क्या है भारत की आर्थिकी का इंजन?

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बेसिक सवाल है! इस सप्ताह रिजर्व बैंक के ब्याज दर फैसले, शेयर बाजार, जीडीपी की हवाबाजी, लुढ़कते रुपए, भारत से भागती पूंजी जैसे तथ्यों से बेसिक सवाल है कि तब देश की आर्थिकी भला चल कैसे रही है? वह प्लेटफॉर्म पर खड़ी है या वह उस छुक-छुक इंजन से बंधी है जो भाप छोड़ रहा है पर न कोयला है न बॉयलर में भभकती आग है?

आप भी सोचें, भारत के हर बंदे को सोचना चाहिए कि आखिर भारत की आर्थिकी के पहियों का मौजूदा इंजन है क्या?

पहले देश विशेष की ताक़त उसकी फ़ौज, कारखानों और खेतों से मापी जाती थी। अब पैसे से है। मतलब पूंजी, कमाई, बचत, श्रीवृद्धि, लक्ष्मी की चंचलता प्राथमिक कसौटी (वैश्विक भी) है। इस मायने में भारत की रियलिटी क्या है? क्या यह रियलिटी नहीं है कि देश के अमीर, देश की बुद्धि भारत छोड़ विदेश जा बस रही है? क्या यह खबर नहीं है कि विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) भारतीय शेयर बाजार से पूंजी निकाल कर दूसरे देशों के बाजारों में निवेश कर रहे हैं? मतलब भारत का शेयर बाजार जोखिम भरा, कम कमाई का है वही इंडोनेशिया हो या तुर्किये, आसियान देश वैश्विक पूंजी के लिए इसलिए कमाई वाले हैं क्योंकि इन देशों की इकोनॉमी सचमुच तेजी से बढ़ती हुई है।

सोचें, सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में अप्रैल-जून 2026 में वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.8 प्रतिशत थी, जबकि सकल मूल्य वर्धन (GVA) की बढ़ोतरी 8.2 प्रतिशत। सात अक्टूबर को रिज़र्व बैंक ने पूरे वित्त वर्ष 2026-27 की विकास दर का अनुमान बढ़ा कर 7.1 प्रतिशत किया। अब यदि भारत की वास्तविक अर्थव्यवस्था 7.8 प्रतिशत बढ़ रही है, तो उसकी करेंसी, रुपया और शेयर बाज़ार क्यों लगातार कमजोर होता हुआ है? गुरूवार को सेंसेक्स फिर भारी गिरा। तथ्य है कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने वर्ष 2026 में अब तक लगभग 30.4 अरब डॉलर के भारतीय शेयर बेचे है। अकेले अक्टूबर के शुरुआती नौ दिनों में लगभग 47,000 करोड़ रुपए के भारतीय शेयरों को विदेशियों ने बेचा।

दुनिया के किसी भी पैमाने पर यह मामूली उतार-चढ़ाव नहीं है। सो, सीधा सवाल है एक तरफ भारत में उत्पादन बढ़ने के सरकारी आंकड़े हैं, वहीं विदेशी निवेशक भारत की कंपनियों के भविष्य को लेकर घबराए हुए हैं, उनके शेयर बेच भाग रहे हैं? ऐसे ही भारत की करेंसी विदेशी बाजार में कौड़ियों वाली हैसियत में है। इस वर्ष डॉलर के मुक़ाबले रुपए का मूल्य सात प्रतिशत से अधिक गिर चुका है।

सरकारी दावा है कि आर्थिकी की रेलगाड़ी तेज़ विकास, डिजिटल अर्थव्यवस्था, रिकॉर्ड जीएसटी संग्रह, कंक्रीटों में नजर आते बुनियादी ढांचे से दुनिया की सर्वाधिक तेज़ बुलेट ट्रेन है। वहीं रियलिटी में गाड़ी प्लेटफॉर्म पर छुक-छुक करते हुए है। बाज़ार की हकीकत, भारतीय करेंसी के घटते भाव, विदेशी पूंजी के भागने, अब नई ऊंची ब्याज दर, महंगा तेल-ईंधन, महंगे कर्ज व व्यापारियों, अमीरों का भागना या हाथ पर हाथ धरे बैठे होना है।

कह सकते हैं कि खेती, आईटी कंपनियां, सेवा क्षेत्र, मेक इन इंडिया के कारखानों की भाप से आर्थिकी का इंजन सरपट भागता हुआ है। पर खेती यदि खुशहाल होती तो किसानों के पेट नहीं भरे होते! किसान तब दो-दो हजार रुपए की प्रधानमंत्री की रेवड़ी पर टकटकी लगाए उसका इंतजार क्या करते हुए होते? सब्जी बाजार, आटे-तेल के दाम क्या आम आदमी का जीना हराम ऐसा किए हुए होते जो रिजर्व बैंक को महंगाई के हवाले ब्याज दर बढ़ाने का फैसला करना पड़ता? ऐसी ही आईटी कंपनियों, सेवा क्षेत्र की कंपनियों के शेयर बाजार में लुढ़कने का औसत है। भारत की आईटी कंपनियों की अमेरिका में हुई एआई क्रांति से लुटिया डूबती हुई है। इन कंपनियों में ही निवेशित पूंजी सर्वाधिक भाग रही है। और मेक इन इंडिया या इंफ्रास्ट्रक्चर की तो बात ही नहीं होनी चाहिए। अंबानी हो, अडानी हो, एयरलाइंस सेक्टर हो या टेक्सटाइल सेक्टर या बैंकिंग सब महंगाई बढ़ा रहे हैं या बांग्लादेश, वियतनाम, आसियान देशों से पिट रहे हैं या आर्थिकी का कर्जा बढ़ा रहे हैं। बट्टेखाते में भारत की पूंजी, बचत वैसे ही जा रही है जैसे शेयर बाजार के चक्कर में मध्यवर्गीय नौकरीपेशा नौजवानों ने म्यूचुअल फंड (एसआईपी) के जरिए अपनी बचत को शेयर बाज़ार में उड़ेला, जबकि खर्चों के लिए कर्ज लेकर अपने आपको ब्याज (जो महंगा होना ही है) के चक्रव्यूह में फंसाया।

सो, पूंजी देशी (कभी भारत में घर-परिवार रिकॉर्ड बचत किया करते थे) हो या विदेशी वह भारत की इकोनॉमी को दौड़ाती हुई नहीं है। न ही भारत की उत्पादकता (यदि होती तो चीन के आयातों पर क्या खतरनाक स्तर पर आश्रित होते?) का इंजन है। तो ले देकर पैसे की मालिक या तो सरकार, उसके खर्च और बाबुओं का भ्रष्टाचार है या सरकारी कृपाओं के क्रोनी खरबपति याकि अडानी-अंबानी जैसे देशी जगत सेठ हैं। इन सबकी ऊर्जा के इंजन का नाम क्या है? 140 करोड़ लोगों का पेट! हां, भारत के 140 करोड़ लोगों की बुनियादी भूख, जीने का संघर्ष ही 2026 की इंडियन इकोनॉमी की वह छुक-छुक रेलगाड़ी है, जिसमें फर्स्ट क्लास, मिडिल क्लास के कुछ डिब्बे हैं बाकी तो भूखे पेटों की आग, उसके हाथ-पांव मार कर जीने की जिजीविषा है!

