12 साल बाद बदला PF का नियम! जानिए ₹10,000, ₹20,000 और ₹25,000 से ज्यादा सैलरी वालों पर क्या पड़ेगा असर?

EPFO Wage Ceiling Hike Update: केंद्र सरकार ने संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों को बीते दिनों एक बड़ा तोहफा दिया। सरकार ने EPFO के तहत अनिवार्य कवरेज के लिए वेज सीलिंग को ₹15,000 से बढ़ाकर ₹25,000 प्रति माह कर दिया है। 17 सितंबर से लागू हुए इस फैसले से देश के करीब 51 लाख से अधिक नए कर्मचारियों को सीधे तौर पर पीएफ, पेंशन और बीमा का फायदा मिलने लगेगा।

12 साल बाद हुए इस बड़े बदलाव से आपकी टेक-होम सैलरी, पीएफ फंड और पेंशन पर क्या असर पड़ेगा? आइए आसान भाषा में समझते हैं कि आपकी सैलरी ब्रैकेट के हिसाब से इस फैसले के क्या मायने हैं।

अगर आपकी बेसिक सैलरी ₹10,000 है, तो क्या बदलेगा?

जवाब: कुछ नहीं बदलेगा।

जिन कर्मचारियों की बेसिक सैलरी ₹15,000 से कम थी, वे पुराने नियमों के तहत भी EPFO के दायरे में अनिवार्य रूप से आते थे। इसलिए ₹10,000 कमाने वाले कर्मचारियों के लिए इस नियम से कोई नया बदलाव नहीं हुआ है। उनके पीएफ खाते और टेक-होम सैलरी में पहले की तरह ही कटौती जारी रहेगी।

अगर आपकी बेसिक सैलरी ₹20,000 है, तो क्या होगा?

जवाब: सबसे बड़ा फायदा इसी ग्रुप को मिलेगा।

पुराना नियम: सितंबर 2014 के नियम के मुताबिक, अगर कोई नया कर्मचारी ₹20,000 की बेसिक सैलरी पर कंपनी जॉइन करता था, तो वह ₹15,000 की सीमा से ऊपर होने के कारण पीएफ के अनिवार्य दायरे से बाहर रहता था।

नया नियम: अब वेज सीलिंग ₹25,000 हो जाने के कारण ₹20,000 कमाने वाला हर नया कर्मचारी अनिवार्य रूप से पीएफ, कर्मचारी पेंशन योजना (EPS) और कर्मचारी जमा सहबद्ध बीमा (EDLI) के दायरे में आएगा।

असर: आपकी इन-हैंड सैलरी में से पीएफ कटेगा, जिससे हाथ में आने वाला पैसा तो थोड़ा कम हो सकता है, लेकिन आपके रिटायरमेंट के लिए बड़ा फंड और पेंशन सुरक्षा पक्की हो जाएगी।

अगर आपकी बेसिक सैलरी ₹25,000 से अधिक है, तो क्या असर पड़ेगा?

जवाब: टेक-होम सैलरी कम होगी, लेकिन पीएफ फंड तेजी से बढ़ेगा।

जो कर्मचारी पहले से ही पीएफ के सदस्य हैं और जिनकी पीएफ कटौती अब तक ₹15,000 की वैधानिक सीमा पर कैप्ड थी:

पुराना पीएफ योगदान: 12% ऑफ ₹15,000 = ₹1,800 प्रति माह

नया पीएफ योगदान: 12% ऑफ ₹25,000 = ₹3,000 प्रति माह

यानी आपकी इन-हैंड सैलरी से हर महीने ₹1,200 ज्यादा पीएफ कटेगा। इससे हर महीने बैंक अकाउंट में आने वाली सैलरी थोड़ी कम होगी, लेकिन आपके पीएफ खाते में हर महीने ज्यादा पैसा जमा होगा, जिस पर आपको 8% से ज्यादा की दर से चक्रवृद्धि ब्याज का फायदा मिलेगा।

सरकार ने 12 साल बाद क्यों लिया यह फैसला?

पिछली बार पीएफ वेज सीलिंग को सितंबर 2014 में संशोधित किया गया था। पिछले 12 वर्षों में न्यूनतम वेतन और कर्मचारियों की औसत आय में भारी बढ़ोतरी हुई है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में भारत में एक नियमित वेतनभोगी कर्मचारी की औसत सैलरी करीब ₹23,000 प्रति माह पहुंच चुकी है, और कई राज्यों में न्यूनतम वेतन भी ₹15,000 के पार जा चुका है। ऐसे में पुराना ₹15,000 का कट-ऑफ व्यावहारिक नहीं रह गया था। इसी खाई को पाटने के लिए सरकार ने इसे बढ़ाकर ₹25,000 किया है।

