बल्कि लोगों की जिंदगी से जुड़ा हुआ है।

जज ने पूछा- कोर्ट की कैंटीन की जांच हुई?

मुंढे की कार्रवाई तब और चर्चा में आ गई जब मुंबई की एक अदालत के जज ने सवाल उठाया कि क्या खाद्य विभाग निजी दुकानों के खिलाफ ही सख्ती कर रहा है। क्या अदालत की कैंटीनों की भी जांच की गई है? मुंढे की टीम ने इस सवाल का जवाब घंटों के भीतर कार्रवाई से दिया।

अधिकारियों ने अदालत परिसर की कैंटीनों का निरीक्षण किया। इस दौरान कुछ ऐसी कैंटीनों को बंद कराया जो कथित तौर पर बिना लाइसेंस चल रही थीं। इस घटना ने यह संदेश दिया कि विभाग बड़े ब्रांड और छोटे कारोबारियों के साथ-साथ सरकारी या संस्थागत परिसरों में चलने वाले खाद्य प्रतिष्ठानों को भी जांच के दायरे में रख रहा है।

हर दिन वायरल हो रही छापेमारी की तस्वीरें

मुंढे की कार्रवाई की सबसे खास बात उसका सार्वजनिक असर है। छापों के बाद खाद्य विभाग की ओर से जारी तस्वीरों में कई जगहों पर गंदी दीवारें, कॉकरोच, चूहे और एक्सपायर्ड खाद्य सामग्री दिखाई दी। इन तस्वीरों ने सोशल मीडिया पर लोगों को हैरान कर दिया। कई लोगों का कहना है कि वर्षों से खराब साफ-सफाई और खाद्य गुणवत्ता को यह कहकर सामान्य मान लिया गया था कि भारत में ऐसा होता है।

अब मुंढे की कार्रवाई से लोगों को उम्मीद दिखाई दे रही है कि खाद्य सुरक्षा के नियम वास्तव में लागू किए जा सकते हैं। कंज्यूमर कंसल्टिंग फर्म ‘The Knowledge Company’ के पार्टनर अंकुर बिसेन के मुताबिक, लोगों में लंबे समय से दबा हुआ गुस्सा है। ऐसे में मुंढे की कार्रवाई ने उसे आवाज दी है।

खाने में रंग से लेकर तेल बदलने तक, दुकानदारों में डर

मुंबई में न्यूज एजेंसी Reuters ने 25 स्ट्रीट वेंडर्स और रेस्टोरेंट का दौरा किया। रिपोर्ट के मुताबिक, मुंढे की कार्रवाई का असर छोटे कारोबारियों के काम करने के तरीके पर भी दिखाई दे रहा है। एक दुकानदार ने चीनी व्यंजनों में इस्तेमाल होने वाले खतरनाक लाल रंग की जगह प्राकृतिक लाल मिर्च का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। एक अन्य दुकानदार ने अपना तलने वाला तेल दिन में तीन बार बदलना शुरू कर दिया है। कर्मचारियों के लिए दस्ताने और सिर ढकने वाली कैप पहनना भी अनिवार्य किया गया है।

मुंबई के फेमस वड़ा पाव पर भी कार्रवाई

मुंबई का मशहूर वड़ा पाव भी मुंढे की खाद्य सुरक्षा मुहिम से बच नहीं पाया है। जून में खाद्य विभाग ने वड़ा पाव समेत खाने की चीजों को पैक करने के लिए अखबार के इस्तेमाल पर रोक लगा दी। मुंबई में लंबे समय से सड़क किनारे खाने की चीजों को अखबार में लपेटकर देने का चलन रहा है। अब कई जगहों पर साफ बटर पेपर का इस्तेमाल किया जा रहा है। 14 वर्षीय सुप्रिया वागले को अपने पसंदीदा वड़ा पाव की साफ बटर पेपर में पैकिंग पसंद आई। उसका कहना है कि इससे उसे राहत महसूस होती है और वह स्ट्रीट फूड को लेकर ज्यादा भरोसा कर पा रही है।

Domino’s और Pizza Hut के बाद McDonald’s पर भी एक्शन

मुंढे की टीम ने कई बड़े ब्रांडों के आउटलेट पर भी कार्रवाई की है। Domino’s के चार और Pizza Hut के एक आउटलेट के परमिट निलंबित किए गए हैं। इसके बाद एक McDonald’s आउटलेट पर भी कार्रवाई हुई। विभाग के मुताबिक, निरीक्षण के दौरान वहां जिंदा कीट यानी कॉकरोच और सड़ा हुआ खाना मिला।

