Salary Management: सैलरी आते ही पैसा खत्म हो जाता है? ये 5 खास फॉर्मूले करेंगे आपकी मदद

Salary Management: हर महीने सैलरी आती है और कुछ ही दिनों में अकाउंट खाली होने लगता है। EMI, किराया, राशन, बच्चों के खर्च, शॉपिंग और बाहर खाने जैसे खर्च मिलकर बजट बिगाड़ देते हैं। महीने के आखिर में बचत के नाम पर कुछ नहीं बचता।

इससे बचने का एक आसान तरीका है सैलरी को मिलते ही 5 अलग-अलग हिस्सों में बांटना। हर हिस्से का एक तय काम होता है। इससे आपको पहले से पता रहता है कि कितना पैसा खर्च करना है और कितना बचाना है।

सैलरी को 5 हिस्सों में कैसे बांटें

इस फॉर्मूले में सैलरी का 50% जरूरी खर्च के लिए रखा जाता है। 20% निवेश, 10% इमरजेंसी फंड, 10% निजी खर्च और 10% बड़े लक्ष्यों के लिए रखा जा सकता है। इसे तीन 30, 50 और 60 हजार अलग-अलग सैलरी के उदाहरण से समझिए।

खर्च का हिस्सा₹30,000 सैलरी₹50,000 सैलरी₹60,000 सैलरी
जरूरी खर्च के लिए 50%₹15,000₹25,000₹30,000
निवेश के लिए 20%₹6,000₹10,000₹12,000
इमरजेंसी फंड 10%₹3,000₹5,000₹6,000
निजी खर्च 10%₹3,000₹5,000₹6,000
बड़े लक्ष्य के लिए 10%₹3,000₹5,000₹6,000
कुल₹30,000₹50,000₹60,000

यह कोई सख्त नियम नहीं है। आप अपनी सैलरी, EMI और परिवार की जरूरत के हिसाब से इन हिस्सों में बदलाव कर सकते हैं।

1. जरूरी खर्च के लिए 50%

सबसे पहले जरूरी खर्च का हिस्सा अलग करना चाहिए। इसमें घर का किराया, EMI, राशन, बिजली-पानी का बिल, बच्चों की फीस और रोजमर्रा की जरूरी चीजें शामिल हो सकती हैं।

अगर आपकी सैलरी ₹50,000 है तो इस हिस्से में करीब ₹25,000 रखे जा सकते हैं। कोशिश करें कि जरूरी खर्च लगातार इससे ऊपर न जाएं। अगर ऐसा हो रहा है तो बजट में कटौती की गुंजाइश तलाशनी चाहिए।

2. निवेश के लिए 20%

दूसरा हिस्सा भविष्य के लिए है। ₹50,000 की सैलरी में इसका मतलब ₹10,000 हर महीने निवेश करना है।

इस पैसे को आपके लक्ष्य और जोखिम के हिसाब से अलग-अलग निवेश विकल्पों में लगाया जा सकता है। मसलन, लंबी अवधि के लक्ष्यों के लिए SIP, जबकि PPF या VPF जैसे विकल्प भी आपकी जरूरत के मुताबिक इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

सबसे जरूरी बात यह है कि निवेश सैलरी आने के बाद हो। महीने के आखिर में जो पैसा बचे, उससे निवेश करने की आदत अक्सर काम नहीं करती।

3. इमरजेंसी के लिए 10%

अचानक आने वाले खर्चों के लिए अलग पैसा होना बहुत जरूरी है। इसके लिए सैलरी का 10% अलग रखा जा सकता है। ₹50,000 की सैलरी में यह रकम ₹5,000 महीने होगी। मेडिकल इमरजेंसी, नौकरी जाने या अचानक किसी बड़े जरूरी खर्च के समय ये पैसा काम आ सकता है।

जब तक पर्याप्त इमरजेंसी फंड तैयार न हो जाए, इस रकम को दूसरे खर्चों में इस्तेमाल करने से बचना चाहिए।

4. निजी खर्च के लिए 10%

बजट बनाने का मतलब यह नहीं है कि हर महीने सिर्फ बिल और निवेश ही किया जाए। घूमने-फिरने, मनोरंजन और अपनी पसंद के खर्च के लिए भी पैसा अलग रखना जरूरी है।

₹50,000 की सैलरी में ₹5,000 इस हिस्से में रखे जा सकते हैं। इससे बाहर खाना, फिल्म, छोटी-मोटी शॉपिंग या घूमने जैसे खर्च किए जा सकते हैं।

इसका फायदा यह है कि आपको हर छोटे खर्च के बाद यह नहीं सोचना पड़ेगा कि बजट बिगड़ गया। बस तय सीमा के अंदर खर्च करना होगा।

5. बड़े लक्ष्यों के लिए 10%

पांचवां हिस्सा उन लक्ष्यों के लिए रखें जिन्हें आप आने वाले कुछ सालों में पूरा करना चाहते हैं। इसमें गाड़ी खरीदना, घर का डाउन पेमेंट, बच्चों की पढ़ाई, शादी या कोई बड़ा पर्सनल गोल शामिल हो सकता है।

₹50,000 की सैलरी में इसके लिए ₹5,000 महीने अलग किए जा सकते हैं। जैसे-जैसे सैलरी बढ़े, इस हिस्से को भी बढ़ाया जा सकता है। इमरजेंसी फंड बनने के बाद उस हिस्से को भी निवेश किया जा सकता है।

फॉर्मूले में अपने हिसाब से करें बदलाव

50:20:10:10:10 का यह फॉर्मूला हर व्यक्ति के लिए बिल्कुल एक जैसा नहीं हो सकता। अगर आपकी EMI ज्यादा है तो जरूरी खर्च का हिस्सा बढ़ सकता है। वहीं, कर्ज कम है और आय ज्यादा है तो निवेश का हिस्सा 20% से ऊपर भी रखा जा सकता है।

आखिर में मकसद सिर्फ सैलरी को 5 हिस्सों में बांटना नहीं है। मकसद यह है कि सैलरी आते ही हर रुपये को एक काम दे दिया जाए, ताकि महीने के अंत में यह सवाल न उठे कि पैसा आखिर गया कहां।

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Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।

