EPF vs PPF: रिटायरमेंट फंड के लिए कौन सा ऑप्शन है नंबर-1? जानिए किसमें मिलेगा ज्यादा फायदा

EPF vs PPF Retirement Planning: जब भी नौकरीपेशा लोगों के लिए रिटायरमेंट प्लानिंग की बात आती है, तो दो नाम सबसे पहले सामने आते हैं एंप्लॉई प्रोविडेंट फंड (EPF) और पब्लिक प्रोविडेंट फंड (PPF)। दोनों ही योजनाएं सरकार द्वारा समर्थित हैं, लंबी अवधि की बचत के लिए हैं और टैक्स छूट का फायदा भी देती हैं। यही वजह है कि इन दोनों में से किसी एक को चुनना काफी उलझन भरा काम लगता है।

हालांकि, वित्तीय सलाहकारों का मानना है कि यह ‘EPF बनाम PPF’ की जंग नहीं है। दोनों स्कीम्स के अपने अलग-अलग फायदे और उद्देश्य हैं। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि एक सैलरीड कर्मचारी को किसे पहले चुनना चाहिए।

EPF: ऑटोमैटिक बचत और एंप्लॉयर का योगदान

अगर आप किसी ऐसी कंपनी या संस्थान में काम करते हैं जो EPF के तहत कवर है, तो आपके वेतन से हर महीने अपने आप ईपीएफ में कटौती होती है। ईपीएफ की सबसे बड़ी खासियत यह है कि जितना योगदान आपकी बेसिक सैलरी से कटता है, उतना ही हिस्सा आपकी कंपनी भी जमा करती है। यह एक ऐसा एक्स्ट्रा फायदा है जो आपको PPF में नहीं मिलता।

बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के आपकी सैलरी से हर महीने पैसे कटकर जमा होते रहते हैं, जिससे करियर के अंत तक एक बड़ा फंड तैयार हो जाता है। इसीलिए ज्यादातर फाइनेंशियल प्लानर्स सुझाव देते हैं कि वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए EPF को हमेशा पहली प्राथमिकता बनाना चाहिए।

PPF: फ्लेक्सिबिलिटी और अतिरिक्त बचत का जरिया

पीपीएफ किसी कंपनी या नौकरी से बंधा हुआ नहीं होता। इसे कोई भी नागरिक अपने बैंक या पोस्ट ऑफिस में जाकर खुलवा सकता है। इसमें आप अपनी सुविधा और बजट के हिसाब से न्यूनतम और अधिकतम सीमा के दायरे में सालाना निवेश कर सकते हैं।

अगर आप जॉब बदलते हैं या कुछ समय का ब्रेक लेते हैं, तब भी आपका PPF अकाउंट बिना किसी रुकावट के चलता रहता है क्योंकि यह पूरी तरह आपका पर्सनल अकाउंट है। साथ ही आप EPF के अलावा अपनी रिटायरमेंट या किसी अन्य लंबे लक्ष्य के लिए अतिरिक्त बचत करना चाहते हैं, तो पीपीएफ सबसे सुरक्षित विकल्प बनता है।

लिक्विडिटी और निकासी

दोनों ही योजनाएं रोजमर्रा के खर्चों या बार-बार पैसे निकालने के लिए नहीं बनाई गई हैं।

EPF निकासी: ईपीएफ से पैसे निकालने के नियम आपकी नौकरी की स्थिति और विशिष्ट जरूरतों जैसे- घर खरीदना, बीमारी, शादी से जुड़े होते हैं।

PPF लॉक-इन: पीपीएफ का लॉक-इन पीरियड 15 साल का होता है, हालांकि कुछ शर्तों के साथ आंशिक निकासी और लोन की सुविधा मिलती है।

दोनों में से किसे चुनें?

एक वेतनभोगी कर्मचारी के लिए सही रणनीति यह है कि दोनों को एक-दूसरे का प्रतिस्पर्धी मानने के बजाय पूरक के रूप में इस्तेमाल किया जाए:

ईपीएफ को बनने दें बुनियाद: चूंकि ईपीएफ में कंपनी का भी योगदान मिलता है, इसलिए अपनी नौकरी के दौरान ईपीएफ अंशदान को बिना किसी रुकावट के जारी रहने दें यह आपकी रिटायरमेंट की मुख्य नींव है।