हालांकि, Reuters के सवालों पर संबंधित तीनों कंपनियों की ओर से तत्काल प्रतिक्रिया नहीं दी गई। मुंढे की कार्रवाई केवल बड़े अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों तक सीमित नहीं रही। विभाग ने मुंबई के एक ब्रिटिश दौर के क्रिकेट क्लब, करीब 70 साल पुराने आइसक्रीम पार्लर और 110 साल पुराने पारसी डेयरी के खिलाफ भी कार्रवाई की है।

कारोबारी बोले- सुधार का समय तो दिया जाए

मुंढे की लोकप्रियता बढ़ने के साथ उनकी कार्यशैली पर सवाल भी उठ रहे हैं। कुछ कारोबारियों का कहना है कि उन्हें नियमों का पालन करने और कमियों को सुधारने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए। कुछ प्रतिष्ठानों ने हाई कोर्ट का रुख करते हुए खाद्य विभाग पर कथित तौर पर जरूरत से ज्यादा सख्ती करने का आरोप लगाया है।

एक मामले में अदालत ने विभाग पर 5 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया। अदालत के अनुसार, संबंधित खाने के प्रतिष्ठान ने अपनी कमियों में सुधार कर लिया था, इसके बावजूद उसका परमिट निलंबित रखा गया था। मुंढे ने कहा कि अदालत की टिप्पणियों को गंभीरता से लिया जाता है। जहां सुधार की गुंजाइश होती है, वहां विभाग सुधार करता है।

हर साल एक लाख से ज्यादा सैंपल की जांच

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2020 से हर साल भारत में खाद्य निरीक्षकों ने एक लाख से ज्यादा सैंपल की जांच की है। इनमें करीब 20 प्रतिशत नमूने असुरक्षित, घटिया या सही लेबलिंग के बिना पाए गए। पिछले तीन वर्षों में करीब 8,000 खाद्य कारोबार लाइसेंस रद्द किए गए हैं। ऐसे आंकड़ों के बीच मुंबई में मुंढे की कार्रवाई को लोग सिर्फ एक अधिकारी की सख्ती के रूप में नहीं। बल्कि खाद्य सुरक्षा को लेकर लंबे समय से चली आ रही समस्या पर बड़े अभियान के रूप में देख रहे हैं।

21 साल की नौकरी में कई बार हुआ तबादला

तुकाराम मुंढे का सख्त प्रशासनिक रवैया नया नहीं है। भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारी के तौर पर करीब 21 साल के करियर में उनका कई बार तबादला हो चुका है। 2018 के एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि उनका लगभग हर साल तबादला हो जाता है।

उन्होंने रिश्वत लेने से इनकार करने और प्रशासनिक कार्रवाई से नहीं डरने की बात भी सार्वजनिक रूप से कही है। अब खाद्य सुरक्षा विभाग में उनकी शैली एक बार फिर सुर्खियों में है। लेकिन इस बार सोशल मीडिया पर वायरल होती छापेमारी की तस्वीरों के कारण।

सेलिब्रिटी जैसी लोकप्रियता, लेकिन मुंढे बोले- मैं सेलिब्रिटी नहीं

मुंढे की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले सप्ताह नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान लोग उनके साथ सेल्फी लेने के लिए पहुंच गए। लोग उनसे हाथ मिलाने की कोशिश करते नजर आए। एक फैंस ने तो यहां तक कह दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मुंढे को राष्ट्रीय स्तर की जिम्मेदारी देनी चाहिए। हालांकि, मुंढे खुद इस लोकप्रियता को सेलिब्रिटी का दर्जा देने से इनकार करते हैं।

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उन्होंने Reuters से बातचीत में कहा, “मुझे नहीं लगता कि मैं कोई सेलिब्रिटी हूं। मैं सिर्फ फूड सेफ्टी कमिश्नर हूं।” मुंढे का अभियान अब मुंबई से आगे भी चर्चा का विषय बन चुका है। उनके सामने चुनौती सिर्फ छापे मारना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि कार्रवाई के बाद खाद्य कारोबारियों में साफ-सफाई और सुरक्षा के नियमों का पालन लंबे समय तक बना रहे।

ईरान की करेंसी रियाल 20 लाख प्रति डॉलर पर पहुंची:यह अब तक का सबसे निचला स्तर, अमेरिकी प्रतिबंधों से बिगड़ी अर्थव्यवस्था

