जैक याडेगरी कौन हैं? 15 विश्वविद्यालयों ने किया रिजेक्ट, अब 19 साल की उम्र में अपने AI स्टार्टअप के लिए जुटाए 10 मिलियन डॉलर

आज के दौर में जहां युवा अपनी पढ़ाई और करियर को लेकर भविष्य की योजनाएं बना रहे हैं, वहीं अमेरिका के 19 वर्षीय जैक याडेगरी अपनी उद्यमशीलता और AI तकनीक के दम पर बिजनेस की दुनिया में चर्चा बटोर रहे हैं। कम उम्र में ही उन्होंने अपनी प्रतिभा और मेहनत से एक खास पहचान बनाई है। जैक ने महज सात साल की उम्र में कोडिंग सीखना शुरू कर दिया था और धीरे-धीरे टेक्नोलॉजी की दुनिया में अपनी रुचि को एक बड़े अवसर में बदल दिया। उन्हें सबसे पहले Cal AI ऐप से पहचान मिली, जिसने उनकी सफलता की कहानी को नई दिशा दी। अब वह अपने नए AI स्टार्टअप Persona को लेकर सुर्खियों में हैं।

इस स्टार्टअप के लिए 10 मिलियन डॉलर की फंडिंग जुटाना उनकी उपलब्धियों में एक और बड़ी कड़ी माना जा रहा है। जैक की कहानी दिखाती है कि सही सोच, तकनीकी कौशल और नए विचारों के साथ कम उम्र में भी बड़ी उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं।

7 साल की उम्र में सीखी कोडिंग, 16 में बेची पहली कंपनी

अमेरिका के लॉन्ग आइलैंड, न्यूयॉर्क में रहने वाले जैक याडेगरी को बचपन से ही तकनीक में दिलचस्पी थी। उन्होंने स्कूल के दिनों में Totally Science नाम की गेमिंग वेबसाइट बनाई थी। इस प्लेटफॉर्म के जरिए छात्र स्कूल नेटवर्क पर ब्लॉक किए गए गेम खेल सकते थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, जैक ने महज 16 साल की उम्र में इस वेबसाइट को करीब 1 लाख डॉलर में बेच दिया था।

हार्वर्ड और स्टैनफोर्ड ने किया रिजेक्ट, फिर भी नहीं मानी हार

जैक की कहानी का एक दिलचस्प पहलू कॉलेज एडमिशन से भी जुड़ा है। अप्रैल 2025 में उन्होंने बताया था कि जिन 18 विश्वविद्यालयों में उन्होंने आवेदन किया, उनमें से 15 ने उन्हें रिजेक्ट कर दिया। इनमें हार्वर्ड, येल और स्टैनफोर्ड जैसे प्रतिष्ठित संस्थान भी शामिल थे।

रिपोर्ट के अनुसार, उनका GPA 4.0 और ACT स्कोर 34 था। इसके बावजूद उन्हें कई बड़े विश्वविद्यालयों में दाखिला नहीं मिला। बाद में उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ मियामी में पढ़ाई शुरू की। हालांकि, एडमिशन में मिली निराशा उनके बिजनेस सफर में बाधा नहीं बनी।

Cal AI ऐप ने बनाया करोड़ों का बिजनेस

साल 2024 में जैक ने Cal AI नाम का कैलोरी ट्रैकिंग ऐप लॉन्च किया। इसकी मदद से यूजर्स खाने की तस्वीर अपलोड करके उसमें मौजूद कैलोरी का अनुमान लगा सकते थे। ऐप को लोगों के बीच अच्छी लोकप्रियता मिली।

मार्च 2026 में फिटनेस प्लेटफॉर्म MyFitnessPal ने Cal AI का अधिग्रहण करने की घोषणा की। सौदे की रकम सार्वजनिक नहीं की गई। TechCrunch की रिपोर्ट के मुताबिक, ऐप के 1.5 करोड़ से ज्यादा डाउनलोड हो चुके थे और दो साल में इसका सालाना राजस्व 3 करोड़ डॉलर से अधिक पहुंच गया था।

अब Persona से AI की दुनिया में नई शुरुआत

MyFitnessPal से जून में अलग होने के बाद जैक ने Persona पर काम शुरू किया। यह AI असिस्टेंट यूजर्स को रोजमर्रा के कामों में मदद देने के लिए तैयार किया जा रहा है। इसके लिए जुटाई गई 10 मिलियन डॉलर की फंडिंग का नेतृत्व Vine Ventures ने किया, जबकि अन्य निवेशकों में Cory Levy और Collective Global शामिल हैं।

दिसंबर में आ सकता है AI डिवाइस

Persona के तहत दिसंबर में 179 डॉलर का एक पहनने योग्य डिवाइस लॉन्च करने की योजना है। इसे बटन दबाकर या कलाई की हलचल से सक्रिय किया जा सकेगा। जैक का कहना है कि कंपनी यूजर्स की बातचीत विज्ञापनदाताओं को नहीं बेचेगी, हालांकि प्रायोजित शॉपिंग सुझाव इसके बिजनेस मॉडल का हिस्सा होंगे। फिलहाल Persona iMessage पर बीटा वर्जन में उपलब्ध है और इसके कुछ हजार शुरुआती यूजर्स हैं।

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तमिलनाडु में टीवीके बनाम डीएमके

तमिलनाडु की दो विधानसभा सीटों मथुरांतकम और धारापुरम उपचुनाव का नतीजा इस बात का संकेत है कि अब अन्ना डीएमके की राजनीति के दिन पूरे हो गए। पहले से नेतृत्व के संकट से जूझ रही जयललिता की पार्टी के लिए पैरों पर खड़ा होना मुश्किल होगा। गौरतलब है कि ये दोनों सीटों पिछले चुनाव में अन्ना डीएमके ने जीती थीं। पश्चिमी तमिलनाडु का कोंगू इलाका अन्ना डीएमके का गढ़ माना जाता है और उसी इलाके से पूर्व मुख्यमंत्री ई पलानीस्वामी आते हैं। खराब प्रदर्शन के बावजूद पिछली बार इस इलाके में अन्ना डीएमके ने अच्छा प्रदर्शन किया था। तभी माना जा रहा था कि कम से कम धारापुरम सीट पार्टी बचा लेगी। अगर पार्टी एक भी सीट बचा पाती तो फिलहाल उसके और टूटने की संभावना कम होती। लेकिन उपचुनाव के नतीजों के बाद अब पलानीस्वामी के लिए पार्टी बचाना बहुत मुश्किल हो गया।

उपचुनाव के नतीजों से यह भी साफ हुआ है कि मुख्य विपक्षी पार्टी के तौर पर एमके स्टालिन की डीएमके का असर बचा हुआ है। अन्ना डीएमके के असर वाले इलाके में दोनों सीटों पर डीएमके का उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहा। इसका अर्थ है कि मतदाताओं ने उस पार्टी की पहचान कर ली है, जिसे टीवीके के मुकाबले में रखना है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि भारतीय जनता पार्टी कब तक अन्ना डीएमके के साथ रहती है। पिछले कुछ समय से भाजपा की ओर से डीएमके को संकेत भेजे जा रहे हैं। लेकिन डीएमके ने अभी तक फैसला नहीं किया है। अब भाजपा को मौका मिल गया है कि वह स्थायी रूप से अन्ना डीएमके को छोड़े और डीएमके से तालमेल करे। ध्यान रहे पहले दोनों पार्टियां साथ रही हैं। चूंकि कांग्रेस डीएमके को छोड़ कर टीवीके के साथ जा चुकी है। यह भी ध्यान रखने की जरुरत है कि राज्य की राजनीति दोध्रुवीय रहती है। अगर कांग्रेस और टीवीके साथ रहते हैं और उनका मुकाबला डीएमके से रहता है तो भाजपा भी अन्ना डीएमके को छोड़ेगी।

CJP Protest Updates: अभिजीत दीपके, रांका और दास गिरफ्तार! थोड़ी देर में मजिस्ट्रेट के सामने पेशी! आज जंतर-मंतर पर फिर प्रदर्शन का ऐलान, ध्रुव राठी रिहा

