हाई क्वालिटी बैंक स्टॉक्स में निवेश से होगी अच्छी कमाई, अल्फा कैपिटल के मुकेश जिंदल की सलाह

शेयर बाजारों पर पिछले कुछ महीनों से लगातार दबाव बना हुआ है। सवाल है कि इस दबाव के बीच कहां निवेश करने पर होगी कमाई? इस सवाल का जवाब अल्फा कैपिटल के सीनियर पार्टनर मुकेश जिंदल ने दिया। उनका कहना है कि अभी हाई क्वालिटी बैंक शेयरों में निवेश का बड़ा मौका है। उन्होंने इसके पीछ की वजह भी बताई।

बैंकों की सेहत लंबे समय बाद इतनी अच्छी

जिंदल ने कहा कि क्रेडिट ग्रोथ स्ट्रॉन्ग है। एसेट क्वालिटी लंबे समय बात इतनी अच्छी है। बैंक निफ्टी अभी काफी सही लेवल पर है। उन्होंने कहा कि इनवेस्टर्स को अपना पैसा उन बैंकों के शेयरों में लगाना चाहिए, जिनका डिपॉजिट लेवल अच्छा है और बुक क्लीन है। पूरे बैंकिंग सेक्टर की सेहत काफी अच्छी दिख रही है। हालांकि, बीते एक साल में प्राइवेट बैंकों के शेयरों में पीएसयू बैंकों के मुकाबले कम तेजी दिखी है।

 टेलीकॉम सहित ये सेक्टर्स भी अट्रैक्टिव

उन्होंने टेलीकॉम को निवेश के लिए दूसरा अट्रैक्टिव सेक्टर बताया। उन्होंने कहा कि अब फोकस सब्सक्राइबर्स बढ़ाने की जगह मौजूदा सब्सक्राइबर्स से कमाई बढ़ाने पर है। इसके अलावा डिफेंस और इंफ्रास्ट्रक्चर में भी निवेश के मौके दिख रहे हैं। इन सेक्टर्स में पूंजीगत खर्च बढ़ रहा है। शेयर बाजारों में आई गिरावट के बाद यह पोर्टफोलियो की क्वालिटी बढ़ाने का सही मौका है।

जीएसटी में राहत के बाद बढ़ेगी इंश्योरेंस में दिलचस्पी

क्या बैंकिंग और इंश्योरेंस सेक्टर में निवेश का मौका है? इस सवाल के जवाब में जिंदल ने कहा कि उनका दोनों सेक्टर पर पॉजिटिव नजरिया है, लेकिन उन्हें बैंक ज्यादा अट्रैक्टिव लग रहे हैं। बैंकों के शेयर सस्ते लग रहे हैं। हालांकि, इंश्योरेंस एक लंबी स्टोरी है। इंश्योरेंस प्रोडक्ट्स की पहुंच अभी आबादी के सीमित हिस्से तक है। जीएसटी से राहत मिलने के बाद इंश्योरेंस प्रोडक्ट्स में दिलचस्पी बढ़ेगी।

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क्रूड 100 डॉलर से ऊपर रहने पर बढ़ सकती है मुश्किल

क्या इनफ्लेशन मुश्किल बढ़ा सकता है? इसके जवाब में उन्होंने कहा कि क्रूड ऑयल में उछाल से इनफ्लेशन बढ़ रहा है। क्रूड के 100 डॉलर प्रति बैरल के पार बने रहने पर अगर पेट्रोल, डीजल की कीमतें बढ़ाई जाती हैं और फ्रेट महंगा होता है तो रिटेल इनफ्लेशन 5 फीसदी या इससे ऊपर जा सकता है। हालांकि, क्रूड के फिर से 100 डॉलर के पार जाने के बाद भी पेट्रोल और डीजल की कीमतें नहीं बढ़ी हैं।

Maruti Suzuki to hike prices this September

Maruti Suzuki to hike prices this September
Maruti Suzuki September price hike

In a regulatory filing, Maruti Suzuki has announced that it will increase prices on selected vehicles by up to Rs 20,000, with the revision taking effect in September 2026. This will be the brand’s third price hike in this financial year, with the previous two having come in June and August, respectively. 

  1. Rising input costs cited as reason for hike 
  2. This is the third price hike from Maruti Suzuki this financial year 

The move follows a period in which the company attempted to absorb rising costs internally through cost reduction measures. However, with inflationary pressures persisting, the company indicated it had reached a point where passing on a portion of those costs to the market became necessary. The filing noted that the increase being transferred to consumers represents only a part of the total cost burden absorbed by the company.

