अगर भगवान गणेश नौकरी के लिए Resume बनाते तो क्या लिखते? देखें बप्पा का अनोखा CV

सोचिए, अगर भगवान गणेश का भी कोई Resume होता तो उसमें क्या-क्या लिखा होता? शायद सबसे ऊपर उनकी सबसे बड़ी ताकत के तौर पर बुद्धि और ज्ञान का जिक्र होता। मुश्किल परिस्थितियों में रास्ता निकालने की क्षमता, नेतृत्व, धैर्य और विवेक जैसी खूबियां उनकी ‘स्किल्स’ में शामिल होतीं। और अगर बात पसंदीदा चीजों की आती, तो मोदक का नाम सबसे ऊपर होना तय है।

गणेश चतुर्थी के मौके पर भगवान गणेश के इन्हीं गुणों को एक रचनात्मक Resume के जरिए समझने की कोशिश की गई है। बप्पा के भक्तों के लिए उनका स्वरूप सिर्फ धार्मिक आस्था से जुड़ा नहीं है, बल्कि वे बुद्धि, शुभता, समृद्धि और नई शुरुआत के प्रतीक भी माने जाते हैं।

आज घर-घर होगा बप्पा का स्वागत

सोमवार, 14 सितंबर 2026 को देशभर में गणेश चतुर्थी मनाई जा रही है। इस खास मौके पर भक्त भगवान गणेश की प्रतिमा को घरों और सार्वजनिक पंडालों में स्थापित कर उनका स्वागत करते हैं। कई जगह बप्पा की भव्य झांकियां और पंडाल सजाए जाते हैं, वहीं घरों में परिवार के लोग मिलकर पूजा की तैयारियां करते हैं। गणपति स्थापना के बाद पूजा, आरती और प्रसाद का दौर शुरू होता है। भक्त भगवान गणेश को फूल, दूर्वा घास, मिठाइयां और विशेष रूप से मोदक अर्पित करते हैं।

क्यों मनाई जाती है गणेश चतुर्थी?

गणेश चतुर्थी भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था। यही वजह है कि इस दिन को गणपति बप्पा के आगमन के पर्व के तौर पर बेहद उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस दिन घर में गणेश प्रतिमा लाकर विधि-विधान से गणपति स्थापना की जाती है। इसके बाद भक्त बप्पा की आरती करते हैं और उन्हें अपनी श्रद्धा के अनुसार भोग लगाते हैं।

बप्पा के आने से पहले घर में होती है खास तैयारी

गणेश चतुर्थी कई परिवारों के लिए भावनाओं से जुड़ा त्योहार है। बप्पा के स्वागत से पहले घर की सफाई की जाती है और पूजा के लिए एक विशेष स्थान तैयार किया जाता है। इसके बाद गणेश जी की प्रतिमा चुनी जाती है और पूजा की जरूरी सामग्री जुटाई जाती है। कई परिवार अपने घर को फूलों और सजावटी सामान से सजाते हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर कोई बप्पा के स्वागत की तैयारियों में उत्साह से शामिल होता है।

चतुर्थी पर चांद देखने की क्यों है मनाही?

गणेश चतुर्थी से जुड़ी एक खास धार्मिक मान्यता चंद्र दर्शन को लेकर भी है। मान्यता के अनुसार चतुर्थी तिथि के निर्धारित समय में चांद देखने से बचना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान चंद्रमा को देखने से मिथ्या दोष या मिथ्या कलंक लग सकता है। धार्मिक मान्यता में मिथ्या कलंक का संबंध झूठे आरोप या बिना गलती के बदनामी से जोड़ा जाता है। इसलिए कई श्रद्धालु इस अवधि में चंद्र दर्शन से बचते हैं।

2026 में कब तक चांद देखने से बचें?

गणेश चतुर्थी 2026 के लिए चंद्र दर्शन से बचने का निर्धारित समय सुबह 9:01 बजे से रात 8:08 बजे तक बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं को मानने वाले श्रद्धालु इस अवधि के दौरान चंद्रमा देखने से परहेज करते हैं।

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बप्पा का Resume सबसे खास क्यों होगा?

अगर सच में भगवान गणेश का Resume बनाया जाए तो उसमें डिग्री या नौकरी के अनुभव से ज्यादा उनके गुणों की लंबी सूची होगी। बुद्धि, विवेक, धैर्य, नेतृत्व और बाधाओं को दूर करने की क्षमता उनकी सबसे बड़ी खूबियां होंगी। यही वजह है कि गणेश चतुर्थी सिर्फ बप्पा के स्वागत का पर्व नहीं, बल्कि उनसे प्रेरणा लेने का भी अवसर है। घर में गणपति का आगमन कई परिवारों के लिए नई उम्मीद, सकारात्मकता और शुभ शुरुआत का प्रतीक बन जाता है।

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Amit Shah UCC: ‘2029 से पहले 21 राज्यों में लागू होगा UCC’: अमित शाह का बड़ा ऐलान, बोले- घुसपैठियों की पहचान कर डिपोर्ट करेंगे

Amit Shah UCC: केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने रविवार (13) को कहा कि 21 राज्यों की भारतीय जनता पार्टी (BJP) की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की सरकारें 2029 से पहले समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करेंगी। शाह ने पत्रकारों से बातचीत के दौरान केंद्र सरकार की पिछले 12 वर्षों की उपलब्धियों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में BJP की 25 साल की यात्रा का उल्लेख किया।

‘मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार दिए गए’

अमित शाह ने कहा, “तीन तलाक को समाप्त करके मुस्लिम महिलाओं को समान अधिकार दिए गए हैं। हमने कई राज्यों में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू की है। मुझे विश्वास है कि भाजपा-राजग शासित 21 राज्यों में 2029 से पहले यूसीसी लागू कर दिया जाएगा।”आपको बता दें कि अगला लोकसभा चुनाव 2029 में होना है।

उन्होंने कहा कि सरकार ने भारतीय न्याय संहिता के माध्यम से देश की आपराधिक न्याय प्रणाली को मजबूत किया है। साथ ही दावा किया कि कई राज्यों में एक साल में दोषसिद्धि दर में 30 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। उन्होंने यह भी कहा कि तीन साल के भीतर न्याय दिलाने के लिए एक व्यवस्था स्थापित की जा रही है।

राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर शाह ने कहा कि आर्टिकल 370 और 35A को बिना एक बूंद खून बहाए या एक गोली चलाए समाप्त किया गया। गृह मंत्री ने दावा किया कि कश्मीर अब भारत के साथ पूरी तरह खड़ा है। उन्होंने कहा कि सरकार ने पांच दशक से जारी नक्सलवाद को समाप्त किया है और देश के पूर्वोत्तर क्षेत्र में 14 से अधिक शांति समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं।

90000 लोगों ने किया सरेंडर

शाह ने कहा, “नौ हजार से अधिक लोगों ने आत्मसमर्पण किया है। आज हम पूर्वोत्तर को विकास के रास्ते पर लाए हैं।” उन्होंने कहा कि सर्जिकल स्ट्राइक, हवाई हमले और ऑपरेशन सिंदूर ने आतंकवाद को बिल्कुल बर्दाश्त न करने की नीति स्थापित की है। मणिपुर में राष्ट्रीय नागरिक पंजी (NRC) लागू करने के लिए क्या 1951 को आधार वर्ष माना जाएगा? इस सवाल पर शाह ने कहा कि केंद्र इस मुद्दे पर अपने सहयोगियों और राजनीतिक दलों के साथ चर्चा कर रहा है।

उन्होंने कहा, “हम इन मुद्दों पर अपने सहयोगियों और मणिपुर के राजनीतिक दलों के साथ चर्चा कर रहे हैं। जो भी फैसला होगा, हम आपको बताएंगे।” अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों और मुंबई जैसे शहरों में उनकी पहचान किए जाने के बारे में पूछे जाने पर शाह ने कहा कि सरकार उन्हें चिह्नित करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले तरीकों का खुलासा नहीं करेगी।

शाह ने चुटकी लेते हुए कहा, “आप गृहमंत्री से कह रहे हैं कि वह तरीकों को सार्वजनिक कर दें और आपको बता दें कि यह कैसे किया जाएगा। फिर हम उन्हें कैसे पकड़ेंगे? उन्हें भी पता चल जाएगा।”

अवैध घुसपैठियों पर एक्शन

शाह ने देश से अवैध घुसपैठियों की पहचान करके उन्हें बाहर निकालने के सरकार के संकल्प को दोहराया। उन्होंने कहा, “मैं अपने संकल्प को दोहराता हूं कि हम इस देश के एक-एक अवैध घुसपैठिये की पहचान करेंगे और एक-एक करके उन्हें देश से बाहर भेजेंगे।”

इस दौरान सरकार के एंटी ड्रग्स अभियान पर शाह ने कहा कि उन्होंने हाल में ‘नशा मुक्त भारत अभियान’ शुरू किया है।इस अभियान के तहत हर राज्य का दौरा करेंगे। शाह ने कहा कि उन्होंने पिछले दिन एक मुख्यमंत्री से बात की थी। अभियान को जमीनी स्तर तक पहुंचाने के लिए पूरे दिन बैठक की जाएगी।

क्या है UCC?

समान नागरिक संहिता (UCC) का मतलब देश के सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे व्यक्तिगत मामलों से जुड़े समान नागरिक कानूनों की व्यवस्था से है। वर्तमान में इन विषयों पर अलग-अलग धार्मिक समुदायों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानून लागू होते हैं। UCC का उद्देश्य इन व्यक्तिगत मामलों में एक समान कानूनी ढांचा स्थापित करना है।

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कांग्रेस के कहने से ईडी की कार्रवाई!

एक तरफ कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों के नेता आरोप लगाते हैं कि केंद्र सरकार ईडी और दूसरी केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग करती है और विपक्षी पार्टियों के नेताओं पर कार्रवाई कराती है तो दूसरी ओर कांग्रेस और भाजपा विरोधी दूसरी पार्टियों के ही नेता आरोप लगा रहे हैं कि ईडी कुछ कांग्रेस नेताओं के कहने से कार्रवाई कर रही है। केरलम औऱ कर्नाटक दोनों जगह इस तरह के आरोप लगे हैं। कर्नाटक में डीके शिवकुमार सरकार के मंत्री सतीश जरकिहोली ने अपने यहां ईडी की छापे की कार्रवाई के लिए कांग्रेस के ही कुछ नेताओं को दोषी ठहराया है। उन्होंने कहा है कि वे जानते हैं कि कांग्रेस के किन नेताओं ने उनके यहां छापे मरवाए हैं और उन्होंने इसकी जानकारी मुख्यमंत्री को दे दी है। बताया जा रहा है कि उन्होंने मुख्यमंत्री से कहा है कि कांग्रेस के कुछ नेता उनकी सरकार को कमंजोर करना चाहते हैं और इसके लिए भाजपा के साथ मिल कर साजिश कर रहे हैं।

गौरतलब है कि कर्नाटक विधानसभा चुनाव में अब दो साल से भी कम समय रह गया है और भाजपा डीके शिवकुमार को बहुत आराम से सरकार चलाने का मौका नहीं देना चाहती है। दूसरी ओर मुख्यमंत्री पद से हटाए गए सिद्धारमैया भी शिवकुमार से अपना बदला निकालना चाहते हैं। इस चक्कर में राज्य में कांग्रेस के अंदर ही घमासान मचा है। बहरहाल, केरलम में मुख्य विपक्षी पार्टी सीपीएम के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन ने आरोप लगाया है कि ईडी ने उनके और उनकी बेटी व दामाद के खिलाफ कार्रवाई करने की सिफारिश कांग्रेस नेताओं के कहने पर की है। विजयन का आरोप है कि कांग्रेस के कुछ नेता दिल्ली में भाजपा नेताओं के संपर्क में हैं और सीपीएम के नेतृत्व वाले लेफ्ट मोर्चा को कमजोर करने की राजनीति कर रहे हैं। विजयन के आरोप तो राजनीतिक लगते हैं लेकिन जरकिहोली की बात में कुछ दम है।

ब्रिटेन के बंटवारे पर साथ आएंगे स्कॉटलैंड, वेल्स-नॉर्दर्न आयरलैंड:तीनों जगहों के नेताओं की कल मीटिंग, अलग होने के पक्ष में