PPF vs VPF: नौकरीपेशा लोगों के लिए कौन ज्यादा फायदेमंद है? समझिए पूरा कैलकुलेशन

PPF vs VPF: नौकरीपेशा लोगों के लिए रिटायरमेंट की तैयारी सिर्फ EPF तक सीमित नहीं है। अगर सैलरी से हर महीने कुछ पैसा बचता है, तो उसे PPF में लगाया जा सकता है। दूसरा विकल्प VPF है। इसमें कर्मचारी अपने EPF में तय योगदान से ज्यादा पैसा जमा करता है। दोनों ही लंबे समय के लिए सुरक्षित बचत के विकल्प हैं। लेकिन दोनों के नियम अलग हैं। ब्याज दर भी अलग है। पैसे निकालने के नियम भी अलग हैं।

मौजूदा ब्याज दर देखें तो जुलाई-सितंबर 2026 तिमाही के लिए PPF पर 7.1% सालाना ब्याज मिल रहा है। वहीं वित्त वर्ष 2025-26 के लिए EPF पर 8.25% ब्याज की सिफारिश की गई है। VPF का पैसा भी EPF में ही जाता है। इसलिए इस उदाहरण में VPF के लिए 8.25% की दर ली गई है।

फीचरPPFVPF
क्या है?सरकारी छोटी बचत योजना
EPF में अतिरिक्त कर्मचारी योगदान

ब्याज दर7%8.25%
निवेश सीमाअधिकतम ₹1.5 लाख सालाना
अलग ₹1.5 लाख की सीमा नहीं

निवेश कैसे करें?खुद जमा करना होता है
सैलरी से अतिरिक्त कटौती

मूल अवधि15 साल
EPF के नियम लागू

नौकरी से संबंधनहींEPF और नौकरी से जुड़ा
80Cपुराने टैक्स रिजीम में पात्रपुराने टैक्स रिजीम में पात्र

₹5,000 महीने के निवेश से कितना पैसा बनेगा?

मान लीजिए आप हर महीने ₹5,000 निवेश करते हैं। साल भर में यह रकम ₹60,000 होगी। 15 साल में आपकी कुल जमा रकम ₹9 लाख हो जाएगी। अब तुलना के लिए मान लेते हैं कि पूरे 15 साल तक PPF पर 7.1% और VPF पर 8.25% की दर बनी रहती है।

इस हिसाब से PPF में ₹5,000 महीने का निवेश 15 साल बाद करीब ₹15.9 लाख हो सकता है। इसमें आपकी जमा रकम ₹9 लाख होगी। करीब ₹6.9 लाख ब्याज से आएगा।

वहीं, VPF में 8.25% की दर मानें तो यही निवेश करीब ₹17.7 लाख हो सकता है। इसमें ₹9 लाख आपका निवेश होगा। करीब ₹8.7 लाख ब्याज से आएगा। यानी इस उदाहरण में 15 साल बाद VPF का फंड PPF से करीब ₹1.8 लाख ज्यादा हो सकता है।

PPF की सबसे बड़ी खासियत क्या है?

PPF का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसका आपकी नौकरी से कोई लेना-देना नहीं है। नौकरी बदलने पर भी PPF चलता रहता है। नौकरी छोड़ने पर भी खाते पर कोई असर नहीं पड़ता।

PPF की मूल अवधि 15 साल है। इसके बाद इसे 5-5 साल के ब्लॉक में बढ़ाया जा सकता है। यानी लंबी अवधि के लिए पैसा जमा करने का विकल्प मिलता रहता है।

टैक्स के लिहाज से भी PPF को फायदा मिलता है। पुराने टैक्स रिजीम में इसका निवेश धारा 80C के तहत कटौती के लिए पात्र हो सकता है। PPF का ब्याज भी टैक्स फ्री है। नियमों के मुताबिक मैच्योरिटी की रकम भी टैक्स फ्री रहती है।

VPF किसके लिए ज्यादा अच्छा है?

VPF उन नौकरीपेशा लोगों के लिए काम का विकल्प हो सकता है, जो रिटायरमेंट के लिए ज्यादा पैसा जमा करना चाहते हैं। इसका एक फायदा यह है कि पैसा सीधे सैलरी से कट जाता है। आपको हर महीने अलग से निवेश करने की जरूरत नहीं पड़ती।

लेकिन VPF का पैसा EPF से जुड़ा रहता है। इसलिए इसे सामान्य बैंक खाते की तरह जब चाहें तब निकाल नहीं सकते। निकासी पर EPF के नियम लागू होते हैं।

एक और बात समझना जरूरी है। पुराने टैक्स रिजीम में 80C की कुल सीमा ₹1.5 लाख है। अगर EPF और दूसरे निवेशों से आपकी यह सीमा पहले ही पूरी हो चुकी है, तो VPF में ज्यादा पैसा डालने पर अलग से 80C फायदा नहीं मिलेगा।

PPF या VPF, किसमें पैसा लगाएं?

अगर आपका मकसद रिटायरमेंट के लिए सैलरी से ज्यादा पैसा जमा करना है, तो VPF एक विकल्प हो सकता है। वहीं, अगर आप EPF से अलग एक लंबी अवधि की बचत चाहते हैं, तो PPF पर विचार किया जा सकता है। इसमें नौकरी बदलने या छोड़ने का कोई असर नहीं पड़ता।

ऐसा भी जरूरी नहीं है कि आपको दोनों में से सिर्फ एक ही विकल्प चुनना हो। आपकी वित्तीय क्षमता अच्छी है तो EPF के साथ VPF में अतिरिक्त पैसा डाल सकते हैं। इसके अलावा अलग लक्ष्य के लिए PPF में भी निवेश कर सकते हैं।

आखिर में फैसला सिर्फ ब्याज दर देखकर न करें। यह भी देखें कि पैसा कब चाहिए, कितना पैसा लॉक कर सकते हैं और आपकी मौजूदा बचत कितनी है। रिटायरमेंट के लिए पैसा जमा कर रहे हैं तो निवेश की अवधि और पैसे की जरूरत, दोनों का संतुलन जरूरी है।

SIP में नुकसान हो रहा है तो क्या बंद कर दें? म्यूचुअल फंड एक्सपर्ट ने दी ये खास सलाह

Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।

SIP Calculator: ₹1000 की SIP से ₹5 लाख कितने समय में बनेंगे? समझिए पूरा कैलकुलेशन

SIP Calculator: सिस्टमैटिक इनवेस्टमेंट प्लान (SIP) के जरिए हर महीने छोटी रकम निवेश करके भी समय के साथ बड़ा फंड तैयार किया जा सकता है। अगर आप हर महीने ₹1,000 की SIP करते हैं और आपका लक्ष्य ₹5 लाख का फंड बनाना है, तो इसमें कितना समय लगेगा?