अक्सर कर्मचारियों को टेक-होम सैलरी कम होने पर थोड़ा मलाल होता है, लेकिन पीएफ की वेज सीलिंग बढ़ना एक बेहद पॉजिटिव कदम है। अनिवार्य पीएफ कटौती बढ़ने से न सिर्फ कर्मचारियों की बचत करने की आदत मजबूत होगी, बल्कि कर्मचारी पेंशन योजना (EPS) के तहत मिलने वाली पेंशन का आधार भी बड़ा हो जाएगा। यदि आपकी सैलरी ₹15,000 से ₹25,000 के बीच है, तो यह बदलाव आपके सुरक्षित भविष्य और रिटायरमेंट प्लानिंग की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगा।

25 हजार रु प्रति माह वेतन तक पीएफ

नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के तहत अनिवार्य सामाजिक सुरक्षा के लिए वेतन सीमा 15,000 रुपये से बढ़ाकर 25,000 रुपये प्रति माह करने को मंजूरी दे दी है। सरकार के अनुसार इस फैसले से 51 लाख से अधिक अतिरिक्त कर्मचारी ईपीएफओ के अनिवार्य दायरे में आ सकते हैं। नई सीमा 17 सितंबर, 2026 से लागू होगी।

सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बुधवार को मंत्रिमंडल के फैसले की जानकारी देते हुए कहा कि भविष्य निधि कटौती के लिए अब 25,000 रुपये प्रति माह वेतन की नई सीमा होगी। इससे 51 लाख से अधिक अतिरिक्त कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था के दायरे में लाया जा सकेगा।

श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के अनुसार संशोधित वेतन सीमा 17 सितंबर यानी विश्वकर्मा पूजा के दिन से प्रभावी होगी।

ईपीएफओ की वेतन सीमा में 12 साल बाद बदलाव हुआ है। वर्ष 2004 से 2014 के बीच यह सीमा अपरिवर्तित रही थी। सितंबर 2014 में इसे 6,500 रुपये से बढ़ाकर 15,000 रुपये प्रति माह किया गया था। उसके बाद से इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ।

सरकार का कहना है कि पिछले वर्षों में वेतन और आय में लगातार बढ़ोतरी हुई है। संगठित क्षेत्र में रोजगार का भी विस्तार हुआ है। कई राज्यों और क्षेत्रों में न्यूनतम वेतन मौजूदा 15,000 रुपये की सीमा के करीब या उससे ऊपर पहुंच गया है। इसे देखते हुए वेतन सीमा बढ़ाकर 25,000 रुपये करने का फैसला किया गया।

इस फैसले पर सालाना करीब 11,339 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च आने का अनुमान है। मौजूदा वार्षिक बजटीय सहायता करीब 10,250 करोड़ रुपये है। पांच वर्षों में अनुमानित खर्च करीब 56,696 करोड़ रुपये होगा।

सरकार के अनुसार इससे अधिक कर्मचारियों को कर्मचारी भविष्य निधि यानी ईपीएफ के तहत बचत, कर्मचारी पेंशन योजना यानी ईपीएस के तहत पेंशन और कर्मचारी जमा संबद्ध बीमा योजना यानी ईडीएलआई के तहत बीमा सुरक्षा मिलेगी। साथ ही भविष्य निधि अंशदान और पेंशन योग्य वेतन की व्यवस्था को मौजूदा वेतन स्तर के अधिक अनुरूप बनाया जा सकेगा।

अभी 15,000 रुपये से अधिक मासिक वेतन पर नौकरी शुरू करने वाला नया कर्मचारी स्वतः ईपीएफ के अनिवार्य दायरे में नहीं आता। सीमा बढ़ने के बाद 15,000 से 25,000 रुपये मासिक वेतन पाने वाले कर्मचारियों का बड़ा वर्ग अनिवार्य सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था में शामिल हो जाएगा।

श्रम एवं रोजगार मंत्री मनसुख मांडविया ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर कहा कि मंत्रिमंडल का फैसला देश के श्रमिकों को व्यापक सामाजिक सुरक्षा देने के साथ संगठित क्षेत्र में रोजगार को भी गति देगा।

उन्होंने कहा कि 17 सितंबर को विश्वकर्मा पूजा और सेवा दिवस का अवसर है और यह फैसला उसी दिन से लागू होगा। ईपीएफओ दुनिया की सबसे बड़ी सामाजिक सुरक्षा व्यवस्थाओं में से एक का संचालन करता है। इसके तहत ईपीएफ, ईपीएस और ईडीएलआई योजनाएं चलती हैं।

ईपीएफओ के ताजा आंकड़ों के अनुसार करीब 7.98 करोड़ सदस्य लगभग 7.68 लाख प्रतिष्ठानों से जुड़े हैं। ईपीएस के तहत करीब 82 लाख पेंशनधारकों को पेंशन मिलती है, जबकि ईडीएलआई ईपीएफ सदस्यों को बीमा सुरक्षा उपलब्ध कराता है।

EPF Passbook: क्या आपकी कंपनी हर महीने जमा कर रही है PF? जानिए घर बैठे पासबुक चेक करने का तरीका और नियम

EPF Passbook Checking Rules: अक्सर नौकरीपेशा लोग हर महीने अपनी सैलरी स्लिप में पीएफ कटने की एंट्री देखकर निश्चिंत हो जाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि सैलरी स्लिप में पीएफ काटना इस बात की 100% गारंटी नहीं है कि आपकी कंपनी ने वह पैसा कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) में जमा भी कर दिया है?