ईरानी करेंसी रियाल डॉलर के मुकाबले अब तक के सबसे निचल स्तर पर पहुंच गई है। इसकी वजह अमेरिका के साथ बीते करीब 6 महीने से जारी जंग और उसपर लगाए गए कड़े आर्थिक प्रतिबंध है। सवालों के जवाब में समझें पूरा मामला…. सवाल 1: ईरानी करेंसी को लेकर ताज़ा अपडेट क्या है? जवाब: ईरान की करेंसी रियाल अनरेगुलेटेड मार्केट में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। करेंसी ट्रैकिंग वेबसाइट बॉनबास्ट के आंकड़ों के मुताबिक, सोमवार को 1 अमेरिकी डॉलर की कीमत 20 लाख ईरानी रियाल हो गई। सवाल 2: रियाल में अचानक इतनी बड़ी गिरावट क्यों आई? जवाब: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पिछले हफ्ते ईरान के खिलाफ एक बड़ी आर्थिक कार्रवाई का ऐलान किया था। इस घोषणा के बाद से रियाल में करीब 4.5% की गिरावट दर्ज की गई है। सवाल 3: अमेरिका ईरान के खिलाफ क्या कदम उठा रहा है? जवाब : अमेरिका का मकसद ईरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करना है। इसके लिए अमेरिका ईरान के बचे हुए चुनिंदा कारोबारी पार्टनर्स को चेतावनी दे रहा है, फारस की खाड़ी में उसके मुख्य बंदरगाहों की नाकाबंदी कर रहा है और विदेशी मुद्रा का मुख्य जरिया माने जाने वाले तेल निर्यात पर पूरी तरह रोक लगाने की कोशिश कर रहा है। सवाल 4: ईरान के तेल कारोबार और बैंकिंग पर इसका क्या असर हुआ है? जवाब : ईरान के सेंट्रल बैंक के गवर्नर अब्दोलनासर हेम्मती के मुताबिक, देश का कच्चा तेल निर्यात “लगभग पूरी तरह बंद” हो गया है। इसके अलावा, ईरान के सबसे बड़े कारोबारी पार्टनर्स में शामिल संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने भी अगले आदेश तक ईरान के साथ सभी वित्तीय लेन-देन रोक दिए हैं। सवाल 5: अमेरिकी प्रशासन ने इस कार्रवाई पर क्या बयान दिया है? जवाब : अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने फाइनेंशियल टाइम्स में लिखा, “हमारा मकसद उन सभी आर्थिक लाइफलाइनों को काटना है जो इस व्यवस्था को चला रही हैं, ताकि तेहरान पूरी तरह अलग-थलग पड़ जाए।” उन्होंने चेतावनी दी कि आर्थिक मोर्चे पर ‘D-Day’ की शुरुआत हो चुकी है। सवाल 6: ईरान की घरेलू मीडिया और विश्लेषकों का इस गिरावट पर क्या कहना है? जवाब : ईरान के प्रमुख बिजनेस अखबार ‘दोनिया-ए एकतेसाद’ के अनुसार, विदेशी मुद्रा ट्रांसफर में आ रही रुकावटों और गिरते निर्यात के कारण यह संकट गहराया है। इसके साथ ही देश में आयात की बढ़ती मांग और महंगाई की आशंकाओं ने मिलकर करेंसी को कमजोर किया है। सवाल 7: चीन का इस पूरे मामले पर क्या रुख है? जवाब: ईरान से सबसे ज्यादा तेल खरीदने वाले देश चीन ने कहा है कि अमेरिका का आर्थिक दबाव काम नहीं करेगा। चीन ने युद्ध का कूटनीतिक समाधान निकालने की अपील की है। सवाल 8: अमेरिकी दबाव का मुकाबला करने के लिए ईरान की क्या योजना है? जवाब: ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि उनका देश अमेरिकी दबाव का मुकाबला करने के लिए चीन समर्थक साझेदार देशों के साथ व्यापार को दोगुना करेगा। सवाल 9: रियाल के टूटने से आम जनता पर क्या असर होगा? जवाब: डॉलर के मुकाबले किसी भी करेंसी के कमजोर होने से रोजमर्रा की जरूरी चीजों जैसी दवाइयां, खाना तेजी से महंगा होता हैं। इससे हाइपरइन्फ्लेशन का खतरा खड़ा हो जाता है।

Sugar Stock: शुगर शेयरों में आज फिर तेजी, 52 हफ्ते के हाई पर पहुंचा Dwarikesh, Bajaj Hind

Sugar Stock: चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी के बीच सरकार द्वारा स्टॉक रखने की सीमा सख्त किए जाने के बाद सोमवार के ट्रेडिंग सेशन में चीनी कंपनियों के शेयरों में तेजी आई और कई शेयरों ने अपने 52-हफ़्ते के उच्चतम स्तर को छुआ।