CJP Protest Updates: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका और सौरव दास को गिरफ्तार किए जाने के बाद आज यानी रविवार (11 अक्तूबर) को दिल्ली कैंट पुलिस स्टेशन में एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाएगा। न्यूज एजेंसी ANI ने पार्टी की लीगल हेड रत्ना सिंह के हवाले से यह जानकारी दी है। वरिष्ठ वकील वृंदा ग्रोवर के नेतृत्व में वकीलों की एक टीम CJP नेताओं की ओर से पैरवी कर सकती है। इस बीच, CJP ने चुनावी वोटर लिस्ट में कथित अनियमितताओं के विरोध में आज जंतर-मंतर पर एक बार फिर प्रदर्शन करने का ऐलान किया है।

हिरासत के बाद अरेस्ट हुए CJP नेता

एक अधिकारी ने पीटीआई को बताया, “कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका और सौरव दास को एहतियातन गिरफ्तार किया गया है। उन्हें आज रविवार को दिल्ली कैंट पुलिस थाने में कार्यकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाएगा।”

पुलिस ने बताया कि दिल्ली पुलिस ने शनिवार को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से पहले राष्ट्रीय राजधानी में उनका विमान उतरने के बाद उन्हें हिरासत में लिया था, जिसके बाद उन्हें एहतियातन गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस ने शनिवार को सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए थे। प्रदर्शनकारियों को जंतर-मंतर पहुंचने से रोक दिया था।

रत्ना सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट कर बताया कि अभिजीत, आशुतोष और सौरव दास को सुबह दिल्ली कैंट पुलिस स्टेशन में एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाएगा। उन्होंने कहा कि दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी ने उन्हें सुबह इस बारे में जानकारी दी। CJP की लीगल हेड होने के नाते वह अन्य वकीलों के साथ पुलिस स्टेशन पहुंचेंगी।

दिल्ली एयरपोर्ट पर विमान से हिरासत में लिए गए CJP नेता

CJP के नेता अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को शनिवार को दिल्ली एयरपोर्ट पर एक विमान से हिरासत में लिया गया था। ये नेता जंतर-मंतर पर प्रस्तावित विरोध-प्रदर्शन से पहले हिरासत में लिए गए। पार्टी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन करने की तैयारी में थी।

यह प्रदर्शन वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) में कथित अनियमितताओं के आरोपों को लेकर आयोजित किया जाना था। राजधानी में प्रदर्शन को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई थी। पुलिस ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कई कदम उठाए और प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार कर दिया।

आज फिर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करेगी CJP

CJP ने हिरासत और पुलिस कार्रवाई के बावजूद अपने आंदोलन को जारी रखने का ऐलान किया है। पार्टी ने आज जंतर-मंतर पर फिर से प्रदर्शन करने की घोषणा की है। पार्टी की मांग है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण में कथित अनियमितताओं की जिम्मेदारी लेते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें।

यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब एक दिन पहले ही दिल्ली में CJP के आह्वान पर प्रस्तावित जुटान को रोकने के लिए पुलिस ने बड़े स्तर पर कार्रवाई की थी। रिपोर्ट के मुताबिक, राजधानी में करीब 3,000 लोगों को हिरासत में लिया गया था।

चार पूर्व मुख्यमंत्री भी हिरासत में लिए गए

दिल्ली में हिरासत में लिए गए लोगों में चार पूर्व मुख्यमंत्री भी शामिल थे। इनमें आम आदमी पार्टी (AAP) के अरविंद केजरीवाल, तृणमूल कांग्रेस (TMC) की संस्थापक ममता बनर्जी, वामपंथी नेता पिनराई विजयन और माणिक सरकार के नाम शामिल हैं। प्रदर्शन को लेकर पुलिस और आयोजकों के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है। पुलिस ने प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी है। उसका कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं। वहीं, CJP ने वोटर लिस्ट में कथित अनियमितताओं के मुद्दे पर अपना विरोध जारी रखने का फैसला किया है।

ध्रुव राठी को छोड़ा गया, जंतर-मंतर पहुंचने पर फिर कार्रवाई की चेतावनी

इस पूरे घटनाक्रम के बीच यूट्यूबर ध्रुव राठी को भी दिल्ली पुलिस ने शुक्रवार देर रात रिहा कर दिया था। हालांकि, पुलिस सूत्रों के मुताबिक, यदि वह जंतर-मंतर पहुंचने की कोशिश करते हैं तो उनके खिलाफ दोबारा कार्रवाई की जा सकती है। एक अधिकारी ने रविवार सुबह बताया, “हरियाणा के गुरुग्राम में हिरासत में लिए जाने के बाद यूट्यूबर ध्रुव राठी को देर रात रिहा कर दिया गया।” राठी को आज तड़के 3 बजे रिहा किया गया।

दिल्ली में लगातार हो रही हिरासत की कार्रवाइयों और CJP के नए प्रदर्शन के ऐलान के बाद राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था पर नजर बनी हुई है। अब सबकी निगाहें आज होने वाली मजिस्ट्रेट के समक्ष पेशी और जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन पर टिकी हैं।

सीईसी के इस्तीफा देने तक पीछे नहीं हटेंगे

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने शनिवार को वोटर लिस्ट में कथित अनियमितताओं के खिलाफ तब तक प्रदर्शन जारी रखने का संकल्प जताया, जब तक मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार इस्तीफा नहीं दे देते। CJP ने रविवार सुबह 10 बजे जंतर-मंतर पर फिर से प्रदर्शन करने की घोषणा की है।

इस बीच, दिल्ली ट्रैफिक पुलिस ने नई दिल्ली और मध्य दिल्ली में संभावित पाबंदियों को लेकर चेतावनी जारी की है। शनिवार के प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों, कार्यकर्ताओं और राजनीतिक नेताओं को हिरासत में लिए जाने के बाद आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कॉजपा के राष्ट्रीय संगठन प्रभारी अजिंक्य शिंदे ने कहा कि संगठन इस कार्रवाई के बावजूद पीछे नहीं हटेगा।

CJP के प्रमुख नेताओं के हिरासत में रहने के बीच प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे शिंदे ने कहा, “आप चाहे जितने लोगों को हिरासत में लें। लेकिन जब तक सबसे बड़े गद्दार और देशद्रोही ज्ञानेश कुमार इस्तीफा नहीं देते, हम पीछे नहीं हटेंगे। हम कल सुबह 10 बजे फिर जंतर-मंतर जाएंगे।’” उन्होंने लोगों से बड़ी संख्या में प्रदर्शन में शामिल होने और पुलिस द्वारा रोके जाने पर भी विरोध जारी रखने की अपील की।

शिंदे ने CJP संस्थापक अभिजीत दीपके और सह-संयोजकों सौरव दास तथा आशुतोष रांका की हिरासत के बारे में भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि हिरासत में लिए जाने के 12 घंटे बाद भी तीनों के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई।

सुवेंदु सरकार को शत प्रतिशत अंक

नंदीग्राम से ज्यादा महत्वपूर्ण चुनाव नतीजा रेजिनगर विधानसभा सीट का है, जहां से भाजपा के सखारव सरकार ने आम जनता उन्नयन पार्टी यानी एजेयूपी के उम्मीदवार गुलाम नबी आजाद को 75 हजार से अधिक वोट से हराया। रेजिनगर का परिणाम पश्चिम बंगाल के साथ साथ देश की राजनीति पर गंभीर असर डालने वाला है। यह चुनाव परिणाम विपक्ष की राजनीति को भी नए सिरे से व्याख्यायित करेगा।

यदि नंदीग्राम और रेजिनगर विधानसभा सीट के उपचुनाव को पांच महीने पुरानी सुवेंदु अधिकारी सरकार की परीक्षा मानें तो कह सकते हैं कि सुवेंदु शत प्रतिशत अंक के साथ उतीर्ण हुए हैं। नंदीग्राम सीट जीतने का जो रिकॉर्ड उन्होंने खुद बनाया था वह रिकॉर्ड उनकी उम्मीदवार हसीरानी रथ ने तोड़ दिया। इस रिकॉर्ड का टूटना सुवेंदु अधिकारी की अपनी उपलब्धि में शुमार होगा। सुवेंदु ने 2016 के चुनाव में एक रिकॉड बनाया था, जब उन्होंने सीपीआई के अब्दुल कबीर शेख को 81 हजार से ज्यादा वोट से हराया था। उसके 10 साल बाद 2026 के उपचुनाव में उनकी चुनी हुई उम्मीदवार हसीरानी रथ ने कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के साझा उम्मीदवार मिलन प्रधान को एक लाख 22 हजार से ज्यादा वोट से हराया। यह निजी तौर पर सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व और उनकी सरकार के कामकाज पर सिर्फ नंदीग्राम की जनता की नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की जनता की स्वीकृति की मुहर है।