इसीलिए हर 2-3 महीने में एक बार अपनी ई-पासबुक चेक करना बेहद जरूरी है। पासबुक से यह साफ हो जाता है कि आपके यूनिवर्सल अकाउंट नंबर (UAN) के तहत कर्मचारी और कंपनी दोनों का हिस्सा समय पर जमा हो रहा है या नहीं।

आइए आसान भाषा में समझते हैं कि पासबुक में क्या-क्या चेक करना चाहिए, पैसा जमा होने की समयसीमा क्या है और गड़बड़ी मिलने पर क्या कदम उठाना चाहिए।

अपनी पासबुक में क्या-क्या जांचना जरूरी है?

अपनी सैलरी स्लिप और ई-पासबुक को आमने-सामने रखकर इन चीजों का मिलान करें:

मंथली एंट्री: अगर आपकी अप्रैल महीने की सैलरी से पीएफ कटा है, तो पासबुक में अप्रैल का कंट्रीब्यूशन दिखना चाहिए।

तीनों हिस्से जांचें: पासबुक में केवल अपना अंशदान न देखें, बल्कि कंपनी का अंशदान और पेंशन फंड (EPS) का हिस्सा भी जरूर चेक करें।

गड़बड़ी का नुकसान: अगर अभी कोई गलती रह जाती है, तो आगे चलकर जॉब बदलते समय, पीएफ ट्रांसफर करते समय या रिटायरमेंट के वक्त पेंशन क्लेम करने में बड़ी रुकावट आ सकती है।

महीने की किस तारीख तक जमा होना चाहिए PF का पैसा?

15 तारीख का नियम: नियमानुसार, कंपनियों को कर्मचारियों की सैलरी से काटा गया पीएफ और अपना हिस्सा, महीना खत्म होने के 15 दिनों के भीतर (जैसे अप्रैल का पीएफ 15 मई तक) EPFO के पास जमा कराना अनिवार्य होता है।

तकनीकी देरी: अगर सैलरी आते ही तुरंत पासबुक में एंट्री न दिखे तो घबराएं नहीं। कई बार प्रोसेसिंग या सर्वर की वजह से एंट्री अपडेट होने में कुछ दिनों का समय लग जाता है।

अलर्ट रहें: लेकिन अगर बाद के महीनों की एंट्री दिखने लगे और किसी पुराने महीने की एंट्री गायब रहे, तो समझ जाएं कि कोई गड़बड़ी है।

ऑनलाइन EPF Passbook कैसे चेक करें? (3 आसान तरीके)

आप घर बैठे 3 तरीकों से अपना पीएफ बैलेंस और पासबुक चेक कर सकते हैं:

EPFO मेंबर पासबुक पोर्टल: EPFO की आधिकारिक वेबसाइट पर UAN और पासवर्ड के जरिए लॉगिन करें और संबंधित मेंबर आईडी चुनकर पासबुक देखें।

Passbook Lite: EPFO ने सदस्यों की सुविधा के लिए ‘पासबुक लाइट’ फीचर भी दिया है, जहां जमा-निकासी और बैलेंस का एक आसान समरी व्यू मिलता है।

UMANG App: अपने स्मार्टफोन में उमंग ऐप डाउनलोड करके भी पासबुक और बैलेंस चेक किया जा सकता है।

इस बात का ध्यान दें कि अगर आपने कई नौकरियां बदली हैं, तो एक ही UAN के तहत आपकी अलग-अलग मेंबर आईडी होंगी। जिस कंपनी का रिकॉर्ड देखना हो, उसी की मेंबर आईडी सिलेक्ट करें।

जॉब बदलते समय UAN और डिटेल्स का रखें ध्यान

नई कंपनी जॉइन करते समय नया UAN बनवाने के बजाय अपना पुराना UAN ही एचआर (HR) को दें। साथ ही यह सुनिश्चित करें कि आपके पीएफ रिकॉर्ड में आपका नाम, जन्मतिथि और पहचान से जुड़े दस्तावेज (KYC) पूरी तरह मैच करते हों। इससे पुराना पीएफ बैलेंस नई कंपनी के खाते में आसानी से ट्रांसफर हो जाता है।

अगर पीएफ का पैसा जमा न हुआ हो तो क्या करें?