इसका सीधा जवाब रिटर्न की दर पर निर्भर करता है। अगर सालाना रिटर्न 10%, 12% और 15% मानें, तो ₹5 लाख का लक्ष्य अलग-अलग समय में पूरा होगा। आइए तीनों मामलों का पूरा हिसाब समझते हैं।

तीनों कैलकुलेशन एक नजर में

सालाना रिटर्न₹5 लाख बनने में समयकुल निवेशरिटर्न से बनी रकम
10%16 साल 6 महीने₹1.98 लाख₹3.02 लाख
12%15 साल 1 महीना₹1.81 लाख₹3.19 लाख
15%13 साल 4 महीने₹1.60 लाख₹3.40 लाख

10% रिटर्न पर कितना समय लगेगा

अगर ₹1,000 की मासिक SIP पर औसतन 10% सालाना रिटर्न मिले, तो ₹5 लाख का फंड करीब 198 महीने यानी 16 साल 6 महीने में तैयार होगा। इस दौरान आप कुल ₹1.98 लाख निवेश करेंगे। बाकी करीब ₹3.02 लाख रिटर्न से जुड़ेंगे।

12% रिटर्न मिला, तो क्या होगा

अगर औसत सालाना रिटर्न 12% हो, तो ₹1,000 की SIP से ₹5 लाख का लक्ष्य करीब 181 महीने यानी 15 साल 1 महीने में पूरा होगा। इस अवधि में आपका कुल निवेश ₹1.81 लाख होगा। आपको करीब ₹3.19 लाख रिटर्न से मिलेंगे।

15% रिटर्न पर लक्ष्य कब पूरा होगा

अगर SIP पर औसतन 15% सालाना रिटर्न मिले, तो ₹5 लाख का फंड करीब 160 महीने यानी 13 साल 4 महीने में तैयार हो सकता है। इस दौरान कुल ₹1.60 लाख निवेश होगा। करीब ₹3.40 लाख रकम रिटर्न से बनेगी।

रिटर्न बढ़ने से लक्ष्य कितनी जल्दी पूरा होगा?

तीनों आंकड़ों को देखें तो 10% और 15% रिटर्न के बीच करीब 3 साल 2 महीने का अंतर है। यानी रिटर्न में 5 प्रतिशत अंक का अंतर लक्ष्य पूरा होने के समय में काफी बड़ा फर्क पैदा करता है।

वहीं कुल निवेश भी घटता है। 10% रिटर्न वाले अनुमान में ₹1.98 लाख निवेश से ₹5 लाख का फंड बनता है। 15% के अनुमान में ₹1.60 लाख निवेश से यही लक्ष्य पूरा होता है। बाकी रकम कंपाउंडिंग के जरिए तैयार होती है।

SIP बढ़ाने से लक्ष्य और जल्दी बन सकता है

अगर समय के साथ आपकी आमदनी बढ़ती है, तो SIP की रकम भी बढ़ाई जा सकती है। उदाहरण के लिए, शुरुआत ₹1,000 से करके बाद में इसे ₹1,500 या ₹2,000 किया जाए, तो ₹5 लाख का लक्ष्य पहले हासिल किया जा सकता है।

यानी SIP में सिर्फ रकम नहीं, समय और निवेश की निरंतरता भी बड़ा फर्क पैदा करती है। ₹1,000 से शुरुआत करने वाला निवेशक धीरे-धीरे SIP बढ़ाकर बड़े वित्तीय लक्ष्य की तरफ भी बढ़ सकता है।

Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।

EPF Pension: ₹12500 महीना तक हो सकती है पेंशन, समझिए सरकार के नए फैसले का पूरा असर

EPF Pension: केंद्रीय कैबिनेट ने EPF और EPS की अनिवार्य कवरेज के लिए वेतन सीमा बढ़ाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। अब यह सीमा ₹15,000 से बढ़कर ₹25,000 हो जाएगी। सरकार के मुताबिक, इस फैसले से करीब 51 लाख कर्मचारियों को फायदा होगा।

अभी तक ₹15,000 तक के वेतन पर EPF और EPS की अनिवार्य कवरेज लागू होती थी। यह सीमा 1 सितंबर 2014 से नहीं बदली थी। नई सीमा लागू होने पर ज्यादा कर्मचारी इस दायरे में आ सकते हैं।

पेंशन में 66.7% तक बढ़ोतरी

इस फैसले का सीधा असर EPS यानी कर्मचारी पेंशन योजना पर भी पड़ने की उम्मीद है। वजह है कि पेंशन की कैलकुलेशन के लिए इस्तेमाल होने वाली वेतन सीमा भी ₹25,000 हो सकती है।

EPS में पेंशन का फॉर्मूला इस तरह है:

पेंशन = पेंशन योग्य वेतन × पेंशन योग्य सेवा ÷ 70

अभी अधिकतम पेंशन योग्य वेतन ₹15,000 माना जाता है। ऐसे में 35 साल की पेंशन योग्य सेवा वाले कर्मचारी की फॉर्मूला आधारित पेंशन करीब ₹7,500 बनती है।

अगर यही सीमा ₹25,000 हो जाती है, तो 35 साल की सेवा पर पेंशन ₹12,500 हो सकती है। यानी फॉर्मूला के हिसाब से पेंशन में 66.7% की बढ़ोतरी हो सकती है।

पेंशन योग्य सेवा₹15,000 वेतन सीमा पर पेंशन₹25,000 वेतन सीमा पर पेंशनसंभावित बढ़ोतरी
10 साल₹2,143₹3,57166.70%
20 साल₹4,286₹7,14366.70%
25 साल₹5,357₹8,92966.70%
30 साल₹6,429₹10,71466.70%
35 साल₹7,500₹12,50066.70%

Zaggle की CHRO लता अय्यर ने कहा, ‘अगर बढ़ी लिमिट को EPS की कैलकुलेशन में लागू किया जाता है, तो पेंशन में अच्छी बढ़ोतरी हो सकती है। हालांकि, वास्तविक बढ़ोतरी पेंशन योग्य सेवा और सरकार की ओर से जारी होने वाले अंतिम नियमों पर निर्भर करेगी।’