क्या नहीं?

विदेश में लुढ़कता रुपया पर भारत में महंगा!

सात अक्टूबर को रिज़र्व बैंक ने रेपो दर 5.25 से बढ़ा कर 5.50 प्रतिशत कर दी। मतलब भारतीयों के लिए ब्याज दर बढ़ाई। जबकि कल, गुरुवार को प्रति डॉलर, रुपया 96.78 पर था। मेरा मानना है साल के आखिर तक यह रेट सौ पार होगी। अंतर देखें, विडंबना समझें कि जिस रुपए को भारतीय नागरिक कर्ज़ लेकर इस्तेमाल करता है, वह महंगा हो रहा है। जबकि उसी रुपए की अंतरराष्ट्रीय ख़रीद-शक्ति लगातार घटती हुई है। बतौर उदाहरण समझें किसी परिवार ने 50 लाख रुपए का घर कर्ज़ 20 वर्ष के लिए लिया है। यदि ब्याज 8.5 से बढ़ कर 8.75 प्रतिशत हो जाए और शेष अवधि 20 वर्ष हो, तो मासिक किस्त लगभग 43,391 रुपए से बढ़ कर 44,186 रुपए होगी। यानी लगभग 795 रुपए हर महीने बढ़ेगी।

ठीक दूसरी तरफ उसी परिवार का बच्चा यदि विदेश में पढ़ रहा हो तो डॉलर के महंगे होने से उसकी पढ़ाई और रहन-सहन का खर्च भी बढ़ेगा। मतलब एक ही परिवार पर घरेलू ब्याज और विदेशी मुद्रा, दोनों का दोतरफा दबाव।

ऐसी इकोनॉमी का एक और सत्य कि एक तरफ़ सरकार विकास, निवेश और विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की हवाबाजी कर रही है। वहीं रिज़र्व बैंक को रुपए को सहारा देने के लिए घरेलू ब्याज दर बढ़ानी पड़ रही है। इतना ही नहीं भागती विदेशी पूंजी से विदेशी मुद्रा कोष में घटते डॉलर या तेल आयात में डॉलर की आवश्यकता के तकाजे में भारत सरकार (रिज़र्व बैंक) ने प्रवासी भारतीयों से अधिक आकर्षक ब्याज दरों के साथ डॉलर का कलेक्शन किया है।

हां, यह फैसला इसी 2026 का है। इससे पहले ऐसा आपातकालीन निर्णय 1991 के भुगतान संकट में हुआ था। उसके बाद 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद तथा 2013 में रुपए पर दबाव बढ़ने की सूरत में एफसीएनआर (बी) जमा योजना के कदम से उठा था। जबकि आज सरकार का यह घर-घर पहुंचा नैरेटिव है कि भारत विकसित हो रहा है। दौड़ रहा है। सबको पछाड़ दिया केवल अमेरिका व चीन को पछाड़ना बाकी है, जिन्हें मोदीजी 2047 में पछाड़ देंगे।

गौर करें तथ्यों पर। आठ जून 2026 को रिज़र्व बैंक ने विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए विशेष एफसीएनआर (बी) स्वैप सुविधा शुरू की। कैसे एनआरआई भारतीयों को ललचाया? भारतीय बैंकों को प्रवासी भारतीयों से तीन से पांच वर्ष की विदेशी करेंसी, डॉलर जमा आकर्षित करने की स्कीम दी गई। ब्याज की सामान्य सीमा में छूट, ज्यादा ब्याज देने और रिज़र्व बैंक ने संबंधित विदेशी करेंसी जोखिम की हेजिंग लागत उठाने की व्यवस्था करके।

नतीजतन कुछ बैंकों ने तो डॉलर जमा कराने के लिए जमा दरें लगभग छह से सात प्रतिशत तक की। सरकार ने 24 अगस्त को घोषणा की कि लगभग ग्यारह सप्ताह में 73 अरब डॉलर भारतीय बैंकों ने जुटाए। इनमें 65.4 अरब डॉलर एफसीएनआर (बी) डिपॉजिट एकत्र हुई। मतलब भारत का विदेशी मुद्रा कोष भरा। हिसाब से इससे भारत का रुपया मजबूत होना चाहिए। जब भारत के पास करेंसी रिजर्व है तब रुपया क्यों लुढ़के? विदेशी निवेशकों का भी भरोसा बनना या लौटना चाहिए था।

लेकिन विदेशियों ने याकि दुनिया ने भारत के शेयर बाजार (इकोनॉमी) को जस का तस भारी जोखिम का ठिकाना माने रखा। उनका पैसा निकालना थमा ही नहीं। परिणाम क्या है? कोई 133 अरब डॉलर के बड़े विदेशी मुद्रा जमा जुटाने के बाद भी रुपया अक्टूबर में 97 प्रति डॉलर के करीब है?

जाहिर है विदेशी संस्थागत निवेशकों का भारत पर भरोसा लौट नहीं रहा। सरकार, रिज़र्व बैंक कितना ही दम लगा लें अपने आयात बिल, महंगा तेल, वैश्विक ब्याज दरें, दुनिया की दूसरी इकोनॉमी (भले वे भारत जैसे फुलाए विकास आंकड़े न दें) के ठोस विकास का जवाब नहीं दे सकते। भारत और भारतीय कंपनियों की कमाई को साल-डेढ़ साल से वैश्विक निवेशक तौलते-तौलते उस मुकाम पर पहुंच चुके हैं, जिससे खोखलापन जगजाहिर है। तभी दुनिया के नंबर एक खरबपति (जिसकी बात, उत्पादकता, सनक का हर शब्द दुनिया सुनती है) इलॉन मस्क ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर कल भारत से पूछा, ‘क्या अंबानी भारत के असली बॉस हैं? भारत के कुछ बड़े बिजनेसमैन नहीं चाहते कि स्टारलिंक का सेटेलाइट इंटरनेट भारत आए, ताकि उनका एकछत्र राज बना रहे। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि वे कौन हैं…’। मस्क ने अपनी पोस्ट में यह भी लिखा कि यह भारत के लोगों के खिलाफ एक अपराध है।

महंगाई दर भी आंकड़ों की बाजीगरी

भारतीय रिजर्व बैंक ने ब्याज दर यानी रेपो रेट करीब 44 महीने के बाद की है। बीते 44 महीनों में ब्याज दर या तो स्थिर रही या उसमें कमी की गई। लंबे समय से रेपो रेट 5.25 फीसदी पर स्थिर था, जिसे बढ़ा कर 5.50 फीसदी कर दिया गया है। मौद्रिक नीति समिति यानी एमपीसी की दोमासिक बैठक के बाद जब रेपो रेट बढ़ाने की घोषणा हुई तो मामला सिर्फ 0.25 फीसदी की बढ़ोतरी पर रुक नहीं गया, बल्कि सूत्रों के हवाले से और विशेषज्ञों के आकलन के आधार पर दावा किया गया कि रेपो रेट में अभी और बढ़ोतरी होगी। यहां तक कहा गया कि इसमें एक फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है। अगली बैठक दिसंबर में है और उस समय 0.50 फीसदी बढ़ोतरी की बात कही जा रही है।

रेपो रेट बढ़ने और आगे बढ़ते रहने की खबरों का बहुत बड़ा असर गुरुवार, आठ अक्टूबर को शेयर बाजार पर पड़ा। बीएसई का संवेदी सूचकांक एक हजार अंक से ज्यादा गिर गया। निवेशकों के लाखों करोड़ रुपए एक दिन में डूब गए वैसे पिछले नौ हफ्ते से लगातार शेयर बाजार गिर रहा है और करीब 20 लाख रुपए की बाजार पूंजी स्वाहा होने की खबर है।

बहरहाल, रिजर्व बैंक ने रेपो रेट में जो बढ़ोतरी की उसका आधार यह था कि महंगाई बढ़ रही है। सवाल है कि महंगाई कितनी बढ़ रही है? सरकार के आंकड़ों में तो महंगाई इतनी नहीं बढ़ी है कि उसे नियंत्रित करने के लिए रेपो रेट बढ़ाना पड़े!