UK के एकजुट रहने पर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड के फर्स्ट मिनिस्टर सोमवार को वेल्स की राजधानी कार्डिफ में मिलेंगे। स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड की सरकार के प्रमुख को फर्स्ट मिनिस्टर कहा जाता है। इनके साथ अलग देश आयरलैंड की पार्टी सिन फेन की अध्यक्ष मैरी लू मैकडोनाल्ड भी रहेंगी। बैठक में नेता हर क्षेत्र को अपना भविष्य खुद तय करने का अधिकार देने की बात पर साझा बयान जारी कर सकते हैं। इसमें जरूरत पड़ने पर आजादी या दूसरे बड़े बदलावों पर जनमत संग्रह कराने की बात भी शामिल है। इस बैठक से UK पर दबाव बढ़ सकता है। UK से अलग होने के पक्ष में तीनों जगहों की पार्टियां ब्रिटेन की केंद्र सरकार देश को एकजुट रखने के पक्ष में है। लेकिन स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड में ज्यादा अधिकार और बड़े बदलाव की मांग बढ़ रही है। इन तीनों जगहों पर ऐसी पार्टियां प्रभावशाली हैं जो ब्रिटेन की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव चाहती हैं। स्कॉटलैंड में SNP आजादी का समर्थन करती है। वेल्स में प्लाइड कम्री भी आजादी की मांग करती है। वहीं नॉर्दर्न आयरलैंड में सिन फेन आयरलैंड के साथ जुड़ने का समर्थन करती है। द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक, स्कॉटलैंड के फर्स्ट मिनिस्टर जॉन स्विनी और वेल्स के फर्स्ट मिनिस्टर रुन एपी इओर्थवर्ट के साथ नॉर्दर्न आयरलैंड का नेतृत्व भी साझा घोषणा का समर्थन कर सकता है। बैठक में आजादी और संवैधानिक बदलाव के अलावा अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, यूरोप और दूसरे देशों से रिश्ते मजबूत करने पर भी चर्चा होगी। स्कॉटलैंड में फिर जनमत संग्रह की चर्चा स्कॉटलैंड की आजादी इस पूरी बहस का सबसे बड़ा मुद्दा है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने हाल ही में कहा था कि अगर स्कॉटलैंड और नॉर्दर्न आयरलैंड में आजादी के पक्ष में लोगों के बीच सहमति बनती है, तो एक और जनमत संग्रह पर विचार किया जा सकता है। SNP ने बर्नहम के इस बयान को तुरंत मुद्दा बना लिया। इसके बाद में बर्नहम को सफाई देनी पड़ी। उन्होंने स्कॉटलैंड के फर्स्ट मिनिस्टर स्विनी को चिट्ठी लिखकर कहा कि अगले आम चुनाव से पहले आजादी पर जनमत संग्रह नहीं कराया जाएगा। नॉर्दर्न आयरलैंड को लेकर भी उन्होंने कहा कि अभी ब्रिटेन से अलग होने को लेकर ऐसा माहौल नहीं है। बर्नहम ने 2024 के चुनावी घोषणापत्र का हवाला देते हुए कहा कि लेबर पार्टी स्कॉटलैंड की आजादी या एक और जनमत संग्रह का समर्थन नहीं करती। स्विनी – UK पर एकजुट रहने का दबाव बढ़ा स्विनी ने बर्नहम के बयान पर सवाल उठाते हुए कहा कि पहली बार स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड में ऐसे फर्स्ट मिनिस्टर हैं जो आजादी के पक्ष में हैं। उनके मुताबिक, इससे साफ है कि ब्रिटेन को एकजुट रखने वाली मौजूदा व्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है। वहीं, वेल्स में भी ज्यादा अधिकार की मांग तेज हो गई है। मई में हुए चुनाव में वहां ब्रिटेन की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठाने वाली पार्टियों को मजबूती मिली है।