बजाज हिंदुस्तान शुगर के शेयरों में 12 फीसदी से अधिक की बढ़त हुई और उन्होंने अपने 52-हफ़्ते का उच्चतम स्तर छुआ।

अवध शुगर एंड एनर्जी, डालमिया भारत शुगर एंड इंडस्ट्रीज, धामपुर शुगर मिल्स, द्वारिकेश शुगर इंडस्ट्रीज, मगध शुगर एंड एनर्जी, मवाना शुगर्स, पोन्नी शुगर्स (इरोड), उगर शुगर वर्क्स और उत्तम शुगर मिल्स के शेयरों ने भी इंट्रा-डे ट्रेडिंग के दौरान अपने-अपने 52-हफ़्ते के उच्चतम स्तर को छुआ।श्री रेणुका शुगर्स, ईआईडी पैरी इंडिया, त्रिवेणी इंजीनियरिंग एंड इंडस्ट्रीज और बलरामपुर चीनी मिल्स के शेयरों में भी तेजी देखी गई और इनमें 3 से 8 फीसदी तक की बढ़त हुई।

सरकार ने भरोसा दिलाया है कि अनुमान से कम उत्पादन के बावजूद देश में घरेलू मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त चीनी स्टॉक उपलब्ध है।

शुक्रवार को, सरकार द्वारा 1 मिलियन टन कच्ची चीनी के ड्यूटी-फ्री आयात की अनुमति देने के बाद चीनी शेयरों में 5 प्रतिशत तक की गिरावट आई थी, जिससे त्योहारों के समय मांग के बीच घरेलू बाजार में तंगी का संकेत मिला था।

चीनी की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी को देखते हुए, सरकार ने चीनी की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने और उपभोक्ताओं के लिए कीमतें स्थिर रखने के लिए कई कदम उठाए हैं। उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने कहा है कि वह स्थिति पर बारीकी से नज़र रख रहा है।

इस साल 1 अगस्त से 30 नवंबर तक देश भर में चीनी डीलरों पर 400 टन की स्टॉक सीमा लगाई गई है। इसके अलावा, थोक उपभोक्ताओं को 1 सितंबर से 15 दिनों की खपत से अधिक चीनी स्टॉक रखने की अनुमति नहीं होगी।

राज्यों और चीनी मिलों को 15 अक्टूबर से पेराई (क्रशिंग) शुरू करने की सलाह दी गई है। इससे अक्टूबर में चीनी का उत्पादन सामान्य 3-4 लाख मीट्रिक टन से बढ़कर 10 लाख मीट्रिक टन से अधिक होने की उम्मीद है, जिससे त्योहारों के मौसम में उपलब्धता और बेहतर होगी।

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Iran-US War Update: ‘एक बूंद भी तेल नहीं निकलेगा’; होर्मुज में तनाव के बीच ईरान की अमेरिका को सबसे बड़ी धमकी

Iran-US War Update: ईरान और अमेरिका के बीच तनाव अब उस मोड़ पर पहुंच गया है, जिसका असर सिर्फ दोनों देशों तक सीमित नहीं रह सकता। ईरान ने साफ चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका ने उसके खिलाफ कथित ‘आर्थिक युद्ध’ जारी रखा, तो वह होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) समेत फारस की खाड़ी से तेल का निर्यात पूरी तरह रोक सकता है। ईरान की इस धमकी ने दुनिया के सबसे अहम तेल आपूर्ति मार्गों में से एक को लेकर चिंता बढ़ा दी है।

सवाल यह है कि अगर Hormuz से तेल की आवाजाही वास्तव में रुकती है तो इसका असर भारत समेत पूरी दुनिया के पेट्रोल, डीजल, LPG और दूसरे ईंधनों की कीमतों पर कितना पड़ेगा?

‘एक बूंद तेल भी निर्यात नहीं होगा’

ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव मोहन रेजाई ने अमेरिका को कड़ी चेतावनी दी है। न्यूज एजेंसी ANI के अनुसार, रेजाई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा कि अगर आर्थिक युद्ध जारी रहता है तो होर्मुज के रास्ते या फारस की खाड़ी के किसी अन्य हिस्से से एक बूंद तेल भी निर्यात नहीं होगा।

रेजाई ने केवल अमेरिका को ही चेतावनी नहीं दी, बल्कि उन देशों को भी निशाने पर लिया जो ईरान के खिलाफ अमेरिकी आर्थिक अभियान में शामिल होते हैं या उसका समर्थन करते हैं। उनके मुताबिक, ईरान ऐसे किसी भी देश की भागीदारी या समर्थन को युद्ध की कार्रवाई के रूप में देखेगा।