पीपीएफ को बनाएं बैकअप शील्ड: अगर ईपीएफ में कटौती के बाद भी आपके बजट में और बचत की गुंजाइश है, तो अतिरिक्त सरप्लस पैसे को पीपीएफ में निवेश करें। इससे आपका एसेट एलोकेशन मजबूत होगा और पोर्टफोलियो सुरक्षित रहेगा।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Gold Silver Price Today: सोना ₹900 सस्ता हुआ, चांदी का ₹1800 बढ़ा भाव

Gold Silver Price Today: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में सोमवार को सोने की कीमत में ₹900 प्रति 10 ग्राम की गिरावट दर्ज की गई। ऑल इंडिया सर्राफा एसोसिएशन के मुताबिक, 24 कैरेट शुद्धता वाला सोना अब ₹1,47,400 प्रति 10 ग्राम पर आ गया है। पिछले कारोबारी सत्र में इसका भाव ₹1,48,300 प्रति 10 ग्राम था।

सोना क्यों हुआ सस्ता?

HDFC Securities के सीनियर कमोडिटी एनालिस्ट सौमिल गांधी के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की चाल सुस्त रही। वहीं, रुपये की मजबूती का भी घरेलू कीमतों पर असर पड़ा। इसी वजह से सोना सीमित दायरे में कारोबार करता रहा और कीमतों में गिरावट आई।

चांदी में लौटी तेजी

सोने के उलट चांदी की कीमत में ₹1,800 प्रति किलो की तेजी आई। अब चांदी ₹2,26,500 प्रति किलो पर पहुंच गई है। पिछले कारोबारी सत्र में इसका भाव ₹2,24,700 प्रति किलो था।

Lemonn Markets Desk के रिसर्च हेड गौरव गर्ग के अनुसार, अमेरिकी डॉलर में कमजोरी और कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के बाद निवेशकों ने चांदी में खरीदारी बढ़ाई। इससे चांदी के दाम मजबूत हुए।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्या रहा हाल?

अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्पॉट गोल्ड मामूली बढ़त के साथ 4,048.89 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार कर रहा था। वहीं, चांदी भी हल्की तेजी के साथ 57.97 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गई।

Kotak Securities की कमोडिटी रिसर्च AVP कायनात चैनवाला के मुताबिक, ईरान पर नए हमले की योजना रद्द होने के बाद भू-राजनीतिक तनाव कुछ कम हुआ है। इससे कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आई और कीमती धातुओं को थोड़ा सहारा मिला। साथ ही, डॉलर में कमजोरी ने भी सोना और चांदी को सपोर्ट दिया।

इस हफ्ते इन आंकड़ों पर रहेगी नजर

Mirae Asset Sharekhan के हेड ऑफ कमोडिटीज प्रवीण सिंह का कहना है कि तेल की कीमतों में 5% से ज्यादा गिरावट के बावजूद सोने में बड़ी तेजी नहीं दिख रही है। इसकी वजह यह है कि इस हफ्ते अमेरिका के कई अहम आर्थिक आंकड़े जारी होने वाले हैं। निवेशकों की नजर फिलहाल इन्हीं आंकड़ों पर टिकी है।

MCX गोल्ड पर एक्सपर्ट की राय

LKP Securities के वाइस प्रेसिडेंट (कमोडिटी और करेंसी रिसर्च) जतीन त्रिवेदी का कहना है कि फिलहाल MCX पर सोने की कीमतें सीमित दायरे में कारोबार कर रही हैं। इसकी वजह अमेरिका-ईरान के बीच फिलहाल कोई नया तनाव नहीं होना, कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और डॉलर का कमजोर होना है।

अब आगे सोने की चाल कैसी रहेगी

जतीन त्रिवेदी के मुताबिक, अब सोने की चाल फेडरल रिजर्व के रेट संकेत और अमेरिका के रोजगार से जुड़े अहम आंकड़ों के हिसाब से चलेंगी। उनका मानना है कि तकनीकी रूप से निकट भविष्य में MCX Gold ₹1,42,000 से ₹1,45,000 प्रति 10 ग्राम के दायरे में कारोबार कर सकता है।

(एजेंसी इनपुट के साथ)

PPF Rules: पीपीएफ में पैसा लगाते समय ये 5 गलतियां न करें, वरना आपके रिटर्न पर सीधा असर पड़ेगा

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Investment Tips: 40 के पहले निपटा लें ये 10 काम! बुढ़ापे में नहीं होगी पैसों की तंगी, जानें वेल्थ क्रिएशन का सही फॉर्मूला

Financial Planning Before Age 40: 30 से 40 वर्ष की आयु वित्तीय सुरक्षा और वेल्थ क्रिएशन के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस उम्र में आपके पास करियर की स्थिरता, नियमित आय और रिटायरमेंट से पहले एक लंबा इनवेस्टमेंट होराइजन होता है।