खुदरा महंगाई का सबसे ताजा आंकड़ा अगस्त है। अगस्त के महीने में खुदरा महंगाई 4.82 फीसदी रही, जो जुलाई में 4.45 फीसदी थी। यह सरकारी आंकड़ा है। सोचें, रिजर्व बैंक ने खुद चार फीसदी की औसत महंगाई दर बनाए रखने का लक्ष्य तय किया। उसके दो से छह फीसदी का लक्ष्य बनाया है। यानी अधिकतम छह फीसदी तक महंगाई होती है तो काम चल सकता है। उससे ज्यादा होने पर मुश्किल होगी। उसके हिसाब से औसत महंगाई चार फीसदी तक रहे तो ठीक है। फिर 4.45 फीसदी या 4.82 फीसदी की महंगाई दर को पैनिक होने की स्थिति नहीं मान सकते हैं। इसका अर्थ है कि इन आंकड़ों से अलग असली आंकड़ा कुछ और है। महंगाई के सरकारी आंकड़ों से अलग असली महंगाई वह है, जिसे लोग महसूस कर रहे हैं पर सरकार बता नहीं रही है।

असली महंगाई की बात करें तो वह सरकार के आंकड़ों से बहुत ज्यादा है। बरसात खत्म हो गई है फिर प्याज की कीमतें 70 रुपए किलो से कम नहीं हैं। यह स्थिति तब है, जब सरकार सस्ता प्याज बिकवाने की बात कर रही है। इसी तरह 31 अक्टूबर तक सरकार ने शुल्क मुक्त चीनी के आयात की अनुमति दी थी फिर भी चीनी की कीमत 70 रुपए किलो से कम नहीं हो रही है। ईंधन की महंगाई चरम पर है। पेट्रोल, डीजल और सीएनजी की कीमतें बेहिसाब बढ़ी हैं, जिससे माल ढुलाई बहुत महंगा हुआ है और खाने पीने की सारी चीजों की कीमत बढ़ गई है। इसके बावजूद महंगाई का आंकड़ा 4.82 फीसदी बताते है। यह हाथी के दिखाने के दांत हैं। असली महंगाई इससे कहीं ज्यादा है। यह वैसे ही है जैसे गर्मियों में बताया जाता है कि तापमान 45 डिग्री है, लेकिन महसूस होने वाला तापमान 52 डिग्री या उससे ज्यादा है। असल में महसूस होने वाली गर्मी कई दूसरे फैक्टर पर निर्भर करती है। वैसे ही महसूस होने वाली महंगाई अलग है और सरकार का आंकड़ा अलग है।

यह इसलिए भी हुआ क्योंकि सरकार ने महंगाई के आकलन का तरीका भी बदल दिया है। अब 2024 की नई सीरीज के आधार पर महंगाई का आकलन हो रहा है। सरकार ने बड़ी होशियारी से खुदरा महंगाई के बास्केट में खाने पीने की चीजों का वजन कम कर दिया। खुदरा महंगाई का आकलन करने वाली पुरानी सीरीज में खाने और पीने की चीजों का वजन 45.86 फीसदी होता था। नई सीरीज में इसे घटा कर 35.75 फीसदी कर दिया है। यानी 11 फीसदी से ज्यादा की कमी की गई है।

सोचें, जिन वस्तुओं का सबसे ज्यादा उपभोग है और जिन वस्तुओं की कीमतें अलग अलग सीजन में अलग अलग कारणों से बहुत बढ़ती रहती है उनके वजन में इतनी बडी कटौती कर दी गई। जाहिर है इससे महंगाई की दर पहले के मुकाबले कम दिखाई देगी। लेकिन लोगों को ज्यादा महसूस होगी क्योंकि खाने पीने की चीजों की कीमतें तो बेतहाशा बढ़ रही हैं। हालांकि भले सरकार इस महसूस होने वाली महंगाई का आंकड़ा नहीं बता रही है लेकिन उसको पता है और इसलिए रेपो रेट में बढ़ोतरी हुई है।

Gold Price Today: सोना हुआ और महंगा, दिल्ली में ₹150720 पर 24 कैरेट; वैश्विक कीमत एक सप्ताह में 1.3% मजबूत

देश में सोने की कीमत में तेजी बरकरार है। 10 अक्टूबर की सुबह राजधानी दिल्ली में 24 कैरेट गोल्ड की कीमत 150870 रुपये प्रति 10 ग्राम है। मुंबई में भाव 150720 रुपये प्रति 10 ग्राम है। एक दिन पहले दिल्ली के सराफा बाजार में 99.9 प्रतिशत शुद्धता वाले सोने की कीमत 1,900 रुपये बढ़ी। डॉलर में गिरावट से निवेशकों की धारणा मजबूत होने के कारण सोने की कीमत में तेजी रही।

सोने और चांदी की देश के अंदर कीमतें डोमेस्टिक फैक्टर्स के साथ-साथ ग्लोबल फैक्टर्स से भी प्रभावित होती हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में हाजिर सोना 4,194.36 डॉलर प्रति औंस पर है। एक सप्ताह में वैश्विक बाजार में सोने की कीमत 1.3 प्रतिशत मजबूत हुई है।

मिरे एसेट शेयरखान में कमोडिटी मामलों के प्रमुख प्रवीण सिंह का मानना है कि आने वाले समय में सोने की कीमत सीमित दायरे में रह सकती है और इनमें मामूली तेजी बनी रह सकती है। हालांकि, उन्होंने आगाह किया कि तेल की कीमतों में अचानक तेजी आने से सोने की कीमतों पर दबाव पड़ सकता है।

देश के कुछ बड़े शहरों में गोल्ड रेट

दिल्ली में सोने की कीमत: दिल्ली में 24 कैरेट सोने की कीमत 150870 रुपये प्रति 10 ग्राम है। 22 कैरेट का भाव 138310 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

मुंबई और कोलकाता: मुंबई और कोलकाता में 22 कैरेट सोने की कीमत 138160 रुपये प्रति 10 ग्राम, जबकि 24 कैरेट सोने की कीमत 150720 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