EPF में ज्यादा पैसा कट सकता है

अब बात EPF की। यहां तस्वीर थोड़ी अलग है। वेतन सीमा बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि हर कर्मचारी की सैलरी से EPF की कटौती तुरंत बढ़ जाएगी। फिलहाल कुछ कंपनियां ₹15,000 की सीमा पर EPF योगदान तय करती हैं। वहीं, कुछ कंपनियां कर्मचारी के वास्तविक बेसिक पे पर योगदान करती हैं। इसलिए नई व्यवस्था का असर कर्मचारी की मौजूदा पॉलिसी पर भी निर्भर करेगा।

मान लीजिए अभी किसी कर्मचारी का EPF योगदान ₹15,000 की सीमा पर हो रहा है। 12% के हिसाब से हर महीने कर्मचारी के हिस्से से ₹1,800 कटते हैं। अगर नई ₹25,000 की सीमा पर 12% योगदान लागू होता है, तो यह रकम बढ़कर ₹3,000 हो जाएगी। यानी हर महीने ₹1,200 ज्यादा EPF में जाएगा।

इसका सीधा असर टेक-होम सैलरी पर पड़ेगा। हाथ में आने वाली सैलरी ₹1,200 तक कम हो सकती है। हालांकि, यह पैसा कर्मचारी की रिटायरमेंट सेविंग में ही जाएगा।

हर कर्मचारी की सैलरी पर असर नहीं पड़ेगा

जिन कर्मचारियों का EPF योगदान पहले से ही उनके वास्तविक बेसिक पे पर होता है, उन पर नई सीमा का तुरंत कोई खास असर नहीं पड़ सकता।

मसलन, अगर किसी कर्मचारी की कंपनी पहले से ही ₹25,000 या उससे ज्यादा के बेसिक पे पर 12% EPF काट रही है, तो केवल वेतन सीमा बढ़ने से उसकी कटौती में जरूरी नहीं कि कोई बदलाव हो।

Choice International की CHRO नेहा जैन ने कहा, ‘अगर बढ़ी हुई सीमा पर EPF योगदान अनिवार्य होता है, तो फिलहाल ₹15,000 की सीमा पर 12% योगदान करने वाला कर्मचारी हर महीने ₹1,800 की जगह ₹3,000 योगदान करेगा। इससे टेक-होम सैलरी में हर महीने ₹1,200 तक की कमी हो सकती है।’

उन्होंने कहा, ‘अगर योगदान अभी की तरह मौजूदा सीमा पर ही कैप रहता है, तो टेक-होम सैलरी पर तुरंत कोई असर नहीं पड़ेगा। इसलिए अंतिम नोटिफिकेशन और योगदान का नया ढांचा काफी अहम होगा।’

EPF Wage Ceiling Hike: केंद्रीय कैबिनेट का बड़ा फैसला! ₹15,000 से बढ़कर ₹25,000 हुई सैलरी लिमिट, 51 लाख कर्मचारियों को सीधा फायदा

iPhone 18 Pro की कीमत ₹1.64 लाख, FD या लंपसम में लगाएं तो कितना बनेगा पैसा? समझिए पूरा कैलकुलेशन

अमेरिकी टेक कंपनी Apple के नए iPhone 18 Pro की भारत में शुरुआती कीमत ₹1,64,900 है। सोशल मीडिया पर मीम चल रहा है कि अगर आप ₹1.64 लाख से आईफोन की जगह एक भैंस खरीदते हैं, तो ज्यादा फायदे में रहेंगे। 5 साल बाद आईफोन खराब होने लगेगा। वहीं भैंस तब तक कई बच्चे और दूध देकर आपका मुनाफा कई गुना बढ़ा चुकी होगी।

खैर, अगर मीम से हटकर बात करें तो इतना पैसा किसी प्रीमियम फोन पर खर्च करने के बजाय निवेश किया जाए, तो आने वाले वर्षों में यह रकम कितनी हो सकती है? इसे FD और एकमुश्त इक्विटी निवेश के जरिए समझते हैं।

इसके लिए ₹1,64,900 की शुरुआती रकम को 5, 10 और 15 साल के लिए निवेश करने का कैलकुलेशन किया गया है। FD के लिए 6.5% सालाना ब्याज और लंपसम निवेश के लिए औसतन 12% सालाना रिटर्न माना गया है।

अवधि6.5% पर FD का रिटर्न12% पर  लंपसम का रिटर्न
5 साल₹2.26 लाख₹2.91 लाख
10 साल₹3.10 लाख₹5.12 लाख
15 साल₹4.24 लाख₹9.03 लाख

नोट : FD का ब्याज बैंक की पॉलिसी और लंपसम का रिटर्न मार्केट की हालत के हिसाब से बदल सकता है।

5 साल बाद कितना पैसा बनेगा?

अगर ₹1,64,900 को 6.5% सालाना ब्याज वाली FD में रखा जाता है, तो 5 साल बाद यह रकम करीब ₹2.26 लाख हो सकती है। यानी करीब ₹61,000 की बढ़ोतरी होगी।

वहीं, इसी रकम को 12% सालाना रिटर्न के अनुमान पर एकमुश्त इक्विटी निवेश में लगाया जाए, तो 5 साल बाद करीब ₹2.91 लाख हो सकते हैं। इसमें शुरुआती रकम करीब ₹1.26 लाख बढ़ जाती है।

10 साल बाद कैसा हाल रहेगा?

समय बढ़ने के साथ कंपाउंडिंग का असर भी बढ़ता है। 6.5% सालाना ब्याज की दर से ₹1,64,900 की FD करीब ₹3.10 लाख हो सकती है।

अगर यही रकम 12% सालाना रिटर्न के अनुमान पर एकमुश्त निवेश की जाए, तो 10 साल बाद करीब ₹5.12 लाख हो सकती है। यानी FD के मुकाबले करीब ₹2 लाख ज्यादा रकम बन सकती है।

15 साल बाद की तस्वीर क्या है?

