Highest Paying Jobs: सॉफ्टवेयर इंजीनियर नहीं, ये लोग कमा रहे लाखों! PG मालिक से चायवाले तक की लिस्ट वायरल

भारत में अक्सर युवाओं को बताया जाता है कि IIT की पढ़ाई, FAANG जैसी बड़ी टेक कंपनियों में नौकरी या Data Structures and Algorithms (DSA) में महारत हासिल करना अच्छी कमाई का सबसे आसान रास्ता है। लेकिन टेक और AI कमेंटेटर साक्षी ने सोशल मीडिया पर एक मजेदार लिस्ट शेयर कर इस सोच को ही उलट दिया। उन्होंने भारत में इस समय सबसे ज्यादा कमाई करने वाले लोगों की एक मजाकिया रैंकिंग साझा की, जिसमें सॉफ्टवेयर इंजीनियर टॉप पर नहीं, बल्कि काफी पीछे नजर आए। इस लिस्ट में PG मालिक, मकान मालिक, पानी के टैंकर वाले और चाय-सिगरेट की दुकान चलाने वाले शामिल हैं।

नंबर-1 पर PG मालिक, एक कमरे से लाखों की कमाई

साक्षी की इस मजेदार रैंकिंग में सबसे ऊपर PG मालिक को रखा गया। उन्होंने बताया कि शहरों में बढ़ती नौकरी और किराए की मांग का फायदा PG के मालिकों को मिल रहा है। उनके मुताबिक, एक कमरे में तीन लोगों को रखा जाता है और हर व्यक्ति से करीब ₹10,000 से ₹15,000 तक किराया लिया जाता है। इस हिसाब से कुछ PG मालिक किराया और दूसरे खर्च निकालने के बाद भी ₹1 लाख से ₹1.5 लाख महीने तक कमा सकते हैं। यही वजह है कि पोस्ट में PG बिजनेस को आज के दौर के सबसे कमाई वाले कामों में से एक बताया गया।

बेंगलुरु के मकान मालिक भी पीछे नहीं

लिस्ट में तीसरे नंबर पर बेंगलुरु के मकान मालिक का जिक्र किया गया। टेक सिटी में किराए की बढ़ती मांग को लेकर अक्सर सोशल मीडिया पर चर्चाएं होती रहती हैं। पोस्ट में मजाकिया अंदाज में बताया गया कि दो बेडरूम का फ्लैट खरीदकर उसे करीब ₹50,000 महीने के किराए पर देना, हर साल किराया बढ़ाना और WhatsApp पर सिर्फ ‘last price’ लिखकर बातचीत खत्म करना भी कमाई का शानदार तरीका बन गया है।

पानी के टैंकर वाले भी बने ‘बिजनेस किंग’

बेंगलुरु में पानी की समस्या किसी से छिपी नहीं है। इसी को लेकर साक्षी ने पानी के टैंकर संचालकों को भी अपनी लिस्ट में जगह दी। उन्होंने मजाकिया अंदाज में लिखा कि ये लोग बेंगलुरु का ही पानी वापस बेंगलुरु के लोगों को बेचते हैं। पानी की कमी के समय टैंकरों की मांग बढ़ने से इस कारोबार की कमाई भी बढ़ जाती है।

ब्रोकरों की कमाई का भी किया जिक्र

रैंकिंग में प्रॉपर्टी ब्रोकर भी शामिल हैं। पोस्ट के मुताबिक, कुछ ब्रोकर किरायेदारों को कई ऐसे घर दिखाते हैं जो उनकी जरूरत के मुताबिक नहीं होते और आखिर में डील होने पर किरायेदार और मकान मालिक, दोनों से करीब एक महीने के किराए के बराबर कमीशन ले लेते हैं। बेंगलुरु जैसे शहरों में लगातार घर बदलने वाले किरायेदारों की बड़ी संख्या के कारण यह काम भी अच्छी कमाई वाला बताया गया।

टेक पार्क के बाहर चाय-सिगरेट वाला भी हिट

इस लिस्ट में दूसरे नंबर पर जिस शख्स को रखा गया, वह शायद सबसे ज्यादा चौंकाने वाला नाम है टेक पार्क के बाहर चाय, सिगरेट और स्नैक्स बेचने वाला दुकानदार। साक्षी ने उसे टेक इंडस्ट्री का ‘अनसंग हीरो’ बताया। उनके अनुसार, हजारों सॉफ्टवेयर इंजीनियर रोजाना चाय, सिगरेट और स्नैक्स के लिए ऐसी दुकानों पर निर्भर रहते हैं। पोस्ट में अनुमान लगाया गया कि अच्छी लोकेशन वाली ऐसी दुकान से कुछ दुकानदार ₹30,000 से ₹50,000 महीने तक कमा सकते हैं।

न MBA, न फंडिंग, फिर भी कमाई!

इस पूरी पोस्ट का सबसे मजेदार हिस्सा यही था। चाय-सिगरेट की दुकान के लिए न किसी MBA की जरूरत है, न pitch deck की और न ही startup funding की। साक्षी ने इसी अंदाज में टेक इंडस्ट्री पर तंज कसते हुए बताया कि जहां इंजीनियर नौकरी और प्रमोशन के लिए लगातार मेहनत कर रहे हैं, वहीं कुछ छोटे कारोबारी रोजमर्रा की जरूरतों के दम पर अच्छी कमाई कर रहे हैं।

सॉफ्टवेयर इंजीनियरों पर आया सबसे बड़ा तंज

पोस्ट के अंत में सॉफ्टवेयर इंजीनियरों को लेकर सबसे मजेदार टिप्पणी की गई। साक्षी ने लिखा कि जब बाकी लोग अलग-अलग तरीकों से कमाई कर रहे हैं, तब सॉफ्टवेयर इंजीनियर रात 2 बजे तक DSA के सवाल हल कर रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि अगली salary hike अच्छी होगी।