स्टेप 1: अपनी सैलरी स्लिप चेक करें और थोड़ा प्रोसेसिंग टाइम दें।

स्टेप 2: अगर फिर भी जमा राशि न दिखे, तो अपनी कंपनी के पेरोल या HR विभाग से तुरंत संपर्क करें।

स्टेप 3: अगर कंपनी आपकी सैलरी से पीएफ काट रही है लेकिन EPFO में जमा नहीं कर रही, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी कंपनी की होती है। ऐसी कंपनियों के खिलाफ EPFO सख्त कानूनी कार्रवाई कर सकता है।

रिटायरमेंट या नौकरी छोड़ते वक्त पीएफ का पैसा रुकने से बेहतर है कि आप सतर्क रहें। हर 2-3 महीने में सिर्फ 5 मिनट निकालकर अपनी ई-पासबुक चेक करने की आदत डालें ताकि किसी भी गड़बड़ी को शुरुआती स्टेज में ही ठीक कराया जा सके।

क्या आपकी SIP उम्मीद से कम रिटर्न दे रही? ये 5 कारण हो सकते हैं जिम्मेदार

हर महीने SIP में पैसा जा रहा है, लेकिन जब पोर्टफोलियो देखते हैं तो रिटर्न उम्मीद के मुताबिक नहीं दिखता। ऐसे में कई निवेशक सोचने लगते हैं कि कहीं फंड का चुनाव ही गलत तो नहीं था। लेकिन कम रिटर्न के पीछे सिर्फ फंड जिम्मेदार नहीं होता। निवेश की अवधि से लेकर बाजार की चाल तक कई चीजें इसका असर डालती हैं।

1. SIP को पूरा समय नहीं मिला

SIP का फायदा लंबे समय में ज्यादा साफ दिखाई देता है। अगर आपने कुछ महीने या 1-2 साल पहले निवेश शुरू किया है तो रिटर्न कम या निगेटिव भी दिख सकता है। खासकर इक्विटी फंड में बाजार के उतार-चढ़ाव का असर जल्दी दिखाई देता है। इसलिए छोटी अवधि के रिटर्न को देखकर तुरंत फैसला लेने से बचना चाहिए।

2. बाजार का दौर कमजोर रहा

SIP बाजार से जुड़ा निवेश है। बाजार में गिरावट आती है तो पोर्टफोलियो का रिटर्न भी प्रभावित होता है। हालांकि, गिरते बाजार में SIP जारी रहने से एक फायदा होता है। आपकी तय रकम से ज्यादा यूनिट खरीदी जाती हैं। बाजार में तेजी लौटने पर ये यूनिट रिटर्न बढ़ाने में मदद कर सकती हैं।

3. फंड का चुनाव सही नहीं रहा

हर म्यूचुअल फंड एक जैसा प्रदर्शन नहीं करता। कई निवेशक पिछले साल के शानदार रिटर्न को देखकर फंड चुन लेते हैं। बाद में प्रदर्शन कमजोर पड़ सकता है। इसलिए सिर्फ रिटर्न देखकर फंड चुनना सही तरीका नहीं है। बेंचमार्क, कैटेगरी के दूसरे फंड और लंबे समय के प्रदर्शन को भी देखना चाहिए।

4. SIP की रकम कम है

कई बार समस्या रिटर्न की नहीं, निवेश की रकम की होती है। अगर आपका लक्ष्य बड़ा है लेकिन SIP छोटी है तो अच्छा रिटर्न मिलने के बावजूद अंतिम कॉर्पस उम्मीद से कम रह सकता है। ऐसे में आय बढ़ने के साथ SIP में भी धीरे-धीरे बढ़ोतरी करना यानी Step-up SIP मददगार हो सकता है।

5. बाजार गिरते ही SIP रोक देना

बाजार में गिरावट देखकर SIP बंद करना आम गलती है। इससे कम कीमत पर यूनिट खरीदने का मौका छूट जाता है। इसी तरह बाजार तेजी में आने पर दोबारा निवेश शुरू करना भी सही रणनीति नहीं हो सकती। SIP का फायदा नियमित निवेश और लंबे समय तक बने रहने से मिलता है।

कम रिटर्न दिखे तो क्या करें?