नंदीग्राम से ज्यादा महत्वपूर्ण चुनाव नतीजा रेजिनगर विधानसभा सीट का है, जहां से भाजपा के सखारव सरकार ने आम जनता उन्नयन पार्टी यानी एजेयूपी के उम्मीदवार गुलाम नबी आजाद को 75 हजार से अधिक वोट से हराया। रेजिनगर का परिणाम पश्चिम बंगाल के साथ साथ देश की राजनीति पर गंभीर असर डालने वाला है। यह चुनाव परिणाम विपक्ष की राजनीति को भी नए सिरे से व्याख्यायित करेगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह चुनाव परिणाम दशकों से स्थापित कई राजनीतिक मान्यताओं और धारणाओं को तोड़ने वाला है।

रेजिनगर विधानसभा सीट मुर्शिदाबाद जिले में आती है, जहां पूरे जिले में औसत मुस्लिम आबादी 55 से 60 फीसदी के करीब है। उसमें भी रेजिनगर विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग 70 फीसदी है। मुर्शिदाबाद जिले के ही बेलडांगा में हुमायूं कबीर ने बाबरी मस्जिद की नींव रखी है। बाबरी मस्जिद की नींव रखने के बाद उन्होंने एजेयूपी नाम से पार्टी का गठन किया और दो सीटों से चुनाव लड़े। तमाम निगेटिव प्रचार के बावजूद वे दोनों सीटों से जीते। रेजिनगर सीट पर हुमायूं कबीर 58 हजार से ज्यादा वोट से जीते थे। लेकिन उनके इस्तीफे से खाली हुई इस सीट पर उनके बेटे गुलाम नबी आजाद 75 हजार से ज्यादा वोट से हारे। हुमायूं कबीर जितने वोट से जीते थे उतना वोट भी उनके बेटे को नहीं मिला। रेजिनगर सीट के चुनाव परिणाम की एक विशेष बात यह भी रही कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की पारंपरिक प्रतिद्वंद्री पार्टियों यानी कांग्रेस, तृणमूल और वामपंथी तीनों को मिला कर सिर्फ 13 हजार वोट मिले। लगातार 15 साल पश्चिम बंगाल में राज करने वाली ममता बनर्जी की पार्टी के उम्मीदवार और पूर्व विधायक रबीउल आलम चौधरी को सिर्फ 3,797 वोट मिले।

जिस विधानसभा सीट पर 70 फीसदी मुस्लिम आबादी हो उस सीट पर भाजपा के हिंदू उम्मीदवार को 63 फीसदी से ज्यादा वोट मिले। अगर तर्क के लिए यह मान लिया जाए कि सभी 30 फीसदी हिंदुओं ने भाजपा उम्मीदवार को वोट किया तब भी कम से कम 33 फीसदी मुस्लिम वोट भाजपा को मिले हैं। हर तीन में से एक मुस्लिम मतदाता ने भाजपा को वोट किया है। यह बहुत बड़ा और पश्चिम बंगाल के साथ साथ देश की राजनीति को प्रभावित करने वाला घटनाक्रम इसलिए है क्योंकि पांच महीने पहले के चुनाव में इसी सीट पर भाजपा के हिंदू उम्मीदवार को सिर्फ 27 प्रतिशत वोट मिले थे। पांच महीने के अंदर 36 फीसदी वोट का स्विंग अभूतपूर्व है। यह मुस्लिम मतदाताओं के मतदान व्यवहार में आए एक बड़े बदलाव का संकेत है।

इस चुनाव परिणाम के अलग अलग आयामों को समझने की आवश्यकता है। सबसे पहला और स्पष्ट आय़ाम यह है कि सुवेंदु अधिकारी ने अपने पांच महीने के छोटे से कार्यकाल में जो काम किया है उससे उन्होंने समाज के सभी वर्गों का भरोसा जीता है। इसमें समान रूप से मुस्लिम भी शामिल हैं। आंकड़े इसकी कहानी खुद बता रहे हैं। रेजिनगर में भाजपा के उम्मीदवार को जितना वोट हिंदुओं का मिला है उससे ज्यादा वोट मुसलमानों का मिला है। यह किसी भय या दबाव का नतीजा नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि मुसलमानों ने सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व को स्वीकार किया है। यह उनके व्यक्तित्व का कमाल है कि उन्होंने मुस्लिमों का आह्वान किया और दोस्ती का मौका दिया तो मुस्लिम समाज ने इसे दिल खोल कर स्वीकार किया। उन्होंने भाजपा के प्रति अपने पूर्वाग्रह को छोड़ दिया। सुवेंदु अधिकारी उनको यह भरोसा दिलाने में सफल रहे हैं कि उनका हिंदुत्व किसी दूसरे धर्म को मानने वाले को नुकसान पहुंचाने या प्रताड़ित करने वाला नहीं है। उनका हिंदुत्व समावेशी है। मुसलमानों के मन में यह भरोसा इसलिए भी बना क्योंकि सुवेंदु सरकार ने सरकार की समस्त लोक कल्याणकारी योजनाओं को प्रभावी ढंग से जारी रखा, किसी के साथ भेदभाव नहीं किया।

ऐसे ही कानून व्यवस्था बहाल करने और राज्य में हिंसा, वसूली, तोलाबाजी, कट-मनी आदि की संस्कृति को समाप्त करने के लिए भी सुवेंदु अधिकारी की सरकार ने जो काम किया वह किसी जाति या धर्म को ध्यान में रख कर नहीं किया। असामाजिक तत्वों के खिलाफ कार्रवाई हुई, जिससे समाज में शांति बहाल हुई है। समाज में शांति बहाली का लाभ हर धर्म व जाति के लोगों को मिलता है। दशकों तक लेफ्ट और फिर डेढ़ दशक तक तृणमूल कांग्रेस के शासन में अराजकता, हिंसा और लूट से हर जाति व धर्म के लोग त्रस्त थे। उनको लेफ्ट व तृणमूल शासन में हुए शोषण का अहसास हुआ है। तभी उनके लिए सुवेंदु का शासन ताजा हवा के झोंके की तरह है। कह सकते हैं कि सरकार ने पांच महीने की छोटी सी अवधि में जिस तरह से शांति और सौहार्द्र स्थापित किया है उसी का परिणाम है कि भाजपा रेजिनगर जैसी सीट पर जीती और नंदीग्राम में जीत का रिकॉर्ड स्थापित किया।

यहां इस बात का जिक्र करना भी आवश्यक है कि रेजिनगर जैसी ही सामाजिक संरचना वाली असम की नगांव लोकसभा सीट पर भी भारतीय जनता पार्टी जीती है। नगांव में लगभग 60 फीसदी आबादी मुस्लिम है। इसके बावजूद इस सीट पर भाजपा के देबाशीष शर्मा डेढ़ लाख वोट से चुनाव जीते। असम में मुसलमानों के मसीहा माने जाने वाले जमात और एआईयूडीएफ के नेता बदरूद्दीन अजमल खुद उस सीट पर चुनाव लड़े थे। इसके बावजूद 40 फीसदी हिंदू आबादी वाली सीट पर भाजपा उम्मीदवार को 50 प्रतिशत वोट मिले। कांग्रेस की शिबोमणी बसु को सवा लाख से भी कम वोट मिले और वे तीसरे स्थान पर रहीं। नगांव सीट की जीत भी समावेशी और लोक कल्याण की राजनीति की जीत है। यह भी मुस्लिम मतदाताओं के बदलते व्यवहार का संकेत है। ध्यान रहे जब बदरूद्दीन अजमल ने पार्टी बनाई थी, तब राज्य के बड़े हिस्से में मुस्लिम कांग्रेस को छोड़ कर उनके साथ गए थे। पिछले दो चुनावों में दिखा कि मुस्लिम अजमल को छोड़ कर कांग्रेस की ओर लौटे। लेकिन इस साल मई में आए विधानसभा चुनाव नतीजों से सबक लेकर मुस्लिम मतदाता अब अपनी नई पोजिशनिंग करते दिख रहे हैं। कुछ मुस्लिम मतदाता कांग्रेस और एआईयूडीएफ की बाइनरी से निकल कर भाजपा को भी एक विकल्प के तौर पर देख रहे हैं। यह दोनों की राजनीति के लिए चिंता की बात होगी।