Input cost inflation has been a concern across India’s automotive sector for several years. Rising prices of raw materials such as steel and aluminium, combined with elevated commodity costs and currency movements that affect the price of imported components, have put pressure on vehicle manufacturers’ margins. Several automakers have responded with periodic price revisions, and Maruti Suzuki has followed this pattern on multiple occasions.

 

जैक्सन होल की बैठक के बाद शेयर मार्केट में कोहराम, S&P500 आया नीचे, टेक शेयरों पर तेज दबाव

अमेरिका के फेडरल रिजर्व के चेयरमैन केविन वार्श की स्पीच के बाद अमेरिकी शेयर मार्केट में कोहराम मच गया। उनके बयान से निवेशकों को यह संकेत मिला कि फेड की कोशिश महंगाई से निपटने की है। इसी बीच ट्रेडर्स ने इस साल ब्याज दरों में बढ़ोतरी के आसार पर दांव लगाना शुरू कर दिया। केविन वार्श के स्पीच के चलते अमेरिका के अहम इंडेक्स लगातार बढ़त और गिरावट के बीच झूलते रहे। हालांकि इक्विटी मार्केट में कुछ हद तक स्थिरता दिखाई दी। ऐतिहासिक रूप से फेड चेयर का जैक्सन होल भाषण शेयर बाजार के लिए बहुत बड़ा ट्रिगर नहीं रहा है। वर्ष 2000 से अब तक इस स्पीच के बाद अगले हफ्ते इंडेक्स में औसतन सिर्फ 0.4% का बदलाव हुआ है। हालांकि अगर यह स्पीच मौद्रिक नीति में किसी बड़े बदलाव से पहले आता है, तो इसका असर अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है।

क्या है अमेरिकी मार्केट में स्थिति

अमेरिका का अहम इंडेक्स एसएंडपी 500 (S&P500) 0.2% टूट गया। इंडस्ट्रियल और आईटी शेयरों में गिरावट ने इस पर दबाव डाला। सेमीकंडक्टर इंडेक्स में शामिल लगभग सभी कंपनियों के शेयर गिरे, और सबसे अधिक गिरावट एनविडिया (Nvidia) में रही। अमेरिका का टेक-हैवी नास्डाक 100 (Nasdaq 100) भी 0.7% टूट गया और शुरुआती बढ़त गंवाते हुए डाउ जोन्स इंडस्ट्रियल एवरेज (Dow Jones Industrial Average) भी थोड़ा नीचे आया। Cboe Volatility Index में गिरावट जारी रही और 14 से थोड़ा ही ऊपर है। साथ ही तेल निकालने वाले देशों के संगठन ओपेक (OPEC) से वेनेजुएला बाहर निकलने पर विचार कर रहा है, जिससे तेल की कीमतें गिर गई।

क्या कहना है केविन वार्श का

अमेरिकी फेडरल रिजर्व चेयरमैन केविन वार्श ने आने वाले समय के लिए गाइडेंस यानी अनुमान को लेकर अपनी अनिच्छा दोहराई। उन्होंने कहा कि हमें ऐसी व्यवस्था को बढ़ावा नहीं देना चाहिए जिसमें मार्केट अपने अगले ट्रेड के लिए मुख्य रूप से फेड की तरफ देख रहे हों। उन्होंने कहा कि शांत फेड अपने उद्देश्यों को हासिल करने में अधिक सक्षम होगा और महंगाई को कंट्रोल करने के लिए अभी काफी काम बाकी है। उन्होंने कहा कि महंगाई लंबे समय से जरूरत से ज्यादा ऊंची बनी हुई है।

क्या कहना है एक्सपर्ट का

सिटी वेल्थ की चीफ इन्वेस्टमेंट ऑफिसर केट मूर ने ब्लूमबर्ग टीवी के एक इंटरव्यू में कहा कि निवेशकों को अर्थव्यवस्था, मुनाफे और 2% महंगाई के लक्ष्य को लेकर अमेरिकी फेड की प्रतिबद्धता के बारे में जानकारी चाहिए थे और उन्हें यह मिल गई, जिसके चलते इक्विटी मार्केट में कुछ स्थिरता दिख रही है।

खत्म हुआ इंतजार, जैक्सन होल की बैठक में फेड ने महंगाई को लेकर जताई यह चिंता

डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए सलाह या विचार एक्सपर्ट/ब्रोकरेज फर्म के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदायी नहीं है। यूजर्स को मनीकंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले हमेशा सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