हालांकि, सफल निवेशक बनने का मतलब सिर्फ मार्केट रिटर्न के पीछे भागना नहीं है, बल्कि एक अनुशासित वित्तीय रणनीति बनाना है। यदि आपकी उम्र भी 40 वर्ष से कम है, तो वित्तीय रूप से मजबूत बनने के लिए आपको ये 10 स्मार्ट इनवेस्टमेंट मूव्स जरूर अपनाने चाहिए:

1. सबसे पहले अपने फाइनेंशियल गोल्स तय करें

बिना लक्ष्य के निवेश करना बिना पते की चिट्ठी भेजने जैसा है। निवेश शुरू करने से पहले तय करें कि आप पैसा किसलिए बचा रहे हैं जैसे- बच्चों की पढ़ाई, घर खरीदना, या रिटायरमेंट। जब आपके लक्ष्य स्पष्ट होते हैं, तो बाजार के उतार-चढ़ाव से घबराकर फैसले लेने के बजाय आप अपने प्लान पर टिके रहते हैं।

2. कंपाउंडिंग का फायदा उठाने के लिए जल्दी शुरुआत करें

निवेश में समय आपका सबसे बड़ा दोस्त होता है। जितनी जल्दी आप निवेश शुरू करेंगे, आपके पैसे को कंपाउंड (चक्रवृद्धि ब्याज के रूप में बढ़ने) होने का उतना ही अधिक समय मिलेगा। छोटी-छोटी रकम से की गई शुरुआत भी लंबी अवधि में बड़ा कॉर्पस बना सकती है।

3. निवेश से पहले इमरजेंसी फंड बनाएं

एक मजबूत वित्तीय योजना की नींव लिक्विडिटी पर टिकी होती है। किसी भी आपात स्थिति (जैसे- नौकरी छूटना या मेडिकल इमरजेंसी) से निपटने के लिए कम से कम 3 से 6 महीने के खर्च के बराबर राशि लिक्विड फंड या सेविंग्स अकाउंट में रखें। इससे आपको अपनी लंबी अवधि के निवेश को असमय बेचने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

4. सिंपल और आसान निवेश विकल्पों से शुरुआत करें

निवेश को बहुत पेचीदा बनाने की जरूरत नहीं है। नए निवेशकों के लिए इंडेक्स फंड्स या डाइवर्सिफाइड म्यूचुअल फंड्स में SIP के जरिए शुरुआत करना सबसे आसान और सुरक्षित तरीका है। जैसे-जैसे आपका अनुभव बढ़े, आप अन्य एसेट क्लासेस में कदम रख सकते हैं।

5. SIP के जरिए नियमित और अनुशासित निवेश करें

मार्केट को टाइम करने के चक्कर में पड़ने के बजाय सिस्टेमैटिक इनवेस्टमेंट प्लान (SIP) का रास्ता चुनें। SIP के जरिए हर महीने एक तय राशि ऑटोमैटिक निवेश होती रहती है, जिससे रूपी कॉस्ट एवरेजिंग का फायदा मिलता है और बाजार के जोखिम से बचाव होता है।

6. डाइवर्सिफाइड पोर्टफोलियो तैयार करें

‘अपने सारे अंडे एक ही टोकरी में न रखें’ यह नियम निवेश पर पूरी तरह लागू होता है।अपने रिस्क प्रोफाइल के हिसाब से पोर्टफोलियो को इक्विटी, फिक्स्ड इनकम, सोना और अन्य साधनों में बांटें। डाइवर्सिफिकेशन का मकसद सिर्फ ज्यादा रिटर्न पाना नहीं, बल्कि बाजार की मंदी में नुकसान को कम करना है।

7. बहुत ज्यादा फंड्स या स्ट्रेटेजीज के चक्कर में न पड़ें

बहुत सारे म्यूचुअल फंड्स इकट्ठा कर लेना या बार-बार अपनी इनवेस्टमेंट स्ट्रेटेजी बदलना नुकसानदेह हो सकता है। अपने पोर्टफोलियो को सिंपल रखें। सीमित और अच्छे से रिसर्च किए गए फंड्स में लंबे समय तक बने रहना हमेशा बेहतर परिणाम देता है।

8. इनकम बढ़ते ही SIP का अमाउंट बढ़ाएं

जैसे-जैसे करियर में आपकी सैलरी या बिजनेस इनकम बढ़े, अपने निवेश की राशि को भी उसी अनुपात में बढ़ाएं। इसे स्टेप-अप SIP (Step-up SIP) कहते हैं। हर साल 10% से 15% निवेश बढ़ाने से आप अपने वित्तीय लक्ष्यों को समय से काफी पहले हासिल कर सकते हैं।