अगर रेजिनगर व नंदीग्राम विधानसभा और नगांव लोकसभा सीट के चुनाव परिणामों के व्यापक असर की बात करें तो राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी इसका एक बड़ा संदेश है। इससे यह धारणा निर्णायक रूप से टूटी है कि मुस्लिम किसी हाल में भाजपा को वोट दे ही नहीं सकता है। अगर सरकार समावेशी हो, लोक कल्याणकारी हो और कानून व्यवस्था सुनिश्चित करने वाली हो तो मुस्लिम भी उसको वोट कर सकते हैं। वैसे भी तीन तलाक समाप्त होने और उसे अवैध बनाए जाने के बाद से मुस्लिम महिलाओं का एक हिस्सा नरेंद्र मोदी के नेतृत्व का समर्थन करता है और उनकी पार्टी को वोट करता है। चुनाव बाद जुटाए गए कई राज्यों के आंकड़े इसकी गवाही देते हैं। धीरे धीरे ही सही लेकिन इस तरह का बदलाव अगर मुस्लिम मतदाताओं के व्यवहार में दिखता है तो उससे सामाजिक व राजनीतिक विभाजन कम होगा। भारत का समाज भी समावेशी बनेगा और तुष्टिकरण की राजनीति भी समाप्त होगी।

जहां तक विपक्ष की बात है तो मुख्य विपक्षी कांग्रेस और उसकी सहयोगी तृणमूल कांग्रेस के लिए इन नतीजों में दो बड़े संकेत छिपे हैं। पहला, मुसलमानों के मन में भाजपा के प्रति नफरत का भाव भरने के तमाम प्रयासों के बावजूद मुसलमान पूर्वाग्रह छोड़ कर भाजपा के साथ जा सकते हैं। दूसरा, तुष्टिकरण के तमाम प्रयासों के बावजूद कांग्रेस और तृणमूल जैसी पार्टियों से मुसलमानों का मोहभंग हो रहा है। कम से कम पश्चिम बंगाल और असम जैसी 30 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले राज्यों में मुस्लिम अब पारंपरिक सेकुलर पार्टियों की बजाय मुस्लिम नेताओं वाली पार्टियों की ओर देख रहे हैं। तभी नगांव में बदरूद्दीन अजमल और रेजिनगर में गुलाम नबी आजाद दूसरे स्थान पर रहे। दोनों सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं ने कांग्रेस को ठुकराया।  (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)

अनगिनत विद्रोह और वो बुनियादी सवाल!

शुरुआत के तीन दिन के अंदर ‘सत्याग्रह’ वेबसाइट पर संघर्ष (या समस्याओं) की 30 हजार से अधिक कहानियां दर्ज कराई गईं। उनमें सबसे ज्यादा संख्या शिक्षा, भ्रष्टाचार, जातीय भेदभाव, स्वास्थ्य सेवाओं, श्रम अधिकारों, और किसान से जुड़े मुद्दों की रहीं। इनसे संबंधित प्रवृष्टियां हजारों की संख्या में आईं।… वोट चोरी बड़ा मुद्दा है, जिसने भारत के राजनीतिक रूप से जागरूक तबकों को उद्वेलित किया है। इनके साथ जमीनी संघर्षों  को भी जोड़ कर देखें, तो बेशक इस समय देश में मौजूद बेचैनी के आलम का अंदाजा लगता है।

सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने हाल में अपने एक सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा- “जून में हुए CJP प्रदर्शनों ने देश में असंख्य छोटे‑बड़े विद्रोहों को जन्म दिया है। (मुख्य निर्वाचन आयुक्त) ज्ञानेश कुमार द्वारा की गई ‘वोट चोरी’ अब स्वतंत्रता के बाद भारत का सबसे बड़ा मुद्दा बन गई है। यह हमारे लोकतंत्र की जड़ पर चोट करती है। सरकार की अपने ‘तोते’ ज्ञानेश को बचाने के लिए प्रदर्शनों को दबाने की कोशिशें उलटी पड़ रही हैं। इससे जनता का गुस्सा और बढ़ रहा है, जो अब उबाल पर है।”

दरअसल, भूषण ने अंग्रेजी में लिखे इस पोस्ट में ‘million mutinies in the country’ लिखा, जिसका अनुवाद हमने ‘असंख्य छोटे-बड़े विद्रोहों’ के रूप में किया है। यह उपमा संभवतः उन्होंने मशहूर लेखक वी.एस. नॉयपॉल की पुस्तक A Million Mutinies Now से ली है। यह किताब नॉयपॉल की भारत संबंधी त्रि-कथा (Trilogy) की आखिरी रचना है, जो 1990 में प्रकाशित हुई थी।

नॉयपॉल की A Million Mutinies Now का सार है कि भारत की सतह पर दिखने वाली हलचल और उथल-पुथल किसी आने वाले विनाश का संकेत नहीं, बल्कि एक “बौद्धिक और सामाजिक जागरण” का परिणाम है। यह छोटे-छोटे विद्रोहों का ऐसा महा-समुद्र है, जो अंततः भारत को अपनी वास्तविक पहचान और स्वतंत्रता की ओर ले जा रहा है।

नायपॉल ने यह किताब 1980 के दशक में भारत यात्रा पर आने के बाद लिखी थी। यहां घूमते हुए उन्हें अहसास हुआ कि स्वतंत्रता के बाद का भारत अब ऐसे दौर में पहुंच गया है, जहां समाज के हर हिस्से में छोटे‑छोटे विद्रोह और असंतोष दिखाई देते हैं। लेकिन ये विद्रोह किसी बड़े क्रांतिकारी आंदोलन की तरह नहीं हैं, बल्कि जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र, राजनीति और व्यक्तिगत आकांक्षाओं से जुड़े संघर्ष हैं। नायपॉल ने इसे भारत के बदलते समाज का प्रतीक माना- जहां लोग अब चुप नहीं रहते, बल्कि अपनी पहचान और अधिकारों के लिए आवाज़ उठाते हैं।

संदर्भ के लिए यह उल्लेख कर लेना उचित होगा कि नॉयपॉल दरअसल संप्रदाय, जाति, क्षेत्र एवं भाषा की पहचान जता रही गतिविधियों से प्रभावित थे, जिन्हें भारतीय नवजागरण के दौर में संकीर्ण एवं भारत की राष्ट्रीय एकता के लिए चुनौती समझा जाता था। नेहरूवादी नीतियों एवं भारतीय धर्मनिरपेक्षता के वे कड़े आलोचक थे। उनका मानना था कि भारत में धर्मनिरपेक्षता का उपयोग अक्सर ऐतिहासिक सच्चाइयों और मध्यकालीन (यानी मुस्लिम) आक्रमणों के घावों को छिपाने के राजनीतिक हथकंडे के रूप में किया गया। अपनी इसी सोच के आधार पर नॉयपॉल ने बाबरी मस्जिद को तोड़ने के लिए हुए राम जन्मभूमि आंदोलन को भारत में एक ऐतिहासिक सांस्कृतिक जागरण के रूप में देखा।

इस रूप में समझा जाएगा कि नरेंद्र मोदी का शासन उस कथित “ऐतिहासिक सांस्कृतिक जागरण” का ठोस परिणाम है। यानी आज देश जहां है, वह 1980-90 के दशकों की ‘Million Mutinies’ का परिणाम है। मगर अब बात जिन ‘Million Mutinies’ की हो रही है, वो दरअसल, उन परिणामों से बनी जकड़न से निकलने की जद्दोजहद की मिसाल हैं।

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने हाल में इन ‘छोटे-मोटे विद्रोहों’ को साझा मंच प्रदान करने की एक सराहनीय पहल की। सत्याग्रह (http://rahulgandhi।in/satyagraha वेबसाइट की शुरुआत करते हुए उन्होंने लिखाः “देशभर में लोग अपने हक़ के लिए लड़ रहे हैं- और अक्सर अकेले लड़ रहे हैं। Gen Z, छात्र, किसान, आदिवासी, दलित, महिलाएं- हर संघर्ष की अपनी कहानी है। पर जो आवाज़ अकेली उठती है, वो अक्सर दब जाती है। ‘सत्याग्रह’ इन्हीं आवाज़ों को एक नक्शे पर साथ लाने की पहल है। बापू ने यही सिखाया था- सच सबसे बड़ा हथियार है। पर उससे भी बड़ा हथियार है, एकता में सच के साथ खड़े होना। अगर आप भी किसी अन्याय से लड़ रहे हैं- अपनी कहानी भेजिए। दो मिनट लगेंगे। आपकी कहानी नक्शे पर आएगी। आप देखेंगे कि आपकी तरह और कौन-कौन लड़ रहा है। और मैं जो कर सकता हूं, करुंगा- संसद में, सड़क पर, खत लिखकर, जहां भी मेरी ज़रूरत हो वहां आपके साथ खड़े होकर- नेता विपक्ष के रूप में ये मेरी ज़िम्मेदारी है। अपने सत्याग्रह की कहानी मुझे यहां बताएं।”