खत्म हुआ इंतजार, जैक्सन होल की बैठक में फेड ने महंगाई को लेकर जताई यह चिंता

अमेरिकी फेडरल रिजर्व के चेयरमैन केविन वार्श का कहना है कि अमेरिका का लेबर मार्केट अब भी मजबूत बना हुआ है और बेरोजगारी की मौजूदा रफ्तार लगभग फुल एंप्लॉयमेंट की स्थिति के हिसाब से है। उनका कहना है कि रोजगार के मोर्चे पर दोनों तरफ से अमेरिकी अर्थव्यवस्था अच्छा परफॉर्म कर रही है। अमेरिका में बेरोजगारी दर अभी 4.1% है जोकि फुल एंप्लॉयमेंट से जुड़ी परिस्थितियों के मुताबिक ही है। हालांकि उन्होंने चेतावनी दी है कि महंगाई अभी भी पॉलिसीमेकर्स के लिए चिंता की बात बनी हुई है। उन्होंने ये बातें शुक्रवार को फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ कैनसस सिटी के एनुअल जैक्सन होल सिम्पोजियम में कही।

महंगाई को लेकर क्या है आशंका

अमेरिकी फेडरल रिजर्व के प्रमुख ने रोजगार के मोर्चे पर इकॉनमी की सेहत को बेहतर तो बताया है लेकिन महंगाई को लेकर सतर्क भी किया है। उन्होंने कहा कि कीमतों का दबाव अभी भी ऊंचे लेवल पर बना हुआ है। उन्होंने महंगाई के आंकड़ों को और अधिक चिंताजनक बताया और कहा कि मौजूदा वित्तीय परिस्थितियां काफी हद तक सख्त है या नहीं, इस पर कु कहना उनके लिए मुश्किल होगा। ऐसे में इस बात के आसार बढ़ गए हैं कि लेबर मार्केट में स्थिरता के संकेतों के बावजूद फेडरल रिजर्व की महंगाई की रफ्तार पर कड़ी नजर बनी रहेगी।

अर्थव्यवस्था पर AI को बढ़ते असर पर भी जोर

केविन वार्श ने अर्थव्यवस्था पर AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के बढ़ते असर पर भी जोर दिया। उन्होंने अभी के समय को इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ बताया। केविन के मुताबिक एआई आने वाले वर्षों में प्रोडक्टिविटी, आर्थिक विकास और काम की प्रकृति को बड़े स्तर पर बदल सकती है। बता दें कि इस साल की शुरुआत में केविन वार्श के प्रमुख बनने के बाद से फेड ने अर्थव्यवस्था पर एआई के आर्थिक असर की स्टडी तेज कर दी है। इसके लिए एक खास टास्क फोर्स बनाई गई है, जो यह जांच रही है कि यह प्रोडक्टिविटी में बढ़ोतरी, रोजगार के रुझानों और व्यापक आर्थिक गतिविधियों पर किस तरह असर डाल सकता है।

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Viral Video: कानपुर में कचरे के ढेर पर फेंकी गई एक्सपायर्ड चॉकलेट्स के लिए मची भयंकर लूट, क्या इसे बच्चों को खिलाएंगे?

Kanpur expired chocolate dump: सोशल मीडिया पर उत्तर प्रदेश के कानपुर का एक चौंकाने वाला वीडियो वायरल हो रहा है। वीडियो में दावा किया जा रहा है कि कानपुर के पनकी में कचरे के ढेर पर फेंकी गई एक्सपायर्ड टॉफियों और चॉकलेट्स को उठाने के लिए लोगों में होड़ मची हुई है। एक फैक्ट्री द्वारा कचरे में फेंकी गई इन मिठाइयों और चॉकलेट्स को इकट्ठा करने के लिए पुरुषों और महिलाएं टूट पड़े हैं। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होते ही फूड सेफ्टी, वेस्ट मैनेजमेंट और गरीबी को लेकर बहस छिड़ गई है कि कोई एक्सपायर्ड चॉकलेट के लिए कैसे क्रेजी हो सकता है और क्या लोग इसे घर ले जाकर अपने बच्चों को खिलाएंगे?