96 सीट पर हुए चुनाव में अलग देश की समर्थक प्लाइड कम्री को 43 जबकि लेबर पार्टी को सिर्फ 9 सीटें मिलीं। इस चुनाव के बाद प्लाइड कम्री के रुन एपी इओर्थवर्ट वेल्स के फर्स्ट मिनिस्टर बने। नॉर्दर्न आयरलैंड के पास आयरलैंड से जुड़ने का रास्ता नॉर्दर्न आयरलैंड का मामला स्कॉटलैंड और वेल्स से अलग है। 1998 के गुड फ्राइडे समझौते के तहत अगर यह संभावना दिखे कि नॉर्दर्न आयरलैंड के ज्यादातर लोग ब्रिटेन से अलग होकर आयरलैंड के साथ जुड़ना चाहते हैं, तो वहां जनमत संग्रह कराया जा सकता है। यहां की नेता सिन फेन का कहना है कि कार्डिफ की बैठक में भी इसी अधिकार की बात उठाई जाएगी कि हर देश और क्षेत्र को लोकतांत्रिक तरीके से अपना भविष्य तय करने का मौका मिलना चाहिए। ट्रम्प के बयान से आयरलैंड के एकीकरण की चर्चा बढ़ी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी हाल में आयरलैंड के एकीकरण पर बयान दिया है। शनिवार को डबलिन दौरे के दौरान ट्रम्प ने कहा कि वह आयरलैंड को एक देश के रूप में देखना पसंद करेंगे। अमेरिकी राष्ट्रपतियों का इस मुद्दे पर आमतौर पर सावधानी भरा रुख रहा है। ऐसे में ट्रम्प का बयान इस बहस को और चर्चा में ले आया है। मामला सिर्फ आजादी का नहीं, पैसा और यूरोप भी अहम कार्डिफ की बैठक सिर्फ ब्रिटेन से अलग होने की मांग तक सीमित नहीं है। तीनों जगहों की कई प्रमुख पार्टियां यूरोपीय यूनियन के साथ करीबी रिश्तों की समर्थक हैं। UK 2020 में आधिकारिक तौर पर यूरोपीय यूनियन से आजाद हो गया था। इसके लिए 2016 में वोटिंग हुई थी। अगर स्कॉटलैंड या वेल्स भविष्य में आजाद होते हैं, तो वे EU की सदस्यता के लिए आवेदन कर सकते हैं। वहीं अगर नॉर्दर्न आयरलैंड आयरलैंड में शामिल होता है, तो वह EU का हिस्सा बन जाएगा, क्योंकि आयरलैंड पहले से EU का सदस्य है। अब जानिए कि ये तीनों इलाके ब्रिटेन से कैसे जुड़े और अब अलग होने की मांग क्यों हो रही है… स्कॉटलैंड करीब 300 साल पहले स्कॉटलैंड और इंग्लैंड दो अलग-अलग देश थे। दोनों के अपने राजा, संसद और कानून थे। साल 1603 में इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम की मौत हो गई। उनका कोई वारिस नहीं था। तब स्कॉटलैंड के राजा जेम्स VI इंग्लैंड के भी राजा बन गए। यानी अब एक ही व्यक्ति दो देशों का राजा था, लेकिन दोनों देश फिर भी अलग-अलग थे। इसके करीब 100 साल बाद बड़ा फैसला हुआ। 1707 में स्कॉटलैंड और इंग्लैंड की संसद ने समझौता किया। दोनों देश मिलकर ग्रेट ब्रिटेन बन गए। इसके बाद दोनों की अलग-अलग संसद नहीं रही और एक साझा संसद बनी। अलग देश बनने की मांग कब तेज हुई 20वीं सदी में स्कॉटलैंड की आजादी की मांग को राजनीतिक ताकत मिलने लगी। 1934 में स्कॉटिश नेशनल पार्टी (NSP) बनी, जिसका मकसद स्कॉटलैंड को अलग देश बनाना था। इसके बाद यह मुद्दा धीरे-धीरे मजबूत होता गया। 1999 में स्कॉटलैंड को अपनी संसद और सरकार वापस मिली। इससे स्कॉटलैंड को शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे कई मामलों में खुद फैसले लेने का अधिकार मिला, लेकिन रक्षा और विदेश नीति जैसे बड़े मुद्दे अब भी ब्रिटेन की केंद्र सरकार के पास रहे। फिर आया 2014 का जनमत संग्रह। स्कॉटलैंड के लोगों से पूछा गया कि क्या वे UK से अलग होकर स्वतंत्र देश बनना चाहते हैं। करीब 55% लोगों ने अलग होने के खिलाफ और 45% ने समर्थन में वोट दिया। इसलिए स्कॉटलैंड UK का हिस्सा बना रहा। साल 2016 के बाद स्कॉटलैंड में आजादी की मांग फिर तेज होने लगी। दरअसल स्कॉटलैंड के ज्यादातर लोगों ने 2016 में यूरोपीय यूनियन में बने रहने के लिए वोट किया था, जबकि पूरे UK ने EU छोड़ने का फैसला किया। वेल्स 13वीं सदी में इंग्लैंड के राजा एडवर्ड प्रथम ने वेल्स पर कब्जा कर लिया। इंग्लैंड के साथ जुड़ने के बावजूद वेल्स ने अपनी भाषा, संस्कृति और पहचान बनाए रखी। 19वीं और 20वीं सदी में इन्हें बचाने के आंदोलन तेज हुए। इसी दौर में 1925 में प्लाइड कम्री पार्टी बनी। शुरुआत में पार्टी का जोर वेल्श भाषा और संस्कृति बचाने पर था। बाद में उसने वेल्स को ज्यादा अधिकार और फिर स्वतंत्र देश बनाने की मांग शुरू की। 1999 में वेल्स को अपनी अलग संसद और सरकार मिली। हालांकि रक्षा और विदेश नीति जैसे बड़े मुद्दे अभी भी UK सरकार के पास हैं। वेल्स में आजादी की मांग स्कॉटलैंड के मुकाबले कमजोर है। लेकिन प्लाइड कम्री इसे लगातार राजनीतिक मुद्दा बनाए हुए है। नॉर्दर्न आयरलैंड वेल्स, स्कॉटलैंड और इंग्लैंड ग्रेट ब्रिटेन का हिस्सा बन चुके थे। 1801 में आयरलैंड भी इसमें शामिल हो गया। हालांकि शुरुआत से ही आयरलैंड के कई हिस्से में इसका विरोध जारी रहा। लंबे संघर्ष के बाद 1922 में आयरलैंड का ज्यादातर हिस्सा UK से अलग होकर स्वतंत्र देश बन गया। लेकिन आयरलैंड का उत्तरी हिस्सा यानी नॉर्दर्न आयरलैंड UK के साथ ही रहा। नॉर्दर्न आयरलैंड में ब्रिटेन के समर्थकों को यूनियनिस्ट कहा जाता है। ये ईसाई धर्म के प्रोटेस्टेंट समुदाय के लोग थे। दूसरी तरफ आयरिश राष्ट्रवादी और ज्यादातर कैथोलिक समुदाय था, जिसका एक बड़ा हिस्सा आयरलैंड के साथ जुड़ना चाहता था। आज भी नॉर्दर्न आयरलैंड में दो तरह की सोच मौजूद है। कुछ लोग UK के साथ रहना चाहते हैं, जबकि कुछ आयरलैंड के साथ एकीकरण चाहते हैं।

Jupiter Transit in Leo 2026: देवगुरु बृहस्पति करेंगे सिंह राशि में प्रवेश और 4 राशियों के लिए खुलेगा खजाने का ताला, जानें कौन सी हैं ये राशियां

Jupiter Transit in Leo 2026: देवगुरु बृहस्पति का सिंह राशि में 31 अक्टूबर को गोचर होगा। ज्योतिषशास्त्र में यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण ज्योतिषीय घटना मानी जाती है, जिसे “सिंहस्थ बृहस्पति” भी कहा जाता है। सिंह राशि के स्वामी सूर्य हैं, जो बृहस्पति के मित्र ग्रह हैं। मित्र राशि में होने के कारण गुरु का यह गोचर सामान्यतः शुभ और प्रभावकारी परिणाम देता है। सिंह राशि शक्ति, नेतृत्व और अधिकार का प्रतीक है। गुरु का यहां आना व्यक्ति में निर्णय लेने की क्षमता, ज्ञान, प्रशासनिक गुणों और आत्मविश्वास को बढ़ाता है। जब देवगुरु बृहस्पति सिंह राशि में प्रवेश करते हैं और सूर्य मेष राशि में होते हैं, तब नासिक के त्र्यंबकेश्वर में प्रसिद्ध सिंहस्थ कुंभ मेले का आयोजन होता है। समाज में धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक गतिविधियों में तेजी आती है। लोग परोपकार और ज्ञान प्राप्ति की ओर अधिक आकर्षित होते हैं। यह समय राजनीति, प्रशासन, शिक्षा, कानून या प्रबंधन से जुड़े लोगों के लिए विशेष रूप से उन्नतिदायक सिद्ध होता है। देवगुरु के इस गोचर से यूं तो सभी 12 राशियों के जातक प्रभावित होंगे, लेकिन 4 राशियों के लिए विशेष रूप से शुभ रहेगा। आइए जानें इसके बारे में