चेन्नई में सोने की कीमत: 24 कैरेट सोने की कीमत 150720 रुपये प्रति 10 ग्राम है। 22 कैरेट का भाव 138160 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

पुणे और बेंगलुरु में कीमत: इन दोनों शहरों में 24 कैरेट गोल्ड की कीमत 150720 रुपये प्रति 10 ग्राम और 22 कैरेट गोल्ड की कीमत 138160 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

शहर22 कैरेट सोने का आज का भाव (₹)24 कैरेट सोने का आज का भाव (₹)
दिल्ली138310150870
मुंबई138160150720
अहमदाबाद138210150770
चेन्नई138160150720
कोलकाता138160150720
हैदराबाद138160150720
जयपुर138310150870
भोपाल138210150770
लखनऊ138310150870
चंडीगढ़138310150870

FD Rates Hike: सीनियर सिटीजन्स को FD पर मिल रहा 8.50% तक ब्याज, जानें ₹10 लाख फिक्स करने पर कितनी होगी कमाई

चांदी का भाव

दूसरी कीमती धातु चांदी की कीमत में गिरावट है। 10 अक्टूबर की सुबह चांदी 234900 रुपये प्रति किलोग्राम पर है। एक दिन पहले दिल्ली के सराफा बाजार में चांदी में 4,500 रुपये की तेजी दर्ज की गई। इस साल जनवरी में चांदी की कीमत 4 लाख रुपये प्रति किलोग्राम के रिकॉर्ड हाई पर पहुंच गई थी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में हाजिर चांदी यानि कि स्पॉट सिल्वर की कीमत 60.77 डॉलर प्रति औंस है।

Amazon Sale में iPhone 16 और iPhone 17e पर भारी छूट, कूपन और बैंक ऑफर से होगी ज्यादा बचत

Amazon Great Indian Festival Sale 2026: अगर आप कम कीमत में iPhone खरीदने की सोच रहे हैं, तो Amazon का Great Indian Festival Sale 2026 आपके लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। दरअसल, इस सेल में iPhone 16 और iPhone 17e पर जबरदस्त डील दी जा रही है। ऐसे में अगर आप पहली बार iPhone खरीदना चाहते हैं या अपना पुराना iPhone बदलकर नया मॉडल लेना चाहते हैं, तो ये दोनों फोन आपके लिए अच्छे विकल्प हो सकते हैं। आइए जानते हैं कि Amazon की इस सेल में इन दोनों iPhone को कितनी कम कीमत पर खरीदा जा सकता है।

Amazon Great Indian Festival 2026: iPhone की सबसे अच्छी डील्स

iPhone 16 का 128GB वाला मॉडल अभी Amazon पर ₹76,999 में मिल रहा है, जबकि इसकी MRP ₹89,900 है। अगर आप Prime मेंबर हैं और ₹500 का कूपन इस्तेमाल करते हैं, तो इसकी कीमत और कम होकर ₹72,249 हो सकती है।

Amazon के अतिरिक्त पेमेंट ऑफर के साथ आप iPhone 16 पर थोड़ी और बचत कर सकते हैं। इनमें चुनिंदा SBI क्रेडिट कार्ड पर ₹1,250 तक का बैंक डिस्काउंट और Amazon Pay Balance के जरिए ₹3,849 तक का कैशबैक शामिल है। अगर आप पेमेंट को किश्तों में करना चाहते हैं, तो कुछ क्रेडिट कार्ड पर नो-कॉस्ट EMI की सुविधा भी मिलती है, जिससे ₹2,161.81 तक के ब्याज की बचत हो सकती है। असल फायदे आपके कार्ड, पेमेंट के तरीके और एलिजिबिलिटी पर निर्भर करेंगे, इसलिए ऑर्डर करने से पहले लिस्टिंग पर मौजूद ऑफर जरूर देख लें।

अगर आप नया मॉडल खरीदना चाहते हैं, तो Amazon Great Indian Festival Sale 2026 में iPhone 17e के 256GB वेरिएंट पर भी छूट मिल रही है। इस फोन की MRP 79,900 रुपये है, लेकिन Amazon पर इसे 71,999 रुपये में खरीदा जा सकता है। इसके अलावा, 1,000 रुपये का कूपन लगाने पर इसकी कीमत घटकर 70,999 रुपये हो जाती है।

iPhone 17e खरीदने पर भी पेमेंट से जुड़े कई ऑफर्स का फायदा मिल सकता है। योग्य SBI क्रेडिट कार्ड से पेमेंट करने पर 1,250 रुपये तक का बैंक डिस्काउंट मिल सकता है। वहीं, Amazon Pay ICICI Bank क्रेडिट कार्ड से नो-कॉस्ट EMI का विकल्प चुनने पर ब्याज में 1,876.99 रुपये तक की बचत हो सकती है।

इसके अलावा, Amazon Pay Balance के जरिए 3,599 रुपये तक का कैशबैक भी मिल सकता है। हालांकि, इन ऑफर्स का लाभ आपकी पात्रता और पेमेंट के तरीके पर निर्भर करेगा।

बता दें कि स्मार्टफोन की कीमतें बढ़ने के बीच ये डील्स आपके लिए फायदेमंद हो सकती हैं। खासकर iPhone के कई मॉडल अब भी काफी महंगे हैं। ऐसे में अगर आप पहली बार iPhone खरीदने या अपना पुराना फोन अपग्रेड करने की सोच रहे हैं, तो iPhone 16 और iPhone 17e पर मिल रहे ये ऑफर आपके बजट में नया फोन खरीदने का अच्छा मौका दे सकते हैं।

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FD Rates Hike: सीनियर सिटीजन्स को FD पर मिल रहा 8.50% तक ब्याज, जानें ₹10 लाख फिक्स करने पर कितनी होगी कमाई

FD Rate Hike: भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने बुधवार, 7 अक्टूबर को अपनी बैठक में रेपो रेट को 25 बेसिस पॉइंट्स बढ़ाकर 5.25 प्रतिशत से 5.50 प्रतिशत कर दिया है। इस फैसले के बाद बैंकों द्वारा अपनी फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) की ब्याज दरों में संशोधन करने की उम्मीद है।

विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ बैंक आरबीआई की नीति घोषणा के कुछ दिनों के भीतर अपनी एफडी दरों में संशोधन कर सकते हैं, जबकि अन्य को ऐसा करने में कई हफ्ते लग सकते हैं।

यह समय काफी हद तक प्रत्येक बैंक की फंडिंग आवश्यकताओं और लिक्विडिटी की स्थिति पर निर्भर करता है। विभिन्न बैंकों की दरों की तुलना करना और सही अवधि चुनना जोखिम को कम रखते हुए ब्याज आय को अधिकतम करने में मदद कर सकता है।

विभिन्न बैंकों में वरिष्ठ नागरिकों को मिल रही उच्चतम FD ब्याज दरें

1. स्मॉल फाइनेंस बैंक

  • इक्विटास स्मॉल फाइनेंस बैंक: 8.50% तक
  • ईएसएएफ स्मॉल फाइनेंस बैंक: 8.50% तक
  • सूर्योदय स्मॉल फाइनेंस बैंक: 8.50% तक
  • जना स्मॉल फाइनेंस बैंक: 8.30% तक
  • उज्जीवन स्मॉल फाइनेंस बैंक: 8.30% तक
  • शिवालिक स्मॉल फाइनेंस बैंक: 8.25% तक
  • उत्कर्ष स्मॉल फाइनेंस बैंक: 8.25% तक
  • एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक: 7.90% तक
  • स्लाइस स्मॉल फाइनेंस बैंक: 7.75% तक