9. ग्रोथ और स्टेबिलिटी में सही संतुलन बनाएं

लंबी अवधि के वेल्थ क्रिएशन के लिए इक्विटी जरूरी है, तो पोर्टफोलियो को मजबूती देने के लिए फिक्स्ड इनकम (डेट फंड्स/पीपीएफ) और गोल्ड अनिवार्य हैं। अपनी उम्र, जोखिम सहने की क्षमता और वित्तीय जिम्मेदारियों के अनुसार सही एसेट एलोकेशन तय करें।

10. समय-समय पर अपने पोर्टफोलियो का रिव्यू करें

बदलते समय के साथ आपकी जिम्मेदारियां और आय का स्तर बदलता है। साल में कम से कम एक या दो बार अपने पोर्टफोलियो की समीक्षा जरूर करें। अगर कोई फंड लगातार खराब प्रदर्शन कर रहा है या आपका एसेट एलोकेशन बिगड़ गया है, तो उसमें आवश्यक रीबैलेंसिंग करें।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

आपके PF का पैसा EPFO कहां निवेश करता है, आपको तगड़ा ब्याज कैसे मिलता है? समझिए पूरा हिसाब

हर महीने आपकी सैलरी से PF कटता है। फिर EPFO उसी पैसे को अलग-अलग जगह निवेश करता है। वहीं से कमाई होती है और उसी कमाई के दम पर EPFO अपने करोड़ों सदस्यों को 8.25% जैसी आकर्षक ब्याज दर देता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि 31 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का यह विशाल फंड आखिर संभालता कौन है?

जवाब आपको चौंका सकता है। दरअसल, EPFO इस निवेश का बड़ा हिस्सा खुद मैनेज नहीं करता, बल्कि पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज (PMS) के जरिए प्रोफेशनल फंड मैनेजर को सौंपता है।

PMS आखिर क्या होते हैं?

पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज (PMS) का नाम आते ही ज्यादातर लोगों के दिमाग में अमीर निवेशकों की तस्वीर आती है। लेकिन हकीकत कुछ और है।

SEBI के जून 2026 के आंकड़े एक दिलचस्प तस्वीर दिखाते हैं। PMS इंडस्ट्री के 36.72 लाख करोड़ रुपये में से करीब 31.04 लाख करोड़ रुपये, यानी लगभग 85% पैसा EPFO और दूसरे प्रोविडेंट फंड्स का है। इससे साफ है कि PMS सिर्फ अमीर निवेशकों के लिए नहीं है। बड़े संस्थान भी अपने हजारों-लाखों करोड़ रुपये इसी के जरिए निवेश करते हैं।

EPFO PMS का इस्तेमाल क्यों करता है?

EPFO करोड़ों नौकरीपेशा लोगों की रिटायरमेंट की बचत संभालता है। उसका मकसद ज्यादा मुनाफा कमाना नहीं है। उसकी पहली जिम्मेदारी लोगों का पैसा सुरक्षित रखना है। साथ ही, लंबे समय तक स्थिर रिटर्न देना भी जरूरी है।

इसी वजह से EPFO निवेश की जिम्मेदारी SEBI-रजिस्टर्ड पोर्टफोलियो मैनेजर को देता है। हालांकि, निवेश से जुड़े बड़े फैसलों पर नजर EPFO और सेंट्रल बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज (CBT) की ही रहती है।

नियमों के मुताबिक, EPFO अपने पैसे का 45% से 65% सरकारी बॉन्ड, 35% से 45% कॉरपोरेट बॉन्ड और दूसरे डेट इंस्ट्रूमेंट में लगाता है। वहीं, 15% तक पैसा इक्विटी में लगाया जा सकता है। यह निवेश भी ज्यादातर इंडेक्स ETF के जरिए होता है।

पैसा बाहर के एक्सपर्ट क्यों संभालते हैं?

31 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का फंड संभालना आसान नहीं है। इसके लिए डेट मार्केट की गहरी समझ चाहिए। जोखिम का आकलन करना पड़ता है। हर दिन बाजार पर नजर रखनी होती है।

अगर EPFO यह पूरा काम खुद करे तो उसे बहुत बड़ा निवेश सेटअप तैयार करना पड़ेगा। इसलिए वह यह जिम्मेदारी प्रोफेशनल पोर्टफोलियो मैनेजर को देता है।

EPFO एक नहीं, कई पोर्टफोलियो मैनेजर नियुक्त करता है। उनकी नियुक्ति बोली प्रक्रिया से होती है। प्रदर्शन की लगातार समीक्षा होती है। जो बेहतर काम करता है, उसे ज्यादा फंड मिलता है। खराब प्रदर्शन करने वाले मैनेजर अपना काम भी गंवा सकते हैं।

chart epfo

आम निवेशक क्या सीख सकते हैं?