अमेरिका करने जा रहा है बड़ा आर्थिक हमला

ईरान की यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब अमेरिका उसके खिलाफ नए और कड़े आर्थिक प्रतिबंधों की तैयारी कर रहा है। न्यूज एजेंसी Reuters के मुताबिक, अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट सोमवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले हैं। इसमें ईरान और उसके साथ व्यापार करने वाले देशों को निशाना बनाने वाली नई आर्थिक कार्रवाई का ऐलान किया जा सकता है।

Financial Times में लिखे एक लेख में बेसेंट ने आने वाले कदमों को किसी विरोधी के खिलाफ अब तक की गई सबसे बड़ी वित्तीय कार्रवाई बताया है। अमेरिका ने अभी इन संभावित प्रतिबंधों की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की है। लेकिन संकेत दिया है कि ईरान के साथ आर्थिक और वित्तीय संबंध बनाए रखने वाले देशों पर भी दबाव डाला जा सकता है।

चीन को भी अमेरिका की चेतावनी

अमेरिका ने ईरान के साथ कारोबार करने वाले देशों को लेकर दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया है। Reuters के अनुसार, बेसेंट ने चीन से भी अमेरिका के साथ सहयोग करने का आग्रह किया है। यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन की ऊर्जा जरूरतों में खाड़ी क्षेत्र की बड़ी भूमिका है। रिपोर्ट के मुताबिक, चीन अपने तेल आयात का करीब आधा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से प्राप्त करता है।

चीन ने हालांकि अमेरिकी प्रतिबंधों की नीति पर आपत्ति जताई है। वॉशिंगटन स्थित चीनी दूतावास के प्रवक्ता ने कहा कि प्रतिबंध और दबाव समस्या के समाधान में मदद नहीं करते और कूटनीति का रास्ता अपनाने की जरूरत है। ईरान के नेताओं ने अमेरिकी दबाव के खिलाफ बयानबाजी तेज कर दी है।

ईरानी सेना यानी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के प्रवक्ता सरदार मोहेबी ने अमेरिकी आर्थिक दबाव को लेकर कहा कि यह सैन्य मोर्चे पर अमेरिका की कथित हार की स्वीकारोक्ति है। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने भी अमेरिकी प्रतिबंधों की आलोचना की। उन्होंने कहा कि ईरान के लिए युद्ध और प्रतिबंध कोई नई चीज नहीं हैं। ईरान करीब दो दशकों से प्रतिबंधों का सामना कर रहा है।

होर्मुज पर क्यों टिकी है पूरी दुनिया की नजर?

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल रूट्स में से एक है। फारस की खाड़ी से निकलने वाले तेल और गैस के लिए यह प्रमुख समुद्री रास्ता है। इसलिए यहां किसी भी बड़े सैन्य या राजनीतिक संकट का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है।

Reuters के मुताबिक, ईरान पहले से ही अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण आर्थिक दबाव में है। इसके अलावा हालिया हमलों के कारण उसके बुनियादी ढांचे को नुकसान, व्यापार में बाधा, उत्पादन में कमी और पुनर्निर्माण की लागत का दबाव भी बढ़ा है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ईरान के पास अब भी पर्याप्त मिसाइल और ड्रोन क्षमता मौजूद है, जिससे वह खाड़ी के पड़ोसी देशों को निशाना बना सकता है। होर्मुज से गुजरने वाले तेल टैंकरों के लिए खतरा पैदा कर सकता है।

भारत के लिए क्यों अहम है यह संकट?

ईरान-अमेरिका तनाव का असर भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल और LPG का आयात करता है। ऐसे में अगर होर्मुज के जरिए तेल की आपूर्ति लंबे समय तक प्रभावित होती है तो अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं।

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इसका असर आगे चलकर पेट्रोल-डीजल, LPG, CNG और परिवहन लागत पर पड़ सकता है। खासकर LPG के मामले में भारत के लिए आयात और अंतरराष्ट्रीय कीमतें महत्वपूर्ण हैं। यही वजह है कि होर्मुज में बढ़ता तनाव भारत के लिए केवल विदेश नीति या सुरक्षा का मुद्दा नहीं है, बल्कि आम आदमी की रसोई और वाहन के खर्च से भी जुड़ा हुआ मामला है।

Stock Market Today : बाजार पर आज इन खबरों का दिखेगा असर, कोई ट्रेड लेने से पहले इन पर डाल लें एक नजर