2. प्राइवेट सेक्टर के बैंक

  • डीसीबी बैंक: 8.00% तक
  • बंधन बैंक: 7.95% तक
  • एसबीएम बैंक इंडिया: 7.80% तक
  • एक्सिस बैंक: 7.25% तक
  • कोटक महिंद्रा बैंक: 7.15% तक
  • एचडीएफसी बैंक: 7.10% तक
  • आईसीआईसीआई बैंक: 7.10% तक
  • आईडीबीआई बैंक: 7.05% तक

3. सरकारी बैंक

  • बैंक ऑफ इंडिया: 7.45% तक
  • बैंक ऑफ बड़ौदा: 7.25% तक
  • इंडियन ओवरसीज बैंक: 7.10% तक
  • पंजाब नेशनल बैंक: 7.10% तक
  • स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI): 7.05% तक
  • यूनियन बैंक ऑफ इंडिया: 7.05% तक

4. विदेशी बैंक

  • स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक: 7.10% तक
  • ड्यूश बैंक: 7.00% तक
  • एचएसबीसी बैंक: 6.00% तक

₹10 लाख की FD पर 3 और 5 साल में कितनी होगी कमाई?

अगर आप ₹10 लाख की राशि को 3 साल या 5 साल की अवधि के लिए फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) करते हैं, तो 8.5%, 8% और 7.5% की ब्याज दरों पर मिलने वाला कुल ब्याज और मैच्योरिटी अमाउंट काफी आकर्षक हो जाता है।

3 साल की अवधि के लिए ₹10 लाख का निवेश करने पर 8.5% ब्याज दर के हिसाब से आपको करीब ₹2,77,289 का ब्याज मिलेगा। अगर ब्याज दर 8% है, तो कुल ब्याज ₹2,59,712 होगा, और 7.5% की दर पर 3 साल में आपको ₹2,42,297 का ब्याज प्राप्त होगा।

वही अगर आप लंबे समय यानी 5 साल के लिए ₹10 लाख फिक्स करते हैं, तो कंपाउंडिंग का फायदा और ज्यादा बढ़कर मिलता है। 8.5% की उच्चतम ब्याज दर पर 5 साल में आपको सीधे ₹5,03,656 का ब्याज मिलेगा, जिससे आपका पैसा बढ़कर ₹15,03,656 हो जाएगा। 8% ब्याज दर पर 5 साल का कुल ब्याज ₹4,69,328 (कुल मैच्योरिटी: ₹14,69,328) बनता है, जबकि 7.5% की दर पर 5 साल में ₹4,35,629 की कमाई ब्याज से होगी (कुल मैच्योरिटी: ₹14,35,629)।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Market Outlook : बाजार में दिखी जोरदार तेजी, जानिए 12 अक्टूबर को कैसी रह सकती है इसकी चाल

Market Outlook : शुक्रवार को भारतीय शेयर बाज़ार में ज़बरदस्त तेज़ी देखने को मिली है। क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) के बाद सेंसेक्स 879 अंक यानी 1.23%) बढ़कर 72,472 पर और निफ्टी 289 अंक यानी 1.30% बढ़कर 22,520 पर बंद हुआ। बाज़ार का रुख पॉजिटिव रहा। 2,344 शेयरों में बढ़त हुई जबकि 1,686 शेयरों में गिरावट आई। सेक्टर के हिसाब से देखें तो IT सेक्टर में सबसे ज़्यादा 3.02% की तेज़ी रही, जबकि FMCG में 2.25% और PSU बैंकों में 1.62% की बढ़त दर्ज की गई। मिडकैप शेयरों में 1.46% और स्मॉलकैप शेयरों में 0.55% की बढ़त हुई, वहीं इंडिया VIX में 6.09% की गिरावट आई। TCS, ITC और अपोलो हॉस्पिटल्स में से हर एक में 4% से ज़्यादा की बढ़त हुई और ये निफ्टी में सबसे ज़्यादा बढ़त वाले शेयरों में शामिल रहे।

जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के हेड ऑफ़ रिसर्च, विनोद नायर का कहना है कि हाल ही में आई भारी गिरावट के बाद, वैल्यू बाइंग और शॉर्ट कवरिंग के दम पर घरेलू इक्विटी मार्केट में राहत भरी रैली देखने को मिली। Q2 अर्निंग्स सीज़न की मज़बूत शुरुआत और AI-आधारित रेवेन्यू के मौकों पर बढ़ते भरोसे के कारण IT शेयरों ने बेहतर प्रदर्शन किया। ईरान के ख़िलाफ़ किसी भी संभावित अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के मिड-टर्म चुनावों से पहले होने की संभावना कम होने के संकेतों से भू-राजनीतिक चिंताएं कम हुईं। इससे कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आई और बाज़ार के सेंटीमेंट में सुधार हुआ। हालांकि, लगातार हो रही FII की बिकवाली और ग्लोबल बॉन्ड यील्ड में तेजी, रिकवरी की उम्मीदों पर दबाव बनाए हुए है। RBI के ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ (सोच-समझकर सख्ती) के रुख के बाद, निवेशक अब ब्याज दरों की चाल के बारे में और संकेतों के लिए सोमवार को आने वाले घरेलू CPI डेटा का इंतज़ार कर रहे हैं। आगे चलकर, Q2 के नतीजे (जिसके सालाना आधार पर अच्छा रहने का अनुमान है) बाज़ार में आई तेज़ी के बने रहने के लिहाज़ से अहम होंगे।

LKP सिक्योरिटीज के सीनियर टेक्निकल एनालिस्ट रूपक डे का कहना है कि आज शुक्रवार को निफ्टी में अच्छी रिकवरी दिखी और इसमें 1% से ज़्यादा की बढ़त हुई। हालांकि, यह 22,600 के आसपास बने 50EMA के लेवल को पार नहीं कर पाया। अगर इंडेक्स 22,600–22,650 के रेजिस्टेंस ज़ोन के ऊपर जाता है तो शॉर्ट-टर्म ट्रेंड में सुधार हो सकता है और रिकवरी जारी रह सकती है। लेकिन, अगर यह इस ज़ोन को पार नहीं कर पाता है, तो बाज़ार में फिर से कमज़ोरी आ सकती है। निचले स्तर पर इसके लिए 22,450, 22,350 और 22,100 पर सपोर्ट हैं।

360 ONE वेल्थ की प्रेसिडेंट अनु जैन ने एक अहम टेक्निकल गड़बड़ी की ओर इशारा करते हुए कहा कि मार्केट अपने 200 वीक के मूविंग एवरेज (जो एक लॉन्ग-टर्म सपोर्ट लेवल है) से नीचे आ गया है। इससे पता चलता है कि एडजस्टमेंट का दौर अभी और चल सकता है। या तो कीमतें और गिर सकती हैं या फिर लंबे समय तक कंसोलिडेशन का दौर रह सकता है। इससे पता चलता है कि अभी और मुश्किल दौर आ सकता है। टेक्निकल इंडीकेटर बताते हैं कि बाजार में अभी और गिरावट की गुंजाइश है।