एक्सपर्ट्स का कहना है कि कि EPFO का पोर्टफोलियो कॉपी करने की जरूरत नहीं है। लेकिन उसकी निवेश करने की सोच जरूर अपनाई जा सकती है।

सबसे बड़ी सीख है अनुशासन। पहले तय करें कि कितना पैसा इक्विटी में रखना है और कितना डेट में। फिर बाजार के उतार-चढ़ाव को देखकर बार-बार फैसला न बदलें। SIP करते रहें और समय-समय पर पोर्टफोलियो को रीबैलेंस करें।

दूसरी बात, अगर निवेश की ज्यादा समझ नहीं है तो म्यूचुअल फंड या ETF जैसे प्रोफेशनल विकल्प चुनें। हर शेयर खुद खरीदना जरूरी नहीं होता।

तीसरी सीख है कि सिर्फ रिटर्न के पीछे न भागें। रिस्क पर भी बराबर ध्यान दें। पूरा पैसा एक ही शेयर, सेक्टर या कम गुणवत्ता वाले बॉन्ड में लगाना समझदारी नहीं है।

EPFO की रणनीति हर किसी के लिए सही नहीं

EPFO का पोर्टफोलियो उसकी जिम्मेदारियों को ध्यान में रखकर बनाया जाता है। आम निवेशकों की जरूरतें अलग होती हैं। खासकर युवा निवेशकों को लंबी अवधि में संपत्ति बनाने के लिए ज्यादा इक्विटी की जरूरत पड़ सकती है।

एक और बड़ा फर्क टैक्स का है। PMS में हर खरीद और बिक्री पर टैक्स लग सकता है। वहीं, म्यूचुअल फंड में आमतौर पर यूनिट बेचने तक टैक्स नहीं देना पड़ता। इसलिए बिना सोचे-समझे EPFO की निवेश रणनीति अपनाना हर निवेशक के लिए सही नहीं होगा।

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Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।

क्या स्पाउस के अकाउंट में पैसे डालकर टैक्स बचाया जा सकता है? पैसे गिफ्ट करने को लेकर क्या रूल है, ये कब टैक्सेबल होता है?

Tax Rules On Gifting Money To Spouse: बहुत से नौकरीपेशा और बिजनेसमैन यह मान लेते हैं कि अपनी पत्नी या पति के बैंक अकाउंट में पैसे ट्रांसफर करके या उनके नाम पर निवेश करके परिवार की टैक्स देनदारी को कम किया जा सकता है। विशेष रूप से तब, जब स्पाउस की कोई अपनी कमाई न हो या वे लोअर टैक्स स्लैब में आते हों।

हालांकि, आयकर विभाग के नियम कुछ और ही कहते हैं। अगर आप सही नियमों और ‘क्लबिंग ऑफ इनकम’ के प्रावधानों को नहीं समझते हैं, तो टैक्स बचाने का यह तरीका आपके लिए भारी पड़ सकता है।

क्या स्पाउस को पैसे गिफ्ट करना टैक्स फ्री है?

हां, पैसे गिफ्ट करना पूरी तरह से टैक्स फ्री है! इनकम टैक्स एक्ट की धारा 56 के तहत पति या पत्नी को ‘रिश्तेदार’ की श्रेणी में रखा गया है। इसलिए अपनी पत्नी या पति को कैश, चेक या एसेट के रूप में कितना भी पैसा गिफ्ट किया जाए, उस पर पाने वाले को कोई टैक्स नहीं देना होता।

कब लगता है अन्य पर टैक्स?

किसी गैर-रिश्तेदार से एक वित्तीय वर्ष में ₹50,000 से अधिक का गिफ्ट मिलने पर टैक्स लगता है, लेकिन स्पाउस के मामले में यह सीमा लागू नहीं होती। पैसे गिफ्ट करना भले ही टैक्स-फ्री हो, लेकिन जैसे ही उस पैसे को कहीं इन्वेस्ट किया जाता है और उससे कमाई शुरू होती है, टैक्स के नियम बदल जाते हैं।

‘क्लबिंग ऑफ इनकम’ (सेक्शन 64) का गणित क्या है?