मेष राशि : मेष राशि वालों के लिए गुरु का सिंह राशि में गोचर कई तरह के शुभ अवसरों में वृद्धि हो सकती है। गुरु आपकी राशि से पंचम भाव में गोचर करते हैं। इससे करियर में नए तरह के अवसर मिल सकते हैं। प्रतियोगी परीक्षा में सफलता के अच्छे संकेत हैं। आर्थिक मोर्चे पर आपको आय के नए स्त्रोत मिल सकते हैं।

कर्क राशि : कर्क राशि वालों के लिए गुरु का राशि परिवर्तन धन लाभ के अवसरों में वृद्धि ला सकता है। पारिवारिक मामलों में सकारात्मक असर देखने को मिल सकता है। यहां पर गुरु का आपकी कुंडली में गोचर आपके धन के भाव में होगा जिससे आपको अच्छा खासा लाभ हासिल हो सकता है।

तुला राशि : तुला राशि वालों पर गुरु के राशि परिवर्तन का सबसे ज्यादा प्रभाव देखने को मिलेगा। गुरु का गोचर आपके लिए बहुत ही लाभकारी रहेगा। गुरु आपकी राशि से 11वें भाव में संचरण करेंगे,ऐसे में आपको आय में वृद्धि के अवसर मिल सकते हैं। करियर में नई तरह की जिम्मेदारियां मिल सकती है।

सिंह राशि : सिंह राशि में गुरु के गोचर करने से सिंह राशि वालों पर विशेष प्रभाव पड़ेगा। आपके आत्मविश्वास में बढ़ोतरी और नेतृत्व करने की क्षमता में विकास होता है। गुरु के गोचर करने से मान-सम्मान में वृद्धि, नौकरी-कारोबार में नई तरह की जिम्मेदारी या अवसर मिल सकता है। आपकी आय में वृद्धि होगी।

शुभ परिणामों के लिए सरल उपाय

गुरु ग्रह के बीज मंत्र का जाप करें: `ॐ बृं बृहस्पतये नमः`

गुरुवार के दिन पीले कपड़े, चने की दाल या हल्दी का दान करें।

भगवान विष्णु या श्री हरि की पूजा करें और माथे पर केसर/हल्दी का तिलक लगाएं।

डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई सामग्री जानकारी मात्र है। हम इसकी सटीकता, पूर्णता या विश्वसनीयता का दावा नहीं करते। कृपया किसी भी कार्रवाई से पहले विशेषज्ञ से संपर्क करें

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इटली की नेता और पूर्व विदेश मंत्री बोनिनो का निधन:महिलाओं के हक पर पोप से टकरा गई थीं एमा; 48 साल पुराना एबॉर्शन कानून बदलवाया

इटली की पूर्व विदेश मंत्री एमा बोनिनो को एक ऐसी महिला के रूप में याद किया जाएगा, जिसने अपनी निजी पीड़ा को लाखों महिलाओं के अधिकार की लड़ाई बना दिया। 26 साल की उम्र में जब उनका गर्भपात हुआ, तब इटली में यह गैरकानूनी था। इसके बाद उन्होंने तय किया कि दूसरी महिलाओं को एबॉर्शन के अपमान और असुरक्षित हालात से नहीं गुजरना पड़े। यूरोपीय आयुक्त भी रह चुकीं इटली की कद्दावर नेता एमा अपनी तीखी टिप्पणियों और मानवाधिकारों के प्रति अटूट निष्ठा के लिए जानी जाती थीं। उनका 78 वर्ष की उम्र में शुक्रवार को निधन हो गया। उनकी पार्टी ‘मोर यूरोप’ ने कहा कि देश ने सबसे दूरदर्शी, साहसी और स्वतंत्र सोच वाली नेता को खो दिया है। जानते हैं ​उनके राजनीतिक संघर्ष… निजी पीड़ा को बनाया इटली में क्रांति का नया हथियार – 1974 में जब इटली में गर्भपात गैरकानूनी था, तब 26 वर्षीय एमा ने एक क्लिनिक में गर्भपात कराया। – गर्भपात पर प्रतिबंध वाले 48 साल पुराने कानून के विरोध में पुलिस के सामने समर्पण किया। अपनी गिरफ्तारी से उपजी लहर को जनआंदोलन बनाया। – दबाव में संसद ने 1978 में 48 साल पुराने 1930 के कानून को बदलते हुए गर्भपात को कानूनी मान्यता दी। इससे पहले तलाक का कानून भी बनाया गया था। एमा ने कभी विवाह नहीं किया। एबॉर्शन के सवाल पर वेटिकन से भी टकराव रहा एमा ने वेटिकन चर्च के कड़े विरोध के बावजूद गर्भपात और तलाक को कानूनी दर्जा दिलवाने के अभियानों का नेतृत्व किया। महिला अधिकारों पर टकराव के बावजूद पोप फ्रांसिस के साथ उनकी अनूठी और गहरी दोस्ती भी थी। पोप फ्रांसिस अक्सर उनकी मानवीय पहलों की सराहना करते थे और उन्हें सबसे कमजोर तबके की आवाज उठाने वाली नेता कहते थे। कैंसर के बावजूद सक्रिय रहीं – 2015 में कैंसर का पता चलने के बाद भी एमा ने सार्वजनिक जीवन से दूरी नहीं बनाई। वह रंग-बिरंगे स्कार्फ पहनकर संसद से लेकर टीवी डिबेट्स में मानवाधिकारों की आवाज बुलंद करती रहीं। आखिरी बात: लड़ाइयां अभी बहुत हैं – बीमारी के बीच जब उनसे पूछा गया कि कौन सी लड़ाई बाकी है, तब कहा था, ‘बहुत सारी, जरूरत से भी ज्यादा- मानवाधिकार, वैश्विक भूख और स्वतंत्र वैज्ञानिक शोध। दस जन्म भी कम पड़ेंगे।’