Market news : कच्चे तेल में नरमी से भारतीय बाजारों के सेंटिमेंट सुधरे हैं। गिफ्ट निफ्टी में करीब 70 प्वाइंट की बढ़त दिख रही है। FIIs की कैश और वायदा मिलाकर करीब 680 करोड़ की नेट खरीदारी देखने को मिली है। नेट शॉर्ट कॉन्ट्रैक्ट भी थोड़े कम हुए हैं। यहां हम आपके लिए तमाम समाचार प्लेटफॉर्मों पर चल रही आज की ऐसी अहम खबरों की एक सूची जारी कर रहें हैं जो भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों को प्रभावित कर सकते हैं।

मार्केट ओवरव्यू

21 अगस्त को उतार-चढ़ाव भरे सेशन में मार्केट पिछले सेशन की जबरदस्त रिकवरी को आगे नहीं बढ़ा पाए और सपाट बंद हुए। मेटल,PSU बैंक और रियल्टी शेयरों में बढ़त का असर ऑटो,IT,मीडिया और फार्मा शेयरों में बिकवाली से खत्म हो गया। मिले-जुले ग्लोबल संकेतों के बावजूद,मार्केट बढ़त के साथ खुला लेकिन उस बढ़त को बनाए नहीं रख पाया और पूरे सेशन के दौरान एक सीमित दायरे में ही घूमता रहा। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और दुनिया भर में बनी अनिश्चितताओं के बीच इन्वेस्टर्स सतर्क नजर आए। कारोबार के अंत में,सेंसेक्स 3.11 अंक बढ़कर 77,540.83 पर और निफ्टी 20.15 अंक या 0.08 प्रतिशत बढ़कर 24,252 पर बंद हुआ।

ईरान के खिलाफ आर्थिक D-Day का एलान, ईरान की तेल निर्यात थामने की चेतावनी

वेस्ट एशिया में अब आर-पार की लड़ाई दिख रही है। अमरिका ने ईरान के खिलाफ सबसे बड़ी इकोनॉमिक स्ट्राइक शुरू कर दी है। US के वित्त मंत्री ने कहा है कि ईरान के खिलाफ वॉर अब आखिरी चरण में है। ईरान का भी पलटवार हुआ है। उसने कहा कि ये प्रतिबंध एक्ट ऑफ वॉर की कटेगरी में आते हैं। अमेरिका का साथ देने वाले देशो को भी निशाना बनाते हुए एक्सपोर्ट ठप करेंगे।

कच्चे तेल में मामूली नरमी, $91 के नीचे, सोना 4600 डॉलर के पार

वेस्ट एशिया तनाव बढ़ने के बावजूद कच्चे तेल में नरमी है। यह 91 डॉलर के नीचे है। इधर सोना-चांदी चमके हैं। सोना 4600 डॉलर के पार चला गया है। 10 साल की US बॉन्ड यील्ड भी 4.7 के अहम लेवल के ऊपर है। हलांकि डॉलर इंडेक्स 99 डॉलर के नीचे है।

अमेरिकी बाजारों में रही बढ़त, निक्केई और कॉस्पी में दबाव

शुक्रवार को अमेरिकी बाजारों में जोरदार तेजी दिखी। डाओ जोंस में 500 प्वाइंट से ज्यादा का उछाल आया। नैस्डैक और S&P में भी हल्की बढ़त रही। वहीं एशिया में मिला-जुला कारोबार देखने को मिल रहा है। कॉस्पी में करीब 1.25 फीसदी की गिरावट के साथ कारोबार हो रहा है। निक्केई फ्लैट कारोबार कर रहा है।

एशियाई करेंसी

अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ज़्यादातर एशियाई करेंसी में बढ़त देख रही है। इसमें इंडोनेशियाई रुपिया सबसे आगे है, जिसमें 0.305% की बढ़त हुई है। इसके बाद दक्षिण कोरियाई वॉन (0.216%),ताइवान डॉलर (0.154%),थाई बाहत (0.141%),चीनी रेनमिनबी (0.051%),जापानी येन (0.044%) और मलेशियन रिंगित (0.017%)का नंबर है। सिंगापुर डॉलर में कोई बदलाव नहीं हुआ है। जबकि फिलीपींस पेसो में डॉलर के मुकाबले 0.092% की गिरावट आई है।