अगर आप अपनी पत्नी को पैसे गिफ्ट करते हैं और वे उस पैसे को एफडी, म्युचुअल फंड, शेयर मार्केट या सोने में निवेश कर देती हैं, तो उससे होने वाली कमाई पर आपकी पत्नी नहीं, बल्कि आपको टैक्स देना होगा। आयकर अधिनियम की धारा 64 के तहत ‘क्लबिंग प्रावधान’ इसलिए बनाए गए हैं ताकि लोग कम टैक्स स्लैब वाले पारिवारिक सदस्यों के नाम पर संपत्ति या पैसे ट्रांसफर करके टैक्स न चुरा सकें।

टैक्स किस पर लगेगा?

गिफ्ट किए गए पैसे से जो भी ब्याज, डिविडेंड या कैपिटल गेन्स होगा, वह आपकी कुल कर योग्य आय में जोड़ दिया जाएगा और आपके टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स काटा जाएगा।

कब लागू नहीं होते क्लबिंग ऑफ इनकम के नियम?

कुछ खास परिस्थितियां ऐसी हैं जहां क्लबिंग के नियम लागू नहीं होते और आप कानूनी रूप से टैक्स राहत पा सकते हैं:

खुद की प्रोफेशनल या टेक्निकल योग्यता से कमाई: अगर आपकी पत्नी आपकी किसी कंपनी या फर्म से सैलरी, फीस या कमीशन प्राप्त करती हैं और वह कमाई उनकी अपनी शैक्षणिक योग्यता, ज्ञान या हुनर के दम पर है, तो उस कमाई को आपके साथ नहीं जोड़ा जाएगा।

PPF में निवेश: अगर आप अपनी पत्नी के नाम से पीपीएफ खाता खोलकर उसमें पैसे जमा करते हैं, तो उस पर मिलने वाला ब्याज पूरी तरह से टैक्स फ्री होता है। इसलिए वहां क्लबिंग का कोई नुकसान नहीं होता।

पिन मनी या घर के खर्च की बचत: अगर पत्नी घर चलाने के लिए मिले खर्चों में से बचत करके उसे कहीं इन्वेस्ट करती हैं, तो उससे हुई आय पर क्लबिंग नियम लागू नहीं होते।

कमाई पर दोबारा कमाई: गिफ्ट किए गए पैसे से जो पहली कमाई होगी, वह आपके खाते में जुड़ेगी। लेकिन अगर आपकी पत्नी उस ब्याज के पैसे को दोबारा कहीं इन्वेस्ट करके और कमाई करती हैं, तो उस ‘दूसरी कमाई’ पर क्लबिंग लागू नहीं होगी।

ITR Deadline Alert: 31 जुलाई के बाद ITR भरा तो लगेगा जुर्माना! जानिए लेट रिटर्न दाखिल करने पर कितना होगा नुकसान

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

ITR Deadline Alert: 31 जुलाई के बाद ITR भरा तो लगेगा जुर्माना! जानिए लेट रिटर्न दाखिल करने पर कितना होगा नुकसान

ITR Filing Deadline AY 2026-27: एसेसमेंट ईयर 2026-27 के लिए इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल करने की आखिरी तारीख में सिर्फ 4 दिन बचे हैं। करदाताओं के लिए 31 जुलाई 2026 की डेडलाइन बेहद करीब है। टैक्स एक्सपर्ट्स की सलाह है कि आखिरी वक्त के रश और ई-फाइलिंग पोर्टल के संभावित सर्वर डाउन या तकनीकी खराबी से बचने के लिए तुरंत अपना रिटर्न दाखिल कर दें।

आयकर विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 26 जुलाई 2026 तक 4.10 करोड़ से अधिक ITR दाखिल किए जा चुके हैं, जिनमें से 3.85 करोड़ का ई-वेरिफिकेशन पूरा हो चुका है। आइए आपको बताते हैं 31 जुलाई की डेडलाइन मिस करने पर आपको किन-किन समस्याओं का सामना करना पड़ सकता हैं।

क्या 31 जुलाई के बाद भी भरा जा सकता है ITR?

हां, अगर आप 31 जुलाई की डेडलाइन मिस कर देते हैं, तो भी आप अपना रिटर्न दाखिल कर सकते हैं। इसे बिलेटेड आईटीआर कहा जाता है। AY 2026-27 के लिए बिलेटेड रिटर्न दाखिल करने की अंतिम सीमा 31 दिसंबर 2026 तक है। हालांकि, 31 जुलाई के बाद रिटर्न दाखिल करने पर आपको भारी जुर्माना, ब्याज और कई टैक्स लाभों से हाथ धोना पड़ सकता है।

लेट ITR फाइल करने पर कितना लगेगा जुर्माना?