ब्रिक्स की इकोनॉमी अमेरिका से 3 गुना बड़ी:10 साल बाद भारत में साथ दिखेंगे मोदी-पुतिन-जिनपिंग; 20 देशों के नेता भी होंगे शामिल

BRICS समिट शनिवार से नई दिल्ली में शुरू होने जा रहा है। भारत में होने वाले BRICS समिट में 10 साल बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक साथ नजर आएंगे। तीनों नेता इससे पहले 2016 में गोवा में हुए BRICS समिट में एक साथ शामिल हुए थे। समिट में BRICS के 11 सदस्य देशों के अलावा 10 पार्टनर देशों के नेता भी शामिल होंगे। BRICS की ताकत को सिर्फ सदस्य देशों की संख्या से नहीं, बल्कि उनकी आबादी और अर्थव्यवस्था से भी समझा जा सकता है। 11 सदस्य देशों में दुनिया की करीब 49.5% आबादी रहती है। यानी दुनिया के लगभग हर दो में से एक व्यक्ति BRICS देशों में रहता है। अर्थव्यवस्था की बात करें तो PPP यानी खरीदने की क्षमता के आधार पर BRICS देशों की कुल अर्थव्यवस्था दुनिया की करीब 39% है। यह अमेरिका की अर्थव्यवस्था के मुकाबले करीब 3 गुना है। PM मोदी 4 वर्ल्ड लीडर्स से मिलेंगे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार को कई विदेशी नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठक करेंगे। जिनपिंग का गलवान हिंसा के बाद पहला भारत दौरा चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग 7 साल बाद भारत आ रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी मुलाकात 2020 के गलवान संघर्ष के बाद भारत में पहली आमने-सामने की बैठक होगी। गलवान के बाद करीब 4 साल तक LAC पर दोनों देशों के बीच तनाव रहा। अब भारत और चीन LAC से लेकर कारोबार तक 6 बड़े मुद्दों पर काम कर रहे हैं। इनमें सीमा विवाद सबसे अहम मुद्दा है। दोनों देश सीमा विवाद पर एक विशेषज्ञ समूह बनाने पर सहमत हुए हैं। इसके अलावा सीमा पर 2 अतिरिक्त सैन्य संपर्क केंद्र और पूर्वी व मध्य सेक्टर में 2 सैन्य हॉटलाइन बनाने पर भी सहमति बनी है। अब इन फैसलों को दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व की मंजूरी मिलनी है। दूसरा बड़ा मुद्दा दोनों देशों के बीच कारोबार है। 2025-26 में भारत ने चीन से करीब 11.4 लाख करोड़ रुपए का सामान आयात किया। इससे भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा 8.6 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा रहा। पश्चिमी देशों के लिए BRICS की बढ़ती चुनौती BRICS देश अब आपस में कारोबार करते समय डॉलर का इस्तेमाल कम करने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए वे एक-दूसरे की अपनी-अपनी करेंसी में लेन-देन बढ़ाना चाहते हैं। साथ ही, अलग-अलग देशों के ऑनलाइन पेमेंट सिस्टम को आपस में जोड़ने पर भी काम हो रहा है। हालांकि, अभी BRICS का अपना कोई एक पेमेंट सिस्टम या एक साझा करेंसी नहीं है। इस साल भारत की अध्यक्षता में होने वाले BRICS समिट में भी अपनी करेंसी में कारोबार और आसान ऑनलाइन पेमेंट पर जोर दिया जाएगा। भारत चाहता है कि BRICS देशों के डिजिटल पेमेंट सिस्टम और उनकी डिजिटल करेंसी को आपस में जोड़ा जाए। इससे एक देश से दूसरे देश में पैसे भेजना आसान हो सकता है और हर बार डॉलर की जरूरत कम हो सकती है। ब्रिक्स तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं का संगठन BRICS 11 देशों का ऐसा समूह है, जिसमें दुनिया की बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं। इसमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, UAE, सऊदी अरब और इंडोनेशिया शामिल हैं। BRICS का मकसद सदस्य देशों के बीच आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक सहयोग बढ़ाना है। शुरुआत में इसमें 4 देश थे और इसे BRIC कहा जाता था। BRIC नाम 2001 में गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने दिया था। बाद में दूसरे देश जुड़ते गए और इसका नाम BRICS हो गया। भारत 2026 में BRICS समिट की अध्यक्षता कर रहा है। एक बैंक की रिपोर्ट से निकला BRICS का नाम BRICS की शुरुआत किसी सरकार ने नहीं, बल्कि एक बैंक की रिपोर्ट से हुई थी। 2001 में अमेरिकी निवेश बैंक गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने अपनी रिपोर्ट में BRIC शब्द इस्तेमाल किया। उन्होंने ब्राजील, रूस, भारत और चीन को तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाएं बताया था। तब BRIC कोई संगठन नहीं था। लेकिन बाद में ये चारों देश एक साथ आने लगे। 2006 में BRIC समूह बना और 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में इसकी पहली आधिकारिक बैठक हुई। 2010 में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने के बाद BRIC का नाम BRICS हो गया। पिछले साल ईरान, मिस्र और इथियोपिया भी इसके पूर्ण सदस्य बने। इसके साथ BRICS का दायरा और बढ़ गया। आज BRICS दुनिया के बड़े आर्थिक मंचों में शामिल है। इसके सदस्य देशों की ग्लोबल GDP में हिस्सेदारी 27% से ज्यादा है, जबकि यूरोपियन यूनियन की करीब 14% है। पाकिस्तान के चाहने के बावजूद BRICS में नहीं मिली एंट्री BRICS के विस्तार के बाद कई देशों ने इसमें शामिल होने की कोशिश की। इनमें पाकिस्तान और तुर्किये भी थे। पाकिस्तान ने 2023 में सदस्यता के लिए आधिकारिक आवेदन किया था। उसे चीन और रूस का समर्थन भी मिला, लेकिन अब तक BRICS में उसकी एंट्री नहीं हो पाई है। तुर्किये ने भी सदस्यता की कोशिश की, लेकिन उसे भी सफलता नहीं मिली। इससे सवाल उठा कि दोनों देशों की एंट्री क्यों अटकी। कई मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत पाकिस्तान और तुर्की को BRICS में शामिल करने के पक्ष में नहीं था। नए सदस्य को शामिल करने के लिए सभी मौजूदा सदस्यों की सहमति जरूरी होती है। यानी किसी एक देश की आपत्ति से सदस्यता रुक सकती है। हालांकि, भारत ने आधिकारिक तौर पर पाकिस्तान की सदस्यता रोकने की बात नहीं कही है। ——————- यह खबर भी पढ़ें… BRICS में पुतिन का अमेरिका-यूरोप पर तंज: कमजोर देश खुद को G7 क्यों कहते हैं; मोदी बोले- ब्रिक्स देशों में दुनिया की 40% GDP प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन समेत ब्रिक्स लीडर्स ने शुक्रवार को ब्रिक्स बिजनेस फोरम में ग्लोबल ट्रेड पर बात की। पूरी खबर पढ़ें…