सबसे पहले देखें कि SIP कितने समय से चल रही है। फिर फंड के प्रदर्शन की तुलना उसके बेंचमार्क और समान कैटेगरी के फंडों से करें। अगर बाजार कमजोर है लेकिन आपका फंड अपनी कैटेगरी के मुकाबले ठीक प्रदर्शन कर रहा है, तो सिर्फ कम रिटर्न देखकर SIP बंद करने की जरूरत नहीं है।

वहीं, अगर फंड लंबे समय से लगातार कमजोर प्रदर्शन कर रहा है तो पोर्टफोलियो की समीक्षा जरूर करनी चाहिए। SIP में धैर्य जरूरी है, लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि खराब फंड को हमेशा पकड़े रहें।

EPF Calculator: पीएफ से भी बनाया जा सकता है एक करोड़ रुपये का फंड! जानिए इसके लिए मंथली कितना करना होगा इन्वेस्टमेंट

Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।

EPF Withdrawal: इन 5 वजहों के लिए कभी भी निकाल सकते हैं PF से पैसा! जानिए किस काम के लिए कितनी है लिमिट

EPF Partial Withdrawal Rules: कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) अपने करोड़ों मेंबर्स को आपात स्थिति या जीवन के बड़े लक्ष्यों को पूरा करने के लिए पीएफ खाते से एडवांस पैसे निकालने की सुविधा देता है। मेडिकल इमरजेंसी हो, बच्चों की पढ़ाई, शादी या फिर सपनों का घर खरीदना EPFO ने अब इन सभी जरूरतों के लिए नियम बेहद साफ और पारदर्शी बना दिए हैं।

अगर आप भी अपने पीएफ खाते से पैसे निकालने का प्लान बना रहे हैं, तो जानिए वे कौन सी 5 खास वजहें हैं जिनके लिए आप एडवांस ले सकते हैं, और किस काम के लिए आपको कितनी बार पैसे निकालने की इजाजत मिलती है।

PF Withdrawal इन 5 वजहों से पीएफ से निकाल सकते हैं एडवांस

EPFO की आधिकारिक गाइडलाइंस के मुताबिक, आप इन 5 कारणों के लिए अपने पीएफ खाते से आंशिक निकासी कर सकते हैं:

PF Withdrawal इन 5 वजहों से पीएफ से निकाल सकते हैं एडवांस

किस जरूरत के लिए क्या हैं नियम? समझिए विस्तार से

1. बीमारी के इलाज के लिए: खुद के या परिवार के किसी सदस्य के इलाज के लिए पीएफ से पैसा निकालने पर कोई सीमा नहीं तय की गई है। गंभीर बीमारी या मेडिकल इमरजेंसी में सदस्य जब चाहे, नियमों के तहत पीएफ एडवांस का दावा कर सकता है।

2. पढ़ाई के खर्च के लिए: खुद की या बच्चों/परिवार के सदस्यों की उच्च शिक्षा के खर्चों को पूरा करने के लिए पीएफ सदस्य अपनी पूरी सर्विस अवधि के दौरान 10 बार तक एडवांस क्लेम कर सकते हैं।

3. शादी के खर्च के लिए: अपनी शादी या बच्चों और भाई-बहन की शादी के खर्चों के लिए पीएफ खाते से पैसा निकाला जा सकता है। यह सुविधा पूरी मेंबरशिप के दौरान अधिकतम 5 बार उपलब्ध है।

4. मकान और प्रॉपर्टी से जुड़ी जरूरतें: घर से जुड़े लगभग सभी कामों को अब एक ही वर्ग में रखा गया है। इसके तहत:

  • नया फ्लैट, बना-बनाया मकान या प्लॉट खरीदना
  • खुद का घर बनवाना
  • होम लोन की बची हुई किश्तें या लोन चुकाना
  • पुराने मकान की मरम्मत या रिनोवेशन कराना

सदस्य अपनी पूरी नौकरी के दौरान घर से जुड़े इन कामों के लिए कुल 5 बार एडवांस ले सकते हैं।

5. विशेष परिस्थितियां: EPFO के सेंट्रल बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज (CBT) द्वारा अधिसूचित किसी विशेष संकट या आपात स्थिति में सदस्य एक फाइनेंशियल ईयर (वित्तीय वर्ष) में 2 बार तक पीएफ एडवांस निकाल सकते हैं।

कितने प्रतिशत फंड निकाल सकते हैं?

EPFO की ताजा गाइडलाइंस के मुताबिक, पीएफ खाते से एडवांस निकालने के लिए कर्मचारी का कम से कम 1 साल तक EPFO का सदस्य होना अनिवार्य है। पात्रता शर्तें पूरी होने पर सदस्य अपने पीएफ खाते में जमा कुल बैलेंस (कर्मचारी का हिस्सा + एम्प्लॉयर का हिस्सा + ब्याज) का 75% तक एडवांस निकाल सकते हैं।

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इस बात का ध्यान रखें कि पीएफ से लिया गया यह एडवांस आपके रिटायरमेंट फंड का हिस्सा होता है। इसलिए बहुत ज्यादा जरूरत होने पर ही इसका इस्तेमाल करें ताकि आपके बुढ़ापे की सामाजिक सुरक्षा प्रभावित न हो।