आयकर अधिनियम की सेक्शन 234F के तहत समय सीमा खत्म होने के बाद रिटर्न भरने पर लेट फीस वसूल की जाती है:

₹5 लाख से अधिक आय पर: अगर आपकी कुल आय ₹5 लाख से अधिक है, तो आपको ₹5,000 का जुर्माना देना होगा।

₹5 लाख तक की आय पर: अगर कुल आय ₹5 लाख तक है, तो लेट फीस ₹1,000 होगी।

बेसिक छूट सीमा से कम आय पर: अगर आपकी आय टैक्स फ्री लिमिट से कम है और रिटर्न भरना अनिवार्य नहीं था, तो कोई लेट फीस नहीं लगेगी।

बकाया टैक्स पर लगेगा भारी ब्याज

31 जुलाई तक अगर आपका कोई टैक्स बकाया रह जाता है, तो धारा 234A के तहत हर महीने या महीने के हिस्से पर 1% की दर से ब्याज वसूला जाएगा। यह ब्याज तब तक जुड़ता रहेगा जब तक आप अपना रिटर्न और बकाया टैक्स जमा नहीं कर देते।

घाटे को आगे कैरी फॉरवर्ड करने का अधिकार खत्म

31 जुलाई की डेडलाइन मिस करने का सबसे बड़ा नुकसान उन टैक्सपेयर्स को होता है जिन्हें कैपिटल गेन या बिजनेस में नुकसान हुआ है। समय पर ITR फाइल न करने पर आप इस नुकसान को भविष्य के सालों में अपने मुनाफे से सेट-ऑफ करने के लिए आगे नहीं ले जा सकते।

टैक्स रिफंड मिलने में होगी देरी

अगर आपका टीडीएस अधिक कट गया है और आप टैक्स रिफंड के हकदार हैं, तो देरी से रिटर्न भरने पर रिफंड की प्रक्रिया और भुगतान में काफी वक्त लग सकता है। जितना जल्दी रिटर्न फाइल और वेरिफाई होगा, रिफंड उतनी ही तेजी से आपके बैंक खाते में आएगा।

किसके लिए कौन-सी डेडलाइन है लागू?

  • 31 जुलाई 2026: वेतनभोगी कर्मचारियों, ITR-1 और ITR-2 फाइल करने वाले टैक्सपेयर्स तथा ₹1.25 लाख तक के LTCG वाले व्यक्तियों के लिए।
  • 31 अगस्त 2026: ऐसे कारोबारी और पेशेवर जिनकी खातों की टैक्स ऑडिट की आवश्यकता नहीं होती (ITR-3 / ITR-4)।
  • 30 सितंबर 2026: टैक्स ऑडिट कराने की अंतिम तिथि।
  • 31 अक्टूबर 2026: ऐसे टैक्सपेयर्स जिनके खातों का ऑडिट होना अनिवार्य है।

पीएफ निकालने पर कब नहीं देना पड़ता टैक्स? जानिए 5 साल वाला नियम और TDS का पूरा गणित

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Small Savings Schemes: शेयर मार्केट में उठा-पटक की टेंशन दूर, 8.2% तक का रिटर्न, पोस्ट ऑफिस की ये स्कीम शानदार

Small Savings Schemes: पिछले कुछ महीनों से स्टॉक मार्केट में काफी उठा-पटक दिख रही है। इससे शॉर्ट टर्म में रिटर्न को लेकर निवेशक परेशान हो गए हैं। हालांकि अधिकतक एक्सपर्ट्स लंबे समय में अच्छा पैसा बनाने के लिए इक्विटी में पैसा लगाने की सलाह देते हैं लेकिन जो निवेशक मार्केट की घबराहट से दूर बिना टेंशन अच्छा पैसा बनाना चाहते हैं, उनके लिए भी मार्केट में विकल्प उपलब्ध हैं। ऐसे निवेशकों के लिए सरकार के सपोर्ट वाली छोटी बचत योजनाएं पोर्टफोलियो का अच्छा हिस्सा बन सकती हैं। इनमें सालाना 8.2% तक का ब्याज मिल रहा है, जिससे मार्केट की उठा-पटक से दूर निवेशकों का क्रेज इन्हें लेकर बढ़ रहा है।

Public Provident Fund (PPF)