सोशल मीडिया यूजर्स ने भी लिए मजे

साक्षी की पोस्ट को सोशल मीडिया पर जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली और इसे खबर लिखने तक 1.5 लाख से ज्यादा व्यूज मिले। यूजर्स ने भी अपने-अपने अंदाज में इस रैंकिंग पर मजेदार प्रतिक्रियाएं दीं। एक यूजर ने मजाक करते हुए कहा कि सॉफ्टवेयर इंजीनियरों ने कमाई का सबसे मुश्किल रास्ता चुना है और उन्हें DSA की तैयारी के बजाय पानी का टैंकर खरीद लेना चाहिए था। एक अन्य यूजर ने बेंगलुरु का असली ‘product-market fit’ AI या सॉफ्टवेयर नहीं, बल्कि चाय, प्रॉपर्टी और मेट्रो से दूरी का गणित बताया। एक यूजर ने टैक्स को लेकर भी तंज कसा और कहा कि इन कामों में कमाई करने वालों में शायद सॉफ्टवेयर इंजीनियर ही ऐसा व्यक्ति है जो नियमित रूप से इनकम टैक्स और ITR जैसी चीजों से जूझता है।

डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट सोशल मीडिया पर यूज़र द्वारा शेयर किए गए कंटेंट पर आधारित है। मनीकंट्रोल इन दावों की न तो स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है और न ही इनका समर्थन करता है।

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Parag Parikh Fund: फंड मैनेजर राजीव ठक्कर की चाल! 39 शेयर्स समान, फिर भी क्यों अलग हैं Flexi Cap और Large Cap?

Parag Parikh Flexi Cap vs Large Cap: पराग पारिख म्यूचुअल फंड (PPFAS) के निवेशकों के बीच इस समय सबसे बड़ी चर्चा Parag Parikh Flexi Cap Fund और हाल ही में लॉन्च हुए Parag Parikh Large Cap Fund को लेकर है। दोनों ही फंड्स का प्रबंधन मुख्य रूप से जाने-माने फंड मैनेजर राजीव ठक्कर संभाल रहे हैं।

मनीकंट्रोल के जुलाई 2026 के पोर्टफोलियो विश्लेषण (ACE MF डेटा) के अनुसार, दोनों फंड्स में 39 शेयर एक जैसे हैं। पहली नजर में देखने पर दोनों स्कीम्स काफी हद तक समान लग सकती हैं, लेकिन पोर्टफोलियो आवंटन और स्ट्रैटेजी के स्तर पर इनमें बड़े अंतर हैं।

रिटर्न की स्थिति: 6 महीने से 3 साल का ट्रैक रिकॉर्ड

Parag Parikh Flexi Cap Fund: इस फंड ने इस साल अब तक -4.57% और 1 साल में -1.79% का रिटर्न दिया है। हालांकि, इसका 3 साल का सालाना रिटर्न 13.87% का रहा है।

Parag Parikh Large Cap Fund: नए फंड ने अपने शुरुआती 6 महीनों की अवधि में -2.11% का रिटर्न दिया है।

एसेट एलोकेशन: लार्ज कैप का दायरा और विदेशी शेयर

दोनों फंड्स के मैंडेट के मुताबिक उनके एसेट एलोकेशन में बड़ा अंतर है:

लार्ज कैप शेयर: फ्लेक्सी कैप फंड अपने पोर्टफोलियो का 64.85% हिस्सा लार्ज कैप कंपनियों में रखता है, जबकि लार्ज कैप फंड में यह हिस्सेदारी 95.25% है।

विदेशी शेयर व कैश: फ्लेक्सी कैप फंड में 11.06% आवंटन ग्लोबल शेयर्स (जैसे- Alphabet, Amazon, Meta और Microsoft) में है। इसके अलावा 7.15% डेट और 4.60% कैश में है। इसके विपरीत, लार्ज कैप फंड 99.16% पैसा सिर्फ भारतीय इक्विटी में ही लगाता है।

39 शेयर कॉमन, लेकिन असली ओवरलैप सिर्फ 37.27%

डेटा दिखाता है कि दोनों स्कीम्स में 39 स्टॉक्स बिल्कुल समान हैं। ये कॉमन शेयर फ्लेक्सी कैप के 67.38% और लार्ज कैप के 68.32% पोर्टफोलियो को कवर करते हैं।हालांकि, दोनों फंड्स में कंपनियों को दिया गया वेटेज अलग-अलग है, जिससे इनका वास्तविक वेटेड पोर्टफोलियो ओवरलैप सिर्फ 37.27% निकलकर आता है:

Bajaj Finance: लार्ज कैप फंड में 2.22% वेटेज है, जबकि फ्लेक्सी कैप में सिर्फ 0.41%।

State Bank of India: लार्ज कैप में 3.08% बनाम फ्लेक्सी कैप में महज 0.09%।

Power Grid & ITC: पावर ग्रिड फ्लेक्सी कैप में 5.98% है तो लार्ज कैप में 0.93%। वहीं ITC फ्लेक्सी कैप में 5.74% और लार्ज कैप में 1.96% है।

HDFC Bank: दोनों फंड्स का सबसे बड़ा होल्डिंग शेयर HDFC Bank है, जो फ्लेक्सी कैप में 7.55% और लार्ज कैप में 8.31% है। इसके अलावा ICICI Bank, Bharti Airtel और Infosys दोनों में प्रमुखता से शामिल हैं।

स्टॉक्स की संख्या और पोर्टफोलियो कंसंट्रेशन

राजीव ठक्कर एक ही फंड मैनेजर होने के बावजूद दोनों फंड्स में डायवर्सिफिकेशन की रणनीति अलग रख रहे हैं:

कुल शेयर्स: फ्लेक्सी कैप के पास 61 भारतीय और 4 विदेशी शेयर (कुल 65) हैं। वहीं, लार्ज कैप फंड ने 103 शेयरों में अपना पैसा फैलाया हुआ है।

टॉप 10 स्टॉक्स: फ्लेक्सी कैप के टॉप 10 शेयर पोर्टफोलियो का 52.31% हिस्सा बनाते हैं, जबकि लार्ज कैप में टॉप 10 शेयर सिर्फ 42.79% बनाते हैं।

टॉप 5 सेक्टर्स: फ्लेक्सी कैप के 5 बड़े सेक्टर्स का योगदान 62.97% है, जबकि लार्ज कैप में यह 55.60% है।

इसका मतलब है कि व्यापक निवेश छूट होने के बावजूद फ्लेक्सी कैप फंड ज्यादा कंसंट्रेटेड पोर्टफोलियो चला रहा है, जबकि लार्ज कैप फंड ने अपनी पूंजी को कई शेयरों में फैला रखा है।