न्यूज18 की रिपोर्ट के मुताबिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर @Delhiite नाम के यूजर ने इस वीडियो को शेयर करते हुए इसे अजीब होड़ बताया है। यूजर का कहना है कि एक्सपायर्ड चॉकलेट लूटने के लिए टूट पड़े लोगों में बुनियादी कॉमन सेंस पूरी तरह से गायब नजर आया।

वीडियो के वायरल होते ही इंटरनेट पर लोगों की ओर से तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ लोगों ने जहां एक्सपायर्ड चीजों को उठाने वालों की आलोचना की और इसके हेल्थ पर पड़ने वाले खराब असर की बात कही, तो दूसरे कुछ लोगों का मानना था कि इस घटना को गरीबी और महंगाई के नजरिए से भी देखा जाना चाहिए।

महंगाई और गरीबी पर छिड़ी तीखी बहस

कचरे के ढेर पर मची इस लूट को लेकर कई यूजर्स ने देश में बढ़ती महंगाई और आर्थिक तंगी पर चिंता जताई। एक यूजर ने कमेंट करते हुए तंज कसा कि भाई महंगाई इतनी बढ़ गई है कि अब कचरा भी बजट शॉपिंग डेस्टिनेशन बन गया है। वहीं दूसरे यूजर ने सहानुभूति जताते हुए लिखा कि यह सामान्य समझ की कमी से ज्यादा गरीबी और असमर्थता को दर्शाता है। इसी गरीबी ने लोगों को कचरे से खाना उठाने पर मजबूर किया होगा। एक दूसरे व्यक्ति ने लिखा कि सोचिए उस स्तर तक पहुंचने के लिए कितनी तंगी रही होगी कि लोग इस जोखिम को उठाने के लिए तैयार हो गए।

कुछ यूजर्स ने लोगों के पहनावे को लेकर सवाल उठाए। एक यूजर ने लिखा कि जिस तरह से लोगों ने कपड़े पहने हैं, उससे लगता है कि वे सभी स्कूल और कॉलेज गए होंगे। समझ नहीं आता कि उन्हें क्या सिखाया गया है कि वे एक्सपायर्ड सामान उठा रहे हैं। दूसरे यूजर ने लिखा कि लोग फ्री की टॉफियों के लिए इंफेक्शन का खतरा मोल ले रहे हैं, ऐसा लगता है जैसे कॉमन सेंस गायब हो चुका है।

कंपनी और FSSAI पर उठे सवाल, नियमों के उल्लंघन का आरोप

इस पूरी घटना के बाद कंपनियों द्वारा खराब और एक्सपायर्ड सामान को नष्ट करने के तरीके पर भी सवाल उठे हैं। सोशल मीडिया पर एफएसएसएआई और संबंधित अधिकारियों को टैग करते हुए एक यूजर ने लिखा कि उस फैक्ट्री मालिक को जल्द से जल्द पकड़ा जाना चाहिए और सजा मिलनी चाहिए क्योंकि एक्सपायर्ड सामान को नष्ट करने की एक तय प्रक्रिया होती है। एक दूसरे यूजर ने कहा कि एक्सपायर्ड आइटम को निपटाने का यह मानक तरीका नहीं है और इसके लिए दोषी ब्रांड के खिलाफ मामला दर्ज किया जाना चाहिए।

(डिस्क्लेमर: यह लेख यूजर-जनरेटेड कंटेंट और सोशल मीडिया पोस्ट पर आधारित है। ओरिजिनल पोस्ट में किए गए दावों की मनीकंट्रोल द्वारा स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की गई है।)

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Gold vs Inflation: 46 साल के आंकड़ों से मिला जवाब, गोल्ड में निवेश महंगाई से लड़ाई में कितना कारगर

Gold vs Inflation: गोल्ड के भाव एक बार फिर तेजी से ऊपर चढ़ने लगे हैं। 24 कैरट की शुद्धता वाला 10 ग्राम गोल्ड अब करीब ₹1.64 लाख के भाव पर पहुंच गया है जबकि कुछ ही दिन पहले यह लगभग ₹1.59 लाख में मिल रहा था। हालांकि गोल्ड के भाव में इस तेजी के चलते ही इसमें निवेशकों का रुझान दिखता है बल्कि इसे बड़े पैमाने पर महंगाई की रफ्तार से बचाव के तौर पर देखा जाता है। अब सवाल ये उठता है कि क्या सोना वाकई लॉन्ग टर्म में महंगाई से लड़ाई में अच्छा हथियार साबित हुआ है और अगर हां तो कितना। इसे लेकर फंड्सइंडिया की वेल्थ कंवर्जेशंस अगस्त 2026 रिपोर्ट के डेटा से सामने आया है कि जैसे-जैसे गोल्ड रखने की अवधि यानी होल्डिंग पीरियड बढ़ती है, महंगाई से आगे रहने में इसकी रफ्तार अधिक स्थिर हो जाती है।