लेंसकार्ट और मीशो में बड़ी ब्लॉक डील संभव

लेंसकार्ट में आज 2800 करोड़ रुपये की ब्लॉक डील हो सकती है। 4% डिस्कउंट पर 635 रुपये फ्लोर प्राइस तय की गई है। इसके साथ मीशो में भी करीब 957 करोड़ रुपये की ब्लॉक डील हो सकती है। इसके लिए 4 फीसदी तक के डिस्काउंट पर 197 रुपये के करीब फ्लोर प्राइस तय है। दोनों में बड़े निवेशक हिस्सेदारी बेच रहे हैं।

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शुरू हुई मोबाइल PLI 2.0 स्कीम, सरकार ने जारी किया नोटिफिकेशन

डिक्सन और अंबर जैसी कंपनियों पर आज फोकस रखें। सरकार ने मोबाइल PLI 2.0 स्कीम का नोटिफिकेशन जारी किया है। सरकार 62500 करोड़ रुपये के इंसेंटिव देगी। यह स्कीम एक अप्रैल 2026 से ही लागू होगी और वित्त वर्ष 2031 तक चलेगी। इसके तहत सरकार 5% तक के इंसेंटिव देगीएफआईआई और

डीआईआई फंड फ्लो

21 अगस्त को घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) ने लगातार नौवें सेशन में भी खरीदारी जारी रखी और ₹2,124 करोड़ के शेयर खरीदे, जबकि विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) लगातार दूसरे सेशन में भी नेट सेलर बने रहे और ₹543 करोड़ के शेयर बेचे।

NHC Foods का रेवेन्यू 73% बढ़कर ₹601 करोड़ पहुंचा, एग्री कमोडिटी कारोबार में विस्तार

एग्री कमोडिटी सेक्टर की कंपनी NHC Foods Ltd ने पहली तिमाही में मजबूत नतीजे पेश किए हैं। कंपनी का कंसोलिडेटेड रेवेन्यू सालाना आधार पर 73% बढ़कर ₹601 करोड़ हो गया। पिछले साल इसी तिमाही में यह ₹348 करोड़ था। कंपनी का बिना ऑडिट वाला कंसोलिडेटेड मुनाफा ₹12 करोड़ से ज्यादा रहा।

कंपनी का EBITDA बढ़कर ₹21.95 करोड़ हो गया। एक साल पहले यह ₹16.42 करोड़ था। यानी इसमें 34% की बढ़ोतरी हुई। बेसिक EPS ₹0.20 प्रति शेयर रहा।

मैनेजमेंट ने क्या कहा?

कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर सत्यम शिरीषचंद्र जोशी ने कहा कि पहली तिमाही के नतीजे कंपनी के मजबूत बिजनेस फंडामेंटल्स को दिखाते हैं। उनके मुताबिक ऑपरेशनल दक्षता और क्वालिटी पर फोकस का असर सीधे वित्तीय प्रदर्शन में दिखा है। उन्होंने कहा कि बाजार की प्रतिक्रिया निवेशकों के भरोसे को भी मजबूत करती है।

FCCB कन्वर्जन से बढ़ा कैपिटल बेस

कंपनी ने Global Focus Fund को 10.41 करोड़ पूरी तरह चुकता इक्विटी शेयर आवंटित किए हैं। यह आवंटन 11 लाख डॉलर के FCCB के आंशिक कन्वर्जन के बाद हुआ। इसके बाद कंपनी की पेड-अप इक्विटी शेयर कैपिटल बढ़कर ₹76.19 करोड़ हो गई।

एग्री कमोडिटी कारोबार में विस्तार

कंपनी के बोर्ड ने AgriConnect Solutions Pvt Ltd में प्रस्तावित निवेश और अधिग्रहण के लिए लेटर ऑफ इंटेंट को मंजूरी दी है। यह कंपनी एग्री कमोडिटीज की सप्लाई और ट्रेडिंग के कारोबार में है। कंपनी का मानना है कि इससे इस सेगमेंट में उसकी मौजूदगी और मजबूत होगी।

कंपनी का बिजनेस क्या है

NHC Foods Ltd एग्री कमोडिटी एक्सपोर्ट और फूड ट्रेडिंग सेक्टर की कंपनी है। यह मसाले, तिलहन, अनाज, दालें, चीनी, चाय, कॉफी और दूसरी कृषि जिंसों की खरीद, प्रोसेसिंग और सप्लाई का काम करती है। कंपनी B2B मॉडल के जरिए कुछ देशों में फूड प्रोडक्ट्स का निर्यात करती है।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Sugar Import: चीनी के भाव कब कम होंगे? ब्राजील से आने वाली है खेप, सरकार जमाखोरी पर भी सख्त