निवेशकों के लिए केवल 39 कॉमन शेयर्स देखकर दोनों फंड्स को एक जैसा मान लेना सही नहीं होगा। फ्लेक्सी कैप फंड जहां कंसंट्रेटेड इंडियन इक्विटी के साथ इंटरनेशनल एक्सपोजर और डेट का बैलेंस देता है, वहीं लार्ज कैप फंड पूरी तरह से भारतीय लार्ज कैप कंपनियों के एक बड़े बास्केट में निवेश करता है। 6 महीने की अवधि नए फंड के प्रदर्शन का आकलन करने के लिए छोटी है, लेकिन पोर्टफोलियो डेटा यह साफ करता है कि कंपनियां भले एक हों, निवेश की दिशा अलग है।

Disclaimer: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

कमरे की खुशबू के पीछे होता है केमिकल खेल! जानिए कैसे बनता है रूम फ्रेशनर

रूम फ्रेशनर आजकल लगभग हर घर में इस्तेमाल होने लगा हैं। कमरे में अच्छी खुशबू लाने और बदबू दूर करने के लिए लोग कई तरह के रूम फ्रेशनर इस्तेमाल करते हैं। इनकी खुशबू से कमरा फ्रेश और अच्छा महसूस होता है, लेकिन इन्हें रोज और लंबे समय तक इस्तेमाल करना हार्मफुल हो सकता है। रूम फ्रेशनर की सेफ्टी उसमें इस्तेमाल किए गए केमिकल और उसकी मात्रा पर डिपेंड करती हैं। रूम फ्रेशनर कम मात्रा सांस के जरिए अंदर लेने से नुकसान कम होता है, लेकिन इसका जरूरत से ज्यादा या लगातार इस्तेमाल करना सेफ नहीं होता है। कुछ लोगों को तेज खुशबू या उसमें मौजूद कुछ केमिकल से सिरदर्द, एलर्जी, स्किन में जलन या सांस से जुड़ी परेशानी हो सकती है।

रूम फ्रेशनर अलग-अलग खुशबू में आते हैं, इनमें फ्रेगरेंस केमिकल और एसेंशियल ऑयल शामिल होते हैं। कई लिक्विड फ्रेशनर में खुशबू वाले तेल को आइसोप्रोपाइल अल्कोहल जैसे सॉल्वेंट के साथ मिलाया जाता है, ताकि खुशबू आसानी से हवा में फैल सके। कुछ प्लग-इन फ्रेशनर गर्म होकर खुशबू फैलाते हैं। कुछ प्रोडक्ट्स में केमिकल भी हो सकते हैं। इसलिए कमरे को खुशबूदार बनाने के लिए इन बातों का ध्यान रखना जरूरी है।

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1. ब्रीथिंग का ध्यान

रूम फ्रेशनर से खुशबू के साथ कुछ VOCs यानी वोलेटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स भी हवा में फैल सकते हैं। थोड़ी मात्रा में इस्तेमाल करने से नुकसान नहीं है, लेकिन लंबे समय तक इनके कॉन्टैक्ट में रहने से परेशानी हो सकती है। फ्रेशनर स्प्रे करने के बाद खांसी, गले में जलन, सांस लेने में दिक्कत या घुटन महसूस हो, तो तुरंत ताजी हवा वाली जगह पर जाएं। छोटे और बंद कमरे में बहुत ज्यादा स्प्रे करने से बचना बेहतर है।

2. बच्चों से दूर रखें

रूम फ्रेशनर जैसे लिक्विड रिफिल, रीड डिफ्यूजर, जेल और फ्रेगरेंस बीड्स बच्चों की पहुंच में नहीं होने चाहिए। कुछ बीड्स देखने में अट्रैक्टिव लग सकते हैं, जिससे बच्चा उन्हें गलती से मुंह में डाल सकता है। रूम फ्रेशनर का लिक्विड निगलने पर मुंह और पेट में जलन, मतली या उल्टी जैसी परेशानी हो सकती है। बच्चा गलती से इसे निगल ले, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लें।

3. प्लग-इन और ऑटोमैटिक स्प्रे में सावधानी

प्लग-इन फ्रेशनर को ऐसी जगह लगाएं जहां बच्चे या पालतू जानवर आसानी से उसे छू न सकें। इस्तेमाल से पहले पैकेज पर दिए इंस्ट्रक्शन जरूर पढ़ें। वहीं, कुछ ऑटोमैटिक स्प्रे और एयरोसोल फ्रेशनर में जलने वाले तत्व हो सकते हैं। इसलिए इन्हें माचिस, मोमबत्ती, गैस या सिगरेट जैसी खुली आग से दूर रखें।

4. स्किन या आंख के लिए सावधानी

यदि रूम फ्रेशनर स्किन पर गिर जाए, तो अफेक्टेड एरिया को साबुन और साफ पानी से अच्छी तरह धो लें। इससे जलन, लालिमा या एलर्जी जैसी परेशानी कम करने में मदद मिल सकती है। फ्रेशनर आंख में चला जाए, तो आंख को साफ पानी से अच्छी तरह धोना चाहिए। धोने के बाद भी जलन बनी रहे, तो डॉक्टर से चेकअप जरूर कराएं।

5. रूम वेंटिलेशन का इस्तेमाल

रूम फ्रेशनर का इस्तेमाल जरूरत के हिसाब से और कम मात्रा में करना बेहतर है। कमरे को बंद करके लगातार फ्रेशनर चलाने के बजाय खिड़कियां खोलकर वेंटिलेशन बनाए रखें। बदबू को सिर्फ फ्रेशनर से छिपाने के बजाय उसका असली कारण जानें। फिर भी यदि परेशानी बनी रहे तो इसका इस्तेमाल करना बंद कर दें।

नेपाल-तिब्बत में फिर आएगी तबाही? 47 ग्लेशियर झीलों से खतरा, कौनसी झीलें हैं सबसे ज्यादा खतरनाक?

नेपाल-तिब्बत में फिर आएगी तबाही? 47 ग्लेशियर झीलों से खतरा, कौनसी झीलें हैं सबसे ज्यादा खतरनाक?