15 साल की अवधि में दोनों विकल्पों के बीच अंतर और बड़ा हो जाता है। 6.5% सालाना ब्याज के हिसाब से FD की रकम करीब ₹4.24 लाख हो सकती है।

दूसरी तरफ, 12% सालाना रिटर्न के अनुमान पर एकमुश्त निवेश करीब ₹9.03 लाख तक पहुंच सकता है। यानी ₹1.64 लाख की शुरुआती रकम करीब साढ़े पांच गुना हो सकती है।

iPhone खरीदने और निवेश के बीच फर्क

यह कैलकुलेशन दिखाता है कि ₹1.64 लाख की रकम को लंबे समय तक निवेश करने पर कंपाउंडिंग का फायदा कितना बड़ा हो सकता है। फोन खरीदने पर यह रकम एक प्रोडक्ट पर खर्च हो जाती है। वहीं निवेश में पैसा आगे भी कमाई कर सकता है।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि फोन खरीदना हमेशा गलत फैसला है। अगर आपकी बचत, इमरजेंसी फंड और दूसरे वित्तीय लक्ष्य पहले से रास्ते पर हैं, तो आप को बेशक अपनी पसंद का फोन खरीद सकता है। लेकिन अगर ₹1.64 लाख उसकी कुल बचत का बड़ा हिस्सा है, तो इस रकम को खर्च करने से पहले निवेश का विकल्प देखना ज्यादा समझदारी भरा हो सकता है।

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SIP vs SSY: हर महीने 3000 के निवेश से कितना पैसा बनेगा? समझिए पूरा कैलकुलेशन

SIP vs SSY: अगर आप हर महीने ₹3,000 बचा सकते हैं तो आपके सामने निवेश के कई विकल्प हैं। इनमें SIP और सुकन्या समृद्धि योजना (SSY) भी शामिल हैं। लेकिन दोनों की पैसे बढ़ाने का तरीका काफी अलग है।

SIP बाजार से जुड़ा निवेश है। इसमें रिटर्न तय नहीं होता। वहीं SSY सरकार की छोटी बचत योजना है। फिलहाल इसमें 8.2% सालाना ब्याज मिल रहा है। ब्याज सालाना कंपाउंड होता है। अब सवाल है कि हर महीने ₹3,000 लगाने पर दोनों में कितना पैसा बन सकता है?

15 साल में कितना पैसा बनेगा?

मान लेते हैं कि SIP से औसतन 12% सालाना रिटर्न मिलता है। लॉन्ग टर्म में अच्छे म्यूचुअल फंड से इतने ही रिटर्न की उम्मीद की जा सकती है। हालांकि, मार्केट से जुड़ा होने के नाते रिटर्न की कोई गारंटी नहीं होती। दूसरी तरफ SSY में मौजूदा 8.2% ब्याज दर है। इसमें सरकार बदलाव कर सकती है। दोनों में हर महीने ₹3,000 निवेश करने पर तस्वीर कुछ ऐसी बनती है।

अवधिकुल निवेशSIP का फंडSSY का फंड
5 साल₹1.80 लाख₹2.47 लाख₹2.16 लाख
10 साल₹3.60 लाख₹6.97 लाख₹5.42 लाख
15 साल₹5.40 लाख₹15.14 लाख₹10.64 लाख

यानी 15 साल में आप दोनों जगह कुल ₹5.40 लाख जमा करेंगे। लेकिन अनुमानित रिटर्न के हिसाब से SIP में करीब ₹15.14 लाख और SSY में करीब ₹10.64 लाख हो सकते हैं।

SSY में एक बड़ा फर्क समझिए

यहां एक जरूरी बात है। SSY में बेटी के नाम खाते में 15 साल तक पैसा जमा किया जाता है। खाता खुलने की तारीख से 21 साल बाद यह मैच्योर होता है। यानी 15 साल तक ₹3,000 जमा करने के बाद भी पैसा तुरंत हाथ में नहीं आता। अगर 15 साल बाद SSY में जमा करीब ₹10.64 लाख को अगले 6 साल तक 8.2% की दर से बढ़ने दें, तो यह रकम लगभग ₹17 लाख हो सकती है।

इसके मुकाबले अगर SIP में ₹3,000 की मासिक SIP पूरे 21 साल तक चलती रहे और औसतन 12% रिटर्न मिले, तो रकम करीब ₹34.16 लाख हो सकती है।

फिर कौन बेहतर है?

इसका सीधा जवाब नहीं है। दोनों का मकसद अलग है। अगर आप बेटी की पढ़ाई या भविष्य के लिए सुरक्षित और तय नियमों वाली बचत चाहते हैं तो SSY एक विकल्प हो सकती है। इसमें सरकार की ब्याज दर लागू होती है और खाता 21 साल में मैच्योर होता है।

वहीं अगर आपका लक्ष्य लंबी अवधि में ज्यादा कॉर्पस बनाना है और आप बाजार के उतार-चढ़ाव का जोखिम ले सकते हैं तो SIP पर विचार किया जा सकता है।

इसलिए निवेश चुनते समय सिर्फ यह न देखें कि पैसा कहां ज्यादा बन रहा है। यह भी देखें कि आपका लक्ष्य क्या है, कितने समय के लिए निवेश करना है और आप कितना जोखिम उठा सकते हैं।

क्या आपकी SIP उम्मीद से कम रिटर्न दे रही? ये 5 कारण हो सकते हैं जिम्मेदार

Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।

SIP vs NPS: हर महीने ₹5,000 निवेश करें तो 30 साल में कितना फंड बनेगा? समझिए पूरा कैलकुलेशन

SIP vs NPS: रिटायरमेंट के लिए हर महीने ₹5,000 निवेश करना अच्छी रकम हो सकती है। इससे 30 जैसी लंबी अवधि में बड़ा फंड भी बन सकता है। लेकिन, असल सवाल है कि ₹5,000 SIP में लगाएं या NPS में? तुलना को आसान बनाने के लिए दोनों में अलग-अलग रिटर्न मानते हैं। SIP में 12% और NPS में 10% औसत सालाना रिटर्न लेते हैं।

मान लेते हैं कि निवेश की शुरुआत 30 साल की उम्र में होती है। हर महीने ₹5,000 निवेश किया जाता है। निवेश 30 साल तक जारी रहता है। यानी 60 साल की उम्र तक कुल ₹18 लाख निवेश होंगे।

30 साल बाद कितना फंड बनेगा?

SIP में 12% औसत रिटर्न मिलने पर ₹5,000 महीने का निवेश करीब ₹1.76 करोड़ का फंड बना सकता है। NPS में 10% औसत रिटर्न मानने पर कॉर्पस करीब ₹1.14 करोड़ हो सकता है।

यानी इस उदाहरण में SIP का अनुमानित फंड NPS से करीब ₹62 लाख ज्यादा रहेगा।

पैमानाSIPNPS
हर महीने निवेश₹5,000₹5,000
निवेश की अवधि30 साल30 साल
कुल निवेश₹18 लाख₹18 लाख
अनुमानित सालाना रिटर्न12%10%
अनुमानित कॉर्पस₹1.76 करोड़₹1.14 करोड़
अनुमानित रिटर्न₹1.58 करोड़₹96 लाख

SIP में ज्यादा पैसा क्यों बनेगा?