इस पहल की शुरुआत के तीन के अंदर ‘सत्याग्रह’ वेबसाइट पर संघर्ष (या समस्याओं) की 30 हजार से अधिक कहानियां दर्ज कराई गईं। उनमें सबसे ज्यादा संख्या शिक्षा, भ्रष्टाचार, जातीय भेदभाव, स्वास्थ्य सेवाओं, श्रम अधिकारों, और किसान से जुड़े मुद्दों की रहीं। इनसे संबंधित प्रवृष्टियां हजारों की संख्या में आईं। जबकि “वोट चोरी” से संबंधित जिस संघर्ष को प्रशांत भूषण ने “स्वतंत्रता के बाद भारत का सबसे बड़ा मुद्दा” बताया है, उससे संबंधित सिर्फ 559 (सात अक्टूबर को दिन में एक बजे तक) शिकायतें दर्ज हुईं।

फिर भी यह निर्विवाद है कि वोट चोरी बड़ा मुद्दा है, जिसने भारत के राजनीतिक रूप से जागरूक तबकों को उद्वेलित किया है। कॉकरोच जनता पार्टी के इस आंदोलन में उतरने और उसे मिले भारी समर्थन से जाहिर है कि अभिजात्य वर्ग के एक बड़े हिस्से में भी “चुनावों को नियंत्रित” कर लिए जाने के आरोप को गंभीरता से लिया गया है। इस कारण मीडिया, सोशल मीडिया, और आम चर्चाओं में यह सवाल सर्वोपरि बना हुआ है।

इनके साथ जमीनी संघर्षों (जिनमें से कई ने राहुल गांधी की वेबसाइट पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है) को भी जोड़ कर देखें, तो बेशक इस समय देश में मौजूद बेचैनी के आलम का अंदाजा लगता है। इनके परिणामस्वरूप कई क्षेत्रों में सामाजिक अस्थिरता की स्थिति है। आर्थिक दबाव और उस कारण जन्में संघर्षों की कहानी तो लगभग पूरे देश में साकार होती दिखती है। लेकिन उनका कोई सकल एवं राष्ट्र-व्यापी प्रभाव उभरता अभी तक नजर नहीं आया है।

इस सिलसिले में व्लादीमीर इलिच लेनिन का वो कथन अक्सर याद आता है, जिसमें उन्होंने कहा था- There are no people– yet there is a mass of people। इस पूरे कथन का सार था- “जनता बहुत है, असंतोष भी बहुत है, लेकिन नेतृत्व नहीं है। कामगार वर्ग और समाज के अलग‑अलग हिस्सों से हर साल असंतुष्ट लोग सामने आते हैं, जो विरोध करना चाहते हैं और निरंकुश शासन के खिलाफ संघर्ष में मदद देने को तैयार हैं। पर समस्या यह है कि उन्हें दिशा देने वाले नेता और संगठनकर्ता नहीं हैं, जो सबकी ताकत को एकजुट करके संगठित और सामंजस्यपूर्ण आंदोलन बना सकें।” (On Organization)

इस कथन का आशय यह भी था कि संगठित करने वाले सक्षम नेतृत्व और रणनीतिकारों के अभाव के कारण क्रांतिकारी आंदोलन की ऊर्जा बिखर जाती है और उसका प्रभाव सीमित हो जाता है। इस बात की पुष्टि वैसे तो आधुनिक इतिहास के हर दौर में हुई है, लेकिन खासकर 21वीं सदी में इसके उदाहरण भरे-पड़े हैं। 2010 का दशक दुनिया भर में विशाल जन आंदोलनों के उभार का रहा। 2011 तो ऐसा वर्ष था, जब अमेरिकी पत्रिका टाइम ने अपनी सालाना रवायत के तहत “The Protester” को Person of the Year घोषित किया। उसका संदर्भ अरब स्प्रिंग (ट्यूनिशिया, मिस्र, लीबिया, सीरिया, बहरीन आदि में जन विद्रोह, अमेरिका में Occupy Wall Street आंदोलन, यूरोप (खास कर ग्रीस और स्पेन) में आर्थिक संकट के खिलाफ प्रदर्शनों, भारत में अन्ना आंदोलन, और मेक्सिको तथा अन्य कई देशों में अलग-अलग मुद्दों पर जन आंदोलनों से बना था।

मशहूर लेखक और पत्रकार विन्सेंट बोविन ने उन आंदोलन का लगभग एक दशक तक अध्ययन करने के बाद “If We Burn: The Mass Protest Decade and the Missing Revolution” नाम की किताब लिखी, जिसका प्रकाशन 2023 में हुआ। उसमें उन्होंने यही समझने की कोशिश की है कि 2010–20 के वैश्विक जन आंदोलन संरचनात्मक बदलाव में क्यों नहीं बदल पाए? उन्होंने लिखा कि ऐसे संघर्षों से अधिक से अधिक संबंधित देश में राजनीतिक शून्यता पैदा होती है, लेकिन यह क्षणिक या अस्थायी घटना बन कर रह जाती है। बेविन्स ने लिखा है:

“जन आंदोलन के दशक में, सड़कों पर (जन आक्रोश के) हुए अचानक विस्फोटों ने कई बार क्रांतिकारी हालात पैदा किए। लेकिन साधारण विरोध प्रदर्शन ऐसे हालात का लाभ उठाने के लिए बहुत कमजोर साबित होते हैं, और इस तरह के विरोध प्रदर्शन इस मोर्चे पर नाकाम रह जाते हैं। अगर आप मानते हैं कि आप एक बेहतर समाज बना सकते हैं… तो आपको खुद उस राजनीतिक खालीपन में प्रवेश करना चाहिए। लेकिन अलग‑अलग कारणों से सड़क पर उतरे बिखरे हुए व्यक्तियों के समूह सीधे सत्ता अपने हाथ में नहीं ले सकते, कम-से-कम पूरे समूह के रूप में तो नहीं ही। अगर कोई व्यक्ति समूह उस राजनीतिक खालीपन में जाकर जनता के नाम पर सत्ता लेता है, तो वह एक प्रकार के अग्रिम दस्ते (vanguard) की भूमिका निभाता है, जो एक विशेष वैचारिक परियोजना से प्रेरित होता है। कुछ आदर्शवादी, सत्ता‑विरोधी विचारधाराओं में मान लिया गया कि उथल-पुथल से ही नया समाज बन जाएगा, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हो पाया है।”

अर्थ यह कि सिर्फ सड़क पर हुआ विरोध क्रांति को दिशा नहीं दे सकता। सत्ता हाथ में लेने के लिए संगठित नेतृत्व और वैचारिक परियोजना की ज़रूरत होती है। मार्क्सवादी क्रांति के संदर्भ में ऐसी एक चर्चित टिप्पणी लेनिन की भी है। उन्होंने कहा था- “अक्सर कहा जाता है कि श्रमिक वर्ग स्वाभाविक रूप से समाजवाद की ओर आकर्षित होता है। यह बिल्कुल सही है, क्योंकि समाजवादी सिद्धांत श्रमिक वर्ग की दुर्दशा के कारणों को अन्य किसी भी अन्य सिद्धांत से अधिक गहराई से और सही ढंग से उजागर करता है। इसी वजह से मजदूर इसे आसानी से अपना लेते हैं- बशर्ते कि यह सिद्धांत खुद ‘स्वतःस्फूर्तता’ के आगे न झुक जाए और उस ‘स्वतःस्फूर्त’ बनी स्थिति को अपने अधीन कर ले। कामगार वर्ग स्वाभाविक रूप से समाजवाद की ओर बढ़ता है; फिर भी, सबसे व्यापक और लगातार नए रूपों में उभरती हुई पूंजीवादी विचारधारा भी स्वाभाविक रूप से कामगार वर्ग पर हावी रहती है।”