नेपाल में आई बाढ़ ने हजारों लोगों को प्रभावित किया। अब तक इसकी वजह से 160 लोगों की जान जा चुकी है और सैकड़ों लोग लापता हैं। अहम बात यह है कि नेपाल फिर से इसी तरह की तबाही की चपेट में आ सकता है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमओडी) और नेपाल सरकार के वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार, 47 ग्लेशियल झीलों को 'संभावित रूप से खतरनाक ग्लेशियल झीलें' (पीडीजीएलएस) के रूप में चिन्हित किया गया है।

चेतावनी दी गई है कि इन झीलों से कभी भी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (ग्लोफ) आ सकता है, जो नेपाल की नदी प्रणालियों में विनाशकारी बाढ़ का कारण बन सकता है। इन 47 झीलों में से 21 नेपाल में स्थित हैं, जबकि 25 झीलें तिब्बत में हैं और सीमा पार की श्रेणी में आती हैं। ये झीलें उन नदियों के ऊपरी हिस्से में स्थित हैं जो दक्षिण की ओर बहते हुए नेपाल में प्रवेश करती हैं, इसलिए ये नीचे बसे समुदायों और बुनियादी ढांचे के लिए संभावित खतरा पैदा करती हैं।

इस पूरी लिस्ट में से आपदा प्रबंधन अधिकारियों और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) ने कुछ तेजी से फैल रही, पत्थर और मलबे से बनी बांधनुमा झीलों को विशेष रूप से चिन्हित किया है। इनके जोखिम को कम करने और जलस्तर घटाने के लिए तत्काल कदम उठाने की जरूरत बताई गई है। इनमें सबसे प्रमुख झीलें लोअर बरुण (टैलोपोखरी), थुलागी (डोना), लुमडिंग त्सो, होंगु-2/चामलांग साउथ, त्सो रोल्पा और इमजा त्सो हैं।

पहाड़ी इलाकों को ज्यादा खतरा : इन झीलों से पैदा होने वाला खतरा मुख्य रूप से उन पर्वतीय और पहाड़ी जिलों में केंद्रित हैं, जो नीचे की ओर बहने वाली नदी घाटियों के रास्ते में स्थित हैं। यदि कोई बड़ा 'ग्लोफ' होता है, तो इन क्षेत्रों के लोगों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। पूर्वी और मध्य नेपाल, जिनमें कोशी और बागमती नदी बेसिन शामिल हैं, वहां कुल क्षेत्रीय जोखिम का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा संवेदनशील क्षेत्रों में केंद्रित है।

सबसे अधिक जोखिम वाले जिलों में सोलुखुम्बु शामिल है, जहां दूध कोसी और इमजा बेसिन आते हैं। संखुवासभा जिला बरुण और अरुण नदी घाटियों के किनारे स्थित है। दोलखा जिला तामा कोशी नदी कॉरिडोर में है और त्सो रोल्पा झील से खतरे का सामना कर सकता है।

इन झीलों से पैदा होने वाला खतरा मुख्य रूप से उन पर्वतीय और पहाड़ी जिलों में केंद्रित हैं, जो नीचे की ओर बहने वाली नदी घाटियों के रास्ते में स्थित हैं। यदि कोई बड़ा 'ग्लोफ' होता है, तो इन क्षेत्रों के लोगों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। पूर्वी और मध्य नेपाल, जिनमें कोशी और बागमती नदी बेसिन शामिल हैं, वहां कुल क्षेत्रीय जोखिम का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा संवेदनशील क्षेत्रों में केंद्रित है। सबसे अधिक जोखिम वाले जिलों में सोलुखुम्बु शामिल है, जहां दूध कोसी और इमजा बेसिन आते हैं। संखुवासभा जिला बरुण और अरुण नदी घाटियों के किनारे स्थित है। दोलखा जिला तामा कोशी नदी कॉरिडोर में है और त्सो रोल्पा झील से खतरे का सामना कर सकता है।

4.9 तीव्रता से आए भूकंप के कारण टूटा ग्लेशियर, क्या आइस-रॉक एवलॉन्च है तबाही की वजह?

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nepal flood

नेपाल में आई इस विनाशकारी बाढ़ भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की प्रमुख इकाई राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC) ने शुरुआती सैटेलाइट आधारित रिसर्च किया है। भारतीय और अंतरराष्ट्रीय उपग्रहों से प्राप्त तस्वीरों का उपयोग करते हुए वैज्ञानिकों ने तबाही के पैमाने का आकलन किया और उन घटनाओं को समझने की कोशिश की, जिनके कारण हाल के सालों में हिमालयी क्षेत्र की सबसे भीषण प्राकृतिक आपदाओं में से एक सामने आई।

वर्तमान में भारत के 56 उपग्रह पृथ्वी की कक्षा में सक्रिय हैं। NRSC के शुरुआती विश्लेषण के अनुसार, इस आपदा की शुरुआत तिब्बत के ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र में हुई। वैज्ञानिकों का मानना है कि 4.9 तीव्रता के भूकंप ने संभवतः एक सर्क ग्लेशियर (Cirque Glacier) को प्रभावित किया, जिसके बाद उसका एक बड़ा हिस्सा ढह गया। इस घटना से बर्फ और चट्टानों का विशाल हिमस्खलन हुआ, जो तेजी से नीचे घाटी की ओर बढ़ा। जो भारी मात्रा में पानी, मिट्टी, चट्टानें और मलबा लेकर अचानक नीचे की ओर बहा. इससे त्रिशूली नदी में भीषण बाढ़ आई, जिसने व्यापक तबाही मचाई। सैटेलाइट इमेज की स्टडी कर रहे वैज्ञानिकों का मानना है कि सर्क ग्लेशियर का ढहना और उसके बाद हुआ आइस-रॉक एवलॉन्च इस आपदा की सबसे संभावित वजह है।

पहाड़ी इलाकों को ज्यादा खतरा : इन झीलों से पैदा होने वाला खतरा मुख्य रूप से उन पर्वतीय और पहाड़ी जिलों में केंद्रित हैं, जो नीचे की ओर बहने वाली नदी घाटियों के रास्ते में स्थित हैं। यदि कोई बड़ा 'ग्लोफ' होता है, तो इन क्षेत्रों के लोगों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। पूर्वी और मध्य नेपाल, जिनमें कोशी और बागमती नदी बेसिन शामिल हैं, वहां कुल क्षेत्रीय जोखिम का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा संवेदनशील क्षेत्रों में केंद्रित है। सबसे अधिक जोखिम वाले जिलों में सोलुखुम्बु शामिल है, जहां दूध कोसी और इमजा बेसिन आते हैं। संखुवासभा जिला बरुण और अरुण नदी घाटियों के किनारे स्थित है। दोलखा जिला तामा कोशी नदी कॉरिडोर में है और त्सो रोल्पा झील से खतरे का सामना कर सकता है।

LIVE: नेपाल बाढ़ तबाही में कितने देशों के लोग शामिल, कहां गए 750 लोग, क्या फिर आएगा तांडव?