Gold vs Inflation: अलग-अलग टाइमफ्रेम में कैसी रही भिड़ंत

फंड्सइंडिया ने साल 1995 और साल 2025 के बीच अलग-अलग इन्वेस्टमेंट पीरियड में सोने से मिलने वाले रिटर्न और महंगाई की तुलना की। इसमें गोल्ड के रिटर्न और महंगाई के बीच सालाना औसत अंतर को मापा गया। इस डेटा के मुताबिक एक साल में दोनों के बीच किसकी रफ्तार अधिक रही, यह इस बात पर काफी निर्भर है कि गोल्ड की खरीदारी कब हुई। औसतन गोल्ड ने एक साल में इनफ्लेशन को करीब 4 पर्सेंटेज प्वाइंट्स से पीछे छोड़ दिया। हालांकि एक साल में ही खरीदारी के अलग-अलग समय के हिसाब से ही गोल्ड ने इनफ्लेशन को 24 पर्सेंटेज प्वाइंट्स तक पछाड़ दिया तो कुछ अवधि में 28 पर्सेंटेज प्वाइंट्स तक पिछड़ गई।

अब अगर पांच साल में बात करें तो गोल्ड ने महंगाई की रफ्तार यानी इनफ्लेशन को औसतन सालाना 5 पर्सेंटेज प्वाइंट्स से पीछे छोड़ा तो 10,15 और 20 साल की अवधि में भी ऐसी ही स्थिति रही। इसका मतलब है कि कम समय में जरूरी नहीं है कि गोल्ड इनफ्लेशन को पछाड़ दे लेकिन लंबे समय में यह अब तक आगे ही साबित हुआ है।

gold vs inflation

हर साल लगातार नहीं बढ़ी गोल्ड की चमक

लॉन्ग टर्म में गोल्ड ने शानदार रिटर्न दिया है और महंगाई को मात दी है लेकिन इसकी चमक लगातार हर साल नहीं बढ़ी है। इसे लेकर फंड्सइंडिया ने 1980 से लेकर अब तक गोल्ड ने कितना रिटर्न दिया, एक और एनालिसिस की। इसमें सामने आया कि इसमें जोरदार तेजी के दौर भी आए हैं तो लॉन्ग टर्म तक सुस्त रिटर्न के दौर भी रहे हैं। रोलिंग-रिटर्न डेटा के मुताबिक अलग-अलग पीरियड में गोल्ड का औसतन सालाना रिटर्न करीब 10% रहा है लेकिन शॉर्ट टर्म में रिटर्न इस बात पर बहुत निर्भर रहा कि निवेशक ने किस समय सोना खरीदा था। कुल मिलाकर यह कह सकते हैं कि इनफ्लेशन हेज यानी महंगाई के खिलाफ हथियार होने का मतलब ये नहीं है कि जब भी महंगाई बढ़ेगी, सोने की कीमत भी उसी समय बढ़ेगी या सोना हर साल महंगाई से ज्यादा रिटर्न देगा या सोने की कीमत हमेशा ऊपर ही जाएगी।

UPI Payment पर 6 साल बाद फिर लगेगा चार्ज! क्यों हो रही वापसी, किनमें बंटेगा इसका पैसा

डिस्क्लेमर: मनीकंट्रोल.कॉम पर दिए गए सलाह या विचार एक्सपर्ट/ब्रोकरेज फर्म के अपने निजी विचार होते हैं। वेबसाइट या मैनेजमेंट इसके लिए उत्तरदायी नहीं है। यूजर्स को मनीकंट्रोल की सलाह है कि कोई भी निवेश निर्णय लेने से पहले हमेशा सर्टिफाइड एक्सपर्ट की सलाह लें।

Tata cars to get pricier from September 1

Tata cars to get pricier from September 1
Tata Punch front logo

Tata cars are set to get pricier by up to Rs 25,000 from September 1, 2026. The exact price hike will vary depending on the model, but the Indian automaker cited continued inflationary pressures and rising input costs as some of the reasons behind its decision. Tata Motors stated that increasing the prices of its cars will help the company offset these challenges. Hyundai has also announced a price hike for September, with Mauruti Suzuki announcing a similar decision for August 2026.

  • Reasons include inflationary pressures and rising input costs
  • Foreign exchange volatility and high employee separation costs also cited

Tata Motors price hike in September 2026

The company said that it has been bearing the brunt of sustained inflation and input costs, but continuing to do so will begin impacting profits. One of the main culprits behind this has been the rising cost of EV batteries, becoming around 10 percent more expensive over a period of several months.

Other factors behind the September 2026 price hike include foreign exchange volatility and high employee separation costs, according to Tata Motors. The resultant hike is to affect the brand’s EV and ICE (internal combustion engine) models, with the exact model-wise breakup yet to be announced. However, prices of Tata SUVs are expected to go up across the board.