बजाज ऑल्ट्स की ग्रुप प्रेसिडेंट (इन्वेस्टमेंट्स) और मैनेजिंग डायरेक्टर और CEO लक्ष्मी अय्यर ने हाल में आई गिरावट को मार्केट में बनी अस्वाभाविक तेजी ज़रूरी सफ़ाई बताते हुए कहा है कि मोमेंटम इंडिकेटर कमज़ोर हुए हैं और मार्केट के मज़बूत स्थिति में आने से पहले निवेशकों को और उतार-चढ़ाव के लिए तैयार रहना चाहिए। अय्यर ने मौजूदा दौर की तुलना समुद्र मंथन से करते हुए कहा क पहले ज़हर मिलेगा, लेकिन आपको अमृत का इंतज़ार करना होगा। यानी असल वैल्यू सामने आने से पहले उथल-पुथल का दौर देखने को मिलेगा।

अभी हर जगह वैल्यूएशन की स्थिति सही नहीं है। अय्यर ने कहा कि वैल्यूएशन अब धीरे-धीरे सही स्तर की ओर बढ़ रहे हैं और बाज़ार के कुछ हिस्सों में ये लंबे समय के औसत से नीचे आ गए हैं। लार्ज-कैप की वैल्यूएशन ठीक लग रही है, लेकिन कई सालों की ज़बरदस्त री-रेटिंग के बाद मिड-कैप और स्मॉल-कैप में अभी भी बहुत ज़्यादा राहत की गुंजाइश नहीं दिख रही है।

उन्होंने आगे कहा कि मिड कैप स्टॉक लार्जकैप के मुकाबले 55-60% प्रीमियम पर ट्रेड कर रहे हैं और स्मॉल-कैप में भी लगभग इतना ही प्रीमियम मिल रहा है। फिर भी, उनका कहना है कि कई मिड साइज़ कंपनियों की अर्निंग में मज़बूती बनी हुई है, इसलिए यह बिना सोचे-समझे खरीदारी करने के बजाय सोच-समझकर निवेश करने वालों का बाज़ार है। यह स्टॉक पिकर्स) का बाज़ार है।

नुवामा एसेट मैनेजमेंट के प्रेसिडेंट और हेड, अंशु कपूर की राय है कि ग्लोबल इन्वेस्टर्स के लिए भारत अभी भी पसंदीदा मार्केट नहीं है, क्योंकि दूसरे मार्केट में तुलनात्मक रूप से बेहतर मौके मिल रहे हैं। उनका कहना यह नहीं है कि भारत का स्ट्रक्चरल आकर्षण खत्म हो गया है, बल्कि यह है कि मार्केट में उतार-चढ़ाव की वजह से निकट भविष्य में कुछ और मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।

 

डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

Gold Silver Price: MCX पर सोने-चांदी में बढ़त, क्या आज की तेजी हालिया गिरावट को करेगी खत्म, एक्सपर्ट्स से जानें अब क्या करें निवेश

Gold Silver Price: घरेलू वायदा बाजार में सोने और चांदी की कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में आई तेजी, US ट्रेजरी यील्ड में कमी और कमजोर डॉलर से कीमतों को सपोर्ट मिला है । हालांकि, महंगाई की चिंताएं और US फेडरल रिजर्व के ब्याज दरों को लेकर नजरिया निवेशकों के लिए अहम बातें बनी हुई हैं।

मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर, दिसंबर गोल्ड फ्यूचर्स ₹1,690 या 1.13% बढ़कर ₹1.51 लाख प्रति 10 ग्राम हो गया। दिसंबर सिल्वर फ्यूचर्स ₹3,626 या 1.64% बढ़कर ₹2.24 लाख प्रति किलोग्राम हो गया।

PTI के अनुसार, इंटरनेशनल बाजारों में गोल्ड फ्यूचर्स 1.43% बढ़कर $4,191.51 प्रति औंस हो गया, जबकि सिल्वर फ्यूचर्स 2.16% बढ़कर $60.44 प्रति औंस हो गया।

कीमतों में तेजी क्यों?

शुक्रवार को US ट्रेजरी यील्ड में कमी और डॉलर में गिरावट से कीमती धातुओं को सहारा मिला। सोने पर कोई ब्याज नहीं मिलता है, इसलिए जब बॉन्ड यील्ड बढ़ती है तो यह कम आकर्षक होता है और जब यील्ड कम होती है तो यह अधिक आकर्षक हो जाता है।

आनंद राठी शेयर एंड स्टॉक ब्रोकर्स में कमोडिटीज और करेंसी की रिसर्च एनालिस्ट वेदिका नार्वेकर ने कहा कि US में 30 साल के ट्रेजरी बॉन्ड की नीलामी से लॉन्ग-टर्म यील्ड ऊंचे स्तरों से नीचे आ गई, जिससे सोने की कीमतों को राहत मिली।

उन्होंने ईरान पर संभावित हमले को टालने और बातचीत को प्रोडक्टिव बताने के बारे में US राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टिप्पणियों के बाद तेल की कीमतों में नरमी का भी जिक्र किया। तेल की कीमतें बुलियन मार्केट के लिए मायने रखती हैं क्योंकि एनर्जी की लागत महंगाई की उम्मीदों और ब्याज दरों के फैसलों पर असर डाल सकती है।

निवेश की मांग से भी अतिरिक्त सहारा मिला है। नार्वेकर ने कहा कि इस हफ्ते ग्लोबल गोल्ड ETF होल्डिंग्स में 0.3% की बढ़ोतरी हुई, जिससे उनकी बढ़त लगातार 12वें हफ्ते भी जारी रह सकती है। सेंट्रल बैंक की खरीदारी से भी सहारा मिला है।

क्या सोना अपनी रिकवरी बनाए पाएगा?

सोना $4,100 प्रति औंस के स्तर से सुधरा है, जिसे नार्वेकर ने एक अहम सपोर्ट लेवल बताया था। हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि अगर महंगाई की चिंताएं बनी रहती हैं, तो यह तेजी कम समय के लिए हो सकती है। उन्होंने $4,220 प्रति औंस (जो घरेलू स्तर पर लगभग ₹1,52,000 के बराबर है) के आसपास तुरंत रेजिस्टेंस और $4,300 प्रति औंस (या लगभग ₹1,55,400) के पास मज़बूत रेजिस्टेंस की पहचान की।

VT मार्केट्स के सीनियर मार्केट एनालिस्ट (APAC) जस्टिन खू ने कहा कि सितंबर की फेडरल ओपन मार्केट कमेटी की मीटिंग के मिनट्स से पता चला है कि 18 में से 16 अधिकारियों को उम्मीद थी कि 2026 में ब्याज दरों में और बढ़ोतरी होगी, ताकि महंगाई को फेडरल रिज़र्व के 2% के लक्ष्य से लगातार ऊपर जाने से रोका जा सके।