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नेपाल में अचानक आई बाढ़ के बाद 130 से ज्यादा भारतीय लापता हैं और कई दूसरे लोग फंस गए हैं। इनमें मानसरोवर यात्रा पर गए कई तीर्थयात्री भी शामिल हैं। काठमांडू में भारतीय दूतावास और तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल, राजस्थान और उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों ने प्रभावित भारतीयों और उनके रिश्तेदारों के लिए हेल्पलाइन शुरू की हैं। सम्राट टूर्स एंड ट्रैवल एजेंसी ने कहा कि कम से कम 59 भारतीय कैलाश मानसरोवर यात्रा के तीर्थयात्री थे। 

  

4.9 तीव्रता से आई भूकंप के कारण टूटा ग्लेशियर : नेपाल में आई इस विनाशकारी बाढ़ भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की प्रमुख इकाई राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC) ने शुरुआती सैटेलाइट आधारित रिसर्च किया है। भारतीय और अंतरराष्ट्रीय उपग्रहों से प्राप्त तस्वीरों का उपयोग करते हुए वैज्ञानिकों ने तबाही के पैमाने का आकलन किया और उन घटनाओं को समझने की कोशिश की, जिनके कारण हाल के सालों में हिमालयी क्षेत्र की सबसे भीषण प्राकृतिक आपदाओं में से एक सामने आई। वर्तमान में भारत के 56 उपग्रह पृथ्वी की कक्षा में सक्रिय हैं। NRSC के शुरुआती विश्लेषण के अनुसार, इस आपदा की शुरुआत तिब्बत के ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र में हुई। वैज्ञानिकों का मानना है कि 4.9 तीव्रता के भूकंप ने संभवतः एक सर्क ग्लेशियर (Cirque Glacier) को प्रभावित किया, जिसके बाद उसका एक बड़ा हिस्सा ढह गया। इस घटना से बर्फ और चट्टानों का विशाल हिमस्खलन हुआ, जो तेजी से नीचे घाटी की ओर बढ़ा। जो भारी मात्रा में पानी, मिट्टी, चट्टानें और मलबा लेकर अचानक नीचे की ओर बहा. इससे त्रिशूली नदी में भीषण बाढ़ आई, जिसने व्यापक तबाही मचाई। सैटेलाइट इमेज की स्टडी कर रहे वैज्ञानिकों का मानना है कि सर्क ग्लेशियर का ढहना और उसके बाद हुआ आइस-रॉक एवलॉन्च इस आपदा की सबसे संभावित वजह है।

चीन में भारतीय दूतावास ने हेल्पलाइन शुरू की : चीन में भारतीय दूतावास ने एडवाइजरी जारी कर तिब्बत-नेपाल बॉर्डर के इलाकों में अचानक आई बाढ़ में फंसे भारतीय नागरिकों के लिए मदद पाने के लिए संपर्क करने की जानकारी दी। तिब्बत से शुरू हुई जबरदस्त बाढ़ ने मध्य नेपाल में कई कस्बों और गांवों को तबाह कर दिया, जरूरी पुल बहा दिए और एक दर्जन हाइड्रोपावर प्रोजेक्टों को ठप कर दिया। दूतावास ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा, “चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के सीमावर्ती इलाकों में हाल ही में आई बाढ़ को देखते हुए, आस-पास फंसे भारतीय नागरिक इन संपर्क बिंदुओं से मदद ले सकते हैं।” इसमें कहा गया है कि भारतीय नागरिक मौके पर मौजूद चीनी अधिकारियों से 0086 139 8999 0012 नंबर पर संपर्क कर सकते हैं। मिशन ने बताया कि वे बीजिंग में भारतीय दूतावास से 0086 185 1428 4905 नंबर पर और वाट्सऐप के जरिए और काठमांडू में भारतीय दूतावास से +977 985 131 6807 और +977 970 910 7500 नंबरों पर (इन दोनों पर WhatsApp के जरिए भी) संपर्क कर सकते हैं।

लहरों के नीचे छिपा राज, जानिए क्यों नहीं हिलते गहरे पानी में बने पुलों के पिलर?

नदी या समुद्र के बीच पुल के पिलर बनाना देखने में जितना मुश्किल लगता है, असल में इसके पीछे उतनी ही शानदार इंजीनियरिंग काम करती है। तेज बहाव और ज्यादा गहराई के बावजूद इंजीनियर खास टेक्निक की मदद से पानी के अंदर पुल की मजबूत नींव तैयार करते हैं। कॉफरडैम और कैसन इसी काम में सबसे ज्यादा मददगार होते हैं।

इन टेक्निक की मदद से पानी के बीच निर्माण के लिए एक सेफ जगह बनाई जाती है, ताकि इंजीनियर और मजदूर वहां नींव का काम कर सकें। लेकिन आखिर पानी को रोककर यह जगह कैसे बनाई जाती है और इतनी गहराई में पुल के पिलर कैसे खड़े किए जाते हैं।

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पानी रोकने वाली दीवारमान लीजिए कि किसी नदी के बीच में पुल का एक पिलर खड़ा करना है. इसमें सबसे बड़ी परेशानी यह होती है कि जिस जगह पर नींव की खुदाई होनी है, वहां हर वक्त पानी मौजूद रहता है. इस परेशानी से निपटने के लिए इंजीनियर उस खास जगह के चारों तरफ स्टील या कंक्रीट का एक वाटर-टाइट घेरा बनाते हैं. इसी अस्थायी घेरे को कॉफरडैम कहा जाता है. कॉफरडैम बनने के बाद उसके भीतर जमा पूरे पानी को पंप के जरिए बाहर निकाल दिया जाता है. पानी हटते ही नदी के बीचों-बीच एक सूखी और सेफ जगह मिल जाती है, जहां मजदूर और भारी मशीनें आसानी से खुदाई और पिलर कंस्ट्रक्शन का काम शुरू कर सकते हैं.