Monetary Policy : अगर महंगाई ऊंचे स्तर पर रही तो RBI ब्याज दरों में कर सकता है बढ़ोतरी – MPC मेंबर

Monetary Policy : मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी के एक्सटर्नर मेंबर सौगत भट्टाचार्य ने कहा है कि अगर महंगाई का दबाव बना रहता है तो रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) का अगला कदम ब्याज दरों में बढ़ोतरी का हो सकता है। हालांकि,उन्होंने कहा कि इस तरह का कोई भी फैसला महंगाई के आने वाले आंकड़ों और इस बात पर निर्भर करेगा कि हालिया कीमतों का दबाव और कितना गहरा होता है।

भट्टाचार्य ने कहा कि MPC के महंगाई के अनुमान और पॉलिसी स्टेटमेंट से भविष्य के कदम की दिशा का संकेत पहले ही मिल चुके हैं। उन्होंने कहा,”मुझे लगता है कि अगला कदम क्या होगा, यह साफ़ तौर पर बताया गया था,”साथ ही उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं पता कि “अगले कदम की ज़रूरत कब पड़ सकती है।”

उन्होंने आगे कहा कि चाहे दबाव खाने-पीने की चीज़ों,ईंधन या कोर कंपोनेंट्स से आ रहा हो, हेडलाइन महंगाई ही MPC का मुख्य लक्ष्य बनी हुई है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर 2026-27 में औसत महंगाई दर लगभग 5% रहती है तो महंगाई को काबू में रखने के लिए मौजूदा 5.25% पॉलिसी रेट कुछ ज़्यादा ही अकोमोडेटिव(नरम)हो सकती है। पॉलिसी मेकर ऐसी स्थिति में नहीं पड़ना चाहते जहां वे समय से कदम उठाने में पीछे रह जाएं और बाद में उन्हें ज़्यादा सख्त कदम उठाने पड़ें।

उन्होंनें इस बात की ओर भी इशारा किया कि कंपनियां बढ़ती इनपुट लागत का बोझ ग्राहकों पर डाल रही हैं। उन्होंने इसके लिए मज़बूत कॉर्पोरेट मार्जिन और क्रेडिट ग्रोथ का हवाला दिया। अगस्त की पॉलिसी समीक्षा के बाद जारी हालिया महंगाई के आंकड़े इस बात का तसदीक करते हैं कि इनपुट की कीमतों और लागत का असर आउटपुट की कीमतों पर पड़ रहा है,जिससे संकेत मिलता है कि कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

भट्टाचार्य ने कहा कि वास्तविक ब्याज दरें एक अहम पैमाना तो हैं,लेकिन पॉलिसी के लिए कोई तय बेंचमार्क नहीं हैं। उन्होंने बताया कि ब्याज दर पर फ़ैसला लेने से पहले पॉलिसी बनाने वाले कई आर्थिक पहलुओं पर विचार करते हैं।

सौगत भट्टाचार्य ने यह भी कहा कि RBI के आकलन में ग्लोबल घटनाओं जैसे US फेडरल रिजर्व और दूसरे बड़े सेंट्रल बैंकों के पॉलिसी फैसलों को भी ध्यान में रखा जाता है। हालांकि,उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारत की मॉनेटरी पॉलिसी से जुड़े फैसलों में घरेलू महंगाई और ग्रोथ ही मेन फैक्टर बने हुए हैं।

अगली MPC मीटिंग को देखते हुए,भट्टाचार्य ने कहा कि कोई भी फैसला लेने से पहले एमपीसी कमिटी महंगाई के आने वाले आंकड़ों पर बारीकी से नज़र रखेगी। अगर महंगाई की रफ़्तार और तेज़ होती है तो ब्याज दरों में जल्द बढ़ोतरी की ज़रूरत पड़ सकती है। अगर कीमतों का दबाव कम होता है तो RBI के पास पॉलिसी को सख़्त करने से पहले और इंतज़ार करने की गुंजाइश हो सकती है।

Share Market Crash: मजबूत एशियाई संकेतों के बावजूद Sensex लाल, 4 वजहों से आया Nifty आया 24300 के करीब