हालांकि, खू ने कहा कि उम्मीद से कम पर्सनल कंजम्पशन एक्सपेंडिचर (PCE) महंगाई और कमज़ोर रोज़गार डेटा ने अक्टूबर में तुरंत ब्याज दरें बढ़ने की संभावना को कम कर दिया है। 14 अक्टूबर को आने वाली सितंबर की US कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) रिपोर्ट से महंगाई और फेड के अगले कदम के बारे में और संकेत मिलेंगे।

ब्याज दरें बढ़ने से सोने पर दबाव पड़ सकता है क्योंकि इससे बिना रिटर्न देने वाली एसेट को रखने की अपॉर्चुनिटी कॉस्ट बढ़ जाती है। इसलिए, निवेशक महंगाई के डेटा और बॉन्ड यील्ड पर नज़र रखेंगे ताकि यह पता चल सके कि शुक्रवार की रिकवरी जारी रह सकती है या नहीं।

चांदी में निवेश के लिए किन बातों का रखें ध्यान

शुक्रवार को चांदी की कीमतों में भी तेज़ी आई, लेकिन इसकी कीमतों में उतार-चढ़ाव ज़्यादा हो सकता है क्योंकि यह मेटल निवेश की मांग और औद्योगिक इस्तेमाल, दोनों से प्रभावित होता है।

Giottus.com के CEO विक्रम सुब्बुराज ने ₹2.19 लाख–₹2.20 लाख प्रति किलोग्राम को एक अहम सपोर्ट ज़ोन और ₹2.24 लाख को चांदी के रिकवर करने के लिए पहला ज़रूरी लेवल बताया। शुक्रवार की तेज़ी ने कॉन्ट्रैक्ट को उस लेवल से ऊपर पहुंचा दिया।

गुरुवार (8 अक्टूबर) को कीमतों में इंट्राडे के दौरान जो तेज़ी से उतार-चढ़ाव देखे गए, वे भी अस्थिरता के जोखिम को दिखाते हैं। रिकवरी के दौरान चांदी में तेज़ी से उछाल आ सकता है, लेकिन निवेशकों को उतनी ही तेज़ी से गिरावट की संभावना को भी ध्यान में रखना चाहिए।

रुपये का घरेलू कीमतों पर क्या असर पड़ सकता है?

भारत में सोने और चांदी की कीमतें न केवल अंतरराष्ट्रीय दरों पर, बल्कि रुपये-डॉलर एक्सचेंज रेट पर भी निर्भर करती हैं। रुपया कमज़ोर होने से डॉलर में कीमत वाली चीज़ों को आयात करने की लागत बढ़ जाती है और इससे घरेलू कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है। लेमन (Lemonn) में रिसर्च हेड गौरव गर्ग ने कहा कि रुपये की कमजोरी से इम्पोर्ट की गई चीज़ों की घरेलू लागत बढ़ रही है। 9 अक्टूबर के उनके मार्केट अपडेट में यह भी बताया गया कि डॉलर की मजबूती में कमी कीमती धातुओं के लिए मददगार साबित हो रही है, जबकि तेल बाज़ार में अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है।

अब निवेशकों को क्या करना चाहिए?

सिर्फ़ शुक्रवार की बढ़त से यह साबित नहीं होता कि बुलियन (सोने-चांदी) में हालिया कमजोरी खत्म हो गई है। सोने के लिए, अहम सपोर्ट लेवल से ऊपर बने रहना और नार्वेकर द्वारा बताए गए रेजिस्टेंस लेवल को पार करना ज़रूरी होगा। चांदी में निवेश करने वालों को इसके सपोर्ट ज़ोन और कीमतों में होने वाले बड़े उतार-चढ़ाव पर खास ध्यान देना चाहिए।

जो लोग योजना बनाकर फिजिकल सोना खरीद रहे हैं, वे एक ही ट्रेडिंग सेशन के आधार पर फैसला लेने के बजाय समय के साथ-साथ खरीदारी करने पर विचार कर सकते हैं। जो निवेशक गोल्ड और सिल्वर ETF का इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें अपने पोर्टफोलियो एलोकेशन, निवेश की अवधि और उतार-चढ़ाव सहने की क्षमता का आकलन करना चाहिए।

Silver Price Today: ₹2700 और महंगी हुई चांदी, खरीदारी से पहले जानें आपके अपने शहर का ताजा भाव

(डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए विचार एक्सपर्ट के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदाई नहीं है। यूजर्स को मनी कंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले सार्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

EPF vs NPS: हर महीने ₹10,000 का निवेश, 30 साल में कहां तेजी से बढ़ेगा आपका पैसा? समझिए पूरा गणित

EPF vs NPS Return Calculation: रिटायरमेंट के लिए अगले 30 सालों तक हर महीने ₹10,000 का योगदान देना एक बड़ा और सुरक्षित कॉर्पस तैयार कर सकता है। लेकिन कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) और नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) में से कौन सा विकल्प आपको अधिक रिटर्न देगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपका पैसा किस तरह इन्वेस्ट और ग्रो हो रहा है।

EPF जहां सरकार द्वारा हर वित्त वर्ष घोषित की जाने वाली निश्चित ब्याज दर पर काम करता है, वहीं NPS का पैसा बाजार से जुड़े एसेट्स जैसे- शेयर बाजार, कॉर्पोरेट बॉन्ड्स और सरकारी प्रतिभूतियों में लगाया जाता है।

अगर आप बिना किसी वार्षिक बढ़ोतरी के 30 सालों तक हर महीने ₹10,000 का योगदान करते हैं, तो आपकी कुल जमा राशि ₹36 लाख होगी। आइए दोनों विकल्पों के गणित और नियमों को विस्तार से समझते हैं:

EPF का गणित: सुरक्षित और निश्चित ब्याज का विकल्प

सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए EPF पर 8.25% की ब्याज दर तय की है। अगर हम पूरे 30 सालों के लिए 8.25% की औसत वार्षिक ब्याज दर मानकर चलें, तो हर महीने ₹10,000 का निवेश बढ़कर लगभग ₹1.57 करोड़ हो जाएगा।

वैसे यह 8.25% का रिटर्न गारंटीड नहीं है, क्योंकि EPF की ब्याज दरें हर साल सरकार द्वारा संशोधित की जाती हैं। हालांकि, इसका रिटर्न दैनिक बाजार के उतार-चढ़ाव से पूरी तरह सुरक्षित रहता है।

NPS का गणित: बाजार की ताकत और कंपाउंडिंग

NPS में कोई फिक्स रिटर्न की गारंटी नहीं होती। इसमें आपका पैसा आपकी पसंद के अनुसार इक्विटी, कॉर्पोरेट बॉन्ड्स और सरकारी सिक्योरिटीज में बांटा जाता है। ‘एक्टिव चॉइस’ के तहत आप इक्विटी में 75% तक एक्सपोजर ले सकते हैं। बाजार से जुड़े होने के कारण NPS का कॉर्पस EPF की तुलना में काफी अलग और बड़ा हो सकता है।

10% वार्षिक रिटर्न पर: अगर NPS पर औसतन 10% का सालाना रिटर्न मिलता है, तो आपका ₹10,000 का मासिक निवेश 30 साल में बढ़कर लगभग ₹2.26 करोड़ हो जाएगा।