कॉफरडैम बनाने का तरीका

कॉफरडैम को तैयार करने के लिए काम की जगह के हिसाब से स्टील शीट पाइल, भारी कंक्रीट, लकड़ी या मिट्टी का उपयोग किया जाता है. कंस्ट्रक्शन प्रोसेस में सबसे पहले पानी के नीचे की ढीली मिट्टी को साफ किया जाता है. इसके बाद सपोर्ट देने वाले पाइल्स लगाए जाते हैं और फिर स्टील की भारी शीटों को जमीन के अंदर तक धंसा दिया जाता है ताकि पानी अंदर न आ सके. जब अंदर का पानी पूरी तरह बाहर निकाल लिया जाता है, तो नींव का काम शुरू होता है. कॉफरडैम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह केवल एक टेम्पररी स्ट्रक्चर होती है. जैसे ही पिलर का कंस्ट्रक्शन पूरा हो जाता है, इस पूरे ढांचे को वहां से हटा लिया जाता है. इसलिए इसका इस्तेमाल 12 से 18 मीटर तक के कम गहरे पानी वाले एरिया में ही किया जाता है.

कैसन टेक्नोलॉजी

पानी बहुत गहरा हो या फिर समुद्र जैसी कंडीशन हो, जहां पानी का प्रेशर बहुत ज्यादा होता है और पुल को भारी वजन संभालना पड़ता है, तो वहां कॉफरडैम काम नहीं आता है. ऐसे बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए कैसन टेक्निक का इस्तेमाल किया जाता है. कैसन असल में एक बहुत बड़ा, खोखला और मजबूत ढांचा होता है, जो पूरी तरह से वाटरप्रूफ होता है. इसे पहले से बाहर तैयार किया जाता है और फिर क्रेन या जहाजों की मदद से तय की गई जगह पर पानी के नीचे उतारा जाता है. कैसन को धीरे-धीरे पानी के तल तक पहुंचाया जाता है और मिट्टी खोदकर इसे गहराई में धंसाया जाता है.

परमानेंट फाउंडेशन

कैसन और कॉफरडैम में सबसे बड़ा फर्क यही है कि कैसन को काम पूरा होने के बाद बाहर नहीं निकाला जाता है. जब कैसन अपनी सही गहराई पर पहुंच जाता है, तो इसके अंदर कंक्रीट और सरिया भरकर इसे पूरी तरह से ठोस बना दिया जाता है. इस तरह यह ढांचा हमेशा के लिए पुल का परमानेंट पार्ट बन जाता है. बंदरगाहों, गहरे समुद्र और नरम मिट्टी वाले इलाकों में जहां भारी कंस्ट्रक्शन बनानी होती हैं, वहां कैसन ही सबसे सेफ ऑप्शन माना जाता है.

कैसन के प्रकार

इंजीनियरिंग में जरूरतों के हिसाब से अलग-अलग तरह के कैसन इस्तेमाल किए जाते हैं. इनमें ओपन कैसन, बॉक्स कैसन और न्यूमैटिक कैसन सबसे मेन हैं. इन्हें बनाने में कंक्रीट, स्टील, मजबूत लकड़ी और चिनाई का इस्तेमाल होता है. सीधे शब्दों में कहें तो कॉफरडैम पानी को रोककर काम करने के लिए बनाई गई एक टेम्पररी प्रोटेक्टिव बैरियर है, जिसे काम खत्म होते ही हटा दिया जाता है. वहीं दूसरी ओर, कैसन एक परमानेंट स्ट्रक्चर है जो कंक्रीट से भरकर खुद पुल का मेन फाउंडेशन बन जाता है.

8th Pay Commission: 3.61 से 4.00 तक फिटमेंट फैक्टर की मांग! जानिए कितनी बढ़ेगी बेसिक सैलरी और पेंशन?

8th Pay Commission Fitment Facto: 8वें केंद्रीय वेतन आयोग को लेकर केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के बीच सुगबुगाहट तेज हो गई है। 7वें वेतन आयोग में जहां फिटमेंट फैक्टर 2.57 तय किया गया था जिससे न्यूनतम बेसिक पे ₹7,000 से बढ़कर ₹18,000 हुई थी। अब 8वें वेतन आयोग के लिए कर्मचारी यूनियनों ने 3.61 से लेकर 4.00 तक के फिटमेंट फैक्टर की मांग रखी है।

कागज पर फिटमेंट फैक्टर के ये आंकड़े छोटे लग सकते हैं, लेकिन असलियत में इनसे हर महीने कर्मचारियों की सैलरी में हजारों रुपये का अंतर आने वाला है।

फिटमेंट फैक्टर क्या है और यह क्यों है अहम?

फिटमेंट फैक्टर वह मल्टीप्लायर होता है, जिसे कर्मचारी की मौजूदा बेसिक पे से गुणा करके नए वेतन आयोग के तहत नई सैलरी तय की जाती है। यह न केवल महंगाई भत्ते (DA) के असर को समाहित करता है, बल्कि कर्मचारियों की वास्तविक आय में वृद्धि भी सुनिश्चित करता है। पेंशनभोगियों की बेसिक पेंशन तय करने में भी इसी फैक्टर का इस्तेमाल होता है।

यूनियनों की प्रमुख मांगें: किसकी कितनी है सिफारिश?

अलग-अलग कर्मचारी और पेंशनभोगी संगठनों ने 8वें वेतन आयोग के सामने अपनी-अपनी मांगें और कैलकुलेशन रखी हैं:

BPMS (फिटमेंट फैक्टर 4.00 – न्यूनतम पे ₹72,000): भारतीय प्रतिरक्षा मजदूर संघ (BPMS) ने सबसे ज्यादा 4.00 फिटमेंट फैक्टर की मांग की है। इसके तहत न्यूनतम बेसिक पे ₹72,000 तय करने का प्रस्ताव है। BPMS का कहना है कि इसमें 1.58 घटक केवल महंगाई भत्ते (DA) के असर को बेअसर करने के लिए है, जबकि बाकी हिस्सा राष्ट्रीय प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि के आधार पर है।

NCJCM स्टाफ साइड और BPS (फिटमेंट फैक्टर 3.833 – न्यूनतम पे ₹69,000): नेशनल काउंसिल JCM (स्टाफ साइड) और भारत पेंशनर्स समाज (BPS) ने 3.833 फिटमेंट फैक्टर का प्रस्ताव दिया है।

इसके तहत न्यूनतम सैलरी ₹69,000 होगी। NCJCM ने 5 सदस्यों के परिवार के खाने, कपड़े, मकान, शिक्षा, शादी और तकनीक जैसे 15वें ILC मानदंडों के आधार पर यह गणना की है।

MSA (फिटमेंट फैक्टर 3.61 – न्यूनतम पे ₹65,000): मिनिस्ट्रियल स्टाफ एसोसिएशन (MSA) ने 3.61 का फिटमेंट फैक्टर प्रस्तावित किया है, जिससे न्यूनतम पे ₹65,000 (लेवल-1) हो जाएगी।

सैलरी मैट्रिक्स: लेवल के हिसाब से कितना होगा फायदा?