यहां सिर्फ 2% रिटर्न का अंतर है। लेकिन 30 साल में कंपाउंडिंग इस अंतर को काफी बड़ा बना देती है। SIP में ₹18 लाख का कुल निवेश 12% औसत रिटर्न पर करीब ₹1.76 करोड़ हो सकता है। यानी करीब ₹1.58 करोड़ की रकम अनुमानित रिटर्न से जुड़ सकती है।

हालांकि, 12% रिटर्न तय नहीं है। इक्विटी म्यूचुअल फंड बाजार से जुड़े होते हैं। कुछ साल रिटर्न काफी ज्यादा हो सकता है। कुछ साल नुकसान भी हो सकता है।

NPS में कितना फंड बनेगा?

NPS में 10% औसत रिटर्न मानें तो ₹5,000 महीने का निवेश 30 साल में करीब ₹1.14 करोड़ बना सकता है। इसमें आपका कुल निवेश ₹18 लाख होगा। बाकी करीब ₹96 लाख अनुमानित रिटर्न होगा।

NPS का मकसद रिटायरमेंट के लिए लंबी अवधि में पैसा तैयार करना है। इसमें निवेश बाजार से जुड़ा होता है। इसलिए यहां भी 10% रिटर्न की कोई गारंटी नहीं है।

NPS में एग्जिट का नियम अलग

NPS और SIP में सबसे बड़ा अंतर पैसा निकालने के समय आता है। NPS में रिटायरमेंट पर पूरा कॉर्पस अपनी मर्जी से निकालने की सुविधा नहीं होती। मौजूदा नियमों के तहत सामान्य एग्जिट में गैर-सरकारी सब्सक्राइबर के लिए 80% तक रकम एकमुश्त निकालने और कम से कम 20% रकम एन्‍युटी में लगाने का विकल्प है। छोटे कॉर्पस के लिए अलग नियम लागू हो सकते हैं।

एन्‍युटी से रिटायरमेंट के बाद नियमित आय मिलती है। हालांकि, पेंशन कितनी मिलेगी यह एन्‍युटी रेट और चुने गए प्लान पर निर्भर करेगा।

SIP में पैसा निकालना आसान

SIP में ऐसा लॉक-इन स्ट्रक्चर नहीं है। म्यूचुअल फंड की स्कीम के नियमों के मुताबिक आप जरूरत पड़ने पर अपनी यूनिट बेच सकते हैं।

यही SIP की बड़ी खासियत है। रिटायरमेंट के अलावा घर, बच्चों की पढ़ाई या किसी दूसरी जरूरत के लिए भी पैसा इस्तेमाल किया जा सकता है।

टैक्स में भी अंतर

SIP और NPS का टैक्स ट्रीटमेंट अलग है। SIP में टैक्स म्यूचुअल फंड के प्रकार और कैपिटल गेन पर निर्भर करता है। इसलिए 30 साल बाद बनने वाले पूरे कॉर्पस को सीधे टैक्स फ्री नहीं माना जा सकता।

NPS में भी लंपसम और एन्‍युटी को लेकर अलग टैक्स नियम हैं। एन्‍युटी से बाद में मिलने वाली पेंशन आपकी इनकम का हिस्सा मानी जाती है और उस पर लागू नियमों के हिसाब से टैक्स लगता है।

फिर SIP या NPS?

अगर आपकी प्राथमिकता ज्यादा लिक्विडिटी और लचीलापन है, तो SIP बेहतर विकल्प हो सकता है। वहीं, रिटायरमेंट के लिए अलग पैसा बनाना है और लंबे समय तक निवेश बनाए रखना है, तो NPS का स्ट्रक्चर काम आ सकता है।

इस उदाहरण में ₹5,000 महीने के निवेश पर SIP का अनुमानित फंड ₹1.76 करोड़ और NPS का करीब ₹1.14 करोड़ है। लेकिन सिर्फ बड़ा कॉर्पस देखकर फैसला नहीं करना चाहिए। रिटर्न के साथ टैक्स, लिक्विडिटी और एग्जिट नियम भी देखना जरूरी है।

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Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।

Maruti Suzuki Baleno Facelift की पूरी कीमत लिस्ट जारी, जानें सभी वेरिएंट्स के दाम

Maruti Suzuki ने 2026 Baleno facelift के सभी वेरिएंट्स की कीमतों की पूरी लिस्ट जारी कर दी है। इसकी शुरुआती कीमत 5.99 लाख रुपये है और टॉप मॉडल की कीमत 9.99 लाख रुपये (एक्स-शोरूम) है, जो पांच ट्रिम्स में उपलब्ध है। यह इसलिए अहम है क्योंकि Maruti Suzuki ने शुरू में इस कार को 5 सितंबर को लगभग 6.10 लाख रुपये (एक्स-शोरूम) की शुरुआती कीमत पर लॉन्च किया था, लेकिन अब Sigma बेस मॉडल की कीमत 5.99 लाख रुपये (एक्स-शोरूम) तय हो गई है। यह कीमत पुराने मॉडल के बराबर ही है, जबकि नई कार में नया इंजन, बेहतर सेफ्टी किट और अतिरिक्त फीचर्स दिए गए हैं। प्रीमियम हैचबैक सेगमेंट में गाड़ी खरीदने की सोच रहे ग्राहक अब Hyundai i20 और Tata Altroz जैसी प्रतिद्वंद्वी कारों से इसकी कीमतों की सही-सही तुलना कर सकते हैं।

Maruti Suzuki Baleno facelift: वेरिएंट्स और कीमत

आपकी जानकारी के लिए यहां सभी वेरिएंट्स की एक्स-शोरूम कीमतें दी गई हैं।

Baleno Facelift वेरिएंटपेट्रोल MTपेट्रोल AMTCNG MT
Sigma₹5.99 लाख——
Delta₹7.00 लाख₹7.50 लाख₹7.92 लाख
Zeta₹8.00 लाख₹8.50 लाख₹8.92 लाख
Alpha₹9.10 लाख₹9.60 लाख—
Alpha(O)₹9.50 लाख₹9.99 लाख—