9% वार्षिक रिटर्न पर: अगर रिटर्न 9% रहता है, तो कुल कॉर्पस लगभग ₹1.83 करोड़ बनेगा।

(नोट: पेंशन फंड नियामक PFRDA के अनुसार, NPS का अंतिम फंड बाजार के प्रदर्शन, आपके द्वारा चुने गए एसेट एलोकेशन और एन्युटी खरीदारी के प्रतिशत पर निर्भर करता है।)

रिटायर्मेंट पर पैसे निकालने के नियम: EPF और NPS का अंतररिटायर्मेंट के समय

जमा राशि निकालने के मामले में EPF और NPS के नियम बिल्कुल अलग हैं। EPF मुख्य रूप से एक नियोक्ता से जुड़ा बचत ढांचा है, जिसमें 58 साल की उम्र में रिटायरमेंट पर जमा हुई पूरी 100% राशि एकमुश्त निकाली जा सकती है। इसके अलावा, नौकरी के दौरान घर खरीदने, बच्चों की शिक्षा, शादी या बीमारी जैसी विशेष जरूरतों के लिए शर्तों के तहत आंशिक निकासी का विकल्प भी मिलता है।

दूसरी ओर, NPS एक स्वतंत्र और फ्लेक्सिबल पेंशन खाता है, जो रिटायरमेंट पर नियमित आय देने के उद्देश्य से डिजाइन किया गया है। NPS के नियमों के तहत रिटायरमेंट के समय कुल कॉर्पस का अधिकतम 60% हिस्सा ही एकमुश्त निकाला जा सकता है, जबकि कम से कम 40% राशि से एन्युटी खरीदना अनिवार्य होता है ताकि जीवनभर पेंशन मिलती रहे। इसमें भी गंभीर बीमारी या बच्चों की उच्च शिक्षा/शादी जैसी विशेष परिस्थितियों में सीमित आंशिक निकासी की अनुमति दी जाती है।

टैक्स छूट और नियम

EPF पर टैक्स: EPF मुख्य रूप से EEE (Exempt-Exempt-Exempt) श्रेणी में आता है। हालांकि, अगर कर्मचारी का सालाना योगदान ₹2.5 लाख से अधिक होता है, तो उस अतिरिक्त योगदान पर मिलने वाला ब्याज टैक्स के दायरे में आता है।

NPS पर टैक्स: धारा 80C के तहत ₹1.5 लाख की सीमा के अलावा, NPS में धारा 80CCD (1B) के तहत ₹50,000 की अतिरिक्त टैक्स छूट मिलती है। रिटायर्मेंट के समय निकाली गई 60% एकमुश्त राशि पूरी तरह टैक्स-फ्री होती है।

आपके लिए कौन सा विकल्प बेहतर है?

केवल आंकड़ों की तुलना करें, तो 10% रिटर्न के अनुमान के साथ NPS (₹2.26 करोड़) EPF (₹1.57 करोड़) से बाजी मार लेता है। लेकिन इस अतिरिक्त रिटर्न के साथ बाजार का जोखिम भी जुड़ा हुआ है।

वैसे आप बिना किसी जोखिम के सुरक्षित रिटर्न चाहते हैं, तो EPF बेहतर है। अगर आप लंबी अवधि के लिए बाजार का जोखिम उठाकर अधिक वेल्थ बनाना चाहते हैं, तो NPS सही विकल्प है।

दोनों का कॉम्बिनेशन भी बढ़िया विकल्प है। नौकरीपेशा कर्मचारियों के लिए यह ‘EPF या NPS’ का चुनाव नहीं है। PFRDA के नियमों के अनुसार, आप EPF के साथ-साथ अलग से NPS खाता भी चला सकते हैं।

रिटायरमेंट प्लानिंग करते समय सिर्फ बड़े आंकड़े न देखें, यह भी देखें कि आप कितना मार्केट रिस्क ले सकते हैं, आपको रिटायरमेंट से पहले कितनी लिक्विडिटी चाहिए और क्या आप नियमित पेंशन चाहते हैं।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

मौद्रिक समाधान काफी नहीं

चुनौतियों की वजह अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति शृंखला भंग होने तथा अर्थव्यवस्था की कमजोरियों में छिपी हो, तो मौद्रिक नीति जैसे बैंड-एड नाकाफी साबित होते हैं, जबकि उनके साइड इफेक्ट्स से नई दिक्कतें सामने आती हैं। 

फिलहाल ब्याज दरों में 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ भारतीय रिजर्व बैंक ने मौद्रिक नीति के मामले में अपना रुख “न्यूट्रल” से बदलकर “कैलिब्रेटेड टाइटनिंग” कर दिया है। इसका अर्थ है कि आगे ब्याज दर स्थिर रहेगी या बढ़ेगी, लेकिन यह घटेगी नहीं। फिलहाल संभावना यही है कि इस वित्त वर्ष में ब्याज दर और बढ़ेगी। पश्चिम एशिया के युद्ध से उपजे ऊर्जा एवं कमोडिटी संकट और धनी देशों में बॉन्ड ब्याज दर बढ़ने से दरपेश चुनौतियों के बीच रिजर्व बैंक के पास इसके अलावा शायद ही कोई और चारा है। भारत में अब ब्याज दर 5.5 प्रतिशत होने के बाद उम्मीद जताई गई है कि यहां से हो रहे पूंजी पलायन को रोकने में कुछ सहायता मिलेगी। ऐसा हुआ तो रुपये की गिरती कीमत को संभालना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।

लेकिन बुधवार को ब्याज दर में वृद्धि के एलान के बावजूद रुपया पांच महीने के निचले स्तर तक गिर गया। स्पष्टतः नई मौद्रिक नीति भी रुपये को सहारा देने के लिहाज से पर्याप्त साबित नहीं हुई। जबकि नई नीति से महंगाई और बढ़ सकती है। खुद आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने अगली तीन तिमाहियों में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई दर के औसतन लगभग 5.8 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है। अगस्त में ये दर पांच फीसदी थी। नई दर की घोषणा के बाद शेयर बाजार में ऑटो एवं उपभोक्ता सामग्री से जुड़ी कंपनियों और प्रॉपर्टी जैसे क्षेत्रों के शेयरों पर उलटा असर पड़ा।

दरअसल, ऊंची ब्याज दर के कारण कार, घर और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे महंगे सामानों के लिए ऋण लेना महंगा हो जाएगा। इससे अनेक ग्राहकों की खरीदारी क्षमता प्रभावित होगी। इस कदम का खराब असर कच्चे माल (जैसे तांबा, स्टील), परिवहन भाड़ा और ए.सी., टीवी, फ्रिज जैसी वस्तुओं के दाम पर भी पड़ सकता है। ये सामान 5-8 प्रतिशत तक और महंगे हो सकते हैं। तो कुल सूरत बिगड़ेगी। दरअसल, जब चुनौतियों की वजह अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति शृंखला के भंग होने तथा अर्थव्यवस्था की मूलभूत कमजोरियों में छिपी हो, तो मौद्रिक नीति जैसे बैंड-एड नाकाफी साबित होते हैं, जबकि इनके साइड इफेक्ट्स से नई दिक्कतें सामने आ जाती हैं।