Gold Rate Today: सोना एक हफ्ते में ₹220 तक हुआ सस्ता; चांदी ₹5000 लुढ़की

देश में सोने की कीमत में वीकली बेसिस पर गिरावट आई है। अलग-अलग शहरों में एक सप्ताह में 24 कैरेट गोल्ड की कीमत 220 रुपये तक ​फिसली है। वहीं 22 कैरेट गोल्ड 200 रुपये तक सस्ता हुआ है। आज 13 सितंबर को राजधानी दिल्ली में सुबह के वक्त 24 कैरेट गोल्ड 154730 रुपये प्रति 10 ग्राम पर है। मुंबई में कीमत 154580 रुपये प्रति 10 ग्राम है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में हाजिर सोना 4,363.01 डॉलर प्रति औंस पर है। सोने का वैश्विक भाव एक सप्ताह में लगभग 1.5 प्रतिशत कमजोर हुआ है।

देश के कुछ बड़े शहरों में गोल्ड रेट

दिल्ली में सोने की कीमत: दिल्ली में 24 कैरेट सोने की कीमत 154730 रुपये प्रति 10 ग्राम है। 22 कैरेट का भाव 141850 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

मुंबई और कोलकाता: मुंबई और कोलकाता में 22 कैरेट सोने की कीमत 141700 रुपये प्रति 10 ग्राम, जबकि 24 कैरेट सोने की कीमत 154580 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

चेन्नई में सोने की कीमत: 24 कैरेट सोने की कीमत 154580 रुपये प्रति 10 ग्राम है। 22 कैरेट का भाव 141700 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

पुणे और बेंगलुरु में कीमत: इन दोनों शहरों में 24 कैरेट गोल्ड की कीमत 154580 रुपये प्रति 10 ग्राम और 22 कैरेट गोल्ड की कीमत 141700 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

शहर22 कैरेट सोने का आज का भाव (₹)24 कैरेट सोने का आज का भाव (₹)
दिल्ली141850154730
मुंबई141700154580
अहमदाबाद141750154630
चेन्नई141700154580
कोलकाता141700154580
हैदराबाद141700154580
जयपुर141850154730
भोपाल141750154630
लखनऊ141850154730
चंडीगढ़141850154730

EPF Calculator: पीएफ से भी बनाया जा सकता है एक करोड़ रुपये का फंड! जानिए इसके लिए मंथली कितना करना होगा इन्वेस्टमेंट

चांदी की चाल

सोने की तरह चांदी भी वीकली बेसिस पर सस्ती हुई है। एक सप्ताह में भाव 5000 रुपये फिसला है। 13 सितंबर की सुबह चांदी की कीमत 245000 रुपये प्रति किलोग्राम है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में हाजिर चांदी यानि कि स्पॉट सिल्वर की कीमत 64.54 डॉलर प्रति औंस पर है। इस साल जनवरी में देश के अंदर चांदी की कीमत 4 लाख रुपये प्रति किलोग्राम के रिकॉर्ड हाई पर पहुंच गई थी। ​तब से अब तक यह लगभग 40 प्रतिशत टूट चुकी है।

EPF Calculator: पीएफ से भी बनाया जा सकता है एक करोड़ रुपये का फंड! जानिए इसके लिए मंथली कितना करना होगा इन्वेस्टमेंट

एंप्लॉयी प्रोविडेंट फंड (ईपीएफ) की मदद से बड़ा रिटायरमेंट फंड बन सकता है। यह लंबी अवधि का निवेश है, जिससे पैसे को बढ़ने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है। लंबे समय तक नियमित रूप से निवेश करने पर ईपीएफ का रिटर्न बहुत अच्छा रहता है। सिर्फ प्राइवेट नौकरी करने वाले एंप्लॉयीज ईपीएफ के दायरे में आते हैं।

हर महीने ईपीएफ में करीब 10,750 रुपये का निवेश करीब 20-25 साल तक करने पर करीब 1 करोड़ रुपये का फंड तैयार हो जाता है। इस कैलकुलेशन में सालाना इंटरेस्ट रेट 8.25 फीसदी माना गया है। अगर एंप्लॉयी हर महीने वॉलेंटरी प्रोविडेंट फंड (VPF) में भी हर महीने 6,000 रुपये का निवेश करता है तो 24-25 साल में करीब 1.58 करोड़ रुपये का फंड तैयार हो सकता है।

यह ध्यान में रखना जरूरी है कि करियर में ब्रेक होने का असर ईपीएफ के फंड पर पड़ेगा। इसकी वजह यह है कि करियर ब्रेक की वजह से ईपीएफ में हर महीने होने वाला कंट्रिब्यूशन रुक जाता है। इसका असर लंबी अवधि में कंपाउंडिंग के फायदे पर पड़ता है।