फिलहाल, भारत में बात मजदूर तबकों की लड़ाई की नहीं हो रही है। अभी संदर्भ पूंजीवादी ढांचे के तहत मिली सीमित आजादियों और अधिकारों की रक्षा का है। यह गौरतलब है कि इन आजादियों और अधिकारों को अधिक बड़े जन समूहों के साथ साझा करने पर एक दौर में राजी हुए शासक वर्ग इस युग में आकर ऐसी “रियायत” को माकूल और मुनासिब नहीं मान रहे हैं। यह एक वैश्विक परिघटना है। दुनिया भर में आम जन से ऐसी “रियायतों” को छीन लेने की परियोजना इस दौर की हकीकत है। इसके लिए लगभग हर जगह (जहां चुनावी लोकतंत्र है) धुर दक्षिणपंथी ताकतों को शासक समूहों ने अपना औजार बनाया है, जिन्होंने नफरत और विभेद की रणनीति से आम जन को भटकाने की अपनी क्षमता साबित की है।

लाजिम है कि ऐसी कोशिशों के खिलाफ प्रभावित जन समूहों ने प्रतिरोध का रास्ता अख्तियार किया है। जिस समय भारत में ‘Million Mutinies’ की बात हो रही है, उसी समय फ्रांस, स्पेन, जर्मनी और यहां तक कि पाकिस्तान में भी हो रहे बड़े जन प्रदर्शनों ने दुनिया का ध्यान खींच रखा है। कहा जा सकता है कि एक बार फिर “The Protester” अग्रिम कतार में आ खड़ा हुआ है। इससे संभव है कि कुछ जगह राजनीतिक शून्य पैदा हो। लेकिन उससे वो पृष्ठभूमि कितनी बदलेगी, जिसकी वजह से आवाम के हासिल अधिकारों पर तलवारें चली हैं और जिनसे आहत होकर लोग प्रतिरोध जताने के लिए प्रेरित हुए हैं?

जैसाकि ऊपर चर्चा हुई, भारत में ‘वोट चोरी’ एक बड़ा मसला है, लेकिन मुद्दे और भी हैं, जैसी झलक राहुल गांधी की पहल ‘सत्याग्रह’ पर देखने को मिली है। बल्कि एक तर्क यह हो सकता है कि उन समस्याओं (शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, रोजगार, रोजमर्रा की जिंदगी से संबंधित अन्य मसलों) से परेशान लोग अपनी वोट की ताकत से मौजूदा शासन तंत्र में कोई अस्थिरता पैदा ना करें, इसलिए उनके वोट के प्रभाव को कमजोर करना शासक वर्गों की फिलहाल सर्वोच्च प्राथमिकता बन गई है। इसलिए- एक व्यक्ति एक वोट, समान मूल्य- के सिद्धांत को व्यवहार में बचाना इस समय की भले सबसे बड़ी जरूरत हो, लेकिन इस सवाल को सिर्फ इससे ही बांध कर नहीं रखा जा सकता। यह कहना और बार-बार दोहराना जरूरी है कि वोट का अधिकार अपने-आप में अंतिम लक्ष्य नहीं है, बल्कि यह आम जिंदगी को बेहतर बनाने का एक माध्यम भर है और इसीलिए महत्त्वपूर्ण है।

इस लिहाज से अधिक दूरगामी महत्त्व का प्रश्न यह है कि दशकों तक वोट का अधिकार मिले रहने के बावजूद बहुसंख्यक जनता की जिंदगी में उसका असर सीमित क्यों बना रहा और क्या गारंटी है कि आगे ऐसा नहीं होगा? इस नजरिए से वह बदलाव जरूरी हो जाता है, जैसा 2010-20 के दशक में ना हो पाने का जिक्र और उसके कारणों की पड़ताल विन्सेंट बोविन ने अपनी पुस्तक If We Burn में की है। इसलिए मौजूदा ‘Million Mutinies’ को mass of people के बीच no people की हकीकत से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए। बोविन ने दशक भर पुराने आंदोलनों से टिकाऊ बदलाव ना होने के लिए जिस vanguard की कमी को जिम्मेदार माना, आज असल सवाल वही है कि भारत में उस शर्त को पूरा करने बारे में क्या चर्चा हो रही है? इसकी जरूरत पर कितना जोर दिया जा रहा है, और इस विकल्प की तैयारी के लिए क्या प्रयास हो रहे हैं?

जंग का मैदान बनी दिल्ली

नई दिल्ली। शनिवार को दिन भर लगभग पूरी दिल्ली जंग का मैदान बनी रही। कॉकरोच जनता पार्टी ने सेंट्रल दिल्ली में जंतर मंतर पर प्रदर्शन का ऐलान किया था लेकिन पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने पूरी दिल्ली को कब्जे में ले रखा था। पुलिस और अर्धसैनिक बलों के 38 हजार जवान अलग अलग जगहों पर तैनात थे, जिन्होंने सात हजार के करीब प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया।

पुलिस ने जगह जगह बैरिकेडिंग कर रखी थी और जंतर मंतर पहुंचने की कोशिश कर रहे युवाओं व छात्रों को अलग अलग जगहों से पकड़ा। उनको बसों में भर कर दूरदराज के इलाकों में ले जाया गया। देर शाम प्रदर्शनकारियों को रिहा किया गया। इससे पहले सोनम वांगचुक ने ऐलान किया था कि अगर प्रदर्शनकारी रिहा नहीं होते हैं तो वे आंदोलन करेंगे। इस बीच शनिवार की शाम को सीजेपी ने रविवार को फिर से जंतर मंतर की ओर मार्च करने का ऐलान किया।

एसआईआर और वोट चोरी के आरोपों से घिरे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी, आम आदमी पार्टी और वामपंथी पार्टियों के साथ साथ सिविल सोसायटी के लोगों ने 10 अक्टूबर को जंतर मंतर पर प्रदर्शन का ऐलान किया था। पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने पूरा जोर लगा कर प्रदर्शनकारियों को जंतर मंतर पहुंचने से रोक दिया। जंतर मंतर पहुंचने का प्रयास करते हुए ममता बनर्जी को गिरफ्तार किया गया तो अरविंद केजरीवाल को भी हिरासत में लिया गया। हालांकि बाद में दोनों को छोड़ दिया गया।

सुबह की उड़ान से दिल्ली पहुंचे सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके को अन्य नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका के साथ एयरपोर्ट पर ही हिरासत में ले लिया गया। बाद में उनकी दादी के निधन की खबर आई तो पुलिस ने उनको घर जाने की इजाजत दे दी। असल में पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने जंतर मंतर के आसपास पांच लेयर की बैरिकेडिंग की थी। प्रदर्शन के लिए तय जगह तक पुलिस ने किसी को पहुंचने नहीं दिया। दीपके की गिरफ्तारी के बाद उनका एक पुराना वीडियो जारी किया गया, जिसमें उन्होंने कहा था कि उनको हिरासत में लिए जाने के बाद आजिंक्य शिंदे आंदोलन का नेतृत्व करेंगे। बाद में शिंदे ने कमान संभाली और लोगों से जंतर मंतर की ओर बढ़ने का आह्वान किया। सीजेपी ने कहा कि ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे तक प्रदर्शन जारी रहेगा।

प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए सरकार ने बहुत बड़ी तैयारी की थी। आठ से 12 अक्टूबर तक के लिए केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की 221 कंपनियां यानी करीब 23 हजार जवान दिल्ली बुला कर तैनात किए गए। इनके अलावा दिल्ली पुलिस के कम से कम 15 हजार जवानों और अधिकारियों की तैनाती की गई। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अनदेखी करते हुए 45 मेट्रो स्टेशन बंद रखे गए। करीब ढाई सौ ट्रेनें रद्द कर दी गईं। कनॉट प्लेस के आसपास दुकानें बंद थीं तो जंतर मंतर के चार किलोमीटर के दायरे में इंटरनेट बंद रखा गया था। स्कूल व कॉलेज भी या तो बंद थे या ऑनलाइन पढ़ाई हो रही थी।

Saudi-Houthi War: सऊदी अरब पर हूती विद्रोहियों का बड़ा हमला! रियाद एयरपोर्ट पर मिसाइल हमले में 12 लोगों की मौत, 300 से ज्यादा घायल