Share Market Crash: विदेशी निवेशकों की ताबड़तोड़ बिकवाली और लगातार दूसरे महीने आरबीआई के टारगेट रेंज से अधिक महंगाई की रफ्तार ने आज मार्केट पर तेज दबाव बनाया। वैश्विक मार्केट से मिले-जुले रुझानों के बीच सेंसेक्स 250 प्वाइंट्स से अधिक टूट गया तो निफ्टी भी फिसलकर 24300 के करीब आ गया। हालांकि ब्रोडर लेवल पर भी रुझान मिला-जुला है। निफ्टी मिडकैप 100 पर फिलहाल बिकवाली का दबाव है लेकिन निफ्टी स्मॉलकैप 100 ग्रीन है। अब घरेलू इक्विटी बेंचमार्क इंडेक्सेज की बात करें तो फिलहाल 09:45 AM पर सेंसेक्स (Sensex) 159.82 प्वाइंट्स यानी 0.20% की गिरावट के साथ 77,806.53 और निफ्टी 50 (Nifty 50) भी 90.25 प्वाइंट्स यानी 0.37% की फिसलन के साथ 24,345.70 पर है। इंट्रा-डे में सेंसेक्स 256.72 प्वाइंट्स टूटकर 77,709.63 और निफ्टी 119.65 प्वाइंट्स गिरकर 24,316.30 तक आ गया था।

Share Market Crash: ये है वजह

महंगाई की तेज रफ्तार

जुलाई में महंगाई 19 महीने के ऊपरी स्तर पर पहुंच गई है। लगातार चौथे महीने इसमें इजाफा हुआ है और लगातार दूसरे महीने यह आरबीआई के 2-4% के टारगेट रेंज से ऊपर रहा। जुलाई में रिटेल महंगाई दर मासिक आधार पर 4.38% से बढ़कर 4.45% पर रही है। खाने-पीने की चीजों ने महंगाई बढ़ाई है।

विदेशी निवेशकों की बिकवाली

एक कारोबारी दिन पहले 12 अगस्त को विदेशी निवेशकों ने इक्विटी मार्केट में खरीदारी से अधिक बिकवाली की जिसका दबाव आज मार्केट में दिख रहा है। विदेशी निवेशकों ने ₹1002.50 करोड़ के शेयरों की नेट बिक्री की।

बैंकिंग स्टॉक्स में बिकवाली का दबाव

मार्केट को आज बैंकिंग शेयरों में बिकवाली का दबाव झेलना पड़ा है। सरकारी और प्राइवेट, दोनों सेक्टर्स के बैंकों के निफ्टी इंडेक्स में आधे-आधे फीसदी से अधिक की गिरावट है तो निफ्टी मेटल और निफ्टी फार्मा में भी आधे फीसदी की गिरावट है। निफ्टी ऑटो फिलहाल ग्रीन है लेकिन इसमें बढ़त आधे फीसदी से कम ही है।

Sensex की वीकली एक्सपायरी

सेंसेक्स के इंडेक्स डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स की आज वीकली एक्सपायरी है तो इसका मार्केट पर दबाव दिख रहा है।

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Retail Inflation : लगातार चौथे महीने महंगाई बढ़ी, रिटेल इंफ्लेशन जुलाई में 4.45% हुई; RBI के लिए बढ़ेगी मुश्किल

डिस्क्लेमर: यहां मुहैया जानकारी सिर्फ सूचना के लिए दी जा रही है। यहां बताना जरूरी है कि मार्केट में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेशक के तौर पर पैसा लगाने से पहले हमेशा एक्सपर्ट से सलाह लें। मनीकंट्रोल की तरफ से किसी को भी पैसा लगाने की यहां कभी भी सलाह नहीं दी जाती है।

Retail Inflation : लगातार चौथे महीने महंगाई बढ़ी, रिटेल इंफ्लेशन जुलाई में 4.45% हुई; RBI के लिए बढ़ेगी मुश्किल

Retail Inflation : रिटेल महंगाई जुलाई में लगातार चौथे महीने बढ़ी है। कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) आधारित महंगाई सालाना आधार पर बढ़कर 4.45% हो गई। जून में यह 4.38% थी। खाने-पीने की चीजों की कीमतों में बढ़ोतरी इसका बड़ा कारण रही।

जुलाई में महंगाई लगातार दूसरे महीने RBI के 4% के लक्ष्य से ऊपर रही। अप्रैल में महंगाई 3.48% थी। इसके बाद मई में 3.93%, जून में 4.38% और जुलाई में 4.45% हो गई। यानी अप्रैल से अब तक महंगाई करीब 1 प्रतिशत अंक बढ़ चुकी है।

खाने-पीने की चीजों ने बढ़ाई महंगाई

जुलाई में Consumer Food Price Index (CFPI) आधारित महंगाई 5.52% रही। जून में यह 5.32% थी। ग्रामीण इलाकों में खाने-पीने की महंगाई ज्यादा रही। यहां यह 5.79% रही। शहरी इलाकों में यह 5.05% थी।