ईपीएफओ के नियम के तहत, एंप्लॉयीज ईपीएफ में अपनी बेसिक सैलरी का 12 फीसदी हर महीने कंट्रिब्यूट करता है। एंप्लॉयर भी 12 फीसदी कंट्रिब्यूशन एंप्लॉयी के ईपीएफ में हर महीने करता है। इसका 8.33 फीसदी एंप्लॉयीज पेंशन स्कीम (EPS) में जाता है और 3.67 फीसदी ईपीएफ में जाता है।

क्लासिस लॉ में एसोसिएट मयंक पराशर ने इसे एक उदाहरण की मतलब से समझाया। उन्होंने कहा कि ऐसा एक एंप्लॉयी है जो लगातार 25 साल तक नौकरी करता है। उसका ईपीएफ में मंथली कंट्रिब्यूशन 10,750 रुपये है। उसका ईपीएफ फंड 24-25 सालों में सालाना 8.25 फीसदी इंटरेस्ट रेट से बढ़कर करीब 1 करोड़ रुपये हो जाएगा। इस कैलकुलेशन में यह माना गया है कि एंप्लॉयी के मंथली कंट्रिब्यूशन में कोई बदलाव नहीं होता है।

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करियर में ब्रेक का असर

पराशर ने कहा, “करियर में ब्रेक का असर ईपीएफ में पहले से जमा फंड पर नहीं पड़ेगा। लेकिन, ब्रेक के दौरान कंट्रिब्यूशन रुकने का असर रिटायरमेंट फंड पर पड़ेगा।” इसका मतलब है कि अगर एंप्लॉयी 3 साल का करियर ब्रेक लेता है तो उस दौरान ईपीएफ में कंट्रिब्यूशन रुक जाएगा। इसका असर लंबी अवधि में कंपाउंडिंग बेनेफिट पर पड़ेगा।

पराशर ने इसे भी एक उदाहरण की मदद से समझाया। उन्होंने कहा कि हम मान लेतें है कि एंप्लॉयी 25 साल की जगह सिर्फ 22 साल कंट्रिब्यूशन करता है। उन्होंने कहा, “ऐसी स्थिति में उसका ईपीएफ फंड करीब 76.6 लाख रुपये होगा। इसका मतलब है कि करियर ब्रेक की वजह से फंड करीब 24.9 लाख रुपये घट जाता है।”

उन्होंने कहा कि करियर ब्रेक के दौरान न सिर्फ कंट्रिब्यूशन रुक जाता है बल्कि कंट्रिब्यूशन पर मिलने वाला इंटरेस्ट और कंपाउंडिंग बेनेफिट भी नहीं मिलता है। इसे हम नीचे टेबल की मदद से समझ सकते हैं।

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VPF की मदद से बना सकते हैं बड़ा फंड

एंप्लॉयी के करियर में अगर कोई ब्रेक नहीं होता है और वह अगर वीपीएफ में हर महीने अतिरिक्त 6000 रुपये का कंट्रिब्यूशन करता है तो ईपीएफ में हर महीने का कंट्रिब्यूशन बढ़कर 16,750 रुपये हो जाता है। इससे 25 साल में उसके लिए करीब 1.58 करोड़ रुपये का फंड तैयार हो जाता है।

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इस उदाहरण से पता चलता है कि नियमित रूप से कंट्रिब्यूशन होने पर ईपीएफ बड़ा रिटायरमेंट फंड तैयार करने में मदद कर सकता है। अगर आप वीपीएफ के जरिए अतिरिक्त कंट्रिब्यूशन कर सकते हैं तो आपके लिए और बड़ा फंड तैयार हो जाता है। लेकिन, करियर ब्रेक की वजह से रिटायरमेंट फंड का आकार कम हो जाता है।

डिसक्लेमर: मनीकंट्रोल पर एक्सपर्ट्स की तरफ से व्यक्त विचार उनके अपने विचार होते हैं। ये वेबसाइट या इसके मैनेजमेंट के विचार नहीं होते। मनीकंट्रोल की यूजर्स को सलाह है कि उन्हें निवेश का फैसला लेने से पहले सर्टिफायड एक्सपर्ट्स की राय लेनी चाहिए।

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Wealth Creation Tips: सिर्फ हाई सैलरी के भरोसे बैठे हैं तो धोखा खा जाएंगे, एक्सपर्ट ने बताए वेल्थ क्रिएशन के 5 तरीके

Wealth Creation Tips: वेल्थ क्रिएशन के लिए क्या ज्यादा सैलरी जरूरी है? आपकी इस बारे में क्या राय है? ज्यादातर लोग यह सोचते हैं कि इनवेस्टमेंट से मोटा पैसा बनाने के लिए ज्यादा सैलरी जरूरी है। वे सैलरी बढ़ने के इंतजार में इनवेस्टमेंट शुरू नहीं कर पाते, जबकि कम इनकम वाले लोग रेगुलर इनवेस्टमेंट से बड़ा फंड तैयार कर लेते हैं। आशीष कांचरला एंड एसोसिएट्स के फाउंडर और सीए ने बताया कि वेल्थ क्रिएशन के लिए मोटी सैलरी से ज्यादा जरूरी कुछ खास आदतें हैं।