लंबे समय से पीपीएफ सैलरीड एंप्लॉयीज और अपना खुद का बिजनेस करने वालों के लिए सबसे पसंदीदा निवेश विकल्पों में शुमार है। अभी इस पर सालाना 7.1% की दर से ब्याज मिल रहा है। इसका मेच्योरिटी पीरियड 15 वर्ष है। पुरानी टैक्स व्यवस्था यानी ओल्ड टैक्स रिजीम के तहत इसमें किए गए निवेश पर इनकम टैक्स के सेक्शन 80C के तहत टैक्स डिडक्शन मिलका है। साथ ही अर्जित ब्याज और मेच्योरिटी पर मिलने वाला पैसा भी टैक्स-फ्री होता है।

National Savings Certificate (NSC)

एनएससी एक फिक्स्ड इनकम योजना है, जिसमें अभी सालाना 7.7% की दर से ब्याज मिल रहा है। इसका मेच्योरिटी पीरियड 5 साल है और इसमें निवेश पर सेक्शन 80सी के तहत टैक्स बेनेफिट्स भी मिलता है।

Kisan Vikas Patra (KVP)

बाजार की उठा-पटक से दूर किसान विकास पत्र (केवीपी) ऐसे निवेशकों के लिए सुरक्षित है जो बिना किसी टेंशन अपने पैसे को अच्छी रफ्तार से बढ़ता हुआ देखना चाहते हैं। अभी इस पर सालाना 7.5% की दर से ब्याज मिल रहा है और इस रफ्तार से 115 महीने में इसमें रखा पैसा डबल हो जाता है।

Sukanya Samriddhi Yojana (SSY)

लड़कियों के भविष्य को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से शुरू की गई सुकन्या समृद्धि योजना में अभी सालाना 8.2% की दर से ब्याज मिल रहा है जोकि स्मॉल सेविंग्स स्कीम्स में सबसे अधिक ब्याज देने वाली योजना में से एक है। 10 साल से कम उम्र की लड़की के अभिभावक यह खाता खोल सकते हैं।

Senior Citizens’ Savings Scheme (SCSS)

सीनियर सिटीजंस सेविंग्स स्कीम के तहत अभी सालाना 8.2% की दर से ब्याज मिल रहा है और यह भी अधिक ब्याज देने वाली सरकारी बचत योजनाओं में शुमार है। इसके तहत 60 वर्ष या इससे अधिक उम्र के लोग निवेश कर सकते हैं और ऐसे लोगों के लिए बेहतर है जो नियमित आय चाहते हैं।

Post Office Time Deposits

पोस्ट ऑफिस में बैंकों की तरह एक एफडी है, जिसे सरकार का सपोर्ट मिला हुआ है। इसमें एक साल की जमा पर 6.9%,दो साल की जमा पर 7.0%, तीन साल की जमा पर 7.1% और पांच साल की जमा पर 7.5% की दर से ब्याज मिलेगा। पांच साल की जमा पर सेक्शन 80सी के तहत टैक्स बेनेफिट्स भी मिलेगा।

छोटी बचत योजनाओं पर ब्याज दरें

सरकार हर तिमाही स्मॉल सेविंग्स स्कीम्स यानी छोटी बचत योजनाओं पर ब्याज दरें तय करती हैं और सितंबर तिमाही के लिए ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। यहां पोस्ट ऑफिस से जुड़ी स्कीम्स के लिए ब्याज दर की डिटेल्स दी जा रही है-

स्मॉल सेविंग्स स्कीमब्याज दर
सुकन्या समृद्धि योजना (SSY)8.2%
सीनियर सिटीजंस सेविंग्स स्कीम (SCSS)8.2%
नेशनल सेविंग्स सर्टिफिकेट (NSC)7.7%
किसान विकास पत्र (KVP)7.5%
5 वर्षीय पोस्ट ऑफिस टाइम डिपॉजिट7.5%
पोस्टऑफिस मंथली इनकम स्कीम (POMIS)7.4%
पब्लिक प्रोविडेंट फंड (PPF)7.1%
3 साल का पोस्ट ऑफिस  टाइम डिपॉजिट7.1%
2 साल का पोस्ट ऑफिस डाकघर टाइम डिपॉजिट7.0%
1 साल का पोस्ट ऑफिस  टाइम डिपॉजिट6.9%
पोस्ट ऑफिस आरडी (RD)6.7%
पोस्ट ऑफिस सेविंग्स स्कीम4.0%

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डिस्क्लेमर: निवेश से जुड़ा कोई भी फैसला लेने से पहले अपने निवेश सलाहकार से जरूर संपर्क करें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है