इसी वजह से आने वाले महीनों में भी महंगाई बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। ICRA के मुताबिक, अगस्त में रिटेल महंगाई 4.7% तक पहुंच सकती है।

गांवों में महंगाई का ज्यादा दबाव

ग्रामीण भारत में कुल रिटेल महंगाई जुलाई में 4.84% रही। जून में यह 4.74% थी। वहीं, शहरी महंगाई 3.93% से मामूली बढ़कर 3.96% हो गई। खाने-पीने की चीजों के अलावा कपड़े और जूते भी ग्रामीण इलाकों में ज्यादा महंगे हुए। ग्रामीण क्षेत्रों में इनकी महंगाई 3.97% रही। शहरी क्षेत्रों में यह 2.41% थी।

कुछ सेवाओं की कीमतों में भी तेज बढ़ोतरी हुई। जुलाई में रेस्टोरेंट और होटल से जुड़ी सेवाओं की महंगाई 7.72% रही। ट्रांसपोर्ट की महंगाई 4.43% और पर्सनल केयर, सोशल प्रोटेक्शन, अन्य सेवाओं की महंगाई 14.77% रही।

अदरक, लहसुन और प्याज ने रुलाया

रसोई में इस्तेमाल होने वाली कुछ चीजें जुलाई में काफी महंगी हुईं। अदरक की कीमतों में सालाना आधार पर 83.62% की बढ़ोतरी हुई। जून में यह 50.41% थी। लहसुन की महंगाई भी 17.93% से बढ़कर 35.36% हो गई। प्याज की कीमतें भी तेजी से बढ़ीं। प्याज की महंगाई जून के 4.73% से बढ़कर जुलाई में 22.54% हो गई।

हालांकि, कुछ सब्जियों ने राहत दी। जुलाई में टमाटर की कीमत सालाना आधार पर 4.59% घटी। जून में टमाटर 31.92% महंगा था। आलू की कीमत 16.56% और भिंडी की कीमत 5.52% घटी।

सोना-चांदी भी महंगे

महंगाई के आंकड़ों में कीमती धातुओं की कीमतों में भी तेज बढ़ोतरी दिखी। जुलाई में चांदी के आभूषणों की कीमत सालाना आधार पर 109.84% बढ़ी। सोने, हीरे और प्लैटिनम के आभूषण भी महंगे हुए। इनकी कीमतों में क्रमशः 32.98% की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

आगे ब्याज दरों पर क्या होगा?

महंगाई बढ़ने से RBI के लिए ब्याज दरों को लेकर फैसला थोड़ा मुश्किल हो सकता है। RBI ने हाल में रेपो रेट को 5.25% पर बरकरार रखा था। कोटक महिंद्रा बैंक की चीफ इकोनॉमिस्ट उपासना भारद्वाज के मुताबिक, बारिश, कच्चे तेल की कीमत और इनपुट लागत पर नजर रखना जरूरी होगा। उनका मानना है कि वित्त वर्ष 2027 की तीसरी तिमाही से महंगाई 5% के ऊपर जा सकती है।

ICRA की चीफ इकोनॉमिस्ट अदिति नायर ने कहा कि वित्त वर्ष 2027 में औसत CPI महंगाई करीब 5% रह सकती है। पश्चिम एशिया में तनाव और मानसून इसके लिए बड़े जोखिम हैं। अगर महंगाई का दबाव दूसरी चीजों तक भी फैलता है, तो दिसंबर 2026 की बैठक में RBI ब्याज दर बढ़ाने पर विचार कर सकता है।

तेलंगाना में सबसे ज्यादा महंगाई

राज्यों की बात करें तो जुलाई में तेलंगाना में महंगाई सबसे ज्यादा 6.32% रही। इसके बाद आंध्र प्रदेश में 5.72% और तमिलनाडु में 5.44% रही। वहीं, मिजोरम में महंगाई सबसे कम 1.84% रही। मेघालय में यह 2.31% और त्रिपुरा में 2.32% रही। दिल्ली में भी महंगाई अपेक्षाकृत कम 2.68% रही।

कुल मिलाकर, जुलाई के आंकड़े बताते हैं कि महंगाई का दबाव धीरे-धीरे बढ़ रहा है। अभी इसकी बड़ी वजह खाने-पीने की चीजें और कुछ सप्लाई से जुड़ी समस्याएं हैं। अगर यह दबाव आगे भी बना रहता है, तो इसका असर RBI की ब्याज दरों की अगली रणनीति पर पड़ सकता है।

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