Saudi-Houthi War: हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब की राजधानी रियाद के किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर अब तक का सबसे बड़ा हमला किया है। ताजा हमले में 12 लोगों की मौत हो गई है। जबकि 300 से अधिक लोग घायल हुए हैं। सऊदी अरब के नागरिक उड्डयन अधिकारियों ने रविवार (11 अक्टूबर) तड़के यह जानकारी दी। घायलों में कई की हालत गंभीर बताई गई है। सऊदी अरब ने इस हमले के लिए पड़ोसी देश यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों को जिम्मेदार ठहराया है। इस हमले के बाद सऊदी और हूती के बीच जारी जंग के खतरनाक रूप लेने के संकते है।

इस हमले को खाड़ी के अरब देशों में ईरान युद्ध शुरू होने के बाद की सबसे घातक घटनाओं में से एक बताया गया है। क्षेत्र में पहले से जारी तनाव के बीच हूती विद्रोहियों और सऊदी समर्थित यमनी सरकारी बलों के बीच लड़ाई तेज होने से संघर्ष का दायरा भी बढ़ा है। एक दशक से भी ज्यादा समय में सऊदी अरब में हुए इन सबसे घातक हमलों ने खाड़ी देश को हिलाकर रख दिया है। सीमा-पार तनाव बढ़ने के बीच देश हफ्ते से मिलिटेंट्स के हमलों को रोकने के लिए संघर्ष कर रहा है।

एयरपोर्ट के घरेलू टर्मिनल परिसर को बनाया निशाना

क्षेत्रीय अधिकारी के मुताबिक, एक मिसाइल किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट के उस परिसर से टकराई, जहां घरेलू उड़ानों के लिए इस्तेमाल होने वाले टर्मिनल 3 और 4 स्थित हैं। अधिकारी ने पहचान गोपनीय रखने की शर्त पर जानकारी दी, क्योंकि उन्हें मीडिया से बात करने की आधिकारिक अनुमति नहीं थी। हमले के बाद सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो फुटेज में एयरपोर्ट के बाहर आपातकालीन गाडि़यां दिखाई दिए। इन वीडियो का न्यूज एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस (AP) ने विश्लेषण किया है। सऊदी अधिकारियों के अनुसार, घायलों को इलाज के लिए कई अस्पतालों में भर्ती कराया गया है।

मृतकों में कई देशों के नागरिक शामिल

सऊदी अधिकारियों की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, मृतकों में चार सऊदी नागरिकों के अलावा बांग्लादेश के दो नागरिक और अमेरिका, फिलिस्तीन, मिस्र, जॉर्डन, सीरिया तथा सूडान का एक-एक नागरिक शामिल है। इस तरह अलग-अलग देशों के नागरिक इस हमले की चपेट में आए हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी हमले में एक अमेरिकी नागरिक की मौत की पुष्टि की है। उन्होंने सोशल मीडिया पर हमले की निंदा करते हुए कहा कि इस तरह के हमले निर्दोष नागरिकों की जिंदगी के प्रति घोर उपेक्षा दर्शाते हैं और इन्हें तत्काल रोका जाना चाहिए।

सऊदी गठबंधन ने हूतियों को ठहराया जिम्मेदार

हूतियों के खिलाफ लड़ रहे सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने हमले की कड़ी निंदा की है। गठबंधन ने इसे ‘पूरी तरह युद्ध अपराध’ करार देते हुए कड़ी जवाबी कार्रवाई करने की चेतावनी दी है। उसका कहना है कि एयरपो्ट पर कोई अमेरिकी सैन्य ठिकाने नहीं है। पिछले एक सप्ताह के दौरान एयरपोर्ट पर हुए कई हमलों में यह ताजा घटना है। इससे सऊदी अरब पर अपने सहयोगी देशों, खासकर अमेरिका से सैन्य सहायता मांगने का दबाव बढ़ने की आशंका है। सऊदी अरब अब तक हूती विद्रोहियों के साथ व्यापक युद्ध से बचने की कोशिश करता रहा है।

ट्रंप ने सऊदी अरब के समर्थन में हमले करने के दिए संकेत

रियाद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर हमले के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया कि अमेरिका हूती विद्रोहियों के खिलाफ सऊदी अरब के हमलों में शामिल होने पर विचार कर सकता है। शनिवार को पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि प्रशासन इस पर विचार कर रहा है और फैसला तेजी से लिया जाएगा।

ट्रंप ने बाद में कहा कि वह सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) से बात करने की योजना बना रहे हैं। उन्होंने सऊदी अरब में हुई घटना को अस्वीकार्य बताया। जब उनसे पूछा गया कि क्या अमेरिका सैन्य कार्रवाई में शामिल हो सकता है, तो उन्होंने कहा कि इस पर आगे फैसला किया जाएगा।

मध्य पूर्व में बढ़ सकता है तनाव

रियाद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर बड़ी संख्या में लोगों के हताहत होने के बाद क्षेत्रीय संघर्ष और व्यापक होने की आशंका बढ़ गई है। अमेरिका की संभावित सैन्य भागीदारी, सऊदी अरब की जवाबी कार्रवाई और यमन में तेज होती लड़ाई आने वाले दिनों में हालात को प्रभावित कर सकती है। हालांकि, अमेरिकी प्रशासन ने अभी तक हूतियों के खिलाफ सऊदी हमलों में शामिल होने का आखिरी फैसला घोषित नहीं किया है। ट्रंप के बयान के मुताबिक, इस संबंध में आगे विचार-विमर्श और निर्णय होना बाकी है।

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मुंबई, पुणे, नासिक से सैकड़ों लोग पकड़े गए

मुंबई। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन का एपीसेंटर दिल्ली में था लेकिन देश के अलग अलग हिस्सों में भी खूब प्रदर्शन हुए। महाराष्ट्र के कई हिस्सों में लोग सड़कों पर उतरे और ज्ञानेश कुमार के ऊपर वोट चोरी के आरोप लगाते हुए उनसे इस्तीफा मांगा। मुंबई में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी के संगठन ने प्रदर्शन का नेतृत्व किया। अगस्त क्रांति मैदान में प्रदर्शन कर रहे करीब चार सौ लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया।

ये लोग दिल्ली में हो रहे विरोध प्रदर्शन के समर्थन में उतरे थे। हिरासत में लिए गए लोगों में तुषार गांधी के संगठन ‘हम भारत के लोग’ के सदस्य और सीपीएम के कार्यकर्ता शामिल थे। उधर पुणे पुलिस ने 80 से एक सौ प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया और उन्हें लश्कर पुलिस स्टेशन ले गई। बाद में छात्रों को रिहा कर दिया गया। नासिक में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और एसआईआर के खिलाफ मशाल जुलूस निकाला गया। कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी, सीजेपी और कई छात्र संगठनों के कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने इस विरोध प्रदर्शन में भाग लिया।

Russia-Ukraine War Update: ‘यूक्रेन को अब नए राष्ट्रपति की जरूरत’: पुतिन को लेकर नरम पड़े ट्रंप के तेवर, जेलेंस्की पर भड़के

Russia-Ukraine War Update: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की पर निशाना साधते हुए कहा है कि युद्धग्रस्त देश को ऐसे नए नेतृत्व की जरूरत है, जो समझौता करने में सक्षम हो। ट्रंप ने यूक्रेन की ओर से रूस की तेल रिफाइनरियों पर किए जा रहे हमलों को रोकने की अपील भी की है। उनके इस बयान से वॉशिंगटन और कीव के बीच तनाव बढ़ने के संकेत मिले हैं। ट्रंप ने कहा है कि यूक्रेन को एक नया राष्ट्रपति चुनने का समय आ गया है क्योंकि वर्तमान राष्ट्रपति जेलेंस्की ने रूस के साथ अपने देश के युद्ध को समाप्त करने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए हैं।

ट्रंप ने शनिवार को व्हाइट हाउस में कहा, “मेरा सुझाव है कि वे (यूक्रेन के लोग) एक ऐसा नया नेता चुनें जो कोई समझौता कर सके। कुछ कारणों से वह (जेलेंस्की) ऐसा कभी नहीं करते।” ट्रंप ने यह दावा भी किया कि यदि वह 2022 में अमेरिका के राष्ट्रपति होते, तो यह युद्ध कभी शुरू ही नहीं होता। उन्होंने कहा, “यूक्रेन और रूस के बीच यह युद्ध शुरू होने का कोई कारण नहीं था। यह अक्षमता के कारण शुरू हुआ।”