अलग-अलग फिटमेंट फैक्टर के कारण पे-मैट्रिक्स में बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है:

लेवल 1: MSA (3.61) के तहत ₹64,980, NCJCM (3.833) के तहत ₹69,000 और BPMS (4.00) के तहत यह ₹72,000 होगी।

लेवल 6: NCJCM के प्रस्ताव के अनुसार बेसिक पे बढ़कर ₹1,35,700 हो जाएगी।

लेवल 9 व 10 (मर्ज्ड): NCJCM के तहत यह ₹2,15,100 तक पहुंच जाएगी।

क्या सरकार उठा पाएगी इसका वित्तीय बोझ?

NCJCM का तर्क है कि 2014-15 के बाद से देश की जीडीपी में 165.23% और कुल कर राजस्व में 205.41% की भारी वृद्धि हुई है। इसलिए सरकार के पास वेतन में इस बढ़ोतरी के वित्तीय प्रभाव को आसानी से संभालने की पूरी क्षमता है। रेलवे सीनियर सिटीजन्स वेलफेयर सोसाइटी (RSCWS) ने भी जोर दिया है कि बेसिक पे में पर्याप्त बढ़ोतरी न होने से रिटायर्ड कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा प्रभावित होती है।

50 लाख से अधिक केंद्रीय कर्मचारियों और लाखों पेंशनभोगियों के लिए 8वें वेतन आयोग द्वारा चुना जाने वाला फिटमेंट फैक्टर बेहद निर्णायक होगा। यह न केवल हर महीने मिलने वाली इन-हैंड सैलरी तय करेगा, बल्कि पेंशन, ग्रेच्युटी की सीमा और कम्यूटेशन अमाउंट पर भी लंबे समय तक असर डालेगा।

Aaj ka Mausam: आज तूफानी मौसम: आज यूपी-बिहार संग इन 15 राज्यों में IMD ने दिया भारी बारिश का अलर्ट, 40 kmph की रफ्तार से आएगा अंधड़

IMD Weather Update: देश के अलग-अलग हिस्सों में मानसून का उग्र रूप देखने को मिल रहा है। इस बीच भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने आज यानी 27 अगस्त के लिए मौसम का बुलेटिन जारी करते हुए देश के 13 राज्यों में भारी से बहुत भारी बारिश की संभावना जताई है। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों में तेज आंधी, वज्रपात और 30 से 40 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से अंधड़ चलने की चेतावनी जारी की गई है। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में 50 से 60 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से तूफानी हवाएं चलने का अनुमान जताया गया है। इसे लेकर स्थानीय प्रशासन और आम जनता को अलर्ट रहने के निर्देश दिए गए हैं।

उत्तर भारत का मौसम: यूपी में मूसलाधार बारिश का अलर्ट, उत्तराखंड और राजस्थान में बिजली कड़कने की चेतावनी

उत्तर भारत के राज्यों में आज मानसून काफी सक्रिय रहने वाला है। मौसम विभाग के मुताबिक उत्तर प्रदेश में अलग अलग जगहों पर मूसलाधार बारिश होने की पूरी संभावना है। यूपी के कई जिलों में बारिश के चलते जलभराव और नदियों के जलस्तर पर असर पड़ सकता है। पहाड़ी राज्य उत्तराखंड और पश्चिमी भारत के पूर्वी राजस्थान में आज अलग-अलग स्थानों पर गरज के साथ आकाशीय बिजली चमकने और गिरने का अलर्ट जारी किया गया है। मौसम विभाग ने इन क्षेत्रों में लोगों को खराब मौसम के दौरान पेड़ों या खुले स्थानों के नीचे जाने से बचने की सलाह दी है।

पूर्वी भारत: बिहार, झारखंड, बंगाल और ओडिशा में भारी बारिश और 40 kmph की रफ्तार से चलेगा अंधड़

पूर्वी भारत के मैदानी इलाकों के लिए आज का दिन मौसम के लिहाज से काफी संवेदनशील माना जा रहा है। मौसम विभाग के मुताबिक आज बिहार, झारखंड, ओडिशा और उप-हिमालयी पश्चिम बंगाल और सिक्किम के अलग-अलग इलाकों में भारी बारिश होने की संभावना है।

बारिश के साथ-साथ इन पूर्वी राज्यों में मौसम का मिजाज काफी बिगड़ा रहेगा। बिहार, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल व सिक्किम में 30 से 40 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज झोंकेदार हवाएं चलने, अंधड़ आने और आकाशीय बिजली गिरने की आशंका है।

पूर्वोत्तर और मध्य भारत: असम, मेघालय, एमपी और छत्तीसगढ़ में बरसेगी आफत

पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में मूसलाधार बारिश का दौर लगातार जारी है। आईएमडी के अलर्ट के मुताबिक अरुणाचल प्रदेश, असम और मेघालय में आज अलग-अलग जगहों पर भारी बारिश हो सकती है। इसके साथ ही नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा में भी भारी बारिश का अनुमान जताया गया है।

इन सभी सातों पूर्वोत्तर राज्यों में बारिश के दौरान गरज-चमक और बिजली गिरने की घटनाएं दर्ज की जा सकती हैं। मध्य भारत की बात करें तो मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में आज भारी बारिश होने के आसार हैं। इसके अलावा इन दोनों ही राज्यों में आकाशीय बिजली चमकने की चेतावनी भी दी गई है।

दक्षिण भारत का हाल: केरल में भारी बारिश, आंध्र और तमिलनाडु में तेज हवाओं का प्रकोप

दक्षिण भारत में भी मानसूनी गतिविधियां जोर पकड़ रही हैं। केरल और माहे के अलग-अलग हिस्सों में आज भारी बारिश का अनुमान जताया गया है। दक्षिण के अन्य राज्यों में तेज हवाओं का असर देखने को मिलेगा। आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु, पुडुचेरी व कराइकल में 40 से 50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज झोंकेदार हवाएं चलने और बिजली चमकने का अलर्ट है। इसके साथ ही आंध्र प्रदेश के तटीय इलाकों में अलग-अलग जगहों पर तेज सतही हवाएं चलने का भी पूर्वानुमान है।