पहले निवेश करें फिर खर्च

उन्होंने कहा कि वेल्थ क्रिएशन के आपके रास्ते में सबसे बड़ी बाधा रुपये-पैसे को लेकर आपकी पुरानी सोच है। हममें से ज्यादातर लोग पहले खर्च करने के बारे में सोचते हैं। पैसे बचने पर वे सेविंग्स के बारे में सोचते हैं। यह आदत वेल्थ क्रिएशन से आपको रोक देती है। अगर आप वेल्थ क्रिएट करना चाहते हैं तो पहले आपको सेविंग्स करनी होगी फिर बाकी पैसे से महीने का खर्च चलाना होगा। मान लीजिए आपकी सैलरी मंथली 1 लाख रुपये है तो आपको कम से कम हर महीने 20,000-30,000 रुपये सेविंग्स और निवेश के लिए इस्तेमाल करना होगा।

निवेश को बनाएं आदत

दूसरा, इनवेस्टमेंट किसी त्योहार की तरह नहीं है, जो साल में तीन बार या चार बार आता है। इसका नियमित होना जरूरी है। आपको हर महीने अनुशासित रूप से निवेश जारी रखना होगा। कई लोग निवेश शुरू तो करते हैं, लेकिन कुछ ही महीनों बाद उनके निवेश की गाड़ी पटरी से उतर जाती है। सबसे पहले आपको इनवेस्टमेंट अमाउंट सोच-समझकर तय करना होगा। अगर आप ज्यादा अमाउंट तय करेंगे तो फिर आपको उसे जारी रखने में दिक्कत आ सकती है।

 खर्च को नहीं बढ़ने दें

ज्यादातर लोगों का खर्च सैलरी बढ़ने के साथ ही बढ़ जाता है। यह वेल्थ क्रिएशन के लिए ठीक नहीं है। आपको अपने खर्च को सैलरी के हिसाब से बढ़ने से रोकना होगा। अगर आज आपकी सैलरी 1 लाख है, जो पांच साल बाद बढ़कर 2.5 लाख हो जाएगी तो इसका मतलब यह नहीं आपका खर्च भी 2.5 गुना हो जाना चाहिए। आपको बढ़ी हुई इनकम का इस्तेमाल इनवेस्टमेंट बढ़ाने के लिए करना चाहिए। इससे कम से ज्यादा वेल्थ आसानी से क्रिएट कर सकेंगे।

इंश्योरेंस सिर्फ प्रोटेक्शन के लिए

कई लोग इंश्योरेंस का मतलब ठीक तरह से नहीं समझते। एक्सपर्ट्स का कहना है कि बीमा का इस्तेमाल सिर्फ प्रोटेक्शन के लिए होना चाहिए, न कि इनवेस्टमेंट के लिए। अगर आप नौकरी करते हैं और आपकी फैमिली है, जिसमें बीवी और बच्चें हैं तो परिवार की फाइनेंशियल सिक्योरिटी आपकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। यहां इंश्योरेंस आपकी मदद करता है। टर्म पॉलिसी खरीदकर आप अपने परिवार को पर्याप्त फाइनेंशियल कवर दे सकते हैं। किसी अनहोनी की स्थिति में इंश्योरेंस से आपके परिवार को इतना पैसा मिल जाएगा कि उन्हें आर्थिक रूप से लाचार नहीं होना पड़ेगा। टर्म पॉलिसी का प्रीमियम एन्डॉमेंट पॉलिसी के प्रीमियम के मुकाबले काफी कम होता है।

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निवेश में डायवर्सिफिकेशन

सिर्फ निवेश करना पर्याप्त नहीं है। आप कहां अपने पैसे का निवेश कर रहे हैं, यह काफी मायने रखता है। पहला, आपके निवेश से मिलने वाला रिटर्न इनफ्लेशन रेट से काफी ज्यादा होना चाहिए। अगर ऐसा नहीं है तो आपके पैसे की वैल्यू लंबी अवधि में बढ़ने की जगह घटेगी। दूसरा, निवेश में डायवर्सिफिकेशन बहुत जरूरी है। आप कुछ पैसा अगर शेयर या म्यूचुअल फंड की स्कीम में लगा रहे हैं तो कुछ फिक्स्ड इनकम इंस्ट्रूमेंट्स में भी लगाना चाहिए। इसके अलावा आपके पोर्टफोलियो में कम से कम 10-15 फीसदी हिस्सेदारी बुलियन यानी गोल्ड और सिल्वर की होनी चाहिए। पीपीएफ, वीपीएफ, बैंक एफडी और बॉन्ड फंड्स फिक्स्ड इनकम के अच्छे ऑप्शंस हैं।