पीएम मोदी कल वर्ल्ड लीडर्स के साथ करेंगे डिनर:मेन्यू में यूपी के गलौटी कबाब, महाराष्ट्र की भाकरवड़ी और राजस्थान की कचौड़ी शामिल

नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को 18वां BRICS लीडर्स समिट होगा। यह आयोजन भारत मंडपम में किया जाएगा। कल पीएम मोदी, पुतिन और शी जिनपिंग समेत कई वर्ल्ड लीडर्स को होस्ट करेंगे। डिनर के मेन्यू में यूपी के गलौटी कबाब, महाराष्ट्र की भाकरवड़ी और राजस्थान की कचौड़ी शामिल हैं। वहीं, लग्ज़री होटलों में मेहमानों के स्वागत की तैयारी कई हफ्तों से चल रही है। इसमें क्षेत्रीय भारतीय खान-पान, खास मेन्यू, पारंपरिक उपहार और कस्टमाइज्ड व्यक्तिगत सुविधाएं शामिल हैं। ITC मौर्या में रूस के राष्ट्रपति पुतिन और ताज पैलेस में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के ठहरने की उम्मीद है। वहीं, UAE के नेतृत्व वाला प्रतिनिधिमंडल द लीला पैलेस और मिस्र का प्रतिनिधिमंडल शेरेटन नई दिल्ली में ठहरेगा। खबर अपडेट हो रही है…

भारत में आकर ब्रिक्स के मंच से गरजे पुतिन, बोले- वर्चस्व वापस पाने की नाकाम कोशिश कर रहे पुराने नेता, जानिए उनके निशाने पर कौन

Putin BRICS Speech: नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स बिजनेस फोरम को संबोधित करते हुए रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पश्चिमी देशों और पारंपरिक आर्थिक महाशक्तियों पर करारा हमला बोला है। पुतिन ने कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में इस समय गहरे और बुनियादी बदलाव हो रहे हैं। 20वीं सदी के उत्तरार्ध में दुनिया के विकास की अगुवाई करने वाले तथाकथित पुराने नेता अब पीछे छूट रहे हैं और उनकी जगह आर्थिक गतिविधियों के नए केंद्र यानी विकास के नए इंजन ले रहे हैं। पुतिन ने पश्चिमी देशों पर सीधा निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि ब्रिक्स के बढ़ते असर को देखकर उनके प्रतिस्पर्धी अपनी खोई हुई बढ़त वापस हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। पुतिन ने कहा कि उनकी इन कोशिशों की वजह से यह कंपीटिशन कई बार काफी अनुचित और गंदा रूप लेता नजर आ रहा है।

पुराने नेतृत्व की जगह ले रहे विकास के नए इंजन

अपने संबोधन में रूसी राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि दुनिया की अर्थव्यवस्था में शक्ति का संतुलन तेजी से बदल रहा है। उन्होंने स्वीकार किया कि पारंपरिक आर्थिक ताकतों के पास आज भी मजबूत बुनियादी ढांचा, तकनीकी बढ़त, वैज्ञानिक लाभ और वैज्ञानिक संस्थान मौजूद हैं लेकिन इसके बावजूद आर्थिक बदलाव को रोका नहीं जा सकता। पुतिन ने कहा कि जो देश पहले आर्थिक विकास की अगुवाई करते थे अब उनकी जगह नए उभरते हुए केंद्र ले रहे हैं। उन्होंने कहा कि वैश्विक चुनौतियों से निपटने और मजबूत अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंध बनाने के लिए ब्रिक्स देशों के बीच कारोबारी संबंधों और आर्थिक साझेदारी को मजबूत करना बेहद जरूरी है।

G7 को पछाड़ ब्रिक्स ने बनाई बढ़त: वैश्विक GDP में 40% हिस्सेदारी

ब्रिक्स देशों की बढ़ती आर्थिक ताकत का आंकड़ा पेश करते हुए पुतिन ने कहा कि पिछले पांच वर्षों के दौरान दुनिया की कुल आर्थिक वृद्धि में 50 प्रतिशत से अधिक योगदान ब्रिक्स देशों का रहा है जबकि इस दौरान G7 देशों की हिस्सेदारी सिर्फ 18 फीसदी रही। पुतिन ने बताया कि वैश्विक जीडीपी में अब ब्रिक्स देशों की हिस्सेदारी करीब 40 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। ये आंकड़ा दुनिया के आर्थिक मंच पर ब्रिक्स के बढ़ते वजन को दिखाता है।

‘प्रतिस्पर्धा की बात करने वाले पश्चिमी देश अपना रहे भद्दे तरीके’

पश्चिमी देशों की नीतियों और प्रतिस्पर्धा पर प्रहार करते हुए पुतिन ने कहा कि पश्चिमी प्रतिस्पर्धी ब्रिक्स के उभार पर नजर बनाए हुए हैं और अपनी प्रतिस्पर्धी बढ़त वापस पाने के लिए हर संभव कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हमें बताया जाता रहा है कि प्रतिस्पर्धा पवित्र है, लेकिन हमारे पश्चिमी प्रतिस्पर्धी अपनी बढ़त वापस पाने के लिए सब कुछ कर रहे हैं और कई बार यह बहुत ही भद्दा और अनुचित रूप ले लेता है।

रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि मॉस्को अभी 30000 से ज्यादा प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि पश्चिमी देश रूस और उसके सहयोगियों पर लगातार आर्थिक दबाव बना रहे हैं। इसी क्रम में उन्होंने भारत से उभरती हुई टेक्नोलॉजी दिग्गज कंपनियों का भी उल्लेख किया।

ईरान और ब्राजील ने भी उठाई आर्थिक दबाव के खिलाफ आवाज

इस मंच से ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान और ब्राजील के विदेश मंत्री माउरो विएरा ने भी अपने विचार रखे। मसूद पेजेशकियान ने भू-राजनीतिक अनिश्चितता, सप्लाय चेन में रुकावटों और राजनीतिक दबाव बनाने के लिए आर्थिक हथियारों के इस्तेमाल पर चिंता जताई। वहीं ब्राजील के विदेश मंत्री माउरो विएरा ने कहा कि 1960 के दशक से अब तक दुनिया की जीडीपी में निम्न और मध्यम आय वाले देशों की हिस्सेदारी 20% से बढ़कर 50% से अधिक हो गई है।

ब्रिक्स का निर्यात बढ़कर 6 ट्रिलियन डॉलर पहुंचा: पीयूष गोयल

फोरम में भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जानकारी दी कि ब्रिक्स का निर्यात 2003 के 900 अरब डॉलर से बढ़कर 2024 में लगभग 6 ट्रिलियन डॉलर हो गया है। इसके साथ ही वैश्विक निर्यात में ब्रिक्स की हिस्सेदारी करीब दोगुनी होकर 24 प्रतिशत के करीब पहुंच गई है। बिजनेस फोरम के दौरान ग्लोबल वैल्यू चेन को प्रभावित करने वाली गैर-टैरिफ बाधाओं, कृषि व कृषि-प्रौद्योगिकी, सेवा व्यापार, महिला आधारित उद्यमों और डिजिटल अर्थव्यवस्था जैसे अहम मुद्दों पर भी चर्चा हुई। यह बैठक शनिवार से शुरू हो रहे दो दिवसीय ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से ठीक पहले आयोजित की गई।

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BSE का शेयर एनएसई के आईपीओ के ऐलान से 3% फिसला, क्या यह इसे खरीदने का सही मौका है?

एनएसई के आईपीओ के ऐलान का सीधा असर बीएसई के शेयरों पर पड़ा है। बीएसई के शेयर में 11 सितंबर को 3 फीसदी तक गिरावट दिखी। बीते चार कारोबारी सत्रों में से 3 में यह शेयर गिरा है। यह अपने सपोर्ट जोन के करीब आ गया है। एनालिस्ट्स का कहना है कि सपोर्ट लेवल टूटने पर इस शेयर पर बिकवाली का दबाव बढ़ सकता है। सवाल है कि क्या यह बीएसई के शेयरों को खरीदने का सही समय है?

शेयर 17 अगस्त से कंसॉलिडेशन में

SBI Securities में टेक्निकल एंड डेरिवेटिव्स रिसर्च के हेड सुदीप शाह ने कहा कि बीएसई का शेयर 3,474-3,132 रुपये की रेंज में कंसॉलिडेट कर रहा है। 17 अगस्त से ऐसा दिख रहा है। उन्होंने कहा, “गिरता एडीएक्स इस बात का संकेत है कि शेयर में ट्रेंड स्ट्रेंथ की कमी है। एमएसीडी लाइन जीरो लाइन के नीचे बनी हुई है। यह कमजोर मोमेंटम का संकेत है।”

सपोर्ट जोन टूटने पर आएगी बड़ी गिरावट

उन्होंने कहा कि बीएसई के शेयरों के लिए अगला सपोर्ट 3,130-3,100 जोन में है। अगर यह इस रेंज को तोड़ देता है तो इस पर बिकवाली का नया दबाव दिख सकता है। इससे यह शेयर गिरकर 2,970 रुपये के अगले सपोर्ट लेवल तक जा सकता है। तेजी की स्थिति में 3,350-3,370 रुपये पर इसे अगला सपोर्ट मिलेगा।

CAS का असर ट्रेडिंग वॉल्यूम पर पड़ा

इससे पहले विदेशी ब्रोकरेज फर्म बर्नस्टीन ने बीएसई के शेयर पर ‘अंडरपरफॉर्म’ की रेटिंग दी थी। बीएसई के शेयर पर एनालिस्ट्स की चिंता की वजह इसका ट्रेडिंग वॉल्यूम है। एक्सचेंज के मैनेजमेंट ने कहा है कि हाल में लागू क्लोजिंग ऑक्शन सेशन (CAS) का असर इंडेक्स ऑप्शंस वॉल्यूम पर पड़ा है। ऑक्शन सेशन में सीमित लिक्विडिटी का असर पार्टिसिपेशन पर पड़ा है।

बीएसई का मार्केट कैपिटलाइजेशन 1.31 लाख करोड़

BSE का मार्केट कैपिटलाइजेशन अभी 1.31 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा है। एनएसई के आईपीओ का ऐलान हो जाने से इनवेस्टर्स दोनों एक्सचेंजों की वैल्यूएशन और प्रॉफिट बनाने की क्षमता की तुलना कर रहे हैं। एनएसई का मार्केट कैपिटलाइजेशन प्राइस बैंड के ऊपरी लेवल पर करीब 4.46 लाख करोड़ रुपये होगा।

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एनएसई का प्रॉफिट बीएसई के प्रॉफिट का चार गुना

एनएसई का FY26 में टैक्स बाद प्रॉफिट 10,302 करोड़ रुपये था, जबकि प्राइस-टू-अर्निंग्स मल्टीपल करीब 42.5 गुना है। इसके मुकाबले बीएसई का मार्केट कैपिटलाइजेशन करीब 1.31 लाख करोड़ रुपये है। इसका FY26 का टैक्स बाद प्रॉफिट 2,497 करोड़ रुपये था। इसका पी/ई मल्टीपल करीब 49 गुना है। एनएसई की वैल्यूएशन बीएसई की करीब 3.2 गुनी है, जबकि प्रॉफिट चार गुना से ज्यादा है।