अंडमान में तूफानी हवाएं, समुद्र में मछुआरों के लिए रेड अलर्ट जारी

द्वीपीय इलाकों की बात करें तो अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में आज 50 से 60 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली तूफानी हवाओं का अलर्ट जारी किया गया है। समुद्री क्षेत्रों में उथल-पुथल को देखते हुए मौसम विभाग ने मछुआरों के लिए विशेष चेतावनी जारी की है। अरब सागर में सोमालिया व ओमान तटों के साथ-साथ उत्तर, पूर्व-मध्य और पश्चिम-मध्य अरब सागर के कई हिस्सों में 45 से 55 किमी प्रति घंटे की गति से हवाएं चल सकती हैं, जो बढ़कर 65 किमी प्रति घंटे तक पहुंच सकती हैं।

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बंगाल की खाड़ी में दक्षिण तमिलनाडु तट, मन्नार की खाड़ी, कोमोरिन क्षेत्र और श्रीलंका तट से सटे दक्षिण-पश्चिम बंगाल की खाड़ी में भी 45 से 55 किमी प्रति घंटे से लेकर 65 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से तूफानी हवाएं चलने का अनुमान है। आईएमडी ने मछुआरों को इन खतरनाक समुद्री क्षेत्रों में न जाने की सख्त सलाह दी है।

ब्रांडेड डिब्बा, नकली दवा! हर 3 में से 1 भारतीय को मिल रहा है नकली मेडिकल सामान! जानिए किस शहर में है सबसे ज्यादा खतरा

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Fake Medicine

Fake Medicines India: जनस्वास्थ्य (Public Health) के मोर्चे पर एक बेहद डरावनी और चिंताजनक सच्चाई सामने आई है। बाजार में मिलने वाली नकली दवाएं और हेल्थकेयर प्रोडक्ट्स पहली नजर में बिल्कुल असली जैसे दिखते हैं। इनकी पैकेजिंग, ब्रांडिंग और डिजाइन की नकल इतनी सफाई से की जाती है कि आम मरीज या ग्राहक के लिए असली और नकली का फर्क पहचानना लगभग असंभव हो जाता है। खास बात यह है कि दिल्ली क्राइम ब्रांच ने हाल ही में कैंसर की नकली दवाओं के कारोबार का भंडाफोड़ किया है। देश के 17 राज्यों में फैले इस कारोबार के सिलसिले में 17 लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार भी किया है।

एएसपीए-क्रिसिल (ASPA-CRISIL) की हालिया जारी स्टेट ऑफ काउंटरफिटिंग इन इंडिया 2025” रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सर्वे किए गए हर तीन में से लगभग एक उपभोक्ता (33%) ने पिछले 12 महीनों के दौरान किसी न किसी नकली हेल्थकेयर प्रोडक्ट का सामना किया है। यह समस्या कपड़े या इलेक्ट्रॉनिक्स के नकली होने से कहीं ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि यहाँ सीधे मरीज की जान दांव पर लगी होती है।

 

Fake Medicine

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स्थानीय मेडिकल स्टोर से लेकर ऑनलाइन ऐप्स तक जाल

अक्सर यह माना जाता है कि नकली सामान केवल अनधिकृत या ऑनलाइन बाजारों में मिलता है, लेकिन यह सर्वे इस भ्रम को तोड़ता है। जिन लोगों का सामना नकली हेल्थकेयर प्रोडक्ट्स से हुआ:

  • 63% लोगों ने स्थानीय रिटेल मेडिकल स्टोर्स को इसका स्रोत बताया।
  • 60% लोगों को ऑनलाइन एग्रीगेटर प्लेटफॉर्म्स (दवा डिलीवरी ऐप्स) के जरिए नकली उत्पाद मिले।
  • लगभग एक-तिहाई लोगों को मल्टी-ब्रांड स्टोर्स और सोशल मीडिया विज्ञापनों के जरिए यह सामान बेचा गया।

कीमत का अंतर : नकली हेल्थकेयर प्रोडक्ट्स असली की तुलना में औसतन 18% सस्ते होते हैं। हालांकि, रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि 96% लोग अंजाने में नकली दवाएं खरीदते हैं, असली समस्या यह है कि मरीज के पास दुकान पर खड़े होकर असलियत जांचने का कोई आसान जरिया नहीं है।

पैकेजिंग पर भरोसा ही सबसे कमजोर कड़ी

सर्वे के अनुसार, केवल 52% उपभोक्ता ही दवा या हेल्थकेयर प्रोडक्ट खरीदने से पहले उसकी असलियत जांचते हैं। हालांकि, 60% लोगों को यह मुगालता रहता है कि वे खुद नकली सामान पहचान सकते हैं।
लोग आमतौर पर इन चीजों को देखकर फैसला लेते हैं:

  1. पैकेजिंग की क्वालिटी (66%)
  2. होलोग्राम (48%)
  3. क्यूआर कोड (40%)

लेकिन आज के आधुनिक जालसाज पैकेजिंग डिजाइन और ब्रांडिंग की हुबहू नकल कर लेते हैं। यही वजह है कि विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ डिब्बा देखकर दवा के असली होने का अंदाजा लगाना जानलेवा साबित हो सकता है।

Fake Medicine

2018 से 2025 के बीच दर्ज हुए 521 मामले

एएसपीए (ASPA) के काउंटरफिट न्यूज़ रिपॉजिटरी के अनुसार, वर्ष 2018 से 2025 के बीच हेल्थकेयर क्षेत्र में जालसाजी के 521 आधिकारिक मामले दर्ज किए गए।

  • महामारी में सबसे बड़ा संकट: कोविड-19 (2020-2021) के दौरान नकली पीपीई किट, मास्क, कफ सिरप, जीवनरक्षक दवाओं और यहाँ तक कि नकली वैक्सीन के मामलों में भारी उछाल देखा गया था।

 

Fake Medicine

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नकली दवा का मुद्दा सिर्फ आर्थिक नुकसान का नहीं, बल्कि सीधे जीवन और मृत्यु का है। भले ही उपभोक्ताओं में जागरूकता बढ़ रही हो, लेकिन जब तक हर दवा की रीयल-टाइम प्रामाणिकता (Authenticity) जांचने की मजबूत और आसान डिजिटल व्यवस्था लागू नहीं होती, तब तक जनस्वास्थ्य पर यह बड़ा खतरा मंडराता रहेगा।