Sugar Import: भारत में चीनी की बढ़ती कीमतों के बीच थोड़ी राहत की खबर आई है। नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज (NFCSF) के अध्यक्ष प्रकाश नाइकनवरे ने कहा है कि 15 अक्टूबर से पहले ब्राजील से कुछ चीनी की खेप भारतीय बंदरगाहों तक पहुंच सकती है। हालांकि उन्होंने माना कि अभी यह बताना मुश्किल है कि तब तक कितनी मात्रा में चीनी आएगी।

फिलहाल ब्राजील ही सबसे बड़ा विकल्प

नाइकनवरे के मुताबिक, इस समय चीनी आयात के लिए ब्राजील ही सबसे व्यावहारिक विकल्प है। थाईलैंड आमतौर पर भारत को चीनी सप्लाई करता है। लेकिन, इस बार वो खुद उत्पादन की कमी से जूझ रहा है।

नाइकनवरे ने बताया कि ब्राजील से भारत तक जहाज आने में 40 से 45 दिन लगते हैं। इसके बाद बंदरगाह से मिलों तक चीनी पहुंचाने में भी कुछ समय लगता है। इसलिए 15 अक्टूबर तक कितनी चीनी पहुंचेगी, इसका सटीक अनुमान लगाना अभी संभव नहीं है।

सरकार समय सीमा में ढील दे सकती है

केंद्र सरकार ने पहले 31 अक्टूबर तक आयातित चीनी के पहुंचने की शर्त रखी थी। लेकिन नाइकनवरे का मानना है कि सरकार इसे सख्ती से लागू नहीं करेगी। अगर कुछ खेप रास्ते में होगी, तो उसके बाद भी उसे मंजूरी मिल सकती है।

किन राज्यों को पहले मिलेगी चीनी?

सबसे पहले बंदरगाह वाले राज्यों को फायदा मिलने की उम्मीद है।

  • महाराष्ट्र
  • कर्नाटक
  • तमिलनाडु
  • गुजरात
  • आंध्र प्रदेश

उत्तर भारत के राज्यों तक भी यही चीनी बाद में सड़क और रेल के जरिए पहुंचाई जाएगी।

सरकार ने क्यों दी आयात की मंजूरी?

20 अगस्त को सरकार ने 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी थी। पिछले एक महीने में चीनी की कीमतें 24% बढ़कर 56-60 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई थीं। इसी वजह से यह फैसला लिया गया।

उत्पादन को लेकर घबराने की जरूरत नहीं?

NFCSF ने 2025-26 सीजन के लिए 279 लाख टन चीनी उत्पादन का अनुमान बरकरार रखा है। इसमें एथेनॉल के लिए भेजी जाने वाली 24 लाख टन चीनी शामिल नहीं है।

फेडरेशन का अनुमान है कि 1 अक्टूबर 2026 से शुरू होने वाले सीजन में शुरुआती स्टॉक 35 लाख टन रहेगा। देश की औसत मासिक खपत करीब 22 लाख टन है। नवंबर तक नई पेराई शुरू होने से सप्लाई और बढ़ने की उम्मीद है। नाइकनवरे ने कहा कि फिलहाल घबराहट जैसी कोई स्थिति नहीं दिख रही।

सरकार की सख्ती के बाद कीमतें घटीं

यह बयान ऐसे समय आया है, जब केंद्रीय खाद्य सचिव संजीव चोपड़ा ने हाल ही में चीनी उद्योग पर कीमतें बढ़ाने और स्टॉक जमा करने का आरोप लगाया था। इसके बाद सरकार ने कई कदम उठाए।

  • मिलों के स्टॉक का भौतिक सत्यापन
  • व्यापारियों पर 200 टन की स्टॉक सीमा
  • बड़े खरीदारों के लिए अलग सीमा
  • राज्यों में गोदामों की जांच
  • फ्लाइंग स्क्वॉड की तैनाती

नाइकनवरे ने बताया कि शनिवार को खुले टेंडरों में एक्स-मिल चीनी के दाम करीब ₹5 प्रति किलो गिर गए। उनका मानना है कि अगले हफ्ते भी कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।

दुनिया में चीनी सस्ती क्यों हुई?

दिलचस्प बात यह रही कि भारत के आयात के ऐलान के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्ची चीनी महंगी होने के बजाय सस्ती हो गई। कीमत पहले 18 सेंट प्रति पाउंड तक गई, लेकिन बाद में गिरकर करीब 17.50 सेंट प्रति पाउंड रह गई।

नाइकनवरे का कहना है कि वैश्विक सप्लाई फिलहाल आरामदायक स्थिति में है। इसी वजह से भारत के 10 लाख टन आयात का अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर बड़ा असर नहीं पड़ा।

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