Sigma बेस ट्रिम सिर्फ पेट्रोल-मैनुअल में आता है और इसकी कीमत ₹5.99 लाख है। इसमें AMT या CNG का ऑप्शन नहीं है। Delta ट्रिम मैनुअल में ₹7 लाख से शुरू होता है, AMT के लिए इसकी कीमत ₹7.50 लाख और CNG वेरिएंट के लिए ₹7.92 लाख तक जाती है। Zeta ट्रिम भी इसी पैटर्न को फॉलो करता है, जिसकी कीमतें क्रमशः ₹8 लाख, ₹8.50 लाख और ₹8.92 लाख हैं।

टॉप दो ट्रिम्स, Alpha और Alpha(O), में CNG का ऑप्शन बिल्कुल नहीं है: Alpha की कीमत ₹9.10 लाख (MT) और ₹9.60 लाख (AMT) है, जबकि Alpha(O) सबसे महंगा वेरिएंट है, जिसकी कीमत ₹9.50 लाख (MT) और ₹9.99 लाख (AMT) है। ध्यान दें कि ये सभी कीमतें एक्स-शोरूम हैं। सभी वेरिएंट्स में, AMT के लिए पेट्रोल-मैनुअल के मुकाबले ₹50,000 ज्यादा देने होंगे, जबकि CNG के लिए ₹92,000 ज्यादा देने होंगे।

Maruti Suzuki Baleno facelift: क्या बदला है?

Maruti Suzuki Baleno facelift में सबसे बड़ा बदलाव इसके इंजन में हुआ है। पुराना K12N 1.2-लीटर फोर-सिलेंडर इंजन हटाकर उसकी जगह Z12E 1.2-लीटर थ्री-सिलेंडर इंजन लगाया गया है, जो पहले से ही Swift और Dzire में इस्तेमाल हो रहा है। इसकी पावर और टॉर्क थोड़ी कम होकर 83hp और 112Nm हो गई है (7hp और 1Nm की कमी), लेकिन मैनुअल मॉडल में माइलेज बढ़कर 23.80kmpl और AMT मॉडल में 24.77kmpl हो गया है।

CNG वर्जन 70hp की पावर और 102Nm का टॉर्क देता है और इसका माइलेज 33.61km/kg बताया गया है। सेफ्टी के मामले में, Baleno में अब लेवल 2 ADAS सुइट और टायर प्रेशर मॉनिटरिंग सिस्टम जैसे नए फीचर्स मिलते हैं, जो पहले नहीं थे। इसके अलावा, इसमें 6 एयरबैग, 360-डिग्री कैमरा और हिल होल्ड असिस्ट जैसे पुराने फीचर्स भी मौजूद हैं। कार के बाहरी डायमेंशन में कोई बदलाव नहीं हुआ है – लंबाई 3,990mm, चौड़ाई 1,745mm और व्हीलबेस 2,520mm ही है।

खरीदारों के लिए इसका क्या मतलब है?

अगर आप Maruti Suzuki Baleno खरीदने की सोच रहे हैं, तो ध्यान रखें कि CNG का ऑप्शन सिर्फ Delta और Zeta वेरिएंट में मिलता है। टॉप-एंड Alpha और Alpha(O) वेरिएंट में CNG का विकल्प नहीं दिया गया है। इसलिए कम रनिंग कॉस्ट के लिए CNG कार खरीदने वाले ग्राहकों के पास सीमित विकल्प हैं।

नई Baleno में पुराने 4-सिलेंडर इंजन के मुकाबले पावर थोड़ी कम हुई है, लेकिन माइलेज बेहतर हुई है। ऐसे में अगर आपकी प्राथमिकता ज्यादा पावर और बेहतर परफॉर्मेंस है, तो बुकिंग से पहले इस बदलाव को ध्यान में रखना जरूरी है। वहीं, अगर आप बेहतर माइलेज और कम ईंधन खर्च चाहते हैं, तो नया इंजन आपके लिए फायदेमंद हो सकता है। साथ ही, ये शुरुआती कीमतें हैं और Maruti Suzuki आगे चलकर इनमें बदलाव कर सकती है।

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FD में ब्याज मंथली लें या मैच्योरिटी पर, किसमें ज्यादा फायदा है? समझिए पूरा कैलकुलेशन

FD में पैसा लगाते समय सिर्फ ब्याज दर देखना काफी नहीं है। यह भी तय करना होता है कि ब्याज हर महीने चाहिए या मैच्योरिटी पर। दोनों विकल्पों में बड़ा फर्क है। हर महीने वाला विकल्प चुनने से नियमित कमाई मिलती है। वहीं, क्यूम्युलेटिव FD में ब्याज जुड़ता रहता है। और उस पर भी ब्याज मिलता है। इसी वजह से लंबी अवधि में मैच्योरिटी वाला विकल्प ज्यादा रकम दे सकता है।

मान लीजिए आपने ₹5 लाख की FD 7.1% सालाना ब्याज पर 5 साल के लिए कराई। अब देखते हैं कि दोनों विकल्पों में कितना पैसा बन सकता है।

हर महीने कितना ब्याज मिलेगा?

अगर आप मासिक ब्याज वाला विकल्प चुनते हैं तो करीब ₹2,958 हर महीने मिलेंगे। 5 साल में कुल ब्याज करीब ₹1.77 लाख होगा। आपका ₹5 लाख का मूलधन FD में बना रहेगा। मैच्योरिटी पर आपको यही ₹5 लाख वापस मिलेंगे।

यानी इस विकल्प में ब्याज आपको बीच-बीच में मिलता रहता है। इसलिए उस रकम पर FD के अंदर दोबारा ब्याज नहीं बनता।

मैच्योरिटी पर कितनी रकम मिलेगी?

अब यही ₹5 लाख क्यूम्युलेटिव FD में लगाते हैं। इसमें ब्याज हर महीने आपके खाते में नहीं आएगा। ब्याज FD में ही जुड़ता रहेगा। इस पर आगे ब्याज भी मिलेगा।

7.1% की दर और 5 साल की अवधि मानें तो रकम करीब ₹7.11 लाख हो सकती है। इसमें करीब ₹2.11 लाख ब्याज शामिल होगा।

दोनों विकल्पों में कितना फर्क?