जेलेंस्की पर निशाना साधते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि उन्होंने (जेलेंस्की ने) अपने देश का 30 प्रतिशत हिस्सा गंवा दिया है और दोनों पक्षों को मिलाकर 10 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं तथा लाखों लोग मारे गए हैं। ट्रंप ने कहा, “यह एक ऐसा युद्ध है जो कभी शुरू ही नहीं होना चाहिए था। और मुझे लगता है कि अब समय आ गया है जब यूक्रेन को एक नया राष्ट्रपति चुनना चाहिए।”

रूसी तेल रिफाइनरियों पर हमलों से नाराज ट्रंप

रूस की तेल रिफाइनरियों और ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर यूक्रेन के हमले ट्रंप और जेलेंसी के संबंधों में एक नया तनाव पैदा कर रहे हैं। ट्रंप ने इन हमलों को रोकने की जरूरत पर जोर देते हुए यूक्रेनी नेतृत्व को समझौते की राह अपनाने का संदेश दिया है। ट्रंप की टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब रूस से डीजल की वैश्विक बाजारों में आपूर्ति की अनुमति देने वाली एक व्यवस्था पर अमेरिका आगे बढ़ रहा है। ऐसे में रूस के ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े फैसले और यूक्रेन की सैन्य रणनीति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गए हैं।

जेलेंस्की के नेतृत्व पर उठाए सवाल

ट्रंप ने अपने बयान में केवल रूसी ऊर्जा ठिकानों पर हमलों का विरोध नहीं किया। बल्कि जेलेंस्की के नेतृत्व को लेकर भी टिप्पणी की। उन्होंने सुझाव दिया कि यूक्रेन को नया राष्ट्रपति चाहिए, जो किसी समझौते तक पहुंच सके। इस बयान को अमेरिका और यूक्रेन के बीच युद्ध को लेकर रणनीतिक मतभेदों के संदर्भ में देखा जा रहा है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में ट्रंप की टिप्पणी के बाद यूक्रेन सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया का डिटेल्स नहीं दिया गया है।

अमेरिका-यूक्रेन संबंधों पर क्या होगा असर?

ट्रंप का यह बयान रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर अमेरिकी प्रशासन के रुख और यूक्रेन की सैन्य कार्रवाई के बीच तनाव को उजागर करता है। एक ओर ट्रंप यूक्रेन से हमले रोककर समझौते की दिशा में बढ़ने की अपील कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर रूस से डीजल की वैश्विक आपूर्ति से जुड़ी व्यवस्था भी चर्चा में है। फिलहाल, इस बयान के बाद अमेरिका और यूक्रेन के संबंधों में आगे क्या बदलाव आएगा, यह दोनों देशों की आधिकारिक प्रतिक्रियाओं और आने वाले फैसलों पर निर्भर करेगा।

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CJP Protest: ‘आंतरिक मामलों में दखल बर्दाश्त नहीं’; दिल्ली विरोध-प्रदर्शनों पर UN की टिप्पणियों पर भारत का पलटवार

CJP Protest: संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय (OHCHR) ने शनिवार (10 अक्तूबर) को राजधानी दिल्ली में बड़े पैमाने पर हुए प्रदर्शनों के दौरान लोगों को हिरासत में लिए जाने पर चिंता जताई। संयुक्त राष्ट्र ने भारतीय अधिकारियों से शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने के अधिकार का सम्मान करने और मनमाने ढंग से हिरासत में लिए गए लोगों को तत्काल रिहा करने का आग्रह किया। इसके बाद जिनेवा में भारत के स्थायी मिशन ने इन चिंताओं को खारिज करते हुए उन्हें गलतफहमी पर आधारित और देश के आंतरिक मामलों में अनुचित हस्तक्षेप बताया।

भारत ने स्पष्ट किया कि देश में शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने का अधिकार संविधान के तहत प्राप्त है। लेकिन यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के हित में लगाए गए उचित प्रतिबंधों के अधीन है। जिनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र में भारत के आधिकारिक प्रतिनिधित्व से जुड़े एक्स (X) अकाउंट पर जारी पोस्ट में भारत ने अपना पक्ष रखा।

भारत के स्थायी मिशन ने कहा, “शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने का अधिकार हमारे संविधान में निहित है और मजबूत संस्थाओं, स्वतंत्र न्यायपालिका तथा स्वतंत्र मीडिया द्वारा इसकी रक्षा की जाती है।” उसने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा, “हर लोकतंत्र की तरह, भारत के नागरिक भी सार्वजनिक व्यवस्था के हित में लगाए गए उचित प्रतिबंधों के अधीन इस अधिकार का इस्तेमाल करते हैं।”

सुरक्षा बलों ने ‘जेन-जी’ के नेतृत्व वाली कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शनकारियों को मध्य दिल्ली के जंतर-मंतर तक पहुंचने से रोक दिया, जिसके बाद सैकड़ों प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया। यह प्रदर्शन मतदाता सूचियों में कथित अनियमितताओं को लेकर चुनावी सुधारों और मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग के लिए आयोजित किया गया था। निर्वाचन आयोग और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इन आरोपों से इनकार किया है।

UN ने क्या कहा?

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय के प्रवक्ता थमीम अल-खीथान ने शनिवार को एक बयान में कहा कि कार्यालय दिल्ली में आज बड़े पैमाने पर हुए प्रदर्शनों से पहले और उनके दौरान प्रदर्शनकारियों, आंदोलन के नेताओं, नागरिक समाज संगठनों के सदस्यों, वकीलों और पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने की खबरों को लेकर चिंतित है। बयान में कहा गया, “हम अधिकारियों से शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने के अधिकार का पूरी तरह सम्मान करने और उसे सुनिश्चित करने का आग्रह करते हैं।”

अल-खीथान ने भारतीय अधिकारियों से यह सुनिश्चित करने का भी आग्रह किया कि कानून लागू करने वाले कर्मी शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों से निपटते समय अत्यंत संयम बरतें। उन्होंने कहा कि ऐसा देश की लोकतांत्रिक परंपराओं और मानवाधिकारों के प्रति उसकी प्रतिबद्धताओं के अनुरूप होना चाहिए। उन्होंने कहा, “मनमाने ढंग से हिरासत में लिए गए सभी लोगों को तत्काल और बिना किसी शर्त के रिहा किया जाना चाहिए।” संयुक्त राष्ट्र ने अधिकारियों से व्यापक स्तर पर व्यक्त की गई चिंताओं का समाधान करने के लिए अर्थपूर्ण संवाद करने का भी आग्रह किया।

क्या है पूरा मामला?

CJP ने मध्य दिल्ली के प्रमुख स्थल जंतर-मंतर पर प्रदर्शन आयोजित करने की योजना बनाई थी। दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार कर दिया था। भारी सुरक्षा व्यवस्था और सड़क मार्गों पर लगाए गए अवरोधकों के कारण अधिकतर प्रदर्शनकारी इलाके में नहीं पहुंच सके। CJP ने बताया कि उसके संस्थापक अभिजीत दीपके और उनके साथी सौरव दास तथा आशुतोष रांका को मुंबई से दिल्ली पहुंचे उनके विमान के उतरने के तुरंत बाद हिरासत में ले लिया गया। शनिवार के प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों, कार्यकर्ताओं और राजनीतिक नेताओं को हिरासत में लिए जाने के बाद CJP के राष्ट्रीय संगठन प्रभारी अजिंक्य शिंदे ने कहा कि संगठन इस कार्रवाई के बावजूद पीछे नहीं हटेगा।

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CJP के प्रमुख नेताओं के हिरासत में रहने के बीच प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे शिंदे ने कहा, “आप चाहे जितने लोगों को हिरासत में लें। लेकिन जब तक सबसे बड़े गद्दार और देशद्रोही ज्ञानेश कुमार इस्तीफा नहीं देते, हम पीछे नहीं हटेंगे। हम कल सुबह 10 बजे फिर जंतर-मंतर जाएंगे।” उन्होंने लोगों से बड़ी संख्या में प्रदर्शन में शामिल होने और पुलिस द्वारा रोके जाने पर भी विरोध जारी रखने की अपील की। शिंदे ने कहा, “बड़ी संख्या में जंतर-मंतर पहुंचें और दिल्ली पुलिस जहां भी आपको रोके, वहीं प्रदर्शन करें।”