विकल्पनिवेशकुल ब्याज
मैच्योरिटी पर रकम

मासिक ब्याज₹5 लाखकरीब ₹1.77 लाख₹5 लाख
क्यूम्युलेटिव FD₹5 लाखकरीब ₹2.11 लाखकरीब ₹7.11 लाख

इस हिसाब से क्यूम्युलेटिव FD में करीब ₹33,000 ज्यादा ब्याज बनता है। वजह साफ है। इसमें ब्याज FD में ही जुड़ता रहता है। उस पर भी ब्याज मिलता है। यही कंपाउंडिंग का फायदा है।

हर महीने इनकम चाहिए तो क्या करें?

अगर आपको हर महीने पैसे की जरूरत है तो मासिक ब्याज वाली FD ज्यादा काम की हो सकती है। इससे नियमित इनकम मिलती रहती है। रिटायरमेंट के बाद खर्च चलाने वाले लोगों के लिए यह विकल्प उपयोगी हो सकता है।

इसमें आपका मूलधन भी बना रहता है। बस ब्याज FD में वापस नहीं जुड़ता।

पैसा बढ़ाना है तो क्यूम्युलेटिव FD

अगर आपको FD से हर महीने इनकम नहीं चाहिए तो क्यूम्युलेटिव FD पर विचार किया जा सकता है। इसमें ब्याज को निकालने के बजाय FD में ही रहने दिया जाता है।

इससे ब्याज पर भी ब्याज मिलता है। लंबी अवधि में यही कंपाउंडिंग आपकी कुल रकम को बढ़ाती है।

सिर्फ ज्यादा ब्याज देखकर फैसला न करें

FD का चुनाव आपकी जरूरत पर निर्भर करता है। हर महीने पैसे चाहिए तो मासिक ब्याज ठीक है। लंबे समय तक पैसा नहीं निकालना है तो क्यूम्युलेटिव FD ज्यादा फायदेमंद हो सकती है।

हालांकि, वास्तविक मैच्योरिटी रकम बैंक की ब्याज दर, कंपाउंडिंग के तरीके और FD की शर्तों पर निर्भर करेगी। FD से मिलने वाला ब्याज टैक्स के दायरे में भी आता है। इसलिए निवेश से पहले टैक्स के बाद मिलने वाली रकम देखना ज्यादा सही रहेगा।

SIP vs Lump Sum: ₹5 लाख एकमुश्त निवेश या ₹5000 की SIP, 15 साल बाद किसमें ज्यादा पैसा मिलेगा? समझिए कैलकुलेशन

Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।

SIP Calculator: ₹3000 की मंथली SIP से कितना पैसा बनेगा? समझिए 10, 15 और 20 साल का पूरा कैलकुलेशन

SIP Calculator: हर महीने ₹3,000 निवेश करना बहुत बड़ी रकम नहीं है। लेकिन लंबी अवधि में यही छोटी रकम बड़ा फंड बना सकती है। इसकी वजह कंपाउंडिंग है। समय जितना ज्यादा होगा, रिटर्न पर मिलने वाला रिटर्न भी उतना ही बढ़ता जाएगा।

मान लीजिए आप हर महीने ₹3,000 की SIP शुरू करते हैं। हम यहां दो अलग-अलग रिटर्न मानकर हिसाब समझ रहे हैं। पहला 12% सालाना। यह लंबी अवधि में बेंचमार्क माना जाता है। और दूसरा 15% सालाना, जो अगर फंड ने ज्यादा अच्छा प्रदर्शन किया, तो मिल सकता है। हालांकि, SIP का पैसा बाजार में लगता है, तो असल रिटर्न कम या ज्यादा हो सकता है।

एक नजर में SIP का पूरा हिसाब

अवधिकुल निवेश12% पर फंड15% पर फंड
10 साल₹3.60 लाख₹6.97 लाख₹8.36 लाख
15 साल₹5.40 लाख₹15.14 लाख₹20.31 लाख
20 साल₹7.20 लाख₹29.97 लाख₹45.48 लाख

10 साल में ₹8 लाख तक का फंड

अगर आप 10 साल तक हर महीने ₹3,000 निवेश करते हैं, तो आपकी कुल जेब से ₹3.60 लाख जाएंगे। 10 साल में कुल 120 किस्तें होंगी।

अगर औसत सालाना रिटर्न 12% रहा, तो आपका फंड करीब ₹6.97 लाख हो सकता है। यानी ₹3.60 लाख के निवेश पर करीब ₹3.37 लाख का रिटर्न मिलेगा।

वहीं, 15% सालाना रिटर्न मिलने पर फंड करीब ₹8.36 लाख तक पहुंच सकता है। इस स्थिति में करीब ₹4.76 लाख रिटर्न से आएंगे।

15 साल में ₹20 लाख के करीब

अब यही SIP 15 साल तक जारी रखें। इस दौरान आप कुल ₹5.40 लाख निवेश करेंगे। यानी 180 महीनों तक ₹3,000 की किस्त जाएगी।

12% सालाना रिटर्न के हिसाब से आपका फंड करीब ₹15.14 लाख हो सकता है। इसमें आपका निवेश ₹5.40 लाख होगा। बाकी करीब ₹9.74 लाख कंपाउंडिंग से मिलने वाला रिटर्न होगा।

अगर रिटर्न 15% सालाना रहा, तो फंड करीब ₹20.31 लाख हो सकता है। यानी ₹5.40 लाख के निवेश पर करीब ₹14.91 लाख का रिटर्न बन सकता है।

20 साल में ₹45 लाख से ज्यादा

सबसे बड़ा फर्क 20 साल की अवधि में दिखाई देता है। 20 साल तक हर महीने ₹3,000 लगाने पर आपका कुल निवेश ₹7.20 लाख होगा। इस दौरान आप 240 SIP किस्तें जमा करेंगे।

12% सालाना रिटर्न के हिसाब से यह रकम बढ़कर करीब ₹29.97 लाख हो सकती है। यानी आपके ₹7.20 लाख के निवेश पर करीब ₹22.77 लाख का रिटर्न मिल सकता है।

वहीं, 15% सालाना रिटर्न मिलने पर फंड करीब ₹45.48 लाख तक पहुंच सकता है। इसमें करीब ₹38.28 लाख रिटर्न होगा।

FD vs SCSS: सीनियर सिटिजंस के लिए FD बेहतर या SCSS? समझिए पूरा कैलकुलेशन

Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सिर्फ सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी निवेश, लोन, टैक्स, बीमा या दूसरे वित्तीय फैसले लेने से पहले संबंधित एक्सपर्ट्स से सलाह जरूर लें। मनीकंट्रोल किसी भी फाइनेंशियल प्रोडक्ट या सर्विस की सिफारिश नहीं करता।